काटती-ढहाती दहाड़ों के बीच शेष कीर्तिमान माजुली

Submitted by UrbanWater on Tue, 03/07/2017 - 11:53
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.ब्रह्मपुत्र - एक नद्य है, ब्रुहीदिहिंग - एक नदी। एक नर और एक नारी; दोनों ने मीलों समानान्तर यात्रा की। अन्ततः लखू में आकर सहमति बनी और दोनों एकाकार हो गए। एकाकार होने से पूर्व एक नदी द्वीप बनाया। असमिया लोगों को मिलन और मिलन से पूर्व की रचा यह नदी द्वीप इतना पसन्द आया कि उन्होंने इसे अपना आशियाना ही बना लिया। असमिया भाषा भी क्योंकर पीछे रहती। वह भी कुहूक उठी - ‘माजुली’। बस, यही नाम मशहूर हो गया।

1661 से 1669 के बीच माजुली में कई भूकम्प आये। लगातार आये इन भूकम्पों के बाद 15 दिन लम्बी बाढ़ आई। वर्ष था - 1750। इस लम्बी बाढ़ के बाद ब्रह्मपुत्र नदी दो उपशाखाओं में बँट गई - लुइत खूटी और ब्रुही खूटी। ब्रह्मपुत्र की ओर की उपशाखा को लुइत खूटी, तो ब्रुहीदिहिंग की ओर की ओर उपशाखा को ब्रुही खूटी कहा गया। द्वीप और छोटा हो गया।

कालान्तर में ब्रुही खूटी का प्रवाह घटा, तो लोगों ने इसका नाम भी बदल दिया। ब्रुही खूटी को खेरकुटिया खूटी कहा जाने लगा। दूसरी ओर कटान बढ़ने से लुइत खूटी का कुछ यूँ विस्तार हुआ कि यह प्रवाह पुनः ब्रह्मपुत्र हो गया। भारतीय लोकव्यवहार की यही खूबी है कि यह जड़ नहीं है। बदलाव के साथ, सम्बोधन तक बदल देता है।

 

माजुली के कीर्तिमान


बनानाल, अमेजन, माराजो.... दुनिया में कई बड़े द्वीप हैं, किन्तु इनके एक सिरे पर अटलांटिक महासागर होने के कारण इन्हें नदी द्वीप नहीं कहा जा सकता। मौजूदा क्षेत्रफल के आधार पर बांग्लादेश का हटिया नदी द्वीप भी दुनिया का सबसे बड़ा नदी द्वीप नहीं है। सितम्बर, 2016 में गिनीज वर्ल्ड बुक आॅफ रिकाॅर्डस ने असम राज्य स्थित माजुली को सबसे बड़े नदी द्वीप का दर्जा दिया है।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने 1853 में एक सर्वेक्षण कराया था। उसके अनुसार दर्ज रिकाॅर्ड के मुताबिक, माजुली का क्षेत्रफल उस समय 1246 वर्ग किलोमीटर था। दहाड़ती-काटती जलधाराओं के कारण इसका क्षेत्रफल लगातार घटता गया। माजुली का मौजूदा क्षेत्रफल 421.5 वर्ग किमी है।

भूमि कटाव से संकट में माजुलीआठ सितम्बर, 2016 को जिला घोषित होने के साथ ही माजुली, अब भारत का सबसे पहला नदी द्वीप जिला भी हो गया है। जनसंख्या - 1,67,304; आबादी घनत्व - 300 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी; कुल गाँव - 144; जातीय समूह - मीसिंग, देओरी और सोनोवाल। माजुली - असम की राजधानी से करीब 350 किलोमीटर दूर स्थित है। जोरहाट से जाने वाले स्टीमर आपको माजुली पहुँचा देंगे।

 

माजुली का महत्त्व


माजुली का महत्त्व सिर्फ इसका बड़ा होना नहीं है; असमिया सभ्यता का मूल स्थान होने के साथ-साथ माजुली पिछले 500 वर्षों से असम की सांस्कृतिक राजधानी भी है। वैष्णव संस्कृति के धनी माजुली का अपना धार्मिक व राजशाही इतिहास है। माजुली, असम मुख्यमंत्री श्री सर्बानंद सोनोवाल का विधानसभा क्षेत्र भी है। मिसिंग और असमिया यहाँ की मुख्य बोलियाँ हैं। माजुली, एक नमभूमि क्षेत्र है। इस खूबी के कारण माजुली में उपलब्ध जैव विविधता विशेष है; माजुली में खेती है, जीवन है और जीवन जीने की एक खास संस्कृति है।

माजुलीवासी अच्छे किसान, नाविक, गोताखोर व हस्तशिल्पी हैं। बिना किसी रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक के तैयार होने वाले धान की 100 से अधिक किस्मों को माजुली के किसानों ने संजो रखा है। मछली पालन, डेयरी, मुर्गीपालन और नाव निर्माण इन्हें अतिरिक्त रोजगार देते हैं। हथकरघे और कलात्मक बुनाई इनके लिये कमाई से ज्यादा व्यस्त रखने के पारम्परिक जरिया हैं।

फरवरी के दूसरे बुधवार से पाँच दिन तक चलने वाला अलीआय लिगांग यहाँ का सबसे खास त्योहार है। कृष्ण के जीवन से जुड़े तीन दिवसीय रास में हर माजुलीवासी शरीक होता है। नामघर - हर गाँव का सबसे महत्त्वपूर्ण जनस्थान है। गाना-बजाना, प्रार्थना, उत्सव, निर्णय आदि सामूहिक कार्य नामघर में ही होते हैं।

 

माजुली का संकट


माजुली में वर्षा काफी होती है और प्रदूषक औद्योगिक इकाइयाँ हैं नहीं। इस कारण माजुली में प्रदूषण का संकट तो नहीं है, लेकिन जीवन की असुरक्षा और अनिश्चितता यहाँ एक बड़ा संकट है। एक आकलन के मुताबिक, बीसवीं सदी के अन्त तक माजुली की 33 प्रतिशत भूमि ब्रह्मपुत्र के प्रवाह में समा चुकी थी। ब्रह्मपुत्र, हर वर्ष माजुली का बड़ा टुकड़ा निगल जाता है।

1991 से लेकर अब तक 35 गाँवों का नामोनिशान मिट चुका है। 15वीं शताब्दी के विद्वान सन्त श्रीमंत शंकरदेव के वैष्णव अनुयायियों ने यहाँ करीब 60 सतारा बनाये। सतारा, एक तरह से उपासना स्थल थे। कालान्तर में ये सतारा आस्था, कला, संस्कृति और शिक्षा के केन्द्र के रूप में विकसित हुए।

नदी में मछली पकड़ती महिलानदी कटान रोकने की कोई ठोस कोशिश न होने के कारण इनमें से आधे सतारा अब तक ब्रह्मपुत्र में विलीन हो चुके हैं। यदि कटान की वर्तमान गति जारी रही, तो अगले 15 से 20 वर्ष बाद न माजुली रहेगा और न उसका वर्तमान दर्जा। इस नाते माजुली को संयुक्त राष्ट्र संघ की विश्व विरासत की श्रेणी में शामिल कराने की सिफारिश की गई है। जरूरी है कि माजुली बचे और इसके जरिए भारत की एक शानदार विरासत भी। किन्तु यह हो कैसे?

 

विपरीत उपाय


कहा जा रहा है कि माजुली को विनाश से बचाने के लिये ब्रह्मपुत्र बोर्ड और जलसंसाधन विभाग पिछले तीन दशक से संघर्ष कर रहे हैं। भारत सरकार ने 250 करोड़ की धनराशि भी मंजूर की। लेकिन कोई विशेष सफलता नहीं मिली। आखिर क्यों? आइए समझें।

सब जानते हैं कि बाँधने से नदियाँ उफन जाती हैं। सरकार खुद जानती है कि माजुली में हो रहे विध्वंस के कारण तटबन्ध ही है। ऊपरी ब्रह्मपुत्र के नगरों को बाढ़ से बचाने के लिये तटबन्ध बनाए हैं। इन तटबन्धों के कारण वर्षा ऋतु में ब्रह्मपुत्र का वेग इतना बढ़ जाता है कि माजुली आते-आते ब्रह्मपुत्र भूमिखोर हो जाता है।

अब सरकार माजुली को बचाने के लिये तटबन्ध बनाने की सोच रही है। कह रही है कि माजुली को बचाने का यही एकमेव तरीका है। बताया जा रहा है कि यह तटबन्ध चार लेन हाइवे के रूप में होगा। इसमें दो बाढ़ गेट भी होंगे, जो ब्रह्मपुत्र की बाढ़ को खेरकुटिया में ले जाएगी। मेरी राय में यह विपरीत उपाय है।

असम सरकार को भी समझना चाहिए कि बाँधा, तो नदियाँ उफनेंगी ही; माजुली में बाँधेगे, तो कोप कहीं आगे बरपेगा। कोई और आबादी डूबेगी। नदी किनारे इमारत सड़क जैसे भौतिक निर्माण जैसे-जैसे बढ़ेंगे, जल निकासी मार्ग वैसे-वैसे और अवरुद्ध होता जाएगा। धाराएँ अपना मार्ग बदलेंगी। रुद्ररूप धारण करेंगी।

ब्रह्मपुत्र पहले ही एक वेगवान नद्य है। तटबन्ध बनाते जाना इसके वेग को बढ़ाते जाना है। कितने और कहाँ-कहाँ तटबन्ध बनाओगे? कोसी, गंगा समेत तमाम नदियों पर बने तटबन्ध व बैराज के नतीजे भोगने वाले वाले बिहार की नीतीश सरकार ने कुछ समय पूर्व गंगा पर नए बैराज का विरोध किया था। अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भागलपुर से पटना के बीच लगातार बढ़ती गाद संकट के समाधान के रूप में फरक्का बैराज को तोड़ने की माँग कर रहे हैं। असम सरकार को भी समझना होगा।

 

 

माजुली में एक सत्र के भीतर - वैष्णव प्रभाव

उचित समाधान


यदि ब्रह्मपुत्र का वेग नियंत्रित करना है, तो ब्रह्मपुत्र घाटी क्षेत्र में बरसने वाले पानी को ब्रह्मपुत्र में आने से पहले ज्यादा-से-ज्यादा संचित करना चाहिए। व्यापक पैमाने पर जल संचयन ढाँचे बनाने चाहिए। पानी के साथ जाने वाली मिट्टी को रोकना भी इतना ही जरूरी है। सघन जंगल, छोटी वनस्पति तथा अन्य प्रकृति अनुकूल तरीकों से यह किया जा सकता है। असम के पर्यावरण कार्यकर्ता श्री जादव पयांग ने 550 एकड़ में जंगल लगाकर एक अनुपम उदाहरण पेश किया है। माजुली से ऊपरी ब्रह्मपुत्र क्षेत्र में ऐसे कार्य तत्काल प्रभाव से शुरू करने चाहिए; कारण कि चुनौतियाँ आगे और भी होंगी।

पूर्वोत्तर राज्यों को भारत की मुख्यधारा में लाने की वर्तमान केन्द्र सरकार की मुहिम का नतीजा असम में आबादी के फैलाव के रूप में सामने आएगा। बिजली, पानी और निर्माण सामग्री की माँग भी बढे़गी ही। अतः यह सावधानी भी अभी से जरूरी होगी कि नदी भूमि, वन भूमि और जलनिकासी के परम्परागत मार्गों पर भौतिक निर्माण न होने पाये; बाँध-बैराज से दूर रहा जाये; खनन नियंत्रित किया जाये; वरना नजीर के रूप में उत्तराखण्ड में हुआ वर्ष 2013 का विनाश हमारे सामने है ही। क्या असम सरकार विचार करेगी?

 

 

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अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

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