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बिन पानी का दृष्टि पत्र, संकल्प पत्र और घोषणा पत्र

विधानसभा चुनाव 2017 पर विशेष


पानीपानी2017 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखण्ड में कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा सहित लगभग दो दर्जन से अधिक राजनीतिक पार्टियों ने अपने-अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। कुल 70 विधानसभाओं के लिये 634 उम्मीदवार मैदान में हैं। कांग्रेस ने संकल्प पत्र और भाजपा ने दृष्टि पत्र तथा बाकि अन्य पार्टियों ने घोषणा पत्र जारी किया है।

पूर्व के चुनाव की भाँति इस बार भी लोक-लुभावन वायदे के साथ ये पार्टियाँ अपने-अपने घोषणा पत्र में विकास की इबारत लिखने की बात करने से बाज नहीं आये। ताज्जुब हो कि एक भी ऐसा वायदा नहीं है जिसके सुहावने सपने इनके घोषणा पत्र में अंकित ना हो। बस! एक बात को इन पार्टियों ने बेपरवाह कर दी कि जिन मुद्दों व वायदों के साथ आजकल ये पार्टियाँ लाउडस्पीकर लेकर घूम रहे हैं वे वायदे कैसे जीवित रहेंगे इसकी फिक्र शायद इन्हें नहीं है।

उल्लेखनीय हो कि इस बात से कोई भी सहमत हो सकता है कि बिना पानी के कोई जीवित रह सकता है? बिना साफ-सुथरी हवा के कोई जीवित रह सकता है? उत्तर आएगा कि नहीं! दरअसल उत्तराखण्ड के असली मुद्दे यही हैं। इन बातों का किसी भी राजनीतिक पार्टी ने अपने घोषण पत्र, संकल्प पत्र व दृष्टि पत्र में जिक्र तक नहीं किया।

आज लोग जानना चाह रहे हैं कि स्कूल की बिल्डिंग बनेगी तो क्या बिन पानी के? या कोई भी ढाँचागत विकास होगा तो क्या बिन पानी के? या राज्य में जल विद्युत परियोजनाएँ बनेंगी तो क्या बिन पानी के? यह सवाल इसलिये खड़े हो रहे हैं कि उत्तराखण्ड सरकार ने ही पिछले वर्ष एक सर्वेक्षण करवाया था कि उत्तराखण्ड में कितने जलस्रोत हैं। सर्वेक्षण से मालूम हुआ कि राज्य के 75 प्रतिशत जलस्रोत सूखने की कगार पर हैं। 50 फीसदी जलस्रोत मौसमी हो चले है वगैरह।

इसी तरह इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट बताती है कि राज्य के अधिकांश जलस्रोत वनाग्नी की वजह से सूख रहे हैं या वे अपना रास्ता बदल रहे हैं। यही नहीं रिपोर्ट यह भी इशारा कर रही है कि राज्य में जैवविविधता घटने से इन प्राकृतिक जलस्रोतों पर बुरा प्रभाव पड़ा है। एक तरफ ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं और दूसरी तरफ राज्य में आपदा की सम्भावनाएँ बढ़ रही हैं। ज्ञात हो कि ऐसे तमाम जनाधारित मुद्दों पर ये राजनीतिक पार्टियाँ अपने घोषणा पत्रों में जगह नहीं बना पाये।

ताज्जुब तो तब होती है जब ये राजनीतिक पार्टियाँ हर वर्ष आपदा के बजट के साथ अखबार बयानबाजी करते नजर आते हैं। हाल में उन्हें चाहिए था कि वे अपने घोषणा पत्र में आपदा के न्यूनीकरण की बात करते, जल संरक्षण की बात करते, जंगल और जमीन को सरसब्ज करने की बात करते। बजाय इनके घोषणा पत्र उल्टे राज्य के प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण नहीं विदोहन की बात जरूर करता है।

घोषण पत्रों के अध्ययन करने से पता चलाता है कि ये पार्टियाँ जो भी विकास का रोडमैप लोगों के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं उनके अनुसार सम्भावित उम्मीदवार को वोट ही नहीं मिल रहे हैं। 634 में से एक भी उम्मीदवार ने अपने घोषणा पत्र के अनुरूप लोगों से मतदान की अपील नहीं की है। वे लोगों से मतदान की अपील के लिये लोगों से क्षेत्र, जाति की बात करके मतदान करने को कहते हैं। हाँ! यदि सार्वजनिक स्थानों पर उन्हें वक्तव्य देना होता है तो वे अपने प्रतिद्वंदी को खरी-खोटी सुनाते हुए दिखाई देते हैं। लोग उम्मीदवारों से जानना चाह रहे हैं कि उनके गाँव में आपदा का खतरा बना हुआ है। उनके गाँव के प्राकृतिक जलस्रोत सूख गए हैं। उनके संवर्धन के लिये वे जीतकर क्या करने वाले हैं। ऐसे अनसुलझे सवाल आज भी खड़े हैं।

कुल मिलाकर उत्तराखण्ड राज्य की जो कल्पना थी सो अब मौजूदा राजनीतिक पार्टियों ने एक दूसरे को हराने के लिये समाप्त करा दी है। मौजूदा राजनीतिक पार्टियों के पास जल, जंगल, जमीन के संरक्षण व दोहन की कोई स्पष्ट नीति इस दौरान के चुनाव में नहीं दिखाई दी है।

सभी ने शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, परिवहन, विद्युत, दूरसंचार, महिला उद्यमिता, कौशल विकास, बाँध आदि-आदि विषयों को विकास का मॉडल बताया और इन विषयों पर खरा उतरने का वे लोगों से वायदे कर रहे हैं। लोगों की प्यास कैसे बुझेगी, बाँध के लिये पानी कहाँ से आएगा? क्योंकि नदियाँ साल-दर-साल सूख रही हैं, ग्लेशियर लगातार तेजी से पिघल रहे हैं जैसे संवेदनशील सवालों पर किसी भी राजनीतिक पार्टियों ने कोई रोडमैप प्रस्तुत नहीं किया है।

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