अगली पीढ़ियों के लिये कृषि जैवविविधता की धरोहर सहेजें - नरेंद्र मोदी

Submitted by RuralWater on Tue, 11/15/2016 - 11:41
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दुनिया में पहली बार आयोजित अन्तरराष्ट्रीय कृषि जैव विविधता कांग्रेस 2016 को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से जैवविविधता को बढ़ावा देने का आह्वान किया। यहाँ प्रस्तुत है, उनके भाषण का शब्दशः अंश...

मन की बातमन की बातदेवियों और सज्जनों, मुझे आज एग्रोबायोडाइवर्सिटी के क्षेत्र में काम कर रहे दुनिया के बड़े-बड़े साइंटिस्ट, एजुकेशनलिस्ट, पॉलिसी मेकर्स और मेरे अपने किसान भाइयों के बीच आकर प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है। मैं, इस अवसर पर विश्व के अलग-अलग हिस्सों से यहाँ पधारे डेलीगेट्स का इस ऐतिहासिक नगरी में हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह अहम विषय-एग्रोबायोडाइवर्सिटी पर पहली बार विश्व स्तर के इस सम्मेलन की शुरुआत भारत से हो रही है, ये मेरे लिये दोहरी खुशी का विषय है।

विकास की अन्धाधुन्ध दौड़ में प्रकृति का जितना शोषण इंसान ने किया, उतना किसी ने नहीं किया और अगर कहें कि सबसे ज्यादा नुकसान पिछली कुछ शताब्दियों में हुआ है तो गलत नहीं होगा। ऐसे में आने वाले समय में चुनौतियाँ बढ़ने जा रही हैं। वर्तमान समय में ग्लोबल फूड, न्यूट्रीशन, हेल्थ और एनवायरनमेंट सिक्योरिटी के लिये एग्रोबायोडाइवर्सिटी पर चर्चा, उस पर रिसर्च बहुत अहम है।

अपनी जियो-डायवर्सिटी, टोपोग्राफी और विभिन्न प्रकार के अलग-अलग क्लाइमेटिक जोंस की वजह से भारत बायोडाइवर्सिटी के मामले में बहुत समृद्ध राष्ट्र है। पश्चिम में रेगिस्तान है तो उत्तर-पूर्व में दुनिया की सबसे ज्यादा नमी वाला हिस्सा है। उत्तर में हिमालय है तो दक्षिण में अथाह समुद्र है। भारत में 47 हजार से ज्यादा प्लांट स्पीशीज पाई जाती हैं और जानवरों की 89 हजार से ज्यादा प्रजातियाँ हैं। भारत के पास 8100 किलोमीटर से ज्यादा का समुद्र तट है।

ये इस देश की अद्भुत क्षमता है कि सिर्फ 2.5 परसेंट भूभाग होने के बावजूद, ये जमीन दुनिया की 17 प्रतिशत ह्यूमन पापुलेशन को, 18 प्रतिशत एनीमल पापुलेशन को और साढ़े 6 प्रतिशत बायोडाइवर्सिटी को यह अपने में संजोये हुए है, सम्भाल रही है। हमारे देश की सोसायटी हजारों हजार साल से एग्रीकल्चर बेस्ड रही है। आज भी एग्रीकल्चर सेक्टर देश की आधी से ज्यादा आबादी को रोजगार मुहैया करा रहा है।

इण्डियन एग्रीकल्चर की फिलॉसफी रही है नैचुरल रिसोर्सेस को इनटैक्ट रखते हुए, उनका कंजर्वेशन करते हुए अपनी आवश्यकता भर और उसके मुताबिक उन्हें इस्तेमाल करना। आज दुनिया में जितने भी डेवलपमेंट प्रोग्राम्स हैं, वह इसी फिलॉसफी पर ही केन्द्रित हैं।

बायोडाइवर्सिटी का केन्द्र नियम-कायदे या रेग्यूलेशंस नहीं बल्कि हमारी चेतना यानी कांशसनेस में होनी चाहिए। इसके लिये बहुत कुछ पुराना भूलना होगा, बहुत कुछ नया सीखना होगा। प्राकृतिक चेतना का ये भारतीय विचार इसावस्य उपनिषद में नजर आता है। विचार ये है कि बायो सेंट्रिक वर्ल्ड में मानव सिर्फ एक छोटा-सा हिस्सा भर है। यानी पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं का महत्त्व इंसान से कम नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र मिलेनियम डेवलपमेंट गोल ने विकास में संस्कृति की बड़ी भूमिका को स्वीकार किया है। यूएन 2030 एजेंडा फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट में भी माना गया है कि सतत विकास के लिये संस्कृतियों और सभ्यताओं का योगदान नितान्त आवश्यक है।

प्रकृति के साथ तालमेल बिठाने में संस्कृति की बहुत अहमियत है। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि एग्रीकल्चर में ही कल्चर भी जुड़ा हुआ है। भारत में मौजूद अलग-अलग स्पीशीज की अलग-अलग वैरायटी इतने सालों में आज भी इसलिये बची हुई है क्योंकि हमारे पुरखे सोशियो-इकोनॉमिक पॉलिसी में माहिर थे। उन्होंने प्रोड्यूस को सामाजिक संस्कारों से जोड़ दिया था। तिलक लगेगा तो उसके साथ चावल के दाने भी होंगे, सुपारी पूजा में रखी जाएगी। नवरात्र में या व्रत के दिनों में कुटू या बकव्हीट के आटे की रोटी या पूड़ी बनती है। बकव्हीट एक जंगली फूल का बीज है। यानी जब प्रजातियों को सामाजिक संस्कार से जोड़ दिया गया तो संरक्षण भी हुआ और किसानों का आर्थिक फायदा भी।

दोस्तों, इस बारे में मंथन किया जाना चाहिए, इसलिये आवश्यक है क्योंकि 1992 में बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी कन्वेन्शन के प्रस्तावों को स्वीकार किये जाने के बावजूद आज भी हर रोज 50 से 150 स्पीशीज खत्म हो रही हैं। आने वाले सालों में आठ में से एक पक्षी और एक चौथाई जानवरों के भी विलुप्त होने का खतरा है।

इसलिये अब सोचने का तरीका बदलना होगा। जो अस्तित्व में है उसे बचाने के साथ-साथ उसे और मजबूत करने पर ध्यान देना होगा। दुनिया के हर देश को एक दूसरे से सीखना होगा। ये तभी हो पाएगा जब एग्रोबायोडाइवर्सिटी के क्षेत्र में रिसर्च पर जोर दिया जाएगा।

एग्रोबायोडाइवर्सिटी को बचाने के लिये दुनिया के बहुत से देशों में अलग-अलग तरीके अपनाए जा रहे हैं। इसके लिये उचित होगा कि आप सब मिलकर विचार करें कि क्या हम ऐसी प्रैक्टिस की रजिस्ट्री बना सकते हैं जहाँ ऐसी सभी प्रेक्टिसेस को मैप करके उसका रिकॉर्ड रखा जाये और फिर साइंटिफिक तरीके से रिसर्च कर देखा जाये कि किन ऐसी प्रेक्टिसेस को और बढ़ावा दिये जाने की जरूरत है।

भारत के अलग-अलग हिस्सों में हमारी संस्कृति ने भी ऐसी-ऐसी प्रजातियाँ बचाकर रखी हैं, जो हैरत पैदा करती हैं। साउथ इण्डिया में चावल की एक बहुत पुरानी वैरायटी है-कोनाममी (KONAMAMI) दुनिया भर में चावल की पैदावार बढ़ाने के लिये बेस रूप में इस वैरायटी का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी तरह केरल के पोक्काली चावल की वैरायटी को ऐसी जगहों के लिये विकसित किया जा रहा है जहाँ पानी बहुत ज्यादा होता है, या खारा होता है, साल्टी होता है।

मैं फॉरेन डेलिगेट्स को खासतौर पर बताना चाहूँगा कि भारत में चावल की एक लाख से भी ज्यादा लेंड रेसेस हैं और इनमें से ज्यादातर सैकड़ों साल पुरानी हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे किसान इनको सहेजकर रखते गए और उसका विकास करते रहे और ये सिर्फ एक स्पेसिफिक एरिया में ही नहीं हुआ। असम में अगूनी बोरा चावल की एक वैरायटी है जिसे सिर्फ थोड़ी देर पानी में भिगोकर भी खाया जा सकता है। ग्लाइसीमिक इंडेक्स के मामले में भी ये काफी लो है, इसलिये डायबिटीज के पेशेंट्स भी इसे अपनी डाइट में शामिल कर सकते हैं।

इसी तरह गुजरात में भाल इलाके में गेहूँ की एक प्रजाति है-भालिया व्हीट। इसमें अधिक प्रोटीन और केरोटिन पाई जाती है इसलिये ये दलिया और पास्ता बनाने के लिये बहुत पॉप्यूलर है। गेहूँ की ये वैरायटी जीयोग्राफिकल आइडेंटिफिकेशन के रूप में रजिस्टर की गई है।

एग्रीकल्चर बायोडाइवर्सिटी के एरिया में भारत का बहुत योगदान दूसरे देशों में भी रहा है।

हरियाणा की मुर्राह और गुजरात की जाफराबादी भैंसों की पहचान इंटरनेशनल ट्रांस-बाउंड्री ब्रीड के तौर पर की जाती है। इसी तरह भारत की ही ओंगोल, गिर और कांकरेज जैसी गाय की नस्लें लैटिन अमेरिकन देशों को वहाँ के प्रजनन सुधार कार्यक्रम के लिये उपलब्ध कराई गई थी। पश्चिम बंगाल के सुन्दरवन से भेड़ की गैरोल नस्ल को ऑस्ट्रेलिया तक भेजा गया था।

एनीमल बायोडाइवर्सिटी के मामले में भारत एक समृद्ध राष्ट्र है। लेकिन भारत में नॉन डिस्क्रिप्ट पशु प्रजातियाँ ज्यादा हैं और अभी तक केवल 160 प्रजातियों को ही रजिस्टर किया जा सका है। हमें अपनी रिसर्च को इस दिशा में मोड़ने की जरूरत है ताकि और अधिक पशु नस्लों का केरेक्टरायजेशन किया जा सके और उन्हें समुचित नस्ल के रूप में रजिस्टर किया जा सके।

कुपोषण, भुखमरी, गरीबी - इसे दूर करने के लिये टेक्नोलॉजी की बहुत बड़ी भूमिका है। लेकिन इस पर भी ध्यान देना होगा कि टेक्नोलॉजी हम पर कैसे असर डाल रही है। यहाँ जितने भी लोग हैं, कुछ साल पहले तक आप में और मुझे भी हर किसी को 15-20 फोन नम्बर जरूर याद रहे होंगे। लेकिन अब हालत यह हो गई है कि मोबाइल फोन आने के बाद हमारा खुद का मोबाइल नम्बर या फोन नम्बर हमें याद नहीं है। यह टेक्नोलॉजी का एक नेगेटिव इम्पेक्ट भी है।

हमें अलर्ट रहना होगा कि एग्रीकल्चर में अपनाई जा रही टेक्नोलॉजी से किस प्रकार से बदलाव आ रहा है। एक उदाहरण है हनी बी का। तीन साल पहले हनी बी टाइम मैगजीन के कवर पेज पर थी। बताया गया कि फसलों को कीड़ों से बचाने के लिये जो पेस्टिसाइड इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे मधुमक्खी अपने छत्ते तक पहुँचने का रास्ता भूल जाती हैं। एक छोटी-सी चीज ने मधुमक्खी पर अस्तित्व का संकट ला दिया। पॉलीनेशन में मधुमक्खी की भूमिका हम सभी को पता है। इसका रिजल्ट ये हुआ कि फसलों का उत्पादन भी गिरने लगा।

एग्रीकल्चर इकोसिस्टम में पेस्टिसाइड बड़ी चिन्ता का विषय है। इसके उपयोग से फसल को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़ों के साथ ही वह इंसेक्ट्स भी मर जाते हैं जो पूरे इकोसिस्टम के लिये जरूरी हैं। इसलिये ऑडिट ऑफ डेवलपमेंट ऑफ साइंस भी आवश्यक है। ऑडिट ना होने से दुनिया इस वक्त कई चुनौतियों से जूझ रही है।

हमारे देश में बायोडाइवर्सिटी की भिन्नता को एक ताकत की तरह लिया जाना चाहिए। लेकिन ये तब होगा जब इस ताकत का वैल्यू एडीशन किया जाये, उस पर रिसर्च हो। जैसे गुजरात में एक घास होती है बन्नी घास। उस घास में हाई न्यूट्रिशन होता है। इस वजह से वहाँ की भैंस ज्यादा दूध देती हैं। अब इस घास की विशेषताओं को वैल्यू एड करके पूरे देश में इसका प्रसार किया जा सकता है। इसके लिये रिसर्च का दायरा बढ़ाना होगा।

देश की धरती का लगभग 70 प्रतिशत महासागर से घिरा हुआ है। दुनिया में मछली की अलग-अलग स्पेसीज में से 10 प्रतिशत भारत में ही पाई जाती हैं। समुद्र की इस ताकत को हम सिर्फ मछली पालन ही केन्द्रित नहीं रख सकते। वैज्ञानिकों को समुद्री वनस्पति, -सी वीड की खेती के बारे में भी अपना प्रयास बढ़ाना होगा। सी वीड का इस्तेमाल बायो फर्टिलाइजर बनाने में हो सकता है। ग्रीन और व्हाइट रिवोल्यूशन के बाद अब हमें ब्लू रिवोल्यूशन को भी समग्रता में देखने की आवश्यकता है।

आपको एक और उदाहरण देता हूँ। हिमाचल प्रदेश में मशरूम की एक वैरायटी होती है-गुच्ची। इसकी मेडिसिनल वेल्यू भी है। बाजार में गुच्ची मशरूम 15 हजार रुपए किलो तक बिकता है। क्या गुच्ची की पैदावार बढ़ाने के लिये कुछ किया जा सकता है। इसी तरह केस्टर हो या मिलेट यानी बाजरा हो। इनमें भी वर्तमान जरूरतों के हिसाब से वेल्यू एडिशन किये जाने की आवश्यकता है। लेकिन यहाँ एक बारीक लाइन भी है। वैल्यू एडीशन का मतलब प्रजातियों से छेड़छाड़ नहीं है।

प्रकृति की सामान्य प्रक्रिया में दखल देकर ही मानव ने क्लाइमेट चेंज जैसी समस्या खड़ी कर ली है। तापमान में बढ़ोत्तरी की वजह से पौधों और जीव-जन्तुओं के जीवन-चक्र में बदलाव आ रहा है। एक अनुमान के मुताबिक क्लाइमेट चेंज की वजह से 2050 तक कुल वन्य प्रजातियों का 16 प्रतिशत तक विलुप्त हो सकता है। ये स्थिति चिन्ता पैदा करती है।

ग्लोबल वॉर्मिंग के इसी खतरे को समझते हुए भारत ने पिछले महीने 2 अक्तूबर, महात्मा गाँधी की जन्म जयन्ती पर, पेरिस समझौते को रेक्टिफाय कर दिया है। इस समझौते को पूरी दुनिया में लागू कराने में भारत अहम भूमिका निभा रहा है। ये प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी और जवाबदेही की वजह से है।

एग्रोबायोडाइवर्सिटी का प्रापर मैनेजमेंट पूरी दुनिया के लिये प्राथमिकता है। लगातार बढ़ रही जनसंख्या का दबाव और विकास की अन्धाधुन्ध दौड़ प्राकृतिक सन्तुलन को काफी हद तक बिगाड़ रहे हैं। इसकी एक वजह ये भी है कि मॉर्डन एग्रीकल्चर में बहुत ही गिनी-चुनी फसलों और पशुओं पर ध्यान दिया जा रहा है। जबकि ये हमारी फूड सिक्योरिटी, एनवायरनमेंटल सिक्योरिटी के साथ-साथ एग्रीकल्चर डेवलपमेंट के लिये भी आवश्यक था।

बायोडाइवर्सिटी के संरक्षण का अहम पहलू है आसपास के एनवायरनमेंट को चुनौतियों के लिये तैयार करना। इसके लिये जीन बैंक्स में किसी स्पेसिफिक जीन का संरक्षण करने के साथ ही उसे किसानों को इस्तेमाल के लिये उपलब्ध भी कराना होगा। ताकि जब वह जीन खेत में रहेगा, जलवायु दबाव सहेगा, आसपास के माहौल के अनुकूल बनेगा तभी उसमें प्रतिरोधी क्षमता विकसित हो पाएगी।

हमें ऐसा मैकेनिज्म तैयार करना होगा कि हमारा किसान डिजायरेबल जींस का मूल्यांकन अपने खेत में करें और इसके लिये किसान को उचित कीमत भी दी जाये। ऐसे किसानों को हमें अपने रिसर्च वर्क का हिस्सा बनाना चाहिए।

बायोडाइवर्सिटी के संरक्षण के लिये इंटरनेशनल, नेशनल एंड प्राइवेट संगठन और एक्सपरटाइज, टेक्नोलॉजी एंड रिसोर्सेस का पूल बनाकर कार्य करें तो सफलता मिलने की सम्भावना निश्चित रूप से बढ़ेगी। इस प्रयास में हमें एक शेयर्ड विजन बनाने और अपनाने की दिशा में बढ़ना होगा।

हमें ये भी देखना होगा कि एग्रोबायोडाइवर्सिटी के संरक्षण से जुड़े अलग-अलग नियमों को किस प्रकार हार्मोनाइज करें जिससे कि ये कानून विकासशील देशों में कृषि और किसानों की प्रगति में बाधक न बनें।

आप सभी अपने-अपने क्षेत्र के एक्सपर्ट्स हैं। आपके द्वारा इस सम्मेलन में अगले तीन दिनों में एग्रोबायोडाइवर्सिटी के विभिन्न पहलुओं पर गहन चर्चा की जाएगी। आज दुनिया के करोड़ों गरीब हंगर, मालन्यूट्रिशन और पावर्टी जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिये साइंस और टेक्नोलॉजी की भूमिका बहुत अहम है। इस बात पर मंथन आवश्यक है कि इन समस्याओं का हल निकालते समय सस्टेनेबल डेवेलपमेंट और बायोडाइवर्सिटी के संरक्षण जैसे महत्त्वपूर्ण आयामों की अनदेखी ना की जाये।

साथियों, हमारी एग्रोबायोडाइवर्सिटी आगामी पीढ़ियों की धरोहर है और हम केवल इसके संरक्षक हैं इसलिये हम सब मिलकर सामूहिक प्रयास से ये सुनिश्चित करें कि ये नेचुरल रिसोर्सेस हम अपनी भावी पीढ़ियों के लिये उसी रूप में उन्हें सौपें जिस रूप में हमारे पूर्वजों ने इसे हमें सौंपा था।

इसके साथ फिर से एक बार आप सबका हृदय से स्वागत करते हुए बहुत-बहुत धन्यवाद।

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मनीष वैद्यमनीष वैद्यमनीष वैद्य जमीनी स्तर पर काम करते हुए बीते बीस सालों से लगातार पानी और पर्यावरण सहित जन सरोकारों के मुद्दे पर शिद्दत से लिखते–छपते रहे हैं। देश के प्रमुख अखबारों से छोटी-बड़ी पत्रिकाओं तक उन्होंने अब तक करीब साढ़े तीन सौ से ज़्यादा आलेख लिखे हैं। वे नव भारत तथा देशबन्धु के प्रथम पृष्ठ के लिये मुद्दों पर आधारित अ

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