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राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 (National Agricultural and Rural Development Bank Act, 1981)

(1981 का अधिनियम संख्यांक 61)


{30 दिसम्बर, 1981}


1{ समेकित ग्रामीण विकास के संवर्धन और ग्रामीण क्षेत्र की उन्नति को सुनिश्चित करने की दृष्टि से, कृषि, लघु उद्योगों, कुटीर और ग्राम उद्योगों, हस्त-शिल्पों और अन्य ग्रामशिल्पों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में अन्य सहबद्ध आर्थिक क्रियाकलापों के संवर्धन और विकास के लिये उधार तथा अन्य सुविधाएँ देने और उनका विनियमन करने के लिये और उनसे सम्बद्ध या उनके आनुषंगिक विषयों के लिये एक विकास बैंक की, जो राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक के नाम से ज्ञात होगा, स्थापना करने के लिये अधिनियम}

भारत गणराज्य के बत्तीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

अध्याय 1


प्रारम्भिक


1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ


(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 है।

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबन्धों के लिये भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी तथा इस अधिनियम के प्रारम्भ के प्रति किसी उपबन्ध में किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबन्ध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है।

2. परिभाषाएँ


इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) “कृषि” के अन्तर्गत बागवानी, पशुपालन, वनोद्योग, दुग्ध उद्योग और कुक्कुट पालन; मत्स्य पालन और अन्य सहबद्ध क्रियाकलाप हैं चाहे उन्हें कृषि के साथ संयुक्त रूप से किया गया है या नहीं और “कृषि संक्रिया” पद का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा।

स्पष्टीकरण


इस खण्ड के प्रयोजनों के लिये “मत्स्य पालन” के अन्तर्गत अन्तर्देशीय और समुद्री, दोनों प्रकार के मीन उद्योग का विकास, मछली पकड़ना और उनसे सम्बद्ध या उनके आनुषंगिक अन्य सब क्रियाकलाप हैं;
(ख) “कृषिक पुनर्वित्त और विकास निगम” से कृषिक पुनर्वित्त और विकास निगम अधिनियम, 1963 (1963 का 10) की धारा 3 के अधीन स्थापित और उस अधिनियम की धारा 3क के अधीन कृषिक पुनर्वित्त और विकास निगम के रूप में पुनः नामित निगम अभिप्रेत है;
(ग) “बोर्ड” से राष्ट्रीय बैंक का निदेशक बोर्ड अभिप्रेत है;
(घ) “केन्द्रीय सहकारी बैंक” से राज्य के जिले में की वह प्रधान सहकारी सोसाइटी अभिप्रेत है जिसका प्राथमिक उद्देश्य उस जिले में अन्य सहकारी सोसाइटियों का वित्तपोषण करना है:

परन्तु जिले की ऐसी प्रधान सोसाइटी के अतिरिक्त या जहाँ जिले में ऐसी प्रधान सोसाइटी नहीं है वहाँ राज्य सरकार उस जिले में अन्य सहकारी सोसाइटियों का वित्तपोषण करने का कारबार करने वाली एक या अधिक सहकारी सोसाइटियों को भी या को इस परिभाषा के अर्थ के अन्तर्गत केन्द्रीय सहकारी बैंक या केन्द्रीय सहकारी बैंकों के रूप में घोषित कर सकेगी;
(ङ) “अध्यक्ष” से धारा 6 के अधीन नियुक्त 2***अध्यक्ष अभिप्रेत है;
(च) “सहकारी सोसाइटी” से सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1912 (1912 का 2) या किसी राज्य में तत्समय प्रवृत्त सहकारी सोसाइटियों से सम्बन्धित किसी अन्य विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत या रजिस्ट्रीकृत समझी गई कोई सोसाइटी अभिप्रेत है;
(छ) “फसल” के अन्तर्गत कृषि संक्रियाओं के उत्पाद हैं;
(ज) “निदेशक” से धारा 6 के अधीन नियुक्त निदेशक अभिप्रेत है;
(झ) “छोटे और विकेन्द्रित सेक्टर में उद्योग” से छोटे और विकेन्द्रित सेक्टर में औद्योगिक समुत्थान अभिप्रेत है और “छोटे और विकेन्द्रित औद्योगिक समुत्थान” से ऐसा औद्योगिक समुत्थान अभिप्रेत है जिसमें मशीनरी और संयंत्र में विनिधान दो लाख रुपए या ऐसी उच्चतर रकम से अधिक नहीं है जो केन्द्रीय सरकार औद्योगिक विकास का रुख तथा अन्य सुसंगत बातों को ध्यान में रखते हुए इस निमित्त अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे;
(ञ) “प्रबन्ध निदेशक” से धारा 6 के अधीन नियुक्त प्रबन्ध निदेशक अभिप्रेत है;
(ट) “फसलों का विपणन” के अन्तर्गत फसलों का वह प्रसंस्करण है जो कृषि उत्पादकों द्वारा या ऐसे उत्पादकों के किसी संगठन द्वारा विपणन के पूर्व किया जाता है;
(ठ) “राष्ट्रीय बैंक” से धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अभिप्रेत है;
(ड) “अधिसूचना” से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(ढ) “प्राथमिक ग्रामीण प्रत्यय सोसाइटी” से वह सहकारी सोसाइटी, उसका चाहे जो भी नाम हो, अभिप्रेत है -

(1) जिसका उद्देश्य या कारबार अपने सदस्यों को कृषि या कृषि संक्रियाओं के लिये या फसलों के विपणन के लिये या ग्रामीण विकास के लिये वित्तीय सौकर्य प्रदान करना है; और

(2) जिसकी उप विधियाँ किसी अन्य सहकारी सोसाइटी को सदस्य के रूप में प्रविष्ट करने की अनुज्ञा नहीं देती है:

परन्तु यह उपखण्ड ऐसी सहकारी सोसाइटी को, जो राज्य सहकारी बैंक या केन्द्रीय सहकारी बैंक है, सदस्य के रूप में प्रविष्ट किये जाने को इस कारण ही लागू नहीं होगा कि ऐसे बैंक ने सहकारी सोसाइटी की शेयर पूँजी के लिये उन निधियों में से अभिदाय किया है जो इस प्रयोजन के लिये राज्य सरकार द्वारा उपबन्धित की गई है;
(ण) “विहित” से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए, विनियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(त) “प्रादेशिक ग्रामीण बैंक” से प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 (1976 का 21) की धारा 3 के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अभिप्रेत है;
(थ) “ग्रामीण विकास” से ग्रामीण क्षेत्र का किसी ऐसे क्रियाकलाप के माध्यम से विकास अभिप्रेत है जो ऐसे विकास के लिये सहायक है।

स्पष्टीकरण


इस खण्ड के प्रयोजनों के लिये, -

(क) ग्रामीण क्षेत्र के विकास के लिये सहायक क्रियाकलापों के अन्तर्गत ग्रामीण क्षेत्र में माल के उत्पादन या सेवाओं के उपबन्ध से सम्बन्धित क्रियाकलाप तथा कुटीर और ग्राम उद्योगों, छोटे और विकेन्द्रित सेक्टर में उद्योग और लघु उद्योग तथा हस्त-शिल्प और ग्राम शिल्प के संवर्धन के लिये क्रियाकलाप हैं;

(ख) “ग्रामीण क्षेत्र” से किसी ग्राम में समाविष्ट क्षेत्र अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत किसी नगर में समाविष्ट ऐसा क्षेत्र भी है जिसकी जनसंख्या दस हजार से या ऐसी अन्य संख्या से अधिक नहीं है जो रिजर्व बैंक समय-समय पर विनिर्दिष्ट करे;

(द) “रिजर्व बैंक” से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय रिजर्व बैंक अभिप्रेत है;

(ध) “अनुसूचित बैंक” से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की द्वितीय अनुसूची में तत्समय सम्मिलित बैंक अभिप्रेत है;

(न) “लघु उद्योग” से लघु सेक्टर के औद्योगिक समुत्थान अभिप्रेत हैं और “लघु सेक्टर के औद्योगिक समुत्थान” से ऐसा औद्योगिक समुत्थान अभिप्रेत है -

(i) जिसमें मशीनरी और संयंत्र में विनिधान बीस लाख रुपए से या ऐसी उच्चतर रकम से अधिक नहीं है जो केन्द्रीय सरकार औद्योगिक विकास के रुख और अन्य सुसंगत बातों को ध्यान में रखते हुए इस निमित्त अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे; और
(ii) जो छोटे और विकेन्द्रित सेक्टर में औद्योगिक समुत्थान नहीं है;
(प) “राज्य सहकारी बैंक” से राज्य में की वह प्रधान सहकारी सोसाइटी अभिप्रेत है जिसका प्राथमिक उद्देश्य उस राज्य में अन्य सहकारी सोसाइटियों का वित्तपोषण करना है:

परन्तु किसी राज्य की ऐसी प्रधान सोसाइटी के अतिरिक्त या जहाँ किसी राज्य में ऐसी प्रधान सोसाइटी नहीं है, वहाँ, राज्य सरकार उस राज्य में कारबार करने वाली एक या एक से अधिक किन्हीं सहकारी सोसाइटियों को भी या इस परिभाषा के अर्थ में राज्य सहकारी बैंक या राज्य सहकारी बैंकों के रूप में घोषित कर सकेगी;

(फ) “राज्य भूमि विकास बैंक” से ऐसी सहकारी सोसाइटी अभिप्रेत है जो किसी राज्य में प्रधान भूमि विकास बैंक (उसका चाहे जो भी नाम हो) है और जिसका प्राथमिक उद्देश्य कृषि विकास के लिये दीर्घकालिक वित्त का उपबन्ध करना है:

परन्तु किसी राज्य के ऐसे प्रधान भूमि विकास बैंक के अतिरिक्त या जहाँ किसी राज्य में ऐसा बैंक नहीं है वहाँ राज्य सरकार उस राज्य में कारबार करने वाली किसी सहकारी सोसाइटी को भी या को जिसे ऐसी सहकारी सोसाइटी की उपविधियों द्वारा कृषि विकास के लिये दीर्घकालिक वित्त का उपबन्ध करने का प्राधिकार दिया गया है इस अधिनियम के अर्थ में राज्य भूमि विकास बैंक के रूप में घोषित कर सकेगी;

(ब) ऐसे शब्दों और पदों के, जिनको इसमें प्रयुक्त किया गया है और परिभाषित नहीं किया गया है किन्तु भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) में परिभाषित किया गया है, वही अर्थ होंगे जो उस अधिनियम में हैं;

(भ) ऐसे शब्दों और पदों के, जिनको इसमें प्रयुक्त किया गया है और इस अधिनियम में या भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) में परिभाषित नहीं किया गया है किन्तु बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) में परिभाषित किया गया है, वही अर्थ होंगे जो बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 में हैं।

अध्याय 2


राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना और उसकी पूँजी


3. राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना और निगमन


(1) ऐसी तारीख से, जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिये एक बैंक की स्थापना की जाएगी जो राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक के नाम से ज्ञात होगा।

(2) बैंक शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला पूर्वोक्त नाम का एक निगमित निकाय होगा और इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए उसे सम्पत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने की तथा संविदा करने की शक्ति होगी और उस नाम से वह वाद ला सकेगा या उस पर वाद लाया जा सकेगा।

(3) राष्ट्रीय बैंक का मुख्य कार्यालय मुम्बई में या अन्य ऐसे स्थान पर होगा जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे।

(4) राष्ट्रीय बैंक भारत में किसी स्थान पर और केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से और रिजर्व बैंक से परामर्श करके भारत के बाहर किसी स्थान पर कार्यालय, शाखाएँ या अभिकरण स्थापित कर सकेगा।

4. पूँजी


(1) राष्ट्रीय बैंक की पूँजी एक अरब रुपए होगी :

परन्तु केन्द्रीय सरकार रिजर्व बैंक से परामर्श करके और अधिसूचना द्वारा उक्त पूँजी को बढ़ाकर 1{पचास अरब रुपए} तक कर सकेगी।

1{(2) राष्ट्रीय बैंक की पूँजी का अभिदाय केन्द्रीय सरकार द्वारा और रिजर्व बैंक द्वारा उस सीमा तक और उस अनुपात में किया जाएगा जो रिजर्व बैंक के परामर्श से केन्द्रीय सरकार द्वारा, समय-समय पर, अधिसूचित किया जाये:

परन्तु राष्ट्रीय बैंक ऐसी संस्थाओं और व्यक्तियों को, ऐसी रीति से, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित की जाये, पूँजी निर्गमित कर सकेगा :

परन्तु यह और कि केन्द्रीय सरकार और रिजर्व बैंक की सम्मिलित शेयरधारिता किसी भी समय सकल प्रतिश्रुत पूँजी के इक्यावन प्रतिशत से कम नहीं होगी।}

अध्याय 3


राष्ट्रीय बैंक का प्रबन्ध


5. प्रबन्ध


(1) राष्ट्रीय बैंक के कार्यकलाप और कारबार का साधारण अधीक्षण, निदेशन और प्रबन्ध एक निदेशक बोर्ड में निहित होगा जो उन सब शक्तियों का प्रयोग तथा वे सब कार्य और बातें करेगा जिनका राष्ट्रीय बैंक द्वारा प्रयोग किया जा सकता है या जिन्हें राष्ट्रीय बैंक कर सकता है।

(2) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, बोर्ड अपने कृत्यों का निर्वहन करने में लोकहित का सम्यक ध्यान रखते हुए, कारबार के सिद्धान्तों के अनुसार कार्य करेगा।

(3) उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए और इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों में जैसा अन्यथा उपबिन्धत है उसके सिवाय प्रबन्ध निदेशक को भी राष्ट्रीय बैंक के कार्यकलापों और कारबार के साधारण अधीक्षण, निदेशन और प्रबन्ध की शक्तियाँ प्राप्त होंगी और वह उन सभी शक्तियों का प्रयोग तथा वे सब कार्य और बातें भी कर सकेगा। जिनका राष्ट्रीय बैंक द्वारा प्रयोग किया जा सकता है या जिन्हें राष्ट्रीय बैंक कर सकता है:

1{परन्तु प्रबन्ध निदेशक के पद में धारा 11 में निर्दिष्ट प्रकृति की किसी आकस्मिक रिक्ति की अवधि के दौरान, अध्यक्ष भी, प्रबन्ध निदेशक की शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन तब तक कर सकेगा जब तक कि केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रबन्ध निदेशक के रूप में कार्य करने के लिये धारा 11 के अधीन नियुक्त किया गया व्यक्ति अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है।}

(4) धारा 6 की उपधारा (3) के अधीन नियुक्त कोई पूर्णकालिक निदेशक उपधारा (3) के अधीन प्रबन्ध निदेशक के कृत्यों का निर्वहन करने में उसकी सहायता करेगा और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो बोर्ड उसे सौंपे या प्रत्यायोजित करे।

(5) प्रबन्ध निदेशक, उपधारा (3) के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करने में ऐसे निदेशों का अनुसरण करेगा जो अध्यक्ष दे।

(6) इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने में राष्ट्रीय बैंक का लोकहित विषयक नीति के विषय में मार्गदर्शन ऐसे निदेशों से होगा जो केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक से परामर्श करके, या रिजर्व बैंक उसे लिखित रूप में दे।

2{6.निदेशक बोर्ड


(1) राष्ट्रीय बैंक का निदेशक बोर्ड निम्नलिखित से मिलकर बनेगा} अर्थात:-

(क) एक अध्यक्ष;
(ख) तीन निदेशक, जो ग्राम अर्थशास्त्र, ग्राम विकास, ग्राम और कुटीर उद्योग, लघु उद्योग के विशेषज्ञों या ऐसे व्यक्तियों में से होंगे, जो सहकारी बैंकों, प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों या वाणिज्यिक बैंकों के कार्यकरण का या ऐसे अन्य विषय का, जिसका विशेष ज्ञान या वृत्तिक अनुभव केन्द्रीय सरकार द्वारा राष्ट्रीय बैंक के लिये उपयोगी समझा जाता है, अनुभव रखते हों;
(ग) तीन निदेशक, रिजर्व बैंक के निदेशकों में से होंगे;
(घ) तीन निदेशक, केन्द्रीय सरकार के पदधारियों में से होंगे;
(ङ) चार निदेशक, राज्य सरकारों के पदधारियों में से होंगे;
(च) इतनी संख्या में निदेशक, जो विहित रीति में रिजर्व बैंक, केन्द्रीय सरकार और केन्द्रीय सरकार के स्वामित्वाधीन या उसके द्वारा नियंत्रित अन्य संस्थाओं से भिन्न ऐसे शेयरधारकों द्वारा, जिनके नाम राष्ट्रीय बैंक के शेयरधारकों के रजिस्टर में उस अधिवेशन की तारीख से नब्बे दिन पूर्व प्रविष्ट हों, जिसमें ऐसा निर्वाचन होता है, निम्नलिखित आधार पर निर्वाचित किये गए हों, अर्थात:-

(i) जहाँ ऐसे शेयरधारकों को पुरोधृत साधारण अंश पूँजी की कुल रकम कुल पुरोधृत साधारण अंश पूँजी के दस प्रतिशत से या उससे कम है, दो निदेशक;
(ii) जहाँ ऐसे शेयरधारकों को पुरोधृत साधारण अंश पूँजी की कुल रकम कुल पुरोधृत साधारण अंश पूँजी के दस प्रतिशत से अधिक किन्तु पच्चीस प्रतिशत से कम है, और तीन निदेशक;
(iii) जहाँ ऐसे शेयरधारकों को पुरोधृत कुल साधारण अंश पूँजी कुल पुरोधृत साधारण पूँजी का पच्चीस प्रतिशत या उससे अधिक है: चार निदेशक;

परन्तु यह कि इस खण्ड के अधीन निर्वाचित निदेशकों द्वारा कार्यभार ग्रहण करने तक केन्द्रीय सरकार किसी भी समय चार से अनधिक उतने निदेशक, ऐसे व्यक्तियों में से नाम-निर्दिष्ट कर सकेगी जो कृषि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अर्थशास्त्र, बैंककारी सहकारिता, विधि, ग्राम वित्त, विनिधान, लेखाकर्म, विपणन का विशेष ज्ञान या वृत्तिक अनुभव या किसी अन्य ऐसे विषय का विशेष ज्ञान या वृत्तिक अनुभव रखते हों, जो केन्द्रीय सरकार की राय में बैंक के लिये उसके कृत्यों को कार्यान्वित करने के लिये उपयोगी होगा; और
(छ) एक प्रंबन्ध निदेशक।

(2) खण्ड (च) में निदिष्ट निदेशकों को छोड़कर, अध्यक्ष और अन्य निदेशक रिजर्व बैंक के परामर्श से केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किये जाएँगे :

परन्तु ऐसा कोई परामर्श उपधारा (1) के खण्ड (घ) के अधीन नियुक्त निदेशकों के मामले में, आवश्यक नहीं होगा।}

(3) जहाँ केन्द्रीय सरकार का रिजर्व बैंक 1***से परामर्श करने पर यह समाधान हो जाता है कि ऐसा करना आवश्यक है वहाँ वह एक या अधिक पूर्णकालिक निदेशक नियुक्त कर सकेगी जिनके पदनाम वे होंगे जो वह सरकार समुचित समझे और इस प्रकार नियुक्त पूर्णकालिक निदेशक भी बोर्ड का सदस्य होगा :

7. अध्यक्ष और अन्य निदेशकों की पदावधि, सेवानिवृत्ति और उनकी फीस का सन्दाय


(1) अध्यक्ष पाँच वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि तक पद धारण करेगा और ऐसे वेतन और भत्ते प्राप्त करेगा जो केन्द्रीय सरकार नियुक्ति के समय विनिर्दिष्ट करे 2{और पुनर्नियुक्ति के लिये पात्र होगा}:

4{(1क) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार को, अध्यक्ष की पदावधि को उस उपधारा के अधीन विनिर्दिष्ट अवधि के अवसान के पूर्व किसी समय, उसे तीन मास से अन्यून की लिखित सूचना देकर या ऐसी सूचना के बदले में तीन मास का वेतन और भत्ता देकर समाप्त करने का अधिकार होगा।}

2{(1ख) अध्यक्ष का पद रिक्त होने की दशा में, प्रबन्ध निदेशक, ऐसी रिक्ति के दौरान अध्यक्ष के कृत्यों और दायित्वों का निर्वहन करेगा।}

5{(2) उपधारा (5) में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अधीन रहते हुए, धारा 6 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) या खण्ड (ग) के अधीन नियुक्त किया गया कोई निदेशक ऐसी अवधि तक जो तीन वर्ष से अधिक नहीं होगी, जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे 6***पद धारण करेगा और वह पुनर्नियुक्ति के लिये पात्र होगा :

परन्तु कोई ऐसा निदेशक छह वर्ष से अधिक की अवधि तक निरन्तर पद धारण नहीं करेगा।}

(3) केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक से परामर्श करके अध्यक्ष 7***को उसकी पदावधि के अवसान के पूर्व किसी भी समय, उसे उसके प्रस्तावित हटाए जाने के विरुद्ध कारण दर्शित करने का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात, हटा सकेगी।

8{(4) अध्यक्ष और किसी अन्य निदेशक को, जो केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार का कोई अधिकारी या रिजर्व बैंक का अथवा केन्द्रीय अधिनियम या किसी राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित और ऐसी सरकार के स्वामित्वाधीन या उसके द्वारा नियंत्रित किसी निकाय या निगम का कोई अधिकारी नहीं है, बोर्ड के या उसकी किसी समिति के अधिवेशनों में उपस्थित होने के लिये और राष्ट्रीय बैंक के किसी अन्य कार्य को करने के लिये ऐसी फीस और भत्ते सन्दत्त किये जाएँगे जो विहित किये जाएँ।}

9{(5) धारा 6 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) से खण्ड (च) तक के अधीन नियुक्त किये गए निदेशक केन्द्रीय सरकार के प्रसाद पर्यन्त पद धारण करेंगे।}

8. प्रबन्ध निदेशक और पूर्णकालिक निदेशकों की पदावधि, सेवा की शर्तें, आदि


(1) धारा 6 की उपधारा (3) के अधीन नियुक्त प्रबन्ध निदेशक और कोई पूर्णकालिक निदेशक, -

(क) पाँच वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि तक पद धारण करेगा जो केन्द्रीय सरकार नियुक्ति के समय विनिर्दिष्ट करे 10{और पुनर्नियुक्ति के लिये पात्र होगा};

(ख) ऐसा वेतन और भत्ते प्राप्त करेगा और सेवा के ऐसे निबन्धनों और शर्तों द्वारा शासित होगा जो बोर्ड केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से और रिजर्व बैंक से परामर्श करके अवधारित करे :

परन्तु प्रथम बोर्ड के लिये नियुक्त प्रबन्ध निदेशक और ऐसा कोई पूर्णकालिक निदेशक ऐसा वेतन और भत्ते प्राप्त करेंगे और सेवा के ऐसे निबन्धनों और शर्तों द्वारा शासित होंगे जो केन्द्रीय सरकार रिजर्व बैंक से परामर्श करके अवधारित करे।

(2) केन्द्रीय सरकार रिजर्व बैंक से परामर्श करके प्रबन्ध निदेशक या धारा 6 की उपधारा (3) के अधीन नियुक्त किसी पूर्णकालिक निदेशक को उसकी पदावधि के अवसान के पूर्व किसी भी समय उसे उसके प्रस्थापित हटाए जाने के विरुद्ध कारण दर्शित करने का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात, हटा सकेगा।

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी केन्द्रीय सरकार को प्रबन्ध निदेशक या धारा 6 की उपधारा (3) के अधीन नियुक्त किसी पूर्णकालिक निदेशक की पदावधि को उपधारा (1) के अधीन नियत अवधि के अवसान के पूर्व किसी समय उसे तीन मास से अन्यून की लिखित सूचना देकर या ऐसी सूचना के बदले में तीन मास का वेतन और भत्ते देकर समाप्त करने का अधिकार होगा :

परन्तु केन्द्रीय सरकार प्रबन्ध निदेशक या धारा 6 की उपधारा (3) के अधीन नियुक्त किसी पूर्णकालिक निदेशक की पदावधि का पर्यवसान करने के पूर्व रिजर्व बैंक से परामर्श करेगी।

9.निरर्हताएँ


(1) ऐसा कोई व्यक्ति निदेशक नहीं होगा जो -

(क) विकृत-चित्त है और सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित किया गया है; या
(ख) ऐसे किसी अपराध के लिये दोषसिद्ध ठहराया गया है या ठहराया जा चुका है जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में नैतिक अधमता अन्तर्वलित है; या
(ग) दिवालिया न्यायनिर्णीत है या किसी समय दिवालिया न्यायनिर्णीत किया गया है या जिसने अपने ऋणों का सन्दाय निलम्बित कर दिया है या अपने लेनदारों के साथ समझौता कर लिया है।

(2) ऐसे किसी व्यक्ति की निदेशक के रूप में नियुक्ति, जो संसद या किसी राज्य के विधान-मण्डल का सदस्य है जब तक कि उसकी नियुक्ति की तारीख से दो मास के भीतर वह ऐसा सदस्य नहीं रह जाता है, उक्त दो मास की अवधि के अवसान पर शून्य हो जाएगी और यदि कोई निदेशक संसद के या किसी राज्य के विधान-मण्डल के सदस्य के रूप में निर्वाचित या नाम-निर्दिष्ट किया जाता है तो वह, यथास्थिति, ऐसे निर्वाचन या नाम-निर्देशन की तारीख से निदेशक नहीं रह जाएगा।

10. निदेशक के पद में रिक्ति और पद त्याग


(1) यदि कोई निदेशक -

(क) धारा 9 में वर्णित किसी निरहर्ता से ग्रस्त हो जाता है; या
(ख) बोर्ड की इजाजत के बिना उसकी लगातार तीन बैठकों से अधिक में अनुपस्थित रहता है, तो ऐसा होने पर उसका स्थान रिक्त हो जाएगा।

(2) कोई निदेशक केन्द्रीय सरकार को लिखित सूचना देकर अपना पद त्याग सकेगा और केन्द्रीय सरकार द्वारा उसका त्यागपत्र स्वीकार कर लिये जाने पर या यदि उसका त्यागपत्र शीघ्र स्वीकार नहीं किया जाता है तो केन्द्रीय सरकार द्वारा त्यागपत्र की प्राप्ति के तीन मास के अवसान पर यह माना जाएगा कि उसने अपना पद रिक्त कर दिया है।

11. प्रबन्ध निदेशक के पद से आकस्मिक रिक्ति


यदि प्रबन्ध निदेशक अंग शैथिल्य के कारण या अन्यथा अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हो जाता है या छुट्टी पर या अन्यथा ऐसी परिस्थितियों में अनुपस्थित है जो उसकी नियुक्ति में रिक्ति अन्तर्वलित नहीं करती है तो केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक और बोर्ड से परामर्श करने के पश्चात, उसकी अनुपस्थिति के दौरान उसके स्थान पर प्रबन्ध निदेशक के रूप में कार्य करने के लिये किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त कर सकेगी।

12. बोर्ड के अधिवेशन


(1) बोर्ड के अधिवेशन ऐसे समय और स्थानों पर होंगे और वह अपने अधिवेशनों में कार्य करने के बारे में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगा जो विहित किये जाएँ।

(2) बोर्ड का अध्यक्ष, या यदि किसी कारण से वह किसी अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है तो 1{प्रबन्ध निदेशक और अध्यक्ष तथा प्रबन्ध निदेशक, दोनों की अनुपस्थिति में} अध्यक्ष द्वारा इस निमित्त नाम-निर्देशित कोई अन्य निदेशक और ऐसे नाम-निर्देशन के अभाव में बैठक में उपस्थित निदेशकों द्वारा निर्वाचित कोई अन्य निदेशक बोर्ड के अधिवेशन का सभापतित्व करेगा।

(3) बोर्ड के किसी अधिवेशन में उठने वाले सभी प्रश्नों का विनिश्चय उपस्थित और मत देने वाले निदेशकों के बहुमत से किया जाएगा और मत बराबर होने की दशा में अध्यक्ष का या उसकी अनुपस्थिति में पीठासीन व्यक्ति का द्वितीय या निर्णायक मत होगा।

13. राष्ट्रीय बैंक की समितियाँ


(1) बोर्ड एक कार्यपालिका समिति का गठन कर सकेगा जिसमें उतने निदेशक होंगे जितने विहित किये जाएँ।

(2) कार्यपालिका समिति ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगी जो विहित किये जाएँ या जो बोर्ड द्वारा उसे प्रत्यायोजित किये जाएँ।

(3) बोर्ड चाहे तो पूर्णतया निदेशकों से या पूर्णतया अन्य व्यक्तियों से या भागतः निदेशकों से और भागतः अन्य व्यक्तियों से मिलकर बनी ऐसी अन्य समितियाँ, जो वह ठीक समझे ऐसे प्रयोजनों के लिये, जो वह विनिश्चित करे, गठित कर सकेगा और इस प्रकार गठित प्रत्येक समिति ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगी जो बोर्ड द्वारा उसे प्रत्यायोजित किये जाएँ।

(4) कार्यपालिका समिति के अधिवेशन ऐसे समय और स्थानों पर होंगे और वह अपने अधिवेशनों में कार्य करने के बारे में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगी जो विहित किये जाएँ।

(5) वह समय और स्थान जिस पर उपधारा (3) के अधीन गठित कोई समिति अपना अधिवेशन करेगी, प्रक्रिया के वे नियम जिनका पालन ऐसी समिति अपने अधिवेशनों में कार्य करने के बारे में करेगी और वे फीसें और भत्ते जो ऐसी समिति के सदस्यों को समिति के अधिवेशनों में हाजिर होने के लिये और राष्ट्रीय बैंक के किसी अन्य कार्य को करने के लिये सन्दत्त किये जा सकेंगे, ऐसे होंगे जो वह बैंक विनिर्दिष्ट करे।

14. सलाहकार परिषद


(1) बोर्ड एक सलाहकार 1{परिषद का गठन कर सकेगा, जिसमें उतने निदेशक और ऐसे अन्य व्यक्ति होंगे जो बोर्ड की राय में कृषि, कृषिक प्रत्यय, सहकारिता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था, लघु उद्योग, ग्राम और कुटीर उद्योग तथा हस्तशिल्प और अन्य ग्राम शिल्प का विशेष ज्ञान रखते हैं या जिन्हें देश की समग्र विकास नीतियों का और विशेषतया समग्र धन सम्बन्धी और प्रत्यय सम्बन्धी नीतियों का विशेष ज्ञान और बोध है, जो बोर्ड द्वारा राष्ट्रीय बैंक के लिये उपयोगी मानी जाती है।

(2) सलाहकार परिषद राष्ट्रीय बैंक को ऐसे विषयों के बारे में सलाह देगी जो राष्ट्रीय बैंक द्वारा सलाहकार परिषद को निर्दिष्ट किये जाएँ और ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करेगी जो राष्ट्रीय बैंक द्वारा सलाहकार परिषद को सौंपे या प्रत्यायोजित किये जाएँ।

(3) सलाहकार परिषद का सदस्य पाँच वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि तक पद धारण करेगा जो राष्ट्रीय बैंक नियत करे और सलाहकार परिषद के अधिवेशनों में हाजिर होने के लिये और राष्ट्रीय बैंक के किसी अन्य कार्य को करने के लिये ऐसी फीस और भत्ते प्राप्त करेगा जो विहित किये जाएँ।

(4) सलाहकार परिषद के अधिवेशन ऐसे समय और स्थानों पर होंगे और वह अपने अधिवेशनों में कार्य करने के बारे में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगी जो विहित की जाये।

15. बोर्ड या उसकी समिति के सदस्यों का कुछ मामलों में बैठकों में भाग न लेना


बोर्ड का कोई निदेशक या समिति का कोई सदस्य जिसका बोर्ड या उसकी समिति के अधिवेशन में विचार के लिये आने वाले किसी मामले में कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष धन सम्बन्धी हित है, सुसंगत परिस्थितियाँ उसकी जानकारी में आने के पश्चात यथासम्भव शीघ्र ऐसे अधिवेशन में अपने हित का स्वरूप प्रकट करेगा और यह प्रकटीकरण, यथास्थिति, बोर्ड या समिति के कार्यवृत्त में अभिलिखित किया जाएगा और वह निदेशक या सदस्य उस विषय के सम्बन्ध में बोर्ड या समिति के किसी विचार-विमर्श या विनिश्चय में कोई भाग नहीं लेगा।

अध्याय 4


राष्ट्रीय बैंक को कारबार का अन्तरण


16. कृषिक पुनर्वित्त और विकास निगम की आस्तियों और दायित्वों का अन्तरण


(1) ऐसी तारीख को जो केन्द्रीय सरकार रिजर्व बैंक से परामर्श करके अधिसूचना द्वारा नियत करे कृषिक पुनर्वित्त और विकास निगम (जिसे इस अध्याय में इसके पश्चात “निगम” कहा गया है) का सम्पूर्ण उपक्रम, जिसके अन्तर्गत सभी कारबार, सम्पत्ति, आस्तियाँ और दायित्व, अधिकार, हित, विशेषाधिकार और किसी भी प्रकार की बाध्यताएँ हैं, वे चाहे जिस प्रकार की हों, राष्ट्रीय बैंक को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएगा।

(2) निगम के उपक्रम के उपधारा (1) के अधीन राष्ट्रीय बैंक को अन्तरण के लिये प्रतिकर के रूप में राष्ट्रीय बैंक उस उपधारा के अधीन नियत तारीख से (जिसे इस धारा में इसके पश्चात नियत तारीख कहा गया है) छह मास के भीतर निगम के शेयर धारकों को, नियत तारीख से ठीक पहले की तारीख को निगम की कुल समादत्त पूँजी के बराबर, राशि सन्दत्त करेगा।

(3) निगम के शेयर धारकों को उपधारा (2) के अधीन सन्देय प्रतिकर की रकम शेयर धारकों के बीच निगम की समादत्त पूँजी में उनके अभिदाय के, जैसे कि वे नियत तारीख के ठीक पहले की तारीख को हो, अनुपात में प्रभाजित की जाएगी।

स्पष्टीकरण


इस उपधारा के प्रयोजनों के लिये “निगम के शेयर धारकों” से निगम के ऐसे शेयर धारक अभिप्रेत हैं जिनके नाम कृषिक पुनर्वित्त और विकास निगम अधिनियम, 1963 (1963 का 10) की धारा 8 के अधीन अनुरक्षित शेयर धारकों के रजिस्टर में नियत तारीख के ठीक पूर्ववर्ती तारीख को हों।

(4) राष्ट्रीय बैंक उपधारा (2) में निर्दिष्ट निगम के शेयर धारकों को ऐसी अवधि के लिये, यदि कोई हो, जो नियत दिन से पूर्व निगम के लेखा वर्ष में व्यतीत हो गई हो, ऐसी दर से संगणित रकम भी सन्दत्त करेगा जिस पर कृषिक पुनर्वित्त और विकास निगम अधिनियम, 1963 (1963 का 10) की धारा 6 के अधीन न्यूनतम लाभांश के सन्दाय के बारे में निगम के शेयरों को प्रत्याभूति दी गई थी और इस रकम को राष्ट्रीय बैंक, उपधारा (2) में निर्दिष्ट निगम के शेयर धारकों में नियत तारीख से ठीक पूर्ववर्ती तारीख को ऐसे शेयर धारकों द्वारा धारित शेयरों के अनुपात में और ऐसी दर पर जिस पर ऐसे शेयरों को न्यूनतम लाभांश के सन्दाय के बारे में प्रत्याभूति दी गई थी, वितरित करेगा।

(5) ऐसी सभी संविदाएँ, विलेख, बन्धपत्र, करार, मुख्तारनामे, विधिक प्रतिनिधित्व के अनुदान और किसी भी प्रकृति की अन्य लिखतें, जो नियत तारीख के ठीक पूर्व विद्यमान या प्रभावी हैं और जिनका निगम एक पक्षकार है या जो निगम के पक्ष में है, यथास्थिति, राष्ट्रीय बैंक के विरुद्ध या उसके पक्ष में वैसे ही पूर्ण बल और प्रभाव की होंगी और वैसे ही पूर्णतः और प्रभावी रूप में प्रवृत्त की जा सकेंगी या उन पर कार्य किया जा सकेगा मानो निगम के स्थान पर राष्ट्रीय बैंक उसका एक पक्षकार रहा था या मानो वे राष्ट्रीय बैंक के पक्ष में रही थीं।

(6) यदि नियत तारीख से ठीक पूर्व निगम द्वारा या उसके विरुद्ध कोई वाद, अपील या किसी भी प्रकार की अन्य विधिक कार्यवाही चाहे वह किसी भी प्रकार की हो लम्बित है तो निगम के उपक्रमों का राष्ट्रीय बैंक को अन्तरण या इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के कारण उसका उपशमन नहीं होगा, वह बन्द नहीं होगी या उस पर किसी भी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा किन्तु वह वाद, अपील या अन्य कार्यवाही राष्ट्रीय बैंक द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रखी जा सकेगी, अभियोजित की जा सकेगी और प्रवृत्त की जा सकेगी।

17. निगम का विघटन और 1963 के अधिनियम 10 का निरसन


धारा 16 की उपधारा (1) के अधीन नियत तारीख को, -

(क) निगम विघिटत हो जाएगा; और
(ख) कृषिक पुनर्वित्त और विकास निगम अधिनियम, 1963 निरसित हो जाएगा।

18. रिजर्व बैंक से कारबार का अन्तरण


(1) ऐसी तारीख को जो केन्द्रीय सरकार रिजर्व बैंक से परामर्श करके अधिसूचना द्वारा नियत करे:-

(क) भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 46 क के अधीन स्थापित और अनुरक्षित राष्ट्रीय कृषिक प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि, और
(ख) भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 46ख के अधीन स्थापित और अनुरक्षित राष्ट्रीय कृषिक प्रत्यय (स्थिरीकरण) निधि, से सम्बन्धित रिजर्व बैंक की आस्तियाँ और दायित्व राष्ट्रीय बैंकों को अन्तरित हो जाएँगे और क्रमशः धारा 42 में निर्दिष्ट राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि और धारा 43 में निर्दिष्ट राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (स्थिरीकरण) निधि के भाग हो जाएँगे।

(2) ऐसी तारीख से जो केन्द्रीय सरकार रिजर्व बैंक से परामर्श करके अधिसूचना द्वारा नियत करे, ऐसे उधार और अग्रिम जो रिजर्व बैंक ने भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 17 के {सिवाय खण्ड (4) के उपखण्ड (क) के, अधीन राज्य सहकारी बैंकों और प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों को दिये हैं और जो रिजर्व बैंक साधारण या विशेष आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे, यथाशक्य, धारा 21 के अधीन राष्ट्रीय बैंक द्वारा दिये गए उधार और अग्रिम हो जाएँगे और समझे जाएँगे और राष्ट्रीय बैंक ऐसे उधारों और अग्रिमों की रकम ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर, जो केन्द्रीय सरकार रिजर्व बैंक से परामर्श करके विनिर्दिष्ट करे, रिजर्व बैंक को प्रतिसन्दत्त करेगा।

(3) उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी आस्ति या दायित्व के सम्बन्ध में या उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी उधार या अग्रिम के सम्बन्ध में रिजर्व बैंक के सभी अधिकार, हित, दायित्व, विशेषाधिकार और बाध्यताएँ, वे चाहे जिस प्रकार की हों, (जिनके अन्तर्गत किन्हीं विनिमय पत्रों और वचन पत्रों के क्रय, विक्रय और मितिकाटा पर पुनः भुगतान के रूप में उद्भूत अधिकार और बाध्यताएँ हैं) उस तारीख को जिसको ऐसी आस्ति या दायित्व उपधारा (1) के अधीन राष्ट्रीय बैंक को अन्तरित हो जाता है या, यथास्थिति, ऐसा उधार या अग्रिम उपधारा (2) के अधीन राष्ट्रीय बैंक द्वारा दिया गया उधार या अग्रिम हो जाता है, राष्ट्रीय बैंक को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएँगी।

(4) ऐसी सभी संविदाएँ, विलेख, बन्धपत्र, करार, मुख्तारनामे, विधिक प्रतिनिधित्व के अनुदान और किसी भी प्रकृति की अन्य लिखतें, जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी आस्ति या दायित्व से सम्बन्धित हैं और जो उस उपधारा के अधीन नियत तारीख से ठीक पूर्व अस्तित्वशील या प्रभावी हैं, या उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी उधार या अग्रिम से सम्बन्धित हैं और उस उपधारा के अधीन नियत तारीख से ठीक पूर्व अस्तित्वशील या प्रभावी हैं, यथास्थिति, राष्ट्रीय बैंक के विरुद्ध या उसके पक्ष में वैसे ही पूर्ण बल वाली और प्रभावी होंगी और वैसे ही पूर्ण बल और प्रभावी रूप में उन्हें प्रवृत्त और कार्यान्वित किया जा सकेगा मानो रिजर्व बैंक के स्थान पर राष्ट्रीय बैंक उनका पक्षकार रहा है या मानो वे राष्ट्रीय बैंक के पक्ष में रही हैं।

(5) यदि, यथास्थिति, उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन नियत तारीख से ठीक पूर्व उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी आस्ति या दायित्व के सम्बन्ध में या उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी उधार या अग्रिम के सम्बन्ध में रिजर्व बैंक द्वारा या उसके विरुद्ध कोई वाद, अपील या अन्य विधिक कार्यवाही चाहे वह किसी भी प्रकार की हो लम्बित है तो उपधारा (1) के अधीन ऐसी आस्ति या दायित्व के राष्ट्रीय बैंक को अन्तरण के कारण या, यथास्थिति, ऐसे उधार या अग्रिम का उपधारा (2) के अधीन राष्ट्रीय बैंक द्वारा अनुदत्त उधार या अग्रिम हो जाने के कारण या इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के कारण उसका उपशमन नहीं होगा, वह बन्द नहीं होगी या उस पर किसी भी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा, किन्तु वह वाद, अपील या अन्य कार्यवाहियाँ राष्ट्रीय बैंक द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रखी जा सकेंगी, अभियोजित की जा सकेंगी और प्रवृत्त की जा सकेंगी।

अध्याय 5


राष्ट्रीय बैंक द्वारा उधार


19. राष्ट्रीय बैंक द्वारा उधार


राष्ट्रीय बैंक इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के प्रयोजन के लिये -

1{(क) केन्द्रीय सरकार की प्रत्याभूति सहित या उसके बिना बन्धपत्र, डिबेंचरों और अन्य वित्तीय लिखतों को, ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर, जो बोर्ड द्वारा अनुमोदित की जाएँ, निर्गमित कर सकेगा और उनका विक्रय कर सकेगा;}

1{(ख) रिजर्व बैंक से ऐसा धन जो माँग किये जाने पर, या अन्यथा प्रतिसन्देय हो, ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर, जिनके अन्तर्गत प्रतिभूति और प्रयोजन से सम्बन्धित निबन्धन भी हैं, जो रिजर्व बैंक विनिर्दिष्ट करे, उधार ले सकेगा;
(ग) केन्द्रीय सरकार से और बोर्ड द्वारा अनुमोदित किसी अन्य प्राधिकारी या संगठन या संस्था से, ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर धन उधार ले सकेगा जो करार पाई जाएँ;
(घ) केन्द्रीय सरकार, किसी राज्य सरकार, किसी स्थानीय प्राधिकरण, किसी राज्य भूमि विकास बैंक, किसी राज्य सहकारी बैंक या किसी अनुसूचित बैंक या किसी व्यक्ति या निकाय से, चाहे निगमित हो या न हो, जो ऐसा निक्षेप, जो ऐसे निबन्धनों पर, जो राष्ट्रीय बैंक, रिजर्व बैंक के अनुमोदन से, नियत करे, प्रतिसन्देय हो, स्वीकार कर सकेगा; और
(ङ) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या किसी अन्य स्रोत से दान, अनुदान, सन्दान या उपकृतियाँ प्राप्त कर सकेगा।}

2{20. विदेशी करेंसी में उधार


विदेशी मुद्रा प्रबन्ध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) में या विदेशी मुद्रा से सम्बन्धित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रीय बैंक, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से और रिजर्व बैंक से परामर्श करके, उधार और अग्रिम मंजूर करने के लिये या इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन विनिर्दिष्ट किसी अन्य प्रयोजन के लिये ऐसी करेंसी का उपयोग करने के लिये भारत में या अन्यत्र किसी बैंक या वित्तीय संस्था से विदेशी करेंसी उधार ले सकेगा।}

अध्याय 6


राष्ट्रीय बैंक के प्रत्यय कृत्य


21. उत्पादन और विपणन प्रत्यय


(1) राष्ट्रीय बैंक, 3{राज्य सहकारी बैंकों, केन्द्रीय सहकारी बैंकों,, प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों या ऐसी किसी वित्तीय संस्था या वित्तीय संस्थाओं के किसी वर्ग को जो रिजर्व बैंक द्वारा इस निमित्त अनुमोदित हैं, पुनर्वित्त पूर्ति, उधार और अग्रिमों के रूप में, जो माँग पर या अठारह मास से अनधिक की नियत अवधि के अवसान पर, प्रतिसन्देय हैं, निम्नलिखित के वित्तपोषण के लिये उपबन्ध कर सकेगा -

(i) कृषि संक्रियाएँ या फसलों का विपणन, या
(ii) कृषि या ग्रामीण विकास के लिये आवश्यक निविष्टि का विपणन और वितरण, या
(iii) कृषि या ग्रामीण विकास की उन्नति के लिये या उस क्षेत्र में कोई अन्य क्रियाकलाप, या
(iv) सद्भाविक, वाणिज्यिक या व्यापारिक संव्यवहार, या
(v) कारीगरों के या लघु उद्योगों, छोटे और विकेन्द्रित सेक्टर में उद्योगों, ग्राम और कुटीर उद्योगों या उनके, जो हस्तशिल्प और अन्य ग्राम शिल्प में लगे हैं, उत्पादन या विपणन क्रियाकलाप।

(2) राष्ट्रीय बैंक उपधारा (1) के अधीन उधार और अग्रिम निम्नलिखित की प्रतिभूति पर दे सकेगा, -

(i) स्टाक, निधियाँ और स्थावर सम्पत्ति से भिन्न प्रतिभूतियाँ, जिनमें न्यास धन विनिहित करने के लिये कोई न्यासी तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा प्राधिकृत है;
(ii) माल के हक के दस्तावेजों द्वारा समर्थित वचनपत्र, ऐसे दस्तावेज उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट किसी प्रयोजन के लिये दिये गए उधार या अग्रिम के लिये प्रतिभूति के रूप में उधार लेने वाली संस्था को अन्तरित, समनुदिष्ट या गिरवी रख दिये गए हों:

परन्तु राष्ट्रीय बैंक, जब भी ऐसा करना आवश्यक समझे, राष्ट्रीय बैंक के पक्ष में किसी ऐसी प्रतिभूति के वास्तविक समनुदेशन के स्थान पर उधार लेने वाली संस्था से ऐसी लिखित घोषणा स्वीकार कर सकेगा, जिसमें -

(क) यह कथित होगा कि वह घोषणा में वर्णित माल के हक के ऐसे दस्तावेज धारण करता है; और
(ख) ऐसी अन्य विशिष्टियाँ भी होंगी जो राष्ट्रीय बैंक द्वारा अपेक्षित हों।

(3) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रीय बैंक अपने विवेकानुसार उधार या अग्रिम -

(क) यदि उधार या अग्रिम मूलधन और ब्याज के प्रति सन्दाय के बारे में सरकार द्वारा पूर्णतः प्रत्याभूत है तो, किसी भी राज्य सहकारी बैंक 1{या केन्द्रीय सहकारी बैंक को},
(ख) यदि उधार या अग्रिम की प्रतिभूति या तो विनिमय पत्र द्वारा या केन्द्रीय सहकारी बैंक द्वारा निष्पादित और राज्य सहकारी बैंक के पक्ष में समनुदिष्ट वचन पत्र द्वारा दी गई है तो, किसी ऐसे राज्य सहकारी बैंक को, जो अनुसूचित बैंक है, देगा।

(4) उपधारा (2) और उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रीय बैंक, राज्य सहकारी बैंक या प्रादेशिक ग्रामीण बैंक या उपधारा (1) के अधीन अनुमोदित संस्था के वचनपत्र के प्रति ऐसे उधार और अग्रिम भी दे सकेगा जो माँग पर या अठारह मास से अनधिक की नियत अवधि के अवसान पर प्रति सन्देय है :

परन्तु यह तब जबकि उधार लेने वाली संस्था उस प्रयोजन को, जिसके लिये उसने उधार और अग्रिम दिये हैं, और ऐसी अन्य विशिष्टियाँ जिनकी राष्ट्रीय बैंक अपेक्षा करे उपवर्णित करते हुए एक लिखित घोषणा प्रस्तुत करती है।

2{22. उत्पादन प्रत्यय के लिये सम्परिवर्तन उधार


जहाँ राष्ट्रीय बैंक का यह समाधान हो जाता है कि सूखा, दुर्भिक्ष या अन्य प्राकृतिक विपत्तियों, सैनिक संक्रियाओं या शत्रु कार्रवाई के कारण किसी राज्य सहकारी बैंक, केन्द्रीय सहकारी बैंक, प्रादेशिक ग्रामीण बैंक या ऐसी किसी वित्तीय संस्था या किन्हीं ऐसी वित्तीय संस्थाओं के किसी वर्ग के अन्तर्गत आने वाली किसी वित्तीय संस्था को, जिसे रिजर्व बैंक इस निमित्त अनुमोदित करे, इस धारा के अधीन सहायता की अपेक्षा है, वहाँ वह ऐसे बैंक या संस्था को उधारों और अग्रिमों के रूप में ऐसी वित्तीय सहायता का, जो वह ठीक समझे, उपबन्ध कर सकेगा, जो सात वर्ष से अनधिक की नियत अवधि के अवसान पर और ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर, जो राष्ट्रीय बैंक इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, प्रतिसन्देय होगी:

परन्तु इस धारा के अधीन, उधार और अग्रिम, उधार लेने वाले बैंक या संस्था को निम्नलिखित के लिये समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिये ही दिये जा सकेंगे, -

(क) धारा 21 की उपधारा (1) के खण्ड (i) के अधीन कृषि संक्रियाओं या फसलों के विपणन का वित्तपोषण करने के लिये दिये गए प्रत्यय के लिये राष्ट्रीय बैंक को किन्हीं देयों का सन्दाय करना, या
(ख) (i) केन्द्रीय सहकारी बैंकों या प्राथमिक ग्रामीण प्रत्यय सोसाइटियों को उन मामलों में, जहाँ उधार लेने वाला बैंक कोई राज्य सहकारी बैंक है, उधार और अग्रिम देना, और (ii) प्राथमिक ग्रामीण प्रत्यय सोसाइटियों को उन मामलों में जहाँ उधार लेने वाला बैंक केन्द्रीय सहकारी बैंक है, उधार और अग्रिम देना,

और ऐसे उधार या अग्रिम, दोनों मामलों में, जो ऐसे सहकारी बैंकों या सोसाइटियों द्वारा कृषि या कृषि संक्रियाओं के लिये या ऐसे उधारों या अग्रिमों की प्रतिपूर्ति के लिये, जिन्हें ऐसे उधारों या अग्रिमों में सम्परिवर्तित कर दिया गया है, जो सम्परिवर्तन की तारीख से अठारह मास से अन्यून और सात वर्ष से अनधिक की नियत अवधियों के अवसान पर प्रतिसन्देय है, दिये गए उधारों और अग्रिमों की प्रतिपूर्ति के रूप में अठारह मास से अन्यून और सात वर्ष से अनधिक की नियत अवधियों के अवसान पर प्रतिसन्देय होंगे :

परन्तु यह और कि इस धारा के अधीन कोई उधार या अग्रिम किसी राज्य सहकारी बैंक या केन्द्रीय सहकारी बैंक को तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक कि ऐसे उधार या अग्रिम को मूलधन के प्रति सन्दाय और ब्याज के सन्दाय की बाबत राज्य सरकार द्वारा पूर्णतः प्रत्याभूत नहीं कर दिया गया हो।}

23. कारीगरों, लघु उद्योगों आदि को उधार का पुनः आयोजन


जहाँ राष्ट्रीय बैंक का यह समाधान हो जाता है कि कारीगरों, लघु उद्योगों, छोटे और विकेन्द्रित सेक्टर के उद्योगों, ग्राम और कुटीर उद्योगों और उनको जो हस्तशिल्पों और अन्य, शिल्पों के क्षेत्र में लगे हैं, किसी राज्य सहकारी बैंक, प्रादेशिक ग्रामीण बैंक या किसी ऐसी वित्तीय संस्था या ऐसी वित्तीय संस्थाओं के किसी वर्ग के अन्तर्गत आने वाली किसी वित्तीय संस्था द्वारा, जिसे रिजर्व बैंक इस निमित्त अनुमोदित करे, दिये गए किन्हीं उधारों और अग्रिमों का पुनः आयोजन करना अकल्पित परिस्थितियों में आवश्यक हो गया है वहाँ, वह ऐसे बैंक या संस्था के लिये ऐसी वित्तीय सहायता का, जो वह ठीक समझे, उपबन्ध ऐसी प्रतिभूतियों पर जो राष्ट्रीय बैंक इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे उधारों और अग्रिम के रूप में कर सकेगा, जो अठारह मास से अन्यून और सात वर्ष से अनधिक की नियत अवधि के अवसान पर सन्देय होंगे :

परन्तु इस धारा के अधीन कोई उधार या अग्रिम किसी राज्य सहकारी बैंक को तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक ऐसा उधार या अग्रिम मूलधन के प्रतिसन्दाय और ब्याज के सन्दाय के बारे में राज्य सरकार द्वारा पूर्णतः प्रत्याभूत नहीं है किन्तु जहाँ राष्ट्रीय बैंक के समाधानप्रद रूप में अन्य प्रतिभूति उपलब्ध है या जहाँ राष्ट्रीय बैंक का उसके द्वारा लिखित कारणों से यह समाधान हो जाता है कि प्रत्याभूति या अन्य प्रतिभूति आवश्यक नहीं है वहाँ राष्ट्रीय बैंक ऐसी प्रत्याभूति का अधित्यजन कर सकेगा।

24. मध्यकालिक विनिधान प्रत्यय


राष्ट्रीय बैंक राज्य सहकारी बैंकों, प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों को ऐसी वित्तीय सहायता का जो वह आवश्यक समझे, उपबन्ध ऐसी प्रतिभूति पर जो राष्ट्रीय बैंक इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, ऐसे उधारों और अग्रिमों के रूप में कर सकेगा जो अठारह मास से अन्यून और सात वर्ष से अनधिक की नियत अवधि के अवसान पर प्रति सन्देय होंगे और ऐसे उधार और अग्रिम, कृषि, ग्रामीण विकास या ऐसे अन्य प्रयोजन के लिये दिये जा सकेंगे जो राष्ट्रीय बैंक समय-समय पर अवधारित करे:

परन्तु इस धारा के अधीन कोई उधार या अग्रिम किसी राज्य सहकारी बैंक को तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक ऐसा उधार या अग्रिम मूलधन के प्रति सन्दाय और ब्याज के सन्दाय के बारे में राज्य सरकार द्वारा पूर्णतः प्रत्याभूत नहीं है किन्तु जहाँ राष्ट्रीय बैंक के समाधानप्रद रूप में अन्य प्रतिभूति उपलब्ध है या जहाँ राष्ट्रीय बैंक का उसके द्वारा लिखित कारणों से यह समाधान हो गया है कि प्रत्याभूति या अन्य प्रतिभूति आवश्यक नहीं है राष्ट्रीय बैंक ऐसी प्रत्याभूति का अधित्यजन कर सकेगा।

25. अन्य विनिधान प्रत्यय


(1) राष्ट्रीय बैंक कृषि और ग्रामीण विकास के संवर्धन के लिये ऐसी वित्तीय सहायता का उपबन्ध जो वह आवश्यक समझे निम्नलिखित द्वारा कर सकेगा -

(क) राज्य भूमि विकास बैंक या राज्य सहकारी बैंक या अनुसूचित बैंक या किसी अन्य वित्तीय संस्था को, जिसे रिजर्व बैंक ने इस निमित्त अनुमोदित किया है, ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर, जो राष्ट्रीय बैंक अधिरोपित करना ठीक समझे, पुनर्वित्त पूर्ति के रूप में उधार और अग्रिम देना, ऐसे उधारों और अग्रिमों का पुनः आयोजन भी करना :

परन्तु वह अधिकतम अवधि, जिसके लिये ऐसा कोई उधार या अग्रिम चाहे मूल रूप से या उसके सन्दाय का पुनः आयोजन करके दिया जा सकेगा पच्चीस वर्ष से अधिक नहीं होगी;

(ख) ऐसे बन्धपत्रों या डिबेंचरों का क्रय या विक्रय करना या उसके लिये प्रतिश्रुति करना जो खण्ड (क) में निर्दिष्ट बैंक या संस्था द्वारा पुरोधृत हों और उस तारीख से जिसको वे पुरोधृत किये गए हों, पच्चीस वर्ष से अनधिक की अवधि के भीतर प्रति सन्देय हों;
(ग) किसी राज्य सहकारी बैंक या अनुसूचित बैंक को ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर जो राष्ट्रीय बैंक अधिरोपित करना उचित समझे, ऐसे बैंक द्वारा कारीगरों, लघु उद्योगों, छोटे और विकेन्द्रित सेक्टर के उद्योगों, ग्राम और कुटीर उद्योगों और उनको जो हस्तशिल्प और अन्य ग्राम शिल्प के क्षेत्र में लगे हुए हैं, उधार या अग्रिम देने में समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिये उधार और अग्रिम देना और ऐसे उधारों और अग्रिमों के सन्दाय का पुनः आयोजन करना :

परन्तु वह अधिकतम अवधि, जिसके लिये ऐसा उधार या अग्रिम, चाहे मूल रूप से या उसके सन्दाय का पुनः आयोजन करके दिया जा सकेगा, पच्चीस वर्ष से अधिक नहीं होगी;
(घ) जहाँ किसी राज्य भूमि विकास बैंक या राज्य सहकारी बैंक या अनुसूचित बैंक को खण्ड (क) या खण्ड (ख) या खण्ड (ग) के अधीन किसी वित्तीय सहायता के सम्बन्ध में ऐसा करना आवश्यक समझा जाये, वहाँ ऐसे बैंक को पुनर्वित्त पूर्ति के रूप में 1{या अन्यथा, माँग पर या अठारह मास से अनधिक की नियत अवधि के अवसान पर प्रति सन्देय उधार और अग्रिम देना और ऐसी अवधि के लिये जो राष्ट्रीय बैंक उचित समझे ऐसे उधारों और अग्रिमों के सन्दाय का पुनः आयोजन भी करना।

(2) इस धारा के उपबन्ध धारा 21 और धारा 24 के उपबन्धों के अतिरिक्त होंगे न कि उनके अल्पीकरण में।

2{26. शेयरों का क्रय और विक्रय


राष्ट्रीय बैंक, कृषि और ग्रामीण विकास से सम्बन्धित किसी संस्था या किसी वर्ग की संस्थाओं के, जिसे बोर्ड ऐसे निबन्धनों और शर्तों के अधीन रहते हुए, जो वह उचित समझे, अनुमोदित करे, स्टाक, शेयरों, बन्धपत्र या डिबेंचरों में अभिदाय कर सकेगा या उनका क्रय अथवा विक्रय कर सकेगा या उनकी प्रतिभूतियों में विनिधान कर सकेगा।}

27. शेयर पूँजी अभिदाय के लिये राज्य सरकार को उधार


राष्ट्रीय बैंक राज्य सरकारों को उधार और अग्रिम, जो ऐसे उधार और अग्रिम दिये जाने की तारीख से बीस वर्ष से अनधिक की नियत अवधि के अवसान पर प्रति सन्देय हों, धारा 42 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि में से दे सकेगा, जिससे उन्हें किसी सहकारी प्रत्यय सोसाइटी की शेयर पूँजी में प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षः अभिदाय करने के लिये समर्थ बनाया जा सकेगा।

1{27क. राज्य सरकार, उपक्रमों आदि को उधार


राष्ट्रीय बैंक, कृषि और ग्राम विकास के संवर्धन के लिये अवसंरचनात्मक सुविधाओं के विकास के प्रयोजन के लिये, किसी राज्य सरकार या राज्य सरकार के स्वामित्वाधीन या उसके नियंत्रणाधीन किसी निगम को या किसी अन्य व्यक्ति या वर्ग के व्यक्तियों को, जो बोर्ड द्वारा अनुमोदित किये जाएँ, उधार और अग्रिम, जो ऐसे उधार या अग्रिम के दिये जाने की तारीख से पच्चीस वर्ष से अनधिक की किन्हीं नियत अवधियों के अवसान पर प्रति सन्देय होंगे, ऐसे निबन्धनों और शर्तों के अधीन रहते हुए जैसी बोर्ड द्वारा अनुमोदित की जाएँ, दे सकेगा।}

28. प्रत्यय के लिये प्रतिभूति


(1) अनुसूचित बैंक से भिन्न किसी संस्था को धारा 25 की उपधारा (1) के खण्ड (क) या खण्ड (ग) या धारा 30 या धारा 32 के अधीन राष्ट्रीय बैंक द्वारा कोई सौकर्य तब तक प्रदान नहीं किया जाएगा जब तक कि वह मूलधन के प्रतिसन्दाय और ब्याज के सन्दाय के बारे में सरकार द्वारा पूणर्तः और शर्त के बिना प्रत्याभूत नहीं है:

परन्तु ऐसी प्रत्याभूति ऐसे मामलों में अपेक्षित नहीं होगी जिनमें बोर्ड के समाधानप्रद रूप में प्रतिभूति उधार लेने वाली संस्था द्वारा दे दी गई है।

(2) किसी अनुसूचित बैंक को धारा 25 की उपधारा (1) के खण्ड (क) या खण्ड (ग) या धारा 32 के अधीन राष्ट्रीय बैंक द्वारा कोई सौकर्य तब तक प्रदान नहीं किया जाएगा, जब तक बोर्ड के समाधानप्रद रूप में प्रतिभूति ऐसे अनुसूचित बैंक द्वारा नहीं दे दी गई है।

2{(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, उसमें निर्दिष्ट कोई प्रत्याभूति या प्रतिभूति उन दशाओं में अपेक्षित नहीं होगी जिनमें बोर्ड ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किये जाएँगे, यह विनिश्चय करता है कि किसी अनुसूचित बैंक, किसी राज्य सहकारी बैंक या किसी व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के वर्ग के सम्बन्ध में, जो विनिर्दिष्ट रूप से बोर्ड द्वारा अनुमोदित किये गए हों या किसी स्कीम या स्कीमों के सम्बन्ध में, ऐसी स्कीम या स्कीमों की, जिनके लिये सौकर्य प्रदान किये जाने का प्रस्ताव किया गया है, प्रकृति और परिधि का ध्यान रखते हुए आवश्यक नहीं है।}

29. न्यास में धारित की जाने वाली रकमें और प्रतिभूतियाँ


(1) ऐसे उधारों और अग्रिमों के प्रतिसन्दाय या वसूली में, जिनकी पुनर्वित्त पूर्ति पूर्णतः या भागतः राष्ट्रीय बैंक द्वारा की गई है, उधार लेने वाली संस्था द्वारा प्राप्त किसी राशि के बारे में, राष्ट्रीय बैंक द्वारा प्रदत्त सौकर्य के विस्तार तक और जितना वह बकाया है, उस तक यह माना जाएगा कि वह उधार लेने वाली संस्था द्वारा राष्ट्रीय बैंक के लिये न्यास के रूप में प्राप्त की गई है और तद्नुसार ऐसी संस्था द्वारा राष्ट्रीय बैंक को, राष्ट्रीय बैंक द्वारा नियत प्रति सन्दाय अनुसूची के अनुसार, सन्दत्त की जाएगी।

(2) जहाँ किसी उधार लेने वाली संस्था को कोई सौकर्य प्रदत्त किया गया है वहाँ ऐसी सभी प्रतिभूतियाँ, जो किसी ऐसे संव्यवहार मद्धे, जिसकी बाबत ऐसा सौकर्य राष्ट्रीय बैंक द्वारा प्रदत्त किया गया है, ऐसे उधार लेने वाली संस्था द्वारा धारित है या धारित की जा सकती है, ऐसी संस्था द्वारा राष्ट्रीय बैंक के लिये न्यास के रूप में धारित की जाएँगी।

3{(3) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, जहाँ किसी उधार लेने वाली संस्था के परिसमापन के लिये परिसमापक नियुक्त किया जाता है, वहाँ परिसमापक का यह कर्तव्य होगा कि वह, यथास्थिति, उधार लेने वाली संस्था या परिसमापक द्वारा वसूल की गई राशियाँ, राष्ट्रीय बैंक द्वारा या तो पूर्णतः या भागतः पुनर्वित्त पूर्ति किये गए उधारों और अग्रिमों के प्रतिसन्दाय या वसूली में उस सीमा तक जहाँ तक पुनर्वित्त पूर्ति बकाया है, राष्ट्रीय बैंक को तत्काल हस्तान्तरित करे और राष्ट्रीय बैंक, उधार लेने वाली संस्था द्वारा राष्ट्रीय बैंक के लिये न्यास में धारित प्रतिभूतियों को प्रवृत्त कराने का उसी प्रकार हकदार होगा मानो किसी संविदा, प्रतिभूति या उधार लेने वाली संस्था द्वारा अभिप्राप्त किसी अन्य दस्तावेज में उधार लेने वाली संस्था के प्रति प्रत्येक निर्देश राष्ट्रीय बैंक के प्रति निर्देश हो और तद्नुसार, राष्ट्रीय बैंक उधार लेने वाली संस्था के संघटकों से ऐसे उधारों या अग्रिमों के अधीन शोध्य अतिशेष राशियाँ वसूल करने का हकदार होगा और ऐसे संघटक को राष्ट्रीय बैंक द्वारा दिया गया उन्मोचन विधिमान्य उन्मोचन होगा तथा परिसमापक, राष्ट्रीय बैंक द्वारा माँग किये जाने पर राष्ट्रीय बैंक द्वारा उनके सम्यक प्रवर्तन के लिये उसे ऐसी सभी संविदाएँ, प्रतिभूतियाँ और अन्य दस्तावेजों का परिदान करेगा।

स्पष्टीकरण


इस उपधारा के प्रयोजनों के लिये, “परिसमापक” के अन्तर्गत परिसमापक या कोई अनन्तिम परिसमापक या कोई ऐसा व्यक्ति या प्राधिकारी आता है जिसे उधार लेने वाली संस्था का परिसमापन करने का कर्तव्य सौंपा गया है।}

4{30. सीधे उधार

राष्ट्रीय बैंक, उन आपवादिक परिस्थितियों में, जो बोर्ड द्वारा लेखबद्ध की जाएँगी, स्वयं या अन्य वित्तीय संस्थाओं या अनुसूचित बैंकों के साथ मिलकर किसी व्यक्ति, व्यक्तियों के वर्ग या निगमित निकाय को, पुनर्वित्त पूर्ति मद्धे अन्यथा उधार और अग्रिम जिनके अन्तर्गत प्रतिभूति हैं, ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर दे सकेगा और वह पच्चीस वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि के भीतर, जो राष्ट्रीय बैंक ठीक समझे, प्रति सन्देय हो सकेगा।

30क. विनिमय-पत्रों का पुनःमितिकाटा लेकर भुगतान करना


राष्ट्रीय बैंक, ऐसे विनिमय-पत्रों और वचन-पत्रों, कृषि और ग्रामीण विकास से सम्बन्धित किसी कम्पनी या निगमित निकाय द्वारा लिखा गया, निकाला गया, स्वीकृत या पृष्ठांकित जो अनुसूचित बैंक, राज्य सहकारी बैंक, राज्य भूमि विकास बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक या बोर्ड द्वारा अनुमोदित किसी अन्य संस्था या संस्थाओं के वर्ग द्वारा उपस्थापित किया गया हो, पुनःमितिकाटा लेकर भुगतान कर सकेगा।}

31. कमीशन


राष्ट्रीय बैंक इस अध्याय या अध्याय 7 में वर्णित कोई सेवा करने के लिये ऐसा कमीशन या अन्य प्रतिफल प्राप्त कर सकेगा जो करार पाया जाये।

1{32. प्रत्याभूतियों का जारी किया जाना


राष्ट्रीय बैंक, समय-समय पर, ऐसे निदेशों के अधीन रहते हुए, जो बोर्ड द्वारा जारी किये जाएँ, ऐसे पूँजी माल के क्रय के सम्बन्ध में या इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी बनाने के लिये किसी अन्य प्रयोजन के लिये ऐसे आस्थगित सन्दायों की प्रत्याभूति दे सकेगा, जो किसी व्यक्ति या किसी वर्ग के व्यक्तियों से, चाहे निगमित हों या न हों, शोध्य हों।}

33. सौकर्म के लिये शर्तें अधिरोपित करने की शक्ति


2{किसी उधार लेने वाले के साथ इस अधिनियम के अधीन} कोई संव्यवहार करने में राष्ट्रीय बैंक ऐसी शर्तें अधिरोपित कर सकेगा जो वह राष्ट्रीय बैंक के हितों के संरक्षण के लिये आवश्यक या समीचीन समझे।

3{34. करार की गई अवधि से पूर्व प्रतिसन्दाय के लिये माँग करने की शक्ति


किसी करार या ठहराव में अन्तर्विष्ट किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, राष्ट्रीय बैंक, लिखित सूचना द्वारा, किसी उधार लेने वाले या सहायता प्राप्त करने वाले व्यक्ति से जिसे उसने कोई उधार या अन्य वित्तीय सहायता, जिसके अन्तर्गत अनुदान भी है, मंजूर की है, यथास्थिति, उधार या अन्य वित्तीय सहायता का, जिसके अन्तर्गत अनुदान भी है, तुरन्त पूर्णतः उन्मोचन करने की अपेक्षा कर सकेगा -

(क) यदि राष्ट्रीय बैंक को यह प्रतीत होता है कि उधार या अन्य वित्तीय सहायता के लिये आवेदन में किसी तात्त्विक विशिष्टि की बाबत मिथ्या या भ्रामक जानकारी दी गई है; या
(ख) यदि उधार लेने वाला या कोई व्यक्ति, उधार या अन्य वित्तीय सहायता, जिसके अन्तर्गत अनुदान भी है, के विषय में राष्ट्रीय बैंक के साथ अपनी संविदा या ठहराव के किन्हीं निबन्धनों का अनुपालन करने में असफल रहा है; या
(ग) यदि यह युक्तियुक्त आशंका है कि उधार लेने वाला अपने ऋणों का सन्दाय करने में असमर्थ है या उसके बारे में परिसमापन की कार्रवाइयाँ प्रारम्भ की जा सकती हैं; या
(घ) यदि किसी कारण से राष्ट्रीय बैंक के हितों की संरक्षा के लिये ऐसा करना आवश्यक है।}

35. राष्ट्रीय बैंक की अभिलेखों तक पहुँच होना


4{(1) राष्ट्रीय बैंक की, ऐसे किसी उधार लेने वाले के, जो इस अधिनियम के अधीन राष्ट्रीय बैंक से कोई प्रत्यय या अन्य सुविधाएँ लेने की इच्छा करता है, ऐसे सभी अभिलेखों तक और ऐसे किसी व्यक्ति के, जो ऐसे उधार लेने वाले से कोई प्रत्यय या अन्य सुविधाएँ लेने की इच्छा करता है, ऐसे सभी अभिलेखों तक भी अबाध पहुँच होगी जिनका परिशीलन राष्ट्रीय बैंक से वित्त या अन्य सहायता का उपबन्ध करने के सम्बन्ध में उधार लेने वाले द्वारा ऐसे व्यक्ति को दिये गए किसी उधार या अग्रिम की पुनर्वित्त पूर्ति के सम्बन्ध में आवश्यक प्रतीत हो सकता हो।}

(2) राष्ट्रीय बैंक उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी संस्था या व्यक्ति से अपेक्षा कर सकेगा कि वह उस उपधारा में निर्दिष्ट किसी अभिलेख की प्रतियाँ उसे दे और, यथास्थिति, वह संस्था या व्यक्ति ऐसी अपेक्षा का अनुपालन करने के लिये बाध्य होगा।

36. उधार या अग्रिम की विधिमान्यता को प्रश्नगत न किया जाना


तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी राष्ट्रीय बैंक द्वारा इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसरण में दिये गए किसी उधार या अग्रिम की विधि मान्यता केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि पूर्वोक्त ऐसी अन्य विधि की या किसी संकल्प, संविदा, ज्ञापन, संगम अनुच्छेद या अन्य लिखित की अपेक्षाओं का अनुपालन नहीं किया गया है :

परन्तु इस धारा की कोई बात किसी कम्पनी या सहकारी सोसाइटी द्वारा अभिप्राप्त किसी उधार या अग्रिम को वहाँ विधिमान्य नहीं बनाएगी जहाँ ऐसी कम्पनी या सहकारी सोसाइटी अपने ज्ञापन द्वारा उधार या अग्रिम अभिप्राप्त करने के लिये सशक्त नहीं है।

37. राष्ट्रीय बैंक द्वारा अपने स्वयं के बन्धपत्रों या डिबेंचरों के प्रति उधार या अग्रिम न दिया जाना


राष्ट्रीय बैंक अपने स्वयं के बन्धपत्रों या डिबेंचरों की प्रतिभूति पर कोई उधार या अग्रिम नहीं देगा।

5{37क. प्रतिषिद्ध कारबार -
(1) राष्ट्रीय बैंक, धारा 30 के अधीन कोई उधार या अग्रिम या इस अधिनियम के अधीन कोई अनुदान ऐसे किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को नहीं देगा जिसमें राष्ट्रीय बैंक के निदेशकों में से कोई उस व्यक्ति या व्यक्ति- निकाय का स्वत्वधारी, भागीदार, निदेशक, प्रबन्धक, अभिकर्ता, कर्मचारी या प्रत्याभूतिदाता है या जिसमें राष्ट्रीय बैंक के एक या अधिक निदेशक मिलकर पर्याप्त हित रखते हैं:

परन्तु यह उपधारा ऐसे किसी उधार लेने वाले को लागू नहीं होगी यदि राष्ट्रीय बैंक का कोई निदेशक, यथास्थिति, ऐसे नाम-निर्देशन या निर्वाचन के कारण केवल -

(क) सरकार द्वारा या कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथापरिभाषित किसी सरकारी कम्पनी द्वारा या किसी अन्य विधि द्वारा स्थापित किसी निगम द्वारा ऐसे उधार लेने वाले बोर्ड के निदेशक के रूप में नाम-निर्दिष्ट किया जाता है;
(ख) सरकार द्वारा या कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथापरिभाषित सरकारी कम्पनी द्वारा या किसी अन्य विधि द्वारा स्थापित किसी निगम द्वारा किसी उधार लेने वाले संगठन में धारित शेयरों के कारण ऐसे उधार लेने वाले बोर्ड में निर्वाचित है।

स्पष्टीकरण


इस उपधारा के प्रयोजनों के लिये किसी उधार लेने वाले के सम्बन्ध में “पर्याप्त हित” से राष्ट्रीय बैंक के एक या अधिक निदेशकों द्वारा या ऐसे निदेशक के कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 2 के खण्ड (41) में यथापरिभाषित किसी सम्बन्धी द्वारा, अकेले या मिलकर उधार लेने वाले के शेयरों में धारित है और जिसकी समादत्त कुल रकम पाँच लाख रुपए या उधार लेने वाले की समादत्त शेयर पूँजी के पाँच प्रतिशत से, दोनों में से जो भी कम हो, से अधिक है।

(2) उपधारा (1) के उपबन्ध, -

(क) किसी उधार लेने वाले को लागू नहीं होंगे यदि राष्ट्रीय बैंक का यह समाधान हो जाता है कि उस उधार लेने वाले के साथ कारबार करना लोकहित में आवश्यक है और ऐसे उधार लेने वाले के साथ किसी प्रकार का कारबार करना ऐसी शर्तों और मर्यादाओं के अनुसार और उनके अधीन रहते हुए होगा जो बोर्ड द्वारा अनुमोदित की जाएँ;

(ख) राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (संशोधन) अधिनियम, 2000 के प्रारम्भ के पूर्व किये गए कारबार के सम्बन्ध में किसी संव्यवहार को लागू नहीं होंगे और ऐसे सभी कारबार और संव्यवहार उनके सम्बन्ध में ऐसे क्रियान्वित किये जा सकेंगे या चालू रखे जा सकेंगे मानो वह अधिनियम प्रवृत्त न हुआ हो;

(ग) केवल उस समय तक लागू होंगे जब तक उक्त उपधारा में यथा उपवर्णित ऐसी निर्योग्यता की पुरोभाव्य शर्तें बनी रहती हैं।}

अध्याय 7


राष्ट्रीय बैंक के अन्य कृत्य


38. राष्ट्रीय बैंक के अन्य कृत्य


राष्ट्रीय बैंक -

(i) अपनी संक्रियाओं और ग्रामीण प्रत्यय के क्षेत्र में लगी विभिन्न संस्थाओं की संक्रियाओं का समन्वय करेगा और कृषि और ग्रामीण विकास से सम्बन्धित सभी समस्याओं का अध्ययन करने के लिये विशेषज्ञ कर्मचारीवृन्द रखेगा और केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक, राज्य सरकारों और ऐसी अन्य संस्थाओं को, जो ग्रामीण विकास के क्षेत्र में लगी हैं परामर्श के लिये उपलभ्य रहेगा;

(ii) ऐसे उधारों और अग्रिमों की बाबत, जो दिये गए हैं या दिये जाने वाले हैं अथवा ऐसे बन्धपत्र या डिबेंचरों की बाबत, जिनका क्रय या अभिदाय किया गया है, या क्रय या अभिदाय किया जाने वाला है, किसी कारबार के संव्यवहार में केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या रिजर्व बैंक के अभिकर्ता के रूप में कार्य कर सकेगा;

(iii) ग्रामीण बैंककारी, कृषि और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में प्रशिक्षण के लिये, जानकारी के प्रसार के लिये और अनुसन्धान को बढ़ावा देने के लिये, जिसके अन्तर्गत अध्ययन, अनुसन्धान, तकनीकी, आर्थिक और अन्य सर्वेक्षण भी हैं, सुविधाओं का उपबन्ध कर सकेगा और वह उक्त प्रयोजनों के लिये 1{उधार या अग्रिम या अनुदान दे सकेगा जिनके, अन्तर्गत अध्येतावृत्ति और किसी संस्था में आचार्य पद के लिये उपबन्ध के रूप में अनुदान सम्मिलित हैं;

2{(iv) कृषि और ग्रामीण विकास क्रियाकलापों में लगे हुए किसी व्यक्ति को तकनीकी, विधिक, वित्तीय, विपणन और प्रशासनिक सहायता दे सकेगा;

(v) भारत में या उसके बाहर ऐसे निबन्धनों और ऐसे पारिश्रमिक पर, जिन पर सहमति हुई पाई जाये, कृषि और ग्रामीण विकास तथा अन्य सम्बन्धित विषयों के क्षेत्र में परामर्श सम्बन्धी सेवाएँ दे सकेगा;

(vi) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा राष्ट्रीय बैंक को सौंपे गए या उससे अपेक्षित कृत्यों का अनुपालन कर सकेगा; और

(vii) किसी अन्य प्रकार का कारबार या किसी अन्य प्रकार का क्रियाकलाप कर सकेगा जो केन्द्रीय सरकार या रिजर्व बैंक प्राधिकृत करे।}

1{38क. समनुषंगियों का सम्प्रवर्तन


राष्ट्रीय बैंक, रिजर्व बैंक के परामर्श से, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का अनुपालन करने के प्रयोजन के लिये कम्पनियों, समनुषंगियों, सम्बद्ध इकाइयों, सोसाइटियों, न्यासों या व्यक्तियों के ऐसे अन्य संगमों का, जिन्हें वह ठीक समझे, सम्प्रवर्तन, संरचना या प्रबन्ध कर सकेगा या उनकी अभिवृद्धि या उनके सम्प्रवर्तन, सरंचना या प्रबन्ध में स्वयं को सहयुक्त कर सकेगा।

38ख. ऋण को प्रतिभूतिबद्ध करना


इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रीय बैंक,-

(क) एक या अधिक न्यासों का सृजन कर सकेगा और अपने द्वारा अनुदत्त उधारों और अग्रिमों को, उनकी प्रतिभूतियों के साथ या उनके बिना, प्रतिफल के लिये ऐसे न्यासों को अन्तरित कर सकेगा;
(ख) राष्ट्रीय बैंक द्वारा धारित उधारों और अग्रिमों को अपास्त कर सकेगा और ऋण, बाध्यताओं, फायदाप्रद हित के न्यास प्रमाणपत्रों या अन्य लिखतों के रूप में चाहे वे किसी भी नाम से ज्ञात हों, इस प्रकार अपास्त किये गए ऐसे उधारों और अग्रिमों पर आधारित प्रतिभूतियों को निर्गमित कर सकेगा और उनका विक्रय कर सकेगा तथा ऐसी प्रतिभूतियों के धारकों के लिये न्यासी के रूप में कार्य कर सकेगा।

38ग. अनिवार्य रजिस्ट्रीकरण से छूट


रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) की धारा 17 की उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, -

(क) ऐसी किसी लिखत का, जो ऋण बाध्यताओं या फायदाप्रद हित के न्यास प्रमाणपत्र या किसी अन्य लिखत के रूप में है, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात है, जो राष्ट्रीय बैंक या उसके द्वारा सृजित किसी न्यास द्वारा, उसके द्वारा अनुदत्त ऋणों को प्रतिभूतिबद्ध करने के लिये निर्गमित की गई है, और किसी स्थावर सम्पत्ति पर या उसमें किसी अधिकार, हक या हित को सृजित, घोषित, समनुदेशित, परिसीमित या निर्वापित नहीं करती है; या

(ख) खण्ड (क) में निर्दिष्ट ऐसी लिखतों के किसी अन्तरण का, अनिवार्य रजिस्ट्रीकरण अपेक्षित नहीं होगा।}

39. आनुषंगिक शक्तियाँ


राष्ट्रीय बैंक ऐसे सभी कार्य भी कर सकेगा जो इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन उसकी शक्तियों का प्रयोग करने, उसके कृत्यों का निर्वहन करने और उसके कर्तव्यों को पूरा करने के लिये आवश्यक या आनुषंगिक हों या उनके परिणामस्वरूप हों।

2{40. निक्षेप और विनिधान


(1) राष्ट्रीय बैंक अपनी निधि को केन्द्रीय सरकार के वचनपत्र, स्टाकों या प्रतिभूतियों में विनिहित कर सकेगा या धनराशियों को रिजर्व बैंक के पास या रिजर्व बैंक के किसी अभिकरण के पास या राज्य सहकारी बैंक या अनुसूचित बैंक के पास निक्षिप्त रख सकेगा।

(2) उपधारा (1) या धारा 30क में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रीय बैंक, अपनी अधिशेष निधि के फायदाप्रद विनिधान के लिये, सद्भावपूर्ण व्यापार और वाणिज्यिक संव्यवहारों से उद्भूत होने वाले विनिमय पत्रों या वचन पत्रों का पुनःमितिकाटा लेकर भुगतान कर सकेगा और किसी अनुसूचित बैंक या रिजर्व बैंक द्वारा अनुमोदित किसी वित्तीय संस्था को माँग करने या लघु सूचना देने पर पुनर्सन्देय उधार भी दे सकेगा या निक्षेप प्रमाणपत्र और अन्य लिखितों या स्कीमों में, जो बोर्ड द्वारा अनुमोदित की जाएँ, विनिधान कर सकेगा।}

41. प्रत्यय विषयक जानकारी


राष्ट्रीय बैंक इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का दक्षतापूर्वक निर्वहन करने के प्रयोजन के लिये केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक या किसी बैंककारी कम्पनी या ऐसी अन्य वित्तीय संस्था से जिसे केन्द्रीय सरकार इस निमित्त अधिसूचित करे, प्रत्यय विषयक जानकारी या अन्य जानकारी संगृहीत करेगा या प्रस्तुत करेगा।

स्पष्टीकरण


इस धारा के प्रयोजनों के लिये “बैंककारी कम्पनी” और “प्रत्यय विषयक जानकारी” पद का वही अर्थ होगा जो भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 45क में है।

अध्याय 8


निधियाँ, लेखे और लेखापरीक्षा


42. राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन निधि)


(1) राष्ट्रीय बैंक, एक निधि, जो राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि नाम से ज्ञात होगी, स्थापित करेगा और बनाए रखेगा।

(2) निधि के अन्तर्गत (धारा 18 के अधीन अन्तरित आस्तियों और दायित्वों के अतिरिक्त), -

(क) ऐसी धनराशियाँ होंगी जिनका केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकारें समय-समय पर अभिदाय करें;
(ख) ऐसी धनराशियाँ होंगी जिनका रिजर्व बैंक प्रतिवर्ष अभिदाय करे; और
(ग) ऐसी अतिरिक्त धनराशियाँ होंगी जिनका बोर्ड प्रतिवर्ष अभिदाय करे।
(3) उक्त निधि में रकम का राष्ट्रीय बैंक द्वारा उपयोजन धारा 23, धारा 24, धारा 25 की उपधारा (1) या धारा 27 के अधीन उधार और अग्रिम के रूप में वित्तीय सहायता देने के लिये ही या धारा 26 के प्रयोजनों के लिये ही किया जाएगा।

43. राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (स्थिरीकरण) निधि


(1) राष्ट्रीय बैंक एक निधि, जो राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (स्थिरीकरण) निधि के नाम से ज्ञात होगी, स्थापित करेगा और बनाए रखेगा।

(2) निधि के अन्तर्गत (धारा 18 के अधीन अन्तरित आस्तियों तथा दायित्वों के अतिरिक्त) : -

(क) ऐसी धनराशियाँ होंगी जिनका केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकारें समय-समय पर अभिदाय करें;
(ख) ऐसी धनराशियाँ होंगी जिनका रिजर्व बैंक प्रतिवर्ष अभिदाय करे; और
(ग) ऐसी अतिरिक्त धनराशियाँ होंगी जिनका बोर्ड प्रतिवर्ष अभिदाय करे।

(3) उक्त निधि में की रकमों का राष्ट्रीय बैंक द्वारा उपयोजन धारा 22 के अधीन उधारों तथा अग्रिमों का उपबन्ध करने के लिये ही किया जाएगा।

44. अनुसन्धान और विकास निधि


(1) राष्ट्रीय बैंक एक निधि, जो अनुसन्धान और विकास निधि के नाम से ज्ञात होगी संस्थापित करेगा और बनाए रखेगा जिसमें निम्नलिखित जमा की जाएँगी :-

(क) ऐसी धनराशियाँ जो धारा 47 के अनुसार इस निधि में अन्तरणीय हैं;
(ख) ऐसी धनराशियाँ जो बोर्ड अपने वार्षिक लाभों में से इस निधि में प्रतिवर्ष अभिदाय करे; और
(ग) ऐसे दान, अनुदान, सन्दान या उपकृतियाँ जो राष्ट्रीय बैंक प्राप्त करे और जो बोर्ड इस प्रयोजन के लिये उद्दिष्ट करे।

(2) अनुसन्धान और विकास निधि कृषि, कृषि संक्रियाओं तथा ग्रामीण विकास के महत्त्वपूर्ण विषयों के लिये, जिनके अन्तर्गत प्रशिक्षण और अनुसन्धान सुविधाओं का उपबन्ध और धारा 38 के खण्ड (iii) के अधीन 1{उधार या अग्रिम देना या अनुदान करना, भी है, व्यय की जाएगी।

45. आरक्षित निधि और अन्य निधियाँ


राष्ट्रीय बैंक अपने वार्षिक लाभों में से और दानों, अनुदानों, सन्दानों या उपकृतियों की प्रप्तियों में से, जो वह प्राप्त करे, उतनी राशियाँ, जो वह ठीक समझे, अन्तरित करके एक आरक्षित निधि 2{और अन्य निधियाँ}, जो बोर्ड आवश्यक समझे, स्थापित करेगा।

46. राष्ट्रीय बैंक के तुलन-पत्र आदि तैयार करना


(1) राष्ट्रीय बैंक का तुलन-पत्र और लेखा ऐसे प्रारूप में और ऐसी रीति से तैयार की और रखी जाएँगी, जो विहित की जाये।

(2) बोर्ड, राष्ट्रीय बैंक की बहियों और लेखाओं को प्रति वर्ष 30 जून को 3{या ऐसी अन्य तारीख को जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे}, सन्तुलित और बन्द करवाएगा:

3{परन्तु केन्द्रीय सरकार, इस उपधारा के अधीन, एक लेखा अवधि से दूसरी लेखा अवधि को संक्रमण को सुकर बनाने की दृष्टि से, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबन्ध कर सकेगी, जो वह सम्बन्धित वर्षों की बाबत बहियों या लेखाओं को सन्तुलित और बन्द करने के लिये, या उससे सम्बन्धित अन्य विषयों के लिये आवश्यक या समीचीन समझती है।}

47. अधिशेष का व्ययन


(1) डूबन्त और शंकास्पद ऋणों, आस्तियों के अवक्षयण और ऐसी अन्य सभी बातों के लिये, जिनके लिये उपबन्ध आवश्यक या समीचीन हों, या जिनके लिये बैंककारों द्वारा प्रायः उपबन्ध किया जाता है और धारा 42, धारा 43 और धारा 45 में निर्दिष्ट निधियों के लिये उपबन्ध करने के पश्चात राष्ट्रीय बैंक, -

(i) उस लेखा वर्ष के, जिनके दौरान राष्ट्रीय बैंक की स्थापना हुई है, पश्चातत्यवर्ती पन्द्रह वर्ष की अवधि के लिये शेष रकम (जिसे इसमें इस धारा के पश्चात अधिशेष कहा गया है) धारा 44 के अधीन अनुसन्धान और विकास निधि को अन्तरित करेगा; और
1{(ii) पन्द्रह वर्ष की उक्त अवधि के अवसान के पश्चात बोर्ड, खण्ड (i) में निर्दिष्ट निधियों के लिये उपबन्ध करने के पश्चात अधिशेष के बकाया का संवितरण या उसका व्यय ऐसी रीति से करेगा जो बोर्ड द्वारा अनुमोदित की जाये।}

48. लेखा परीक्षा


(1) राष्ट्रीय बैंक के लेखाओं की लेखा परीक्षा, कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 226 की उपधारा (1) के अधीन लेखापरीक्षकों के रूप में कार्य करने के लिये सम्यक रूप से अर्हित लेखापरीक्षकों द्वारा की जाएगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा रिजर्व बैंक से परामर्श करके ऐसी अवधि के लिये और ऐसे पारिश्रमिक पर नियुक्त किये जाएँगे, जो केन्द्रीय सरकार नियत करे।

(2) लेखापरीक्षकों को राष्ट्रीय बैंक के वार्षिक तुलन-पत्र की एक प्रति दी जाएगी और उनका यह कर्तव्य होगा कि वे उससे सम्बन्धित लेखाओं और वाउचरों सहित उसकी परीक्षा करें और उन्हें राष्ट्रीय बैंक द्वारा रखी गई सभी बहियों की एक सूची परिदत्त की जाएगी और राष्ट्रीय बैंक की बहियों, लेखाओं, वाउचरों और अन्य दस्तावेजों तक युक्तियुक्त समयों पर उनकी पहुँच होगी।

(3) लेखापरीक्षक राष्ट्रीय बैंक के लेखाओं के सम्बन्ध में बोर्ड के किसी निदेशक या राष्ट्रीय बैंक के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी की परीक्षा कर सकेंगे और बोर्ड से या राष्ट्रीय बैंक के अधिकारियों या अन्य कर्मचारियों से ऐसी जानकारी और स्पष्टीकरण माँगने के हकदार होंगे जो वे अपने कर्तव्यों के पालन के लिये आवश्यक समझें।

(4) लेखापरीक्षक अपने द्वारा परीक्षित वार्षिक तुलन-पत्र और लेखाओं के बारे में राष्ट्रीय बैंक को रिपोर्ट देंगे और ऐसी प्रत्येक रिपोर्ट में वे यह कथन करेंगे कि क्या उनकी राय में तुलन-पत्र सब आवश्यक विशिष्टियों से युक्त, पूरा और ठीक तुलन-पत्र है और ऐसे उचित रूप में तैयार किया गया है कि उससे राष्ट्रीय बैंक के कामकाज की सच्ची और यथार्थ स्थिति प्रदर्शित होती है और यदि उन्होंने बोर्ड से या राष्ट्रीय बैंक के किसी अधिकारी या कर्मचारी से कोई जानकारी या स्पष्टीकरण माँगा था तो क्या वह दिया गया है और क्या वह समाधानप्रद है।

(5) राष्ट्रीय बैंक, अपने तुलन-पत्र की एक प्रति जैसी कि वह उस वर्ष के अन्त में हो और साथ में उस वर्ष के लाभ और हानि लेखा की एक प्रति, लेखा परीक्षकों की रिपोर्ट की एक प्रति तथा सुसंगत वर्ष के दौरान राष्ट्रीय बैंक के कामकाज की रिपोर्ट, उस तारीख से जिसको राष्ट्रीय बैंक के वार्षिक लेखा बन्द और सन्तुलित किये जाते हैं, चार मास के भीतर केन्द्रीय सरकार और रिजर्व बैंक को देगा और केन्द्रीय सरकार अपने द्वारा उनके प्राप्त होने के पश्चात यथाशक्य शीघ्र उन्हें संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी और उक्त तुलन-पत्र, लाभ और हानि लेखा तथा लेखापरीक्षकों की रिपोर्ट को राजपत्र में प्रकाशित कराएगी।

(6) पूर्वगामी उपधाराओं में किसी बात पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, केन्द्रीय सरकार, भारत के नियंत्रक - महालेखा परीक्षक को राष्ट्रीय बैंक के लेखाओं की परीक्षा करने और उन पर रिपोर्ट देने के लिये किसी भी समय नियुक्त कर सकेगी। ऐसी परीक्षा और रिपोर्ट के सम्बन्ध में उसके द्वारा उपगत कोई व्यय भारत के नियंत्रक - महालेखा परीक्षक को राष्ट्रीय बैंक द्वारा सन्देय होगा।

49. विवरणियाँ


राष्ट्रीय बैंक केन्द्रीय सरकार को और रिजर्व बैंक को समय-समय पर ऐसी विवरणियाँ देगा जिनकी केन्द्रीय सरकार या रिजर्व बैंक अपेक्षा करे।

अध्याय 9


कर्मचारीवृन्द


50. राष्ट्रीय बैंक के कर्मचारीवृन्द


(1) राष्ट्रीय बैंक उतने अधिकारी और अन्य कर्मचारी नियुक्त कर सकेगा जितने वह अपने कृत्यों के दक्षतापूर्ण पालन के लिये आवश्यक या वांछनीय समझे और उनकी नियुक्ति तथा सेवा के निबन्धन और शर्तें अवधारित कर सकेगा।

(2) उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना रिजर्व बैंक के ऐसे कर्मचारीवृन्द की सेवाओं का, ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर जिन पर राष्ट्रीय बैंक और रिजर्व बैंक के बीच करार हो जाये, उपयोग करना राष्ट्रीय बैंक के लिये और उपलब्ध कराना रिजर्व बैंक के लिये, विधिपूर्ण होगा।

(3) उपधारा (6) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, नियत दिन से छह मास के अवसान के पूर्व किसी समय रिजर्व बैंक, लोकहित में, राष्ट्रीय बैंक को रिजर्व बैंक में कर्मचारीवृन्द के ऐसे सदस्यों को अन्तरित कर सकेगा जिनके बारे में रिजर्व बैंक यह समझता है कि वे ऐसे कार्य में, जो कार्य वही है या उसी प्रकार का है जिसकी राष्ट्रीय बैंक को अपने दक्षतापूर्ण कार्यकरण के लिये अपेक्षा है, लगे हैं या लगने के लिये उपयुक्त हैं और ऐसे अन्तरण पर उन्हें ऐसे अन्तरण की तारीख से राष्ट्रीय बैंक द्वारा उपधारा (1) के अधीन नियुक्त किया गया समझा जाएगा :

परन्तु इस प्रकार अन्तरित प्रत्येक व्यक्ति नियत दिन से छह मास की अवधि के अवसान से या ऐसे अन्तरण से तीस दिन की अवधि के अवसान से इनमें जिस भी अवधि का बाद में अवसान होता है उससे पूर्व रिजर्व बैंक में वापस जाने का चयन इस प्रभाव के लिखित विकल्प का प्रयोग करके कर सकेगा। विकल्प का एक बार प्रयोग कर दिये जाने पर वह अन्तिम होगा और ऐसे विकल्प का प्रयोग करने पर रिजर्व बैंक नियत दिन से अठारह मास की अवधि के अवसान के पूर्व कर्मचारीवृन्द के ऐसे सदस्य को वापस लेगा और उस अवधि के दौरान जिसमें वह राष्ट्रीय बैंक के कर्मचारीवृन्द का सदस्य था, उसे राष्ट्रीय बैंक में प्रतिनियुक्ति पर रहा माना जाएगा।

(4) (क) रिजर्व बैंक के कर्मचारीवृन्द का कोई सदस्य जो उपधारा (3) के अनुसार नियुक्त नहीं किया गया है, यदि वह ऐसा चाहे तो राष्ट्रीय बैंक के कर्मचारीवृन्द के सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिये विचार किये जाने के लिये नियत तारीख से छह मास के भीतर रिजर्व बैंक को आवेदन कर सकेगा।
(ख) रिजर्व बैंक इस प्रकार आवेदन करने वाले व्यक्ति की उपयुक्तता राष्ट्रीय बैंक में रिक्तियों की उपलभ्यता, रिजर्व बैंक और राष्ट्रीय बैंक में सेवाओं की आवश्यकता और ऐसी अन्य बातों का, जो इस बाबत सुसंगत मानी जाये, ध्यान रखते हुए राष्ट्रीय बैंक से परामर्श करके ऐसे आवेदन पर विचार कर सकेगा और, यदि रिजर्व बैंक का इन बातों का ध्यान रखते हुए समाधान हो जाता है कि ऐसा आवेदक इस प्रकार नियुक्त किये जाने के लिये उपयुक्त है तो वह उसकी नियुक्ति की सिफारिश राष्ट्रीय बैंक से करेगा।
(ग) राष्ट्रीय बैंक तब इस उपधारा के अधीन आवेदन करने वाले ऐसे व्यक्ति को नियत दिन से अठारह मास के भीतर राष्ट्रीय बैंक के कर्मचारीवृन्द के सदस्य के रूप में नियुक्त कर सकेगा और ऐसी नियुक्ति पर ऐसा व्यक्ति उपधारा (3) के अधीन राष्ट्रीय बैंक में नियुक्त किया गया समझा जाएगा :

परन्तु उपधारा (3) का परन्तुक और उपधारा (5) का परन्तुक ऐसे व्यक्ति के बारे में लागू नहीं होगा।

(5) इस अधिनियम में अन्यत्र या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या किसी संविदा में किसी बात के होते हुए भी, नियत दिन से छह मास के अवसान के पूर्व किसी समय यदि रिजर्व बैंक, राष्ट्रीय बैंक से परामर्श करके, राष्ट्रीय बैंक के हित में ऐसा करना आवश्यक समझे तो वह राष्ट्रीय बैंक के कर्मचारीवृन्द के किसी सदस्य को प्रोन्नति पर रिजर्व बैंक को अन्तरित कर सकेगा और रिजर्व बैंक को ऐसे अन्तरण पर कर्मचारीवृन्द का ऐसा प्रत्येक सदस्य रिजर्व बैंक के कर्मचारीवृन्द का सदस्य माना जाएगा और उसी वेतन, उपलब्धियाँ और सेवा की अन्य शर्तों के लिये हकदार होगा, जिनके लिये वह ऐसे स्थानान्तरण की तारीख से ठीक पूर्व हकदार था। इसके अन्तर्गत वे फायदे भी, यदि कोई हों, हैं जो ऐसी प्रोन्नति से सीधे प्रोद्भूत होते हैं :

परन्तु कर्मचारीवृन्द का ऐसा प्रत्येक सदस्य जिसे पूर्वोक्त रीति से अन्तरित किया गया है नियत दिन से छह मास की अवधि के अवसान से, या ऐसे अन्तरण से तीस दिन के अवसान से इनमें से जिस भी अवधि का बाद में अवसान होता है उससे पूर्व राष्ट्रीय बैंक में वापस जाने का चयन इस प्रभाव के लिखित विकल्प का प्रयोग करके कर सकेगा। विकल्प का एक बार प्रयोग कर दिये जाने पर वह अन्तिम होगा और ऐसे विकल्प का प्रयोग करने पर राष्ट्रीय बैंक नियत दिन से अठारह मास की अवधि के अवसान के पूर्व कर्मचारीवृन्द के ऐसे सदस्य को वापस लेगा और उस अवधि के दौरान जिसमें वह रिजर्व बैंक के कर्मचारीवृन्द का सदस्य था उसे रिजर्व बैंक में प्रतिनियुक्ति पर रहा माना जाएगा।

(6) ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, -

(क) जो धारा 16 की उपधारा (1) के अधीन नियत तारीख से ठीक पूर्व कृषिक पुनर्वित्त और विकास निगम के कर्मचारीवृन्द का सदस्य है; या
(ख) जो रिजर्व बैंक के कर्मचारीवृन्द का सदस्य है, किन्तु जिसकी सेवाओं का उपयोग उस तारीख से ठीक पूर्व उक्त निगम द्वारा किया जा रहा है, उक्त तारीख को उपधारा (1) के अधीन राष्ट्रीय बैंक द्वारा नियुक्त किया गया समझा जाएगा :

परन्तु रिजर्व बैंक के कर्मचारीवृन्द का ऐसा प्रत्येक सदस्य जो इस प्रकार नियुक्त किया गया समझा जाता है और जिसे कृषिक पुनर्वित्त और विकास निगम में उपयोग के लिये विनिर्दिष्ट रूप से भर्ती नहीं किया गया है, नियत दिन से छह मास की अवधि के अवसान से या धारा 16 की उपधारा (1) के अधीन नियत तारीख से तीस दिन के अवसान से, इनमें से जिस भी अवधि का बाद में अवसान होता है उससे, पूर्व रिजर्व बैंक में वापस जाने का चयन इस प्रभाव के लिखित विकल्प का प्रयोग करके कर सकेगा। विकल्प का एक बार प्रयोग कर दिये जाने पर वह अन्तिम होगा और ऐसे विकल्प का प्रयोग किये जाने पर रिजर्व बैंक कर्मचारीवृन्द के ऐसे सदस्य को नियत दिन से अठारह माह की अवधि के अवसान के पूर्व वापस लेगा और उस अवधि के दौरान, जिसमें वह राष्ट्रीय बैंक के कर्मचारीवृन्द का सदस्य था, राष्ट्रीय बैंक में प्रतिनियुक्ति पर रहा माना जाएगा।

(7) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या किसी करार में किसी बात के होते हुए भी कर्मचारीवृन्द का कोई सदस्य उपधारा (3) से (6) तक के अधीन अपने अन्तरण, नियुक्ति या, यथास्थिति, अपनी वापसी के लिये या, उससे सम्बन्धित किसी बात के बारे में किसी प्रतिकर का दावा करने का हकदार नहीं होगा और उसके बारे में कोई दावा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा।

(8) उपधारा (10) और उपधारा (11) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कृषिक पुनर्वित्त और विकास निगम या रिजर्व बैंक के कर्मचारीवृन्द का प्रत्येक सदस्य, जिसे इस धारा के अधीन राष्ट्रीय बैंक के कर्मचारीवृन्द का सदस्य नियुक्त किया गया समझा जाता है, राष्ट्रीय बैंक द्वारा उसी वेतन, परिलब्धियों और सेवा के अन्य निबन्धनों और शर्तों पर नियुक्त किया गया समझा जाएगा जिसके लिये वह राष्ट्रीय बैंक में अपनी नियुक्ति के ठीक पूर्व हकदार था।

(9) अधिवर्षिता फायदों से सम्बन्धित उपबन्ध, अर्थात भविष्य निधि से सम्बन्धित विनियम और उपदान और अनुकम्पा उपदान के सन्दाय से सम्बन्धित नियम और अधिवर्षिता से सम्बन्धित कोई अन्य उपबन्ध, जो नियत दिन को रिजर्व बैंक के कर्मचारीवृन्द को लागू हैं, जहाँ तक हो सके, राष्ट्रीय बैंक के कर्मचारीवृन्द को तब तक लागू होंगे जब तक राष्ट्रीय बैंक उनमें परिवर्तन या संशोधन नहीं कर देता है :

परन्तु नियत दिन के पश्चात राष्ट्रीय बैंक द्वारा ऐसा परिवर्तन या संशोधन भविष्य निधि विनियमों के बारे में धारा 60 के अनुसार और अन्य नियमों के बारे में उस प्रकार किया जा सकेगा जिस प्रकार उनका परिवर्तन या संशोधन, यदि यह उपधारा न होती तो, किया जा सकता था :

परन्तु यह और कि नियत दिन से छह मास के अवसान के पश्चात रिजर्व बैंक के कर्मचारीवृन्द के ऐसे किसी सदस्य के खाते में, जिसकी सेवाएँ इस धारा के अधीन राष्ट्रीय बैंक को अन्तरित कर दी गई हैं और जो रिजर्व बैंक को वापस जाने के विकल्प का प्रयोग नहीं करता है, भारतीय रिजर्व बैंक कर्मचारी भविष्य निधि में धारित अतिशेष उन्हीं या वैसे ही निबन्धनों पर जिनके अधीन वे अतिशेष भारतीय रिजर्व बैंक कर्मचारी भविष्य निधि में पहले धारित थे राष्ट्रीय बैंक की भविष्य निधि में अन्तरित और धारित किये जाएँगे।

(10) किसी अन्य विधि, परिनिर्धारण या करार में किसी बात के होते हुए भी ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जिसे इस अधिनियम के अधीन राष्ट्रीय बैंक द्वारा नियोजित किया गया है या जिसकी सेवाएँ राष्ट्रीय बैंक को अन्तरित कर दी गई हैं, भारत में किसी भी स्थान पर सेवा करने के दायित्वाधीन होगा।

(11) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में, या किसी औद्योगिक अधिकरण, न्यायालय या अन्य प्राधिकरण के किसी अधिनिर्णय, निर्णय, डिक्री, विनिश्चय या आदेश में या इस धारा के अधीन किसी व्यक्ति की सेवाएँ राष्ट्रीय बैंक को अन्तरित किये जाने की तारीख से पूर्व किये गए किसी परिनिर्धारण या करार में किसी बात के होते हुए भी राष्ट्रीय बैंक ऐसे व्यक्तियों को, जिनकी सेवाएँ, राष्ट्रीय बैंक को इस प्रकार अन्तरित की गई हैं और जो इस धारा के अधीन राष्ट्रीय बैंक में नियुक्त किये गए हैं, लागू सेवा के किन्हीं निबन्धनों और शर्तों को ऐसी रीति से और ऐसे विस्तार तक, जो वह आवश्यक समझे, परिवर्तित, संशोधित या निरसित करने के लिये स्वतंत्र होगा, किन्तु राष्ट्रीय बैंक वेतन और अन्य उपलब्धियों, सेवानिवृत्ति फायदों के सन्दाय और छुट्टी के लिये पात्रता से सम्बन्धित निबन्धनों को इस प्रकार परिवर्तित नहीं करेगा जिससे उन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े।

स्पष्टीकरण


इस धारा के प्रयोजनों के लिये “नियत दिन” से धारा 3 के अधीन राष्ट्रीय बैंक की स्थापना की तारीख अभिप्रेत है।

अध्याय 10


प्रकीर्ण


51. विश्वसनीयता और गोपनीयता की बाध्यता


(1) इस अधिनियम या किसी अन्य विधि द्वारा जैसा अन्यथा अपेक्षित है उसके सिवाय राष्ट्रीय बैंक अपने ग्राहक के सम्बन्ध में या उनके क्रियाकलाप के सम्बन्ध में कोई जानकारी तब के सिवाय प्रकट नहीं करेगा जबकि परिस्थितियाँ ऐसी हों जिनमें विधि या बैंककारों को रूढ़िगत पति और प्रथाओं के अनुसार राष्ट्रीय बैंक के लिये ऐसी जानकारी प्रकट करना आवश्यक या समुचित है।

(2) राष्ट्रीय बैंक अथवा रिजर्व बैंक का प्रत्येक निदेशक, समिति का सदस्य, लेखापरीक्षक या अधिकारी या अन्य कर्मचारी, जिसकी सेवाओं का उपयोग किया जाता है, अपना कार्यभार ग्रहण करने से राष्ट्रीय बैंक द्वारा इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन इस अधिनियम की पहली अनुसूची में दिये गए प्रारूप में विश्वसनीयता और गोपनीयता की घोषणा करेगा।

1{(3) इस धारा की कोई बात प्रत्यय विषयक जानकारी कम्पनी (विनियमन) अधिनियम, 2005 (2005 का 30) अधीन प्रकट की गई प्रत्यय विषयक जानकारी को लागू नहीं होगी।}

52. नियुक्ति में त्रुटियों के कारण कार्य आदि का अविधिमान्य न होना


(1) बोर्ड का या राष्ट्रीय बैंक की किसी समिति का कोई कार्य या कार्यवाही, केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि, यथास्थिति, बोर्ड या समिति में कोई रिक्ति थी या उसके गठन में कोई त्रुटि थी।

(2) बोर्ड के निदेशक के रूप में या राष्ट्रीय बैंक की किसी समिति के सदस्य के रूप में सद्भावपूर्वक कार्य करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा किया गया कोई कार्य केवल इस आधार पर अविधिमान्य नहीं होगा कि वह निदेशक होने के लिये निरर्हित था या उसकी नियुक्ति में कोई अन्य त्रुटि थी।

2{52क. निदेशकों की नियुक्ति के सम्बन्ध में राष्ट्रीय बैंक के साथ करार का अभिभावी होना


(1) जहाँ राष्ट्रीय बैंक द्वारा उधार और अग्रिम अनुदत्त करते समय किसी कम्पनी या निकाय के साथ किये गए करार में ऐसी कम्पनी या निगम निकाय के एक या अधिक निदेशकों की राष्ट्रीय बैंक द्वारा नियुक्ति के लिये उपबन्ध है वहाँ ऐसे उपबन्ध और उसके अनुसरण में की गई निदेशकों की कोई नियुक्ति, कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या कम्पनी अथवा निगम निकाय से सम्बन्धित ज्ञापन, संगम-अनुच्छेद या किसी अन्य लिखत में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, विधिमान्य और प्रभाशील होगी और पूर्वोक्त ऐसी किसी विधि या लिखत में अन्तर्विष्ट शेयर अर्हता, आयु-सीमा, निदेशक-पदों की संख्या, निदेशकों के पद से हटाए जाने सम्बन्धी कोई उपबन्ध और ऐसी ही समान शर्तें पूर्वोक्त करार के अनुसरण में राष्ट्रीय बैंक द्वारा नियुक्त किये गए किसी निदेशक को लागू नहीं होंगी।

(2) पूर्वोक्त रूप में नियुक्त कोई निदेशक, -

(क) राष्ट्रीय बैंक के प्रसाद पर्यन्त पद धारण करेगा और राष्ट्रीय बैंक के लिखित आदेश द्वारा उसे हटाया जा सकेगा या उसके स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को रखा जा सकेगा;
(ख) अपने केवल निदेशक होने के कारण अथवा निदेशक के रूप में अपने कर्तव्यों के निर्वहन में सद्भावपूर्वक की गई या न की गई किसी बात के लिये अथवा उससे सम्बन्धित किसी बात के लिये किसी बाध्यता या दायित्व के अधीन नहीं होगा;
(ग) चक्रानुक्रम से निवृत्ति का भागी नहीं होगा और ऐसी निवृत्ति के भागी निदेशकों की संख्या की संगणना करने में उसको गिनती में नहीं लिया जाएगा।}

53. इस अधिनियम के अधीन की गई कार्रवाई का संरक्षण


इस अधिनियम के या किसी अन्य विधि के या विधि का बल रखने वाले किसी उपबन्ध के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिये आशयित किसी बात से हुई या सम्भाव्य किसी हानि या नुकसान के लिये कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही राष्ट्रीय बैंक या उसके किसी निदेशक या किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी अथवा इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कृत्यों के निर्वहन के लिये राष्ट्रीय बैंक द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी।

54. निदेशकों की क्षतिपूर्ति


(1) प्रत्येक निदेशक की, उसके कर्तव्यों के निर्वहन में या सम्बन्ध में उसके द्वारा उपगत सभी हानियों और व्ययों की बाबत, जो उसके जान-बूझकर किये गए कार्य या व्यतिक्रम से न हुए हों, राष्ट्रीय बैंक द्वारा क्षतिपूर्ति की जाएगी।

(2) कोई निदेशक राष्ट्रीय बैंक के किसी अन्य निदेशक के लिये या किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी के लिये या राष्ट्रीय बैंक की किसी ऐसी हानि या व्यय के लिये जो राष्ट्रीय बैंक की ओर से अर्जित की गई या ली गई किसी सम्पत्ति या प्रतिभूति के मूल्य की या उसमें हक की अपर्याप्तता या कमी के, अथवा राष्ट्रीय बैंक के प्रति बाध्यताधीन किसी ऋणी या व्यक्ति के दिवाले या सदोष कार्य के, अथवा अपने पद के या उससे सम्बन्धित कर्तव्यों के निष्पादन में सद्भावपूर्वक की गई किसी बात के फलस्वरूप हो, उत्तरदायी नहीं होगा।

56. शास्तियाँ


(1) जो कोई किसी विवरणी या तुलन-पत्र या अन्य दस्तावेज में अथवा इस अधिनियम के किसी उपबन्ध द्वारा या उसके अधीन या उसके प्रयोजनों के लिये अपेक्षित या दी गई किसी जानकारी में जानबूझकर ऐसा कथन करेगा जो किसी तात्त्विक विशिष्टि में मिथ्या है, जिसका मिथ्या होना वह जानता है या कोई तात्त्विक कथन करने में जानबूझकर लोप करेगा वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा।

(2) यदि कोई व्यक्ति किसी बही, लेखा या अन्य दस्तावेज को पेश करने में अथवा ऐसा कोई विवरण या अन्य जानकारी देने में, जिसे पेश करना या देना इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन उसका कर्तव्य है, असफल होगा तो वह जुर्माने से, जो प्रत्येक अपराध के लिये दो हजार रुपए तक का हो सकेगा और जारी रहने वाली असफलता की दशा में अतिरिक्त जुर्माने से, जो उस प्रत्येक दिन के लिये जिसके दौरान असफलता ऐसी पहली असफलता के लिये दोषसिद्धि के पश्चात जारी रहती है, सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा।

57. कम्पनियों द्वारा अपराध


(1) जहाँ कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है वहाँ प्रत्येक व्यक्ति जो अपराध के किये जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन में कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएँगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्रवाई किये जाने और दण्डित किये जाने के भागी होंगे :

परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबन्धित किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध का निवारण करने के लिये सब सम्यक तत्परता बरती थी।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी जहाँ इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित होता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सम्मति या मौनानुकूलता से किया गया है या उसकी किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है, वहाँ ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्रवाई किये जाने और दण्डित किये जाने का भागी होगा।

स्पष्टीकरण


इस धारा के प्रयोजनों के लिये -

(क) “कम्पनी” से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; और
(ख) फर्म के सम्बन्ध में, “निदेशक” से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है।

58. बैंककार बही साक्ष्य अधिनियम, 1891 (1891 का 18) का राष्ट्रीय बैंक के सम्बन्ध में लागू होना


बैंककार बही साक्ष्य अधिनियम, 1891 (1891 का 18) राष्ट्रीय बैंक के सम्बन्ध में वैसे ही लागू होगा मानो वह उस अधिनियम की धारा 2 में यथा परिभाषित बैंक हो।

59. राष्ट्रीय बैंक का समापन


कम्पनियों के परिसमापन से सम्बन्धित विधि का कोई उपबन्ध राष्ट्रीय बैंक को लागू नहीं होगा और राष्ट्रीय बैंक का समापन केन्द्रीय सरकार के आदेश द्वारा ऐसी रीति से ही, जो वह निर्दिष्ट कर, किया जाएगा अन्यथा नहीं।

60. विनियम बनाने की बोर्ड की शक्ति


(1) बोर्ड केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से और रिजर्व बैंक से परामर्श करके, अधिसूचना द्वारा, ऐसी सभी बातों के लिये जिनके लिये इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने के प्रयोजन के लिये उपबन्ध करना आवश्यक या समीचीन है, उपबन्ध करने के लिये ऐसे विनियम बना सकेगा, जो इस अधिनियम से असंगत न हों।

(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी या उनमें से किसी बात के लिये उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात :-

(क) फीसें और भत्ते जो निदेशकों या सलाहकार परिषद के सदस्यों को दिये जा सकेंगे;
(ख) बोर्ड या कार्यपालिका समिति या सलाहकार परिषद के अधिवेशनों के समय और स्थान तथा ऐसे अधिवेशनों में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया जिसके अन्तर्गत कार्य करने के लिये आवश्यक गणपूर्ति आती है;
(ग) कार्यपालिका समिति का गठन करने वाले निदेशकों की संख्या और वे कृत्य जिनका निर्वहन ऐसी समिति करेगी;
(घ) राष्ट्रीय बैंक द्वारा बन्धपत्रों और डिबेंचरों के पुरोधरण और उन्मोचन की रीति और निबन्धन;
1{(ङ) धारा 6 की उपधारा (1) के खण्ड (च) के अधीन निदेशकों के निर्वाचन की रीति;}

(छ) वह प्रारूप जिसमें और वह रीति जिससे राष्ट्रीय बैंक के तुलन-पत्र और लेखे तैयार किये या रखे जाएँगे;
(झ) अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के कर्तव्य और आचरण, वेतन, भत्ते और सेवा की शर्तें;
(ञ) राष्ट्रीय बैंक के कर्मचारियों के लिये भविष्य निधि या अन्य प्रसुविधा निधियों की स्थापना और उनको बनाए रखना;
(ट) ऐसे अन्य विषय जिनके लिये बोर्ड विनियमों द्वारा उपबन्ध करना समीचीन और आवश्यक समझे।

(3) इस अधिनियम के अधीन बोर्ड द्वारा बनाया जाने वाला कोई विनियम, राष्ट्रीय बैंक की स्थापना की तारीख से तीन मास के अवसान के पूर्व रिजर्व बैंक द्वारा, केन्द्रीय सरकार से परामर्श करके बनाया जाएगा और इस प्रकार बनाए गए किसी विनियम को बोर्ड इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए परिवर्तित या विखण्डित कर सकेगा।

(4) इस धारा द्वारा प्रदत्त विनियम बनाने की शक्ति के अन्तर्गत विनियमों या उनमें से किसी को ऐसी तारीख से, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से पूर्वतर न हो, भूतलक्षी प्रभाव देने की शक्ति भी है, किन्तु किसी विनियम को भूतलक्षी प्रभाव इस प्रकार नहीं दिया जाएगा जिससे ऐसे किसी व्यक्ति के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो जिसे ऐसा विनियम लागू हो सकता है।

(5) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम बनाए जाने के पश्चात यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिये रखा जाएगा। अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी। यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिये सहमत हो जाएँ तो तत्पश्चात वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा। यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएँ कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात वह निष्प्रभाव हो जाएगा। किन्तु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

61. कुछ अधिनियमितियों का संशोधन


इस अधिनियम की दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियमितियाँ उसमें उपबन्धित रीति से संशोधित की जाएँगी और जब तक उस अनुसूची में अन्यथा उपबन्ध न किया जाये ऐसे संशोधन धारा 3 के अधीन राष्ट्रीय बैंक की स्थापना की तारीख से प्रभावी होंगे।

62. कठिनाई दूर करने की शक्ति


यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार ऐसे आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हो, उक्त कठिनाई को दूर कर सकेगी :

परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के अवसान के पश्चात नहीं किया जाएगा।

पहली अनुसूची


{धारा 51(2) देखिए}


विश्वसनीयता और गोपनीयता की घोषणा


मैं..................................................... इसके द्वारा घोषणा करता हूँ कि मैं राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक के (यथास्थिति) निदेशक, लेखापरीक्षक, अधिकारी या अन्य कर्मचारी के रूप में मुझसे अपेक्षित और उक्त राष्ट्रीय बैंक में या उसके सम्बन्ध में मेरे द्वारा धारण किये गए पद या ओहदे से उचित रूप से सम्बद्ध कर्तव्यों का, निष्ठापूर्वक, सच्चाई से और अपनी पूर्ण कुशलता और योग्यता से निष्पादन और पालन करुँगा।

मैं यह भी घोषणा करता हूँ कि मैं राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक के कार्यों से या उक्त राष्ट्रीय बैंक से संव्यवहार करने वाले किसी व्यक्ति के कार्यों से सम्बद्ध कोई जानकारी ऐसे किसी व्यक्ति को जो उसका विधिक रूप से हकदार नहीं है, संसूचित नहीं करुँगा और न संसूचित होने दूँगा तथा ऐसे किसी व्यक्ति को राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक की या उसके कब्जे की तथा उक्त राष्ट्रीय बैंक के कारबार से या उक्त राष्ट्रीय बैंक से संव्यवहार करने वाले किसी व्यक्ति के कारबार से सम्बद्ध किन्हीं बहियों या दस्तावेजों का निरीक्षण नहीं करने दूँगा और न उसकी उन तक पहुँच होने दूँगा। मेरे समक्ष हस्ताक्षर किये।
(हस्ताक्षर)

दूसरी अनुसूची


(धारा 61 देखिए)


(कुछ अधिनियमितियों का संशोधन)


भाग 1


भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के संशोधन


(1934 का 2)


संशोधन


1. धारा 2 में, -

(क) खण्ड (क), (कi), (खi), (खii), (खiii), (खiv), (खv), (खviii), (गi), (गiक), (गii), (गiii), (गiv), (गv) और (च) का लोप किया जाएगा;

(ख) खण्ड (ग) के पश्चात निम्नलिखित खण्ड अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात:-

‘(गगग) “राष्ट्रीय बैंक” से राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अभिप्रेत है;’
(ग) खण्ड (छ) के पश्चात निम्नलिखित खण्ड अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात:-
‘(ज) “कृषि संक्रिया”, “केन्द्रीय सहकारी बैंक”, “सहकारी सोसाइटी”, “फसलें”, “फसलों का विपणन”, “मत्स्य-पालन”, “प्रादेशिक ग्रामीण बैंक” और “राज्य सहकारी बैंक” के वही अर्थ होंगे जो उनके राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 में हैं;’
(झ) “सहकारी बैंक”, “सहकारी प्रत्यय सोसाइटी”, “निदेशक”, “प्राथमिक कृषिक प्रत्यय सोसाइटी”, “प्राथमिक सहकारी बैंक” और “प्राथमिक प्रत्यय सोसाइटी” के वही अर्थ होंगे जो उनके बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) के भाग 5 में हैं;’।

2. धारा 8 की उपधारा (2) में विद्यमान परन्तुक के पश्चात निम्नलिखित परन्तुक अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात:-

“परन्तु यह और कि केन्द्रीय सरकार बैंक से परामर्श करके किसी उप-गवर्नर को राष्ट्रीय बैंक का अध्यक्ष ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर नियुक्त कर सकेगी जो वह सरकार विनिर्दिष्ट करे।”।

3. धारा 17 में, -

(क) खण्ड (4कक) के स्थान पर निम्नलिखित खण्ड रखा जाएगा, अर्थात:-

“(4कक) राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 की क्रमशः धारा 42 और धारा 43 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि और राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (स्थिरीकरण) निधि में वार्षिक अभिदाय करना;”
(ख) खण्ड (4ङ) के स्थान पर निम्नलिखित खण्ड रखा जाएगा, अर्थात:-

“(4ङ) राष्ट्रीय बैंक को -

(i) स्टाक, निधियों तथा (स्थावर सम्पत्ति से भिन्न) ऐसी प्रतिभूतियों की प्रतिभूति पर, जिनमें कोई न्यासी न्यास धन का विनिधान करने के लिये भारत में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा प्राधिकृत है; या
(ii) ऐसी अन्य शर्तों या निबन्धनों पर, जो बैंक द्वारा विनिर्दिष्ट किये जाएँ, ऐसे उधार और अग्रिम देना जो माँग पर या ऐसे उधार या अग्रिम के दिये जाने की तारीख से अठारह मास से अनधिक की नियत कालावधियों के अवसान पर प्रतिसन्देय हैं;”
(ग) खण्ड (8क) में, “कृषिक पुनर्वित्त और विकास निगम” पद के स्थान पर “राष्ट्रीय बैंक” पद रखा जाएगा।

4. धारा 33 की उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी: -

“(3) शेष आस्तियाँ रुपए के सिक्कों, कैसी ही परिपक्वता वाली भारत सरकार की रुपए वाली प्रतिभूतियों, राष्ट्रीय बैंक द्वारा धारा 17 की उपधारा (4ङ) के अधीन किसी उधार या अग्रिम के लिये लिखे गए वचनपत्रों और भारत में देय ऐसे विनिमय पत्रों और वचन पत्रों के रूप में धारण की जाएगी जो धारा 17 के खण्ड (2) के उपखण्ड (क) या उपखण्ड (ख) या उपखण्ड (खख) के अधीन या धारा 18 के खण्ड (1) के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा क्रय किये जाने योग्य हैं।”।

5. धारा 42 की -

(क) उपधारा (1) के पश्चात आने वाले स्पष्टीकरण के खण्ड (ग) के उपखण्ड (ii) में “कृषिक पुनर्वित्त और विकास निगम” पद के स्थान पर “राष्ट्रीय बैंक” पद रखा जाएगा;
(ख) उपधारा (6) के पश्चात निम्नलिखित उपधारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात:-
“(6क) इस बात पर विचार करते समय कि राज्य सहकारी बैंक या प्रादेशिक ग्रामीण बैंक को दूसरी अनुसूची में सम्मिलित किया जाये या उसमें से निकाला जाये, बैंक, इस प्रश्न पर राष्ट्रीय बैंक के प्रमाणपत्र पर कार्य करने के लिये सक्षम होगा कि, यथास्थिति, राज्य सहकारी बैंक या प्रादेशिक ग्रामीण बैंक समादत्त पूँजी या आरक्षित निधियों के बारे में अपेक्षाओं को पूरा करते हैं या नहीं या क्या उनके कार्य का संचालन ऐसी रीति से नहीं किया जा रहा है जो उनमें निक्षेपकर्ताओं के हितों के प्रतिकूल है।”।

6. धारा 45 के स्थान पर निम्नलिखित धारा रखी जाएगी, अर्थात:-

“45. अभिकर्ताओं की नियुक्ति


(1) जब तक किसी स्थान के प्रति निर्देश से केन्द्रीय सरकार द्वारा अन्यथा निदेश न दिया जाये बैंक लोकहित में, बैंककारी सुविधाओं, बैंककारी विकास और ऐसे अन्य तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, जो उसकी राय में इस बारे में सुसंगत हैं राष्ट्रीय बैंक या स्टेट बैंक या बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी किसी नए बैंक या बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी किसी नए बैंक या भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 38) में यथा परिभाषित किसी समनुषंगी बैंक को अपने अभिकर्ता के रूप में भारत में सभी स्थानों पर या किसी स्थान पर, ऐसे प्रयोजनों के लिये जो बैंक विनिर्दिष्ट करे, नियुक्ति कर सकेगा।

(2) जहाँ किसी विधि या नियम, विनियम या विधि का बल रखने वाली किसी अन्य लिखत के अधीन बैंक में सन्दाय किये जाने के लिये अपेक्षित कोई सन्दाय या बैंक में परिदत्त किये जाने के लिये अपेक्षित कोई बिल या हुंडी या अन्य प्रतिभूति को बैंक की ओर से प्राप्त करने के लिये बैंक ने किसी बैंक को उपधारा (1) के अधीन अपने अभिकर्ता के रूप में नियुक्त किया है वहाँ उसका सन्दाय या परिदान बैंक के अभिकर्ता के रूप में इस प्रकार नियुक्त बैंक में किया जा सकेगा।”।

7. राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 की धारा 18 की उपधारा (1) के अधीन नियत तारीख से ही धारा 46क और धारा 46ख के स्थान पर निम्नलिखित धारा रखी जाएगी, अर्थात:-

“46क. राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि और राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (स्थिरीकरण) निधि में अभिदाय


बैंक प्रतिवर्ष ऐसी धनराशि, जिसे वह आवश्यक और साध्य समझे राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 की धारा 42 और धारा 43 के अधीन स्थापित और अनुरक्षित क्रमशः राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि और राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (स्थिरीकरण) निधि में अभिदाय करेगा।”।

8. धारा 54 के स्थान पर निम्नलिखित धारा रखी जाएगी, अर्थात:-

“54. ग्रामीण प्रत्यय और विकास


बैंक ग्रामीण प्रत्यय और विकास के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन करने के लिये अनुभवी कर्मचारी रख सकेगा और विशेष रूप से वह -

(क) राष्ट्रीय बैंक को अनुभवी मार्गदर्शन और सहायता दे सकेगा;
(ख) एकीकृत ग्रामीण विकास के संवर्धन के लिये ऐसे क्षेत्र में जहाँ वह आवश्यक समझे, विशेष अध्ययन चला सकेगा।”।

भाग 2


बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 के संशोधन


(1949 का 10)


संशोधन


1. धारा 5 में, -

(i) खण्ड (ज) के पश्चात निम्नलिखित खण्ड अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात:-

‘(जक) “राष्ट्रीय बैंक” से राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अभिप्रेत है;’

(ii) खण्ड (ञ) के पश्चात निम्नलिखित खण्ड अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात:-

‘(ञक) “प्रादेशिक ग्रामीण बैंक” से प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 (1976 का 21) की धारा 3 के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अभिप्रेत है;’।

2. धारा 23 की उपधारा (4) के पश्चात निम्नलिखित उपधारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात:-

“(4क) इस धारा के अधीन रिजर्व बैंक की अनुज्ञा की अपेक्षा करने वाला कोई प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अपना आवेदन रिजर्व बैंक को राष्ट्रीय बैंक की मार्फत भेजेगा जो आवेदन के गुणावगुण पर अपनी टिप्पणी देगा और उसे रिजर्व बैंक को भेजेगा :

परन्तु प्रादेशिक ग्रामीण बैंक आवेदन की अग्रिम प्रति रिजर्व बैंक को सीधे भी भेज सकेगा।”।

3. धारा 24 की उपधारा (3) में, निम्नलिखित परन्तुक जोड़ा जाएगा, अर्थात:-

“परन्तु प्रत्येक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक राष्ट्रीय बैंक को उक्त विवरणी की एक प्रति भी देगा।”।

4. धारा 25 की उपधारा (2) में निम्नलिखित परन्तुक जोड़ा जाएगा, अर्थात:-

“परन्तु प्रत्येक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक राष्ट्रीय बैंक को उक्त विवरणी की एक प्रति भी देगा।”।

5. धारा 26 में, विद्यमान परन्तुक के पश्चात, निम्नलिखित परन्तुक अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात:-

“परन्तु यह और कि प्रत्येक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक राष्ट्रीय बैंक को उक्त विवरणी को एक प्रति भी देगा।”।

6. धारा 27 की उपधारा (2) के पश्चात निम्नलिखित उपधारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात:-

“(3) प्रत्येक प्रादेशिक ग्रामीण बैंक ऐसी विवरणी की एक प्रति, जिसे वह उपधारा (1) के अधीन रिजर्व बैंक को देता है, राष्ट्रीय बैंक को भी देगा और उपधारा (2) के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियाँ प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के सम्बन्ध में राष्ट्रीय बैंक द्वारा भी प्रयोग की जाएँगी।”।

7. धारा 28 के स्थान पर निम्नलिखित धारा रखी जाएगी, अर्थात:-

“28. जानकारी प्रकाशित करने की शक्ति


रिजर्व बैंक या राष्ट्रीय बैंक या दोनों यदि वे लोकहित में ऐसा करना चाहे तो इस धारा के अधीन उन्हें अभिप्राप्त किसी जानकारी को ऐसे समेकित प्रारूप में प्रकाशित कर सकेंगे जो वह ठीक समझे।”।

8. धारा 31 में, विद्यमान परन्तुक के पश्चात निम्नलिखित परन्तुक अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात:-

“परन्तु यह और कि प्रादेशिक ग्रामीण बैंक ऐसी विवरणियाँ राष्ट्रीय बैंक को भी देगा।”।

9. धारा 34क की उपधारा (3) में, “भारतीय औद्योगिक विकास बैंक” शब्दों के पश्चात “राष्ट्रीय बैंक” शब्द अन्तःस्थापित किये जाएँगे।

10. धारा 35 की उपधारा (5) के पश्चात निम्नलिखित उपधारा अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात:-

“(6) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के सम्बन्ध में इस धारा के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियाँ (किसी प्रादेशिक ग्रामीण बैंक के सम्बन्ध में रिजर्व बैंक द्वारा, ऐसी शक्तियों के प्रयोग पर जब भी वह ऐसा करना आवश्यक समझे, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना) प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के सम्बन्ध में राष्ट्रीय बैंक द्वारा प्रयोग की जा सकेगी और तद्नुसार उपधारा (1) से (5) तक प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों के सम्बन्ध में वैसे ही लागू होंगी मानो रिजर्व बैंक के लिये उनमें किये गए प्रत्येक निर्देश के अन्तर्गत राष्ट्रीय बैंक के प्रति निर्देश भी है।”।

11. धारा 36 कघ की उपधारा (3) में, “भारतीय औद्योगिक विकास बैंक” शब्दों के पश्चात “राष्ट्रीय बैंक” शब्द अन्तःस्थापित किये जाएँगे।

12. धारा 47 में, जहाँ कहीं भी “रिजर्व बैंक” शब्द आते हों उनके स्थान पर, “यथास्थिति, रिजर्व बैंक या राष्ट्रीय बैंक” शब्द रखे जाएँगे।

13. धारा 56 के -

(i) खण्ड (ग) में, उपखण्ड (i) के स्थान पर निम्नलिखित उपखण्ड रखा जाएगा, अर्थात:-

“(i) खण्ड (गग) के पश्चात निम्नलिखित खण्ड अन्तःस्थापित किये जाएँगे, अर्थात:-

‘(गगi) “सहकारी बैंक” से राज्य सहकारी बैंक, केन्द्रीय सहकारी बैंक और प्राथमिक सहकारी बैंक अभिप्रेत है;
(गगii) “सहकारी प्रत्यय सोसाइटी” से ऐसी सहकारी सोसाइटी अभिप्रेत है जिसका प्राथमिक उद्देश्य अपने सदस्यों के लिये वित्तीय सुविधा का उपबन्ध करना है और इसके अन्तर्गत सहकारी भूमि बन्धक बैंक है;

(गगiii) सहकारी सोसाइटी के सम्बन्ध में “निदेशक” के अन्तर्गत, किसी समिति का या निकाय का ऐसा कोई सदस्य है, जिसमें तत्समय उस सोसाइटी के क्रियाकलाप का प्रबन्ध निहित है;
(गगiv) “प्राथमिक कृषिक प्रत्यय सोसाइटी” से ऐसी सहकारी सोसाइटी अभिप्रेत है -

(1) जिसका प्राथमिक उद्देश्य या जिसका प्रधान कारबार कृषि प्रयोजनों के लिये या कृषि क्रियाकलापों से सम्बन्धित प्रयोजनों के लिये (जिसके अन्तर्गत फसलों का विपणन भी है) अपने सदस्यों को वित्तीय सौकर्य का उपबन्ध करना है; और

(2) जिसकी उपविधियाँ किसी अन्य सहकारी सोसाइटी को सदस्य के रूप में प्रविष्ट करने की अनुज्ञा नहीं देती है:

परन्तु यह उपखण्ड किसी सहकारी बैंक को सदस्य के रूप में प्रविष्टि करने के लिये इस कारण लागू नहीं होगा कि ऐसा सहकारी बैंक ऐसी सहकारी सोसाइटी की शेयर-पूँजी में अभिदाय इस प्रयोजन के लिये राज्य सरकार द्वारा उपबन्धित निधियों में से करता है;

(गगv) “प्राथमिक सहकारी बैंक” से प्राथमिक कृषिक प्रत्यय सोसाइटी से भिन्न सहकारी सोसाइटी अभिप्रेत है -

(1) जिसका प्राथमिक उद्देश्य या प्रधान कारबार बैंककारी कारबार का संव्यवहार करना है;
(2) जिसकी समादत्त शेयर-पूँजी और आरक्षिति एक लाख रुपए से कम नहीं है; और
(3) जिसकी उपविधियाँ किसी अन्य सहकारी सोसाइटी के सदस्य के रूप में प्रविष्ट करने की अनुज्ञा नहीं देती है:

परन्तु यह उपखण्ड किसी सहकारी बैंक को सदस्य के रूप में प्रविष्ट करने के लिये इस कारण लागू नहीं होगा कि ऐसा सहकारी बैंक ऐसी सहकारी सोसाइटी की शेयर-पूँजी में अभिदाय इस प्रयोजन के लिये राज्य सरकार द्वारा उपबन्धित निधियों में से करता है;

(गगvi) “प्राथमिक प्रत्यय सोसाइटी” से प्राथमिक कृषिक प्रत्यय सोसाइटी से भिन्न ऐसी सहकारी सोसाइटी अभिप्रेत है -

(1) जिसका प्राथमिक उद्देश्य या प्रधान कारबार बैंककारी का संव्यवहार करना है;

(2) जिसकी समादत्त शेयर-पूँजी और आरक्षिति एक लाख रुपए से कम है; और

(3) जिसकी उप विधियाँ किसी अन्य सहकारी सोसाइटी को सदस्य के रूप में प्रविष्ट करने की अनुज्ञा नहीं देती है:

परन्तु यह उपखण्ड किसी सहकारी बैंक को सदस्य के रूप में प्रविष्ट करने के लिये इस कारण लागू नहीं होगा कि ऐसा सहकारी बैंक ऐसी सहकारी सोसाइटी की शेयर-पूँजी में अभिदाय इस प्रयोजन के लिये राज्य सरकार द्वारा उपबन्धित निधियों में से करता है।

स्पष्टीकरण


यदि खण्ड (गगiv), (गगv) और (गगvi) में निर्दिष्ट किसी सहकारी सोसाइटी के प्राथमिक उद्देश्य या प्रधान कारबार के बारे में कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो रिजर्व बैंक द्वारा उसका अवधारण अन्तिम होगा;

(गगvii) “केन्द्रीय सहकारी बैंक”, “सहकारी सोसाइटी“, “प्राथमिक ग्रामीण प्रत्यय सोसाइटी” और “राज्य सहकारी बैंक” का वही अर्थ होगा जो राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 में है;

(पप) खण्ड (त) में, -

(क) “धारा 23 की उपधारा (1) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात शब्दों, अंकों और कोष्ठकों के स्थान पर निम्नलिखित रखा जाएगा, अर्थात:-

“धारा 23 में, -

(i) उपधारा (1) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात:-”;

(ख) उपखण्ड (i) के पश्चात निम्नलिखित उपखण्ड अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात:-

‘(ii) उपधारा (4) के पश्चात निम्नलिखित उपधारा अन्तःस्थापित की जाएँगी, अर्थात:-

“(4क) इस धारा के अधीन रिजर्व बैंक की अनुज्ञा की अपेक्षा करने वाला कोई सहकारी बैंक अपना आवेदन रिजर्व बैंक को राष्ट्रीय बैंक की मार्फत भेजेगा जो आवेदन के गुणावगुण पर अपनी टिप्पणी देगा और उसे रिजर्व बैंक को भेजेगा :

परन्तु सहकारी बैंक आवेदन की एक अग्रिम प्रति रिजर्व बैंक को सीधे भी भेज सकेगा।”

(iii) खण्ड (थ) में, उपखण्ड (ii) के पश्चात निम्नलिखित उपखण्ड अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात:-

“(iii) उपधारा (3) में, निम्नलिखित परन्तुक जोड़ा जाएगा, अर्थात:-

‘परन्तु प्राथमिक सहकारी बैंक से भिन्न प्रत्येक सहकारी बैंक भी राष्ट्रीय बैंक को उक्त विवरणी की प्रति देगा।’

(iv) खण्ड (द) के पश्चात निम्नलिखित खण्ड अन्तःस्थापित किये जाएँगे, अर्थात:-

‘(दi) धारा 26 के द्वितीय परन्तुक में “प्रादेशिक ग्रामीण बैंक” पद के स्थान पर “प्राथमिक सहकारी बैंक से भिन्न सहकारी बैंक” पद रखा जाएगा;

(दii) धारा 27 की उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात:-

“(3) प्राथमिक सहकारी बैंक से भिन्न प्रत्येक सहकारी बैंक ऐसी विवरणी की प्रति, जो वह उपधारा (1) के अधीन रिजर्व बैंक को देता है, राष्ट्रीय बैंक को भी देगा और उपधारा (2) के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियाँ प्राथमिक सहकारी बैंक से भिन्न सहकारी बैंक के सम्बन्ध में राष्ट्रीय बैंक द्वारा भी प्रयोग की जा सकेगी।”

(v) खण्ड (न) के स्थान पर निम्नलिखित खण्ड रखा जाएगा, अर्थात:-

‘(न) धारा 31 में, -

(i) “तीन मास के अन्दर” और “तीन मास की” शब्दों के स्थान पर क्रमशः “छह मास के अन्दर” और “छह मास की” शब्द रखे जाएँगे;

(ii) द्वितीय परन्तुक के स्थान पर निम्नलिखित परन्तुक रखा जाएगा, अर्थात:-

“परन्तु यह और कि प्राथमिक सहकारी बैंक से भिन्न सहकारी बैंक राष्ट्रीय बैंक को भी ऐसी विवरणियाँ देगा;”

(vi) खण्ड (ब) में, विद्यमान उपखण्ड (iii) को उपखण्ड (iv) के रूप में पुनः संख्यांकित किया जाएगा और इस प्रकार पुनः संख्यांकित उपखण्ड (iv) के पूर्व निम्नलिखित उपखण्ड अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात:-

‘(iii) उपधारा (6) में, जहाँ कही भी “प्रादेशिक ग्रामीण बैंकों” और “प्रादेशिक ग्रामीण बैंक” पद आते हैं, उनके स्थान पर क्रमशः “प्राथमिक सहकारी बैंकों से भिन्न सहकारी बैंक” और “प्राथमिक सहकारी बैंक से भिन्न सहकारी बैंक” पद रखे जाएँगे।’;

(vii) खण्ड (यञ) के पश्चात निम्नलिखित खण्ड अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात:-

‘(यञi) धारा 54 में, जहाँ कहीं भी “रिजर्व बैंक” पद आता है वहाँ उसके पश्चात “या राष्ट्रीय बैंक” पद अन्तःस्थापित किया जाएगा।’;

(viii) खण्ड (यठ) द्वारा यथा प्रतिस्थापित तृतीय अनुसूची में जहाँ कहीं भी “ रिजर्व बैंक” पद आता है वहाँ उसके पश्चात “राष्ट्रीय बैंक” पद अन्तःस्थापित किया जाएगा।

14. बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) में जहाँ कहीं भी “कृषिक पुनर्वित्त निगम” शब्द आते हैं, उनके स्थान पर “राष्ट्रीय बैंक” शब्द रखे जाएँगे।

भाग 3


औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 का संशोधन


(1947 का 14)


संशोधन


धारा 2 के खण्ड (क) में, “कृषिक पुनर्वित्त निगम अधिनियम, 1963 (1963 का 10) की धारा 3 के अधीन स्थापित कृषिक पुनर्वित्त निगम” शब्दों और अंकों के स्थान पर “राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक” शब्द और अंक रखे जाएँगे।

भाग 4


निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम अधिनियम, 1961 का संशोधन


(1961 का 47)


संशोधन


धारा 2 के खण्ड (थ) के स्थान पर निम्नलिखित खण्ड रखे जाएँगे, अर्थात:-

‘(थ) “केन्द्रीय सहकारी बैंक”, “सहकारी सोसाइटी” और “राज्य सहकारी बैंक” पदों के क्रमशः वही अर्थ होंगे, जो राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 में हैं;

(द) “प्राथमिक सहकारी बैंक” और “प्राथमिक प्रत्यय सोसाइटी” पदों के क्रमशः वही अर्थ होंगे, जो बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 के भाग 5 में हैं।’।

भाग 5


बोनस सन्दाय अधिनियम, 1965 का संशोधन


(1965 का 21)


संशोधन


धारा 32 में, खण्ड (ix) के उपखण्ड (घ) के स्थान पर निम्नलिखित उपखण्ड रखा जाएगा, अर्थात:- “(घ) राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक।”।

सन्दर्भ


1. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 2 द्वारा प्रतिस्थापित।
2. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 3 द्वारा लोप किया गया।
3. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 4 द्वारा प्रतिस्थापित।
4. 1988 के अधिनियम सं० 66 की धारा 43 द्वारा अन्तःस्थापित।
5. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 5 द्वारा प्रतिस्थापित।
6. 1985 के अधिनियम सं० 81 की धारा 17 द्वारा लोप किया गया।
7. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 6 द्वारा अन्तःस्थापित।
8. 1985 के अधिनियम सं० 81 की धारा 18 द्वारा लोप किया गया।
9. 1985 के अधिनियम सं० 81 की धारा 18 द्वारा अन्तःस्थापित।
10. 1988 के अधिनियम सं० 66 की धारा 45 द्वारा प्रतिस्थापित।
11. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 6 द्वारा लोप किया गया।
12. 1988 के अधिनियम सं० 66 की धारा 45 द्वारा लोप किया गया।
13. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 6 द्वारा प्रतिस्थापित।
14. 1988 के अधिनियम सं० 66 की धारा 45 द्वारा अन्तःस्थापित।
15. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 7 द्वारा अन्तःस्थापित।
16. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 8 द्वारा अन्तःस्थापित।
17. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 9 द्वारा प्रतिस्थापित।
18. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 10 द्वारा प्रतिस्थापित।
19. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 11 द्वारा प्रतिस्थापित।
20. 2003 के अधिनियम सं० 48 की धारा 2 द्वारा प्रतिस्थापित।
21. 2003 के अधिनियम सं० 48 की धारा 2 द्वारा प्रतिस्थापित।
22. 2003 के अधिनियम सं० 48 की धारा 3 द्वारा प्रतिस्थापित।
23. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 12 द्वारा अन्तःस्थापित।
24. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 13 द्वारा प्रतिस्थापित।
25. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 14 द्वारा अन्तःस्थापित।
26. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 15 द्वारा प्रतिस्थापित।
27. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 16 द्वारा अन्तःस्थापित।
28. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 17 द्वारा प्रतिस्थापित।
29. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 18 द्वारा प्रतिस्थापित।
30. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 19 द्वारा प्रतिस्थापित।
31. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 20 द्वारा प्रतिस्थापित।
32. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 21 द्वारा प्रतिस्थापित।
33. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 22 द्वारा अन्तःस्थापित।
34. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 23 द्वारा प्रतिस्थापित।
35. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 23 द्वारा अन्तःस्थापित।
36. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 24 द्वारा अन्तःस्थापित।
37. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 25 द्वारा प्रतिस्थापित।
38. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 26 द्वारा प्रतिस्थापित।
39. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 27 द्वारा प्रतिस्थापित।
40. 1988 के अधिनियम सं० 66 की धारा 46 द्वारा अन्तःस्थापित।
41. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 28 द्वारा प्रतिस्थापित।
42. 2005 के अधिनियम सं० 30 की धारा 34 और अनुसूची द्वारा अन्तःस्थापित।
43. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 29 द्वारा अन्तःस्थापित।
44. 2001 के अधिनियम सं० 14 की धारा 140 द्वारा लोप किया गया।
45. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 30 द्वारा प्रतिस्थापित।
46. 2000 के अधिनियम सं० 55 की धारा 30 द्वारा लोप किया गया।
47. 1988 के अधिनियम सं० 19 की धारा 2, पहली अनुसूची द्वारा निरसित।

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