राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र में जल विरासत - 12वीं सदी से 18वीं सदी तक (Water heritage in Hadoti region of Rajasthan - 12th Century to 18th Century)

Submitted by Hindi on Wed, 10/25/2017 - 10:25
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Source
इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग, समाज विज्ञान संकाय, वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान-304022, शोध-प्रबन्ध 2015

परिचय


जल विधाता की प्रथम सृष्टि है। विधाता ने सृष्टि की रचना करने से पहले जल बनाया फिर उसमें जीवन पैदा किया। मनुस्मृति कहती है ‘‘अप एवं सर्सजादो तासु बीज अवासृजन’’ जल में जीवन के बीज विधाता ने उगाये। जल प्रकृति का अलौकिक वरदान स्वरूप मानव, प्राणी तथा वनस्पति सभी के लिये अनिवार्य है।

आज सम्पूर्ण प्राणी जगत् जल का ही विकसित रूप माना जा सकता है। विश्व की सभी सभ्यताएँ नदियों के किनारे पनपी हैं, जल की अपार उपलब्धियों ने कृषि व व्यापार को विस्तार दिया है, जिससे सुविधा सम्पन्न सभ्यताएँ कला, संस्कृति एवं साहित्य से जुड़ गई, जिससे वह देश व राज्य सब तरह से सम्पन्न हो गया।

आज के इस विकसित युग में नवीन तकनीकों के विकास ने हमारी पुरातन जल-विरासत को नजरअन्दाज कर दिया है, जिस कारण प्राकृतिक प्रकोप, तापक्रम का बढ़ना, जलप्रदूषण, कुपोषण जैसे घातक प्रभाव अब हमारे सामने आने लगे हैं। वर्षा की अनिश्चितता एवं जल की कमी होने पर हमें बार-बार अपने परम्परागत तरीके याद आते हैं, परन्तु फिर भी हम उन्हें संरक्षित कर अपनाने का प्रयास नहीं कर पा रहे है। इन्ही सबका सूक्ष्म अध्ययन करने का प्रयास इस शोध में किया है। यह रिसर्च छः अध्यायों में विभाजित है।

अध्याय क्रम इस प्रकार हैं -
1 - हाड़ौती का भूगोल एवं इतिहास (Geography and history of Hadoti)
2 - हाड़ौती क्षेत्र में जल का इतिहास एवं महत्त्व ( History and significance of water in the Hadoti region)
3 - हाड़ौती क्षेत्र में जल के ऐतिहासिक स्रोत ( Historical sources of water in the Hadoti region)
4 - हाड़ौती के प्रमुख जल संसाधन ( Major water resources of Hadoti)
5 - हाड़ौती के जलाशय निर्माण एवं तकनीक ( Reservoir Construction & Techniques in the Hadoti region)
6 - उपसंहार

प्रथम अध्याय में हाड़ौती का भौगोलिक वर्णन किया गया है, जिसमें हाड़ौती का भूगोल, जलवायु, पहाड़, दर्रों से लेकर हाड़ौती शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में प्रकाश डाला है। इसके अतिरिक्त हाड़ौती के ऐतिहासिक परिदृश्य में शासकों की वंशावली व उनके कार्यो का वर्णन है।

द्वितीय अध्याय में जल का इतिहास एवं उसके महत्त्व का वर्णन किया गया है, जिसमें जल की उत्पत्ति, विशेषताओं, जलचक्र एवं जल के महत्त्व को दर्शाते हुए जल की पारंपरिक विधियों का वर्णन किया गया है।

तृतीय अध्याय में हाड़ौती क्षेत्र के जल के ऐतिहासिक स्रोतों के प्रकार एवं महत्त्व का विवेचन किया गया है जिसमें हाड़ौती के शिलालेख, अभिलेखागारीय जलस्रोत एवं समसामयिक ग्रंथों की विस्तृत व्याख्या की गई है।

चतुर्थ अध्याय हाड़ौती क्षेत्र के जल संसाधन में हाड़ौती के जलाशयों का विवेचन किया गया है, जो बून्दी नरेशों की जन-कल्याण की भावना को प्रदर्शित करते हैं साथ ही इनके निर्माण के उद्देश्य को उजागर करते हैं।

पंचम अध्याय में हाड़ौती के जलाशयों का निर्माण एवं तकनीकी पहलुओं को शामिल किया गया है, जिसमें जलाशयों एवं बावड़ियां के स्थापत्य एवं कलात्मक निर्माण में प्रयुक्त सामग्रियों एवं उपलब्धियों पर प्रकाश डाला गया है।

षष्टम अध्याय उपसंहार में शोध प्रबन्ध का सारांश, शोध के निष्कर्षों एवं जल के महत्व को शामिल किया गया है। सार रूप में यह शोध हाड़ौती के जलस्रोतों की विभिन्न दशाओं का आलेखन है।

मैं कृतज्ञ हूँ अपने शोध निर्देशक डॉ. पेमाराम जी पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, इतिहास विभाग, वनस्थली विधापीठ की जिन्होंने अपने मार्गदर्शन में मेरा यह शोध-प्रबन्ध पूर्ण करवाया। शोध सामग्री जुटाने में राजस्थान राज्य अभिलेखागार बीकानेर के निर्देशक श्री महेन्द्र खडगावत ,सहायक निदेशक पूनम चन्द्र जोहिया, कोटा की निदेशक सविता चौधरी, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान कोटा के वरिष्ठ शोध अधिकारी श्री ख्यालीराम मीणा, निदेशालय पुरातत्व एवं संग्रहालय, जवाहर कला केन्द्र जयपुर एवं जिला पुस्तकालय बून्दी के पुस्तकालयाध्यक्षों को विस्मृत नहीं किया जा सकता।

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