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कार्बनिक खेती में जैव उर्वरकों का योगदान (Contribution of organic fertilizers in organic farming)

Author: 
नरेन्द्र कुमार
Source: 
विज्ञान प्रगति, अक्टूबर 2017

जैव उर्वरक एक प्रकार के जीव होते हैं जो मृदा की पोषण गुणवत्ता को बढ़ाते हैं। ये जीवाणु, कवक तथा सायनोबैक्टीरिया के मुख्य स्रोत होते हैं। द्विबीजपत्री (लैग्यूमिनस) पादपों की जड़ों पर स्थित ग्रंथियों का निर्माण राइजोबियम के सहजीवी सम्बन्ध द्वारा होता है। यह जीवाणु वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को स्थिरीकृत कर इसे कार्बनिक रूप में परिवर्तित कर देते हैं जिससे पादप इसका प्रयोग पोषकों के रूप में करते हैं।

खेती में रासायनिक उर्वरकों के अधिकाधिक प्रयोग से अनेक समस्याएँ जुड़ी हुई हैं। इसके परिणामस्वरूप जैविक खेती करने पर तथा जैव उर्वरकों के प्रयोग पर बल दिया जा रहा है। हाल ही में, भारत में जैव उर्वरकों की एक बड़ी संख्या बड़े पैमाने पर बाजार में उपलब्ध होने लगी है। किसान अपनी खेतों में लगातार इनका प्रयोग कर रहे हैं। इससे मृदा पोषक तत्वों की भरपाई तथा रसायन उर्वरकों पर निर्भरता भी कम हो रही है। रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से उपज में वृद्धि तो होती है परन्तु अधिक प्रयोग से मृदा की उर्वरता तथा संरचना पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है इसलिये रासायनिक उर्वरकों के साथ जैव उर्वरकों के प्रयोग की सम्भावनाएँ बढ़ रही हैं। जैव उर्वरकों के प्रयोग से फसल को पोषक तत्वों की आपूर्ति होने के साथ मृदा जिससे उपज में वृद्धि होती है।

एक लम्बे समय से इस बात की जानकारी लोगों को थी कि दलहन मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाती है। लेकिन इस बात का वैज्ञानिक प्रदर्शन 19वीं शताब्दी के आधा गुजर जाने के बाद ही हो पाया था। दहलन कुल के पौधों की जड़ों में ही नाइट्रोजन स्थिरीकरण के लिये गाँठे बनती हैं। दलहन कुल को तीन उपकुलों-मिमोसिडी, सिजलपिनिडी व पैपलिओनिडी में विभाजित किया गया है। मिमोसिडी के 90 प्रतिशत सिजलपिनिडी के 23 प्रतिशत व पैपलिओनिडी के 97 प्रतिशत सदस्यों की जड़ों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण के लिये गाँठे बनती हैं।

जैव उर्वरक के रूप में सूक्ष्मजीव (Microorganisms as organic fertilizers)


जैव उर्वरक एक प्रकार के जीव होते हैं जो मृदा की पोषण गुणवत्ता को बढ़ाते हैं। ये जीवाणु, कवक तथा सायनोबैक्टीरिया के मुख्य स्रोत होते हैं। द्विबीजपत्री (लैग्यूमिनस) पादपों की जड़ों पर स्थित ग्रंथियों का निर्माण राइजोबियम के सहजीवी सम्बन्ध द्वारा होता है। यह जीवाणु वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को स्थिरीकृत कर इसे कार्बनिक रूप में परिवर्तित कर देते हैं जिससे पादप इसका प्रयोग पोषकों के रूप में करते हैं। अन्य जीवाणु (जैसे ऐजोस्पाइरिलम तथा एजोटोबैक्टर) मृदा में मुक्तावस्था में रहते हैं। यह भी वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को स्थिर कर सकते हैं। इस प्रकार मृदा में नाइट्रोजन अवयव बढ़ जाते हैं।

मित्र कवक (जैसे माइकोराइजा) पादपों के साथ सहजीवी सम्बन्ध स्थापित करते हैं। ग्लोमस जीनस के बहुत से सदस्य माइकोराइजा बनाते हैं। इस सहजीवन में कवकीय सहजीवी मृदा से फास्फोरस का अवशोषण कर उसे पादपों में भेज देते हैं। ऐसे सम्बन्धों से युक्ति पादप कई अन्य लाभ जैसे मूलवातोढ़ रोगजनक के प्रति प्रतिरोधकता, लवणता तथा सूखे के प्रति सहनशीलता तथा कुलवृद्धि तथा विकास प्रदर्शित करते हैं।

सायनोबैक्टीरिया स्वपोषित सूक्ष्मजीव हैं जो जलीय तथा स्थलीय वायुमण्डल में विस्तृत रूप से पाये जाते हैं। इनमें बहुत से वायुमण्डलीय नाइट्रोजन को स्थिरीकृत कर सकते हैं, जैसे-ऐनाबीना, नॉसटॉक, ऑसिलेटोरिया आदि। धान के खेत में सायनोबैक्टीरिया महत्त्वपूर्ण जैव उर्वरक की भूमिका निभाते हैं। नील हरित शैवाल भी मृदा में कार्बनिक पदार्थ बढ़ा देते हैं। जिससे उसकी उर्वरता बढ़ जाती है।

जैव उर्वरक (Biofertilizer)


फसलों में जैव उर्वरकों का इस्तेमाल करने से वायुमण्डल में उपस्थित नाइट्रोजन पौधों को (अमोनिया के रूप में) सुगमता से उपलब्ध होती है तथा भूमि में पहले से मौजूद अघुलनशील फास्फोरस आदि पोषक तत्व घुलनशील अवस्था में परिवर्तित होकर पौधों को आसानी से उपलब्ध होते हैं। चूँकि सूक्ष्मजीव प्राकृतिक हैं, इसलिये इनके प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और पर्यावरण पर विपरीत असर नहीं पड़ता। जैव उर्वरकों को रासायनिक उर्वरकों के पूरक के रूप में (ना कि विकल्प के रूप में) प्रयोग करके बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।

वास्तव में जैव उर्वरक विशेष एवं किसी नमी धारक पदार्थ के मिश्रण हैं। विशेष सूक्ष्म जीवों की निर्धारित मात्रा को किसी नमी धारक धूलीय पदार्थ (चारकोल, लिग्नाइट आदि) में मिलाकर जैव उर्वरक तैयार किये जाते हैं। यह प्रायः ‘शुद्ध कल्चर’ के नाम से बाजार में उपलब्ध होता है जो कि एक प्राकृतिक उत्पाद है। इनका उपयोग विभिन्न फसलों में नाइट्रोजन एवं फास्फोरस की आंशिक पूर्ति हेतु किया जा सकता है। इनके उपयोग से भूमि के भौतिक व जैविक गुणों में सुधार होता है व उसकी उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है। जैविक खेती में जैव उर्वरकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

भारत में सर्वप्रथम लेग्यूम राइजोबियम सहजीविता का अध्ययन श्री एन वी जोशी ने किया था। इसका सर्वप्रथम वाणिज्यिक उत्पादन वर्ष 1956 में शुरू हुआ। भारत सरकार की 9वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान कृषि मंत्रालय ने जैव उर्वरकों के उपयोग तथा विकास के लिये राष्ट्रीय परियोजना के माध्यम से वास्तविक रूप से इसको बढ़ावा देने के साथ-साथ लोगों में जागरुकता उत्पन्न करने का काम शुरू किया।

जैव उर्वरकों के प्रकार (Types of Organic Fertilizers)


(1) एजोला (Azolla) : एजोला टेरिडोफाइटा समूह की एक तैरती हुई फर्न है। सामान्यतः एजोला धान के खेत या उथले पानी में उगाई जाती है। यह तेजी से बढ़ती है। एजोला की पंखुड़ियों में एनाबिना नामक नील हरित काई के जाति का एक सूक्ष्मजीव होता है जो सूर्य के प्रकाश में वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का यौगिकीकरण करता है और हरे खाद की तरह फसल को नाइट्रोजन की पूर्ति करता है। एजोला की विशेषता यह है कि यह अनुकूल वातावरण में 5 दिनों में ही दोगुना बड़ा हो जाता है। यदि इसे पूरे वर्ष बढ़ने दिया जाये तो 300 टन से भी अधिक एजोला प्रति हेक्टेयर पैदा किया जा सकता है यानी 40 किग्रा नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर प्राप्त। एजोला में 3.5 प्रतिशत नाइट्रोजन तथा कई तरह के कार्बनिक पदार्थ होते हैं जो भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाते हैं। एजोला के उपयोग से धान की फसल में 5-15 प्रतिशत उत्पादन वृद्धि सम्भावित रहती है।

धान के खेत में इसका उपयोग सुगमता से किया जा सकता है। 2-4 इंच पानी से भरे खेत में 10 टन ताजा एजोला को रोपाई के पूर्व डाल दिया जाता है। इसके साथ इसके ऊपर 30-40 किग्रा सुपर फास्फेट का छिड़काव भी कर दिया जाता है। इसकी वृद्धि के लिये 30-35 डिग्री सेल्सियस का तापक्रम अत्यन्त अनुकूल होता है।

(2) नील हरित शैवाल (algae): नील हरित शैवाल (सायनोबैक्टीरिया) एक जीवाणु होता है जो प्रकाश संश्लेषण से ऊर्जा उत्पादन करते हैं। यहाँ जीवाणु के नीले रंग के कारण इसका नाम सायनो (यूनानी अर्थ नीला) पड़ा है। सायनोबैक्टीरिया विटामिन 12ए ऑक्सिन और एस्कार्बिक अम्ल स्रावित करते हैं जो धान के पौधे की वृद्धि में सहायक होते हैं।

नील हरित शैवाल वायुमण्डलीय नाइट्रोजन का यौगिकीकरण कर धान के फसल को आंशिक मात्रा में नाइट्रोजन की पूर्ति करता है। यह जैविक खाद नाइट्रोजन युक्त रासायनिक उर्वरक का सस्ता व सुलभ विकल्प है जो धान की फसल को न सिर्फ 25-30 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर पूर्ति करता है, बल्कि उस धान के खेत में नील हरित काई के अवशेष से बने खाद के द्वारा उसकी गुणवत्ता व उर्वरता कायम रखने में मददगार साबित होती है।

(3) एजोटोबैक्टर (Azotobacter) : एजोटोबैक्टर अतिसूक्ष्म हिटेरोट्रोफिक जीवाणु हैं। यह स्वतंत्र रूप से रहने वाला सूक्ष्म व वायवीय जीवाणु होते हैं जो बिना किसी सहजीवन के नाइट्रोजन का मुक्त रूप से जैविक स्थिरीकरण करते हैं। यह केवल राइजोस्फियर में पाया जाता है। राइजोप्लेन में यह गुण सामान्यतः नहीं पाया जाता है। मूल स्राव जिसमें अमीनो अम्ल, शर्करा, विटामिन्स और कार्बनिक अम्ल होते हैं, एजोटोबैक्टर के गुणन में सहायक होता है। यह नाइट्रोजन स्थिरीकरण के साथ-साथ पौधों के विकास में काम आने वाले पादप वृद्धिकारक हार्मोन (इण्डोल एसिटिक एसिड एवं जिब्रेलिक अम्ल) और कुछ एंटीबायोटिक्स का भी स्राव करते हैं। जिसका बीजों के अंकुरण पर अच्छा प्रभाव पड़ता है एवं जड़ों में होने वाली बहुत सारी बीमारियों की रोकथाम होती है। एजोटोबैक्टर सभी गैर-दलहनी फसलों में प्रयोग किया जा सकता है। जिसमें अन्न वाली फसलें, सब्जियाँ, कपास तथा गन्ना मुख्य है। सर्वप्रथम बिजेरिक ने एजोटोबैक्टर जीवाणुओं की खोज एवं उसका वर्णन किया था।

(4) एजोस्पाइरिलम (Azospirillum) : यह भी नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाला एक सूक्ष्म जीवाणु है जो गैर दलहनी पौधों के लिये लाभकारी होता है। यह सूक्ष्म जीवाणु भी जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के साथ-साथ पादप वृद्धिकारक हार्मोंस का स्राव करते हैं जो अंकुरण से लेकर पौधे की वृद्धि तक में लाभकारी होते हैं।

(5) फास्फेट घुलनशील सूक्ष्म जीव (पीएसएम) (Phosphate soluble microorganisms) : यह उन सूक्ष्म जीवों का समूह है जो कि मृदा में उपस्थित अघुलनशील फास्फेट में परिवर्तित कर उर्वरक की कार्य क्षमता को बढ़ाता है। क्षारीय मृदा में फास्फेट की उपलब्धता कम होती है। यह सूक्ष्म जीवाणु पूरी प्रक्रिया को उल्टा करने में काफी लाभकारी है। जब पीएसएम को रॉक फास्फेट के साथ उपयोग किया जाता है तो सिंगल सुपर फास्फेट की तरह फास्फेटिक उर्वरक की लगभग 50 प्रतिशत तक आवश्यकता को कम किया जा सकता है। फास्फेट को घुलनशील बनाने वाले जीवाणु का कल्चर बाजार में पीएसबी कल्चर के नाम से मिल जाता है। यह कल्चर फास्फोरस घोलने वाले जीवाणुओं का यौगिक होता है। इससे बिना प्रदूषण किये उत्पादन एवं उत्पादकता दोनों बढ़ती हैं, साथ ही मृदा का स्वास्थ्य भी बढ़ जाता है।

पीएसबी के प्रयोग से फास्फोरस तत्व को पौधे आसानी से ग्रहण कर लेते हैं। इसका प्रयोग करने से 10-20 प्रतिशत उत्पादन में वृद्धि होती है और साथ-ही-साथ मिट्टी में अनुपलब्ध फास्फोरस के उपलब्ध अवस्था में आ जाने से 30-40 प्रतिशत फास्फोरस उर्वरक की बचत की जा सकती है।

यह एक अनिवार्य एरोबिक, जैविक रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाला सूक्ष्म जीवाणु है जो अपने मेटाबोलिक गतिविधियों के द्वारा अम्ल का स्राव करता है। सभी जैविक रूप से नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले सूक्ष्म जीवाणु नाइट्रोजिनेज नामक एन्जाइम की मदद से हवा में उपस्थित 78 प्रतिशत स्थिरीकरण सामान्य नाम एवं दाब पर मेटाबोलिक प्रक्रिया के माध्यम से करते हैं। विभिन्न तरह के जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं में ऑक्सीजन के प्रति संवेदनशीलता अलग-अलग होती है। एसिटोबैक्टर गन्ने की पैदावार के लिये उपयोगी है।

(6) एक्टिनोराइजा (Actinorhiza) : एक्टिनोमाइसिट्स समूह के जीवाणु जो अदलहनी वृक्ष की जड़ों में गाँठे बनाकर नाइट्रोजन स्थिरीकरण करते हैं, एक्टिनोराइजा कहलाते हैं। फ्रन्किया इसका बहुत अच्छा उदाहरण है। फ्रन्किया 8 विभिन्न पादप कुलों की 280 से भी ज्यादा वृक्ष जातियों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करता है।

जैव उर्वरकों की प्रयोग विधि (Method of use organic fertilizers)


जैविक उर्वरकों को चार विभिन्न तरीकों से खेती में प्रयोग किया जाता है:

बीज उपचार विधि : जैव उर्वरकों के प्रयोग की यह सर्वोत्तम विधि है। ½ लीटर पानी में लगभग 50 ग्राम गुड़ या गोंद मिलाकर उबाल लेते हैं ठंडा होने के बाद उसमें जैव उर्वरक (200 ग्राम) को अच्छी तरह मिलाकर घोल बना लेते हैं। इस घोल को 10 किग्रा बीज पर छिड़ककर अच्छी तरह मिला लेते हैं जिससे प्रत्येक बीज पर इसकी परत चढ़ जाये। इसके उपरान्त बीजों को छायादार जगह में सुखा लेते हैं। उपचारित बीजों की बुवाई सूखने के तुरन्त बाद कर लेनी चाहिए।

पौध जड़ उपचार विधि : धान तथा सब्जी वाली फसलें जिनके पौधों की रोपाई की जाती है जैसे टमाटर, फूलगोभी, पत्तागोभी, प्याज इत्यादि फसलों में पौधों की जड़ों को जैव उर्वरकों द्वारा उपचार किया जाता है। इसके लिये किसी चौड़े व छिछले बर्तन में 5-7 लीटर पानी में एक किलोग्राम एजोटोबैक्टर व एक क्रिग्रा पीएसबी 250 ग्राम गुड़ के साथ मिलाकर घोल बना लेते हैं। इसके उपरान्त नर्सरी से पौधों को उखाड़कर तथा जड़ों में मिट्टी साफ करने के पश्चात 50-100 को बंडल में बाँधकर जीवाणु खाद के घोल में 10 मिनट तक डुबा देते हैं।

कन्द उपचार : गन्ना, आलू, अदरक, घुइयाँ (अरबी) जैसी फसलों में जैव उर्वरकों के प्रयोग हेतु कन्दों को उपचारित किया जाता है। एक किलोग्राम एजोटोबैक्टर व एक किग्रा पीएसबी जैव उर्वरकों को 20-30 लीटर घोल में मिला लेते हैं। इसके उपरान्त कन्दों को 10 मिनट तक डुबो देते हैं। इसके बाद तुरन्त रोपाई कर देते हैं।

मृदा उपचार विधि : 5-10 किलोग्राम जैव उर्वरक व 70-100 किग्रा मिट्टी या कम्पोस्ट का मिश्रण तैयार करके रात भर छोड़ दें। इसके बाद अन्तिम जुताई पर खेत में मिला देते हैं।

जैव उर्वरकों के उपयोग से लाभ


1. इनके प्रयोग से उपज में लगभग 10-15 प्रतिशत की वृद्धि होती है।
2. यह रासायनिक खादों विशेष रूप से नाइट्रोजन और फास्फोरस की जरूरत का 20-25 प्रतिशत तक पूरा करते हैं।
3. इनके प्रयोग से अंकुरण शीघ्र होता है तथा कल्लों की संख्या में वृद्धि होती है।
4. जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं।
5. इनके प्रयोग से गन्ने में शर्करा की, मक्का व आलू में स्टार्च तथा तिलहनों में तेल की मात्रा में वृद्धि होती है।

जैविक उर्वरकों के प्रयोग में सावधानियाँ (Precautions in the use of organic fertilizers)


1. जैव उर्वरक को छाया में सूखे स्थान पर रखें।
2. फसल के अनुसार ही जैव उर्वरक का चुनाव करें।
3. उचित मात्रा का प्रयोग करें।
4. जैव उर्वरक खरीदते समय उर्वरक का नाम बनाने की तिथि व फसल का नाम इत्यादि ध्यान से देख लें।
5. जैव उर्वरक का प्रयोग समाप्ति की तिथि के पश्चात न करें।

लेखक परिचय


श्री नरेन्द्र कुमार
शोध छात्र, पादप रोग विज्ञान विभाग, चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर 208 002 (उत्तर प्रदेश)

मो. : 09458673397,
ई-मेल : kumarnarendra6887@gmail.com


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