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जुनून की हद तक गुजर जाने को तैयार एक और दशरथ माँझी

Author: 
अनिल सिंदूर

.उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्र में बिहार की तर्ज पर जुनून की हद तक गुजर जाने को तैयार है एक और “दशरथ माँझी”। दशरथ का दर्द ये था कि जिस पत्नी से वो बेहद प्यार करता था वो पत्नी उसको खाना पहुँचाते समय पहाड़ के दर्रे में गिर गई थी और दवाओं के अभाव में उसकी मौत हो गई थी लेकिन यहाँ तो न कोई प्यार है न कोई पत्नी, है तो सिर्फ और सिर्फ सेवा का जुनून और कुछ कर गुजरने की तमन्ना। दशरथ ने उस पहाड़ को तोड़ने को हथौड़ा उठा लिया था और यहाँ बेपानी गाँव को पानीदार करने को फावड़ा उठाया है।

बुन्देलखण्ड क्षेत्र इन दिनों पानी की कमी के कारण पूरे देश में चर्चा का विषय है उसी बुन्देलखण्ड के हमीरपुर जनपद की तहसील के पचखुरा बुजुर्ग गाँव में पानी की कमी को दूर करने को किशन पाल सिंह उर्फ कृष्णानन्द ने 200 वर्ष पुराने कलारन दाई के तालाब को नया जीवन देने को फावड़ा उठाया है। उन्होंने यह काम अकेले ही दम पर करने की ठानी है। अभी तक वह 6 माह में लगभग 1000 ट्राली मिट्टी तालाब से निकाल चुके हैं।

विज्ञान के छात्र रहे कृष्णानन्द ने हाईस्कूल तक शिक्षा ग्रहण की इन्टरमीडिएट की परीक्षा न दे वर्ष 1982 में हरिद्वार चले गए और स्वामी परमानन्द के शिष्य बन किशन पाल सिंह से कृष्णानन्द हो गए। कृष्णानन्द ने स्वामी परमानन्द के गंगा सफाई अभियान को गति दी।

स्वामी के ब्रह्मलीन होने के बाद कृष्णानन्द बुलन्दशहर जिले के खुर्जा तहसील के थाना जहाँगीराबाद के ग्राम भाईपुर आ गए और 13 वर्षों के अथक प्रयास से स्वामी परमानन्द शिक्षण संस्थान की नींव रख परमानन्द महाविद्यालय की स्थापना की और स्थानीय समिति को सब कुछ सौंप वर्ष 2014 में अपने गाँव पचखुरा बुजुर्ग आ गए और गाँव के रामजानकी मन्दिर जो लगभग 200 वर्ष पूर्व कलारन दाई ने बनवाया था, आकर ठहर गए।

कृष्णानन्द ने बताया कि उनके दादा राजेन्द्र सिंह बड़े भगत जी को इस मन्दिर से बड़ा लगाव था उन्होंने इसकी सेवा बहुत वर्षों तक की उनकी मृत्यु के बाद मैं यहाँ आया तो यहीं का होकर रह गया। मन्दिर के साथ ही कलारन दाई ने लगभग 10 बीघा का तालाब भी जमीन लेकर बनवाया था जो अब पूरी तरह सूख चुका है इसके घाट, सीढ़ियाँ जर्जर हो चुकी हैं।

तालाब सूखने से कुआँ भी सुख गयामन्दिर के पास ही एक कुआँ का निर्माण करवाया गया था जो अब पूरी तरह सूख चुका है। गाँव में पीने के पानी के लाले पड़े हैं ऐसे में तालाब की यह दशा देख तालाब को पुनर्जीवित करने की ठानी और 6 माह में अकेले ही लगभग 1000 ट्राली मिट्टी फावड़े से खोदकर तालाब के बाहर बने रामजानकी मन्दिर की क्षतिग्रस्त दीवालों को ढकने के लिये सहेज दी।

गाँव के लोग मुझे पागल और सिरफिरा कहते हैं लेकिन मैं जानता हूँ जब मैं तालाब को पुनर्जीवित कर लूँगा यही गाँव के लोग मुझे सर पर बिठा लेंगे। वह कहते हैं मुझे कोई चिन्ता नहीं कौन मुझसे क्या कहता है मेरा सुबह से शाम तक एक ही प्रयास रहता है कि तालाब को जल्द-से-जल्द अपने पूर्व के वैभव पर पहुँचा दूँ।

बुलन्दशहर में मैंने इस समाज की मानसिकता को भोगा है वहाँ भी मुझे लोग पागल कहते थे। उन्होंने बताया कि मेरे पिता के पाँच सन्ताने हैं, मेरे तीन भाई एक बहन हैं। मैं भाइयों में दूसरे नम्बर का भाई हूँ पिता के पास 120 बीघा जमीन है मैंने अपना स्वं का परिवार न बसाने का निर्णय लिया है। मेरे लिये दो समय की भोजन की थाली घर से आती है जिसका भगवान को प्रसाद लगा उसी थाली को खाकर काम में जुट जाता हूँ।

कलारन दाई तालाब का इतिहास


लगभग दो सौ वर्ष पूर्व इस गाँव की आबादी दो सौ के आसपास थी। इसी गाँव में कलारन दाई अपने पति के साथ रहा करती थी। वह नि:सन्तान थी। एक बार जब वो चारधाम की यात्रा पर अपने पति के साथ गईं तभी पति वहीं बीमार हुए और वहीं उनकी मृत्यु हो गई।

उनकी इच्छा पूर्ति को कलारन दाई गाँव लौटकर आईं और दस बीघा जमीन खरीद चन्देलकालीन राजाओं जैसा ही एक विशाल तालाब का निर्माण करवाया। तालाब के साथ ही रामजानकी मन्दिर, शिव मन्दिर तथा एक कुआँ का निर्माण करवाया गया। जानकर बताते हैं कि पूरे क्षेत्र में इस जैसा विशाल तालाब नहीं है।

पूर्व में यहाँ गाँव की बरातों का रुकने का स्थान होता था लेकिन तालाब तथा कुआँ सूख जाने के कारण अब यह वीरान हो गया है। तालाब में सात पक्के घाट दलितों, सवर्णों, पिछड़ों के अलावा गाँव में आने वाले महमानों, प्रौढ़ महिलाओं, नई नवेली दुल्हनों के लिये पर्दानसीन घाट हैं।

कृष्णानन्द का क्या है संकल्प


वह बारह वर्षों के अन्दर तालाब की भव्यता को एक बार फिर अकेले दम पर पुनर्जीवित करना चाहते हैं। साथ ही वह चाहते हैं कि गाँव में एक चिकित्सालय ऐसा बनवाएँ जिसमें प्राथमिक उपचार मुफ्त हो सके। गाँव में अंग्रेजी माध्यम के स्कूल के साथ ही महाविद्यालय की भी नींव रखना चाहते हैं।

तालाब की मिट्टी से ढँका मन्दिर की दीवार बुन्देलखण्ड में एक कहावत है कि 12 साल बाद घूरे के भी दिन फिर जाते हैं शायद इसी मंत्र को लेकर कृष्णानन्द जुनून की हद से गुजर जाना चाहते हैं वह मानते हैं अपना काम करते रहो चीजें मिलें या न मिलें परवाह मत करो।

Nice Work

Aaj bhi aise log hai jo dusron ki bhalai sochate.Lekin agar chahe to Mla is kam ko bhut badiya tarike se sampan kra sakte hai

बहुत बढ़िया स्टोरी

बहुत बढ़िया स्टोरी

महान इंसान

ऐसे महान इंसान को कोटिशः नमन सचमुच ऐसे लोग तो समाज के लिए एक उदहारण है जो की दुनिया में कभी कभी पैदा होते है पर उनकी क़द्र और सम्मान ही समाज के लिए एक आदर्श और प्रेरणा है ऐसे लोंगो को गुमनामी की जिंदगी न जीनी पड़े गुमनामी बाबा की तरह वर्ना समाज से अच्छाई मिट जाएगी 

comment

अनिल जी,बहुत शानदार जमीनी रिपोर्टिंग की बधाई.आपको याद दिला दूं कि #दशरथ मांझी को भी दुनिया ने एक पत्रकार की वजह से ही जाना वरना वो उसी पहाड़ी दर्रे को खोदकर इतिहास के बियाबान में गुम हो गया होता.एक बार फिर बधाई कि आपके सद्प्रयासों से दुनिया को कृष्णानंद जैसे संकल्पी व्यक्ति के बारे में जाना.......

धन्यबाद अरविन्द जी , आप सभी

धन्यबाद अरविन्द जी , आप सभी के द्वारा मिलने वाले हौंसले से ही रिपोर्टिंग की ताकत मिलती है ! एक बार पुन: हौंसला बढ़ाने के लिए धन्यबाद ! 

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