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अब बगैर पानी के बना सकेंगे स्टील

Author: 
राजेश राय पप्पू
Source: 
दैनिक जागरण, 13 अक्टूबर 2017

भारतीय युवा वैज्ञानिक ने ईजाद की लौह पृथक्करण की नई तकनीक

सहरसा/पानी के बिना लोहे का उत्पादन सम्भव नहीं है। इस्पात उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती पानी की है। बड़ी उत्पादन इकाइयों में रोजाना करोड़ों गैलन पानी का इस्तेमाल किया जाता है। भारतीय युवा वैज्ञानिक ने इस समस्या से निपटने का उपाय ढूँढ निकाला है। इंजीनियर दीपक कुमार ने खनिज पदार्थ से लौह अयस्क को पृथक करने का जो फार्मूला दिया है, उसमें बिना पानी के ही यह काम सम्भव हो सकता है।

सिंक होल फ्लुइडाइजर तकनीक


दीपक द्वारा विकसित लौह अयस्क पृथक्करण की इस तकनीक में पानी की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसमें लौह खनिज को उचित ताप-दबाव में तरल अवस्था में लाकर उसमें हवा का बहाव कराया जाता है, जिससे पृथक्करण आसानी से हो जाता है।

बिजली-पानी दोनों की बचत


खनिज पदार्थ से लौह पृथक्करण की सामान्य इकाई, जिसमें प्रति घंटे 20 किलोवाट ऊर्जा की खपत होती है, उसमें प्रतिवर्ष 137 गीगा लीटर पानी खर्च होता है। सिंक होल फ्लुइडाइजर तकनीक से पानी के साथ-साथ बिजली भी बचाई जा सकेगी। मतलब प्रतिघंटे 20 किलोवाट ऊर्जा के साथ-साथ 137 गीगा लीटर पानी की भी बचत होगी।

शोध को मिली सराहना


पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में आयोजित लौह अयस्क सम्मेलन-2017 में दीपक को सिंक होल फ्लुइडाइजर तकनीक के लिये सर्वश्रेष्ठ युवा इंजीनियर के रूप में सम्मानित किया गया। बिहार के पूर्णिया जिले के रहने वाले दीपक आइएसएम धनबाद से खनिज अभियंत्रण में बीटेक करने के बाद ऑस्ट्रेलिया स्थित न्यूकैसल विश्वविद्यालय में रसायन के प्रख्यात प्रोफेसर केविन गेल्विन के पर्यवेक्षण में पीएचडी कर रहे हैं।

बिन पानी सब सून


1. 01 टन इस्पात उत्पादन में तीन लाख लीटर पानी होती है खपत
2. 30 करोड़ गैलन पानी का उपयोग प्रतिदिन होता है इंग्लैंड के शौटन इस्पात केन्द्र में
3. 03 लाख गैलन पानी का उपयोग रोजाना भारत के भिलाई स्टील प्लांट में किया जाता है

भिलाई स्टील प्लांट ने कहा


भारत में छत्तीसगढ़ स्थित भिलाई स्टील प्लांट इस्पात उत्पादन की बड़ी इकाइयों में से एक है। यहाँ रोजाना करीब लीन लाख गैलन पानी का इस्तेमाल होता है। भिलाई स्टील प्लांट के वाटर मैनेजमेंट डिपार्टमेेंट के डीजीएम संजय कुमार ने बताया कि माइंस से कच्चा लौह खनिज निकालने के बाद उसकी धुलाई की जाती है, जिसमें पानी की जरूरत पड़ती है। फिर फर्नेस (भट्टी) में 1500 डिग्री तापमान पर इसे पिघलाया जाता है। फर्नेस को ठंडा करने के लिये पानी की जरूरत होती है। इसके बाद हॉट मेंटल प्रोसेसिंग और रोलिंग में पानी की खपत होती है। इन सभी कामों को पानी के बिना नहीं किया जा सकता है। फिलहाल बिना पानी इस्पात उत्पादन सम्भव नहीं हो। अगर कोई नई तकनीकी आती है तो अमल में आने के बाद ही उस पर कुछ कहा जा सकेगा।

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