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समुद्री खारे पानी को मीठा बनाने का उपहार


दुनिया के वैज्ञानिक इन कोशिशों में लगे हैं कि खारे पानी को मीठा बनाने के सरल व सुविधायुक्त संयंत्र ईजाद कर लिये जाएँ। लेकिन अभी इजराइल जैसी सफलता किसी अन्य देश को नहीं मिली है। ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के वैज्ञानिकों के एक दल ने ग्रैफीन की एक ऐसी चलनी विकसित की है, जो समंदर के खारे पानी से नमक को अलग कर देती है। ग्रैफीन ग्रेफाइट की पतली पट्टी जैसा तत्व है, जिसे प्रयोगशाला में आसानी से तैयार किया जा सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा के दौरान उन्हें हमने वहाँ के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ समुद्र में एक विशिष्ट जीप में बैठे देखा था। यह जीप समुद्र के पानी में चलते हुए समुद्री खारे जल को मीठे पेयजल में बदलने का अचरज भरा काम करती है। इस जल को दोनों प्रधानमंत्रियों ने पिया भी था। अब नेतन्याहू ने भारत यात्रा पर आकर यह जीप भारत को भेंट कर दी है।

इस जीपनुमा संयंत्र से गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) उपयोग करेगा। समुद्री पानी को मीठा बनाने का काम तो यह संयंत्र करेगा ही, बाढ़ के समय भी पानी को शुद्ध इस संयंत्र से किया जाएगा। अब भारत को चाहिए कि इस संयंत्र से तकनीक को हासिल कर समुद्र तटीय इलाकों में खारे पानी को मीठा करने के व्यापक उपाय हों। 71 लाख की कीमत वाले इस संयंत्र से एक दिन में 20000 लीटर पानी शुद्ध किया जा सकता है।

पूरी दुनिया समुद्र के पानी को मीठे जल में परिवर्तित करने की तकनीक की खोज में लगी है, लेकिन इजराइल के अलावा अन्य किसी देश को इस तकनीक के आविष्कार में अब तक सफलता नहीं मिली है। भारत भी इस प्रौद्योगिकी की खोज में लगा है, लेकिन असफल ही रहा।

प्राचीन काल में समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाए जाने के प्रयास लंका सम्राट रावण ने किये थे, पर सफलता नहीं मिली। दुनिया के आधुनिक वैज्ञानिक लगातार इन कोशिशों में लगे हैं कि समुद्र के खारे पानी को पीने के लायक बना लिया जाये, जिससे भविष्य दृष्टाओं द्वारा इस सदी में पानी के लिये तीसरे विश्व युद्ध की जो आशंकाएँ जताई जा रही हैं, उन पर पूर्ण विराम लग सके।

भारत में खारा पानी मीठे में कब तब्दील होगा, इसके बारे में फिलहाल कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता, लेकिन मुम्बई और समुद्र तटीय महानगरों में गहराई से जल दोहन की वर्तमान स्थिति अनवरत रही तो कई महानगरों का पीने योग्य पानी जरूर, आने वाले एक-दो दशकों में खारा हो जाएगा। मीठे पानी में खारे जल का विलय एक आसन्न खतरा है, जिस पर विचार किया जाना जरूरी है।

दुनिया में इजराइल इकलौता देश है, जिसने समुद्र के खारे पानी को पीने लायक बनाने की तकनीक ईजाद की है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 2050 तक जब विश्व की 40 फीसदी आबादी जल संकट भोग रही होगी, तब भी इजराइल में पीने के पानी का संकट नहीं होगा। इजराइल न सिर्फ हथियारों, बल्कि पानी के मामले में भी महाशक्ति बनकर उभरा है।

पीएम मोदी ने तेलअवीव के डोर तट पर समुद्र के पानी को तत्काल पीने लायक बनाने वाले संयंत्र का अवलोकन किया था। यह संयंत्र ‘गेलमोबाइल वाटर फिल्ट्रेशन प्लांट’ कहलाता है। यह चलित फिल्टर प्लांट है। नेतन्याहू इसे ‘फ्यूचर जीप’ कहते हैं। वहीं मोदी ने इसे बेजोड़ वाहन बताते हुए कहा कि प्राकृतिक आपदा के वक्त यह संयंत्र बेहद उपयोगी हो सकता है। क्योंकि आधे से ज्यादा भारत बारिश में बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा में डूबा दिखाई देता है। भारत अब इस संयंत्र का निर्माण कर बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में भेज सकता है।

हालांकि दुनिया के वैज्ञानिक इन कोशिशों में लगे हैं कि खारे पानी को मीठा बनाने के सरल व सुविधायुक्त संयंत्र ईजाद कर लिये जाएँ। लेकिन अभी इजराइल जैसी सफलता किसी अन्य देश को नहीं मिली है। ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के वैज्ञानिकों के एक दल ने ग्रैफीन की एक ऐसी चलनी विकसित की है, जो समंदर के खारे पानी से नमक को अलग कर देती है। ग्रैफीन ग्रेफाइट की पतली पट्टी जैसा तत्व है, जिसे प्रयोगशाला में आसानी से तैयार किया जा सकता है।

ग्रैफीन ऑक्साइड से निर्मित यह छलनी समुद्र के पानी से नमक अलग करने में सक्षम है। लेकिन इससे उत्पादन बहुत महंगा पड़ता है। वैज्ञानिकों के इस दल का नेतृत्व डॉ. राहुल नायर ने किया है। इस आविष्कार से सम्बन्धित शोध-पत्र को ‘साइंस जर्नल नेचर नैनोटेक्नोलॉजी’ छापा है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने उपरोक्त तकनीक की तुलना में बेहद सस्ती तकनीक से खारे पानी को मीठे पानी में बदलने का दावा किया है। इस तकनीक को ‘इंटरडिस्पिलनरी नैनो टेक्नोलॉजी सेंटर’ के निदेशक प्रो, अबसार अहमद ने अंजाम दिया है। उन्होंने इंडोफिटिक फंजाई (फंगस) से पोरस नैनो सामग्री तैयार की, इसकी माप नैनो मीटर से होती है। यह फंगस खाने-पीने की वस्तुओं में आसानी से मिल जाते हैं। अहमद बताते है कि फंगस के मेमरेन (बायोमास) में पहले छेद किया गया।

छेद का व्यास नैनो मीटर से तय किया गया। छेद युक्त इन नैनो पार्टिकल्स (सूक्ष्म कण) से केवल पानी ही रिस कर बाहर निकला है अन्य लवणयुक्त कण फंगस के ऊपर ही रहे जाते हैं। इस पानी को साफ करने के लिये विशेष प्रकार का फिल्टर बनाया जाएगा, जिसमें नैनो सामग्री डाली जाएगी। जब खारे पानी को यहाँ से प्रवाहित किया जाएगा तो वह शुद्ध होकर निकलेगा। खारे पानी में नमक 70-80 नैनो मीटर, बैक्टीरिया 2000 नैनो मीटर और फंगस 5000 नैनो मीटर होते है, जिन्हें नैनो सामग्री शुद्ध पानी के साथ नहीं निकलने देते हैं। इस तकनीक से 100 लीटर पानी को शुद्ध करने के लिये मात्र 50 ग्राम सूक्ष्म कणों की जरूरत पड़ेगी।

पृथ्वी का 71 प्रतिशत हिस्सा पानी में डूबा हुआ है। 1.6 प्रतिशत पानी धरती के नीचे है और 0.001 फीसद वाष्प और बादलों के रूप में है। पृथ्वी की सतह पर जो पानी है, उसमें 97 प्रतिशत सागरों और महासागरों में है, जो नमकीन होने के कारण पीने लायक नहीं है। कुल उपलब्ध पानी में से केवल तीन प्रतिशत पानी ही पीने योग्य है। इसमें से 2.4 फीसदी हिमखण्डों के रूप में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर बर्फ के रूप में जमा हुआ है।

भूजल भण्डारों का बेइन्तहा दोहन करने और शुद्ध पानी के प्राकृतिक भण्डारों के ऊपर बहुमंजिला इमारतें खड़ी किये जाने से मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, गोवा, वापी, दमन, तिरुअनन्तपुरम, पुरी, एर्नाकूलम, कोझीकोड़, रन्नागिरी और विजयनगरम जैसे नगरों का भूजल समाप्त होने की स्थिति में है। इनमें सबसे बुरा हाल मुम्बई का है।

मुम्बई में जिस तेजी से जल दोहन किया जा रहा है, उससे लगता है कि 2030 तक मुम्बई के मीठे पानी के जल भण्डार रीत जाएँगे। मुम्बई का पानी लगातार खत्म होता जा रहा है। यहाँ वर्षा का जो पानी जमीन सोखती है, वह एक निश्चित सीमा तक पहुँच पा रहा है, इसी के नीचे समुद्री क्षार वाला पानी बह रहा है, जो खारा है।

ज्यादा गहराई से दोहन पर बरसात का पानी क्षार वाले पानी में विलय होकर खारा हो जाएगा। जमीन की भीतरी बनावट ऐसी होती है कि बारिश का पानी एक निर्धारित सीमा तक ही जमीन में तैरता रहता है, जो कि प्रसंस्कृत होकर नीचे पीने के योग्य अपने आप बनता रहता है। लेकिन ज्यादा खुदाई के बाद मुम्बई में खारा पानी आ जाता है, क्योंकि वह समुद्री जल स्तर से प्रभावित होने लगता है।

यह खतरा भूमण्डल का तापमान लगातार बढ़ते जाने से और बढ़ गया है। दूर संवेदी उपग्रहों के माध्यम से हुए नए अध्ययनों से पता चलता है कि पश्चिमी अंटार्कटिक में बिछी बर्फ की पट्टी बहुत तेजी से पिघल रही है। यह पानी समुद्री जल को बढ़ा रहा है। इस कारण एक ओर तो बांग्लादेश और मार्शल द्वीपों पर डूब जाने का आसन्न खतरा मँडरा रहा है, वहीं समुद्री रिहाइशी इलाकों का पीने योग्य पानी खारे पानी में विलय हो जाने का खतरा है।

मुम्बई में गहराई से जल दोहन के लिये टैंकर लॉबी को दोषी माना जा रहा है। ये टैंकर गहराई से लाखों क्यूसेक मीठा पानी पम्पों से खींचकर भवन निर्माताओं और औद्योगिक इकाईयों को प्रदाय करते हैं। जलस्तर गिरने के लिये यही टैंकर लॉबी जिम्मेदार है। भूजल विशेषज्ञों का मानना है कि मुम्बई में अभी भी सैंकड़ों स्थानों पर मीठे पानी के भण्डार गहरे में सुरक्षित हैं। लेकिन इन स्थलों से जल दोहन नहीं किया जा सकता क्योंकि यहाँ बहुमंजली इमारतें खड़ी हो चुकी हैं।

मुम्बई के कई पुराने कुओं का पानी सूख गया है। इससे अनुमान लगता है। कि जलस्तर कितना नीचे चला गया है। जल स्तर गिरने का सबसे बड़ा कारण बड़े पैमाने पर आलीशान अट्टालिकाएँ बनाए जाने के लिये खोदी गई गहरी बुनियादें हैं।

बुनियादें खोदते समय निकले पानी को पम्पिंग करके पक्के नालों के जरिए समुद्र में बहा देने के कारण जलस्तर नीचे गिर जाने की समस्या भयावह हुई है। दूसरी तरफ बरसात के पानी को भी पक्के नालों व नालियों के मार्फत समुद्र में बहा दिया जाता है। गोया, जब पानी जमीन पर बहेगा ही नहीं तो जमीन उसे सोखेगी कैसे? और जमीन जलग्रहण ही नहीं करेगी तो जल स्तर बढ़ेगा कैसे? इस सिलसिले में मुम्बई के पानी में भीतरी भण्डरों पर अध्ययन कर चुके भूगर्भशास्त्री डॉ.ऋषिकेश सामंत का कहना है कि नई इमारतों की मंजूरी देने से पहले भूजल स्तर की पड़ताल की जाये और यदि ऐसे स्थलों पर पीने योग्य पर्याप्त जल है तो इमारतें खड़ी करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।

समुद्र का पानी स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। इसमें पाये जाने वाले विभिन्न तत्त्वों को पचाने की क्षमता शरीर में नहीं होती है। ये तत्त्व मनुष्य के शरीर में ऐसी बीमारियाँ पैदा करते हैं जो भारत में लाइलाज हैं। 1994 में लिये गए उपग्रह चित्रों से गहरे भूजल भण्डारों का पता चला था, लेकिन इनका उचित संरक्षण नहीं किये जाने से ये लगातार रीतते चले जा रहे हैं।

1924 के पहले तक मुम्बई के उपनगरों में बड़ी मात्रा में हरियाली थी और खाली जमीन पर भी पक्की सड़क या खड़ंजे नहीं थे। नाले आदि भी कच्चे थे। बहुमंजिला भवनों का निर्माण भी कम था। गोया, तब इन नगरों में जल भण्डार भी खूब थे और जलस्तर ऊपर था। मुम्बई जैसा हाल ही अन्य महानगरों का है। इस स्थिति में बदलाव भी आता नहीं दिख रहा है। इसलिये भारत को जरूरी है कि वह समुद्री जल को मीठे पानी में बदलने की प्रौद्योगिकी को जल्द-से-जल्द सरल रूप में विकसित कर लें।

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