आकाशीय आपदा का जमीनी सच

Submitted by RuralWater on Fri, 01/12/2018 - 14:16
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डाउन टू अर्थ, जनवरी 2018

अमेरिका में बिजली गिरने से मरने वालों की संख्या से तुलना करें तो यह और भी भयावह नजर आता है। अमेरिका में 2014 में बिजली गिरने से केवल 33 लोगों की मौत हुई। ब्यूरो के अनुसार, 2000 से 2014 तक भारत में बिजली गिरने से 32,743 लोगों की मौत हुई। जबकि अमेरिका में आकाशीय बिजली से मरने वालों की संख्या में तेजी से कमी दर्ज की गई है। वहाँ 1970 के दशक में औसतन 100 लोग बिजली गिरने से मारे जाते थे। यह संख्या 2015 में घटकर 27 रह गई है। “आकाशीय बिजली को कैसे रोका जा सकता है? यह तो एक शक्तिशाली करंट हैं और फिर इसके गिरने के समय आमजन को खुद को बचाने का रत्ती भर का समय नसीब नहीं होता” उत्तर प्रदेश के उच्च अधिकारी जब इस तरह का अवैज्ञानिक तर्क देते हैं तो हम उन योजनाओं के हाल का अनुमान लगा सकते हैं जिनको पूरा करने की जिम्मेदारी इनके कंधों पर होती है। जब पढ़े-लिखे अधिकारी ही आकाशीय बिजली गिरने को ईश्वरीय आपदा मानते हों तो आम लोगों से क्या उम्मीद की जाये?

पहले तेज चमकती रोशनी और उसके बाद कड़कड़ाती आवाज। आसमान में चमकी यह बिजली धरती पर गिर इंसानों की मौत का कारण भी बनती है। बीते मानसून के दौरान एक हफ्ते में ही आसमानी बिजली गिरने से देश भर में 120 लोग मारे गए और 57 लोग घायल हुए। इनमें सबसे अधिक बिहार में 57, उत्तर प्रदेश में 41, मध्य प्रदेश में 12 और झारखण्ड में 10 लोग मरे। मुसीबत यह है कि आम इंसान के साथ सरकारी अधिकारियों का एक बड़ा तबका अब भी इसे दैवीय आपदा मानता है और इसकी रोकथाम के लिये कुछ भी नहीं करता। आम लोगों के साथ सरकारी अधिकारी भी इसे ईश्वरीय कोप मानते हैं।

आकाशीय बिजली से पीड़ितों में से कुछ को ही अधिकृत तौर पर सरकारी मदद मिल पाती है। क्योंकि इस तरह के हादसे को राष्ट्रीय आपदा राहत निधि के अन्तर्गत शामिल नहीं किया गया है। हालाँकि, पिछले साल चौदहवें वित्तीय आयोग ने राज्य सरकारों को राज्य आपदा राहत निधि के 10 फीसद को अपने राज्यों में विशेष आपदाओं के पीड़ितों को तत्काल राहत देने के लिये इजाजत दी है। यह ध्यान देने की बात है कि आकाशीय बिजली गिरने की घटना गृह मंत्रालय की आपदाओंं की अधिसूची में शामिल नहीं है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, भारत में हर साल 2,182 लोग आकाशीय बिजली गिरने के शिकार हो जाते हैं। ब्यूरो के मुताबिक, 2016 में 120, 2014 में भारत में बिजली गिरने से 2,582 जबकि 2013 में 2,833 लोग मारे गए थे।

इन आँकड़ों की अमेरिका में बिजली गिरने से मरने वालों की संख्या से तुलना करें तो यह और भी भयावह नजर आता है। अमेरिका में 2014 में बिजली गिरने से केवल 33 लोगों की मौत हुई। ब्यूरो के अनुसार, 2000 से 2014 तक भारत में बिजली गिरने से 32,743 लोगों की मौत हुई। जबकि अमेरिका में आकाशीय बिजली से मरने वालों की संख्या में तेजी से कमी दर्ज की गई है। वहाँ 1970 के दशक में औसतन 100 लोग बिजली गिरने से मारे जाते थे। यह संख्या 2015 में घटकर 27 रह गई है।

भारतीय मौसम विभाग के अनुसार पश्चिमी और मध्य भारत में बिजली गिरने का प्रकोप अधिक है। विभाग ने भारत में बारह ऐसे राज्यों की पहचान की है, जहाँ सबसे अधिक आकाशीय बिजली गिरती है। इनमें मध्य प्रदेश पहले नम्बर पर है। इसके बाद महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओड़िशा का स्थान आता है। वहीं 1967 से 2012 तक के बीच भारत में प्राकृतिक आपदाओं के कारण हुई मौतों में 39 प्रतिशत मौतों के लिये आकाशीय बिजली जिम्मेदार थी। केरल के तिरुवनंतपुरम स्थिति इंस्टीट्यूट ऑफ लैंड एंड डिजास्टर मैनेजमेंट के अनुसार वे अखबार, पंचायत या पुलिस स्टेशन से बिजली गिरने से होने वाली मौतों के बारे में जानकारी हासिल करते हैं। ऐसे में दूर-दराज के गाँवों में यह जानना मुश्किल है कि वहाँ क्या हो रहा है।

अमेरिका ने आकाशीय बिजली से होने वाली मौतों को कम किया है। वहाँ सरकार ने जागरुकता अभियान चलाया कि लोग तूफान के समय घरों में रहें। अमेरिका में बिजली गिरने से अधिकतर समुद्री तट पर लोगों की मौत होती है जबकि भारत में खेतों में काम करने वाले किसान इसके सबसे ज्यादा शिकार होते हैं।

किसानों की अधिक मौतें


जब ओड़िशा सरकार 2017 में अप्रैल से अगस्त के बीच आसमानी बिजली से होने वाली 280 किसानों की मौत का विश्लेषण करने बैठी, तो एक बहुत परेशान करने वाली बात सामने आई। इनमें से 94 किसान जो कुल मौतों का 33.57 प्रतिशत, धान के खेतों में काम करते समय मरे थे। इस संख्या की तुलना में 21.07 प्रतिशत और 14.29 प्रतिशत लोगों की अपने घरों और खेतों में काम करते समय मौतें हुई। अगस्त के बाद भी 141 लोगों की मौत बिजली गिरने से हुई, जिससे कुल मरने वालों की संख्या 421 हो गई। राज्य के आपदा प्रबन्धकों व वैज्ञानिकों के जेहन में यह सवाल आया कि क्या खेतों में काम करने वाले लोगों को आसमानी बिजली से ज्यादा खतरा है, क्या उनके लिये बिजली ज्यादा जानलेवा साबित हो रही है? आस-पास के भौगोलिक परिवेश में ऐसा क्या है जो बिजली गिरने की घटना को ज्यादा बढ़ाता है?

इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, स्कूल ऑफ अर्थ, ओशियन एंड क्लाइमेट भुवनेश्वर में विजिटिंग प्रोफेसर यू.सी. मोहंती इसकी खास वजह बताते हुए कहते हैं, “अगर कोई व्यक्ति ऐसे किसी खेत में काम कर रहा होता है जहाँ, आस-पास ताड़ का पेड़ है तो बिजली ताड़ के पेड़ पर पहले गिरती है और व्यक्ति सुरक्षित बच जाता है। क्योंकि उस पूरे क्षेत्र में ताड़ का पेड़ ही सबसे ऊँची वस्तु होती है। वास्तव में, कोई भी जीवित पेड़ विद्युत का अच्छा संवाहक होता है।” प्रोफेसर मोहंती का कहना है कि ताड़ के पेड़ में मौजूद रस और पानी, बिजली को जमीन में ले जाने का माध्यम बन जाती है। इस तरह यह पेड़ बिजली को जमीन पर फैलने से भी रोकते हैं। ताड़ के यह पेड़ बिजली के करंट को अवशोषित कर इसे जमीन के अन्दर गहराई में पहुँचा देते हैं। इस तरह वे आस-पास मौजूद जीवों की जान बचा लेते हैं।

इसी तरह ओड़िशा में ताड़ के पेड़ों की आसमानी बिजली के प्रभाव को सोखने में अहम भूमिका है। नारियल के पेड़ भी बिजली के अच्छे संवाहक हैं। लेकिन नारियल के पेड़ों की अधिक उपयोगिता और कीमत होने के कारण उन्हें ज्यादातर रिहायशी इलाकों और उसके आसपास उगाया जाता है। वहीं ताड़ के पेड़ जो खेतों में उग आते हैं उन्हें किसान अपने खेतों की मेड़ों पर सुरक्षित रखते हैं। राज्य के प्रभावित क्षेत्रों में से एक जगतसिंहपुर जिला, करमंगा गाँव के निवासी खिरोद राउत इस बात की पष्टि करते हैं। वह कहते हैं, “इस इलाके में बिजली से झुलसे हुए ताड़ के पेड़, एक आम दृश्य हैं।”

किसानों की बढ़ती मौतों की वजह क्या खेतों के आस-पास ताड़ के पेड़ों की कमी हो सकती है? पहले अपने विभिन्न जरूरतों की वजह से ताड़ के पेड़ ओड़िशा के ग्रामीण जीवन के अविभाज्य अंग थे।

लेकिन अब ज्यादातर ग्रामीणों को अपनी दैनिक जरूरतों के लिये ताड़ के पेड़ों की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इसलिये वे इसे बचाने की कोशिश भी नहीं करते हैं। ताड़ के पेड़ों की आर्थिक उपयोगिता तलाशने के लिये गठित “द ओडिशा स्टेट पालमगुर कोऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड” भी ताड़ के पेड़ों की कमी को महूसस करने लगा है। कोऑपरेटिव के सेल्स टीम के सदस्य सुभाष चन्द्र साहू ने डाउन टू अर्थ को बताया कि दो मुख्य वृक्षारोपित क्षेत्र पुरी एवं धेनकनाल जिले को छोड़कर शायद ही ताड़ के पेड़ राज्य के अन्य गाँवों में बचे हैं।

भुवनेश्वर स्थिति पर्यावरणविद विजय मिश्रा ने कहा कि भारत को बांग्लादेश की तरह बिजली आघात से बचने के लिये ताड़ वृक्षारोपण की योजना बनानी चाहिए। बांग्लादेश में 2016 में 200 से भी ज्यादा मौतें बिजली गिरने की वजह से हुई, जिसमें केवल मई में एक दिन में 82 जानें गई हैं। बांग्लादेश ने बिजली गिरने से होने वाली मौतों को कम करने के लिये ग्रामीण क्षेत्रों में ताड़ के वृक्ष लगाने शुरू कर दिये हैं। ओड़िशा सरकार एक सलाहकार नियुक्त करने की प्रक्रिया में है, जो बिजली से होने वाली मौतों को कम करने के लिये सम्भावित उपायों पर सुझाव देंगे।

ओड़िशा के साथ ही बिहार सरकार भी आकाशीय बिजली से होने वाली मौतों पर मंथन कर रही है। नौ जुलाई 2017 को एक ही दिन में बिजली गिरने (स्थानीय भाषा में ठनका कहा जाता है) से 31 लोगों की मौत के बाद बिहार सरकार जागी। ध्यान रहे कि 2016 में ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लाइटनिंग सेंसर के लिये सर्वे का सख्त निर्देश जारी किया था। मुख्यमंत्री का निर्देश मिले साल भर हो गया, लेकिन सेंसर के लिये सर्वे नहीं हो सका जुलाई 2017 तक। इसी कारण लाइटनिंग सेंसर लगाने की फाइल भी ठंडे बस्ते में पड़ी थी। मई से जुलाई के दूसरे हफ्ते तक बिजली गिरने से 171 लोगों की मौत ने सरकार को एक बार फिर चिन्ता में डाला। अगले ही दिन आपदा प्रबन्धन विभाग ने संवाददाता सम्मेलन में बताया कि वज्रपात की भविष्यवाणी के लिये एक मोबाइल एप लाया जाएगा।

बिहार में इस तरह की प्रणाली इसलिये भी जरूरी हो गई है क्योंकि बिजली गिरने से मौत के आँकड़ों में लगातार बढ़ोत्तरी देखी जा रही है इसी चिन्ता के कारण ही आन्ध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक आदि के आपदा प्रबन्धन सलाहकार संजय श्रीवास्तव को बिहार बुलाकर उनसे इस पर विमर्श किया गया। इसी विमर्श के बाद बिहार सरकार के आपदा प्रबन्धन विभाग ने लाइटनिंग के खिलाफ अपने अभियान का ब्लू प्रिंट तैयार किया।

संजय कहते हैं कि वज्रपात की पूर्व सूचना मिलना बिहार के लिये जरूरी है। वज्रपात से भारी संख्या में मौत चिन्तित करती है। उन जिलों में इसके लिये सेंसर फौरी जरूरत बन गई है जहाँ वज्रपात से ज्याद मौत का रिकार्ड दर्ज हो रहा है। जहाँ बिहार में बिजली से होने वाली मौतों को कम करने के लिये नई तकनीक का सहारा लेने की सरकारी कवायद जारी है, वहीं उनके पड़ोसी राज्य झारखण्ड में नई तकनीक के उपयोग से बिजली गिरने से होने वाली मौतों पर एक सीमा तक नियंत्रण करने का द्वारा राज्य सरकार कर रही है। राज्य की राजधानी राँची में नामकुम में तो एक गाँव का नाम ही वज्रमारा (आकाशीय बिजली) पड़ गया। यह नाम कब पड़ा, किसी को पता नहीं लेकिन क्यों पड़ा यह हर आदमी जानता है। हर साल सैकड़ों बार वज्र यानी आकाशीय बिजली गिरने के कारण इस गाँव का नाम वज्रमारा पड़ गया।

वज्रमारा के खबरों में रहने के कारण ही आज झारखण्ड में आकाशीय बिजली से मौतों की संख्या कुछ नियंत्रित हुई है। पहाड़ियों के बीच जंगल में अब इस गाँव के लोग चैन से रह रहे हैं। बेखौफ हैं क्योंकि नामकुम में अब लाइटनिंग अरेस्टर लग गया है। लाइटनिंग अरेस्टर अब इनके ऊपर गिरने वाली बिजली को खींचकर जमीन में डाल देता है। 508 मीटर रेंज वाले अरेस्टर की कीमत डेढ़ लाख रुपए है और अकेले नामकुम में करीब डेढ़ दर्जन जगहों पर ऐसे अरेस्टर लगाए गए हैं। हर मानसून में अकेले वज्रमारा गाँव में 500 बार तक बिजली गिरती थी। इस स्थान विशेष में इतनी बार आकाशीय बिजली गिरने की वजह पर किये गए शोध में माना गया कि लोहा, तांबा जैसे खनिजों की भरमार के कारण यहाँ की जमीन आकाशीय बिजली को आकर्षित करती होगी। इसके अलावा जंगल और पहाड़ के बीच होने को भी एक कारण माना गया, हालांकि अन्तिम तौर पर कोई परिणाम अभी निकल कर नहीं आया। यही कारण है कि सरकार ने इसके कारणों पर बहुत ज्यादा ध्यान देने की जगह बचाव की कदमों पर ध्यान केन्द्रित किया।

झारखण्ड के आपदा प्रबन्धन विभाग ने बिरसा कृषि विवि परिसर में एक सेंसर लगाए, जो 300 किलोमीटर के परिक्षेत्र में आकाशीय बिजली की घटनाओं और उसकी शक्ति का अध्ययन करती है। इसी अध्ययन के बाद नामकुम के सेफ्टी ग्रिड में जर्मन लाइटनिंग अरेस्टर लगाए गए। लम्बे समय तक झारखण्ड के आपदा प्रबन्धन विभाग में विशेष परियोजना पदाधिकारी की जिम्मेदारी सम्भालने के बाद फिलहाल बिहार, आन्ध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक आदि में आपदा प्रबन्धन सलाहकार के रूप में सेवारत संजय श्रीवास्तव कहते हैं कि झारखण्ड में नामकुम के हालात के कारण बहुत परिवर्तन हुआ। नामकुम के साथ ही राँची एयरपोर्ट और स्टेडियम के अलावा देवघर के बाबा धाम मन्दिर में भी लाइटनिंग अरेस्टर लगाने का काम पूरा हो गया। इस प्रोजेक्ट में स्कूलों-कॉलेजों और अस्पतालों को भी जोड़ा जाना था। लेकिन फिलहाल मुख्य रूप से कुछ खास स्थलों पर ही अरेस्टर लगाने का काम हो सका है।

जोखिम कम करना


आकाशीय बिजली के गिरने पर नियंत्रण तो नहीं किया जा सकता है लेकिन केरल के तिरुवनंतपुरम में इंस्टीट्यूट ऑफ लैंड एंड डिजास्टर मैनेजमेंट का सुझाव है कि इस सम्बन्ध में हर राज्य सरकारें अपने-अपने राज्यों में कमजोर क्षेत्रों की पहचान कर सकती हैं। अमेरिका या कनाडा की तरह भारत में आकाशीय बिजली की पहचान करने वाला नेटवर्क नहीं है। हालांकि इस बार बिहार सरकार ने बिजली गिरने की घटनाओं से बचाव के उपायों पर जन-जागरुकता को लेकर पहली बार मीडिया में विज्ञापन जारी किये थे। वहीं दूसरी ओर कई विशेषज्ञों ने कहा कि भारत को भी आकाशीय बिजली से होने वाली मौतों तो कम करने के लिये बांग्लादेश की रणनीतियों को अपनाना चाहिए। वहाँ के लोक गीतों, नुक्कड़ नाटकों और कहानियों में आकाशीय बिजली से बचने के उपायों को बचाया गया है।

जब आसमानी बिजली गिरती है


आईएमडी के अनुसार, बिजली का गिरना या आघात एक बड़ा विद्युतीय प्रवाह है जो तूफान के दौरान हवा की गति के बढ़ने और कम होने के कारण उत्पन्न होता है। इस दौरान, पृथ्वी की बाहरी परत पर सकारात्मक चार्ज होता है क्योंकि विपरीत चार्ज आकर्षित करता है, आँधी के बादलों में मौजूद नकारात्मक चार्ज पृथ्वी की बाहरी सतह पर मौजूद सकारात्मक चार्ज से जुड़ना चाहता है। बादल के निचले हिस्से में हवा के दबाव को दूर करने के लिये जब यह बहुत ज्यादा चार्ज हो जाता है तो चार्ज का बहाव पृथ्वी की ओर तेजी से भागता है। इसे “स्टैप्ड लीडर” कहते हैं। पृथ्वी का सकारात्मक चार्ज इस “स्टैप्ड लीडर” की तरफ आकर्षित होता है और सकारात्मक चार्ज हवा की ओर रुख कर लेता है। जब “स्टैप्ड लीडर” और पृथ्वी से आया सकारात्मक चार्ज आपस में मिलते हैं, एक मजबूत विद्युतीय प्रवाह बादल में सकारात्मक चार्ज उत्पन्न करता है। इस विद्युतीय प्रवाह को बिजली को “स्टैप्ड लीडर” कहा जाता है जिसे देखा जा सकता है। चूँकि मानव का शरीर विद्युत का अच्छा संवाहक होता है, इसलिये हमारा शरीर आसमानी बिजली के प्रवाह को स्वीकार कर लेता है, जिसे बिजली गिरना कहते हैं।

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