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स्वच्छता और गाँधीजी

Author: 
सुदर्शन आयंगार
Source: 
कुरुक्षेत्र, अक्टूबर 2017

महात्मा गाँधी स्वच्छता और साफ-सफाई के मुद्दे पर अपना ध्यान केन्द्रित करने वाले पहले प्रमुख नेता थे। वह अपने जीवन के आखिरी दिनों तक लोगों का ध्यान इस समस्या की ओर लगातार खींचते रहे। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि उन्होंने इस समस्या पर काम किया तथा शौचालयों के निर्माण और मैले की वैज्ञानिक ढंग से सफाई के लिये अनेक प्रयोग किए। उन्होंने बेहद खतरनाक ढंग से मैला साफ करने वाले सफाईकर्मियों के उद्धार के लिये भी काम किया।

स्वतंत्र आधुनिक भारत के इतिहास में शायद यह दुर्लभ घटना है कि किसी प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्र के नाम अपने सम्बोधन में स्वच्छता के बारे में बोलने का फैसला किया। भारत के 15वें प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त, 2014 को स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से अपने पहले भाषण में कहा-

भाइयों और बहनों, 2019 में महात्मा गाँधी का 150वां जन्मदिवस मनाया जाएगा। स्वच्छता और साफ-सफाई महात्मा गाँधी को बहुत प्रिय थी। क्या हम संकल्प करेंगे कि 2019 में महात्मा गाँधी के 150वें जन्मदिवस तक अपने गाँव, शहर, गली, क्षेत्र, स्कूल, मन्दिर, अस्पताल और जो भी जगह हमारे आस-पास हैं, वहाँ गन्दगी का एक कतरा तक नहीं रहने देंगे? इस काम को सरकार अकेले नहीं कर सकती बल्कि यह जनता की भागीदारी से होगा। इसलिये हमें यह काम मिल-जुलकर करना है। ...क्या हमें इस बात से कभी भी तकलीफ हुई कि हमारी माताओं और बहनों को खुले में शौच करना पड़ता है? महिलाओं की गरिमा क्या हमारी सामूहिक जिम्मेदारी नहीं है? बेचारी गाँव की महिलाएँ रात होने का इन्तजार करती हैं। अंधेरा होने से पहले वे शौच के लिये नहीं जा सकतीं। वे कैसी शारीरिक यातना महसूस करती होंगी! इससे कितनी बीमारियाँ पैदा होती होंगी! क्या हम अपनी माताओं और बहनों की गरिमा के लिये शौचालयों का इन्तजाम नहीं कर सकते? ...आपको हैरानी हो रही होगी कि प्रधानमंत्री लालकिले की प्राचीर से स्वच्छता और शौचालय बनाने की जरूरत पर बोल रहे हैं। ...गरीबों को सम्मान चाहिए और इसकी शुरुआत साफ-सफाई से होती है। इसलिये मुझे इस साल दो अक्टूबर से एक ‘स्वच्छ भारत’ अभियान शुरू करना होगा जिसे चार वर्षों में पूरा किया जाएगा। मैं इसके लिये आज ही शुरुआत करना चाहता हूँ। देश के सभी स्कूलों में शौचालय होने चाहिए। लड़कियों के लिये अलग से शौचालय हों, तभी हमारी बेटियाँ स्कूल की पढ़ाई अधूरी छोड़ने के लिये मजबूर नहीं होंगी।2

1990 में भारत सहस्राब्दी के विकास लक्ष्यों (एमडीजी) पर दस्तखत करने वाले देशों में शामिल हो गया। वह धारणीय विकास लक्ष्यों (एसडीजी) पर हस्ताक्षर करने वालों में भी शामिल है। एसडीजी के लक्ष्य 6 में ‘सभी के लिये जल और स्वच्छता की उपलब्धता और धारणीय प्रबन्धन’ सुनिश्चित करने पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। एमडीजी के कतिपय संकेतक संशोधित और कुछ नए हैं। भारत के प्रदर्शन को इन संकेतकों के आधार पर ही आँका जाएगा। यूनिसेफ की रिपोर्ट ‘पेयजल और स्वच्छता पर प्रगति 2014 अपडेट’ के अनुसार 1990 और 2012 के बीच भारत ने स्वच्छता के विस्तार में काफी सुधार किया। वर्ष 1990 में स्वच्छता के लिहाज से शहरों की स्थिति गाँवों की दुर्दशा की तुलना में बेहतर थी। शहरी भारत में 1990 में 50 प्रतिशत आबादी को स्वच्छता की उन्नत सुविधाएँ उपलब्ध थीं। वर्ष 2012 तक 60 प्रतिशत शहरी आबादी को ऐसी सुविधाएँ मिल चुकी थीं। ग्रामीण क्षेत्रों में 1990 के 18 प्रतिशत की तुलना में 2012 में 36 प्रतिशत आबादी को स्वच्छता की उन्नत सुविधाएँ उपलब्ध करायी जा चुकी थीं। इस तरह, शहरी भारत के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में प्रदर्शन ज्यादा प्रभावशाली रहा।

ग्रामीण भारत में स्वच्छता की स्थिति में सुधार के बारे में प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता और घोषणा के अच्छे नतीजे सामने आए हैं। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की ‘स्वच्छता स्थिति रिपोर्ट’ 2016 में समूचे भारत में प्रगति का जिक्र किया गया है। यह सर्वेक्षण देश को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) बनाने की राष्ट्रीय प्रतिबद्धता की प्रधानमंत्री की घोषणा के लगभग नौ महीने बाद मई-जून, 2015 में किया गया था इसलिये इसे आधार माना जा सकता है। इस 72वें राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण में पाया गया कि 45.3 प्रतिशत परिवारों के पास स्वच्छ शौचालय थे। शहरी इलाकों में यह प्रतिशत 88.8 था। देश में स्वच्छता के प्रमुख संकेतकों की स्थिति के बारे में ताजा आकलन से निम्नलिखित बातों का पता चलता है-

सितम्बर, 2017 तक 68 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास शौचालय हो चुके हैं। ग्रामीण भारत में 11.32 करोड़ शौचालय बनाए जा चुके हैं। यह वास्तव में अच्छी प्रगति है। पाँच राज्यों को पूरी तरह ओडीएफ घोषित किया जा चुका है। देश के 195 जिले और 237084 गाँव ओडीएफ घोषित किए जा चुके हैं।3 इस तरह आधे से ज्यादा भारत ओडीएफ घोषित किया जा चुका है। मिशन के तौर पर चलाए गए इस कार्यक्रम के लिये तीन साल के समय में यह महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन शौचालय होना और उस तक पहुँच से उसका इस्तेमाल किया जाना अलग चीज है। शौचालय का इस्तेमाल नहीं किए जाने के कारणों को समझने के क्रम में कई समस्याओं का पता चलता है। भारत के एक-तिहाई से ज्यादा ग्रामीण परिवारों के पास उनके घरों में इस्तेमाल करने लायक और उपयोग किए जा रहे शौचालय नहीं हैं। हाल ही में सेलफोन रखने वाले परिवारों और घर में शौचालय वाले परिवारों के प्रतिशत के बीच एक दिलचस्प तुलना की गई। इसमें पता चला कि सेलफोन वाले परिवारों का प्रतिशत घर में शौचालय वाले परिवारों से काफी ज्यादा है। इससे स्वच्छता के सम्बन्ध में लोगों की जागरुकता, समझ और प्राथमिकताओं के बारे में पता चलता है।

महात्मा गाँधी स्वच्छता और साफ-सफाई के मुद्दे पर अपना ध्यान केन्द्रित करने वाले पहले प्रमुख नेता थे। वह अपने जीवन के आखिरी दिनों तक लोगों का ध्यान इस समस्या की ओर लगातार खींचते रहे। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि उन्होंने इस समस्या पर काम किया तथा शौचालयों के निर्माण और मैले की वैज्ञानिक ढंग से सफाई के लिये अनेक प्रयोग किए। उन्होंने बेहद खतरनाक ढंग से मैला साफ करने वाले उन सफाईकर्मियों के उद्धार के लिये काम किया जो सामाजिक तौर पर बुरी तरह भेदभाव और छुआछूत के शिकार थे। देश में स्वच्छता और साफ-सफाई की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार के लिये महात्मा गाँधी के विचारों और कामकाज को याद करना जरूरी है।

महात्मा गाँधी की चिन्ताएँ


गाँधीजी का स्वच्छता पर कार्य दक्षिण अफ्रीका में शुरू हुआ। उन्होंने किसी भी सभ्य और विकसित मानव समाज के लिये स्वच्छता के उच्च मानदंड की जरूरत को महसूस किया। इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका की अंग्रेज बस्तियों के सम्पर्क में आने से उन्हें विश्वास हो गया कि पश्चिमी जगत स्वच्छता के क्षेत्र में तेजी से और आगे चल रहा है। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका और बाद में भारत में भारतीयों से कहा कि पश्चिम ने कार्पोरेट स्वच्छता और साफ-सफाई के एक विज्ञान को विकसित कर लिया है। म्युनिसिपल स्वच्छता के विज्ञान को देश में हर किसी को सीखना चाहिए। गाँधीजी अपनी हत्या के एक दिन पहले यानी 29 जनवरी, 1948 तक सार्वजनिक स्थलों पर स्वच्छता को लेकर चिन्ता जाहिर करते रहे। जिस लोकसेवक संघ को कांग्रेस की जगह लेना था उसके संविधान के मसौदे में उन्होंने जनसेवकों के कर्तव्यों का जिक्र किया। उन्होंने लिखा- “जनसेवक को स्वच्छता और साफ-सफाई के बारे में गाँववासियों को शिक्षित करना चाहिए। उसे गाँववासियों के बीच खराब स्वास्थ्य और बीमारियों की रोकथाम के लिये सभी जरूरी कदम उठाने चाहिए।”

राजनीति में गाँधीजी के गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने उनसे कोई भी सार्वजनिक कार्रवाई शुरू करने से पहले साल भर देश में यात्रा करने के लिये कहा था। इस यात्रा के दौरान गाँधीजी ट्रेनों, जलयानों, पवित्र स्थलों और रिहायशी इलाकों में अस्वच्छ स्थितियों से रूबरू हुए। चूँकि पिछली एक सदी से ज्यादा समय में स्थिति में बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुआ है इसलिये उनकी कुछ टिप्पणियों को याद करना प्रासंगिक होगा। एक जलयान के भीड़भाड़ वाले डेक पर यात्री के रूप में रंगून के लिये अपने सफर के बारे में उन्होंने लिखा-

गुसलखाने में असह्य गन्दगी थी। पाखानों से भयानक बदबू आती थी। उनका इस्तेमाल करने के लिये मूत्र और मल के बीच से रास्ता बनाना या छलांग लगाना पड़ता था। बदबू और गन्दगी में जो कुछ कसर बच रही थी उसे यात्रियों ने अपनी मूर्खतापूर्ण आदतों से पूरी कर दी। वे जहाँ बैठते, वहीं थूकते और इस तरह उन्होंने अपने समूचे आस-पास को गन्दा कर दिया।4

हरिद्वार के नजदीक लक्ष्मण झूला की यात्रा में उन्होंने देखा कि प्रकृति के एक खूबसूरत उपहार को इंसानों ने दागदार बना दिया है। उन्होंने कहा- “हरिद्वार और ऋषिकेश दोनों में सड़कों और गंगा के स्वच्छ किनारों को लोगों ने गन्दा कर दिया है। लोगों को अपनी नैसर्गिक क्रियाएँ गलियों में और गंगा के किनारों पर करता देख मेरा मन पीड़ा से भर गया...।”5

उन्होंने वाराणसी की अपनी यात्रा के बाद काशी मन्दिर और उसके आस-पास के इलाके के बारे में लिखा- मैं पिछली शाम विश्वनाथ मन्दिर गया। उन गलियों से गुजरते हुए इन विचारों ने मेरे मन को छू लिया। अगर कोई अजनबी ऊपर से इस महान मन्दिर पर उतरे और उसे हम हिन्दुओं के बारे में धारणा बनानी हो तो क्या उसका हमारी निन्दा करना वाजिब नहीं होगा? क्या यह महान मन्दिर हमारे अपने चरित्र की परछाई नहीं है? मैं एक हिन्दू के तौर पर बोल रहा हूँ। क्या हमारे पवित्र मन्दिर की गलियों का इतना गन्दा रहना सही है? आस-पास बने मकानों की वजह से ये गलियाँ यातनाप्रद और तंग हैं। अगर हमारे मन्दिर तक खुलेपन और स्वच्छता की मिसाल नहीं हैं तो हमारा स्वशासन क्या हो सकता है? क्या अपनी मर्जी से या मजबूरी में अंग्रेजों के अपने बोरिया-बिस्तर के साथ भारत से जाते ही हमारे मन्दिर पवित्रता, स्वच्छता और शान्ति के अधिष्ठान बन जाएँगे?6up>

रेल के तीसरी श्रेणी के डिब्बे के माहौल के बारे में गाँधीजी ने कहा- हमें सफाई का पहला पाठ भी नहीं मालूम। बिना यह सोचे कि इसका इस्तेमाल अक्सर सोने के लिये किया जाता है, हम डिब्बे के फर्श पर कहीं भी थूक देते हैं। हम कुछ परवाह ही नहीं करते। नतीजतन डिब्बे में अवर्णनीय गन्दगी फैल जाती है। तथाकथित बेहतर श्रेणी के यात्री अपने कम भाग्यवान भाइयों पर रौब गाँठते हैं। मैंने उनमें छात्रों की दुनिया भी देखी है। कभी-कभार उनका बर्ताव भी कुछ बेहतर नहीं होता। वे समझते हैं कि अंग्रेजी झाड़ने और नॉरफोक जैकेट पहनने के कारण उन्हें जबरन अन्दर घुसने और सीट पर कब्जा जमाने का अधिकार है। मैंने चारों ओर गौर से देखा है। चूँकि आपने मुझे आपसे बोलने का विशेषाधिकार दिया है इसलिये अपना दिल आपके सामने खोल रहा हूँ। निस्सन्देह स्वशासन के मार्ग पर बढ़ते हुए हमें इन चीजों को दुरुस्त करना होगा।7

गाँधीजी ने महसूस किया कि देश के गाँव लगभग नरक के समान हैं। कई तो अब भी उसी स्थिति में हैं। उन्होंने 1915 में भारत वापसी के बाद शुरुआती दस वर्षों में लगभग सभी सार्वजनिक सभाओं और नागरिक अभिनन्दनों में स्वच्छता से जुड़े मुद्दों को अपने भाषणों में शामिल किया। उन्होंने ‘नवजीवन’ और ‘यंग इंडिया’ में स्वच्छता के बारे में अक्सर लिखा। उन्होंने कांग्रेस के लगभग सभी प्रमुख सम्मेलनों में अपने भाषणों में स्वच्छता के मुद्दे की चर्चा की। गाँधीजी के लिये अस्वच्छता एक बुराई थी। उन्होंने कलकत्ता (अब कोलकाता) में 25 अगस्त, 1925 को दिए एक भाषण में ग्राम-स्तरीय कार्यकर्ताओं से कहा कि वे गाँवों में स्वास्थ्य, स्वच्छता, साफ-सफाई और ग्रामीण उद्योग के प्रतीक झाड़ू, कुनैन, अरंडी का तेल और चरखा लेकर जाएँ।

गाँधीजी का दृढ़ विश्वास था कि स्वच्छता की शिक्षा प्राथमिक स्कूल के स्तर से ही दी जानी चाहिए। लिखना, पढ़ना और गिनती आना ही काफी नहीं है। इनके साथ ही चाल-चलन और स्वच्छता का सबक तथा छुआछूत मिटाने की शिक्षा देना भी अपरिहार्य है। गाँधीजी का विश्वास था कि स्वच्छता और साफ-सफाई से हर किसी का सरोकार है। उन्होंने हर स्वयंसेवी और कार्यकर्ता से कहा कि वह खुद को सफाईकर्मी बना ले ताकि मैला ढोने वालों का वर्ग ही खत्म हो जाए। वह जानते थे कि मैला ढोने वाले अभिशप्त लोगों की कतार में भी सबसे पीछे होते हैं।

गाँधीजी : एक स्वच्छता कार्यकर्ता


गाँधीजी स्वच्छता कार्यों के कट्टर कर्मी बन गए थे। दक्षिण अफ्रीका में फीनिक्स आश्रम और टॉलस्टॉय फार्म में स्वच्छता की जिम्मेदारी हर वासी की थी। उनमें मानव मल को बेशकीमती खाद में तब्दील करने के लिये कई प्रयोग किए गए। आश्रम में शुष्क शौचालय का इस्तेमाल किया जाता था। हर सुबह वहाँ के वासियों का एक दल मल को बड़े कनस्तर में भरकर फार्म ले जाता था। वहाँ इस मल को एक निर्धारित गड्ढे में डालकर खाद बनने के लिये छोड़ दिया जाता था। बाद में इस खाद को बागवानी में इस्तेमाल किया जाता था। भारत में कोचरब, साबरमती और सेवाग्राम आश्रमों में भी इसी तरह स्वच्छता का कार्य किया जाता था। गाँधीजी और आश्रमवासियों ने दिखा दिया था कि मानव मल का वैज्ञानिक ढंग से निस्तारण सबके लिये सम्भव है और ऐसा किया जाना चाहिए। इससे उन अमानवीय स्थितियों को भी खत्म करने में मदद मिलेगी जिनमें सफाईकर्मी समुदाय को डालकर उस पर छुआछूत का अभिशाप थोपा जाता है।

देशवासी गन्दगी और मैला उठाने के लिये अभिशप्त समुदायों के प्रति जिस तरह का बर्ताव करते थे उससे गाँधीजी को गहरी पीड़ा होती थी। यह पीड़ा उनके मन में बचपन से ही थी जब उन्होंने बालिग होकर छुआछूत का मतलब भी नहीं समझा था। यह उनके बचपन की एक घटना से स्पष्ट है। गाँधीजी ने बचपन में एक बार अपनी माँ से कहा कि उन्होंने एक अछूत को छू लिया है। जब उनसे इस बारे में गम्भीरता से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वह तो सिर्फ मजाक कर रहे थे।8 बालिग होने पर गाँधीजी ने छुआछूत के कलंक को मिटाने में अपना समूचा जीवन लगा दिया। वह समझते थे कि भारतीयों ने कालान्तर में स्वच्छता और साफ-सफाई के प्रति बेहद अवैज्ञानिक रवैया विकसित कर लिया है। इस रवैये के कारण ही गन्दगी और मैला उठाने वालों का एक अलग वर्ग बन गया है। यह वर्ग मुख्य बस्ती से दूर गरीबी और अकेलेपन तथा अत्यन्त अमानवीय शारीरिक और मानसिक स्थितियों में जीने के लिये अभिशप्त है। जब गाँधीजी ने स्वच्छता और साफ-सफाई की स्थिति में सुधार की अपील की उस समय उनके मन में इस अभिशप्त समुदाय को मुख्यधारा से जोड़ने की ठोस योजना भी थी ताकि समाज में सभी समुदाय, पूर्वाग्रह, भेदभाव और अपमान के बिना बराबर हों।

गाँधीजी देश में छुआछूत के अभिशाप को लेकर हमेशा चिन्तित रहे। छुआछूत मिटाना उनके लिये निजी, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक कार्यक्रम था। उनके लिये स्वच्छता का मतलब सिर्फ साफ-सुथरे शौचालयों और सड़कों तथा कचरा निस्तारण से नहीं था। उनके लिये इसका अर्थ सफाईकर्मी और अन्य सभी ऐसे समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ना भी रहा जिन्हें तथाकथित पवित्र सामाजिक समूहों ने सदियों से अछूत बना रखा था। धरती पर हर व्यक्ति के लिये आजादी और समानता गाँधीजी का सबसे प्रिय आदर्श था। उनकी नजर में छुआछूत को पूरी तरह खत्म किए बिना भारत अस्वच्छ ही रहता। इसलिये एक समाज के रूप में अस्वच्छता और छुआछूत की सामाजिक बीमारी को खत्म करने के लिये ठोस कदम उठाए बिना गाँधीजी के प्रति हमारी श्रद्धांजलि पूरी नहीं होगी। गाँधीजी ने इस मुद्दे पर सिर्फ एक बौद्धिक रुख नहीं अपनाया, वह इसके लिये भावनात्मक तौर पर प्रतिबद्ध थे और उन्होंने छुआछूत के धब्बे को मिटाने में अपना जीवन लगा दिया। वह रूढ़िवादी मानसिकता को अछूतों के प्रति प्रेम से भरने के लिये प्रयासरत थे।

सामाजिक नवाचार और उद्यम


देश के युवाओं में यह सोच भरी जानी चाहिए कि वे स्वच्छता के मुद्दे को नवाचार और ऐसे सामाजिक उद्यम के अवसर के तौर पर लें जिससे आर्थिक लाभ भी जुड़ा है। सुलभ इंटरनेशनल स्वच्छता के क्षेत्र में नवाचार और उद्यम की मिसाल है। गुजरात में गाँधीनगर के सुघड़ में स्वच्छता और पर्यावरण संस्थान भी है। इन दोनों संस्थाओं के संस्थापक गाँधीजी से प्रेरित और उनके विचारों से प्रभावित थे। लेकिन इस तरह के एक या दो संस्थान देश के लिये पर्याप्त नहीं हैं। देश की स्वच्छता की समस्या को अवसर में तब्दील करने की विपुल सम्भावना है। इसके लिये उत्साहवर्धन और सहायता की राजनीतिक इच्छाशक्ति की दरकार है। स्वच्छता का बीड़ा उठाने वाले देश के युवाओं को मान्यता, मदद, आर्थिक लाभ और प्रशंसा दी जानी चाहिए। वर्ष 2016 के मैग्सेसे विजेता बेजवाड़ा विलसन को मैला उठाने वालों के उद्धार और पुनर्वास के उनके कार्य के लिये पुरस्कृत और प्रशंसित किया गया। उनके मुताबिक देश में अब भी लगभग दो लाख लोग मैला उठाने के काम में लगे हैं। युवाओं को चाहिए कि वे इन लोगों को इस अमानवीय पेशे से निजात दिलाने की योजनाएँ तैयार करने के लिये आगे आयें। इस काम के दो पहलू हैं। पहला तो यह कि जो परिवार दूसरों से मैला उठाने का काम कराते हैं उन्हें अपने घर में शौचालय बनाने के लिये समझाया और विवश किया जाए। उन ग्राम पंचायतों और म्युनिसिपल संस्थाओं को दंडित किया जाना चाहिए जिन इलाकों में मैला उठाने की प्रथा अब भी जारी है। उन्हें मिलने वाले अनुदान के साथ शर्तें जोड़ी जानी चाहिए। दूसरे, मैला उठाने वाले समुदाय के सदस्यों को वैकल्पिक पेशे अपनाने के लिये कौशल प्रदान किया जाए। सभी स्तरों पर सरकारों को चाहिए कि यह बीड़ा उठाने की इच्छा रखने वाले युवाओं की सहायता के लिये विशेष योजना बनाएँ। सुलभ इंटरनेशनल तथा स्वच्छता और पर्यावरण संस्थान जैसी स्थापित दक्षता और प्रतिबद्धता वाली संस्थाएँ योजना के निर्माण, इसके तहत प्रशिक्षण और कामकाज की निगरानी में प्रमुख एजेंसी की भूमिका निभा सकती हैं।

ग्रामीण भारत में खुले में शौच की समस्या व्यापक है। मल के परिशोधन को गन्दा और घिनौना काम माना जाता है। सरकार को परिशोधित मानव मल को खाद के रूप में मान्यता देकर इसकी खरीद के लिये बेहतर मूल्य प्रदान करना चाहिए। ग्रामीण युवाओं को मानव मल के वैज्ञानिक और स्वच्छ ढंग से प्रबन्धन के लिये कौशल प्रशिक्षण मुहैया कराया जाना चाहिए, जो सम्भव है। गाँव के स्तर पर मानव मल परिशोधन संयंत्र लगाने के लिये सहायता दी जानी चाहिए। दो गड्ढों से जुड़े शौचालय भी छोटे परिशोधन संयंत्र के तौर पर काम करते हैं इसलिये इनके इस्तेमाल को आर्थिक तौर पर प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। शौचालय निर्माण तथा मानव मल का परिशोधन और वैज्ञानिक तौर पर परिशोधित मैले का इस्तेमाल गाँधीजी का आधुनिक सकारात्मक कार्यक्रम है।

ग्रामीण और शहरी भारत के परिवारों को घर के स्तर पर ही कचरे को छाँटने के बारे में बताया जाना चाहिए। जरूरत पड़ने पर इसके लिये दंड के प्रावधानों का सहारा भी लिया जा सकता है। कचरे का संग्रह, प्रसंस्करण, पुनर्चक्रण और निस्तारण एक सामाजिक उद्यम होना चाहिए। युवाओं को इसमें भागीदारी के लिये प्रेरित करने के अलावा उन्हें इससे सम्बन्धित पर्याप्त सहायता और प्रशिक्षण देने की भी जरूरत है। एक बार युवा इस काम में लग जाएँ तो नवाचारों की शुरुआत होगी और कचरे का बेहतर ढंग से निस्तारण होने लगेगा। मुख्य बात यह है कि कूड़ा, गन्दगी और अस्वच्छता के प्रति हमारे मन में सख्त नापसन्दगी हो। साथ ही उन लोगों के प्रति हमारे मन में प्रेम और सहानुभूति होनी चाहिए। जो मैला साफ करने और उसके निस्तारण का काम करते हैं। हमें गाँधीजी के आह्वान पर आगे आना चाहिए।

स्वच्छ हिन्दुस्तान की गाँधीजी की धारणा में और भी बहुत कुछ है। बाहरी साफ-सफाई के साथ-साथ गाँधीजी एक ऐसा स्वच्छ हिन्दुस्तान देखना चाहते थे जिसमें शरीर और मन दोनों साफ हों। हम अपने परिवेश को जिस तरह रखते थे उससे उन्हें चिन्ता होती थी। उन्होंने इतिहास की अपनी समझ से यह धारणा बनायी थी कि भारतीय समुदायों में स्वच्छता और साफ-सफाई का भाव खत्म होने की मुख्य वजह हमलावरों का हजार वर्षों तक चला आक्रमण है। इन हमलावरों ने एक के बाद एक आकर इन समुदायों को गुलाम जैसा बना दिया। इसने सभ्यता और संस्कृति का नाश हो गया तथा स्वच्छता और साफ-सफाई भी इसका शिकार हुई।

शिक्षा, विस्तार और अनुसन्धान


गाँधीजी ने 1920 में जिस गुजरात विद्यापीठ की स्थापना की थी उसने भारत को स्वच्छ बनाने की कोशिशें फिर से शुरू की हैं। वह शौचालयों के निर्माण और इस्तेमाल को बढ़ावा देने में सक्रिय भूमिका निभा रही है। सद्रा गाँव में विद्यापीठ का एक ग्रामीण परिसर है। महादेव देसाई के बेटे और गुजरात विद्यापीठ के पूर्व कुलाधिपति नारायण देसाई ने इस गाँव में जनवरी, 2012 में गाँधीकथा9 के 108वें पाठ के दौरान गाँधीवादी सकारात्मक कार्यक्रम फिर से शुरू करने के लिये आह्वान किया। परिसर के शिक्षकों और छात्रों ने कथा के दौरान और उसके बाद शौचालयों को बढ़ावा देने का संकल्प किया। विद्यापीठ सद्रा के आस-पास के गाँवों में 2000 से ज्यादा शौचालयों के निर्माण में सहायक रही है।10 बड़े शहरों जैसे कि अहमदाबाद के 20 किलोमीटर के दायरे के अन्दर के गाँवों में भी लोगों को शौचालय को प्राथमिकता देने के लिये मनाना वाकई मुश्किल रहा है। लोगों की मानसिकता बदलने में यह मुश्किलें और बढ़ जाती है यदि सरकारी पदाधिकारी इस कार्य के प्रति अत्यधिक उत्साहित और प्रेरित न हों। 21वीं सदी के दूसरे दशक के मध्य में भारत में शौचालय निर्माण की धीमी रफ्तार के लिये यह सभी तथ्य जिम्मेदार हैं।

विद्यापीठ बायोगैस पर भी काम कर रही है। गाँवों में बायोगैस को बढ़ावा देने के लिये विद्यापीठ के पास आई एक परियोजना एक सम्पूर्ण कार्य और शिक्षा कार्यक्रम में तब्दील हो गई। अब विद्यापीठ में स्नातक से पीएचडी स्तर तक माइक्रोबायोलॉजी विभाग है। विभाग के शिक्षकों और छात्रों ने राजमार्ग के किनारे बायोगैस संयंत्र स्थापित किए हैं जिनमें ढाबों के बचे-खुचे भोजन, खरपतवार और गोबर का इस्तेमाल किया जाता है। एक समाज के तौर पर हमें समझना चाहिए कि हमारे आस-पास की गन्दगी विभिन्न जीवों के लिये भोज्य पदार्थ है। वे कार्बनिक पदार्थों का उत्पादन बढ़ाने में सहायक होते हैं जो हमारा भोजन है। यह हमारी पारिस्थितिकी है और हमें बिना किसी दम्भ के इसका सम्मान करना चाहिए। हमें मैले को समझने और अपना जीवन सुधारने के लिये इस पर काम करने की जरूरत है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि विद्यापीठ मातृभाषा में उच्चतर शिक्षा चाहने वाले गरीब, दलित और आदिवासी छात्रों का पसन्दीदा विश्वविद्यालय है।

देश में हर विश्वविद्यालय को स्वच्छता के लिये इस तरह का कार्यक्रम अपनाना चाहिए। भारत में रैंकिंग में विशिष्टता हासिल करने की होड़ में लगे विश्वविद्यालयों को समझना चाहिए कि देश के गाँवों, शहरी झुग्गी-बस्तियों और उपेक्षित रिहायशी क्षेत्रों में ज्यादा बुनियादी काम किया जाना बाकी है। स्वच्छता के क्षेत्र में शिक्षा, विस्तार और अनुसन्धान की पूरी गुंजाईश है। इसमें उद्यम और रोजगार की काफी सम्भावनाएँ हैं। देश के हर स्कूल में स्वच्छता और साफ-सफाई की शिक्षा को शामिल कर इस पर अमल किया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से शिक्षक और अभिभावक अज्ञानता, दम्भ और पूर्वाग्रह की वजह से घर और स्कूल में स्वच्छता और साफ-सफाई का काम करने में हिचकिचाते हैं। मात्र शौचालय बना लेने से देश में स्वच्छता की स्थिति में सुधार नहीं आएगा। स्वच्छता के प्रति हमारी समग्र मानसिकता बदलने की जरूरत है। यह गाँधीजी ने भी इंगित किया कि अपने आस-पास साफ-सफाई रखने के साथ-साथ शरीर, मन और आत्मा को साफ रखना भी हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

संदर्भ


1. पूर्व कुलपति, गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद और सदस्य गाँधी विरासत मिश10न। इस लेख की ज्यादातर सामग्री लेखक की पूर्व प्रकाशित कृतियों से ली गई है।
2. http://www.pmindia.gov.in/en/tag/speech/, 18 दिसम्बर, 2015
3. http://sbm.gov.in/sbm/, 10 सितम्बर, 2017 को देखा गया।
4. गाँधी एमके 1927; ऐन ऑटोबायोग्राफी आर द स्टोरी ऑफ माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ, नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, अहमदाबाद। 1976 पुनर्मुद्रण। पृ. 291
5. उपरोक्त पृ. 296
6. उपरोक्त पृ. 212-13
7. उपरोक्त पृ. 213
8. पूरे विवरण के लिये कृपया देखें- प्यारेलाल, 1965, महात्मा गाँधी वॉल्यूम 1, द अर्ली फेज, नवजीवन पब्लिशिंग हाउस, अहमदाबाद, 1986 पुनर्मुद्रण, पृ. 217।
9. भारत में कथा की एक परम्परा है जिसमें विशाल भीड़ के सामने धर्मग्रन्थों और पौराणिक कथाओं का पाठ किया जाता है। भागवत और रामायण का पाठ तो बहुत प्रचलित है। नारायण देसाई ने लोगों को गाँधी की कहानी से अवगत कराने के लिये इस परम्परा का सफलतापूर्वक उपयोग किया है। गाँधी कथा का पाठ पाँच दिनों तक प्रतिदिन तीन घंटे चलता है।
10. गाँधी कथा से पहले भी प्रयास किए गए हैं। विद्यापीठ ने 1990 के दशक से 5000 से ज्यादा शौचालयों के निर्माण में सहायता की है।

लेखक परिचय


लेखक गाँधी हेरिटेज मिशन के सदस्य हैं, गुजरात विद्यापीठ में कुलपति रह चुके हैं और गुजरात में जल और स्वच्छता अभियानों से जुड़े रहे हैं।
ईमेल : sudarshan54@gmail.com

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