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दूषित जल प्रबन्धन पर बने कानून


जल प्रदूषण से अधिक खतरा अल्पविकसित देशों में है। कच्चे मलजल का प्राकृतिक जल में प्रवाह द्वारा इसके निपटान की यह विधि भारत जैसे देशों में सबसे आम है। देश में इतने प्रचार-प्रसार के बाद भी कारखानों एवं घरों से निकलने वाले कचरे, मल, कीचड़, गन्दगी और विषाक्त प्रदूषक, सब पानी में फेंक दिये जाते हैं। मल उपचार के बावजूद समस्याएँ खड़ी होती हैं। कीचड़ के अतिरिक्त उद्योगों के रासायनों का रिसाव जल प्रदूषण का प्रमुख स्रोत हैं। मानव गतिविधियाँ पानी को प्रदूषित करने में बड़े पैमाने पर प्रभाव डाल रही हैं।केन्द्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्री उमा भारती ने कहा है कि देश में दूषित जल प्रबन्धन एक गम्भीर मुद्दा बन गया है। नई दिल्ली में अपने मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ साप्ताहिक बैठक में केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि यह मुद्दा अब उस स्थिति में पहुँच चुका है, जहाँ मंत्रालय को इसके लिये एक नया कानून बनाना होगा।

बैठक में केन्द्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण राज्य मंत्री श्री संजीव बालियान, मंत्रालय के सचिव शशि शेखर एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे। पानी की शुद्धता जीवन के लिये अति आवश्यक है। लम्बे समय से सबको शुद्ध पानी की उपलब्धता मुद्दा बना हुआ है। 'जल ही जीवन है।' अब यह कहावत सबको समझ में आने लगी है। हमारे आसपास तो पानी उपलब्ध है। लेकिन वह हमारे जरूरत के लिये अयोग्य साबित हो रहा है। जल मानव जीवन के उपयोग में आने वाली हर चीज के लिये अति आवश्यक है। पीने से लेकर कृषि, उद्योग, घरेलू काम, मनोरंजन हेतु और पर्यावरणीय गतिविधियों में इसकी जरूरत होती है। वस्तुत: इन सभी मानवीय उपयोगों में से ज्यादातर में ताजे जल की आवश्यकता होती है।

पृथ्वी पर पानी की कुल उपलब्ध भण्डार को जलमण्डल कहते हैं। पृथ्वी के इस जलमण्डल का 97.5 प्रतिशत समुद्रों में खारे जल के रूप में है और केवल 2.5 फीसदी ही मीठा पानी है, उसका भी दो तिहाई हिस्सा हिमनद और ध्रुवीय क्षेत्रों में हिम चादरों और हिम टोपियों के रूप में जमा है। शेष पिघला हुआ मीठा पानी मुख्यत: जल के रूप में पाया जाता है, जिसका केवल एक छोटा सा भाग भूमि के ऊपर धरातलीय जल के रूप में या हवा में वायुमण्डलीय जल के रूप में है।

मीठा पानी एक नवीकरणीय संसाधन है क्योंकि जल चक्र में प्राकृतिक रूप से इसका शुद्धिकरण होता रहता है, फिर भी विश्व के स्वच्छ पानी की पर्याप्तता लगातार गिर रही है। दुनिया के कई हिस्सों में पानी की माँग पहले से ही आपूर्ति से अधिक है और जैसे-जैसे विश्व में जनसंख्या में अभूतपूर्व दर से वृद्धि हो रही हैं, पानी की माँग बढ़ती जा रही है।

बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण, शहरीकरण, व्यावसायीकरण और जलवायु परिवर्तन ने पानी को दूषित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। इसके बावजूद हर व्यक्ति को पीने और अन्य उपयोग के लिये शुद्ध पानी चाहिए। शुद्ध पानी के इसी माँग ने दूषित जल पर सोचने को मजबूर किया है। जल प्रदूषण आज विश्व के प्रमुख चिन्ताओं में से एक है। कई देशों की सरकारों की इस समस्या को कम करने के लिये समाधान खोजने के लिये कड़ी मेहनत की है।

जल आपूर्ति को कई प्रदूषकों से खतरा है। जल प्रदूषण से अधिक खतरा अल्पविकसित देशों में है। कच्चे मलजल का प्राकृतिक जल में प्रवाह द्वारा इसके निपटान की यह विधि भारत जैसे देशों में सबसे आम है। देश में इतने प्रचार-प्रसार के बाद भी कारखानों एवं घरों से निकलने वाले कचरे, मल, कीचड़, गन्दगी और विषाक्त प्रदूषक, सब पानी में फेंक दिये जाते हैं। मल उपचार के बावजूद समस्याएँ खड़ी होती हैं। कीचड़ के अतिरिक्त उद्योगों के रासायनों का रिसाव जल प्रदूषण का प्रमुख स्रोत हैं।

मानव गतिविधियाँ पानी को प्रदूषित करने में बड़े पैमाने पर प्रभाव डाल रही हैं। एक अनुमान के मुताबिक पृथ्वी पर कुल जल उपयोग का 69 फीसदी जल सिंचाई के लिये उपयोग होता है। विश्व के कुछ क्षेत्रों में सिंचाई किसी भी फसल के लिये आवश्यक है। लेकिन सिचाईं की नई विधियों सेे फसल पैदावार, जल खपत एवं उपकरणों और संरचनाओं की पूँजी लागत में कमी आ सकती है।

सिचाईं का अधिकांश जल वाष्पिभूत होकर समाप्त हो जाता है। इसी तरह मीठे पानी में व्यावसायिक मत्स्य पालन भी पानी का कृषि उपयोग माना जाता है, लेकिन इसे सिंचाई से कम महत्त्व दिया जाता है। जैसे-जैसे विश्व की जनसंख्या और अनाज की माँग में वृद्धि हो रही है जल के सीमित स्रोतों के कम उपयोग द्वारा अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिये सिंचाई की विधियों और प्रौद्योगिकी, कृषि जल प्रबन्धन, शस्य संयोजन और जल संरक्षण के क्षेत्र में विकास की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

औद्योगिक क्षेत्र में जल का उपयोग अनुमानत: विश्व भर के 15 फीसदी जल का होता है। प्रमुख औद्योगिक उपयोगकर्ताओं में तापीय बिजली शामिल है। वहीं जलविद्युत संयंत्र पानी को बिजली स्रोत के रूप में उपयोग करते हैं। अयस्क और पेट्रोलियम संयंत्र रासायनिक प्रक्रियाओं में पानी का उपयोग करते हैं। कई विनिर्माण संयंत्र इसे एक विलायक के रूप में उपयोग करते हैं।

औद्योगिक उपयोग में नष्ट होने वाले पानी में व्यापक विविधता है पर वैश्विक स्तर पर यह कृषि उपयोग में होने वाले क्षय से कम है। घरेलू उपयोग में पानी का उपयोग कुल उपयोग का पन्द्रह फीसदी किया जाता है। इसमें पीने का पानी, स्नान, खाना पकाने, स्वच्छता और बागवानी आदि शामिल है। एक अनुमान के मुताबिक घरों की बुनियादी आवश्यकताओं के लिये प्रतिदिन प्रति व्यक्ति लगभग 50 लीटर की खपत है।

मनोरंजन के लिये प्रयोग होने वाला जल आमतौर पर कुल जल प्रयोग का एक बहुत छोटा किन्तु बढ़ता हुआ हिस्सा है। मनोरंजन में पानी का उपयोग अधिकतर जलाशयों, क्षिप्रिकाओं, झरनों और साहसिक खेलों से जुड़ा हुआ है। यदि एक जलाशय में पानी का स्तर सामान्य की तुलना में अधिक रखा जाय तो मनोरंजक खपत के लिये उसका उपयोग एक नवीकरणीय या अक्षय उपयोग के तौर पर वर्गीकृत किया जा सकता है।

कुछ जलाशयों में नौका विहार, तैराकी आदि होता है। इससे जल नष्ट तो नहीं होता लेकिन उसके शुद्धता पर प्रभाव पड़ता है। एक तरह से हम यह कह सकते हैं कि शहरीकरण, औद्योगीकरण और कृषि में कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग ने मीठे जल को प्रदूषित किया है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जिसके कारण आज जल उपयोग में बुनियादी सुधार के साथ ही जल सुविधाओं को बढ़ाने के लिये इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण निवेश की आवश्यकता है। हर व्यक्ति तक शुद्ध पानी पहुँचाने के साथ हर व्यक्ति को पानी को शुद्ध रखने की जिम्मेदारी भी मिलनी चाहिए। पानी को प्रदूषित करने वाले औद्योगिक संस्थानों और व्यक्तियों पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।

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