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लाल मिट्टियों में संसाधन संरक्षण एवं ज्वार की उपज बढ़ाने हेतु उन्नत भूपरिष्करण तथा पलवार विधियाँ (Advanced landscaping and Pliable methods to increase the yield of resource protection and Sorghum vulgare in red soil)

Author: 
प्रशांत कुमार मिश्रा
Source: 
भा.कृ.अनु.प. - भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान अनुसन्धान केन्द्र, दतिया (मध्य प्रदेश)

खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने की दिशा में बारानी क्षेत्रों में कृषि उत्पादन बढ़ाने की अपार सम्भावनाएँ हैं जो देश के शुद्ध खेती योग्य क्षेत्र का लगभग 60 प्रतिशत भाग है। लाल मिट्टियों का समूह तीन मृदा समूहों (लाल, काली एवं उप पहाड़ी मिट्टियाँ) में से एक प्रमुख समूह है जो मुख्यरूप से बारानी क्षेत्रों में पाया जाता है। पारम्परिक विधियों से खेती करने पर इन मिट्टियों से जल अपवाह एवं मृदा कटाव होता है जिससे इसकी उत्पादन क्षमता कम हो जाती है। मध्य भारत के बुन्देलखण्ड क्षेत्र में लाल मिट्टियाँ लगभग 50 प्रतिशत क्षेत्र में पायी जाती हैं, जहाँ सामान्यतः बारानी खेती की जाती है। भूमि की निचली सतह में पायी जाने वाली अपारगम्य पर्त तथा वर्षा उपरान्त भूमि सतह पर एक कड़ी पर्त बन जाने के कारण इन मिट्टियों से वर्षाजल का एक बड़ा भाग अपवाह के रूप में बहकर नष्ट हो जाता है। अतः वर्षा के मौसम में भी फसलों को सूखे का सामना करना पड़ता है जिसके कारण फसलों की बढ़वार एवं उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इन परिस्थितियों में एक ऐसी तकनीक की आवश्यकता है जो आसानी से इन अवरोधों को दूर कर सके। उन्नत भूपरिष्करण एवं सतही पलवार भूमि सतह के वर्षाजल को ग्रहण करने एवं उसे तीव्रता से भूमि में अवशोषित करने तथा संग्रहित करने में मुख्य भूमिका निभा सकते हैं।

प्रस्तावना


बुन्देलखण्ड क्षेत्र में लाल मिट्टियाँ 50 प्रतिशत से अधिक क्षेत्रफल में पायी जाती हैं परन्तु इनकी उत्पादन क्षमता भूमि की कम उर्वरा शक्ति एवं कम जलधारण क्षमता के कारण बहुत कम है। मुख्यतयः यह मिट्टियाँ ढालू क्षेत्रों में पायी जाती हैं जिसके कारण वर्षा के जल का काफी भाग अपवाह के रूप में बहकर नष्ट हो जाता है, जो अपने साथ काफी मात्रा में उपजाऊ मिट्टी तथा पोषक तत्वों को भी बहाकर ले जाता है। वर्षा के जल का अधिक अपवाह, भूमि की निचली सतह में पाई जाने वाली कठोर पर्त के कारण कम अवशोषण तथा वर्षा के बाद भूमि सतह पर बनने वाली कठोर पर्त के कारण होता है। अतः वर्षाऋतु में भी फसलें, लम्बे अन्तराल तक वर्षा न होने पर सूखे की समस्या से जूझती हैं जिसके कारण फसल की वृद्धि एवं उपज बुरी तरह प्रभावित होती है। इन परिस्थितियों में उन्नत भूपरिष्करण एवं पलवार विधियाँ भूमि सतह को वर्षाजल ग्रहण करने तथा उसे तीव्रता से सोखने एवं अधिक मात्रा में भूमि में संरक्षित रखने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। अन्य फसलों की तुलना में अधिक सूखा सहन करने की क्षमता के कारण ज्वार इस क्षेत्र की वर्षाऋतु की प्रमुख फसल है। परन्तु यह फसल भी वर्षा समाप्त हो जाने के बाद दाना भरने की अवस्था में भूमि में नमी की कमी के कारण सूखे का सामना करती है जिसके कारण उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

तकनीक विवरण


उन्नत भूपरिष्करण एवं पलवार क्यों?
उन्नत भूपरिष्करण एवं पलवार भूमि में अधिक मात्रा में वर्षाजल के संरक्षण में सहायक होते हैं, अतः यह फसल की वृद्धि एवं उपज बढ़ाने में भी सहायक होते हैं।

उन्नत भूपरिष्करण


रबी फसलों की कटाई के पश्चात, अप्रैल-मई के महीने में भूमि के सौरीकरण के लिये, मिट्टी पलटने वाले मोल्डबोर्ड या डिस्क हल से 20 सेमी तक गहरी जुताई करनी चाहिए। भूमि की जुताई समोच्च पर करनी चाहिए। मई-जून की तेज गर्मी के कारण भूमि जनित हानिकारक कीट, लार्वा, फफूँद, सूक्ष्म जीव, बहुवर्षीय खरपतवार आदि नष्ट हो जाते हैं। भूमि का यह सौरीकरण कीड़े-मकोड़ों और बीमारियों को कम करने में सहायक होता है। गहरी जुताई भूमि में अधिक मात्रा में वर्षाजल के संग्रहण, अवशोषण एवं संरक्षण में भी सहायक होती है।

ज्वार की खेती एवं स्व स्थान पलवार की उन्नत विधियाँ


खेत की तैयारी एवं बुआई का समय - मानसून वर्षा की कुछ बौछारों के पश्चात भूमि में उपयुक्त नमी हो जाने के उपरान्त ही भूमि की तैयारी करनी चाहिए। गहरी जुताई के पश्चात हैरो एवं पटेला लगाकर भूमि को समतल करके बुआई के लिये तैयार करना चाहिए। बुआई मानसून आने के एक सप्ताह के भीतर जुलाई के प्रथम सप्ताह तक कर देनी चाहिए। समय से बोई गई फसल तना भेदक मक्खी के नुकसान से बच जाती है।

खाद एवं उर्वरक – अन्तिम जुताई के समय 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की सड़ी खाद एवं 40 किलो नत्रजन (नाइट्रोजन) प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में मिलाना चाहिए। अगर गोबर की खाद उपलब्ध न हो तो 80 किलोग्राम नत्रजन (नाइट्रोजन), 40 किलोग्राम फास्फोरस एवं 20 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा अन्तिम जुताई के समय खेत में समान रूप से छिड़ककर मिट्टी में मिलानी चाहिए। नत्रजन की शेष आधी मात्रा बुआई के 30 से 35 दिन बाद खड़ी फसल पर समान रूप से छिड़क देनी चाहिए। जस्ते की कमी वाले क्षेत्रों में जिंक सल्फेट 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 3 वर्ष में एक बार अन्तिम जुताई के समय प्रयोग करना चाहिए।

जातियाँ – अधिक उपज प्राप्त करने के लिये ज्वार की संकर जातियों (सीएसएच 14, सीएसएच 16, सीएसएच 18, सीएसएच 23) को अन्य जातियों की तुलना में प्राथमिकता देनी चाहिए।

बीजोपचार – बीज को थायराम या बावस्टिन 2.5 ग्राम/किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। बीजोपचार, बीज जनित फफूँदियों द्वारा होने वाली बीमारियों से बचाव में सहायक होता है।

बीज दर एवं पौध संख्या – बुआई पंक्तियों में समोच्च पर करनी चाहिए। उचित पौध संख्या 1,80,000 पौधे/हेक्टेयर प्राप्त करने के लिये बीज दर 8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होनी चाहिए, जिसे 60 सेमी पंक्ति से पंक्ति एवं 9.5 सेमी पौधे से पौधे की दूरी पर बोना चाहिए।

सनई का स्व स्थान पलवार – ज्वार की दो पंक्तियों के बीच सनई की एक पंक्ति 30 सेमी की दूरी पर बोने के लिये 20 किलोग्राम सनई का बीज एक हेक्टेयर की बुआई के लिये पर्याप्त रहता है। बुआई के 25 दिन बाद सनई की पंक्ति को भू सतह से काटकर ज्वार की दो पंक्तियों के बीच की जगह में समान रूप से पलवार के रूप में फैला देना चाहिए। यह भू-अपरदन को कम करने एवं भूमि में नमी को लम्बे समय तक संरक्षित करने में सहायक होता है।

ज्वार की फसल

फसल सुरक्षा


कीड़े/मकोड़े
तना मक्खी –
यह ज्वार का मुख्य कीट है जो फसल की प्रारम्भिक पौध अवस्था में आक्रमण करता है। तीन सप्ताह तक के पौधे इस कीट के प्रकोप से अधिक प्रभावित होते हैं। फसल के इस कीट से अधिक प्रभावित होने की दशा में फसल की पुनः बुआई की आवश्यकता पड़ सकती है। इस कीट की रोकथाम के लिये फोरेट 10 जी की 20 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से अन्तिम जुताई के समय समानरूप से छिड़ककर भूमि में अच्छी तरह से मिलाना चाहिए अथवा मेटासिस्टाक्स 25 ई.सी. का 0.025 प्रतिशत का घोल अंकुरण के एक सप्ताह बाद फसल पर छिड़कना चाहिए और 15 दिन के बाद पुनः छिड़कना चाहिए।

तना भेदक – ज्वार की सम्पूर्ण फसल अवधि में इस कीट का प्रकोप रहता है। इसकी रोकथाम के लिये थायोडान 35 ई.सी. का 0.1 प्रतिशत का घोल बनाकर बुआई के 15 दिन के बाद छिड़काव करना चाहिए। तदोपरान्त 15 दिन बाद दानेदार कीटनाशक (फोरेट 10 जी) की कणिकाएँ 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से पौधों की गोफ में डालना चाहिए।

ज्वार की मिज – यह बहुतायत में पाया जाने वाला ज्वार का प्रमुख कीट है। इस कीट के प्रकोप के कारण दानों का विकास रुक जाता है तथा अधिक प्रकोप की दशा में पूरा भुट्टा प्रभावित हो जाता है। जिसके कारण उपज में भारी कमी आ जाती है। इसकी रोकथाम के लिये 5 प्रतिशत मैलाथियान धूलि को 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से फसल पर बुरकाव करना चाहिए।

ज्वार के भुट्टे की बग – वयस्क एवं निम्फ दोनों विकसित होने पर दानों का दूध चूसते हैं जिसके फलस्वरूप दानें सूखे व हल्के रह जाते हैं। जब अधिक संख्या में इनके निम्फ दानों का दूध चूसते हैं तो पहले पूरा भुट्टा काला पड़ता है तत्पश्चात इसके सूख जाने के कारण उनमें कोई दाना नहीं पड़ता है। इसकी रोकथाम के लिये 5 प्रतिशत पैराथियान, कार्बोरिल या मैलाथियान धूलि का बुरकाव 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिए।

पत्ती मोड़क – इसकी रोकथाम के लिये 5 प्रतिशत पैराथियान या मैलाथियान धूलि का बुरकाव 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिए।

रोग नियन्त्रण


बीज विगलन एवं पौध झुलसा – देखने में स्वस्थ लगने वाले बीज भी बहुत से हानिकारक फफूँदों द्वारा प्रभावित हो सकते हैं। यह फफूँद केवल अंकुरण को ही नहीं कम करते हैं अपितु बहुत सी पौध सम्बन्धी बीमारियाँ भी पैदा करते हैं। बीज एवं बीज के चारों ओर मिट्टी में पाये जाने वाले फफूँद, जड़ व अंकुर को सड़ा देते हैं। इनकी रोकथाम के लिये थायराम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार किया जाना चाहिए।

डाउनी मृदुल आसिता – इस रोग के लक्षण फसल की नई पत्तियों की निचली सतह पर सफेद फफूँद की वृद्धि एवं उसी जगह पत्ती के ऊपरी सतह पर पीलेपन के रूप में दिखायी देते हैं। ये पत्तियाँ कुछ समय पश्चात नीचे की ओर झुकने लगती हैं। इस रोग की रोकथाम पूर्ण वर्णित बीजोपचार द्वारा की जा सकती है। अन्यथा, डायथेन एम-45 का 0.2 प्रतिशत घोल के छिड़काव द्वारा फफूँद जनित संक्रमण का सफल नियन्त्रण किया जा सकता है।

जोनेट रोग एवं सरकोस्पोरा रोग के पत्ती पर धब्बे – जोनेट रोग में पत्तियों पर पहले छोटे लाल भूरे रंग के पानी युक्त धब्बे बनते हैं। तदोपरान्त ये धब्बे गहरे रंग में बदलकर बड़े अर्द्ध गोलाकार या अनियमित आकार के होकर पूरी पत्ती पर फैल जाते हैं। सरकोस्पोरा रोग में पत्ती पर दोनों ओर आयताकार धब्बे अलग-अलग होकर बनते हैं जो शिराओं के बीच में रहते हैं। ये धब्बे लाल, बैंगनी, भूरे या भूसे के रंग के हो सकते हैं। इनकी रोकथाम के लिये डायथेन एम-45 के घोल का 0.2 प्रतिशत छिड़काव बुआई के 30, 45 और 60 दिन बाद किया जाना चाहिए।

दाने का कण्डवा एवं आवृत कण्डवा – स्वस्थ दानों के स्थान पर कण्डवे के सोराई यहाँ-वहाँ भुट्टे पर बनते हैं। कण्डवा युक्त दानों का आकार सामान्य दानों से बड़ा होता है। आवृत कण्डवा रोग से प्रभावित पौधे असामान्य, पतले तने वाले परन्तु ज्यादा कल्ले वाले तथा इन पर स्वस्थ पौधों की अपेक्षा पहले फूल आते हैं। पूरे भुट्टे के सभी स्पाइकलेट्स टेढ़े-मेढ़े असामान्य आकृति के हो जाते हैं। प्रभावित भुट्टा एक पत्तियों के गुच्छे या उभारदार संरचना के रूप में दिखाई देता है। इस बीमारी पर पूर्ण नियंत्रण के लिये थायराम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज दर से बुआई के पहले बीजोपचार करना चाहिए।

कटाई एवं गहाई – जब दाने कड़े हो जायें तथा उनमें 25 प्रतिशत से कम नमी की मात्रा हो तब फसल की कटाई करनी चाहिए। कटाई के लिये पत्तियों और डन्ठलों के सूखने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि संकर ज्वार के पकने पर भी फसल के पौधे हरे रहते हैं। कटाई के समय पूरे पौधों को काटा जा सकता है या फिर पहले भुट्टों को काट लें तत्पश्चात शेष बचे पौधों को बाद में काटा जा सकता है। फसल की गहाई थ्रेसर द्वारा या भुट्टों को पीटकर या फिर बैलों द्वारा दायें चलाकर की जा सकती है। गहाई के पश्चात दानों को साफ करके उन्हें लगभग एक सप्ताह तक धूप में सुखाना चाहिए।। ताकि दानों में नमी 13 से 15 प्रतिशत तक रह जाये जिस पर भण्डारण करना सुरक्षित रहता है।

उन्नत भूपरिष्करण व स्व स्थान पलवार के लाभ


वर्षाजल का संरक्षण – केन्द्र के अनुसन्धान अनुभव दर्शाते हैं कि उन्नत भूपरिष्करण (20 सेमी गहरी) एवं सनई का स्व स्थान पलवार भूमि में परम्परागत जुताई (7 सेमी) की तुलना में वर्षाजल संरक्षण में अधिक सहायक रहे। परम्परागत जुताई की तुलना में उन्नत भूपरिष्करण द्वारा वर्षाजल संरक्षण में 18 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो सनई के स्व स्थान पलवार द्वारा बढ़कर 34 प्रतिशत हो गई।

 

तालिका-1 : विभिन्न भूपरिष्करण एवं पलवार विधियों द्वारा ज्वार की फसल में वर्षाजल संरक्षण

उपचार

वर्षाजल संरक्षण

मिमी

परम्परागत भूपरिष्करण की तुलना में वृद्धि (%)

परम्परागत भूपरिष्करण

297.3

-

उन्नत भूपरिष्करण

351.8

18

उन्नत भूपरिष्करण + सनई का स्व स्थान पलवार

398.8

34

 

 
दाने एवं कड़वी की उपज – परम्परागत भूपरिष्करण की तुलना में उन्नत भूपरिष्करण द्वारा ज्वार की उपज में 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो सनई के स्व स्थान पलवार का प्रयोग करने पर 47 प्रतिशत तक बढ़ गई। ज्वार की कड़वी की उपज में परम्परागत भूपरिष्करण की तुलना में उन्नत भूपरिष्करण एवं उन्नत भूपरिष्करण तथा सनई के स्व स्थान पलवार द्वारा क्रमशः 26 एवं 36 प्रतिशत की बढ़त हुई।

 

तालिका-2 : भूपरिष्करण एवं सनई का स्व स्थान पलवार का ज्वार के दाने एवं कड़वी की उपज पर प्रभाव

उपचार

उपज (किलोग्राम प्रति हेक्टेयर)

दाना

कड़वी

परम्परागत भूपरिष्करण

2,249

7,358

उन्नत भूपरिष्करण

2,991

9,294

उन्नत भूपरिष्करण + सनई का स्व स्थान पलवार

3,810

9,981

 

 
उन्नत भूपरिष्करण एवं सनई का स्व स्थान पलवार के प्रयोग द्वारा ज्वार की अच्छी फसल

आर्थिक मूल्यांकन


आर्थिक विवेचना से विदित हुआ कि उन्नत भूपरिष्करण एवं सनई का स्व स्थान पलवार, परम्परागत भूपरिष्करण की तुलना में लाभ बढ़ाने में सहायक रहे। परम्परागत भूपरिष्करण की तुलना में उन्नत भूपरिष्करण द्वारा रुपये 4,610 का अतिरिक्त शुद्ध लाभ हुआ जो सनई के स्व स्थान पलवार के प्रयोग द्वारा बढ़कर रुपये 7,437 प्रति हेक्टेयर हो गया।

 

तालिका 3 : विभिन्न भू-परिष्करण एवं पलवार विधियों के अन्तर्गत अतिरिक्त शुद्ध लाभ

उपचार

परम्परागत भूपरिष्करण की तुलना में अतिरिक्त शुद्ध लाभ (रुपये प्रति हेक्टेयर)

परम्परागत भूपरिष्करण

-

उन्नत भूपरिष्करण

4,610

उन्नत भूपरिष्करण + सनई का स्व स्थान पलवार

7,437

 

 

सम्भावनायें एवं सीमायें


बारानी दशा में लाल मिट्टियों में, अनिश्चित उपज एवं फसल का असफल होना सामान्य बात है। उन्नत भूपरिष्करण एवं स्व स्थान पलवार विधियों को अपनाकर अधिक मात्रा में वर्षाजल का संरक्षण करते हुए अधिक दूरी पर बोई जाने वाली लम्बी अवधि की खरीफ की फसलें जैसे – ज्वार, मक्का, अरहर व अरण्डी आदि की फसल वृद्धि एवं उत्पादन क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। अपितु केवल उन्नत भूपरिष्करण द्वारा अधिक मात्रा में वर्षाजल का संरक्षण करते हुए खरीफ की फसलें जैसे – सोयाबीन, मूँगफली और ग्वार का उत्पादन भी बढ़ाया जा सकता है क्योंकि सामान्यतया इन फसलों को बारानी दशा में उगाया जाता है और लम्बे अन्तराल तक वर्षा के मौसम में वर्षा न होने पर भी ये फसलें बारानी दशा में सूखे का सामना करने में सक्षम हैं।

अधिक जानकारी हेतु सम्पर्क करें


केन्द्राध्यक्ष
भा.कृ.अनु.प. - भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान अनुसन्धान केन्द्र
दतिया - 475 661 (मध्य प्रदेश), दूरभाष - 07522-237372/237373, फैक्स - 07522-290229/400993, ई-मेल - cswcrtidatia@rediffmail.com

अथवा
निदेशक
भा.कृ.अनु.प. - भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान अनुसन्धान केन्द्र, 218, कौलागढ़ रोड, देहरादून - 248 195 (उत्तराखण्ड), दूरभाष - 0135-2758564, फैक्स - 0135-2754213, ई-मेल - directorsoilcons@gmail.com

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