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उमानंद की बस्ती से


उमानंद द्वीप पर आबादी है, घर हैं, मन्दिर हैं, दुकाने हैं; दुनिया के दुर्लभ सुनहरी लंगूर हैं; 17 विशेष किस्म के पक्षी हैं; समय आने पर प्रवासी पक्षियों का वास है। बाढ़ के कठिन दिनों में जिस ‘भोग’ पर यहाँ का जीवन चलता है, उसकी परम्परा व कौशल सचमुच अनुकरणीय है। ‘भोग’, आपदा के वक्त भोजन प्रबन्धन का सामाजिक कौशल है। इस कौशल का एक ही आधार है; वह है उमानंद की हवा में प्रेम का वास। उमानंद द्वीप पर रहने का मतलब, बाढ़ के कठिन दिनों में भी द्वीप पर बने रहने की जिद है।

प्रवाह के रूप और गति के आधार पर भारत की तीन धाराओं को नद कहा जाता है। सिंधु, सोन के अलावा तीसरा नद ब्रह्मपुत्र है। ब्रह्मपुत्र नद ऊपर से जितना शान्त दिखता है, अन्तस्थल में वह उतना ही बेचैन रहता है। यह ब्रह्मपुत्र नद का बेचैन अन्तस्थल ही है, जिसके कारण ब्रह्मपुत्र चलते-चलते बिदक जाता है; बँट जाता है। इस बिदकन के कारण ब्रह्मपुत्र ने अपने प्रवाह मार्ग में अनेक छोटे-बड़े द्वीपों का निर्माण किया है। इन्हीं द्वीपों में से एक द्वीप है - उमानंद द्वीप। ब्रह्मपुत्र, एक नद है। अतः उमानंद को नदी द्वीप की बजाय, नदद्वीप कहना ज्यादा उचित होगा।

सबसे छोटा आबाद नदद्वीप


उमानंद द्वीप, दुनिया का सबसे छोटा बसावट युक्त नदद्वीप है। इस दावे को लेकर कई शंकाएँ हैं, किन्तु उमानंद द्वीप, एशिया का सबसे छोटा बसावट युक्त नदद्वीप है; इस तथ्य की सच्चाई पर कोई शंका नहीं है।

नामकरण के आधार


असम राज्य की राजधानी गुवाहाटी का महाभारतकालीन नाम प्राग्ज्योतिषपुर है। गुवा यानी सुपारी और हाटी यानी बाजार। इस प्रकार नए नाम गुवाहाटी का मतलब हुआ - सुपारी का बाजार। इसी गुवाहाटी के कामरूप (मेट्रो) उपायुक्त कार्यालय या कहिए कि कचहरी घाट के एकदम सामने स्थित है उमानंद नदद्वीप। बाँह फैलाए ब्रह्मपुत्र, बीच में उमानंद कथानक है कि भगवान शिव ने देवी उमा के अपने आनन्दमयी समय को व्यतीत करने के लिये इस द्वीप को उत्पन्न किया था। इसीलिये इसे उमानंद द्वीप कहा जाता है।

उमा यानी देवी पार्वती और आनंद यानी खुशी। कहते हैं कि उमानंद स्थित भैरव मन्दिर का दर्शन किये बगैर माँ कामाख्या देवी का दर्शनफल अधूरा रहता है। अतः तीर्थयात्री, कामख्या मन्दिर जाने से पहले यहाँ आते हैं। विघ्न डालने के कारण कामदेव को भगवान शिव द्वारा जहाँ भस्म किया गया था, वह जगह भी उमानंद द्वीप ही है। अतः इस नदी द्वीप का एक नाम भस्माचल द्वीप भी है। दूर से मयूरपंख की छटा जैसा दिखने के कारण किसी ब्रितानी अधिकारी ने इस द्वीप का उल्लेख ‘पीकाॅक आइलैण्ड’ के नाम से किया गया है।

आनन्दमय जीवन


उमानंद द्वीप पर आबादी है, घर हैं, मन्दिर हैं, दुकाने हैं; दुनिया के दुर्लभ सुनहरी लंगूर हैं; 17 विशेष किस्म के पक्षी हैं; समय आने पर प्रवासी पक्षियों का वास है। बाढ़ के कठिन दिनों में जिस ‘भोग’ पर यहाँ का जीवन चलता है, उसकी परम्परा व कौशल सचमुच अनुकरणीय है। ‘भोग’, आपदा के वक्त भोजन प्रबन्धन का सामाजिक कौशल है। इस कौशल का एक ही आधार है; वह है उमानंद की हवा में प्रेम का वास।

उमानंद द्वीप पर रहने का मतलब, बाढ़ के कठिन दिनों में भी द्वीप पर बने रहने की जिद है। गुवाहाटी जैसे व्यस्तम नगर के बगल में होते हुए भी एक बसावट इस छोटे से नदद्वीप पर ही रहने की जिद पर टिकी है, तो इसकी शक्ति भी उमानंदवासियों को आपसी प्रेम से मिलती है। इसीलिये उमानंद की बस्ती में आने वालों नवागुन्तकों को भी कभी नहीं लगता कि वे किसी नई जगह में हैं। उमानंदवासियों को तो ब्रह्मपुत्र की यह गोद अपनी सी लगती ही है।

मोटरबोटों ने उमानंद द्वीप पर आना-जाना बेहद आसान बना दिया है। द्वीप से लाने-ले जाने के लिये यहाँ मोटरबोट हैं। मोटरबोट से निकलने वाली भुटभुट की आवाज के कारण स्थानीय लोग इन्हें ‘भुटभुटी’ कहते हैं। भुटभुटी मात्र दस मिनट में आपको एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुँचा देती है।

आस्थामय प्रकृति


तीर्थयात्रियों के लिये उमानंद द्वीप का सबसे प्रमुख आकर्षण उमानंद मन्दिर है। उमानंद मन्दिर, अहोम राजा गदाधर सिंह साम्राज्य में फूकन गढ़गन्य हंदीक्यू द्वारा 1694 में बनाया विशेष वास्तुशिल्प व विशेष नक्काशीयुक्त शिव मन्दिर है। दिलचस्प है कि ब्रह्मपुत्र में आई ऊँची-से-ऊँची बाढ़ भी उमानंद मन्दिर के भीतर अब तक कभी प्रवेश नहीं पा सकी।

लोग बताते हैं कि वर्ष 1897 के भूकम्प ने अवश्य इस मन्दिर को क्षति पहुँचाई थी, जिसे बाद में एक स्थानीय वैष्णव व्यापारी ने दुरुस्त कराया। इस द्वीप पर पाँच और मन्दिर हैं - गणेश मन्दिर, हरागौरी मन्दिर, चलन्तिका मन्दिर, चन्द्रशेखर मन्दिर और वैद्यनाथ मन्दिर। उमानंद द्वीपवासियों के लिये महाशिवरात्रि सबसे पवित्र दिन होता है। स्थानीय राय में उमानंद द्वीप के ब्राह्मणों की जड़ें, उत्तर प्रदेश के कन्नौज इलाके में हैं। इसका मतलब है कि उमानंद द्वीप के ब्राह्मण, मूलतः कान्यकुब्ज हैं।

विशेष आकर्षण - सुनहरी लंगूर


उमानंद द्वीप पर मौजूद सुनहरी लंगूर सिर्फ पश्चिम असम के कुछ हिस्से तथा भूटान की काली पहाड़ियों के तलहटी क्षेत्रों में ही पाये जाते हैं। लोग कहते हैं कि कोई दो नौजवान यहाँ इन लंगूरों का एक जोड़ा छोड़ गए थे। तभी से सुनहरी लंगूर उमानंद द्वीप पर वास कर रहे हैं। उमानंद द्वीप पर सुनहरी लंगूरों की संख्या एक समय बढ़कर 13 हो गई थी; अब महज पाँच ही हैं। इसकी वजह व समाधान तलाशना वन्यजीव विशेषज्ञों की रुचि का विषय होना स्वाभाविक है, तो मेरे जैसे पानी लेखक को जानना चाहिए कि एक नद के बीच आबादी के रहने, न रहने के पानी प्रभाव क्या है।

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