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कुंड, बावड़ी, टांके, कुएँ और कुइयाँ

Author: 
बृजेश विजयवर्गीय
Source: 
जल निधि - हाड़ौती के पारम्परिक जलाशयों का संकट एवं समाधान, 1999

बावड़ियों की तरह कुंड भी बूंदी में बहुत हैं। प्रसिद्ध कुंडों में नागर सागर कुंड, गोविंद सागर, धाभाईयों का बड़ा कुंड प्रमुख हैं। नागर सागर कुंड राजा रामसिंह (1787-1946 वि.) के द्वारा बनाए प्रतीत होते हैं। वास्तुकला की दृष्टि से अनुपम है। कुंड के चारों ओर अतिक्रमण से इनके अस्तित्व को खतरा उत्पन्न हो गया। उसके शिलालेख दीवारों में दब गए। इस कारण निर्माण का संवत उपलब्ध नहीं हो सका। गोविन्द सागर कुंड की विशालता के कारण ही इसे सागर की संज्ञा दी गई। इसे माजी साहब का कुंड भी कहते हैं। हाड़ौती सम्भाग में तालाबों के अलावा कुंड, कलात्मक बावड़ियाँ, घर-घर व खेतों में कुएँ, प्राचीन किलों में टांके, जल संरक्षण की अद्भुत मिसाल रहे हैं जो हमारे पूर्वजों की बेहतर जल प्रबन्ध नीति को दर्शाते हैं। आज के समय में ये जलस्रोत घोर उपेक्षा के शिकार होते हुए भी जल संकट का काफी हद तक निदान करते हैं।

बूंदी और बारां जैसे शहर आज भी कुएँ व बावड़ियों के पानी से ही अपनी मूलभूत जरूरतों को पूरा करते हैं। जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (जलदाय) कुएँ, बावड़ी को जल स्रोत समझ कर उसका पूरी तरह दोहन तो करना चाहते हैं परन्तु उनके संरक्षण की कोई कार्य योजना नहीं है।

प्रेमिकाओं की याद


बूंदी की बावड़ियाँ और डावड़ियाँ (लड़कियाँ) बहुत प्रसिद्ध हैं। यहाँ के प्रत्येक मोहल्ले में बावड़िया हैं। सबसे बड़ी रानी जी की बावड़ी है जिसमें दो तोरण हैं जिसकी अनूठी स्थापत्य कला के कारण पर्यटकों के लिये आकर्षण का केन्द्र है। कोटा-जयपुर मार्ग पर अब यह सघन आबादी के बीच आ गई है। इसका निर्माण पूर्व महाराजा अनिरुद्ध सिंह (1738-52 वि.) की रानी नाथावतणी जी लाडकुंवरी बाई ने जनहित में संवत 1757 में किया। दूसरी मावल दी बावड़ी महत्त्वपूर्ण है इसे राजा मानसिंह (1715-1738 वि.) की पटरानी सीसोद्या मावलदेवी ने 1734 वि.) में बनवाई थी। इसी बावड़ी के पानी का प्रताप है कि बूंदी में वीर रस का कविरत्न और ‘वंश भास्कर’ के रचयिता सूर्यमल्ल उत्पन्न हुए।

महाकवि सूर्यमल्ल का मकान इसी बावड़ी के सामने हैं। मनोहर बावड़ी, ठंडी बावड़ी समेत 50 अन्य बावड़ियाँ बूंदी शहर में हैं जिनमें आज भी पानी है परन्तु स्थानीय प्रशासन की लापरवाही से घोर उपेक्षा की शिकार होकर कचरे से भरी जा रही हैं। सिर्फ रानी जी की बावड़ी को पर्यटन महत्त्व की होने के कारण संरक्षण मिला हुआ है। दूसरा इसका पानी जलदाय विभाग नागरिकों को आपूर्ति करता है। बूंदी शहर में 50 से अधिक बावड़ियों में एक दो बावड़ियों को छोड़कर शेष सभी में कचरा डाल दिया जाता है। नगर पालिका के कर्मचारी भी इस विरासत को कचरा डम्प करने का आसान तरीक माने बैठे हैं।

पहाड़ों पर भी पानी


बूंदी की अरावली पहाड़ियों पर स्थापित तारागढ़ दुर्ग में 6 टांके हैं जिनमें आज भी पानी संग्रहित होता है एक टाँके को छोड़कर अन्यों का गन्दा पानी है जिसे साफ कराने का प्रबन्ध कोई नहीं करता। समुद्र तट से 1600 फीट की ऊँचाई पर टाँके का निर्माण पुराने शासकों की उत्कृष्ठ जल प्रबन्धन नीति को प्रकट करते हैं।

बावड़ियों की तरह कुंड भी बूंदी में बहुत हैं। प्रसिद्ध कुंडों में नागर सागर कुंड, गोविंद सागर, धाभाईयों का बड़ा कुंड प्रमुख हैं। नागर सागर कुंड राजा रामसिंह (1787-1946 वि.) के द्वारा बनाए प्रतीत होते हैं। वास्तुकला की दृष्टि से अनुपम है। कुंड के चारों ओर अतिक्रमण से इनके अस्तित्व को खतरा उत्पन्न हो गया। उसके शिलालेख दीवारों में दब गए। इस कारण निर्माण का संवत उपलब्ध नहीं हो सका। गोविन्द सागर कुंड की विशालता के कारण ही इसे सागर की संज्ञा दी गई। इसे माजी साहब का कुंड भी कहते हैं।

उपलब्ध शिलालेख से पता चलता है कि इसका रामसिंह की माता राठौड़ी जी ने निर्माण कराना प्रारम्भ किया था वे इस कार्य को अधूरा छोड़कर स्वर्ग सिधार गई। फिर रामसिंह की रानी शुभनाथ कंवरी ने अपनी पति की आज्ञा से संवत 1952 में यह कुंड बनाया और दो लाख लोगों को लड्डू जलेबी का भोज कराया। बड़ा कुण्ड जेल के पास स्थित है। इसके शिलालेख में विक्रम संवत के बजाय शक संवत का ही प्रयोग किया जाता है। अतः यहाँ कुछ नवीनता लगती है। शिलालेख की भाषा संस्कृत के स्थान पर देशज है। इसका निर्माण शक संवत 1751 में हुआ, निर्माता के लिये लिखा है- “राव श्री माब सिह जी की धाय संवीरा धावड़ गोपी लेहाड़ी सुहाड़ पवारी (ती) तीको बेटो आडमाड़ कन्ही राम त्यां को करायो कुण्ड” बूंदी जिले में पेच की बावड़ी आज भी प्रसिद्ध है। सम्पूर्ण हाड़ौती सम्भाग के शहरों व कस्बों में कुण्ड, बावड़ियों, कुओं का विशाल तंत्र रहा है जो आधुनिक युग में प्रशासनिक सूझबूझ के अभाव में तिरोहित होता जा रहा है।

चन्द्रभागा का तट प्यासा


झालावाड़ जैसे पानी को तरसते नगर में इन पारम्परिक जलस्रोतों ने बरसों तक जनता की प्यास बुझाई है। वर्तमान काल में इनमें से अधिकांश उचित देखरेख के अभाव में नष्ट हो चुके हैं या नष्ट होने के कगार पर हैं। बस स्टैंड के सामने गुड़पुरा बस्ती में भगवती लॉज के पीछे नवीं सदी के मध्य का कुआँ अतिक्रमण की नीयत से पत्थरों से भर दिया गया। यादवों के इस मोहल्ले में प्रत्येक मकान के निर्माण में इसके पानी का योगदान रहा है। इसी कुएँ के पास लगे हुए हैण्डपम्प में अब पानी नहीं आता।

जलदाय विभाग की मेहरबानी पर ही यहाँ के बाशिन्दों को पानी मिल सकता है अन्यथा कोई विकल्प नहीं है। जल वितरण की इतनी गम्भीर समस्या के चलते यदि नगर प्रशासन नगर के पारम्रिक जलस्रोतों की समुचित सफाई करवा कर उनका पानी उपयोग के लायक नहीं बना सकता तो यह समस्या थार के मरुस्थल के समान होगी।

कोटा जिले के सुकेत कस्बे में गढ़बावड़ी का पानी सफाई के अभाव में सड़ान्ध मारने लगा है सुकेत में पेयजल आपूर्ति के लिये दूर-दराज कुम्भ कोट व आसपास की खदानों से पानी की जरूरत पूरी होती है।

गिने-चुने हैण्डपम्पों पर पानी के लिये लोगों की लम्बी कतारें जल संकट की गम्भीरता का एहसास कराते हैं। सुकेत के सरपंच गुलमोहम्मद का यह बयान कि कचरे के ढेर ही साफ नहीं होते बावड़ी की बात तो दूर है। जन प्रतिनिधियों की मानसिकता को प्रतिबिम्बित करता है। सुकेत के पत्रकार हनीफ का कहना है कि यदि प्रशासन इन पारम्परिक जलस्रोतों की मरम्मत व साफ-सफाई की ओर ध्यान दे तो काफी हद तक जल संकट का समाधान हो सकता है।

बारां नगर के प्रत्येक पुराने मकान में कुइयाँ देखने को मिलती हैं। शहर के आसपास के तालाबों में जब पानी होता था तो कुइयों का जल कभी नहीं सूखता था। आज हालत यह है कि इन कुइयों का जलस्तर काफी नीचे गिर गया है। चारों ओर नदियों व तालाबों से घिरे होने के बावजूद बारां शहर में जल संकट गम्भीर है। अटरू मार्ग पर स्थित अरडान गाँव कोटा रियासत का ठिकाना होता था।

किसी जमाने में बावड़ी केबड़ के नीचे बारां व मांगरोल आने झाने वाले लोगों की बैलगाड़ियों की लाइनें लग जाती थीं। लोग कुछ देर ठंडी छाया में विश्राम कर बावड़ी का ठंडा पानी पीकर आगे बढ़ते थे। घर-घर पानी के कृत्रिम साधन होने से बावड़ी उपेक्षित हो गई। इसके चारों तरफ अतिक्रमण कर मकान बना लिये गए। धीरे-धीरे इसमें कचरा भरता जा रहा है। मजबूत दीवारें धसकने लगी हैं। आज भी बावड़ी का पानी खत्म नहीं हुआ बावड़ी के पास जिनके खेत हैं वे डीजल इंजन से खेत तक इसका पानी ले जाते हैं। जहाँ कुओं का पानी सूख गया। हैण्डपम्पों में भी पानी नहीं आता। भँवरगढ़ आदिवासी अंचल में प्राचीन गढ़ के परकोटे के पास राजाजी की बावड़ी है बुजुर्ग लोग बताते हैं कि इसका पानी कभी टूटता नहीं है। राजा महाराजाओं के समय स्नान का गढ़ में व्याप्क प्रबन्ध था। गढ़ में सुरंग के सहारे बावड़ी तक पानी पहुँचता था। एक स्कूल के निर्माण के दौरान इस सुरंग को बन्द कर दिया गया। मीठे जल के कारण इस बावड़ी का महत्त्व काफी रहा है। अवांछित तत्वों ने परकोटे को तोड़ दिया। लोगों ने बावड़ी के आसपास शौच का स्थान बना लिया।

जहाँ पेयजल के लिये महिलाओं का जमघट लगा रहता था अब वीरान हो गया। काई व गन्दगी के कारण अब मनुष्य तो क्या जानवर भी इसका पानी नहीं पी सकते। कस्बे के मध्य अंग्रेजों के शासनकाल में बना इंजीनियरी कुआँ सबसे गहरा कुआँ था। इसके चारों ओर गन्दगी के ढेर लगे हैं। पेयजल की समस्या से त्रस्त भँवरगढ़ के लोग इस पुराने जलस्रोत की दुर्दशा के प्रति चिन्तित नहीं हैं।

यहाँ से चार किलोमीटर दूर घट्टी पंचायत के अन्तर्गत ग्राम बोरेन प्रथम व द्वितीय के मध्य खाल में स्थित बावड़ी का पानी गर्मियों में काफी गहरा चला जाता है। बंजारा लोगों का जीवन इसी के पानी को मोहताज है यह बावड़ी भी नष्ट प्रायः है। इसी प्रकार किशनगंज पंचायत समिति के रेलावण और पदमपुरा गाँव की बसावट साथ-साथ की है यहाँ हनुमान जी के मन्दिर की बावड़ी सैंकड़ों वर्ष पुरानी है इसकी निर्माण तिथि का गाँव के बुजुर्गों को भी पता नहीं है।

पत्रकार यमुना शंकर सोनी जिन्होंने ‘राजस्थान पत्रिका’ के संवाददाता के रूप में यहाँ का दौरा किया। सोनी के अनुसार राजा पदम सिंह खींची ने इस गाँव को बसाया था। इसी से इसका नाम पदमपुरा हो गया। पुराने लोग बताते हैं कि साठ हाथ गहरी इस बावड़ी में भी बेवरी थी और बारहों माह इसमें पनघट चलता था।

गाँव के लोगों को इस बावड़ी पर गर्व है किसी जमाने में बावड़ी केबड़ के नीचे बारां व मांगरोल आने झाने वाले लोगों की बैलगाड़ियों की लाइनें लग जाती थीं। लोग कुछ देर ठंडी छाया में विश्राम कर बावड़ी का ठंडा पानी पीकर आगे बढ़ते थे। घर-घर पानी के कृत्रिम साधन होने से बावड़ी उपेक्षित हो गई। इसके चारों तरफ अतिक्रमण कर मकान बना लिये गए। धीरे-धीरे इसमें कचरा भरता जा रहा है। मजबूत दीवारें धसकने लगी हैं। आज भी बावड़ी का पानी खत्म नहीं हुआ बावड़ी के पास जिनके खेत हैं वे डीजल इंजन से खेत तक इसका पानी ले जाते हैं। बावड़ी के आसपास सघन वृक्ष आज भी हैं। गर्मी के दिनों में यहाँ लम्बी पूँछवाला हरे रंग का पक्षी खूब देखा जाता था, बरसात में पानी में रहने वाली सफेद चिड़िया भी आती है।

चमत्कारिक महादेव जी की बावड़ी


बारां के ही भंवरगढ़ में प्राचीन बावड़ी जिसका मीठा पानी कस्बे में ही नहीं ग्वालियर की ओर जाने वाले हर व्यक्ति के बीच चर्चित है। लोग अपने वाहन रोककर इसका जल पीकर आगे की यात्रा करते हैं। कहते हैं कि इसके पानी से सुस्ती गायब हो जाती है। वर्षों पुराना शिवलिंग भी यहाँ स्थापित है।

वर्षा में विलम्ब होते ही किसान हवन आदि कराते हैं। महादेव जी की यह बावड़ी चमत्कारिक मानी जाती है। जलस्रोतों के प्रति आस्था व पवित्रता का अनुपम उदाहरण है। भंवरगढ़ का ही सौ वर्ष पुराना सायबा कुआँ आसपास के लोगों के कचरे से रेबड़ियों के बीच घिर गया है। अवांछित तत्वों ने इसमें मिट्टी पत्थर भर दिये जिससे बहु उपयोगी कुएँ की गहराई कम हो गई।

कोटा जिले के सुल्तानपुर कस्बे में सिंघाड़े का कुआँ जिसका पानी सिंघाड़े जैसा मिठा होता था देखरेख के अभाव में अन्तिम साँसे गिन रहा है। बारां जिले के अन्ता में गोवर्धननाथ जी के मन्दिर की गढ़ बावड़ी के पानी का उपयोग जलदाय विभाग करता है। परन्तु उसकी मरम्मत कराने जरूरत नहीं समझी जा रही। पलायथा के बाग का कुआँ कोटा बारां सड़क मार्ग के किनारे है।

आज भी राहगीरों के लिये पेयजल का सर्वोत्तम स्रोत बना हुआ है। जहाँ दो घड़ी बैठकर ग्रामीण राहत महसूस करते हैं। सम्भाग के कई गाँवों व कस्बों में कलात्मक बावड़ियों का पानी गर्मी में भी नहीं टूटता। स्थानीय नागरिकों व प्रशासनिक अकर्मण्यता से वे अनुपयोगी बना दी गई जबकि बावड़ी के पास के घरों में पानी के लिये हाहाकार मचा रहता है। बूंदी के इन्द्रगढ़ कस्बे में एक बावड़ी को केवल इसलिये बन्द कर दिया गया कि इसमें कोई डूब न मरे। जैसे जलस्रोत जनजीवन के लिये खतरा बन गए हों। नए यूग के लोगों का मानसिक दिवालियापन कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा।

पवित्र कुण्ड


बारां जिले के ही सीताबाड़ी धार्मिक स्थल पर पवित्र कुंडों की अनूठी शृंखला है सघन आम्र कुंजों के बीच राम लक्ष्मण, लव-कुश नाम के कुंड आदिवासी समाज के सांस्कृतिक संगमि का स्थल भी है। मई-जून में आयोजित मेले को आदिवासियों का कुम्भ कहा जाता है। प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर इन कुण्डों के कारण आसपास के वन क्षेत्र में भीषण गर्मी में भी पानी की झिरियाँ चलती हैं।

कैथून बावड़ी, भँवरिया बावड़ी, डाढ़ देवी कुण्ड, रंगवाड़ी कुण्ड, गणेशपाल की राड़ी के कुण्ड, सोरसन के देववन की बावड़ी, अन्ता के निकट नागदा के कुण्ड में वर्ष भर गौमुख से झिर चलती है। ये जलस्रोत स्थानीय जनता के साथ-साथ पशु-पालकों के लिये भी पेयजल का आधार है। बारां जिले के ही मांगरोल का 22 बीघा का सूरज्या तालाब एवं चन्दा तालाब जो 80 बीघा का था अस्तित्व खो रहा है।

अनुपम मिश्र ने ‘राजस्थान की रजत बूंदे’ नामक पुस्तक में राज्य के रेगिस्तानी इलाकों में जल संग्रहण परम्परा को गहराई तक टटोला है जाहिर है उसमें हाड़ौती सम्भाग को जल संकट से मुक्त समझा गया। इसलिये जिक्र नहीं किया गया। नदी, नाले, तालाब, कुण्ड, बावड़ियों और चम्बल की नहरों का बिछा हुआ जाल रेगिस्तान (मरूभूमि) से इस क्षेत्र की अलग प्रकृति को दर्शाता है। फिर भी यह चित्रण अधूरा इसलिये है कि यहाँ भी जल संग्रहण की श्रेष्ठ परम्परा में जल की बूँदों का महत्त्व निहित है और जलाशयों की देशी समझ मरुभूमि से अलग नहीं है।

राजस्थान के हाड़ौती सम्भाग में जल की प्रचुरता का ‘जसढोल’ यानि प्रशंसा सही चित्रण नहीं है। आज इतने जलस्रोत होते हुए भी जलसंकट की खबरें राज्य के अन्य हिस्सों से भिन्न नहीं हैं। राजस्थान के पुराने इतिहास में मरुभूमि का या अन्य क्षेत्रों का वर्णन सूखे उजड़े और एक अभिशप्त क्षेत्र की तरह नहीं मिलता। रेगिस्तान के लिये आज प्रचलित थार शब्द भी ज्यादा नहीं दिखता। अकाल पड़े हैं पानी का कष्ट भी रहा है पर गृहस्थ से लेकर जोगियों तक कवियों साहित्यकारों आदि ने इसे ‘धरती धोरां री’ कहा।

पालर यानि वर्षा के जल को संग्रह कर लेने के तरीके भी यहाँ बादलों और बूँदों की तरह अनन्त हैं। बूँद-बूँद गागर भी भरती है और सागर भी ऐसे सुभाषित अब पाठ्यपुस्तकों से भी गायब है। समाज की स्मृति में समाए मिलते हैं। जिस बात को समाज ने याद रखा उसे उसने आगे सुनाया और बढ़ाया और न जाने कब पानी के इस काम का इतना विशाल व्यावहारिक और बहुत व्यवस्थित ढाँचा खड़ा कर दिया। आज कोई सी भी सरकार कितनी ही महंगी योजना बना ले, जल प्रबन्ध का ऐसा सुसंठित तंत्र खड़ा नहीं कर सकती। ऐसे निराकार संगठन को समाज ने न राज को, सरकार को सौंपा न आज की भाषा में ‘निजी’ क्षेत्र को। घर-घर, गाँव-गाँव लोगों ने इस ढाँचे को साकार किया सम्भाला और उसे आगे बढ़ाया।

कुएँ के पानी को ढँक कर रखना जरूरी है। कुइयों पर पहले लकड़ी के ढक्कन होते थे अब लोहे के मिल जाते हैं। कहीं खस की टाटी की तरह घासफूस या छोटी हटनियों से बने ढक्कनों का भी उपयोग किया जाता है। जहाँ नई सड़कें निकली हैं नए और अपरिचित लोगों की आवक-जावक भी बढ़ गई है, वहाँ अमृत जैसे मीठे पानी की सुरक्षा भी करनी पड़ती है। ढक्कनों पर ताले तथा कुईं के ऊपर पानी खींचने के लिये लगाई गई घिरनी व चकरी पर भी लगाए जाते हैं। गहरी कुईं पर पानी खींचने की सुविधा के लिये चकरी लगाई जाती है जिसे चरखी, गरेड़ी व फरेड़ी भी कहा जाता है।कुईं यानि बहुत छोटा सा कुआँ। कुआँ पुल्लिंग है। कुईं स्त्रीलिंग। यह छोटी भी केवल व्यास में ही है। गहराई तो इस कुईं की कहीं से कम नहीं। राजस्थान में अलग-अलग स्थानों पर विशेष कारण से कुईयों की गहराई कुछ कम ज्यादा होती है। कुईं एक ओर अर्थ में कुएँ से अलग है। कुआँ भूजल को पाने के लिये बनता है। कुईं भूजल से ठीक वैसे नहीं जुड़ती जैसे कुआँ जुड़ता है। कुईं वर्षा जल को बड़े विचित्र ढंग से समेटती है, तब भी जब वर्षा ही नहीं होती। यानि कुईं में न तो सतह पर बहने वाला पानी है, न भूजल। यह तो ‘नेति नेति’ जैसा कुछ पेचीदा मामला है।

अनुपम मिश्र कहते हैं इस अमृत को पाने के लिये मरुभूमि के समाज ने खूब मंथन किया। अपने अनुभवों को व्यवहार में उतारने का एक पूरा शास्त्र विकसित किया। इस शास्त्र ने समाज के लिये उपलब्ध पानी को तीन रूपों में बाँटा- पहला रूप है पालर पानी यानि सीधे बरसात से मिलने वाला पानी। यह धरातल पर बहता है और इसे नदी तालाब आदि में रोका जाता है। पानी का दूसरा रूप पाताल पानी कहलाता है। यह वही भूजल है जो कुओं में से निकाला जाता है। पालर और पाताल पानी के बीच का तीसरा रूप है रेजाणी पानी, धरातल से नीचे उतरा लेकिन पाताल में न मिल पाया पानी रेजाणी है।

पाताल तोड़ कुएँ


कुआँ, कुईं खोदने की देशी तकनीक आज की तकनीक से श्रेष्ठ रही है। कुएँ खोदने में सारा समाज शामिल होता था। काम पूरा होने पर भोज होता था जबकि आज जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग द्वारा खोदे हुए हैण्डपम्प को विभाग स्वयं ही नहीं सम्भालता। यदि एक वाशर भी खराब हो जाये तो उसे ठीक कराने के लिये सरकारी तंत्र का इन्तजार रहता है। भले ही गाँव पानी के लिये त्राहि-त्राहि करता रहे। शासन तंत्र की कार्यप्रणाली और उस पर निर्भर रहने की आधुनिक सोच ने देशी जल प्रबन्धन के तंत्र को छिन्न-भिन्न किया है। तभी तो कुएँ के किनारे बैठा राहगीर प्यासा ही रहा जाता है।

कुएँ के पानी को ढँक कर रखना जरूरी है। कुइयों पर पहले लकड़ी के ढक्कन होते थे अब लोहे के मिल जाते हैं। कहीं खस की टाटी की तरह घासफूस या छोटी हटनियों से बने ढक्कनों का भी उपयोग किया जाता है। जहाँ नई सड़कें निकली हैं नए और अपरिचित लोगों की आवक-जावक भी बढ़ गई है, वहाँ अमृत जैसे मीठे पानी की सुरक्षा भी करनी पड़ती है। ढक्कनों पर ताले तथा कुईं के ऊपर पानी खींचने के लिये लगाई गई घिरनी व चकरी पर भी लगाए जाते हैं। गहरी कुईं पर पानी खींचने की सुविधा के लिये चकरी लगाई जाती है जिसे चरखी, गरेड़ी व फरेड़ी भी कहा जाता है। लेकिन प्रायः गुलेल के आकार के मजबूत तने को काट कर उसमें आर-पार छेद बनाकर लगाई जाती है। इसे ओड़ाक कहते हैं इसके बिना गहरी कुईं से पानी निकालना कठिन है।

श्रेयस्कर धार्मिकता


राजस्थान में प्राचीनकाल से ही नाली कूप, तड़ाग आदि बनवाने की परम्परा विद्यमान थी। शिलालेखों में सीढ़ी से उतर कर जलस्तर तक पहुँचने वाली वापी के निर्माण के संकेत मिलते हैं। झालावाड़ के पास गंगधार ग्राम से प्राप्त गुप्तकालीन विक्रम संवत 480 (423 ईस्वी) के लेख में मयूराक्ष द्वारा मातृकावेश्म तथा वापी के निर्माण का उल्लेख मिलता है। मध्य युग में भी वापी, कूप, तड़ाग आदि के निर्माण का कार्य धार्मिक गतिविधियों के रूप में श्रेयस्कर समझा जाता था। इस प्रकार के उदाहरण प्राप्त होते हैं जब माता-पिता, पुत्रादि या स्वयं के श्रेयार्थ, कृपादि के निर्माण या जीर्णोद्धार के लिये दान दिया गया।

तपती धरती का स्वर्ग


कहावत है ‘बहता पानी निर्मला’ ठीक इसके विपरीत हाड़ौती सम्भाग में कुण्ड, कुण्डियों की परम्परा रही है जिनमें पानी वर्ष भर उससे भी ज्यादा समय तक ठहर कर निर्मल बना रहता है। बारां जिले में सीताबाड़ी के कुण्डों की शृंखला, बूंदी में नागर सागर कुण्ड, कोटा के कसार के पास शिवबाड़ी का कुण्ड साफ-सुथरी जगह पर रोककर उनका संग्रह करना आज गिरी बूँदों को कल के लिये रोकना पहाड़ों पर टाँके, पठार व तलहटी के कुण्ड घरों में कुण्डियाँ कई नाम हैं। बूंदी के तारगढ़ दुर्ग के टाँके का पानी आज भी पीने योग्य है तलवास के पहाड़ों पर टाँकों का पानी श्रेष्ठतम नमूने हैं।

प्राचीन समाज की जल प्रबन्ध नीति के अवशेष झालावाड़ में गागरोन के किले का टाँका अब फूट गया है। राजा महाराजाओं ने भीषण संकट में भी जल संग्रहण को भुलाया नहीं। पश्चिमी राजस्थान एवं मध्य प्रदेश की तरह हाड़ौती के घरों में टाँके नहीं देखने को मिलते। घर-घर में कुइयाँ जरूर पुराने मोहल्ले में देखने को मिलती हैं।

आधुनिक युग में ये सब चीजें अतीत की बातें हो गई हैं। जिन घरों में कुइयाँ हैं। वहाँ भी जलदाय विभाग के नल का पानी काम में लिया जाने लगा है। कुएँ और कुइयाँ अपने ही घर में उपेक्षित हो गए। उनकी याद तब आती है जब जलदाय विभाग जल आपूर्ति नहीं करता। यानि उलटी गंगा बह रही है।

विस्तार की भेंट चढ़ गए कोटा के कुएँ


कोटा शहर जहाँ कभी जल संकट नहीं रहा। कारण यह शहर वर्ष पर्यन्त बहने वाली चम्बल नदी के तट पर बसा है। यहाँ के पर्व राजाओं और धनी लोगों ने तालाबों, कुओं, बावड़ियों का निर्माण कराया परकोटे के अन्दर पुराने शहर में कुण्ड, बावड़ियों की एक शृंखला है। लेकिन 1929-30 के काल में पाइप लाइनों के जरिए नगर को पेयजल आपूर्ति की प्रणाली प्रारम्भ हुई।

उम्मेद सिंह द्वितीय की पहल पर रियासत के अभियन्ता डेविन ने इस योजना को लागू किया। तभी से पारम्परिक जलस्रोतों की उपेक्षा शनैः-शनैः प्रारम्भ हो गई। सम्पन्न लोगों के घरों में निजी कुण्ड व कुएँ थे जहाँ से आमजन भी पानी ले सकते थे। कोई इन्हें गन्दा करने का साहस नहीं करता था।

कोटा के कुछ जलस्रोतों में अबली मीणी की बावड़ी, नयापुरा की जमना बावड़ी, गोपाल निवास के पास गंगाजली का कुआँ, पुरानी सब्जी मंडी में भैरु बावड़ी, रामकुण्ड व वक्षपुरी का कुण्ड, इसके नाम से तो एक बाजार भी है। घोड़ा वाले बाबा चौराहे के पास एक कुआँ था जिससे कच्ची बस्ते वाले लोग पानी पीते थे उसे सड़क चौड़ी करने के लिये पाट दिया गया। शहर में आज भी कई बावड़ियों में पानी है परन्तु आधुनिकता व शहरी विस्तारीकरण के फलस्वरूप या तो खण्डहर हो गई या उपेक्षित पड़ी हैं। रंगबाड़ी के बालाजी का कुण्ड आज भी उपयोगी है। वर्तमान दुखद स्थिति को देखते हुए कह नहीं सकते कब तक उपयोगी रहेगा। यहाँ कुण्डों की व्यापक शृंखला थी जो अब नष्ट हो गई।

नाड़ियाँ – जिनके अवशेष भी नहीं बचे


पश्चिमी राजस्थान की तरह ही हाड़ौती में तालाबों के साथ तलाइयाँ भी रही। माटी और आकाश के बदलते रूपों के साथ ही तालाबों के आकार-प्रकार और नाम भी बदल जाते हैं। बड़े तालबों के पास गाँव के किनारों पर तलाइयों के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। तलाइयाँ तो तालाबों के पहले ही नष्ट हो गई। कोटा सूरजपोल इलाके में रामतलाई होती थी उसे आज मैदान का रूप दे दिया गया, दीगोद की तलाई पर बस स्टैंड खड़ा है। गाँवों के आसपास की सभी तलाइयों का वहीं हाल हुआ जो तालाबों का हुआ।

इनके पीछे मूल भावना वही थी जहाँ पानी की आवक पूरी नहीं हो रोक लेने के लिये जगह भी छोटी हो तो उस जगह को छोड़ते नहीं थे उस पर तालाब के बड़े कुटुम्ब की सबसे छोटी सदस्या नाड़ी बनी मिलेगी। ये बड़े काम सिर्फ राज परिवारों ने ही नहीं किये बंजारों, चरवाहों, भीलों ने वर्षों की मेहनत से तैयार किये थे। बारां जिले की किशनगंज तहसील के रामगढ़ में घोड़े की नाल जैसी पहाड़ी के बीच की तलाई में वर्ष भर पानी रहता है जो आज भी जन उपयोगी बनी हुई है। लेकिन अधिकांश तलाइयाँ नष्ट प्राय हैं। नाड़ियों के तो अवशेष भी नहीं बचे।

दुष्परिणाम


1. भूजल के स्तर में निरन्तर गिरावट
2. वर्षा का पानी व्यर्थ बहना
3 बड़े बाँधों को खतरा
4. स्वरदेशी आर्थिक स्रोत पर कुठाराघाट
5. जंगलों की बर्बादी
6. पक्षियों की खत्म होती प्रजातियाँ
7. धार्मिक-सांस्कृतिक बिखराव
8. पृथ्वी का बढ़ता तापमान
9. ओजोन परत में छेद

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