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परिश्रम से बने पानीदार

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दैनिक जागरण, 05 जून, 2016

.एक समय सूखे के कारण देश के कुछ इलाकों की स्थिति काफी चिन्तनीय थी। सिंचाई और पीने का पानी लगभग खत्म था, बेरोजगारी बढ़ी थी, महिलाएँ दूरदराज क्षेत्रों से पानी लाती थीं और पलायन तेज था। मौसमी हालात यानी बारिश की स्थिति यहाँ आज भी वैसी ही है, लेकिन लगन और मेहनत से यहाँ के लोगों ने प्रतिकूल परिस्थितियों को अनुकूल बना लिया। इनमें से कई स्थानों में सालाना 250 मिमी से भी कम वर्षा होती है। लेकिन वर्षा जल संचयन ने इन इलाकों की तस्वीर बदल दी है। अब वहाँ समृद्धि है, खुशहाली है और रोजगार हैं। स्थिति इतनी सुधर गई है कि इन इलाकों में गर्मियों के दौरान भी पानी की कमी नहीं दिखती। इससे कृषि उत्पादन व आय में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। इस बदलाव पर एक नजरः

अलवर। राजस्थान


350-450 मिमीः औसत वार्षिक वर्षा

1985 के हालात : किशोरी गाँव व अन्य गाँव डार्क जोन घोषित थे। भूजल स्तर दो सौ फीट से भी नीचे था। महिलाएँ दूरदराज के इलाकों से पानी भरकर लाती थीं। कृषि उत्पादन नगण्य था और युवा काम की तलाश में पलायन कर रहे थे।

बदले हालात : जलपुरुष के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह ने वहाँ वर्षा जल संचयन की मुहिम शुरू की। ग्रामीणों ने 1,058 गाँवों में आठ हजार से अधिक जोहड़ (कुंड) बनाए और पौधरोपण किया। अलवर की अरवरी नदी, जो मानसून के बाद ही सूख जाती थी, 1995 में अरवरी बारहमासी बन गई। ग्रामीण अब वर्ष में तीन फसलें उगाते हैं। रोजगार बढ़े, जिससे 85 फीसद पलायन रुका। 70 गाँवों के 150 लोगों ने अरवरी को स्वच्छ रखने के लिये एक संगठन बनाया है।

रालेगण सिद्धि। महाराष्ट्र


250-300 मिमी : औसत वार्षिक वर्षा

1980 के हालात 1,700 एकड़ भूमि में से सिर्फ 80 एकड़ भूमि पर सिंचाई सम्भव थी। पुरुष ईंट-भट्ठों में काम करने बाहर जाते थे। जो गाँव में थे वे अवैध शराब बनाकर परिवार का पेट पालते थे। परिवार दिनोंदिन कर्ज में डूब रहे थे। शिशु मृत्यु दर अधिक थी।

बदले हालात : समाजसेवी अन्ना हजारे ने 17 साल पहले गाँव में वर्षाजल संचयन की शुरुआत की। तालाब, चेकडैम और कुएँ बनाए गए। आज 1200 एकड़ कृषि भूमि सिंचाई योग्य हो गई है। किसान 60 लाख रुपए कीमत की तीन फसल प्रतिवर्ष उगा रहे हैं। सब्जी, राशन और दूध भी बेच रहे हैं। गाँव में चार लाख पौधरोपण हुआ। गाँव में शराबबन्दी हो गई है। गाँव के बच्चे तालाबों में तैराकी सीखकर राज्य स्तरीय पुरस्कार जीत रहे हैं।

राज समधियाला। राजकोट, गुजरात


300 मिमी से कम : औसत वार्षिक वर्षा

1985 के हालात : भूजल स्तर घटकर 250 मीटर तक पहुँच गया था।

बदले हालात : डिस्ट्रिक्ट रूरल डेवलपमेंट अथॉरिटी कार्यक्रम से प्राप्त धन से ग्रामीणों ने करीब दो हजार हेक्टेयर भूमि पर 45 डैम बनाए और 35 हजार पौधे रोपे। 2001 में गाँव की आय 4.5 करोड़ हो गईं। एक ही ऋतु में तीन फसलें उगने लगीं। 2003 में तो एक बूँद बारिश नहीं हुई, फिर भी भूजलस्तर बढ़कर 15 मिनट तक आ गया था। 1985 में मीठे पानी के बारहमासी कुएँ दो थे जो 2002 में 14 हो गए। 1985 की तुलना में प्रति हेक्टेयर औसत आय 4,600 से बढ़कर 2002 में 31 हजार हो गई।

माहुदी। दाहोद, गुजरात


830 मिमी (1999 में 350 मिमी) : औसत वार्षिक वर्षा

1999 से पहले के हालात : गाँव विकट जल संकट से जूझ रहा था।

बदले हालात : ग्रामीणों ने स्थानीय मचान नदी के मुहाने के आसपास बड़ी संख्या में चेकडैम बनाए। सिंचाई की उपयुक्त व्यवस्था की। सैकड़ों पौधे लगाए। वार्षिक कृषि उत्पादन 900 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से बढ़कर चार हजार क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया। साल में तीन फसलें उग रही हैं। पलायन घटा, पीने का स्वच्छ जल मिला। 1999 में सालाना औसत आय 35 हजार से ऊपर पहुँच गई। घर-घर में नल प्रणाली के जरिए पानी पहुँचाया गया। चारा बढ़ा तो दुग्ध उत्पादन बढ़ा।

गाँधीग्राम। कच्छ, गुजरात


340 मिमी : औसत वार्षिक वर्षा

2000 से पहले के हालात : पानी संकट से खेती में बाधा उत्पन्न होती थी।

बदले हालात : ग्रामीणों ने पाँच बड़े चेकडैम, 72 छोटे चेकडैम और 72 छोटे-बड़े नालों का निर्माण किया। इससे 2001 में जब 165 मिमी वर्षा हुई तब भी गाँव के तालाबों और अन्य जलस्रोतों में पानी उचित मात्रा में मौजूद था। कुँओं से ग्रामीण को पानी नलों के जरिए मिलने लगा। गाँव की सूरत बदलने लगी। किसान गेहूँ, प्याज और जीरे जैसी नई फसलें उगाने लगे। रोजगार की सम्भावनाएँ बढ़ीं। बैंक से लोन लेकर ग्रामीणों ने एक बाँध बनाया। खेतों को जंगली जानवरों से बचाने के लिये गाँव के चारों ओर कंटीले बाड़ लगाई।

डेरवाड़ी गाँव। अहमद नगर, महाराष्ट्र


300 मिमी : औसत वार्षिक वर्षा

1996 के हालात : सूखा प्रभावित गाँव में पीने और सिंचाई का पानी मिलने की सम्भावना काफी कम थी। ठीकठाक बारिश के बावजूद कृषि उत्पादन काफी कम था।

बदले हालात : ग्रामीणों ने वन विभाग से प्रतिबन्धित वन क्षेत्र में खेती करने की अनुमति ली। उन्होंने रिज टू वैली अवधारणा पर काम किया। किसानों को पानी मिलने लगा, जिससे वे विभिन्न फसलें उगाने लगे। पुणे, अहमद नगर और मुम्बई जैसे बड़े शहरों में उनकी फसल बिकने लगी। रोजगार बढ़ा, डेयरी, नर्सरी, पॉल्ट्री क्षेत्र में विकास हुआ और दुग्ध उत्पादन 1,500 लीटर प्रतिदिन जा पहुँचा। गाँव में महिला सहायता समूह बने। यह महिलाओं की पूँजी जोड़ने में सहयोग करते हैं और उन्हें जरूरत पर ऋण मुहैया कराते हैं।

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