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किशनगंगा विवाद पर विश्व बैंक का दखल


भारत ने इस परियोजना की शुरुआत 2007 में 3642.04 करोड़ की लागत से की थी। न्यायालय के फैसले के परिप्रेक्ष्य में प्रश्न यह खड़ा होता है कि यदि किसी साल पानी कम बरसता है और किशनगंगा नदी बाँध में पानी छोड़ने के लायक रह ही नहीं जाता है तो ‘रन ऑफ दी रीवर’ प्रणाली का सिद्धान्त अमल में कैसे लाया जाएगा? इस दृष्टि से यह फैसला सिंधु जल संधि की संकीर्ण व्याख्या है। कालान्तर में पाकिस्तान को यदि इस फैसले के मुताबिक पानी नहीं मिलता है तो उसे यह कहने का मौका मिलेगा कि भारत अन्तरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय के फरमान का सम्मान नहीं कर रहा है। विश्व बैंक किशनगंगा और राटले पनबिजली नदी परियोजनाओं में अनचाहा दखल देकर भारतीय हितों पर कुठाराघात कर रहा है। इन परियोजनाओं को लेकर पाकिस्तान ने विश्व बैंक को शिकायत कर पंचाट के गठन की माँग की थी। दूसरी तरफ भारत ने निष्पक्ष तकनीकी विशेषज्ञ नियुक्त करने की माँग की थी। इन दोनों ही माँगों पर अमल करते हुए विश्व बैंक ने पंचाट का गठन भी कर दिया और विशेषज्ञ की नियुक्ति भी कर दी।

एक साथ दो समानान्तर तंत्र विकसित किये जाने से भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने कड़ी आपत्ति जताई है। क्योंकि भारत उन कार्यवाहियों का हिस्सा नहीं हो सकता जो सिंधु जल संधि के अनुरूप नहीं हैं। जाहिर है, सरकार अन्य विकल्पों पर विचार करेगी और फिर उसी के अनुरूप कदम आगे बढ़ाएगी।

मालूम हो, विश्व बैंक की मध्यस्थता में 19 सितम्बर 1960 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान ने सिंधु जलसंधि पर हस्ताक्षर किये थे। इसके अन्तर्गत पाकिस्तान से पूर्वी क्षेत्र की तीन नदियों व्यास, रावी व सतलुज की जलराशि पर नियंत्रण भारत के सुपुर्द किया गया था और पश्चिम की नदियों सिंधु, चेनाब व झेलम पर नियंत्रण की जिम्मेवारी पाक को सौंपी गई थी। इसके तहत भारत के ऊपरी हिस्से में बहने वाली इन छह नदियों का 80.52 यानी 167.2 अरब घनमीटर पानी पाकिस्तान को हर साल दिया जाता है। जबकि भारत के हिस्से में महज 19.48 प्रतिशत पानी ही शेष रह जाता है।

नदियों की ऊपरी धारा (भारत में बहने वाला पानी) के जल-बँटवारे में उदारता की ऐसी अनूठी मिसाल दुनिया के किसी भी अन्य जल समझौते में देखने में नहीं आई है। इसीलिये अमेरिकी सीनेट की विदेशी मामलों से सम्बन्धित समिति ने 2011 में दावा किया था कि यह संधि दुनिया की सफलतम संधियों में से एक है। लेकिन यह संधि केवल इसलिये सफल है, क्योंकि भारत संधियों की शर्तों को निभाने के प्रति अब तक उदार एवं प्रतिबद्ध बना हुआ है। जबकि जम्मू-कश्मीर को हर साल इस संधि के पालन में 60 हजार करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ता है। भारत की भूमि पर इन नदियों का अकूत जल भण्डार होने के बावजूद इस संधि के चलते इस राज्य को बिजली नहीं मिल पा रही है।

दरअसल सिंधु संधि के तहत उत्तर से दक्षिण को बाँटने वाली एक रेखा सुनिश्चित की गई है। इसके तहत सिंधु क्षेत्र में आने वाली तीन नदियाँ सिंधु, चेनाब और झेलम पूरी तरह पाकिस्तान को उपहार में दे दी गई हैं। इसके उलट भारतीय सम्प्रभुता क्षेत्र में आने वाली व्यास, रावी व सतलुज नदियों के बचे हुए हिस्से में ही जल सीमित रह गया है।

इस लिहाज से यह संधि दुनिया की ऐसी इकलौती अन्तरदेशीय जलसंधि है, जिसमें सीमित सम्प्रभुता का सिद्धान्त लागू होता है और संधि की असमान शर्तों के चलते ऊपरी जलधारा वाला देश नीचे की ओर प्रवाहित होने वाली जलधारा वाले देश पाकिस्तान के लिये अपने हितों की न केवल अनदेखी करता है, वरन बलिदान कर देता है।

इतनी बेजोड़ और पाक हितकारी संधि होने के बावजूद पाक ने भारत की उदार शालीनता का उत्तर पूरे जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में आतंकी हमलों के रूप में तो दिया ही, अब इनका विस्तार भारतीय सेना व पुलिस के सुरक्षित ठिकानों तक भी हो गया है।

दरअसल पाकिस्तान की प्रकृति में ही अहसान-फरामोशी शुमार है। इसीलिये भारत ने जब झेलम की सहायक नदी किशनगंगा पर बनने वाली ‘किशन गंगा जलविद्युत परियोजना’ की बुनियाद रखी तो पाकिस्तान ने बुनियाद रखते ही नीदरलैंड में स्थित ‘अन्तरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय’ में 2010 में ही आपत्ति दर्ज करा दी थी।

जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले में किशनगंगा नदी पर 300 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना प्रस्तावित है। हालांकि 20 दिसम्बर 2013 को इसका फैसला भी हो गया। दुर्भाग्य कहलें या भारत द्वारा ठीक से अपने पक्ष की पैरवी नहीं करने के कारण यह निर्णय भारत के व्यापक हित साधे रखने में असफल रहा है।

न्यायालय ने भारत को परियोजना निर्माण की अनुमति तो दे दी, लेकिन भारत को बाध्य किया कि वह ‘रन ऑफ दी रिवर’ प्रणाली के तहत नदियों का प्रवाह निरन्तर जारी रखे। फैसले के मुताबिक किशनगंगा नदी में पूरे साल हर समय 9 क्यूसेक मीटर प्रति सेकेंड का न्यूनतम जल प्रवाह जारी रहेगा।

हालांकि पाकिस्तान ने अपील में 100 क्यूसेक मीटर प्रति सेकेंड पानी के प्राकृतिक प्रवाह की माँग की थी, जिसे न्यायालय ने नहीं माना। पाकिस्तान ने सिंधु जल समझौते का उल्लंघन मानते हुए भारत के खिलाफ यह अपील दायर की थी। इसके पहले पाकिस्तान ने बगलिहार जलविद्युत परियोजना पर भी आपत्ति दर्ज कराई थी। जिसे विश्व बैंक ने निरस्त कर दिया था।

किशनगंगा को पाकिस्तान में नीलम नदी के नाम से जाना जाता है। इसके तहत इस नदी पर 37 मीटर यानी 121 फीट ऊँचा बाँध बनाया जाना है। बाँध की गहराई 103 मीटर होगी। यह स्थल गुरेज घाटी में है। इसका निर्माण पूरा होने के अन्तिम चरण में है। 2017 की शुरुआत में इसका काम पूरा हो जाने की उम्मीद है।

बाँध बनने के बाद किशनगंगा के पानी को बोनार मदमती नाले में प्रवाहित किया जाएगा। भारत ने इस परियोजना की शुरुआत 2007 में 3642.04 करोड़ की लागत से की थी। न्यायालय के फैसले के परिप्रेक्ष्य में प्रश्न यह खड़ा होता है कि यदि किसी साल पानी कम बरसता है और किशनगंगा नदी बाँध में पानी छोड़ने के लायक रह ही नहीं जाता है तो ‘रन ऑफ दी रीवर’ प्रणाली का सिद्धान्त अमल में कैसे लाया जाएगा? इस दृष्टि से यह फैसला सिंधु जल संधि की संकीर्ण व्याख्या है।

कालान्तर में पाकिस्तान को यदि इस फैसले के मुताबिक पानी नहीं मिलता है तो उसे यह कहने का मौका मिलेगा कि भारत अन्तरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायालय के फरमान का सम्मान नहीं कर रहा है। इसलिये भारत को सिंधु जल बँटवारे पर पुनर्विचार की जरूरत है।

इसी किशनगंगा पनबिजली परियोजना के मानचित्र को लेकर पाकिस्तान ने विश्व बैंक से हस्तक्षेप का अनुरोध करते हुए आपत्तियों की सुनवाई के लिये मध्यस्थता न्यायालय के गठन की माँग की थी, जो मान ली गई। साथ ही भारत की माँग के मुताबिक तकनीकी विशेषज्ञ की तैनाती भी कर दी गई।

दरअसल पाक का कहना है कि परियोजना दोनों देशों के बीच सिंधु जल संधि के तहत निर्धारित मानदण्डों के अनुरूप नहीं है। हालांकि भारत ने परियोजना की डिजाइन को संधि के मानदंडों के अनुरूप बताया है। इसीलिये भारत ने ऐसे तकनीकी विशेषज्ञ की माँग की थी जो जल संसाधन की जानकारी रखने वाला इंजीनियर की तरह हो। किन्तु विश्व बैंक ने जल संसाधन इंजीनियर की जगह कानूनी विशेषज्ञ की तैनाती की है, जो कतई तर्कसंगत नहीं है। क्योंकि इंजीनियर कानूनी विशेषज्ञ से कहीं ज्यादा परियोजना का निर्माण मानचित्र के अनुरूप हो रहा है अथवा नहीं बेहतर ढंग से बता सकता है।

दरअसल पाकिस्तान को आशंका है कि भारत परियोजना को निर्धारित मानचित्र के विपरीत ऐसा आकार दे रहा है, जिससे पाकिस्तान नदी में छोड़े गए पानी से प्रभावित होगा अर्थात उसे हानि उठानी पड़ेगी। इसीलिये भारत सरकार ने विश्व बैंक से कह दिया है कि परियोजना की सरंचना को लेकर पंचाट और विशेषज्ञ के गठन से दो समानान्तर तंत्र विकसित कर दिये गए हैं। लिहाजा इनका गठन कानूनी रूप से अतार्किक है। गोया, इससे परियोजना का निर्माण तो प्रभावित होगा ही किसी विवाद का हल भी होने वाला नहीं है।


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