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तालाबों का राम-दरबार


वर्षाकाल मेघ नभ छाए
गरजत लागत परम सुहाए

सिमट सिमट जल भरहिं तलावा
जिमी सद्गुण सज्जन पहिं आवा


पानी समिति और समाज ने अपनी इन रचनाओं का नाम राम सागर-लक्ष्मण सागर- भरत सागर और शत्रुघ्न सागर के नाम पर रखा। तालाब बनने के बाद गाँव में पानी से सुकून आ गया। पिछले तीन सालों से यहाँ सारस इन तालाबों पर आ रहे हैं। पानी रुकने के बाद जलमुर्गी, बगुले और लोमड़ियाँ भी दिखाई देने लगी हैं। बंजर जमीन की तस्वीर बदलने और बूँदों को ज्यादा-से-ज्यादा गाँव का मेहमान बनाने के लिये 40 हेक्टेयर क्षेत्र में पड़त भूमि विकास कार्यक्रम की शुरुआत की गई। यहाँ बड़े पैमाने पर कंटूर ट्रेंचेस खोदे गए। रामचरितमानस के किष्किन्धाकांड में बरसात की बूँदों का ‘जीवन-दर्शन’ वर्णित है। कैसे पहाड़ इन बूँदों का स्वागत करते हैं, कैसे बिजली का चमकना हमारे जीवन की घटनाओं से जुड़ा है, कैसे नदी-नाले गहराई के अभाव में उफनते हैं, तो कैसे सज्जनों और तालाबों में गुणों की समानता होती है- आदि को अनेक उदाहरणों के साथ समझाया गया है…!

...आपने राम दरबार के दर्शन तो अवश्य किये होंगे!

...लेकिन कभी तालाबों का राम दरबार देखा है?

...उज्जैन-देवास मार्ग पर सात किलोमीटर भीतर चार हजार की आबादी वाले गाँव पिपलौदा द्वारकाधीश में तालाबों का यह रूप आप देख सकते हैं।

इस गाँव की कहानी कुछ यूँ है कि किसी जमाने में यहाँ घने जंगल हुआ करते थे। पानी भी पर्याप्त था। यहाँ इस वजह से सारस आया करते थे, लेकिन जंगलों के कटने और पानी के खत्म होते ही वे प्राणी लुप्त प्राय हो गए।

पिछले कुछ सालों से समाज ने यहाँ करवट बदली। वाटर मिशन के तहत जागृति का एक दौर चला। पिपलौदा द्वारकाधीश में सूखे से लड़ने के लिये चार तालाब बनाए गए। पहला तालाब 40 हेक्टेयर क्षेत्र में बनाया गया।

पानी समिति और समाज ने अपनी इन रचनाओं का नाम राम सागर-लक्ष्मण सागर- भरत सागर और शत्रुघ्न सागर के नाम पर रखा। तालाब बनने के बाद गाँव में पानी से सुकून आ गया। पिछले तीन सालों से यहाँ सारस इन तालाबों पर आ रहे हैं। पानी रुकने के बाद जलमुर्गी, बगुले और लोमड़ियाँ भी दिखाई देने लगी हैं।

बंजर जमीन की तस्वीर बदलने और बूँदों को ज्यादा-से-ज्यादा गाँव का मेहमान बनाने के लिये 40 हेक्टेयर क्षेत्र में पड़त भूमि विकास कार्यक्रम की शुरुआत की गई। यहाँ बड़े पैमाने पर कंटूर ट्रेंचेस खोदे गए। इस क्षेत्र में 14 हजार पौधे लगाए गए। यहाँ पानी रोकने से रबी की फसल का उत्पादन बीस फीसदी बढ़ा है। वर्षाकाल के लम्बे समय बाद भी यहाँ इसी पानी की वजह से चारों ओर हरियाली छाई हुई है।

तालाबों के अलावा यहाँ 30 डबरियाँ- एक स्टॉपडैम भी बने हैं। इसके अलावा ट्यूबवेल रिचार्जिंग के काम भी किसानों ने किये हैं।

...हम इस समय लक्ष्मण सागर की पाल पर खड़े हैं। राम सागर का यह ‘छोटा भाई’ ही है। यहाँ 70 हेक्टेयर राजस्व भूमि है और 40 हेक्टेयर पर समाज ने इस तालाब को बनाया है।

...लक्ष्मण तालाब के लिये गाँव वालों ने एक बरसाती नाले से रुकने की मनुहार की। स्थानीय समाज ने तालाब निर्माण में श्रमदान भी किया और मिट्टी निकालने के लिये अपने ट्रैक्टर लगाए।

पानी समिति अध्यक्ष जसवंत सिंह पंवार, सचिव मनोहर सिंह पांचाल, रामनिवास, देवेन्द्र सिंह, राजाराम, बाबूभाई, कृष्णसिंह कुमावत आदि के साथ समाज के अनेक लोग जुट गए।

गाँव के रामचन्दर कहने लगे- “तालाब बनने के बाद गाँव के ट्यूबवेल बढ़िया चल रहे हैं। हमारे पशु भी अब पानी के मामले में तो मजे में हैं। कुँओं में भी पानी अच्छा आ गया है।” शिवनारायण का कहना है- “पहले कुओं में मोटर केवल दो घंटे चलती थी, अब 8 से 10 घंटे तक चल रही है।”

गाँव का समाज पानी के लिये कैसे जागा?

एम.एल. वर्मा और उदयराज पंवार कहते हैं- “गाँव में वाटर मिशन के बारे में विस्तार से बताया और आस-पास के गाँवों की मिसाल देकर बताया गया कि पानी रोकने से कैसे गाँव में खुशहाली आ जाएगी। गाँव में वाटर मिशन के प्रति आस्था जागे इसके लिये स्कूल की बाउण्ड्रीवाल तैयार भी कराई गई। दो मोहल्लों में सड़क की समस्या थी, सो सीमेंटीकरण भी किया गया। गाँव वालों ने इन सब कार्यों में उत्साह से भाग लिया।”

...इस गाँव की और विशेषताएँ जानना चाहेंगे?

...यहाँ गाँव-समाज मेड़बंदी, चराईबंदी, शराबबंदी और नसबंदी पर जोर दे रहा है।

...शराब दुकानें गाँव में बन्द करवा दी गई हैं।

...सार्वजनिक रूप से पानी आन्दोलन के बाद कोई शराब पीता नहीं दिखता है।

...गाँवों में पौधारोपण की लहर चली है। कुल 22 हजार पौधे लगाए हैं। जितेन्द्र सिंह पंवार, देवेन्द्र सिंह, रामनिवास कुमावत आदि ने तो पाँच-पाँच सौ से ज्यादा के पौधे लगाए हैं।

...आखिर गाँव बदलेगा क्यों नहीं?

...यहाँ अकेले राम नहीं, तालाबों का राम-दरबार जो तैयार हो गया है!!

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