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उल्लंघन करे, सो असभ्य


अदालतों ने नदियों को लेकर कई अच्छे आदेश दिए, लेकिन उनकी पालना कराने हेतु जिम्मेदार एजेंसियाँ नाकारा साबित हुईं। नतीजा, यह है कि हमारी नदियाँ, बाजार, शासन, प्रशासन और ठेकेदारों के लिये आज खुला चारागाह बन गई हैं। जितना चाहें, कमायें; कभी प्रदूषण मुक्ति, कभी गाद मुक्ति, कभी बाढ़ मुक्ति, कभी बाढ़ राहत, तो कभी बिजली उत्पादन और जल परिवहन के नाम पर।

संस्कृति निर्देश देती है। निर्देशों की पालना करना, सभ्यता का काम है। जो पालना करे, वह सभ्य; जो न करे, वह असभ्य। आइये, पुरातन नदी संस्कृति और वर्तमान भारत के आइनों को सामने रखें और स्वयं से जवाब लें कि हम क्या थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी।

अन्तिम निवेदन


अब आप पूछ सकते हैं कि यदि भारत के सांस्कृतिक निर्देश इतने व्यावहारिक थी, भारतीय जन, आज भी इतने आस्थावान हैं, तो आज हमारी नदियों की ऐसी हालत कैसे हो गई ? यह हमारे व्यवहार में गिरावट का परिणाम है अथवा कारण कुछ और है ?

मुगलिया सल्तनत के समय तक नदियों के साथ छेड़छाड़ के प्रमाण नहीं मिलते हैं। एक समय में अंग्रेज कमिश्नर लॉर्ड हॉकिन्स द्वारा बनारस के नालों को नदी से मिलाने के आदेश दिया। भारत की नदियों के इतिहास में इसका जिक्र भारत की किसी नदी के अमृत जल में विष मिलाने के अनैतिक कर्म की शुरुआत के रूप में किया जाता है। हालांकि इसके बाद ऐसा कोई आदेश नहीं मिलता; फिर भी हमारी सारी नगरपालिकायें, नगर निगम और जि़ला पंचायत आदि निकाय आज तक अपने नालों को नदियों में बेरोक-टोक मिला रहे हैं। बाँधों को ’आधुनिक भारत का मंदिर’ बताकर नदियों के प्रवाह मार्ग में बाधा पैदा करने को नदी विपरीत दूसरा कर्म माना गया। नदी की चिंता किए बगैर बनाये बैराजों, नदी किनारे बनाये तटबन्ध, राजमार्ग, एक्सप्रेस-वे तथा रेलवे लाइनें भी इसी श्रेणी के नदी प्रवाह में बाधक कर्म हैं। तीसरे नदी विपरीत कर्म के रूप में हरिद्वार में गंगा पर बैराज बनाकर स्नान घाटों को जलापूर्ति करने वाली धारा को नहर का नाम दिया गया। बकौल प्रख्यात पर्यावरणविद् स्वर्गीय श्री अनुपम मिश्र, अंग्रेजों ने रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना ही इसीलिये की, ताकि नदियों पर अधिकाधिक बाँध-बैराज बना सकें और नदियों से नहरें निकालकर ज्यादा से ज्यादा राजस्व वसूल सकें।

दुःखद यह है कि आजाद भारत में नदी विपरीत दुष्कर्मों में कमी आने की बजाय, तेजी ही आई। नदियों का शोषण, अतिक्रमण और प्रदूषण करने की प्रवृति बढ़ी। शासन और प्रशासन ने बाजार और ठेकेदारों के साथ मिलकर नदियों का व्यावसायीकरण कर डाला। सन्त और शेष समाज ने भी ’हमें क्या फर्क पड़ता है’ वाले अन्दाज में नदियों की परवाह करनी बन्द कर दी। स्वयंसेवी संगठनों ने विरोध तो बहुत किया; किन्तु एकजुटता के अभाव में उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती से अधिक कुछ साबित नहीं हुई। अदालतों ने नदियों को लेकर कई अच्छे आदेश दिए, लेकिन उनकी पालना कराने हेतु जिम्मेदार एजेंसियाँ नाकारा साबित हुईं। मेरे जैसे कलमकारों की कलम भी जानकारी देने के अलावा कुछ विशेष नहीं कर सकी।

नतीजा, यह है कि हमारी नदियाँ, बाजार, शासन, प्रशासन और ठेकेदारों के लिये आज खुला चारागाह बन गई हैं। जितना चाहें, कमायें; कभी प्रदूषण मुक्ति, कभी गाद मुक्ति, कभी बाढ़ मुक्ति, कभी बाढ़ राहत, तो कभी बिजली उत्पादन और जल परिवहन के नाम पर। बीमारी बनी रहे, इलाज चलता रहे; नदी प्रदूषण मुक्ति का बाजारू फार्मूला यही है। हमारी सरकारें आज इसी का अनुसरण कर रही हैं।

हमने अपनी नदियों को संस्कृति विपरीत सभ्यता के असभ्य विकास की भेंट चढ़ने को मजबूर कर अवश्य दिया है; किन्तु लोगों को अभी भी विश्वास है - “गंगा मैया सब ठीक कर लेगी।” यह सच है। प्रकृति अपना नियमन करना जानती है। एक दिन कोई झटका आयेगा और नदियाँ अपने साथ हो रहे शोषण, अतिक्रमण और प्रदूषण को एक झटके में ठीक कर ही लेगी। आखिरकार कोई माँ अपनी सन्तान के अत्याचार को कितना बर्दाश्त करेगी ? अतः हमें चिंता अपनी नदियों की नहीं, नदियों के बहाने अपनी सेहत और समृद्धि की करनी है; वह भी समय रहते। नदी विनाशक शक्तियाँ एकजुट हैं। अतः एकजुट तो नदी हितकारी शक्तियों को भी होना ही होगा। वर्तमान समय का असल कुंभ यही होगा। भारतीय संस्कृति का यही निर्देश है। सभ्यता, पालना करे। स्वयं को तभी सभ्य कहें; वरना् भारत की नदी संस्कृति के आइने में हमारी तस्वीर एक असभ्य की तो है ही।

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