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यूएन रिपोर्ट - कई देशों के लिये खतरे की घंटी

Author: 
बिशन पपोला
Source: 
नेशनल दुनिया, 25 मई, 2016

जलवायु परिवर्तन की वजह से खतरे तो बढ़ते ही रहे हैं, लेकिन यह रिपोर्ट उसे और पुख्ता कर देती है। यह उन चीजों पर जल्दी काम करने के लिये भी प्रेरित करती है, जिसके मूल में यह समस्या पैदा हो रही है। जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक चिन्तन तो बढ़ा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन की वजह से जिस प्रकार परिस्थितियाँ तेजी से खतरे में बदल रही हैं, उसकी चुनौती भी बढ़ती जा रही है। भविष्य में चुनौतियाँ और भी जटिल हो जाएँगी। जीवन के मूल में विकास जरुरी है, लेकिन जिन परिस्थितियों में विकास की नींव रखी जा रही है वही इसकी मूल समस्या बन रही है।

अभी संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की पर्यावरण सम्बन्धी रिपोर्ट में समुद्र के बढ़ते स्तर (सी लेवल) को लेकर गम्भीर चिन्ता जाहिर की गई है। वैश्विक स्तर की इस रिपोर्ट में भारत को सबसे अधिक खतरे वाला देश बताया गया है। रिपोर्ट में समुद्र का स्तर बढ़ने की वजह से मुम्बई और कोलकाता जैसे शहरों को अन्य समुद्र तटीय शहरों के मुकाबले कहीं अधिक खतरे से घिरा हुआ बताया गया है।

वर्ष 2050 तक इसके गम्भीर परिणाम सामने आने की बात भी कही गई है। वैश्विक रिपोर्ट में खतरे के अन्तर्गत आने वाली सूची में भारत समेत दुनिया के दस देशों को शामिल किया गया है। यह सच है कि जिस तरह जलवायु परिवर्तन हो रहा है, उसके खतरे भी उसी तरह के होंगे। इस रिपोर्ट को उसके परिणामों का चिन्ताजनक पूर्वानुमान ही कहा जाएगा।

अब इसकी चुनौती को समझना जरूरी है और यही कारगर रास्ता भी होगा, क्योंकि इससे बचने के उपायों पर तेजी से काम करने की धारणा बढ़ाई जा सकती है। इस धारणा को समय रहते बढ़ाया जाये, ताकि खतरों को कम किया जा सके।

रिपोर्ट में कहा गया है कि समुद्र तल में बढ़ोत्तरी होने की वजह से 2050 तक दुनिया के जो देश प्रभावित होंगे, उनमें भारत सूची में सबसे ऊपर है। प्रभावित होने वाले देशों की सूची में चीन, बांग्लादेश, फिलीपींस, म्यांमार, थाईलैंड को भी शामिल किया गया है। भारत में चार करोड़ लोगों के प्रभावित होने का अनुमान लगाया गया है, जबकि बांग्लादेश के ढाई करोड़, चीन के दो करोड़ और फिलीपींस के डेढ़ करोड़ लोगों को खतरा हो सकता है।

समुद्र का स्तर बढ़ने की वजह से भारत के मुम्बई और कोलकाता को जहाँ सबसे अधिक खतरा बताया गया है, वहीं चीन के गुआंगझो और शंघाई, बांग्लादेश में ढाका, म्यांमार में यंगून, थाईलैंड में बैंकाक और वियतनाम में हो ची मिन्ह तथा हाई फोंग को खतरे वाला शहर बताया गया है। इन शहरों की बड़ी आबादी को भयंकर तटीय बाढ़ से भी जूझना पड़ सकता है। दस में से सात देश एशिया-प्रशान्त क्षेत्र के हैं। इसके अलावा दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में भी खतरे बताए गए हैं।

इसका मूल कारण एशिया में बसावट के तरीकों में परिवर्तन तो है ही, इसके अलावा शहरीकरण और सामाजिक-आर्थिक स्तर को भी उतना ही जिम्मेदार माना गया है, क्योंकि प्राकृतिक आपदाओं व जलवायु परिवर्तन से लोगों की आजीविका पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जिससे बसावट में असन्तुलन की स्थिति बढ़ जाती है और यही चीज खतरे को भी बढ़ा देती है।

अनेक तटीय इलाकों व विस्तार के दौर से गुजर रही शहरी बसावटों ने भी जलवायु के कारण पैदा होने वाली भीषण स्थितियों को भी जटिल बनाया है, क्योंकि इसने ऐसी आपदाओं से निपटने में प्राकृतिक तटीय प्रणालियों की क्षमता को प्रभावित किया है और वहाँ के खतरों को बढ़ाया है।

तटीय इलाकों में चक्रवात और तूफान आने की सबसे ज्यादा सम्भावना रहती है और इसमें गरीबी में जीवनयापन कर रहे लोगों को सबसे अधिक दंश झेलना पड़ता है। उसका कारण है कि वे ऐसी खतरनाक जगहों पर ही अपना आशियाना बना लेते हैं। इसीलिये प्राकृतिक आपदाओं से उनके प्रभावित होने की आशंका सबसे अधिक रहती है। ऐसे में समुद्र का स्तर बढ़ने से उन पर संकट और भी बढ़ जाएगा।

रिपोर्ट में यह आशंका भी जताई गई है कि तेज शहरीकरण और आर्थिक वृद्धि के चलते चीन भारत और थाईलैंड जैसे कुछ देशों को, खासकर उनके अत्यन्त शहरीकृत इलाकों को भविष्य में इससे जूझना होगा। यह पूर्वानुमान इसीलिये भी अहम है, क्योंकि 2011 में जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक खतरे में रहने वाले दुनिया के दस देशों में छह एशिया और प्रशान्त में माने जाते थे। कुल मिलाकर 2050 तक बांग्लादेश, चीन, भारत, इंडोनेशिया और फिलीपींस में ‘स्टार्म सर्ज जोन’ होंगे और इसके चलते पाँच करोड़ 80 लाख लोगों की जान जोखिम में होगी।

जलवायु परिवर्तन की वजह से खतरे तो बढ़ते ही रहे हैं, लेकिन यह रिपोर्ट उसे और पुख्ता कर देती है। यह उन चीजों पर जल्दी काम करने के लिये भी प्रेरित करती है, जिसके मूल में यह समस्या पैदा हो रही है। जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक चिन्तन तो बढ़ा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन की वजह से जिस प्रकार परिस्थितियाँ तेजी से खतरे में बदल रही हैं, उसकी चुनौती भी बढ़ती जा रही है।

भविष्य में चुनौतियाँ और भी जटिल हो जाएँगी। जीवन के मूल में विकास जरुरी है, लेकिन जिन परिस्थितियों में विकास की नींव रखी जा रही है वही इसकी मूल समस्या बन रही है। यह नीति-निर्धारकों व सामान्य जनमानस को भी समझने की जरूरत है। प्राकृतिक संसाधनों के साथ छेड़छाड़ और उनका दोहन इसके स्वरूप को और भी बिगाड़ रहा है।

विकास की दौड़ में खतरों की ऐसी चेन तैयार हो रही है, जिसके समय-समय पर परिणाम भी सामने आते रहे हैं। राजनीति भी विकास के इर्द-गिर्द ही घूमने लगी है, लेकिन इसके मूल परिणामों पर उस स्तर का चिन्तन नहीं हो रहा है, जिससे खतरों से निपटने की तरफ तेजी से काम हो। लिहाजा, यूएन की रिपोर्ट इस कमी की तरफ भी ऐसा संकेत है, जिस पर अब राजनीति और चिन्तन दोनों पर ही तेजी से काम करने की जरूरत है। और इसके लिये वैश्विक चिन्तन को और व्यापक बनाए जाने की जरूरत है।

जिस प्रकार वैश्विक तापमान यानी जलवायु परिवर्तन दुनिया की समस्या बनता रहा है, उससे मनुष्य ही नहीं बल्कि हर प्राणी परेशान है। प्राकृतिक आपदाओं के खतरों का अनुपात भी तेजी से बढ़ा रहा है। पानी का संकट तो जगजाहिर है ही। दुनिया के कई देश हर साल सूखे की चपेट में आते हैं, जिससे भुखमरी और बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ने लगता है।

अब जरूरत इस बात की है कि इसकी परिस्थितियों को तेजी से समझा जाये और विकास के नाम पर कंक्रीट के जंगल तैयार न किये जाएँ। ड्रीम प्रोजेक्ट्स के नाम पर शहरों के बसावट के तरीकों को भी सुधारा जाये, तभी खतरों पर अंकुश लग पाएगा। आपदा से निपटने में जिस प्रकार आपदा प्रबन्धन की क्षमता कमजोर साबित होती है, उसकी क्षमता को भी दुरुस्त किया जाये।

यह अच्छा है कि यूएन की यह रिपोर्ट उस वक्त आई है, जब संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण असेम्बली की तैयारियाँ अन्तिम चरण में हैं और आगामी सप्ताह यह असेम्बली नैरोबी में होने जा रही है। ऐसी उम्मीद है कि इस असेम्बली में इस पर गहनता से विचार-विमर्श होगा और वैश्विक स्तर पर खतरों से निपटने के तरीकों को व्यापक रूप दिया जाएगा।

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