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जल समाधि का मन बनाकर गया था : किशोर कोडवानी


.सवाल अकेले पीपल्याहाना तालाब का भी नहीं है, मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी माने जाने वाले इन्दौर शहर के हवा और पानी पर ही संकट खड़ा हो गया है। यही हालात रहे तो 2021 के बाद शहर में साफ हवा और शुद्ध पानी के लिये भी लोग तरसने लगेंगे। हालात यहाँ तक बिगड़ सकते हैं कि इन्दौर के लोगों को हवा और पानी के लिये पलायन करना पड़े।

यह दावा प्रकृति के जानकार विशेषज्ञ कर रहे हैं। हम किस तरह के विकास की बातें कर रहे हैं, यह कौन सा विकास है। हम किस दिशा में जा रहे हैं। क्या हम सामूहिक आत्महत्याओं की दिशा में बढ़ रहे हैं।

यह बात पानी-पर्यावरण के मुद्दे पर इन्दौर में लगातार काम करने वाले और अभी–अभी पीपल्याहाना तालाब बचाने के जन-आन्दोलन के नायक बनकर उभरे 61 वर्षीय किशोर कोडवानी ने इण्डिया वाटर पोर्टल के लिये विशेष बातचीत में कही। उन्होंने इन्दौर के सौ साल पुराने रियासतकालीन तालाब को बचाने के लिये छह दिनों तक जल सत्याग्रह किया।

दरअसल राज्य सरकार ने यहाँ नए हाईटेक कोर्ट भवन के निर्माण की अनुमति दे दी थी, इससे तालाब की आधी से ज्यादा जमीन को पाटा जा रहा था। अब राज्य सरकार ने बैकफुट पर जाकर निर्माण कार्य रोकने और कोर्ट भवन के लिये अन्यत्र स्थान देखने को समिति गठित करने का एलान किया है। प्रस्तुत है मनीष वैद्य द्वारा पीपल्याहाना तालाब आन्दोलन के नायक किशोर कोडवानी से बातचीत पर आधारित साक्षात्कार।

क्या आपको भरोसा था कि सरकार आपकी बात मानेगी और तालाब बच पाएगा?
पीपल्याहाना तालाब की न्यायालयीन लड़ाई दरअसल इस स्थिति में आ गई थी कि अब जन-आन्दोलन के अलावा कोई विकल्प नहीं था। जनता की अदालत में ही इसे लाना पड़ा। भरोसा तो था सरकार पर नहीं, जनता पर। मैंने इन्दौर को कभी शहर की तरह नहीं माना, इसे हमेशा आत्मा माना है और यहाँ के लोग मेरे परिवार की तरह हैं।

मेरे साथ हमेशा खड़े रहते हैं और मैं तो जब जल सत्याग्रह आन्दोलन के लिये घर से निकला था तो साफ कहूँ कि जल समाधि की तैयारी से ही निकला था। उम्मीद नहीं थी कि सरकार इतनी जल्दी सुनेगी पर बढ़ते जन-दबाव ने आखिरकार सरकार को कदम पीछे करने पर बाध्य कर दिया। हम तो अभी भी तैयार हैं, सरकार अपनी बात से मुकरती है तो 21 जुलाई से हम फिर आमरण अनशन शुरू कर देंगे।

आन्दोलन की सफलता पर अब आपको कैसा लग रहा है?
पीपल्याहाना आन्दोलन को मैं अभी सफल नहीं मानता। अभी खुश होने का समय नहीं आया है, जब तक लिखित दस्तावेज हाथ में नहीं आ जाते। जैसे शादी के रिश्ते जोड़ने में होता है कि अभी लड़की–लड़के ने शादी का नम बनाया है। सगाई की रस्म बाकी है। न्यायालय में सिर्फ कागज चलते हैं, वहाँ मौखिक बात का कोई काम नहीं होता इसलिये मैं भी सरकार से कागज का इन्तजार कर रहा हूँ।

पीपल्याहाना आन्दोलन प्रारम्भ करने की प्रेरणा कैसे मिली और कैसे इसकी शुरुआत हुई?
पीपल्याहाना तालाब की लड़ाई इन आठ दिनों भर की नहीं है। इसके पहले इसकी लम्बी कानूनी लड़ाई भी इसमें शामिल है। 2009 से कानूनी लड़ाई चल रही है। तब लोकोपयोगी लोक अदालत में मामला था। तालाब में भवन निर्माण के आदेश आने के बाद राष्ट्रीय हरित अधिकरण में पृथक याचिका दायर की।

18 मार्च 2016 को एनजीटी ने निर्माण कार्यों में निर्देशों के पालन करने की ताकीद की। लेकिन जब निर्माण करने वाली एजेंसी के ठेकेदार ने इन निर्देशों की अवहेलना शुरू की तो इसके खिलाफ प्रशासन को चिट्ठी लिखी। इसी दौरान एक दिन देखा कि रातोंरात ठेकेदार के लोगों ने बीच तालाब में सड़क बनाना शुरू कर दिया है तो बहुत दुःख हुआ।

कुछ समय के लिये लगा कि इस लड़ाई में हारता जा रहा हूँ। आँखें भीग गई पर दूसरे ही पल विचार आया कि मेरे साथ सच की ताकत है और प्रकृति भी तो क्यों न लड़ाई जारी रखी जाये। अधिकारियों को 10 जुलाई से जल सत्याग्रह करने की चिट्ठी सौंपी और बैठ गया तालाब के पानी में।

पहले ही दिन जोरदार बारिश हुई और तालाब भर गया। मुझे लगा कि प्रकृति भी मेरे साथ है। मैं आन्दोलन को लोगों के बीच लेकर गया और उन्होंने भरपूर साथ दिया। अन्ततः अब सरकार ने भी मन बना लिया है। हालाँकि अभी खुश होने का समय नहीं आया है।

प्रेरणा की जहाँ तक बात है तो एक व्यक्तिगत बात बताता हूँ कि मेरे जन्म पर पचास रुपए खर्च हुए थे। मेरा जब बेटा पैदा हुआ तो उसे अस्पताल से घर लाने पर साढ़े तीन सौ रुपए खर्च हुए। लेकिन जब मेरी पोती आई तो अस्पताल का खर्च बढ़कर पौने दो लाख और पोते के जन्म का खर्च हुआ सवा दो लाख रुपए। तो आप बताइए, ये कैसा विकास है। हम कहाँ जा रहे हैं।

20 लाख से ज्यादा की आबादी वाले इन्दौर शहर, जिसे मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी कहा जाता है और प्रदेश का सबसे ज्यादा राजस्व करीब 42 फीसदी यहीं से सरकार को जाता है, की प्राकृतिक सेहत लगातार बिगड़ती जा रही है।

बारिश में फिर भर गया पीपल्याहाना तालाब हवा और पानी जहरीले हो रहे हैं। जलस्रोतों को नेस्तनाबूद किया जा रहा है। हम नर्मदा नदी से आये पानी पर ही जिन्दा हैं। हमारे अपने कोई संसाधन नहीं। अब तुर्रा यह कि हम अपनी धरोहर के संसाधनों को भी मिटाने चले हैं। फिर कैसे चुप रहता।

जल सत्याग्रह से आपके पैरों में घाव हुए हैं, अब कैसे हैं?
घाव का क्या है, वे तो कल भर जाएँगे पर तालाब बच गया तो पीढ़ियों को इसका फायदा मिलेगा। पैरों की चमड़ी गली है, घाव से खून आता है। लेकिन उत्साह और जज्बे में कोई कमी नहीं आई है। इस उम्र में अब मुझे देह से कोई लगाव नहीं है, बस लोग जागरूक हो रहे हैं। यह बड़ी बात है। मैं कभी नेता नहीं रहा, कार्यकर्ता भर हूँ।

आपने शहर से गुजरने वाली खान नदी के प्रदूषण की कानूनी लड़ाई भी लड़ी, पर उससे ज्यादा आपका यह आन्दोलन सफल रहा, ऐसा क्यों?
आपका ऐसा मानना गलत है, दरअसल नदी की लड़ाई से ही तालाब की लड़ाई निकली है। कोई भी लड़ाई व्यर्थ नहीं जाती। खान नदी की लड़ाई में भी एनजीटी ने कई अहम निर्णय दिये। लोगों का साथ तब भी था, लेकिन कानूनी लड़ाई में वह दिखता नहीं है।

जन आन्दोलनों में साफ–साफ दिखता है। खान नदी की बात हमने नहीं की होती तो शायद शहर मेरी बात पर भरोसा ही नहीं करता। मेरा काम और जज्बा दोनों लोगों के बीच हैं। प्रकृति और पर्यावरण की लड़ाई बीते 25 सालों से लड़ता रहा हूँ और आगे भी लगातार लड़ता रहूँगा। यह सही है कि यह छोटे से तालाब के लिये आन्दोलन था लेकिन बड़ी लड़ाई तो शहर के प्रदूषण और बिगड़ते पर्यावरण को लेकर है।

आपको क्यों लगता है कि पर्यावरण से जुड़े मुद्दे उठाना चाहिए?
क्या आपने परमात्मा को देखा है, नहीं देखा न पर हाँ प्रकृति को तो सबने देखा है। मुझे लगता है कि प्रकृति ही परमात्मा का रूप है। आस्थावान लोग परमात्मा की पूजा करते हैं और मैं प्रकृति का उपासक हूँ। लोग कहते हैं न कि परमात्मा का कोप होगा तो मुझे लगता है कि हमने यदि अब भी प्रकृति की, पर्यावरण की चिन्ता नहीं की तो प्रकृति का तांडव होगा और इससे हमें कोई नहीं बचा सकेगा। कहीं–कहीं ऐसे तांडव देखने में भी आने लगे हैं। लोग कहते हैं कि यह कुदरत का कहर है, मैं कहता हूँ कि इस कहर का जिम्मेदार और कोई नहीं खुद आप और हम हैं।

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