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श्री श्री-यमुना विवाद : चोरी और सीनाजोरी


.राष्ट्रीय हरित पंचाट के इतिहास में चोरी और सीनाजोरी की ऐसी दबंग मिसाल शायद ही कोई और हो। शासन, प्रशासन से लेकर निजी कम्पनी तक कई ऐसे हैं, जिन्होंने हरित पंचाट के आदेशों को मानने में हीला-हवाली दिखाई है। पंचाट के कई आदेश हैं, जिनकी अनदेखी आज भी जारी है; किन्तु इससे पहले शायद ही कोई ऐसा आरोपी होगा, जिसने आदेश की अवमानना करने पर दंडित करने की हरित पंचाट की शक्ति को चुनौती देने की हिमाकत की हो। विश्व सांस्कृतिक उत्सव (11-13 मार्च, 2016 ) के आयोजक ने की है।

हालांकि हरित पंचाट ने यह स्पष्ट किया कि आदेश की अवमानना होने पर दंडित करने के हरित पंचाट को भी वही अधिकार प्राप्त हैं, जैसे किसी दूसरे सिविल कोर्ट को, किन्तु चुनौती देकर आयोजक के वकील ने यह सन्देश देने की कोशिश तो की ही कि वह आदेश की अवमानना करे भी तो हरित पंचाट उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

हरित पंचाट के इतिहास में यह पहला ऐसा मामला है। ढाई महीने के बाद इसने मुझे फिर मजबूर किया है कि मैं यमुना नदी पर विश्व सांस्कृतिक उत्सव के आयोजक की कारगुजारियाँ फिर पाठकों के सामने रखूँ।

यमुना बनाम श्री श्री


आर्ट ऑफ लिविंग प्रमुख श्री श्री रविशंकर जी की अगुवाई में दिल्ली की यमुना पर हुए विश्व सांस्कृतिक उत्सव की याद आपको होगी ही। उत्सव के स्थान चयन और उससे यमुना नदी पारिस्थितिकी को हुए नुकसान पर यमुना जिये अभियान के मनोज मिश्र द्वारा मामले को हरित पंचाट में ले जाने की याद भी आपको होगी। ‘व्यक्ति विकास केन्द्र’, आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन की सहयोगी संस्था है। विश्व सांस्कृतिक उत्सव के लिये यमुना भूमि का उपयोग करने की अनुमति का आवेदन ‘व्यक्ति विकास केन्द्र’ ने किया था। इस नाते वही उत्सव का औपचारिक आयोजक ‘व्यक्ति विकास केन्द्र’ ही था।

तीन आदेश


याद कीजिए कि विश्व सांस्कृतिक उत्सव मामले में राष्ट्रीय हरित पंचाट ने नौ मार्च, 2016 को एक आदेश जारी किया था। आदेश में अन्य के अलावा तीन बातें मुख्य थी:

पहला, हरित पंचाट ने हुए पारिस्थितिकीय नुकसान के लिये आयोजक और उसे आयोजन की अनुमति देने वाले दिल्ली विकास प्राधिकरण..दोनों को दोषी माना था। कहा था कि आयोजक, आयोजन शुरू होने से पहले यानी 11 मार्च, 2016 की शाम से पहले पाँच करोड़ रुपए की राशि दिल्ली विकास प्राधिकरण के पास जमा करे। हरित पंचाट ने यह राशि, यमुना को हुए पारिस्थितिकीय नुकसान की भरपाई की अग्रिम राशि के तौर तय की थी।

.दूसरा, हरित पंचाट की प्रधान समिति आयोजन के मौके का मुआयना कर चार सप्ताह के भीतर कुल नुकसान के आर्थिक आकलन की रिपोर्ट पंचाट के समक्ष पेश करे। इस पर पंचाट तय करेगा कि उसमें से कितना भुगतान उत्सव के आयोजक को करना है और कितना दिल्ली विकास प्राधिकरण को।

तीसरे तथ्य के तौर पर पंचाट पीठ ने कहा था कि नदी शुद्धिकरण के लिये लाये गए एंजाइम की कोई प्रमाणिकता नहीं है, लिहाजा उसे यमुना में न डाला जाये।

तीन अवमानना


यह सीनाजोरी नहीं, तो और क्या है कि आयोजकों ने सुनिश्चित किया कि उक्त तीनों मुख्य आदेशों की पालना न होने पाये। जानिए कि कैसे?

1. कार्यक्रम सम्पन्न होते ही आयोजकोें ने एंजाइम के ड्रम वहीं यमुना में उड़ेल दिये। मीडिया में उसकी तस्वीरें छपी।
2. आयोजक-व्यक्ति विकास केन्द्र ने कहा कि उसके पास इतनी बड़ी धनराशि नकद नहीं है। उसने आयोजन से पूर्व तय पाँच करोड़ में से मात्र 25 लाख रुपए जमा किये और शेष को जमा करने के लिये वक्त माँगा। पंचाट ने तीन सप्ताह का और वक्त दिया और आयोजक ने ऐसा करने का स्वीकारनामा दिया, किन्तु समय समाप्ति की अन्तिम तारीख (एक अप्रैल, 2016) को वह पलट गया। एक अप्रैल को पंचाट को दिये आवेदन में आयोजक ने कहा कि नकद की जगह उसे 4.75 करोड़ बैंक गारंटी जमा करने की अनुमति दी जाये। पंचाट ने इससे इनकार किया। इस इनकार को भी लगभग दो महीने होने को हैं, किन्तु विश्व सांस्कृतिक उत्सव के आयोजक ने अभी तक एक धेला नहीं जमा किया है। यह हरित पंचाट के आदेश की अवमानना है। आयोजक द्वारा आदेश की अवमानना को लेकर याची ने पंचाट में दो शिकायतें दर्ज की। आयोजक ने कोई लिखित जवाब पेश नहीं किया। वकील ने टालू रवैया अपनाया। उसने कहा कि दो शिकायतों में एक का जवाब तैयार है; एक का अभी तैयार करना है।

गौर कीजिए कि प्रतिक्रिया में हरित पंचाट ने कहा कि अपनी बैंक गारंटी अपने पास रखो; 25 मई की सुनवाई के बाद उसने तीन दिन के भीतर जवाब जमा करने को भी कहा; लेकिन मालूम नहीं किस दबाव में पंचाट अपनी अवमानना सहती रही? पंचाट की इस सहनशक्ति को उसकी कमजोरी समझ कर ही आयोजक के वकील ने हरित पंचाट पीठ से सवाल किया कि क्या उसके आदेश की आवमानना पर कार्रवाई करने का उसे कोई अधिकार है?

31 मई का समाचार है कि हरित पंचाट ने बैंक गारंटी तथा जगह को जैव विविधता पार्क के रूप में विकसित करने की अनुमति आयोजक को देने से पुनः इनकार कर दिया है। बैंक गारंटी की अनुमति की अर्जी देने की एवज में रुपए पाँच हजार का जुर्माना लगाया है और एक सप्ताह के भीतर अग्रिम मुआवजा राशि का बकाया जमा करने को कहा है।

उत्तराखण्ड की कोसी नदी में गन्दगी निपटान की कार्ययोजना नहीं सौंपे जाने से नाराज राष्ट्रीय हरित पंचाट के अध्यक्ष श्री स्वतंत्र कुमार की पीठ ने एक बयान दिया- “पंचाट के आदेशों को क्रियान्वित करना पर्यावरण न्याय का तत्व है और लोग, खासकर अधिकारी, जो निर्देशों का पालन नहीं करते, वे न सिर्फ अवज्ञा के जिम्मेदार हैं, बल्कि प्रदूषण करने और क्षेत्र के पर्यावरण और पारिस्थितिकी की गिरावट के लिये भी जिम्मेदार हैं।’’

आर्ट ऑफ लिविंग का अन्तरराष्ट्रीय आश्रमयह बयान एक आइना जरूर है, लेकिन आदेश की अवमानना करने वाले यदि अवमानना को दंडित करने की शक्ति को ही चुनौती देने लग जाएँ, तो यह आइना कितना कारगर होगा? स्वयं पंचाट के लिये विचारणीय प्रश्न आज यही है।

3. नौ मार्च के आदेश के अनुसार, हरित पंचाट की प्रधान समिति को आयोजन से चार सप्ताह के भीतर उत्सव से यमुना की पारिस्थितिकी को हुए नुकसान का आकलन पेश करना था। एक अपैल, 2016 को दिये आवेदन में आयोजक ने पंचाट से अनुरोध किया नुकसान का आकलन करने वाली समिति का सहयोग करने की उसे भी अनुमति दी जाये। उसके बाद आयोजक द्वारा पंचाट की प्रधान समिति को यह कहकर मौका मुआयना करने से रोका गया कि उसने आयोजन स्थल को आधिकारिक तौर पर दिल्ली विकास प्राधिकरण को नहीं सौंपा है।

आयोजक के वकील ने अपने ताजा बयान में कहा है कि उन्होंने यमुना का कोई नुकसान नहीं किया। उलटा उन्होंने तो जमीन को पहले से बेहतर स्थिति में वापस लौटाया है।

जमीन नहीं लौटाने का पेंच


दिल्ली विकास प्राधिकरण द्वारा व्यक्ति विकास केन्द्र को दिये अनुमति पत्र के अनुसार भूमि का आवंटन किया गया है। यह आंवटन कितनी अवधि का है? इसकी अस्पष्टता में आयोजन के ढाई महीने बाद भी आयोजन स्थल को औपचारिक तौर पर दिल्ली विकास प्राधिकरण को सौंपने का पेंच छिपा है।

यदि जमीन अब तक नहीं लौटाई, तो दिल्ली विकास प्राधिकरण ने कार्रवाई क्यों नहीं की? वह क्यों चुप रहा? क्या इसमें उसकी भी कुछ शह है? क्या वह आगे चलकर रखरखाव के नाम पर वह यह जमीन लम्बी लीज अवधि के लिये आयोजक को आवंटित करने के फेर में है? आयोजक ने अदालत से जमीन को जैव विविधता पार्क के रूप में विकसित करने की अनुमति चाही थी। आगे वह उसके रखरखाव की जिम्मेदारी लेने के नाम पर अपना कब्जा बनाए रखने की जुगत लगाती।

आयोजक का व्यवहार हरित पंचाट को विश्वसनीय नहीं लगा। उसने मना कर दिया। जमीन न लौटाने के पीछे पेंच यह भी हो सकता है कि बारिश आने के बाद नुकसान का सही आकलन करना मुश्किल हो जाएगा। गर्मी में छुटिट्याँ हो जाएँगी। मामला अगस्त तक खिसक जाएगा। सत्य आगे पता चलेगा।

यमुना में एंजाइम डालते हुए आर्ट ऑफ लिविंग के कार्यकर्ता25 मई की आदेशानुसार, फिलहाल हरित पंचाट ने भारत सरकार के जलसंसाधन सचिव श्री शशिशेखर की अध्यक्षता वाली अपनी प्रधान समिति को कहा है कि वह अगले दो सप्ताह के भीतर (सात जून, 2016) यमुना पारिस्थितिकी को हुए नुकसान की आर्थिक आकलन रिपोर्ट जमा करे। गर्मी की छुट्टियों में पंचाट बन्द रहता है; लिहाजा, सुनवाई की अगली तारीख दो अगस्त, 2016 तय की गई है।

नकदी चुकाने में अक्षमता के सच की जाँच


इस प्रकरण का सबसे बड़ा सच वह झूठ है, जो आयोजक ने इतनी बड़ी रकम नकद देने में असमर्थता के रूप में हरित पंचाट के समक्ष रखा। ‘द कारवाँ’ द्वारा की गई एक जाँच इस झूठ का सच सामने रखती है।

आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन, दुनिया के 155 देशों में अपनी शाखाएँ बताता है। ‘द कारवाँ’ के मुताबिक, संयुक्त राज्य अमेरिका, यू के और नीदरलैंड...इन तीन देशों में ही श्री श्री की प्रमुखता में 234 करोड़ रुपए की सम्पत्ति तथा 81 करोड़ रुपए आय का पता चला है।

आय के मुख्य स्रोत क्रमशः पाठ्यक्रम व आयोजनों में ली जाने वाली फीस तथा नकदी व गैर नकदी रूप में प्राप्त सहयोग राशि दर्शाई गई है। ‘द कारवाँ’ की उक्त रिपोर्ट आर्ट ऑफ लिविंग (अमेरिका), आर्ट ऑफ लिविंग (यू के ), वेद विज्ञान महा विद्यापीठ (अमेरिका), शंकर यूरोप होल्डिंग बी वी (नीदरलैंड), शंकर यूरोप बी वी (नीदरलैंड) तथा आर्ट ऑफ लिविंग हेल्थ एंड एजुकेशन ट्रस्ट के वर्ष 2013 अथवा 2014 के खातों पर आधारित हैं।

एक अन्य जानकारी के मुताबिक पिछले नौ वर्षों में आर्ट ऑफ लिविंग के चार प्रमुख ट्रस्टों को 331.55 करोड़ रुपए की धनराशि विदेशों से सहयोग के रूप में प्राप्त हुई है। बकौल ‘द कारवाँ’, 5.54 करोड़ रुपए की विदेशी सहयोग राशि तो श्री श्री से सम्बद्ध श्री श्री सम्बद्ध अकेले इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर ह्यूमन वैल्यूज को मार्च 31,2016 की पहली तिमाही में ही प्राप्त हुई। मार्च 31,2016 की पहली तिमाही में ही प्राप्त हुए हैं।

’द कारवाँ’ द्वारा जारी जाँच रिपोर्ट में कहा गया है कि स्विस व्यावसायिक रजिस्ट्रार ने स्विस में श्री श्री रविशंकर से सम्बद्ध दो संस्थाओं और एक कम्पनी के खातों के सम्बन्ध में ‘द कारवाँ’ का आवेदन स्वीकार नहीं किया। जाहिर है कि जब कभी श्री श्री से सम्बद्ध समस्त संगठनों/कम्पनियों का लेखा-जोखा सामने आएगा, तो सम्पत्ति और आय का आँकड़ा कम नहीं होगा।

यह मजहबी आकाओं के व्यावसायीकरण का दौर है। इस दौर में श्री श्री समूह की आय का अधिक होना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन आय होते हुए भी असमर्थता का रोना रोना पर्यावरणीय न्याय और व्यक्तिगत नैतिकता की दृष्टि से क्या सचमुच अच्छी बात है?

सीनाजोरी का दूसरा नमूना ‘टेम्पल ऑफ नॉलेज’


पूर्वी कोलकाता वेटलैंड पर आर्ट ऑफ लिविंग का टेम्पल ऑफ नॉलेज आश्रमविश्व सांस्कृतिक उत्सव के आयोजक का यह रवैया स्पष्ट करता है कि पर्यावरण और पर्यावरण को न्याय देने के लिये स्थापित राष्ट्रीय हरित पंचाट को लेकर उनकी मंशा क्या है? आर्ट ऑफ लिविंग की मंशा की स्पष्टता कोलकोता के दलदली क्षेत्र में मनाही के बावजूद बनाई ‘टेम्पल ऑफ नॉलेज’ नामक 8,000 वर्ग फीट 60 फीट ऊँची नई इमारत से भी स्पष्ट होती है। हालांकि मनाही के बावजूद वहाँ बनी यह अकेली इमारत नहीं है, लेकिन अपने आकार और पर्यावरण की चिन्ता करने के श्री श्री के दावे के कारण यह इमारत एक मिसाल जरूर है।

गौर कीजिए कि करीमपुर में यह इमारत आर्ट ऑफ लिविंग से सम्बद्ध ‘वेद धर्म संस्थान ट्रस्ट’ की है। इमारत से सम्बद्ध सदस्य इसे पुराना बताते हैं। स्थानीय जानकारों के मुताबिक इमारत का निर्माण जुलाई-अगस्त, 2015 के मध्य शुरु हुआ। ‘कार्बन डेटिंग’ की जाँच सत्य बताती है। ईस्ट कलकत्ता वेटलैंड मैनेजमेंट अथॉरिटी ने अगस्त और सितम्बर, 2015 में ट्रस्ट को क्रमशः ‘कारण बताओ’ और फिर ‘निर्माण बन्द करो’नोटिस भी जारी किये।

स्थानीय पर्यावरण संगठन ‘पब्लिक’ की बोनानी कक्कड़ कहती हैं कि निर्माण उसके बावजूद जारी रहा और पूरा हुआ। बोनानी वेटलैंड अथॉरिटी की सदस्य भी हैं; कहती हैं कि वर्ष 1993 में पश्चिम बंगाल हाईकोर्ट के निर्देश तथा वेटलैंड अथॉरिटी की वर्ष 2005 की अधिसूचना के मुताबिक वेटलैंड का न तो भू-उपयोग बदला जा सकता है और न ही उसमें कोई नया निर्माण किया जा सकता है। उन्होंने इस आधार पर गत चार मार्च को अथॉरिटी में ‘टेम्पल ऑफ नॉलेज’ इमारत का मामला उठाने की कोशिश भी की, लेकिन निर्माण रोकने के लिये अथॉरिटी की पहल नोटिस के आगे नहीं बढ़ी।

यह न्यायप्रियता है या जिद्दप्रियता?


कारण कुछ भी हो, लेकिन चोरी पर सीनाजोरी के उक्त प्रतिबिम्ब शान्ति, प्रेम और भारतीय संस्कृति के उस बिम्ब से तो कतई मेल नहीं खाते, जिसके लिये आज तक दुनिया श्री श्री रविशंकर जी और आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन को जानती रही है। यदि श्री श्री लातूर जाकर एक नदी की पुनर्जीवन के लिये जनता के प्रयास पर अपना नाम लिखाने के लिये एक करोड़ रुपए का सहयोग दे सकते हैं, तो फिर यमुना को खुद किये नुकसान के लिये पाँच करोड़ क्यों नहीं?

यह श्री श्री की पर्यावरण न्यायप्रियता है या दिखाव प्रियता या फिर जिद्दप्रियता? पाठक तय करें।

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