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पानी- एक ने बनाया रोजगार तो दूसरे ने बनाया समाचार


त्रिलोक बिष्ट के घर के पीछे बनाया गया रेनवाटर हार्वेस्टिंग टैंकत्रिलोक बिष्ट के घर के पीछे बनाया गया रेनवाटर हार्वेस्टिंग टैंकउत्तराखण्ड हिमालय में अब पेयजल का संकट होना लाजिमी है। क्योंकि जनसंख्या का बढ़ना और प्राकृतिक संसाधनों का अवैध दोहन, पानी की समस्या को खड़ा कर रहे हैं। इस संकट से निजात पाने के लिये सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर कई योजनाएँ बनी हैं, परन्तु गर्मी आरम्भ होते ही पानी के लिये चारों तरफ हाहाकार मचा रहता है।

इस बीच कुछ सिरफिरे लोग हैं, जो पेयजल मुहैया कराने बाबत जल-प्रबन्धन के नए आयाम स्थापित कर रहे हैं। हालांकि उनके तरीके आधुनिक नहीं हो सकते हैं, मगर लोगों के हलक ‘तर’ करने में वे सौ फीसदी साबित हो रहे हैं। राज्य के पौड़ी जनपद अन्तर्गत किमसार एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ पानी की समस्या सदियों से चली आ रही है।

इस क्षेत्र के दर्जनों गाँव ऐसे हैं जहाँ की महिलाओं के सिर पर पानी ढोते-ढोते स्थायी निशान हो चुके हैं। इस हालात पर रामजीवाला गाँव के एक सेवानिवृत्त फौजी और एक गाँव के युवा ने पिछले 12 वर्षों से लोगों को पानी उपलब्ध करवाने की अनूठी पहल की है। दोनों की पहल अलग-अलग है।

उल्लेखनीय हो कि 12 वर्ष पहले जब त्रिलोक सिंह बिष्ट सेवानिवृत होकर गाँव लौटे तो उन्हें गाँव में पानी की समस्या वैसे ही नजर आई जैसे वे सरकारी सेवा में जाने से पूर्व भोगकर गए थे। वे तो सेवानिवृत्ति के बाद गाँव में आराम फरमाना चाहते थे, गाँव के अन्य विकास कार्यों में लोगों के साथ हाथ बँटाना चाहते थे। अतएव उन्हें तो जल संरक्षण के काम में हाथ डालना पड़ा।

गाँव में पानी की विकराल समस्या को देखते हुए एक बारगी वे अपने जनप्रतिनिधियों को कोसने लगे, परन्तु उन्हें लगा कि विरोध करने से काम नहीं चलने वाला, बजाय इसके वे जल संरक्षण के कामों में हाथ अजमाएँ। उन्हें तो जल संरक्षण की सीख आर्मी में रह-रहकर मिल चुकी थी। इसलिये उन्होंने अपने रामजीवाला गाँव में सेवानिवृत्ति के बाद पहला निश्चय तो ऐसा ही किया कि वे गाँव में ही रहेंगे, वे शहर नहीं जाएँगे। दूसरा यह कि गाँव में रहकर ही जल संरक्षण के कामों को आगे बढ़ाएँगे ताकि कम-से-कम उनके गाँव के लोग पानी की समस्या से निजात पा सकें। हुआ भी ऐसा ही।

आर्मी से अवकाश प्राप्त त्रिलोक सिंह बिष्ट अब गाँव में ही रह रहे हैं। और अपने घर-गाँव में जल संरक्षण के तौर-तरीके पर लगातार काम कर रहे हैं। पहले उन्होंने खुद के मकान की छत को ठीक किया। छत पर विधिवत पतनाले लगवाए, जिससे बरसात का पानी एक साथ बहकर आये और एक ही जगह पर एकत्र हो सके। घर के आस-पास परम्परागत चाल-खाल का निर्माण किया।

रामजीवाला गाँव में त्रिलोक बिष्ट का घरइस तरह से वे बरसात के पानी का भरपूर उपयोग करने में सफल हो रहे हैं। यही वजह है कि वे अपने घर के आस-पास की जमीन पर बरसात के पानी से ही सिंचाई करते हैं तो पीने के अलावा जितने भी पानी के उपयोग की आवश्यकता होती है वह बरसात के पानी से ही पूरी करते हैं। घर की छत, शौचालय की छत के पानी को वह अलग-अलग टंकियों तक पहुँचाते हैं।

कुल मिलाकर इस क्षेत्र का इसे पहला ‘मॉडल’ कह सकते हैं जहाँ सौ फीसदी वर्षाजल का उपयोग हो रहा है। इनकी देखा-देखी में गाँव के अन्य लोगों ने अपने सामर्थ्य अनुकूल श्री बिष्ट का अनुसरण किया तो गाँव में अधिकांश पानी की समस्या दूर होती गई। बता दें कि श्री बिष्ट के घर में हर वक्त 20 हजार ली. वर्षाजल एकत्रित रहता ही है।

काबिलेगौर हो कि रही-सही कसर को पूरा करने के लिये इसी रामजीवाला गाँव के एक युवक ने कमर कस दी। वह पानी संरक्षण का काम तो नहीं कर पाया परन्तु पानी को गाँव तक पहुँचाने का तरीका ढूँढ निकाला। रामजीवाला गाँव के 36 वर्षीय धर्मानन्द शुक्ला ने पहले-पहल एक घोड़ा खरीदा और उसके सहारे कनस्तरों से गाँव तक पानी पहुँचाया। वे 40 ली. पानी का भाड़ा मात्र 20 लेता है। इस प्रकार गाँव का प्रत्येक परिवार शुक्ला से 40 ली. पानी तो खरीदता ही है। परन्तु शुक्ला ने आरम्भ में प्रत्येक परिवार की पेयजल आपूर्ति इसलिये नहीं कर पाई कि उनके पास पानी को एकत्रित करने की कोई उचित जगह नहीं थी। धीरे-धीरे वह अपने घर-पर ही पानी को जमा करने के लिये प्लास्टिक के बर्तनों को प्रयोग करने लगे, फिर एक फेरोसीमेंट टैंक बनवाया।

पिछले वर्ष ‘हिमकॉन संस्था व एक्वामाल वाटर सोल्यूशन लिमिटेड’ देहरादून के संयुक्त सहयोग से उनके घर में 5000 ली. का एक टैंक बनवाया गया। जिसमें वह वर्षाजल को भी एकत्रित करता है और स्रोत से ढोया गया पानी को भी जमा करता है। इसके अलावा उसके पास पानी को जमा करने के लिये 40-40 ली. के 32 कैन अलग से हैं। श्री शुक्ला गाँव से तीन किमी दूर ‘पाणी की सार’ नामक तोक पर स्थित जलस्रोत से दिन में चार राउंड घोड़े से ढोते हैं। 36 वर्षीय धर्मानन्द शुक्ला कहते हैं कि उनका तो गाँव में लोगों को पानी पिलाने का ही धन्धा है। वह पिछले 10 सालों से ‘पानी ढोने’ का काम कर रहे हैं। मौजूदा समय में उनके पास दो खच्चर है। दोनों खच्चरों के पीठ पर ‘पाणी की सार जलस्रोत से रामजीवाला गाँव’ तक 140 ली. पानी एक बार में ढोता है। जिसकी कीमत वे लोगों से 90 रु. लेता है। कुछ लोग उनसे दो ही कैन लेते हैं तो उनसे 45 रु. लेना होता है। कहते हैं कि अब तो उनके घर पर टैंक बन चुका है। इसमें बरसात का पानी भी संग्रहित करुँगा और अन्य टैंकों में भी। आगे बताता है कि जिस पानी को वह संग्रहित करेगा उसे लोगों को 45 रु. के हिसाब से दो कैन यानि 70 ली. पानी देगा। वे नियमित 16 कैन पानी अपने खच्चरों से ‘पाणी की सार’ जलस्रोत से गाँव तक ढोता है और अलग-अलग लोगों को माँग के अनुरूप पानी उपलब्ध करवाता है। इस प्रकार से 720 रु. प्रतिदिन उसकी आमदनी हो जाती है।

रामजीवाला गाँव का दृश्य

अब प्रत्येक परिवार के पास एक फेरोसीमेंट टैंक


हिमकॉन संस्था ने एक्वामाल वाटर सोल्यूशन लिमिटेड देहरादून के सहयोग से रामजीवाला गाँव में 5000-5000 ली. के 36 फेरोसीमेंट टैंक गाँव में गठित स्वयं सहायता समूह के सदस्यों के मार्फत हर घर बाबत बनवाए गए। अब तो ग्रामीण फूले नहीं समा रहे हैं कि संस्था द्वारा उनके घर में 5000 ली. की टंकी जो बन गई। इसलिये कि उनके घर में अब सर्वाधिक वर्षाजल का संग्रहण होगा। उधर त्रिलोक बिष्ट का कहना है कि टंकी बनने के बाद उनके घर पर वर्षाजल का 25 हजार ली. का बैंक बन चुका है। हिमकॉन संस्था के राकेश बहुगुणा का कहना है कि इस गाँव की पेयजल समस्या बहुत पुरानी है। गाँव में जागरुकता आ गई है कि लोग वर्षाजल को संग्रहित कर रहे हैं। ग्रामीणों के टैंक साल में दो बार की वर्षा से लबालब भरे रहते हैं। इन टैंकों के साथ एक-एक फिल्टर भी लगा रखे हैं ताकि लोग इस पानी को पीने के लिये इस्तेमाल कर सकें।

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