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ब्रह्मपुत्र नदी में सुरंग


ब्रह्मपुत्र पर बनने वाले बाँधों और सुरंगों से भारत के साथ-साथ बांग्लादेश भी प्रभावित होगा। इसके आलावा लाओस, थाईलैंड व वियतनाम भी प्रभावित होंगे। लेकिन ये देश पाकिस्तान की तरह चीन के प्रभाव में हैं, इसलिये चीन इनके साथ उदरता बनाए रखेगा। इसलिये संयुक्त राष्ट्र संधि की शर्तों को चीन भी स्वीकार करे, इस हेतु भारत और बांग्लादेश इस मसले को संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंच पर उठाएँ, यह जरूरी हो गया है। इस मंच से यदि चीन की निन्दा होगी तो उसे संधि की शर्तों को दरकिनार करना आसान नहीं होगा।चीन के अभियन्ता ऐसी तकनीकों के परीक्षण में जुट गए हैं, जिनका प्रयोग कर ब्रह्मपुत्र नदी के जलप्रवाह को 1000 किमी लम्बी सुरंग बनाकर मोड़ दिया जाये। इस योजना के जरिए चीन की मंशा अरुणाचल प्रदेश की सीमा से लगे तिब्बत से शिनजियांग पानी ले जाने की है। हांगकांग के अखबार ‘साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट’ ने यह खबर दी है।

इस पहल से चीन शिनजियांग के रेगिस्तानी इलाके को उपजाऊ भूमि में बदलना और इस क्षेत्र की आबादी को पेयजल उपलब्ध कराना चाहता है। दक्षिणी तिब्बत की यारलुंग सांगपो नदी के जल प्रवाह को ताकलाकान रेगिस्तान की ओर मोड़ा जाएगा। भारत में इसी नदी को ब्रह्मपुत्र के नाम से जाना जाता है। इस खबर के आने के साथ ही भारत सरकार के साथ दुनिया भर के पर्यावरण प्रेमी चिन्तित हो गए है। क्योंकि सुरंग खुदाई से हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन की ओर से कई बाँध बनाए जाने को लेकर भारत बीजिंग को पहले ही अपनी चिन्ताओं से अवगत करा चुका है। तिब्बत-शिनजियांग जल सुरंग के प्रस्ताव का प्रारूप तैयार करने में सहयोगी रहे शोधकर्ता वांगवेई ने यह खुलासा हांगकांग के अखबार को किया है। वांगवेई के अनुसार 100 से अधिक वैज्ञानिक अभियन्ताओं के अलग-अलग दल बनाए गए हैं।

चीनी सरकार ने इसी साल अगस्त में मध्य यूनान प्रान्त में 600 किमी से भी अधिक लम्बी सुरंग बनाने का काम शुरू किया है। वांगवेई का दावा है कि यूनान में बन रही यह सुरंग चीन की नई प्रौद्योगिकी का पूर्वाभ्यास है। इस प्रयास के सफल होने पर इसका इस्तेमाल ब्रह्मपुत्र नदी का जलप्रवाह मोड़ने के लिये सुरंग बनाने में किया जाएगा। हालांकि चीन ने अखबार की खबर को गलत बताया है।

ब्रह्मपुत्र नदी के पानी को लेकर चीन का भारत से ही नहीं बांग्लादेश से भी विवाद है। इस नदी पर कई बाँध बनाकर चीन ने ऐसे जल प्रबन्ध कर लिये हैं कि वह जब चाहे तब भारत और बांग्लादेश में पानी के प्रवाह को रोक दे और जब चाहे तब ज्यादा पानी छोड़कर ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसे इलाकों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न कर दे। चीन ने ऐसी हरकत करते हुए पिछले साल भारत में जलापूर्ति करने वाली ब्रह्मपुत्र नदी की सहायक नदी जियाबुकू का पानी रोक भी दिया था।

इस नदी पर चीन 74 करोड़ डॉलर (करीब 5 हजार करोड़ रुपए) की लागत से जल विद्युत परियोजना के निर्माण में लगा है। जून 2014 में शुरू हुई यह परियोजना 2019 में पूरी होगी। चीन जिस यारलुंग सांगपो नदी पर सुरंग बनाने की इच्छा पाले हुए है, वह भारत के पूर्वोत्तर प्रान्तों से होते हुए बांग्लादेश में बंगाल की खाड़ी में गिरती है। चीन यदि भविष्य में यह सुरंग बना लेता है तो ब्रह्मपुत्र के बहाव में तो बदलाव आएगा ही, इस पर निर्भर अनेक क्षेत्रों में जलसंकट भी गहरा जाएगा। इस सुरंग को बनाने में 15 करोड़ डॉलर प्रति किमी खर्च आएगा और सुरंग पूरी करने में करीब 150 अरब डॉलर खर्च होंगे। इस दृष्टि से इस सुरंग को बनाना उतना आसान भी नहीं है, जितना समझा जा रहा है।

एशिया की सबसे लम्बी इस नदी की लम्बाई 3000 किमी है। इसी की सहायक नदी जियाबुकू है। जिस पर चीन हाइड्रो प्रोजेक्ट बना रहा है। दुनिया की सबसे लम्बी नदियों में 29वाँ स्थान रखने वाली ब्रह्मपुत्र 1625 किमी क्षेत्र में तिब्बत में बहती है। इसके बाद 918 किमी भारत और 363 किमी की लम्बाई में बांग्लादेश में बहती है। समुद्री तट से 3300 मीटर की ऊँचाई पर तिब्बती क्षेत्र में बहने वाली इस नदी पर चीन ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत तीन पनबिजली परियोजनाएँ निर्माण के प्रस्ताव स्वीकृत किये हैं।

चीन इन बाँधों का निर्माण अपनी आबादी के लिये व्यापारिक, सिंचाई, बिजली और पेयजल समस्याओं के निदान के उद्देश्य से कर रहा है, लेकिन उसका इन बाँधों और जल सुरंगों के निर्माण की पृष्ठभूमि में छिपा एजेंडा, खासतौर से भारत के खिलाफ रणनीतिक इस्तेमाल भी है। दरअसल चीन में बढ़ती आबादी के चलते इस समय 886 शहरों में से 110 शहर पानी के गम्भीर संकट से जूझ रहे हैं।

उद्योगों और कृषि सम्बन्धी जरूरतों के लिये भी चीन को बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत है। चीन ब्रह्मपुत्र के पानी का अनूठा इस्तेमाल करते हुए अपने शिनजियांग, जांझु और मंगोलिया इलाकों में फैले व विस्तृत हो रहे रेगिस्तान को भी नियंत्रित करना चाहता है। चीन की यह नियति रही है कि वह अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये पड़ोसी देशों की कभी परवाह नहीं करता है।

चीन ब्रह्मपुत्र के पानी का मनचाहे उद्देश्यों के लिये उपयोग करता है तो तय है, अरुणाचल में जो 17 पनबिजली परियोजनाएँ प्रस्तावित व निर्माणाधीन हैं, वे सब अटक जाएँगी। ये परियोजनाएँ पूरी हो जाती हैं और ब्रह्मपुत्र से इन्हें पानी मिलता रहता है तो इनसे 37,827 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा। इस बिजली से पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में बिजली की आपूर्ति तो होगी ही, पश्चिम बंगाल और ओड़ीसा को भी अरुणाचल बिजली बेचने लग जाएगा।

चीन अरुणाचल पर जो टेढ़ी निगाह बनाए रखता है, उसका एक बड़ा करण अरुणाचल में ब्रह्मपुत्र की जलधारा ऐसे पहाड़ व पठारों से गुजरती है, जहाँ भारत को मध्यम व लघु बाँध बनाना आसान है। ये सभी बाँध भविष्य में अस्तित्व में आ जाते हैं और पानी का प्रवाह बना रहता है तो पूर्वोत्तर के सातों राज्यों की बिजली, सिंचाई और पेयजल जैसे बुनियादी समस्याओं का समाधान हो जाएगा।

चीन के साथ सुविधा यह है कि वह अपनी नदियों के जल को अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानकर चलता है। पानी को एक उपभोक्ता वस्तु मानकर वह उनका अपने हितों के लिये अधिकतम दोहन में लगा है। बौद्ध धर्मावलम्बी चीन परम्परा और आधुनिकता के बीच मध्यमार्गी सामंजस्य बनाकर चल रहा है। जो नीतियाँ एक बार मंजूर हो जाती हैं, उनके अमल में चीन कड़ा रुख और भौतिकवादी दृष्टिकोण अपनाता है। इसलिये वहाँ परियोजना के निर्माण में धर्म और पर्यावरण सम्बन्धी समस्याएँ रोड़ा नहीं बनती।

नतीजतन एक बार कोई परियोजना कागज पर आकार ले लेती है तो वह आरम्भ होने के बाद निर्धारित समयावधि से पहले ही पूरी हो जाती है। इस लिहाज से ब्रह्मपुत्र पर जो 2.5 अरब किलोवाट बिजली पैदा करने वाली परियोजना निर्माणाधीन है, उसके 2019 से पहले ही पूरी होने की उम्मीद है। इसके उलट भारत में धर्म और पर्यावरणीय संकट परियोजनाओं को पूरा होने में लम्बी बाधाएँ उत्पन्न करते रहते हैं। लिहाजा चीन भविष्य में सुरंग बनाने का संकल्प ले लेता है तो उसे पूरा करने में पीछे नहीं हटेगा।

चीन और भारत के बीच ब्रह्मपुत्र के जल-बँटवारे को लेकर विवाद और टकराव बढ़ रहा है। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पानी के उपयोग को लेकर कई संधियाँ हुई हैं। इनमें संयुक्त राष्ट्र की पानी के उपभोग को लेकर 1997 में हुई संधि के प्रस्ताव पर अमल किया जाता है।

इस संधि के पारूप में प्रावधान है कि जब कोई नदी दो या इससे ज्यादा देशों में बहती है तो जिन देशों में इसका प्रवाह है, वहाँ उसके पानी पर उस देश का समान अधिकार होगा। इस लिहाज से चीन को सोची-समझी रणनीति के तहत पानी रोकने या उसकी धारा बदलने का अधिकार है ही नहीं। इस संधि में जल प्रवाह के आँकड़े साझा करने की शर्त भी शामिल है। लेकिन चीन संयुक्त राष्ट्र की इस संधि की शर्तों को मानने के लिये इसलिये बाध्यकारी नहीं है, क्योंकि इस संधि पर अब तक चीन और भारत ने हस्ताक्षर ही नहीं किये हैं।

2013 में एक अन्तरमंत्रालय विशेष समूह गठित किया गया था। इसमें भारत के साथ चीन का यह समझौता हुआ था कि चीन पारदर्शिता अपनाते हुए पानी के प्रवाह से सम्बन्धित आँकड़ों को साझा करेगा। लेकिन चीन ने इस समझौते का पालन नहीं किया। वह जब चाहे तब ब्रह्मपुत्र का पानी रोक देता है, अथवा इकट्ठा छोड़ देता है। पिछले वर्षों में अरुणाचल और हिमाचल प्रदेशों में जो बाढ़ें आई हैं, उनकी पृष्ठभूमि में चीन द्वारा बिना किसी सूचना के पानी छोड़ा जाना रहा है।

नदियों का पानी साझा करने के लिये अब भारत को चाहिए कि वह चीन को वार्ता के लिये तैयार करे। इस वार्ता में बांग्लादेश को भी शामिल किया जाये। क्योंकि ब्रह्मपुत्र पर बनने वाले बाँधों और सुरंगों से भारत के साथ-साथ बांग्लादेश भी प्रभावित होगा। इसके आलावा लाओस, थाईलैंड व वियतनाम भी प्रभावित होंगे। लेकिन ये देश पाकिस्तान की तरह चीन के प्रभाव में हैं, इसलिये चीन इनके साथ उदरता बनाए रखेगा। इसलिये संयुक्त राष्ट्र संधि की शर्तों को चीन भी स्वीकार करे, इस हेतु भारत और बांग्लादेश इस मसले को संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंच पर उठाएँ, यह जरूरी हो गया है। इस मंच से यदि चीन की निन्दा होगी तो उसे संधि की शर्तों को दरकिनार करना आसान नहीं होगा।

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