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वायु, जल और भूमि प्रदूषण

Author: 
डॉ. इन्दु टिकेकर
Source: 
सन्तुलित पर्यावरण और जागृत अध्यात्म, 2006

मिट्टी की उर्वरा शक्ति क्षीण कर देने वाला एक अन्य महत्त्व का कारण वही है जिससे नदियों के पानी का प्रवाह अनियमित हो जाता है। यह हमने देखा है। विकास के लिये उद्योग, उद्योगों के लिये मार्ग-निर्माण एवं मार्ग-प्रशस्त और अधिकाधिक बनाने के लिये वन-विनाश और फिर भू-क्षरण, भूमि-स्खलन यह शृंखला दुष्ट-चक्र बनकर भूमि और जल-प्रवाहों पर आघात करती जाती है!

पिछले कुछ वर्षों से नागरी सभ्यता में ध्यान में आने लायक कुछ बातें प्रचलित हुई हैं ऐसा दिखता है। जुहू के या मद्रास-त्रिवेंद्रम के सागर तटों पर केवल मजे में चक्कर लगाने वालों की इतनी भीड़ नहीं रहती, इन तटों पर विस्तृत फैली रेत पर हेतुपूर्वक दीर्घश्वास लेते हुए गतिशील कदम बढ़ाने वाले गम्भीर, प्रौढ़ और तरुण स्त्री-पुरुषों की तादाद बढ़ती जा रही है। यही दृश्य सार्वजनिक बगीचों में, नदी-तटों पर और मैदानों में या जिनके दोतरफा वृक्ष झूम रहे हों ऐसे मार्गों पर, शान्त, एकान्त पथों पर भी दिख पड़ता है। शुद्ध वायु की, शान्त, निर्विघ्न पगडण्डियों को ढूँढकर सुशिक्षित, सुबुद्ध लोग विशेष रूप से प्रातःकालीन मुक्त समय में एक्सरसाइज की, प्राणायाम की परिपाटी चला रहे हैं।

प्रातःकाल में अन्य एक परिपाटी भी लोकमान्य हो गई है। योगासन सीखकर नियमपूर्वक कुछ आसन करने वाले प्रौढ़, तरुण तथा कम उमर के लड़के-लड़कियाँ करीब सभी छोटे-बड़े शहरों में दिखने लगे हैं। अंग्रेजी शिक्षा के परिणामस्वरूप सुन्दर संस्कृत ‘योग’ शब्द को विकृत ‘योगा’ बनाकर उसके असंख्य क्लासेस चलाए जा रहे हैं। बड़े सवेरे टीवी पर भी ‘योगा’ केन्द्रों की यह कवायतें दिखाई जाती हैं।

इसी तरह टीवी पर सवेरे-सवेरे हर घर में जहाँ-जहाँ वृद्ध और अच्छी उमर वाले लोग होते हैं वहाँ बैठक के कमरे में रंगीन दूरदर्शन पर किसी विख्यात प्रवचनकार साधु-महात्माओं के प्रवचन प्रसारित होते रहते हैं। उनके ये भाषण सुने जाते हैं। उन पर चर्चा भी कुछ जगहों पर होती है। जिन छोटे ग्रामों में शिक्षित समाज होगा वहाँ भी योगासन और प्रवचन-श्रवण की लोकप्रियता बढ़ रही है।

ये सारे इष्ट परिवर्तन आरोग्य के लिये, रोग मुक्ति के लिये तो हैं ही, साथ ही जीवन के गहरे आशय और अर्थ समझ लेने की प्रवृत्ति भी कुछ प्रमाण में व्यक्त हो रही है। इसे एक तरह की सामाजिक जागृति ही कहना होगा। लेकिन इस जागृति के पीछे कोई महत्त्व का कारण है या यह केवल एक फैशन है?

रोज का अखबार पढ़ने वाले किसी भी प्रबुद्ध व्यक्ति के ध्यान में आसानी से आ जाता है कि मात्र अपने निकटवर्ती बस्ती में, गाँव या शहर में ही नहीं, बल्कि सारे देश में, सभी प्रान्तों में सभी नगरों में वायु-प्रदूषण मर्यादा लाँघकर फैल चुका है। रास्तों पर चलते समय, वाहनों पर दौड़ लगाते वक्त श्वास लेना असम्भव हो गया है। श्वास का रोग सर्वत्र बढ़ रहा है। सर्वत्र व्याप्त धुएँ से, कार्बन मोनोऑक्साइड और डाइऑक्साइड इन जीवन के लिये हानिकारक वायुओं का प्रमाण शुद्ध प्राण वायु से अधिक हो जाने से सिर्फ श्वास पर ही नहीं, आँखों पर, पाचन क्रिया पर भी इनका विपरीत परिणाम होता रहता है। अच्छे जानकार लोगों को यह भी मालूम पड़ा है कि विदेशों में अति विकसित देशों में एसिड वर्षा हो रही है। घर बार, वन, खेत सभी जगहों पर जीवनदायी प्राण वायु क्षीण होकर इस प्राण-घातक, सर्व-विनाशक रसायन को निमंत्रित करती जा रही है। हमारे स्वयं निर्मित किये वाहन और कल कारखानों की भट्टियाँ कार्बन मोनो और डाइऑक्साइड के साथ अन्य हानिकारक वायु भी पूरे पर्यावरण को प्रदूषित करती हुई फैलाती है।

पत्थर के कोयले के धुएँ से निर्मित अम्ल या एसिड संगमरमर, वनस्पति, वस्त्र इत्यादि द्रवित करता, जलाता रहता है। ताजमहल के सौन्दर्य को शापित करने वाला सल्फर डाइऑक्साइड मथुरा में स्थित तेल संशोधक कारखाने से प्रवाहित होता था। जागृत समाज-सेवकों के सत्याग्रह के कारण ताजमहल बच सका है।

मोटरें और जनरेटर्स हम हमेशा इस्तेमाल करते हैं। बिजली ऑफ होते ही लोग घरों में, दुकानों में, फैक्टरियों में जनरेटर्स उपयोग में लाते हैं। इनमें पेट्रोल और गैसोलीन के साथ शीशा धातु की आवश्यकता पड़ती है। इनका मिश्रित धुआँ पर्यावरण की मार्फत सर्वत्र मनुष्य, पशु, पक्षी में प्रविष्ट होकर कितने ही रोग फैलाता है। बच्चे मन्द बुद्धि होते हैं और कैंसर की वृद्धि का भी यह एक महत्त्व का कारण होता है।

बीड़ी, सिगरेट, हुक्के का धुआँ, वास्तव में, तमाखू, चरस इत्यादि का ही धुआँ है। इन व्यसनों के आदी लोग ही कैंसर के शिकार होते हैं ऐसा नहीं, उनके पास बैठे हुए निरपराध सज्जन भी इस जानलेवा बीमारी को मुफ्त में पा लेते हैं।

एसी वाले घर एवं फ्रिज से निकलने वाली क्लोरीन गैस के कारण भी वायु-प्रदूषण होता है। आवाज की गति से उड़ने वाला जेट हवाई जहाज बहुत ऊँचाई पर से चलता है उसके इंजिन में से निकलने वाले नाइट्रिक ऑक्साइड भी भयंकर प्रदूषणकारी है। क्लोरीन और नाइट्रिक ऑक्साइड ये दोनों मिलकर पृथ्वी के ओजोन का कवच जीर्ण-शीर्ण बना डालते हैं। धरती के चारों ओर 20-25 किलोमीटर के पश्चात फैली ओजोन की परत सूरज की तरफ से आने वाले अल्ट्रा वायलेट (पराबैंगनी) के घातक किरणों को सौम्य, सह्य बनाकर धरती पर पनपने वाले जीवन को पोषक हो सके इतना ही इन किरणों का परिणाम हो ऐसा सिफत प्रारम्भ से ही करती आई है।

आधुनिक मानव की अमर्याद भोग वृत्ति के कारण दक्षिण ध्रुव के निकट इस ओजोन कवच में छेद हो गया है। ऑस्ट्रेलिया के लोगों को त्वचा के कैंसर की पीड़ा इसी वजह से सहनी पड़ती है। अपने पृथ्वी ग्रह की ऊष्मा बढ़ाकर ‘ग्रीन हाउस’ का निर्माण करने का कार्य इन्हीं विषैली वायुओं का है।

यह तो हुई वातावरण के सुरक्षा कवच की कथा लेकिन अपनी मातृभूमिक मस्तक पर विराजमान हिम शिखरों के मुकुट की अवस्था हिमालय के तीर्थ क्षेत्रों में पहुँचे पेट्रोल और डीजल के धुएँ ने क्या कर डाला है इसकी बहुत थोड़े लोगों को कल्पना होगी। अनेक वर्ष पहले परदेशों में से आये कुछ युवकों से पूछा गया- ‘यहाँ हिमालय में आपको विशेष आकर्षण किस बात का लगा?’ उनके उद्गार थे- ‘the blue and beautiful sky of the himalayas that we love most’ (हिमालय का नील और मनोरम आकाश हमें सबसे प्यारा लगा।) आज गंगोत्री के दस हजार फीट से अधिक ऊँचाई पर विराजमान मन्दिर को करीब-करीब स्पर्श करके अनेक किलोमीटर दूरी तक भैरव घाटी तक मोटरें, ट्रक्स व अन्य वाहनों की लाइनें खड़ी हैं। क्योंकि पर्यटन का उद्योग पनप गया है। वाहन और मानव-समाज की भीड़ को स्थान देकर उनका स्वागत करने के लिये गंगोत्री ग्लेशियर (हिमनद) पीछे-पीछे हटता जा रहा है। अवकाश की शान्ति और आकाश की नीलिमा दोनों को ही अपना मुख छिपाना पड़ रहा है।

तीस-चालीस वर्षों के पश्चात फिर से गढ़वाल को देखने आये एक वृद्ध समाज-सेवक दुःख से कहने लगे- ‘आपका हिमालय तो बिल्कुल गंजा हो गया है!’ वाहनों के अति बढ़े हुए आवागमन के लिये सड़कों का निर्माण और सड़कों के कारण हुए वन-विनाश यह हिसाब सरल ही है। धूल और धुओं का साम्राज्य साफ, निर्मल और पवित्र वातावरण को व्याप्त करके फैल गया है।

वायु-प्रदूषण के साथ स्पर्धा कर सकता है ऐसा जल प्रदूषण भी धरती का जीवन खतरे में डाल रहा है। पूर्णतः शुद्ध जल के लिये प्रसिद्ध बिसलेरी बोतलों का पानी भी प्रदूषण से दूषित हो गया है। कहीं-कहीं समूचे देश को ही नहीं, सारी दुनिया को भी पानी पिलाने वाली सभी छोटी बड़ी नदियाँ, जलस्रोत, हैण्डपम्प, तालाब इत्यादि पीने योग्य स्वच्छ, साफ जल उपलब्ध करा सकेंगे यह विश्वास करना अब असम्भव सा हो गया है। कहीं रासायनिक उर्वरकों के कारण, कहीं कारखानों के रासायनिक द्रव-पदार्थों की वजह से तो कहीं प्लास्टिक की न पिघलने वाली चीजों व थैलियों के कारण और सभी बड़े शहरों की नालियों के नदियों-तालाबों में प्रविष्ट होने वाले नारकीय जल के कारण समूचे जल क्षेत्र प्रदूषित, रोग फैलाने वाले बन चुके हैं। अनेक मंजिल वाली इमारतों को जल आपूर्ति करने वाले प्लास्टिक के प्रचण्ड ड्रम्स में और सीमेंट की टंकियों में छिपकलियों के और अन्य जीव-जन्तुओं के सड़े हुए अवशेषों ने प्रदूषणों को और विस्तृत बना डाला है- यह आक्रोश भी सुनाया जाता रहा है।

जल प्रदूषण का सबसे बड़ा हिस्सा सर्वाधिक विशाल जलाशय को यानी सागर-महासागरों को मिला है, यह स्पष्ट ही है। तट पर रहने वाले सागर-जीवी मानवों के सिवाय उसके सबसे अधिक परिणाम भुगतने वाले अन्य कौन होंगे? एक जापान का ही उदाहरण इसे स्पष्ट करने के लिये काफी है। पारा मिश्रित रसायन की फैक्टरी से निकले प्रवाह से जलचर प्राणी प्रभावित हुए। जिन लोगों को उस तरफ के सागर की मछलियाँ खानी पड़ी उन सबको इटाई-इटाई नाम की स्नायु-तंत्र को जकड़ा देने वाली बीमारी हुई। आखिर मछली बेचने और खाने पर पाबन्दी लगा दी गई। किन्तु इससे ना मछलियों की जानें बच सकीं ना मछुआरों के पेट भर सके! जापान के कर्तव्य तत्पर अधिकारी गणों ने, सरकार ने उनकी चिन्ता भी की होगी। अपने यहाँ दक्षिण की तरफ के सागर तट के निवासी मछुआरों की आजीविका समाप्त हो गई देश के आर्थिक उदारीकरण की नीति की वजह से! प्रदूषण के प्रकार कितने और कहाँ-कहाँ व्याप्त होंगे इसकी गिनती भी कैसे करें?

और अपने देश की नदियाँ केवल प्रदूषित ही नहीं हैं, उनका अस्तित्व भी खतरे में आया है, यह कितनों को मालूम हुआ है? ‘हर गंगे’, ‘हर भागीरथी’ कहते हुए श्रद्धापूर्वक इस इतिहास प्रसिद्ध नदी में डुबकी लगाने वाले लाखों-लाख भक्तों की कल्पना को भी छू न सकेगा ऐसा विदारक भवितव्य वैज्ञानिकों ने प्रकट किया है : दुनिया में हिमनदों पर पुष्ट होने वाली नदियों की आयु इस शताब्दी में पचास वर्षों से अधिक होगी नहीं, महाकाव्यों में और वेदों में भी जिन नदियों के स्तोत्र गाये गए हैं उन्हें केवल बीमार नहीं, नष्ट करने तक आज के औद्योगिक विकास ने मंजिल तय कर दी है!

आद्य शंकराचार्य प्रज्ञावान अख्खड़ सन्यासी थे। उनके पास भावुकता फटकती नहीं थी। लेकिन उन्होंने गंगा का जो अद्भुत वर्णन किया है उसे संस्कृत काव्य में अतुलनीय ही कहना होगा। अपने स्तवन में वे गंगाजी की महिमा इस प्रकार कथन करते हैं :

विधिर्विष्णुः शम्भुस्त्वमसि पुरुषत्वेन सकला।
रमोमागीमख्या त्वमसि ललना जह्नुतनये।
निराकारागाधा भगवति सदा त्वं विहरसि।
क्षितो नीराकारा हरसि जनतापान् स्वकृपया।।


हे ऐश्वर्य शालिनी गंगे, साकार रूपों में तुम स्त्री और पुरुष उभयविध हो। एक तरफ से तुम ब्रह्मा, विष्णु और महेश हो, तो दूसरी अभिव्यक्ति में तुम, हे जाह्नवी, सरस्वती, रमा और उमा हो। निराकार, सर्व-व्याप्त ऐसे ब्रह्म स्वरूप भी तुम ही हो। तुम्हारी महत्ता का पार नहीं पाया जा सकता। पृथ्वी पर नित्य प्रवाहित जलरूपिणी बनकर संसार-तप्त प्राणियों का दुःख तुम करुणार्द्र होकर हरण कर लेती हो।

गंगा-जल तांबे के लोटे में बन्द रखा जाता है और वर्षानुवर्ष उसका स्वरूप शुद्ध, जैसा का वैसा ही रहता है यह वैज्ञानिक कसौटी से सिद्ध हुआ है। इस जल के चार बूँद मरणोन्मुख व्यक्ति के मुख में डालने से उसकी मुक्ति निश्चित हो जाती है यह श्रद्धा शतकानुशतक, हर पीढ़ी में भारत में प्रवाहित होती आई है। यह जल उत्तर व पूर्वी भारत के अनेक शहरों के निकट से वक्र गति में बहता हुआ सागर में मिलता रहा है-उसका वरदान देने वाली भागीरथी को अब नष्ट प्राय करने के लिये हमारी विकृत विकास की कार्य-पद्धति कारणभूत बन रही है और इसी को विकास का यश मानने की जबरदस्ती हो रही है!

गंगा-स्मृति से जुड़ी हुई दूसरी हिमालयीन नदी है जमुना जी। जमुना के तट पर बसे एक विख्यात तीर्थ क्षेत्र में वर्षानुवर्ष रहकर श्रीकृष्ण का यश-गान करने वाले एक महान सम्प्रदाय के गुरू ने गहरे विषाद से कहा- “अब हम हमारी इस पवित्र नदी के जल में न स्नान कर सकते हैं, ना आचमन ले सकते हैं उसका। बड़े शहरों के मल-मूत्र के और कारखानों के रसायनों के प्रवाहों का वाहन करने वाला इसका पात्र बन चुका है।”

दक्षिण भारत की नदियों की भी यही गाथा है। देश-भर में अनेक नदियों के पात्रों में अब ऐसा बोर्ड लिखना पड़ेगा ऐसी स्थिति है : ‘पूर्वकाल में कभी यहाँ एक जीवन्त नदी बहती थी!’ आज शेष हैं केवल रेत और पत्थरों का बिखरा हुआ संसार! भविष्य के दर्शन करने वाले कुछ अनुभव प्राप्त विचारकों का कथन है कि भविष्य की लड़ाइयाँ पानी के प्रश्न पर होने की सम्भवाना है। अनेक तरह के झगड़े तो प्रान्त-प्रान्त में, देश की सीमावर्ती क्षेत्र में खड़े हो ही गए हैं। आचार्य विनोबा भावे कहते थे कि नदी दो तटों पर बसने वाले लोगों को जोड़ने वाली होती है, वह मनुष्य को मनुष्य से तोड़ने वाली नहीं होती है। लेकिन हमने नदी ही नाम शेष कर दिखा दी।

नदियों का जल-क्षेत्र मर्यादित करने वाले और उन्हें सुखा देने वाले दो महत्त्व के कारण और भी हैं। नदियों के जन्मस्थान के आस-पास और उसके प्रवाह के मार्ग के निकट भी जहाँ-जहाँ वन-विनाश किया जाता है, वहाँ भूमि-क्षरण और स्खलन की समस्या गम्भीर रूप लेती है। बन जल-सुरक्षा के लिये नैसर्गिक बाँध का कार्य ही करते हैं। वर्षाजल एकदम बहा देने के बदले वृक्ष उसे अपनी जड़ों रूपी पंजों से पकड़कर रखते हैं और धीरे-धीरे प्रवाहित करते हैं। इससे वर्षाकाल के जल-प्रवाह में शीतकालीन प्रवाह से जल की मात्रा अत्यधिक नहीं रहती। इससे नदियों की आयु बढ़ती है, जल-संभार नियमित रूप से प्रवाहित होता रहता है। वृक्षों का सुरक्षा दल नष्ट हो गया कि नदियों में किनारों की गाद भर जाती है, पात्र उथले बनते हैं और वर्षा का पानी एक साथ बहता हुआ यह सारी सम्पदा बड़े बाढ़ों के साथ सागर तक लुढ़का ले जाता है! इसलिये जलागम क्षेत्रों के वनों के साथ छेड़छाड़ करना और किनारों को वृक्षहीन करना खतरे से खाली नहीं है। लेकिन यही होता आया है दुर्दैव से।

विकास के नाम से हुई और एक गम्भीर दुर्घटना है, प्लास्टिक की असंख्य सुविधाजनक चीजों की निर्मिति और पॉलीथिन की अनगिनत थैलियों का यत्र-तत्र-सर्वत्र होता जा रहा अमर भण्डार! ये चीजें और थैलियाँ एक बार बन गईं कि इन्हें पिघला देना और जमीन तथा जल के लिये वरदान बना देना सम्भव ही नहीं होता है। इन्हें जला देने से वायु-प्रदूषण में भयंकर बाढ़ आ जाती है। इसलिये इस वरदान के रूप में आये विकास को अभिशाप के रूप में पाया जा रहा है। इनको री-साइक्लिंग करके नया रूप तो दिया जा सकता है, किन्तु इनको मिला हुआ अमर पट्टा ज्यों-का-त्यों रहता ही है। यहाँ तक कि फेंकी हुई थैलियों को खा-खाकर बीमार हो गई गाय के पेट पर शल्य क्रिया करके पाया गया कि 48 किलो पॉलिथीन जैसा का वैसा ही सुरक्षित है। जम्मू की 1998 में घटित सत्य कथा है यह! इनको अधिकतर अन्य कचरे के साथ जल में ही प्रवाहित किया जाता है। नदियाँ, तालाब, सागर इनमें मृत्युलोक की यह अमर्त्य सम्पदा जल-प्रवाह रोकने का यशस्वी कार्य करती जाती है।

भूमि प्रदूषण का भी इन्हीं थैलियों से, चीजों से होना बिल्कुल स्वाभाविक है। इन पर पूर्णरूप से पाबन्दी लगाने का समय कब आने वाला है यह तो आधुनिक विकास के अध्वर्यु भी नहीं बता पाएँगे, क्योंकि इनकी अनुपस्थिति में आराम की जिन्दगी जीना असम्भव हो जाएगा तो क्या करेंगे?

ऐसे ही उपस्थित किये आधुनिक विकास की अपरिहार्यता के अनेक कारणों से वायु और जल प्रदूषण बढ़ते गए। इनके साथ ही भूमि को भी प्रदूषित एवं सत्त्वहीन बन जाने के सिवा अन्य मार्ग ही कहाँ रह सकता था? नए युग-प्रवर्तक रासायनिक कीटनाशकों का और उर्वरकों का उपयोग करके अधिक-से-अधिक उत्पादन लेने में खेती उद्योग ने खूब पराक्रम दिखाया। इसके परिणाम से धरती की पोषण क्षमता तो घट गई ही है, साथ ही मानवी जननी के दूध में भी डीडीटी का अंश पाया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी पर जीने वाले करीब सभी प्राणियों के शरीर में खेतों में और उद्योगों में इस्तेमाल हुए विभिन्न रसायनों के अंश पाये जाते हैं। अत्यन्त हानिकारक कार्सिनोजेन्स किंवा म्यूटोजेन्स जीवमात्रों का जीना असम्भव कर सकते हैं। मानवी कार्यकलापों के कारण हर दिन सैकड़ों जीव-जन्तुओं की जातियाँ नष्ट की जाती होंगी ऐसा अन्दाज तो वैज्ञानिकों ने व्यक्त किया ही है। विज्ञान को इनमें से बहुत कम जातियों की जानकारी है। प्राकृतिक जीवन में किये गए इन विघातक हस्तक्षेपों के कारण धरती का मैग्नेटिक क्षेत्र बदल रहा है। इसका आबोहवा पर निकट भविष्य में क्या परिणाम होगा बता नहीं सकते, क्योंकि अस्थिरता उसकी प्रकृति बन गया है। इसी तरह का ‘विकसित’ जीवन जीने की प्रवृत्ति चलती रहेगी तो धरती पर किसी जीव-जन्तु का जीना सम्भव नहीं होगा!

इस भावी को टालने के लिये समझदार कृषकों ने जमीन की विषाक्तता मिटा देने की प्रक्रिया प्रारम्भ की है। नैसर्गिक खाद डालकर या बगैर खाद डाले अनाज-उत्पादन लेने की तैयारी अनेकों को पसन्द है। वह आवश्यक है, यह भी अनेक कृषक मानते हैं। खेतों में ही यह प्राकृतिक खाद का उत्पादन हरे पत्तों में से सूखे, सड़े हुए वृक्षों के अवशेषों में से सहज हो सकता है। लेकिन बड़े उर्वरक कारखानों को खड़ा करना और वह भी विदेशी मदद से करना आवश्यक है इस गलतफहमी का क्या होगा? अंधश्रद्धा का विषय है वह!

रासायनिक उर्वरकों से उत्पादित किया हुआ शाक कुछ समय सुन्दर दिखता है, लेकिन बहुत जल्द सड़ता है और स्वादहीन होता है। जमीन इन उर्वरकों के कारण अधिक पानी की माँग करती है और उर्वरकों की उसकी भूख भी बढ़ती ही जाती है, वह मानों उनकी ‘अडिक्ट’ बन जाती है। जमीन का कस नष्ट करने की ही यह प्रक्रिया है। इसका अर्थ यही निकलता है कि सूद के खातिर मूल पूँजी ही खत्म करने की मूर्खता विकास के लाभ के नाम से चलाई जाती है। ऐसे ठगाने वाले विकास के बारे में मोह निराश होने पर प्राकृतिक सब्जियाँ और अनाज इत्यादि के लिये लोग प्रयास करते रहेंगे यह स्वाभाविक है। गाँधी आश्रमों में या कुछ खास दुकानों में प्राकृतिक पद्धति से उत्पादित गन्नों का गुड़ रखा जाता है। लेकिन इन ‘नैसर्गिक’ खाद्य पदार्थों को प्राप्त करने के लिये बहुत अधिक दाम देना पड़ता है। ‘विकसित’ और ‘विकासशील’ देशों में इन खास पदार्थों के लिये विशेष होटल्स खोल दिये गए हैं। परन्तु गरीबों का विचार कौन करेगा? उनके लिये शुद्ध व निरोग आहार की व्यवस्था करने के लिये विकसित कहे जाने वाले देशों में किसके पास समय और विवेक होता है?

मिट्टी की उर्वरा शक्ति क्षीण कर देने वाला एक अन्य महत्त्व का कारण वही है जिससे नदियों के पानी का प्रवाह अनियमित हो जाता है। यह हमने देखा है। विकास के लिये उद्योग, उद्योगों के लिये मार्ग-निर्माण एवं मार्ग-प्रशस्त और अधिकाधिक बनाने के लिये वन-विनाश और फिर भू-क्षरण, भूमि-स्खलन यह शृंखला दुष्ट-चक्र बनकर भूमि और जल-प्रवाहों पर आघात करती जाती है! धरती की उर्वरा शक्ति का बाढ़ों के साथ सागर गामी हो जाना यह अभिशाप वृक्ष-विनाश का नतीजा है।

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