नदी की धारा सा अविरल समाज (River connects society)

Submitted by RuralWater on Tue, 06/14/2016 - 16:59
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सूख चुकी नान्दूवाली नदी का फिर से बहना अकाल ग्रस्त भारत के लिये एक सुखद सन्देश है।

यह कल्पना करना मुश्किल है कि यह नदी और जंगल कभी सूख चले थे। पेड़ों के साथ-साथ समाज और परम्पराओं का भी कटाव होने लगा था। कुओं में कटीली झाड़ियाँ उग आईं और बरसात से जो थोड़ी सी फसल होती उसमें गुजारा करना मुश्किल था। गाय-भैंस बेचकर कई परिवार बकरियाँ रखने लगे क्योंकि चारे को खरीदने और गाँव तक लाने में ही काफी पैसे खर्च हो जाते। जवान लोगों का रोजी-रोटी के लिये पलायन जरूरी हो गया। निम्न जाति के परिवारों की हालत बदतर थी।

ढाक के पेड़ों पर नई लाल पत्तियाँ आ रही हैं पर कदम, ढोंक और खेजड़ी की शाखाएँ लदी हुई हैं। एक दूसरे में मिलकर यह हमें कठोर धूप से बचा रहे हैं। जिस कच्चे रास्ते पर हम बढ़ रहे हैं वह धीरे-धीरे सख्त पत्थरों को पीछे छोड़ मुलायम हो चला है और कुछ ही दूरी पर नान्दूवाली नदी में विलीन हो जाता है।

राजस्थान में अलवर जिले के राजगढ़ इलाके की यह मुख्य धारा कई गाँव के कुओं और खलिहानों को जीवन देती चलती है। इनमें न सिर्फ कई मन अनाज, बल्कि सब्जियों की बाड़ी और दुग्ध उत्पादन भी शामिल है।

यह कल्पना करना मुश्किल है कि यह नदी और जंगल कभी सूख चले थे। पेड़ों के साथ-साथ समाज और परम्पराओं का भी कटाव होने लगा था। कुओं में कटीली झाड़ियाँ उग आईं और बरसात से जो थोड़ी सी फसल होती उसमें गुजारा करना मुश्किल था। गाय-भैंस बेचकर कई परिवार बकरियाँ रखने लगे क्योंकि चारे को खरीदने और गाँव तक लाने में ही काफी पैसे खर्च हो जाते। जवान लोगों का रोजी-रोटी के लिये पलायन जरूरी हो गया।

घेवर गाँव में जोहड़निम्न जाति के परिवारों की हालत बदतर थी। अपनी भूमि न होने की वजह से वह औरों के खेतों में हाथ बँटाते और जो कुछ उपज होती उसके एक छोटे से हिस्से से गुजर करते। घेवर गाँव की महिलाएँ रोज 2.5 किलोमीटर की दूरी तय करके पैदल नान्दू गाँव तक आतीं और पशुओं के गोबर उठाने के बदले उच्च जाति के परिवारों से छाछ ले जातीं।

आज घेवर की पहचान पक्के मकानों की कतारें, पशुधन और सब्जियों के खेत हैं। ग्रामीण जीवन का अनुभव कराने का दावा करता एक टूरिस्ट रिसोर्ट भी गाँव के बाहर आ बसा है। परन्तु गाँव का असली धन वो जंगल, जोहड़, एनीकट और मेडबन्दी हैं जिनकी वजह से पिछले वर्ष 40 फीसदी कम बरसात के बावजूद कुओं में 40-50 फीट पर पानी उपलब्ध है।

जोहड़, तालाब का ही एक रूप है जबकि एनीकट पानी के नालों पर बनने वाली एक सीमेंट की दीवार है जो एक छोटे से बाँध का काम करती है। अधिक पानी होने पर वह दीवार के ऊपर से गुजर जाता है। इन संसाधनों में ठहरा हुआ पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसकर धरातल के पानी के स्तर को ऊपर उठता है। खेतों में मेड़बन्दी बरसात और सिंचाई के पानी को खेत में ही रोकती है। इससे पानी के साथ बह जाने वाली उपजाऊ मिट्टी का कटाव भी रुकता है।

घेवर के अलावा आसपास के 20 गाँव ने इन साधनों से न सिर्फ वर्तमान की चुनौतियों को झेला बल्कि एक मिसाल बन गए। पर यह पॉजिटिव स्टोरी पानी के संरक्षण और समृद्धि से बढ़कर उस सोच की है जिसमें नतीजे से ज्यादा टिकाव पर जोर है। मदद नहीं स्वावलम्बन की नीति है।

घेवर गाँव के हरे-भरे जंगल

पानी का सेतु


2003 में जब नान्दू गाँव के दो भाई कुंज बिहारी और सतीश शर्मा ने अपने क्षेत्र को पानी बहुल करने का प्रण लिया तो उनके सामने स्थानीय जर्जर अर्थव्यवस्था और जाति के आधार पर बँटा समाज सबसे बड़ी बाधा थी।

कुंज बिहारी कहते हैं कि एक स्थानीय होने के बावजूद उन्हें एक साल लग गया लोगों का विश्वास हासिल करने में। उससे भी मुश्किल काम था सभी जातियों को साथ बिठाना। लेकिन धीरे-धीरे उनका समर्पण देखकर लोगों को कुछ भरोसा हुआ। हालांकि जोहड़ इस क्षेत्र की धरोहर है पर लुप्त हो चुके पारम्परिक ज्ञान की वजह से लोगों को यकीन नहीं था कि पेड़ बचाने और जोहड़ बनाने से कुओं में पानी आ पाएगा।

समाज और ज्ञान की बाधाओं के अलावा एक और चुनौती थी लोगों को स्वावलम्बी बनाने की।

प्रारम्भिक समर्थन देने वाले समभाव ट्रस्ट ने इस बात को स्पष्ट तौर से रखा कि समाज को अपना योगदान देना होगा। संस्था का न तो कोई दफ्तर खुला, न ही कोई बोर्ड लगा। ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी इसलिये वे अपना 25 फीसदी योगदान श्रम के रूप में देते। अगर एक जोहड़ के लिये 1000 तगाड़ी मिट्टी निकालनी है तो गाँव वालों को 750 तगाड़ी मिट्टी निकालने की मजदूरी मिलती और 250 तगाड़ी का वो श्रमदान करते।

घेवर गाँव में बने सबसे पहले जोहड़ ने एक सेतु का काम किया। कुंज बिहारी कहते हैं कि पहले वर्ष में ही जोहड़ के पास के कुएँ का जलस्तर 50 फीट ऊपर आ गया। इस वास्तविक प्रमाण के बाद हमें कुछ साबित करने की जरूरत नहीं थी। पानी ने सभी सामाजिक सीमाओं को लाँघ लिया। समृद्धि के लिये लोग कोई भी शर्त पूरी करने को तैयार थे। फिर तो एक के बाद एक जोहड़ बनते चले गए।

जुड़ाव की परम्परा


समाज को पानी और प्रकृति से जोड़ने में पारम्परिक प्रथाओं का भी सहारा लिया गया। बुजुर्गों ने बताया कि पहले पूर्णिमा और अमावस्या वाले दिन सार्वजनिक काम किये जाते थे जिसमें जोहड़ों को मजबूत करना या वृक्षारोपण भी शामिल थे। जंगलों को इस्तेमाल के हिसाब से रेखांकित किया गया था।

घेवर गाँव में निर्मित एनीकटअगर देव बनी पवित्र वन क्षेत्र था, तो रखत बनी सिर्फ अकाल के दिनों में इस्तेमाल किया जाता। कांकड़ जंगल दो गाँवों की सीमा को रेखांकित करता और चारागाह में पशु चरते। धराड़ी प्रथा में हर जाति किसी विशिष्ट पेड़ को पवित्र मानते थे। कुंज बिहारी कहते हैं कि हमारी जाति की धराड़ी खेजड़ी का पेड़ है। हमें शुभ अवसरों पर इसकी पूजा करनी चाहिए, इसके पौधे लगाने चाहिए और कोई भी इसे नुकसान पहुँचा रहा हो तो उसे रोकना चाहिए।

इन सभी पारम्परिक प्रथाओं को पुनर्जीवित किया गया और विशेष वन संरक्षण समितियों का गठन भी हुआ जो नियमों के पालन न करने वालों पर जुर्माना लगाती। इससे उन भ्रष्ट वन अधिकारियों पर भी लगाम लगी जो गाँव वालों को अनाज और घी के बदले में पेड़ काटने देते थे।

इन प्रयासों को प्रकृति का साथ मिलना स्वाभाविक था। ज्यादातर राजस्व भूमि आज पेड़ों से घिरी है। पीपलवनी में सैकड़ों नए पीपल के पेड़ हैं जो गाँव वालों ने बचाए हैं। कुंज बिहारी कहते हैं कि वृक्षारोपण की तुलना में चराई से सुरक्षा ने जंगल को बचाने में ज्यादा मदद की है। अगर मनुष्य दखल न दे तो काम आसान हो जाता है। यह सब तभी सम्भव हो पाया जब ग्रामीणों ने वन, जल और आजीविका के बीच के सम्बन्ध को समझा और प्रकृति के साथ मिलकर काम करने को तैयार हुए।

पानी की बहुतायत का एक प्रमाण यह भी है कि जहाँ पलायन एक मजबूरी बन चुका था वहीं अब 50 किलोमीटर दूर तक से लोग बटाई पर खेत लेने आते हैं।

जोहड़ निर्माण से घेवर गाँव का कुआँ भी लबालब भर गयारायका समुदाय इस क्षेत्र की सबसे पिछड़ी जाति है। पारम्परिक तौर पर ऊँटों के व्यापारी रायका थोड़ी सी आमदनी से गुजारा करते। लेकिन आज इस इलाके के 15 रायका परिवारों के पास पक्के मकान और खेत हैं जिस पर सब्जियाँ, गेहूँ और सरसों की फसल उन्हें अच्छी आमदनी देती हैं। 30 वर्षीय जय सिंह रायका कहते हैं कि उनकी जमीन पर कोई सिंचाई सुविधा नहीं थी पर पास में एक जोहड़ के निर्माण से उनके भी कुएँ तर हो गए जिससे फसल अच्छी होने लगी।

अपने दम पर पानी और जंगल सहेज रहे हैं ग्रामीण


धीरे-धीरे जब खेती में सुधार हुआ तो समाज का योगदान 25 प्रतिशत से बढ़कर 100 प्रतिशत हो गया। पिछले तीन साल से संस्था ने कुछ भी खर्चा नहीं किया परन्तु जोहड़, एनीकट और मेड़बन्दी बनती चली जा रही है।

गाँव वाले निर्माण से लेकर मरम्मत और वनों का संरक्षण अपने दम पर कर रहें हैं। कुंज बिहारी एक तकनीकी सहायक की तरह जरूरत पड़ने पर हाजिर हो जाते हैं। वह बताते हैं कि हर कोई यहाँ एक इंजीनियर है। वह केवल पानी के सतही और धरातल के स्वभाव को ही नहीं, निर्माण के सभी पहलुओं की जानकारी रखते हैं।

यह ज्ञान सरकारी कामों की निगरानी में भी मदद करता है। घेवर निवासी गजानंद शर्मा कहते हैं कि कई बार ग्रामीण रोजगार योजना के तहत किया गया काम बुरी क्वालिटी का पाया जाता है। उस पर आपत्ति जताने से, उनके गाँव में अब ज्यादा काम अलाट नहीं होता पर उन्हें इस बात की खुशी है कि गाँववालों की दखलंदाजी से सरकारी पैसे की बर्बादी रुक गई है। उनकी सोच साफ है कि जब हम खुद अपना काम करने में सक्षम हैं तो बाहर से मदद क्यों लें? इसी सोच का प्रमाण है वह एनीकट जो शर्मा अपने खेत से गुजरते एक छोटे से नाले पर बना रहे हैं।

गजानंद शर्मा कहते है, 'इस एनीकट से बरसात के बाद मेरे खेत में पानी भर जाएगा और रिकॉर्ड गेहूँ का उत्पादन होगा । इसके अलावा आसपास के दर्जन भर किसानों के कुओं में पानी का स्तर उपर उठेगा। इस एनीकट के निर्माण का सारा खर्च हम सब किसान मिल कर उठा रहें हैं। अब हमें किसी सरकारी या गैर सरकारी संस्था की मदद नहीं चाहिए।”

पानी और जंगल बचाने से हरा-भरा घेवर गाँव का कृषि जोहड़ का रखरखाव भी एक स्थायी प्रणाली है। चारे के रूप में आसपास के पेड़ों की पत्तियों का उपयोग करने वाले को जोहड़ से गाद की एक निश्चित मात्रा निकाल कर पाल पर डालना जरूरी है। इससे जोहड़ गहरा रहता है और दीवार मजबूत।

जैसे नान्दूवाली नदी की धाराएँ आकाश और पाताल में मिलकर दूर-दराज की मिट्टी को भी सींचती होंगी वैसे ही इसके किनारे बसा यह समाज सूखे की मार झेल रहे कई इलाकों के लिये प्रेरणास्रोत बन चुका है।


Tags; Nanduwali River in Rajasthan, Dought in Rajasthan, Revival of Nanduwali River

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