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जहर से कम नहीं है प्लास्टिक कचरा (Poison of plastic waste)


हमारे यहाँ यह समस्या खासकर इसलिये और भयावह शक्ल अख्तियार कर चुकी है क्योंकि देश में जारी स्वच्छता अभियान के बावजूद प्लास्टिक युक्त कचरे से क्या गाँव, क्या कस्बा, क्या नगर-महानगर, यहाँ तक कि इससे देश की राजधानी तक अछूती नहीं है। इस मामले में देश की राजधानी की हालत और बदतर है। असलियत में यहाँ जगह-जगह प्लस्टिक बैग बिखरे पड़े रहते हैं। यहाँ इसलिये इस खतरे को किसी भी कीमत पर दरगुजर नहीं किया जा सकता।

बीते दिनों देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आईवीआरआई के वैज्ञानिकों द्वारा एक बैल के लाइव आपरेशन को अपनी आँखों से देखा। ऑपरेशन के दौरान बैल के पेट से पूरे 50 किलो प्लास्टिक निकली देख प्रधानमंत्री खुद हैरान रह गए। इसके बाद उन्होंने देश के हर नागरिक से पॉलिथीन से दूर रहने की अपील की।

दरअसल जब-जब प्लास्टिक के खतरनाक पहलुओं के बारे में सोचा जाता है, तो यकायक देश की उन गायों की याद जरूर आ जाती है जो पेट में प्लास्टिक जमा हो जाने के कारण अक्सर अनचाहे मौत के मुँह में चली जाती हैं। असलियत में यह सड़क पर घूमने वाले आवारा जानवरों भले वह चाहे बैल हों, सुअर हों, सांड हों, गधे हों या फिर कोई अन्य जानवर, उनके लिये तो यह प्लास्टिक काल बन चुका है। यह समस्या अकेले हमारे देश की ही नहीं, समूचे विश्व की है।

यह समूची दुनिया के लिये गम्भीर चुनौती है। सच तो यह है कि प्लास्टिक कचरा पर्यावरण के लिये गम्भीर खतरा है। वैज्ञानिक तो बरसों से इसके दुष्परिणामों के बारे में चेता रहे हैं। अपने शोधों, अध्ययनों के माध्यम से उन्होंने समय-समय पर इससे होने वाले खतरों को साबित भी किया है और जनता को उससे आगाह भी किया है।

जहाँ तक हमारे देश का सवाल है, हमारे यहाँ यह समस्या खासकर इसलिये और भयावह शक्ल अख्तियार कर चुकी है क्योंकि देश में जारी स्वच्छता अभियान के बावजूद प्लास्टिक युक्त कचरे से क्या गाँव, क्या कस्बा, क्या नगर-महानगर, यहाँ तक कि इससे देश की राजधानी तक अछूती नहीं है। इस मामले में देश की राजधानी की हालत और बदतर है। असलियत में यहाँ जगह-जगह प्लस्टिक बैग बिखरे पड़े रहते हैं। यहाँ इसलिये इस खतरे को किसी भी कीमत पर दरगुजर नहीं किया जा सकता।

विडम्बना यह कि प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पाबन्दी है। लेकिन इसके बावजूद इसका इस्तेमाल बदस्तूर जारी है। इस बाबत राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने कड़ा ऐतराज जताया है। न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने तो पाबन्दी के बावजूद राष्ट्रीय राजधानी में प्लास्टिक के व्यापक और अन्धाधुन्ध इस्तेमाल तथा जगह-जगह प्लास्टिक के बिखरे फैले थैलों पर दिल्ली सरकार को पिछले दिनों कड़ी फटकार लगाई है। उन्होंने निर्देश दिया है कि वह उसके प्रतिबन्ध को राजधानी में तत्काल लागू करवाए और इस मामले में स्थिति की रिपोर्ट शीघ्रतिशीघ्र प्रस्तुत करे। पीठ ने कहा है कि जब प्लास्टिक पर प्रतिबन्ध है तो क्या कारण है कि आप उसे सख्ती से लागू क्यों नहीं करवा रहे हैं।

हमारे देश में आजकल एक ओर तो सफाई अभियान का डंका पीटा जा रहा है। प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यों के मंत्री, राष्ट्रीय से लेकर गली-मोहल्ले के भारतीय जनता पार्टी के नेता- पदाधिकारी-कार्यकर्ता बड़ी-बड़ी झाड़ू लेकर सड़कों पर झाड़ू लगाते-फोटो खिंचवाते नजर आ रहे हैं, अखबारों में बड़े-बड़े फोटो के साथ विज्ञापन प्रकाशित करवाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जगह-जगह गलियों के नुक्कड़ों पर पड़े प्लास्टिक युक्त कूड़े के ढेरों पर आवारा मवेशियों के झुंड-के-झुंड मुँह मारते देखे जा सकते हैं।

नतीजतन गन्दगी और प्लास्टिक युक्त कूड़ा-कचरा सड़क पर फैला रहता है जिस पर अक्सर मक्खी-मच्छर और कीड़े-मकोड़े भिनभिनाते रहते हैं जो अनेकों गम्भीर बीमारियों का सबब बनता है। सबसे अधिक दुखदायी बात तो यह है कि इस बाबत स्थानीय निकाय कतई गम्भीर नहीं दिखाई देते हैं। ऐसा लगता है कि सुअर, बैल आदि आवारा मवेशियों और उनके पालकों पर सरकार और स्थानीय निकायों का कोई अंकुश ही नहीं है। सरकार और स्थानीय निकायों लापरवाही इस समस्या की विकरालता में अहम भूमिका निभाती है। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता।

देखा जाये तो प्लास्टिक कचरे के दुष्प्रभाव से हमारे समुद्र भी अछूते नहीं हैं। समुद्र में जिस तेजी से प्लास्टिक कचरा जमा हो रहा है, उससे समुद्री नमक जहरीला होता जा रहा है। ब्रिटेन सहित बहुतेरे यूरोपीय देशों, अमरीका, फ्रांस, मलेशिया और चीन में बाजारों में बिकने वाले समुद्री नमक में प्लास्टिक के सूक्ष्म कण कहें या टुकड़े पाये गए हैं। वैज्ञानिक जाँच में खुलासा हुआ है कि समुद्र में पहुँच रहा प्लास्टिक का कचरा हमारे खाने में पहुँच रहा है। पूर्व में हुए शोध-अध्ययन प्रमाण हैं कि ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय मुल्कों के समुद्री तटों पर पकड़ी गई मछलियों के पेट में प्लास्टिक के कण पाये गए हैं।

शोधकर्ता वैज्ञानिक यह मानते हैं कि समुद्र में होने वाले इस प्रदूषण के लिये माइक्रोफाइबर और पानी की प्लास्टिक की बोतलें प्रमुख रूप से जिम्मेवार हैं जो एक बार इस्तेमाल कर फेंक दी जाती हैं। जापान और दक्षिण एशियाई देशों की मछलियों के पेट में भी माइक्रोप्लास्टिक पाया गया है।

टोक्यो यूनीवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी में जैविक रसायन विज्ञान प्रयोगशाला के प्रमुख प्रोफेसर हीदेशिगे तकादा कहते हैं कि जब हम मछली खाते हैं तो सम्भव है कि हम प्लास्टिक भी खाते हों। वे कहते हैं कि मुझे टोक्यो की खाड़ी की 80 फीसदी मछलियों के पेट में माइक्रोप्लास्टिक मिली है।

इस बारे में फ्लोरिडा स्थित स्टेट यूनीवर्सिटी ऑफ न्यूयार्क की प्रोफेसर शेरी मेसन कहती हैं कि प्लास्टिक हमारे समाज में व्यापक रूप से मौजूद है। इसे यदि यूँ कहा जाये कि यह अब हमारे समाज में रच-बस गया है तो कुछ गलत नहीं होगा। यह सर्वव्यापी है। यह हवा, पानी, समुद्री भोजन और बीयर से लेकर नमक तक में अपनी पहुँच बना चुका है। नतीजतन यह पर्यावरण में व्यापकता से फैलकर उसे प्रदूषित कर मानव के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। अध्ययन के अनुसार अमरीका के लोग हर साल 660 से ज्यादा प्लास्टिक के कण निगल रहे हैं। गौरतलब है कि प्लास्टिक एक बार समुद्र में पहुँचने के बाद बिषाक्त पदार्थों और प्रदूषकों के लिये चुम्बक बन जाता है।

यह अध्ययन साबित करते हैं कि प्लास्टिक कचरे के चलते समुद्र में मछलियों का जीवन भी सुरक्षित नहीं है। जहाँ तक माइक्रोप्लास्टिक का सवाल है, यह आमतौर पर कचरे जैसे कि प्लास्टिक के थैलों, बोतलों के ढक्कन और डिब्बों के जलप्रवाह और पराबैंगनी किरणों के टूटने तथा कॉस्मेटिक्स एवं टूथपेस्ट में भारी मात्रा में इस्तेमाल किये जाने वाले माइक्रोबीड्स के कारण आते हैं। वे खतरनाक रसायनों को अवशोषित कर लेते हैं और पक्षी एवं मछलियाँ जब इन्हें खा लेती हैं तो यह उनके शरीर में चला जाता है।

आर्कटिक सागर के बारे में ताजा अध्ययन प्रमाणित करता है कि आने वाले तीन दशक बाद इसमें प्लास्टिक तो ज्यादा होगी लेकिन मछलियों के दर्शन दुर्लभ हो जाएँगे। कहने का तात्पर्य यह कि इस सागर में उस समय मछलियों की तादाद बहुत कम होगी। अध्ययन की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस सागर में अलग-अलग धाराओं से आकर बहुत बड़ी मात्रा में बरसों से प्लास्टिक के छोटे-बड़े टुकड़े लगातार जमा हो रहे हैं। इनकी मात्रा तकरीब 100 से 1200 टन आँकी जा रही है।

ग्रीनलैंड के समुद्र में इनकी तादाद बहुतायत में है। आशंका जताई जा रही है कि आर्कटिक सागर में प्लास्टिक के टुकड़ों का तेजी से बढ़ने के कारण आस-पास के देशों का समुद्री प्रदूषण हो सकता है। अब तक के अध्ययनों से यह साबित हो गया है कि दुनिया के महासागरों में साल 2010 तक तकरीब 80 लाख मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा मिल चुका है और दिन-ब-दिन इसमें बढ़ोत्तरी जारी है जो खतरनाक संकेत है।

इस बारे में जार्जिया यूनीवर्सिटी की प्रोफेसर जेना जैमबेक का कहना है कि अधिकांशतः प्लास्टिक का जैविक क्षरण नहीं होता। यही वह अहम वजह है कि आज पैदा किया गया प्लास्टिक कचरा सैकड़ों-हजारों साल तक हमारे साथ बना रहेगा जो हमारे जीवन और पर्यावरण से खिलवाड़ करता रहेगा जिसकी भरपाई असम्भव होगी। ऐसे में हमें इसके उत्पादन और निस्तारण को लेकर गम्भीरतापूर्वक विचार किये जाने की बेहद जरूरत है। इसमें दो राय नहीं कि धरती पर प्लास्टिक जितना कम होगा, उतना ही वह समुद्र में कम पहुँचेगा। इसलिये यदि समुद्र में प्लास्टिक कम करना है तो हमें धरती पर उसका इस्तेमाल कम करना होगा।

चूँकि समुद्र का प्रदूषण धरती के प्रदूषण का ही विस्तार है। इसलिये यह हमारे जीवन के लिये धरती के प्रदूषण से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। उस स्थिति में जबकि आज दुनिया प्लास्टिक कचरे के ढेर में तब्दील हो चुकी है। इसमें किंचित भी सन्देह नहीं है कि समुद्र तभी स्वच्छ रह पाएगा जबकि धरती प्रदूषण मुक्त हो। प्लास्टिक तो एक कारक है।


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