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एक राजनीतिक नहर की दास्तां


नदियों को जोड़ने का सपना देखने वाली नीतियों की आगे की दशा और दिशा क्या होगी। सिर्फ सतुलज यमुना लिंक नहर ही नहीं, देश के अमूमन सभी राज्य नदी के पानी को लेकर अपने-अपने पड़ोसी से टकराव की मुद्रा में हैं। कावेरी को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक, गंगा के पानी को लेकर बिहार और पश्चिम बंगाल, महानदी के मुद्दे पर छत्तीसगढ़ और उड़ीसा और नर्मदा को लेकर मध्य प्रदेश और गुजरात। ये बड़े विवाद तो वे है जो अभी छाए हुए हैं या आने वाले समय में सुर्खियाँ बनेंगे लेकिन इसके अलावा नहर के पानी को लेकर भी पूरे देश में तनाव फैल रहा है, मानों हम किसी जलयुद्ध के मुहाने पर बैठा समाज है।जिस नहर में चालीस साल में एक बूँद पानी नहीं बहा वहाँ पंजाब और हरियाणा खून बहाने को आतुर हैं। दूरदृष्टि वाले नेता जानते हैं कि आने वाले चुनाव पानी के वायदे पर ही जीते जाएँगे। जिस तरह पिछले चार दशकों से हरियाणा की एक बड़ी आबादी अपने हिस्से के पानी का इन्तजार कर रही है उसी तरह पंजाब के हरियाणा से सटे शांबु, सरला हेडवर्क्स और कपूरी जैसे इलाके भारी तनाव में हैं यह अलग बात है कि यहाँ के किसानों को एसवाईएल का कभी कोई लाभ नहीं मिला। पानी की किल्लत से जूझ रहे किसान अब जमीन वापसी की नई राजनीति में उलझ गए है, इस खुदी हुई जमीन को दोबारा खेती के लायक बनाना इन किसानों के बस की बात भी नहीं है।

यह एक संकेत है कि नदियों को जोड़ने का सपना देखने वाली नीतियों की आगे की दशा और दिशा क्या होगी। सिर्फ सतुलज यमुना लिंक नहर ही नहीं, देश के अमूमन सभी राज्य नदी के पानी को लेकर अपने-अपने पड़ोसी से टकराव की मुद्रा में हैं। कावेरी को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक, गंगा के पानी को लेकर बिहार और पश्चिम बंगाल, महानदी के मुद्दे पर छत्तीसगढ़ और उड़ीसा और नर्मदा को लेकर मध्य प्रदेश और गुजरात। ये बड़े विवाद तो वे है जो अभी छाए हुए हैं या आने वाले समय में सुर्खियाँ बनेंगे लेकिन इसके अलावा नहर के पानी को लेकर भी पूरे देश में तनाव फैल रहा है, मानों हम किसी जलयुद्ध के मुहाने पर बैठा समाज है।

वास्तव में जब नदी से नहर निकाली गई तो नदी के किनारे बसे समाज के बारे में नहीं सोचा गया अब नहर को बढ़ाने या बन्द करने की बात होती है तो उस समाज के बारे में नहीं सोचा जाता जिसकी नहर पर पूरी निर्भरता है। इसका एक उदाहरण यही यमुना लिंक नहर है, यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में हरियाणा के हितों की रक्षा के लिये नहर बन भी गई और इसमें पानी भी आ गया (जो कि आने वाले समय में तकरीबन असम्भव हो जाएगा) तो इसमें दिया जा रहा पानी राजस्थान को पहले से ही दिये जा रहे पानी में से ही होगा और राजस्थान को तो पहले ही समझौते से कम पानी दिया जा रहा है।

1981 के समझौते के अनुसार अभी 8 एमएएफ पानी इन्दिरा गाँधी फीडर और अन्य कैनाल से राजस्थान को मिल रहा है, जिससे भी बाँध नहीं भरने के कारण एक-दो एमएएफ पानी कम ही सप्लाई हो पाता है। उसमें से भी सतलुज यमुना लिंक के नाम 1.9 एमएएफ पानी हरियाणा को देने का सीधा असर राजस्थान पर पड़ने वाला है। हरियाणा को लिंक का पानी देते ही राजस्थान को मिलने वाले पानी की वास्तविक मात्रा 4 से 5 एमएएफ ही रह जाएगी।

यदि नई लिंक नहर आकार लेती है तो बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर में पानी का भारी संकट खड़ा हो जाएगा क्योंकि इन इलाकों में पानी की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। वास्तव में मूल समझौते में प्लान यह था कि भाखड़ा नांगल से इस नहर में रावी-व्यास का अतिरिक्त पानी बहाया जाएगा जिससे हरियाणा से ज्यादा फायदा पंजाब को होगा लेकिन उस दौर में आतंकवाद के तवे पर सिकती राजनीतिक रोटियों ने इस योजना को सफल ही नहीं होने दिया। नहर के निर्माण में लगे इंजीनियरों को उनके ऑफिस में घुसकर गोली मारी गई थी।

ड्रग्स की महामारी और फसल उत्पादन में लगातार गिरावट झेल रहे पंजाब में आतंकवाद के फिर से पैदा होने के खतरनाक संकेत मिलने शुरू हो गए है। सैकड़ों बेरोजगार युवा क्षेत्रवाद के नशे में मरने-मारने पर आतुर हैं, इस बार भी इसके बीज राजनीतिक दल विशेषकर कांग्रेस बो रही है और जमीन है सतलुज यमुना लिंक नहर।

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