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गम्भीर संकट की दस्तक

Author: 
मनोरमा
Source: 
शुक्रवार, अप्रैल 2016

मार्च की शुरुआत से ही गर्मी के कारण नदियों, तालाबों, जलाशयों में बचा पानी भी सूखने लगा है। यहाँ के पुराने लोग अभी के मौसम की 1972 की गर्मी और सूखे से तुलना कर रहे हैं और 2016 को 1972 से भी ज्यादा गर्म कह र​हे हैं। राज्य के 314 गाँव में पीने के पानी की भीषण दिक्कत हो रही है, सरकार टैंकर से इन गाँवों में पानी भेज रही है। कर्नाटक सरकार ने अब रबी फसल के भी बर्बाद होने की भी घोषणा कर दी है। लगभग 70 प्रतिशत भूभाग पर लगी 7,207 करोड़ रुपए की रबी फसल बर्बाद हो चुकी है इसलिये राज्य सरकार ने केन्द्र सरकार से 1,417 ​करोड़ की मदद राशि का अनुरोध किया है। कर्नाटक में इस बार मार्च का महीना उत्तर भारत के जून-जुलाई को मात दे रहा है। सुहावने मौसम के लिये जाना जाने वाला बंगलुरु तक तप रहा है। दोपहर में तेज धूप के बाद शाम तक बारिश हो जाने वाले इस शहर में पिछले बीस दिनों से तापमान 32 डिग्री से बढ़कर 38 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच गया है जबकि इन दिनों तापमान 25-26 डिग्री सेल्सियस ही होना चाहिए था।

अगले कुछ दिनों में बारिश नहीं हुई तो गर्मी के साथ बंगलुरु समेत पूरे कर्नाटक में पीने और जरूरत के पानी की उपलब्धता बड़ी समस्या बन सकती है। उत्तर कन्नडा जिले के 196 गाँव सूखा प्रभावित घोषित किये जा चुके हैं, हैदराबाद कर्नाटक क्षेत्र के 31 ताल्लुके भी सूखे की चपेट में हैं, 314 से ज्यादा गाँवों में पीने तक का पानी नहीं है और इलाके के 25,000 हेक्टेयर इलाके में लगी धान की फसल सूख चुकी है।

वैसे राज्य में सूखे के हालात पिछले साल अक्टूबर से ही बने हुए हैं। औसत से 34 फीसद कम बारिश के कारण कर्नाटक सितम्बर-अक्टूबर से ही बीते चालीस साल में सबसे सूखे मौसम का सामना कर रहा है। उस समय 177 ताल्लुकों में से 136 को सूखा प्रभावित कहा गया। बीते साल सितम्बर तक राज्य के 30 जिलों में से 12 में नाममात्र की बारिश ​दर्ज हुई, कई इलाकों में चालीस हफ्ते से ज्यादा समय से बारिश नहीं हुई।

सूखे की वजह से 3,600 करोड़ रुपए मूल्य की खड़ी फसल बर्बाद हो गई और कुल नुकसान 16,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का हुआ। इसे देखते हुए विशेषज्ञों ने पहले ही साल 2015-2016 में राज्य में खाद्यानों की पैदावार में 45 प्रतिशत की कमी आने का अनुमान जता दिया था।

मुख्यमंत्री सिद्धारम्मैया ने तब भी 27 जिलों के 135 ताल्लुकों को सूखा प्रभावित घोषित किया था और केन्द्र सरकार से राज्य को सूखा प्रभावित घोषित किये जाने का अनुरोध किया ताकि केन्द्र सरकार की मदद से सूखा प्रभावित लोगों और किसानों की मदद हो सके। लेकिन तब शायद किसी को भी अनुमान नहीं रहा होगा कि अगले साल हालात और खराब होने वाले हैं।

मार्च की शुरुआत से ही गर्मी के कारण नदियों, तालाबों, जलाशयों में बचा पानी भी सूखने लगा है। यहाँ के पुराने लोग अभी के मौसम की 1972 की गर्मी और सूखे से तुलना कर रहे हैं और 2016 को 1972 से भी ज्यादा गर्म कह र​हे हैं। राज्य के 314 गाँव में पीने के पानी की भीषण दिक्कत हो रही है, सरकार टैंकर से इन गाँवों में पानी भेज रही है।

कर्नाटक सरकार ने अब रबी फसल के भी बर्बाद होने की भी घोषणा कर दी है। लगभग 70 प्रतिशत भूभाग पर लगी 7,207 करोड़ रुपए की रबी फसल बर्बाद हो चुकी है इसलिये राज्य सरकार ने केन्द्र सरकार से 1,417 ​करोड़ की मदद राशि का अनुरोध किया है। किसानों का गाँवों में रहना मुश्किल हो रहा है भोजन पानी और काम की जरूरत उन्हें गाँव से शहर आने को मजबूर कर रही है।

पिछले साल यहाँ के हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की थी, पानी की कमी, फसलों का नुकसान कहीं फिर बड़ी तादाद में किसानों को आत्महंता ना बना दे। कर्नाटक के राजस्व मंत्री वी श्रीनिवास प्रसाद के मुताबिक राज्य के कुल 38,54,725 किसानों को राष्ट्रीय आपदा राहत कोष से मदद या सहायता राशि दिये जाने की जरूरत है।

कर्नाटक के गाँवों में पीने का पानी नहीं होने के सवाल पर श्रीनिवास प्रसाद कहते हैं कि 85 गाँवों में टैंकर से पानी उपलब्ध कराया जा रहा है। गाँवों में पानी और पशुओं को चारा मुहैया कराने के लिये सरकार ने 214 करोड़ रुपए राशि ​का आवंटन किया है और राज्य के सभी डीसी को इस मद के लिये 2 करोड़ रुपए का फंड प्रदान किया गया है। लेकिन वो ये भी बताते हैं कांग्रेस को अपने इस कार्यकाल में छठी बार प्राकृतिक आपदा का सामना करना पड़ रहा है।

पिछले साल की खरीफ और अभी की रबी फसल मिलाकर 15,636 करोड़ रुपए की फसल बर्बाद हुई है लेकिन केन्द्र सर​कार ने अपने हिस्से की पूरी मदद 3,860 करोड़ रुपए देने के बजाय केवल 1540 करोड़ रुपए दिये हैं जो नाकाफी हैं। तर्क चाहे जो हो लेकिन किसानों तक वैसी मदद नहीं पहुँची है जैसी पहुँचनी चाहिए। इसलिये राज्य के सूखा प्रभावित इलाकों के किसानों ने ​बंगलुरु में विधानसभा के सामने सत्र चलने के दौरान प्रदर्शन किया और सरकार से पीने के पानी की समस्या के स्थायी हल की माँग रखी। लेकिन फिलहाल सरकारी मदद से भी ज्यादा आसमानी मदद की जरूरत है। पैसा पानी नहीं बन सकता और पानी उपलब्ध कराने के लिये सरकार को भी पानी की ही जरूरत पड़ेगी।

दूसरी ओर बंगलुरु शहर की बात करें तो यहाँ भी गर्मी और पानी की कमी का असर दिखने लगा है, सिद्धारम्मैया सरकार ने पिछले हफ्ते ही 1 अप्रैल से पानी कर राशनिंग करने की घोषणा की थी जिसे बाद में बीडब्ल्यूएसएसबी या बंगलुरु जल आपूर्ति और सीवेज आयोग ने खारिज कर दिया और कहा कि राज्य के जलाशयों या बाँधों में पानी का भण्डार की बात है तो उनमें अपनी क्षमता का 24 फीसदी जल है। लेकिन हकीकत ये है कि बंगलुरु की कई रिहायशी सोसाइटी में 1अप्रैल से कम पानी मिलने की सूचना चिपका दी गई है, बारिश नहीं होने की सूरत में कम पानी देने का संकेत किया जा रहा है।

जिन इलाकों में एक दिन बीच कर आपूर्ति का पानी आया करता था वहाँ अब 6 दिन बाद पानी आ रहा है। इस सम्बन्ध में और जानकारी माँगने पर बीडब्ल्यूएसएसबी के अधिकारी का कहना है कि बंगलुरु को प्रतिदिन 1600 एमएलडी पानी की जरूरत होती है लेकिन बीडब्ल्यूएसएसबी केवल 1400 एमएलडी उपलब्ध करा पाता है बाकी 200 एमएलडी बोरवेल से पूरी की जाती है। वो ये भी स्पष्ट करते हैं कि बंगलुरु प्रतिमाह जलाशयों से 1.5 टीएमसी पानी लेता है और अभी भी अप्रैल-मई तक बंगलुरु को पानी लेने में कोई दिक्कत नहीं होने वाली है क्योंकि कृष्णराजसागर और काबिनी डैम में क्रमश: 85.31 फीट और 22.59 फीट पानी है। लेकिन अप्रैल-मई तक में बारिश नहीं होने पर दिक्कत होने लगेगी।

वैसे तस्वीर का दूसरा पहलू ये भी है कि बंगलुरु को रोजाना 1400 करोड़ लीटर पानी मिलता ​है जिसमें 35 फीसद आपूर्ति के दौरान बर्बाद होता है अन्तत: प्रति व्यक्ति 75 लीटर पानी रोज ​मिलता है जो कि महानगरों में प्रति व्यक्ति जल आपूर्ति के राष्ट्रीय मानक 150 लीटर से भी कम है। पानी का मुख्य स्रोत कावेरी नदी है लगभग 80 प्रतिशत पानी कावेरी से ही लिया जाता है। लेकिन कावेरी के पानी पर तमिलनाडु ​का भी दावा है जो अक्सर दोनों राज्य में विवाद का कारण बनता है।

2001 में 53 लाख की आबादी वाला शहर 2016 में 1 करोड़ की आबादी वाला बन चुका है, जबकि 2001 में ही बंगलुरु मेट्रोपोलिटीन रीजन डेवलपमेंट अॅथारिटी यानि बीएमआरडीए के द्वारा संग्रहित सेटेलाइट आँकड़ों के मुताबिक यहाँ 2,789 झीलें हुआ करती थीं जिनका आकार 2 हेक्टेयर से 50 हेक्टेयर तक और कुल क्षेत्रफल 18260.48 हेक्टेयर था। सूचना क्रान्ति के उभार और गार्डन सिटी से 'सिलीकॉन वैली' बनने की यात्रा में इस शहर ने अपने झीलों, टैंक बन्धों और जलाशयों को खो दिया।

अब शायद यहाँ 200 से भी कम झील या टैंक बन्ध बच गए हैं और वो भी गन्दे नाले या सीवर में तब्दील होकर। अंधाधुंध निर्माण ने भूजल भण्डार को भी प्रभावित किया है। 15 साल पहले तक जहाँ 100 फीट पर पानी आ जाता था अब 1000 फीट पर भी नहीं मिलता, बावजूद इसके शहर में लगभग 3 लाख लोगों के घरों में बोरवेल हैं और नौ हजार सरकारी बोरवेल हैं।

रिहायशी कॉलोनी बन जाती है दस-दस साल तक बीडब्ल्यूएसएसबी का पानी का कनेक्शन नहीं मिलता, सरकारें टैक्स लेती हैं, राजनीतिक पार्टियाँ वोट लेती हैं लेकिन मंत्रियों, बिल्डरों के अपार्टमेंट हब में भी पानी टैंकर से आता है। ऐसे महंगे अपार्टमेंट में रहने वाले पानी पर औसतन 4 से 6 हजार रुपए महीना खर्च करते हैं।

पानी का व्यवसाय करने वाले टैंकरों की एक अलग अर्थव्यवस्था बन गई है, टैंकर माफिया यहाँ प्रचलित शब्द है। बंगलुरु में पानी के अध्ययन और संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञ मानते हैं कि अगले दस साल में पानी की कमी के कारण इस शहर की आधी आबादी को यहाँ से हटाना पड़ सकता है।

जाहिर है संकट बहुत गहरा है, जबकि बंगलुरु में सालाना औसत बारिश 900 एमएम तक होती है यानी झीलों, टैंकों को पुनर्जीवित कर और वर्षा जल संग्रह करके पानी की कमी से निपटा जा सकता है साथ ही भूजल को लगातार रीचार्ज भी किया जा सकता है। लेकिन यहाँ के 3 लाख से ज्यादा बोरवेल भूजल जितना रिचार्ज होता है उससे तीन चौथाई से भी ज्यादा पानी निकाल लेते हैं।

वर्षाजल संग्रह से जुड़े और बायोम एनवायरन्मेंटल सोल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक विश्वनाथ कहते हैं कि बंगलुरु के बाहरी इलाकों में भूजल स्तर काफी नीचे गिर चुका है। यह स्तर 800 से कहीं-कहीं 1600 फीट तक चला गया है। पहले यहाँ के कुओं में 20 फीट पर पानी होता था। इनके आसपास के ही जिन इलाकों में वर्षाजल संग्रह किया गया वहाँ फिर से 100 फीट पर पानी मिलने लगा है तो इसकी वजह वहाँ की जमीन का सालाना एक करोड़ लीटर से ज्यादा पानी से रिचार्ज होना है। मात्र 6 हजार रुपए खर्च कर वर्षाजल संग्रह शुरू हो सकता है और लाखों लीटर पानी बचाकर हजारों रुपए बचाए जा सकते हैं, इसके अलावा ग्रे वाटर और वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट भी आठ से दस हजार रुपए में हो जाता है जबकि किसी भी घर के निर्माण में औसतन 15-20 लाख रुपए तक खर्च होते हैं। यानी अब भी भूजल रिचार्ज से तस्वीर सुधर सकती है जरूरत कानून और नीतियों की है।

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