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2 जुलाई - मध्य प्रदेश में वृक्षारोपण और पर्यावरण के महापर्व को कारगर बनाने का अवसर


2 जुलाई को नर्मदा के किनारे वृक्षारोपण करते म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान2 जुलाई को नर्मदा के किनारे वृक्षारोपण करते म.प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहाननर्मदा सेवा यात्रा के बाद 2 जुलाई 2017 को मध्य प्रदेश में एक बार फिर इतिहास रचा गया है। इस इतिहास के केन्द्र में हैं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का वह संकल्प जो नर्मदा सेवा यात्रा के दौरान उनके द्वारा बारम्बार दुहराया गया था। वह संकल्प जिसके मार्फत नर्मदा क्षेत्र और उसके आसपास के समूचे समाज को वृक्षारोपण और पर्यावरण बचाने की कोशिश से जोड़ने का पुरजोर प्रयास किया गया था।

यह वही प्रयास है जिसमें प्रदेश के मुखिया ने साधु सन्तों से लेकर फिल्म जगत के सितारों को और मीडिया से लेकर देश के जाने-माने पर्यावरणविदों को जोड़कर अदभुत काम कर दिखाया था। प्रधानमंत्री की मौजूदगी में नर्मदा की रेत के अवैध और अवैज्ञानिक खनन को रोकने के लिये न केवल संकल्प लिया था वरन उसे रोककर और वैज्ञानिक आधार दिलाने के लिये ऐतिहासिक फैसला लेकर देश के सामने उदाहरण पेश किया था।

उसी क्रम में 2 जुलाई 2017 को प्रदेश के 51 में से 24 जिलों के 98 हजार 976 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 6 करोड़ पौधों का रोपण कर हरितिमा की चुनरी चढ़ाने का प्रयास किया गया है। मुख्यमंत्री खुद अमरकंटक, लमेटाघाट (जबलपुर), छीपानेर (सीहोर) और ओंकारेश्वर में वृक्षारोपण किये। यह प्रयास विश्व रिकार्ड बनेगा और सदा-सदा के लिये प्रदेश और उसके मुखिया के नाम पर अंकित होगा।

वृक्षारोपण कार्यक्रम में पौधों का इन्तजाम करना और उन्हें यथा समय लगाना बहुत कठिन नहीं है। हर राज्य के वन विभाग का अमला इसके लिये प्रशिक्षित होता है। हर प्रदेश में ऐसे लोगों का भी अभाव नहीं होता जो प्रकृति से अपने जुड़ाव के कारण वृक्षारोपण को विज्ञान सम्मत, आवश्यक तथा पुनीत कार्य मानते हैं। कुछ लोग उसे अपने संस्कारों का हिस्सा मानते हैं।

कुछ लोग पीपल और वट वृक्षों में देवी-देवताओं का वास मानकर उनकी पूजा-अर्चना भी करते हैं। इस कारण पीपल और वट वृक्ष को काटने में अवचेतन में पैठी आस्था निर्णायक भूमिका निभाती है। विश्नोई समाज का खेजड़ी के वृक्ष बचाओ आत्म बलिदान का उदाहरण जग जाहिर है। चिपको आन्दोलन भी समाज के लिये मिसाल हैं। पर प्रश्न है क्या 2 जुलाई 2017 को मध्य प्रदेश में हुआ 6 करोड़ पौधों का रोपण अपनी मंजिल को पा सकेगा? यह सवाल प्रदेश की प्रतिष्ठा तथा परीक्षा का भी सवाल है।

इस सवाल का सम्बन्ध नर्मदा सेवा यात्रा के दौरान समाज को जोड़ने की जद्दोजहद से भी है। इस कारण मीडिया सहित पूरा समाज इस प्रयोग की सफलता को आँकने का पुरजोर प्रयास करेगा। यदि वृक्षारोपण सफल होता है, नर्मदा का प्रदूषण कम होता है, प्रवाह बढ़ता है तो यह प्रयोग पूरी दुनिया में मिसाल बनेगा। यदि असफल होता है तो सम्भव है मीडिया सवाल खड़े कर चुप हो जावे पर समाज के विश्वास पर जो वज्रपात होगा उसकी भरपाई कठिन होगी क्योंकि असफलता का पोस्टमार्टम प्याज के छिलके उतारने जैसा होता है।

देश भर में वन महोत्सवों का पिछला अनुभव बहुत अच्छा नहीं है। कुछ आलोचकों की नजर में वन महोत्सव अब रस्म अदायगी का पर्याय जैसा बन गया है तो कुछ लोग रोपित प्रजातियों पर, राईपेरियन प्रजातियों की उपेक्षा के कारण प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। केन्द्र और राज्यों के अनेक कार्यक्रमों में भी वृक्षारोपण महत्त्वपूर्ण घटक है। कारपोरेट सोशल जिम्मेदारी के अर्न्तगत तथा नाबार्ड की कुछ योजनाओं के अर्न्तगत भी वृक्ष लगाए जाते हैं।

उन वृक्षों को छोड़कर जिन्हें घर की चहारदिवारी के भीतर परिवार के किसी सदस्य द्वारा लगाया गया है या परिवार के किसी सदस्य की स्मृति में लगाया गया है, सब जगह परिणाम वही ढाक के तीन पात ही रहा है। पुराने अनुभवों के कारण मौजूदा प्रयास पर निश्चय ही गम्भीरता से बात होनी चाहिए। यह बात उसके परिणामों की आलोचना के लिये नहीं वरन उन तौर-तरीकों को खोजने के लिये होना चाहिए जो इस प्रतिष्ठित कार्यक्रम को टिकाऊ बनाने और वृक्षों को समाज से जोड़ने के लिये आवश्यक हैं।

अनुभव बताता है कि समाज ने अनेक अवसरों पर उन वृक्षों की रक्षा की है जिनके फलों पर उसका अधिकार निर्विवादित है। उसने उन्हें पाला-पोसा है, उन्हें पानी दिया है और कीड़ों तथा बीमारियों से उनकी रक्षा की है।

समाज ने उन वृक्षों की सुरक्षा में अरुचि दिखाई है जिनके फलों पर उसका अधिकार शून्य या विवादित है। इस कारण यदि मौजूदा कार्यक्रम में रोपित वृक्षों के फलों पर अधिकारिता का सिद्धान्त लागू किया जाता है तो वृक्षों के बचे रहने की सम्भावना बढ़ जाएगी। हितग्राही आगे आकर उनकी रक्षा करेगा। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश की रेवेन्यु पुस्तिका में प्रावधान मौजूद है। अतः उस प्रावधान का उपयोग किया जा सकता है।

यदि प्रावधान नहीं हैं तो कानून बनाया जा सकता है। कानून बनाकर समाज के वंचित वर्ग को वृक्षों के लाभों का हकदार बनाया जा सकता है। पंचायत या राजस्व विभाग उनके साथ अनुबन्ध कर सकता है। उन्हें पट्टा दे सकता है। यह उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने की दिशा में उठाया सकारात्मक कदम होगा। अन्य लाभों में हवा में प्राणवायु की वृद्धि तथा तापमान में नियंत्रण मुख्य कहे जा सकते हैं।

जहाँ तक नर्मदा में प्रदूषण की कमी तथा प्रवाह बढ़ाने की बात है तो और भी अनेक कार्य हैं उन्हें इस प्रयास में जोड़ना होगा। उन कामों में नदी कछार में रासायनिक खेती को तिलांजली देकर आर्गेनिक खेती को अपनाना बहुत महत्त्वपूर्ण कदम होगा। अन्य कामों में सीवर ट्रीटमेंट प्लांट लगाना, उनके पानी को रीसाईकिल कराना, कछार में भूजल और सतही जल के मिले-जुले उपयोग को लागू करना तथा भूजल दोहन को नियंत्रित करना सम्मिलित है।

भूजल दोहन को नियंत्रित करने के लिये उसके उपयोग की उसकी निरापद सीमा तय करना होगा। अभी इस सीमा के बारे में विज्ञान जगत पूरी तरह मौन है। उसके मौन को खत्म कराना होगा अन्यथा प्रयास असफल होंगे। अन्त में एक बात और - किसी भी नदी तंत्र में एक निश्चित मात्रा में ही पानी होता है। अतः उस नदी-तंत्र से उतने ही पानी की अपेक्षा करनी चाहिए जितना वह बिना नदी को नुकसान पहुँचाए दे सके।

यह तभी सम्भव है जब नदी के पानी के उपयोग में समझदारी का उपयोग होगा। लालच आधारित उपयोग नदी, समाज और सरकार के लिये अमान्य होना चाहिए। यदि ऐसा सम्भव हुआ तो नर्मदा सेवा यात्रा के अमृत का लाभ नदी, समाज और सरकार की ही झोली में जाएगा। राक्षसों को अमृत की एक बूँद भी नहीं मिलेगी। यही कदम 2 जुलाई को अविस्मरणीय बना सकता है।

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