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पर्व उत्सवों को पर्यावरण से जोड़ें - प्रधानमंत्री


मन की बातमन की बातरविवार की सुबह, मध्य प्रदेश में धार जिले के बदनावर तहसील का छोटा-सा गाँव -कलसाडा बुजुर्ग। यहाँ विनायक शुक्ल की किराना दुकान से रेडियो की आवाज गूँज रही है। आज मन की बात सुनने के लिये सामने चौपाल पर ग्रामीण इकट्ठे हो रहे हैं।

(इस बार 30 अक्टूबर को मन की बात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को दीपावली की शुभकामनाएँ देते हुए पर्यावरण और स्वच्छता पर बड़ा जोर दिया। उन्होंने कहा कि हमारे उत्सव पर्यावरण और खास पेड़-पौधों, नदी-पर्वतों, वन्यजीवों-पखेरुओं के बारे में हमारे दायित्त्व का भान कराते हैं। उन्होंने खुले में शौच से मुक्ति की बात के साथ ही देश के पाँच करोड़ निर्धन परिवारों को धुएँ से आजादी दिलाने के अभियान की भी चर्चा की।)

रेडियो से आवाज गूँजती है...! मेरे प्यारे देशवासियों, आप सबको दीपावली की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। भारत के हर कोने में उत्साह और उमंग के साथ दीपावली का पर्व मनाया जाता है। भारत एक ऐसा देश है कि 365 दिन, देश के किसी-न-किसी कोने में, कोई-न-कोई उत्सव नजर आता है। दूर से देखने वाले को तो कभी यही लगेगा कि जैसे भारतीय जन-जीवन, ये उत्सव का दूसरा नाम है और ये स्वाभाविक भी है।

वेद-काल से आज तक भारत में जो उत्सवों की परम्परा रही है, वे समयानुकूल परिवर्तन वाले उत्सव रहे हैं, कालबाह्य उत्सवों की परम्परा को समाप्त करने की हिम्मत हमने देखी है एवं समय और समाज की माँग के अनुसार उत्सवों में बदलाव भी सहज रूप से स्वीकार किया गया है। लेकिन इन सबमें एक बात हम भली-भाँति देख सकते हैं कि भारत के उत्सवों की ये पूरी यात्रा, उसका व्याप, उसकी गहराई, जन-जन में उसकी पैठ, एक मूल-मंत्र से जुड़ी हुई है - स्व को समष्टि की ओर ले जाना।

व्यक्ति और व्यक्तित्व का विस्तार हो, अपने सीमित सोच के दायरे को, समाज से ब्रह्माण्ड तक विस्तृत करने का प्रयास हो और ये उत्सवों के माध्यम से करना। भारत के उत्सव कभी खान-पान की महफिल जैसे दिखते हैं। लेकिन उसमें भी, मौसम कैसा है, किस मौसम में क्या खाना चाहिए। किसानों की कौन सी पैदावार है, उस पैदावार को उत्सव में कैसे पलटना। आरोग्य की दृष्टि से क्या संस्कार हों। ये सारी बातें, हमारे पूर्वजों ने बड़े वैज्ञानिक तरीके से, उत्सव में समेट ली हैं।

आज पूरा विश्व पर्यावरण की चर्चा करता है। प्रकृति-विनाश चिन्ता का विषय बना है। भारत की उत्सव परम्परा, प्रकृति-प्रेम को बलवान बनाने वाली, बालक से लेकर के हर व्यक्ति को संस्कारित करने वाली रही है। पेड़ हो, पौधे हों, नदी हो, पशु हो, पर्वत हो, पक्षी हो, हर एक के प्रति दायित्त्व भाव जगाने वाले उत्सव रहे हैं।

आजकल तो हम लोग रविवार को छुट्टी मनाते हैं, लेकिन जो पुरानी पीढ़ी के लोग हैं, मजदूरी करने वाला वर्ग हो, मछुआरे हों, आपने देखा होगा सदियों से हमारे यहाँ परम्परा थी - पूर्णिमा और अमावस्या को छुट्टी मनाने की। और विज्ञान ने इस बात को सिद्ध किया है कि पूर्णिमा और अमावस को, समुद्र के जल में किस प्रकार से परिवर्तन आता है, प्रकृति पर किन-किन चीजों का प्रभाव होता है। और वो मानव-मन पर भी प्रभाव होता है। यानि यहाँ तक हमारे यहाँ छुट्टी भी ब्रह्माण्ड और विज्ञान के साथ जोड़ करके मनाने की परम्परा विकसित हुई थी।

आज जब हम दीपावली का पर्व मनाते हैं तब, जैसा मैंने कहा, हमारा हर पर्व एक शिक्षादायक होता है, शिक्षा का बोध लेकर के आता है। ये दीपावली का पर्व ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ - अन्धकार से प्रकाश की ओर जाने का एक सन्देश देता है। और अन्धकार, वो प्रकाश के अभाव का ही अन्धकार वाला अन्धकार नहीं है, अन्ध-श्रद्धा का भी अन्धकार है, अशिक्षा का भी अन्धकार है, गरीबी का भी अन्धकार है, सामाजिक बुराईयों का भी अन्धकार है। दीपावली का दिया जलाकर के, समाज दोष-रूपी जो अन्धकार छाया हुआ है, व्यक्ति दोष-रूपी जो अन्धकार छाया हुआ है, उससे भी मुक्ति और वही तो दिवाली का दिया जलाकर के, प्रकाश पहुँचाने का पर्व बनता है।

एक बात हम सब भली-भाँति जानते हैं, हिन्दुस्तान के किसी भी कोने में चले जाइए, अमीर-से-अमीर के घर में चले जाइए, गरीब-से-गरीब की झोपड़ी में चले जाइए, दिवाली के त्योहार में, हर परिवार में स्वच्छता का अभियान चलता दिखता है। घर के हर कोने की सफाई होती है। गरीब अपने मिट्टी के बर्तन होंगे, तो मिट्टी के बर्तन भी ऐसे साफ करते हैं, जैसे बस ये दिवाली आई है। दिवाली एक स्वच्छता का अभियान भी है। लेकिन, समय की माँग है कि सिर्फ घर में सफाई नहीं, पूरे परिसर की सफाई, पूरे मोहल्ले की सफाई, पूरे गाँव की सफाई, हमने हमारे इस स्वभाव और परम्परा को विस्तृत करना है, विस्तार देना है।

दीपावली का पर्व अब भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा है। विश्व के सभी देशों में किसी-न-किसी रूप में दीपावली के पर्व को याद किया जाता है, मनाया जाता है। दुनिया की कई सरकारें भी, वहाँ की संसद भी, वहाँ के शासक भी, दीपावली के पर्व के हिस्से बनते जा रहे हैं। चाहे देश पूर्व के हों या पश्चिम के, चाहे विकसित देश हों या विकासमान देश हों, चाहे अफ्रीका हो, चाहे आयरलैंड हो, सब दूर दिवाली की धूम-धाम नजर आती है।

आप लोगों को पता होगा, अमेरिका की यूएस पोस्टल सर्विस, उन्होंने इस बार दीपावली का डाक टिकट जारी किया है। केनेडा के प्रधानमंत्री जी ने दीपावली के अवसर पर दिया जलाते हुए अपनी तस्वीर ट्वीटर पर साझा की है।

ब्रिटेन की प्रधानमंत्री ने लंदन में दीपावली के निमित्त, सभी समाजों को जोड़ता हुआ एक सहभोज का कार्यक्रम आयोजित किया, स्वयं ने हिस्सा लिया और शायद यूके में तो कोई ऐसा शहर नहीं होगा कि जहाँ पर बड़े ताम-झाम के साथ दिवाली न मनाई जाती हो। सिंगापुर के प्रधानमंत्री जी ने इंस्टाग्राम पर तस्वीर रखी है और उस तस्वीर को उन्होंने दुनिया के साथ शेयर किया है और बड़े गौरव के साथ किया है और तस्वीर क्या है।

सिंगापुर संसद की 16 महिला सांसद भारतीय साड़ी पहन करके संसद के बाहर खड़ी हैं और ये फोटो वायरल हुई है और ये सब दिवाली के निमित्त किया गया है। सिंगापुर के तो हर गली-मोहल्ले में इन दिनों दिवाली का जश्न मनाया जा रहा है। आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने भारतीय समुदाय को दीपावाली की शुभकामनाएँ और आस्ट्रेलिया के विभिन्न शहरों में दीपावली के पर्व में हर समाज को जुड़ने के लिये आह्वान किया है।

अभी न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री आये थे, उन्होंने मुझे कहा कि मुझे जल्दी इसलिये वापस जाना है कि मुझे वहाँ दिवाली के समारोह में शामिल होना है। कहने का मेरा तात्पर्य यह है कि दीपावली, ये प्रकाश का पर्व, विश्व समुदाय को भी अन्धकार से प्रकाश की ओर लाये जाने का एक प्रेरणा उत्सव बन रहा है।

दीपावली के पर्व पर अच्छे कपड़े, अच्छे खान-पान के साथ-साथ पटाखों की भी बड़ी धूम मची रहती है। और बालकों को, युवकों को बड़ा आनन्द आता है। लेकिन कभी-कभी बच्चे दुस्साहस भी कर देते हैं।

कई पटाखों को इकट्ठा कर-कर के बड़ी आवाज करने की कोशिश में एक बहुत बड़े अकस्मात को निमंत्रण दे देते हैं। कभी ये भी ध्यान नहीं रहता है कि आसपास में क्या चीजें हैं, कहीं आग तो नहीं लग जाएगी। दीपावली के दिनों में अकस्मात की खबरें, आग की खबरें, अपमृत्यु की खबरें, बड़ी चिन्ता कराती हैं और एक मुसीबत ये भी हो जाती है कि दिवाली के दिनों में डॉक्टर भी बड़ी संख्या में अपने परिवार के साथ दिवाली मनाने चले गए होते हैं, तो संकट में और एक संकट जुड़ जाता है। मेरा खासकर के माता-पिताओं को, पैरेंट्स को, गार्जियन्स को खास आग्रह है कि बच्चे जब पटाखे चलाते हों, बड़ों को साथ खड़े रहना चाहिए, कोई गलती न हो जाये, उसकी चिन्ता करनी चाहिए और दुर्घटना से बचना चाहिए। हमारे देश में दीपावली का पर्व बहुत लम्बा चलता है। वो सिर्फ एक दिन का नहीं होता है। वो गोवर्धन पूजा कहो, भाई दूज कहो, लाभ पंचमी कहो और कार्तिक पूर्णिमा के प्रकाश-पर्व तक ले जाइए, तो एक प्रकार से एक लम्बे कालखण्ड चलता है। इसके साथ-साथ हम दीपावली का त्योहार भी मनाते हैं और छठ-पूजा की तैयारी भी करते हैं।

भारत के पूर्वी इलाके में छठ-पूजा का त्योहार, एक बहुत बड़ा त्योहार होता है। एक प्रकार से महापर्व होता है, चार दिन तक चलता है, लेकिन इसकी एक विशेषता है -समाज को एक बड़ा गहरा सन्देश देता है। भगवान सूर्य हमें जो देते हैं, उससे हमें सब कुछ प्राप्त होता है। प्रत्यक्ष और परोक्ष, भगवान सूर्य देवता से जो मिलता है, उसका हिसाब अभी लगाना ये हमारे लिये कठिन है, इतना कुछ मिलता है और छठ-पूजा, सूर्य की उपासना का भी पर्व है। लेकिन कहावत तो ये हो जाती है कि भई, दुनिया में लोग उगते सूरज की पूजा करते हैं। छठ-पूजा एक ऐसा उत्सव है, जिसमें ढलते सूरज की भी पूजा होती है। एक बहुत बड़ा सामाजिक सन्देश है उसमें।

मैं दीपावली के पर्व की बात कहूँ, छठ-पूजा की बात कहूँ- ये समय है आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएँ देने का, लेकिन साथ-साथ मेरे लिये समय और भी है, खासकर के देशवासियों का धन्यवाद करना है, आभार व्यक्त करना है। पिछले कुछ महीनों से, जो घटनाएँ आकार ले रही हैं, हमारे सुख-चैन के लिये हमारे सेना के जवान अपना सब कुछ लुटा रहे हैं।

मेरे भाव-विश्व पर सेना के जवानों की, सुरक्षा बलों के जवानों की, ये त्याग, तपस्या, परिश्रम, मेरे दिल-दिमाग पर छाया हुआ रहता है। और उसी में से एक बात मन में कर गई थी कि यह दिवाली सुरक्षा बलों के नाम पर समर्पित हो। मैंने देशवासियों को ‘सन्देश टू सोल्जर्स’ एक अभियान के लिये निमंत्रित किया। लेकिन मैं आज सिर झुकाकर के कहना चाहता हूँ, हिन्दुस्तान का कोई ऐसा इन्सान नहीं होगा, जिसके दिल में देश के जवानों के प्रति जो अप्रतिम प्यार है, सेना के प्रति गौरव है, सुरक्षा-बलों के प्रति गौरव है। जिस प्रकार से उसकी अभिव्यक्ति हुई है, ये हर देशवासी को ताकत देने वाली है। एक सन्देश में सामर्थ्य बढ़ जाता है और देश ने कर के दिखाया। मैं सचमुच में देशवासियों का आभार प्रकट करता हूँ।

एक घटना मेरे ध्यान में लाई गई - मैं भी आपको बताना चाहता हूँ। अब मैं इसलिये बताना चाहता हूँ कि सफलता के मूल में कैसी-कैसी बातें एक बहुत बड़ी ताकत बन जाती हैं। आप ने सुना होगा, हिमाचल प्रदेश खुले में शौच से मुक्त हुआ। पहले सिक्किम प्रान्त हुआ था, अब हिमाचल भी हुआ, 1 नवम्बर को केरल भी होने जा रहा है। लेकिन ये सफलता क्यों होती है? कारण मैं बताता हूँ, देखिए, सुरक्षाबलों में हमारा एक आईटीबीपी का जवान, श्री विकास ठाकुर- वो मूलतः हिमाचल के सिरमौर जिले के एक छोटे से गाँव से हैं। उनके गाँव का नाम है बधाना। ये हिमाचल के सिरमौर जिले से हैं। अब ये जवान अपनी ड्यूटी पर से छुट्टियों में गाँव गए थे। तो गाँव में वो उस समय शायद कहीं ग्राम-सभा होने वाली थी, तो वहाँ पहुँच गए और गाँव की सभा में चर्चा हो रही थी, शौचालय बनाने की और पाया गया कि कुछ परिवार पैसों के अभाव में शौचालय नहीं बना पा रहे हैं।

ये विकास ठाकुर देशभक्ति से भरा हुआ एक हमारा आईटीबीपी का जवान, उसको लगा- नहीं-नहीं, ये कलंक मिटाना चाहिए। और उसकी देशभक्ति देखिए, सिर्फ दुश्मनों पर गोलियाँ चलाने के लिये वो देश की सेवा करता है, ऐसा नहीं है। उसने फटाक से अपनी चेकबुक से सत्तावन हजार रुपया निकाला और उसने गाँव के पंचायत प्रधान को दे दिया कि जिन 57 घरों में शौचालय नहीं बना है, मेरी तरफ से हर परिवार को एक-एक हजार रुपया दे दीजिए, 57 शौचालय बना दीजिए और अपने बधाना गाँव को खुले में शौच से मुक्त बना दीजिए। विकास ठाकुर ने करके दिखाया। 57 परिवारों को एक-एक हजार रुपया अपनी जेब से दे करके स्वच्छता के अभियान को एक ताकत दी। और तभी तो हिमाचल प्रदेश खुले में शौच से मुक्त करने की ताकत आई। वैसा ही केरल में, मैं सचमुच में, नौजवानों का आभार व्यक्त करना चाहता हूँ।

मेरे ध्यान में आया, केरल के दूर-सुदूर जंगलों में, जहाँ कोई रास्ता भी नहीं है, पूरे दिन भर पैदल चलने के बाद मुश्किल से उस गाँव पहुँचा जा सकता है, ऐसी एक जनजातीय पंचायत इडमालाकुडी, पहुँचना भी बड़ा मुश्किल है। लोग कभी जाते नहीं। उसके नजदीक में, शहरी इलाके में, इंजीनियरिंग के छात्रों के ध्यान में आया कि इस गाँव में शौचालय बनाने हैं। एनसीसी के कैडेट, एनएसएस के लोग, इंजिनीयरिंग के छात्र, सबने मिलकर के तय किया कि हम शौचालय बनाएँगे। शौचालय बनाने के लिये जो सामान ले जाना था, ईंटें हो, सीमेंट हो, सारे सामान इन नौजवानों ने अपने कंधे पर उठा करके, पूरा दिन भर पैदल चल के उन जंगलों में गए। खुद ने परिश्रम करके उस गाँव में शौचालय बनाए और इन नौजवानों ने दूर-सुदूर जंगलों में एक छोटे से गाँव को खुले में शौच से मुक्त किया। उसी का तो कारण है कि केरल खुले में शौच से मुक्त हो रहा है। गुजरात ने भी, सभी नगरपालिका -महानगरपालिकाएँ, शायद 150 से ज्यादा में, खुले में शौच से मुक्त घोषित किया है। 10 जिले भी खुले में शौच से मुक्त किये गए हैं। हरियाणा से भी खुश-खबरी आई है, हरियाणा भी 1 नवम्बर को उनकी अपनी गोल्डन जुबली मनाने जा रहा है और उनका फैसला है कि वो कुछ ही महीनों में पूरे राज्य को खुले में शौच से मुक्त कर देंगे। अभी उन्होंने सात जिले पूरे कर दिये हैं। सभी राज्यों में बहुत तेज गति से काम चल रहा है। मैंने कुछ का उल्लेख किया है। मैं इन सभी राज्यों के नागरिकों को इस महान कार्य के अन्दर जुड़ने के लिये देश से गन्दगी रूपी अन्धकार मिटाने के काम में योगदान देने के लिये हृदय से बहुत-बहुत अभिनन्दन देता हूँ।

मेरे प्यारे देशवासियों, सरकार में योजनाएँ तो बहुत होती हैं और पहली योजना के बाद, उसी के अनुरूप दूसरी अच्छी योजना आये, तो पहली योजना छोड़नी होती है। लेकिन आम तौर पर इन चीजों पर कोई ध्यान नहीं देता है। पुरानी वाली योजना भी चलती रहती है, नई वाली भी योजना चलती रहती है और आने वाली योजना का इन्तजार भी होता रहता है, ये चलता रहता है। हमारे देश में जिन घरों में गैस का चूल्हा हो, जिन घरों में बिजली हो, ऐसे घरों को केरोसिन की जरुरत नहीं है। लेकिन सरकार में कौन पूछता है, केरोसिन भी जा रहा है, गैस भी जा रहा है, बिजली भी जा रही है और फिर बिचौलियों को तो मलाई खाने का मौका मिल जाता है।

मैं हरियाणा प्रदेश का अभिनन्दन करना चाहता हूँ कि उन्होंने एक बीड़ा उठाया है। हरियाणा प्रदेश को केरोसिनमुक्त करने का। जिन-जिन परिवारों में गैस का चूल्हा है, जिन-जिन परिवारों में बिजली है, ‘आधार’ नम्बर से उन्होंने वेरीफाई किया और अब तक मैंने सुना है कि सात या आठ जिले केरोसिन मुक्त कर दिये। जिस प्रकार से उन्होंने इस काम को हाथ में लिया है, पूरा राज्य, मुझे विश्वास है कि बहुत ही जल्द केरोसिन मुक्त हो जाएगा। कितना बड़ा बदलाव आएगा, चोरी भी रुकेगी, पर्यावरण का भी लाभ होगा, हमारी विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी और लोगों की सुविधा भी बढ़ेगी। हाँ, तकलीफ होगी, तो बिचौलियों को होगी, बेईमानों को होगी।

मेरे प्यारे देशवासियों, महात्मा गाँधी हम सब के लिये हमेशा-हमेशा मार्गदर्शक हैं। उनकी हर बात आज भी देश कहाँ जाना चाहिए, कैसे जाना चाहिए, इसके लिये मानक तय करती है। गाँधी जी कहते थे, आप जब भी कोई योजना बनाएँ, तो आप सबसे पहले उस गरीब और कमजोर का चेहरा याद कीजिए और फिर तय कीजिए कि आप जो करने जा रहे हैं, उससे उस गरीब को कोई लाभ होगा कि नहीं होगा। कहीं उसका नुकसान तो नहीं हो जाएगा। इस मानक के आधार पर आप फैसले कीजिए। समय की माँग है कि हमें अब, देश के गरीबों का जो एस्पिरेशंस जगा है, उसको एड्रेस करना ही पड़ेगा। मुसीबतों से मुक्ति मिले, उसके लिये हमें एक-के-बाद-एक कदम उठाने ही पड़ेंगे। हमारी पुरानी सोच कुछ भी क्यों न हो, लेकिन समाज को बेटे-बेटी के भेद से मुक्त करना ही होगा। अब स्कूलों में बच्चियों के लिये भी टॉयलेट हैं, बच्चों के लिये भी टॉयलेट हैं। हमारी बेटियों के लिये भेदभाव-मुक्त भारत की अनुभूति का ये अवसर है।

सरकार की तरफ से टीकाकरण तो होता ही है, लेकिन फिर भी लाखों बच्चे टीकाकरण से छूट जाते हैं। बीमारी के शिकार हो जाते हैं। ‘मिशन इन्द्रधनुष’ टीकाकरण का एक ऐसा अभियान, जो छूट गए हुए बच्चों को भी समेटने के लिये लगा है, जो बच्चों को गम्भीर रोगों से मुक्ति के लिये ताकत देता है। 21वीं सदी हो और गाँव में अन्धेरा हो, अब नहीं चल सकता और इसलिये गाँवों को अन्धकार से मुक्त करने के लिये, गाँव बिजली पहुँचाने का बड़ा अभियान सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहा है। समय सीमा में आगे बढ़ रहा है। आजादी के इतने सालों के बाद, गरीब माँ, लकड़ी के चूल्हे पर खाना पका करके दिन में 400 सिगरेट का धुआँ अपने शरीर में ले जाये, उसके स्वास्थ्य का क्या होगा। कोशिश है 5 करोड़ परिवारों को धुएँ से मुक्त जिन्दगी देने के लिये। सफलता की ओर आगे बढ़ रहे हैं।

सरदार पटेल साहब की जीवन यात्रा का प्रारम्भ किसानों के संघर्ष से हुआ था। किसान के बेटे थे। आजादी के आन्दोलन को किसानों तक पहुँचाने में सरदार साहब की बहुत बड़ी अहम भूमिका रही। आजादी के आन्दोलन को गाँव में ताकत का रूप बनाना सरदार साहब का सफल प्रयास था। उनके संगठन शक्ति और कौशल्य का परिणाम था। लेकिन सरदार साहब सिर्फ संघर्ष के व्यक्ति थे, ऐसा नहीं, वह संरचना के भी व्यक्ति थे। आज कभी-कभी हम बहुत लोग ‘अमूल’ का नाम सुनते हैं। ‘अमूल’ के हर प्रोडक्ट से आज हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान के बाहर भी लोग परिचित हैं। लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि सरदार साहब की दिव्यदृष्टि थी कि उन्होंने को-ओपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स के यूनियन की कल्पना की थी। और खेड़ा जिला, उस समय केरा जिलाबोला जाता था और 1942 में इस विचार को उन्होंने बल दिया था, वो साकार रूप, आज का ‘अमूल’ किसानों के सुख-समृद्धि की संरचना सरदार साहब ने कैसे की थी, उसका एक जीता-जागता उदाहरण हमारे सामने है।

मेरे प्यारे देशवासियों, फिर एक बार, देश के जवानों के नाम ये दिवाली, इस दिवाली पर आपको भी बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। आपके सपने, आपके संकल्प हर प्रकार से सफल हों। आपका जीवन सुख-चैन की जिन्दगी वाला बने, यही आप सबको शुभकामनाएँ देता हूँ। बहुत-बहुत धन्यवाद।

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