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हिमालय में नौले-धारे लौटा सकते हैं जीवन और उसका दर्शन


इन नौले-धारों की देखभाल करने वाला कोई नहींइन नौले-धारों की देखभाल करने वाला कोई नहींमध्य हिमालय अर्थात उत्तराखण्ड भू-भाग भौगोलिक विषमता और आर्थिक दुर्बलता की उपस्थिति में भी सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना के साथ-साथ राजनीतिक जागरुकता के मामले में सम्पन्न रहा है। अपने भीतर अनेक संस्कृतियों और समाजों को समेटे गढ़वाल और कुमाऊँ का यह भू-भाग ऐसा है जहाँ वर्ष भर कौथिग-मेले और त्योहार आयोजित होते रहते हैं- कुछ धार्मिक तो कुछ सांस्कृतिक और जल अनेक मेलों-त्योहारों के साथ किसी-न-किसी रूप में जुड़ा है। शिव से जुड़े त्योहारों से जल का जुड़ाव विशेष रूप से माना जाता है। आज भी विवाह के बाद गाँव आने वाली नई बहू के लिये धारे-पंदेरे या नौले पर अगली सुबह जाकर पूजा करना और वहाँ से पानी लाना संस्कृति का महत्त्वपूर्ण अंग है।

उत्तराखण्ड में नौलों-धारों के उपयोग और संरक्षण में धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संवेदनशीलता इत्यादि का पूरा ध्यान रखा जाता रहा है। ये धारे-नौले सदैव ही सामूहिकता, सामंजस्यता, सद्भावना और परस्पर सम्मान के वाहक रहे हैं और साथ ही, ग्राम-समाज की जीवनरेखा! और हाँ, अधिकतर मामलों में ये धारे, पंदेरे, मगरे और नौले प्राकृतिक ही रहे हैं। अर्थात, जहाँ प्राकृतिक रूप से पानी था, वहीं इनका निर्माण किया गया। ताल भी सदैव प्राकृतिक रहे। हाँ, खालें अवश्य मानव-निर्मित भी होती रही हैं। कुल मिलाकर लोग जल संचय और उसके संरक्षण और संवर्धन का काम करते थे। यदि जल की मात्रा अर्थात उसका प्रवाह नियमित और ठीक-ठाक मात्रा में होता था तो ग्राम-समाज उसे धारे-पंदेरे या मगरे का रूप देता था और यदि पानी की मात्रा कम होती थी तो सूर्य की किरणों से बचाकर उसे नौले का रूप दिया जाता था।

कहीं-कहीं तो नौले के भीतर सीढ़ियाँ भी बनाई जाती थीं। धारों-मगरों की मुखाकृतियों को खूब सजाया जाता था। उन्हें इस प्रकार से बनाया जाता था कि जल का प्रवाह उन मुखाकृतियों से बाहर निकले। और ये मुखाकृतियाँ गणेश, नागदेवता, बाघ, हाथी, गाय, इत्यादि किसी भी देव या जीव की हो सकती थीं। इनके आस-पास छोटा सा मन्दिर भी बना दिया जाता था। संक्षेप में, यह स्थल पवित्र-स्थल होता था और मन्दिर के बराबर ही इसका स्थान भी होता था। आस-पास खूब सफाई भी रखी जाती थी। पानी होने के फलस्वरूप आस-पास वनस्पतियाँ और वृक्ष तो स्वत: ही उगे होते थे।

धारों और मगरों की तरह नौलों के बाहर भी देवताओं की आकृतियाँ उकेरी जाती रही हैं। गोपेश्वर (चमोली जनपद) के वैतरणी में दसवीं सदी से पहले बने ऐसे मुख प्राप्त हुए हैं। और जहाँ तक धारों-नौलों के इतिहास की बात है, कुमाऊँ मण्डल में गंगोलीहाट के पास जाह्नवी नौला उत्तराखण्ड का सबसे प्राचीन नौला माना जाता है।

समझा जाता है कि ईसा पूर्व 1272 में इस नौले का निर्माण किया गया था। तब सम्भवत: पानी की कमी नहीं रही होगी लेकिन किसी-न-किसी सामाजिक, सांस्कृतिक या धार्मिक कारण से यह उपक्रम किया गया होगा। धारे, नौले और मगरे वास्तव में संस्कृति के प्रतीक थे। इन्हें जल-संस्कृति का वाहक बनाकर जनचेतना के लिये उपयोग में लाया गया होगा। सामूहिक कार्यों का शुभारम्भ या तो धारों-नौलों से होता था या देवस्थानों से। धारे, पंदेरे, मगरे और नौले गाँव की बहू-बेटियों के मिलनस्थल भी हुआ करते थे।

पूरे दिन काम से थकी ये महिलाएँ धारे-पंदेरे और नौले के पास बैठ आपस में बातें कर अपनी थकान ही नहीं उतारती थीं, बल्कि अगले दिन के सामूहिक कार्यों की योजना भी बनाती थीं। संक्षेप में, जन्म-विवाह से लेकर अन्तिम संस्कार जैसी अनेक धार्मिक क्रियाओं के सम्बन्ध में ये जल-प्रणालियाँ महत्त्वपूर्ण थीं। हाँ, अन्तिम संस्कार के लिये जो जल-प्रणाली उपयोग में लाई जाती थीं, वे गाँव से कुछ दूर और भिन्न होती थीं।

ताल भी सदैव प्राकृतिक रहे। हाँ, खालें अवश्य मानव-निर्मित भी होती रही हैं। कुल मिलाकर लोग जल संचय और उसके संरक्षण और संवर्धन का काम करते थे। यदि जल की मात्रा अर्थात उसका प्रवाह नियमित और ठीक-ठाक मात्रा में होता था तो ग्राम-समाज उसे धारे-पंदेरे या मगरे का रूप देता था और यदि पानी की मात्रा कम होती थी तो सूर्य की किरणों से बचाकर उसे नौले का रूप दिया जाता था। कहीं-कहीं तो नौले के भीतर सीढ़ियाँ भी बनाई जाती थीं। धारों-मगरों की मुखाकृतियों को खूब सजाया जाता था। धारों, मगरों, पंदेरों और नौलों को सूर्य की सीधी किरणों से भी बचाया जाता था। इसमें यह विज्ञान था कि सूर्य की सीधी किरणें पानी को न लगने देने से पानी का वाष्पीकरण कम होता है और जल की शीतलता भी बनी रहती है। आज तो ये दोनों ही काम नहीं हो रहे क्योंकि नल-जल संस्कृति ने पारम्परिक जल-पद्धतियों को समाप्त करने का काम कर दिया है।

उत्तराखण्ड में तो विश्व बैंक की स्वजल योजना ने जल-संस्कृति का नाश करने में बड़ी भूमिका निभाई है। विकास की इस तथाकथित नई सोच ने बहुत कुछ बदल दिया है। जहाँ धारे, पंदेरे, मगरे और नौले हुआ करते थे, वहाँ विश्व बैंक की इस योजना ने अपने नल लगा दिये और प्रकृति के कर्म को अपना कर्म दिखा दिया।

आज ऐसे स्थानों पर जल निगम या जल संस्थान के नल उग आये हैं। ये न तो देखने में सुन्दर लगते हैं और न ही स्थानीय परिवेश के अनुकूल दिखाई देते हैं। पर विवशता यह कि इनके बिना कोई चारा भी नहीं। जलस्रोत सूखते जा रहे हैं और पानी का संकट बढ़ता जा रहा है। यही स्थिति रही तो वह दिन दूर नहीं जब आने वाली पीढ़ियाँ केवल पुस्तकों और इंटरनेट पर धारों, मगरों, पंदेरों और नौलों के चित्र देखेंगी।

थोड़ा ध्यान से देखें और सोचें कि ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई है! यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि आज धरती का तापमान बढ़ने से जलवायु परिवर्तन की जो स्थितियाँ बनी हैं उनके कारण उत्तराखण्ड जैसे क्षेत्र में धारे, पंदेरे, मगरे और नौले सूख रहे हैं और इसके लिये केवल और केवल मानव उत्तरदाई है। आदिकाल से लेकर आज के अत्याधुनिक युग तक को देखें तो सहज ही मालूम हो जाएगा कि मनुष्य के अलावा धरती पर कोई भी जीव-जन्तु नहीं है जिसने अपनी जीवन-पद्धति में कोई आमूल परिवर्तन किया हो। जिन जीव-जन्तुओं ने अपनी जीवन-पद्धति में थोड़ा-बहुत परिवर्तन किया भी है, उसके लिये भी मानव ही दोषी है।

अत्यधिक जनसंख्या के कारण जल सहित धरती के सीमित संसाधनों और धरोहरों पर अनावश्यक बोझ बढ़ रहा है। कृषि-खेती, भोजन, आवास जैसी मूल समस्याएँ बढ़ रही हैं। पानी की उपलब्धता कम होने के कारण स्वास्थ्य भी संकट में है और इन समस्याओं के बढ़ने से आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संकट भी सामने आ रहे हैं। समाज में हिंसा बढ़ रही है, मानवीय रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं और संक्षेप में समाज बिखर रहा है।

उत्तराखण्ड के पर्यावरण-पारिस्थितिकी से समाज का सरोकार भी महत्त्वपूर्ण है। यही कारण था कि लगभग डेढ़ दशक पहले उत्तराखण्ड के सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने राज्य सरकार की प्रस्तावित जलनीति का विरोध करते हुए राजेन्द्र धस्माना और सुरेश नौटियाल के सम्पादकीय नेतृत्व में ‘उत्तराखण्ड लोक जलनीति’ का प्रारूप तैयार किया, जिसे बनाने में अनेक संगठनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। इनमें अग्रणी थे: हिमालय पर्यावरण शिक्षा संस्थान लम्बगाँव, लोक विज्ञान संस्थान देहरादून, लक्ष्मी आश्रम कौसानी, उत्तराखण्ड लोक विद्यापीठ कौसानी, उत्तरांचल वन अध्ययन समिति लम्बगाँव, उत्तराखण्ड लोक वाहिनी अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड जल संस्कृति मंच देहरादून, अमन अल्मोड़ा, पहाड़ नैनीताल और अन्य संगठन।

इस प्रारूप में स्पष्ट किया गया कि उत्तराखण्ड के तमाम वर्गों के लिये आवश्यक है कि वे प्राकृतिक धरोहरों और संसाधनों के स्थानीय संरक्षक की भूमिका में रहें और अपने विवेक और लोक संचित ज्ञान के आधार पर अपनी जल-वन-भूमि से सम्बन्धित योजनाएँ बनाएँ। इन संगठनों की यह अवधारणा निश्चित रूप से संचित लोक ज्ञान पर आधारित थी। इसलिये, उत्तराखण्ड स्थित धारों-नौलों के बारे में भी यही समझ रही कि ये स्थानीय जीवन का दर्शन हैं और इन्हें भावी पीढ़ियों के लिये स्वस्थ रखना समाज का दायित्व है।

लेकिन, राज्य सरकार ने इस लोक जलनीति को गम्भीरता से नहीं लिया। उत्तराखण्ड हिमालय में जल-विद्युत प्रोजेक्ट्स और बाँध परियोजनाएँ निर्लजता और निर्ममता के साथ जारी हैं। विस्फोट करके सड़कें भी बराबर खोदी जा रही हैं। अन्य हिमालयी क्षेत्रों जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, सिक्किम, अरुणाचल और पूर्वोत्तर में भी यही सब-कुछ हो रहा है। देश की तथाकथित मुख्यभूमि की पानी और बिजली की निरन्तर बढ़ रही भूख को हिमालय स्वयं लहू-लुहान होने के बावजूद शान्त नहीं कर पा रहा है।

कथुली धाराआज हिमालय क्षेत्र में पानी कम होने के भी अनेक कारण हैं। पर्वतों, हिमनदों, नदियों, जलागम क्षेत्रों, वनों, कृषि जोतों, गूलों-कूलों-नहरों, वर्षाजल प्रबन्धन, इत्यादि को लेकर जनपक्षीय नीतियाँ हैं ही नहीं। कहीं बाँध बनाने के लिये बारूद बिछाकर पहाड़ों के भीतर सुरंगें बिछाई जा रही हैं तो कहीं पहाड़ों का सीना चीरकर विकास के नाम पर सड़कें खोदी जा रही हैं। तथाकथित आधुनिक विकास के लिये ऐसा करना आवश्यक बताया जा रहा है। क्या बड़े-बड़े बाँधों के स्थान पर बिना सुरंगों वाले छोटे बाँध रन-ऑफ-द-रिवर प्रणाली और स्थानीय जनता की भागीदारी से नहीं बनाए जा सकते? क्या इनके बनाने में विश्व बाँध आयोग की शर्तों का पालन नहीं किया जा सकता? क्या सड़कें खोदते समय मलबे को सड़क पर ही बिछाकर नदियों को गाद और पत्थरों-चट्टानों से नहीं बचाया जा सकता?

जलवायु परिवर्तन के कारण ही धरती का तापमान बढ़ रहा है और हिमालय के हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं। अनियमित, अनियंत्रित और कम वर्षा के लिये भी यही कारण जिम्मेदार है। वैसे तो जलवायु परिवर्तन के बहुत सारे आयाम हैं पर यहाँ पानी पर ही बात कर रहे हैं और वह भी हिमालय के पानी पर। उस हिमालय के बारे में जो उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के बाद सबसे अधिक हिम अपने पास आज भी रखे हुए हैं। जलवायु परिवर्तन से हिमालय क्षेत्र में वर्षा के पैटर्न में परिवर्तन हुआ है और जो हिमनद बचे हैं, उनके समाप्त होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। अर्थात, वर्षा कम होगी तो हिम कम बनेगा और जितना बनेगा भी उतना टिकेगा भी नहीं तापमान बढ़ने के कारण।

जलवायु परिवर्तन के कारण भारत और तिब्बत के हिमालय क्षेत्र के अलावा गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी सदानीरा कही जाने वाली नदियों के बेसिनों में रहने वाली करोड़ों की आबादी प्रभावित हो रही है। संकट इतना बढ़ गया है कि कोई नहीं जानता कि ये नदियाँ कब तक सदानीरा रहेंगी। जिन 16 हजार से अधिक हिमालयी हिमनदों पर ये नदियाँ निर्भर हैं, वे स्वयं अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका आकार छोटा हो रहा है और उनमें जो हिम है उसकी सघनता में भारी कमी आ रही है।

आईपीसीसी की 2007 की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि मानव गतिविधियों के कारण बढ़े तापमान के कारण भविष्य में इन नदियों में जलवायु परिवर्तन के कारण पानी का बहाव काफी कम हो जाएगा और उनका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।

भारत विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक जे. श्रीनिवासन तो पहले ही कह चुके हैं कि बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारत के अधिकतम हिस्सों के सतही वायु तापमान में आधा डिग्री की वृद्धि हुई, लेकिन हिमालय क्षेत्र में यह वृद्धि एक डिग्री सेंटीग्रेड की रही। इसी वजह से हिमनदों के पिघलने की गति तेज हुई। हिमालयी कृषि पर तापमान बढ़ने का बुरा असर आज कोई भी देख सकता है। हिमालयी राज्यों में कृषि लगभग समाप्त होने का कारण केवल वन्य-जीवों का हस्तक्षेप नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन भी प्रमुख कारण है।

केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट ‘हिमालयन ग्लेशियर्स’ भले ही कहती हों कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी हिमनद प्रभावित हुए हैं। लेकिन, हिमनदों की टर्मिनस पोजीशन की नाप से पता चलता है कि हिमालय क्षेत्र के हिमनद पिछले कुछ दशकों से निरन्तर घट रहे हैं।

उदाहरण के लिये 1960 के दशक से लेकर अब तक सगरमाथा (एवरेस्ट) क्षेत्र की घटने की दर औसतन 5.5-8.7 एम/ए रही है। हाल के वर्षों में हिमनदों का आकार घटने की दर में और तेजी आई है। हिमनदों में बर्फ जमने में भी कमी आई है। हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति में 915 किमी। क्षेत्र में हिमनदों के फोटो कुछ वर्ष तक कुछ-कुछ अन्तराल के बाद लिये गए और फिर तमाम फोटो का मिलान किया गया। पता चला कि 1999 और 2004 के बीच यहाँ के हिमनद 0.85 मीटर प्रतिवर्ष के औसत से घट गए थे। वर्ष 2000 में नासा ने चित्र उपलब्ध कराए थे और 2004 में फ्रांस के सेटेलाइट स्पाट-5 ने इसी इलाके के भिन्न कोणों से खींचे दो चित्र मुहैया कराए थे। स्टीरियोस्कोपिक फोटोग्रैमीट्रिक तकनीक से यह अध्ययन किया गया था।

हजारों हिमनदों और सैकड़ों नदियों का स्रोत है हिमालय। एशिया की अनेक महत्त्वपूर्ण नदियाँ हिमालय से निकलती हैं। पोलर यानी ध्रुवीय क्षेत्र से बाहर 72 किमी. लम्बा और 2 किमी. चौड़ा सबसे बड़ा सियाचिन हिमनद भी हिमालय क्षेत्र में ही विद्यमान है। बल्तोरो, बायाफो, नूब्रा, हिस्पार, बन्दरपूँछ, डोकरियानी, खतलिंग, दूनागिरि, तिपराबमक जैसे हिमनद सब हिमालय क्षेत्र में ही हैं। ये सब किसी-न-किसी नदी का स्रोत हैं।

वर्ष 2000 में विश्व बैंक और जल संसाधन मंत्रालय भारत सरकार की एक रिपोर्ट ‘इंटर-सेक्टोरल वाटर अलोकेशन, प्लानिंग एंड मैनेजमेंट’ के अनुसार 2050 तक केवल ब्रह्मपुत्र, बराक और तादरी से लेकर कन्याकुमारी तक पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों में ही ठीकठाक पानी रह जाएगा। इस रिपोर्ट में फुटनोट के तौर पर यह बात भी कही गई है कि 2050 तक अधिकतर हिमनद लुप्त ही हो जाएँगे। इस हिसाब से हिमनदों के लुप्त होने में 35 साल ही बचे हैं।

राजेन्द्र पचौरी के अनुसार तो ये हिमनद 2035 तक भी गायब हो सकते हैं और इस हिसाब से तो बीस साल ही बचे हैं। ऐसा होगा तो गंगा बेसिन में रहने वाले करोड़ों लोगों का क्या होगा? चीन के अनुसन्धानकर्ताओं ने तिब्बत में जो शोध किया है, उसके अनुसार तो हिमनदों के तेजी से पिघलने से उनकी स्थिति ही खराब नहीं हो रही है बल्कि बाढ़ की स्थिति भी पैदा हो गई है।

धरती के वातावरण और तापमान के बारे में फ्रांस के फिजिसिस्ट जोसेफ फूरी ने 1824 के आस-पास ग्रीनहाउस गैस के सिद्धान्त का पहली बार प्रतिपादन किया। वर्ष 1896 में स्वीडिश रसायनशास्त्री स्वान्ते अरेनियस ने कहा कि औद्योगिक युग शुरू होने के साथ ही सीओ-टू उत्सर्जन से ग्रीनहाउस प्रभाव बढ़ने लगा होगा। सम्भवत: यह भी किसी वैज्ञानिक ने पहली बार कहा कि मानव की गतिविधि से ग्रीनहाउस गैसें पैदा होती हैं।

बाद में 1938 में ब्रिटिश इंजीनियर गाई कैलेंडर ने जोड़ा कि जीवाश्म ईंधन जलने के कारण धरती का तापमान बढ़ा है। ये बातें लम्बे हिमयुग और छोटे तापयुग के सिद्धान्तों (थियरीज) से बहुत मेल नहीं खाती हैं, लेकिन ज्यादा तार्किक और वैज्ञानिक लगती हैं। इस तार्किक और वैज्ञानिक धारणा को आगे बढ़ाते हुए 1975 में अमेरिकी वैज्ञानिक वैलेस ब्रोकर ने अपने एक शोधपत्र में ‘ग्लोबल वार्मिंग’ फ्रेज का उपयोग किया। इसके चार साल बाद 1979 में विश्व जलवायु सम्मलेन आयोजित हुआ। इस सम्मलेन ने विश्व सरकारों से आग्रह किया कि जलवायु परिवर्तन में मानव की भूमिका को समझें और इस पर अंकुश लगाएँ।

जहाँ धारे, पंदेरे, मगरे और नौले हुआ करते थे, वहाँ विश्व बैंक की इस योजना ने अपने नल लगा दिये और प्रकृति के कर्म को अपना कर्म दिखा दिया। आज ऐसे स्थानों पर जल निगम या जल संस्थान के नल उग आये हैं। ये न तो देखने में सुन्दर लगते हैं और न ही स्थानीय परिवेश के अनुकूल दिखाई देते हैं। पर विवशता यह कि इनके बिना कोई चारा भी नहीं। जलस्रोत सूखते जा रहे हैं और पानी का संकट बढ़ता जा रहा है।इसके बाद तो बहुत कुछ हुआ। मसलन, 1987 में मांट्रियल प्रोटोकॉल अस्तित्व में आया और 1988 में संयुक्त राष्ट्र ने आईपीसीसी का गठन किया। और 1990 में आईपीसीसी की पहली रिपोर्ट सामने आयी। 1992 में संयुक्त राष्ट्र पृथ्वी शिखर सम्मलेन हुआ और पाँच साल बाद 1997 में क्योटो प्रोटोकॉल के अन्तर्गत औद्योगिक देशों से कहा गया कि 1990 के दशक में गैसों के उत्सर्जन का जो स्तर था, उससे भी पाँच फीसद कम उत्सर्जन का लक्ष्य वे 2008-2012 के बीच हासिल कर लें।

अनेक देश इस लक्ष्य से सहमत नहीं थे। अमेरिका ने तो क्योटो प्रोटोकॉल से स्वयं को बाहर ही कर दिया था। वर्ष 2005 में क्योटो प्रोटोकॉल धरातल पर आया पर जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। विश्व की विवश जनता जलवायु परिवर्तन को लेकर होने वाले शिखर सम्मेलनों पर आस लगाए रहती है पर निकलता कुछ नहीं है। इस विषय पर पेरिस में कॉप-21 शिखर बैठक हुई और अब कॉप-22 शिखर बैठक होने जा रही है पर अब तक हुआ कुछ नहीं है। लगता है कि गोलचक्कर काटकर हम बार-बार उसी जगह पहुँच जाते हैं जहाँ से यात्रा आरम्भ की थी।

संक्षेप में हिमालय के सन्दर्भ में यही है कि पारिस्थितिक प्रबन्धन व्यवस्था समग्र हिमालय नीति का हिस्सा हो और ‘हिमालय संरक्षण एवं संवर्धन मंत्रालय’ इन पर क्रियान्वयन करे। पारिस्थितिक-क्षेत्र संरक्षण की नीति इस प्रकार बने कि प्राकृतिक विरासत पर स्थानीय जनता के पारम्परिक अधिकार यथावत बने रहें। चीड़ जैसे एकल प्रजाति के वनों को समाप्त कर उनके स्थान पर चौड़ी पत्ती वाले मिश्रित वन लगाए जाएँ। और जिन दूसरे देशों में हिमालय है, वहाँ भी ऐसे मंत्रालय बनाने के लिये भारत सरकार वहाँ की सरकारों से बात करे।

साथ ही, उत्तराखण्ड जैसे हिमालयी राज्यों में संविधान के अनुच्छेद- 371 और राजस्व अधिनियम के सेक्शन-18 की व्यवस्थाओं अथवा उनके जैसी व्यवस्थाओं के साथ अनिवार्य चकबन्दी के माध्यम से खेती को बचाया जाये। हिमालय फल संवर्धन योजना के माध्यम से लोगों को वृक्ष खेती की ओर प्रोत्साहित करने की योजना बने। प्रत्येक विधायक अपने क्षेत्र में अपने कार्यकाल में कम-से-कम एक लाख नए वृक्षों के रोपण और उनके रख-रखाव की जिम्मेदारी ले। भोजन पकाने के लिये पर्याप्त मात्रा में छोटे सिलेंडरों के माध्यम से पर्वतीय ग्रामों में रसोई गैस उपलब्ध कराई जाय ताकि ईंधन के लिये वनों पर अनावश्यक बोझ न बढ़े। यात्रियों पर अनिवार्य रूप से पर्यावरण शुल्क लगाया जाये।

पच्चीस सौ किलोमीटर लम्बे और करीब तीन सौ किलोमीटर चौड़ाई वाले हिमालय क्षेत्र के स्वास्थ्य की चिन्ता में पिछले कुछ वर्षों से देश भर और खासकर उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश में 9 सितम्बर को ‘हिमालय दिवस’ मनाया जाता है।

साल में एक दिन प्रायश्चितभाव से हिमालय दिवस मनाने से कुछ नहीं होगा। हिमालय के संरक्षण के लिये तो हर दिन हिमालय दिवस मनाना होगा, तब जाकर हिमालय का भला होगा और यह काम सर्वप्रथम हिमालय के पर्वतों, हिमनदों, नदियों, जलागम क्षेत्रों और वनों को संरक्षण के नैसर्गिक अधिकारों से सुसज्जित करने से आरम्भ होगा।

हिमालय दिवस मनाने की सार्थकता तो तब होगी जब हिमालय के स्थानिक पर्यावरण-पारिस्थितिकी, वातावरण-जलवायु और भूगोल के हिसाब से अनुकूल और मानव संवेदी दीर्घकालिक नीतियाँ बनें। पारिस्थितिक-पर्यावरण प्रबन्धन अल्पावधि में सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है। इसके लिये दीर्घकालिक रणनीति चाहिए। ऐसी नीतियाँ हों जिनमें इसके पर्वतों, हिमनदों, नदियों, वनों, जलागम क्षेत्रों, लोगों, वन्य जन्तुओं और वनस्पतियों के संरक्षण और संवर्धन की बातें हों।

जब दुनिया के कुछ देशों में पर्वतों, नदियों और वनों के संरक्षण के नैसर्गिक अधिकार हो सकते हैं तो हिमालय पर्वत को ये अधिकार क्यों नहीं मिल सकते? उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के बाहर सबसे अधिक हिम का संरक्षण करने वाले हिमालय के साथ ऐसा व्यवहार क्यों? क्या हम नहीं चाहते कि इसके हजारों हिमनद और सैकड़ों नदियाँ करोड़ों लोगों के जीवन को सुनिश्चित करें? लगभग पाँच सहस्त्राब्दि पूर्व ऋषि अथर्वन द्वारा रचित चौथे और अन्तिम वेद ‘अथर्वेद’ के बारहवें अध्याय में “पृथिवी” सूक्त में भी तो यही भावना है।

इस वेद के एक श्लोक (यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टय: सम्बभूवु, यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत्सा नो भूमि: पूर्वेपेये दधातु) में धरा का आह्वान किया गया है कि सागर, नदियों-जलस्रोतों, कृषि उपज और जीव-वनस्पति वैविध्य से परिपूर्ण ओ धरा हमें भोजन उदार होकर देना! और इस पर आज टिप्पणी है कि यह निर्भर करता है धरा के स्वास्थ्य पर! धरा पर स्वच्छ जल और वनस्पतियों से लेकर अनुकूल वायु की उपलब्धता रहेगी तभी यह श्लोक चरितार्थ होगा।

जीव-जगत के लिये जल के महत्त्व के बारे में सर्वज्ञात है कि यह प्राणवायु ऑक्सीजन के पश्चात सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व है। ऑक्सीजन के बिना तो जीवन की कल्पना कुछ पल से अधिक नहीं की जा सकती, किन्तु जल के बिना भी जीवन अधिक समय तक नहीं रह सकता है। वायु दिखती नहीं है, केवल उसकी अनुभूति होती है इसलिये उसका एथीरिअल अर्थात वायवीय महत्त्व है, यद्यपि सनातनी परम्परा में वायु भी देव है। दूसरी ओर, देव के रूप में होने के साथ-साथ मानव के लिये जल पूरे जीवन-दर्शन के रूप में विकसित हुआ है। भारत में सदानीरा गंगा और अन्य नदियों को देवी के रूप में ही माना और पूजा जाता है। उत्तराखण्ड के धारे-नौले भी इसी जीवन-दर्शन का अंग हैं।

विश्व की विभिन्न जीवन-पद्धतियों में जल का सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व है। भारतीय परम्परा में तो जल को देव की तरह पूजा जाता है। भारत में अनेक जीवनशैलियों और संस्कृतियों को गढ़ने में जल की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। गंगा जैसी सदानीरा के ओर-छोर अनेक समाज और संस्कृतियाँ पल्लवित हुईं। नदियों में पवित्र स्नान की परम्परा वास्तव में प्रकृति और मानव के उस सहज और सिम्बायोटिक सम्बन्ध को पुनर्जीवित करने का ही प्रयास होता है जो आरम्भ से ही बना है। वस्तुत:, अथर्वेद के पृथिवी सूक्त में सम्पूर्ण मानव-जाति के लिये सहिष्णुता का शाश्वत सन्देश है।

इस सूक्त में प्रकृति और मानव के परस्पर अर्थात सिम्बायोटिक सम्बन्धों का उल्लेख है सदाशयता की पराकाष्ठा है। वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय ने पृथिवी सूक्त पर श्रीनिवास सोहोनी की टीका पढ़ने के पश्चात इस सूक्त का हिन्दी में भावानुवाद किया और पृथिवी नाम से इस पुस्तक का प्रकाशन भारतीय पर्यावरण समिति ने 1992 में किया। इस पुस्तक की भूमिका में मधुकर उपाध्याय ने लिखा है कि यह सूक्त मानवमात्र के उत्कर्ष की कामना का समूहगान है। इसमें देश, काल, जाति, रंग, लिंग, भाषा और धर्म का कोई स्थान नहीं है।

वस्तुत:, ऋषि अथर्वन की अवधारणा में पृथ्वी माँ का स्वरूप है और मानव उसकी सन्तान! मानव का सम्पूर्ण अस्तित्व, उसका जीवन और उसकी संस्कृति, सब धरती पर आधारित है। और प्रक्रृति के इस उपहार का उपयोग मनुष्य को उचित ढंग से करना चाहिए। मानव से अपेक्षित है कि वह सीमित और सृजनात्मक उपयोग करेगा। ऐसा उपयोग और उपभोग जो धरती को क्षति पहुँचाए बिना हो और जिसमें उसके मूल तत्वों को न छुआ गया हो। ऋषि अथर्वन ने सम्पूर्ण मानव-जाति की ओर से इस सूक्त के एक अन्य श्लोक में कहा है कि ओ पावन धरती तुम्हें और तुम्हारे मूल तत्वों को क्षति पहुँचाए बिना हम इस मिट्टी का सृजनात्मक उपभोग करें।

दर्शन के स्तर पर प्रकृति के ही एक रूप जल और मानव का सम्बन्ध परस्परता के सिद्धान्त पर विकसित हुआ है। यह सिद्धान्त वह इस सूत्र में निहित है कि मनुष्य के साथ-साथ समस्त प्राणियों का अस्तित्त्व पृथ्वी की जैव-विविधता और सघनता, जीवन्तता, निरन्तरता और नैसर्गिकता पर निर्भर है और ये तत्व जल की उपलब्धता पर निर्भर करते हैं। यद्यपि यह निर्भरता पारस्परिक है। जल होगा तो जैव-विविधता सघन होगी और यदि जैव-विविधता सघन होगी तो जल की उपलब्धता प्रचुर मात्रा में होगी।

पहाड़ों से पलायन को मजबूर लोगअथर्वेद के पृथिवी सूक्त के एक अन्य श्लोक का उल्लेख करते हुए यह एक बार फिर से कहना होगा कि निर्विकार स्थायी और शान्त पृथ्वी हमें असीमित सम्पदा और सुख तभी देगी यदि मनुष्य धरती को क्षति पहुँचाना बन्द कर उसका कल्याण कर अपना अस्तित्व बचाने का उपक्रम करे! जल-संकट के बीच सरल और सादे जीवन के पक्षधर थोरो और गाँधी का स्मरण करना आवश्यक है। गाँधी की यह बात विशेषकर प्रासंगिक है कि धरती पर मनुष्य के लिये सब कुछ है पर उसके लालच के लिये कुछ नहीं।

अन्तत: इतना ही कहना है कि यदि हिमालय को सही मायने में बचा लिया तो उसके धारे-नौले भी लौटेंगे और लौटेगा इस संस्कृति पर आधारित पूरा जीवन और जीवन-दर्शन।

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