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धरती पर जैविक विनाश की चेतावनी


भारत में दुनिया के भू-भाग का 2.4 प्रतिशत भाग है। इसके बावजूद यह सभी ज्ञात प्रजातियों की सात से आठ प्रतिशत प्रजातियाँ उपलब्ध हैं। इसमें पेड़-पौधों की 45 हजार और जीवों की 91 हजार प्रजातियाँ हैं इस नाते भारत जैवविविधता की दृष्टि से सम्पन्न देश है। हालांकि कुछ दशकों से खेती में रसायनों के बढ़ते प्रयोग ने हमारी कृषि सम्बन्धी जैवविविधता को बड़ी मात्रा में हानि पहुँचाई है। आज हालात इतने बदतर हो गए हैं कि प्रतिदिन 50 से अधिक कृषि प्रजातियाँ नष्ट हो रही हैं।

नेशनल एकेडमी आॅफ साइंस जनरल में छपे शोध-पत्र ने धरती पर जैविक विनाश की चिन्तनीय चेतावनी दी है। लगभग साढ़े चार अरब साल उम्र की यह धरती अब तक पाँच महाविनाश देख चुकी है। इस क्रम में लाखों जीव व वनस्पतियों की प्रजातियाँ नष्ट हुईं। पाँचवाँ जो कहर पृथ्वी पर बरपा था, उसने डायनासोर जैसे महाकाय प्राणी का भी अन्त कर दिया था।

इस शोध-पत्र में दावा किया गया है कि अब धरती छठे विनाश के दौर में प्रवेश कर चुकी है। इसका अन्त भयावह होगा। क्योंकि अब धरती पर चिड़िया से लेकर जिराफ तक हजारों जानवरों की प्रजातियों की संख्या कम होती जा रही है। वैज्ञानिकों ने जानवरों की घटती संख्या को वैश्विक महामारी करार देते हुए इसे छठे महाविनाश की हिस्सा बताया है। बीते 5 महाविनाश प्राकृतिक घटना माने जाते रहे हैं, लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक इस महाविनाश की वजह बड़ी संख्या में जानवरों के भौगोलिक क्षेत्र छिन जाने को बताया है।

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफसर पाल आर इहरिच और रोडोल्फो डिरजो नाम के जिन दो वैज्ञानिकों ने यह शोध तैयार किया है, उनकी गणना पद्धति वही है, जिसे यूनियन आॅफ कंजर्वेशन आॅफ नेचर जैसी संस्था अपनाती है। इसकी रिपोर्ट के मुताबिक 41 हजार 415 पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों की प्रजातियाँ खतरे में हैं। इहरिच और रोडोल्फो के शोध-पत्र के मुताबिक धरती के 30 प्रतिशत कशेरूकी प्राणी विलुप्तता के कगार पर हैं। इनमें स्तनपायी, पक्षी, सरीसृप और उभयचर प्राणी शामिल हैं।

इस ह्रास के क्रम में चीतों की संख्या 7000 और ओरांगउटांग 5000 ही बचे हैं। इससे पहले के हुए पाँच महाविनाश प्राकृतिक होने के कारण धीमी गति के थे, लेकिन छठा विनाश मानव निर्मित है, इसलिये इसकी गति बहुत तेज है। ऐसे में यदि तीसरा विश्व युद्ध होता है तो विनाश की गति तांडव का रूप ले सकती है। इस लिहाज से इस विनाश की चपेट में केवल जीव-जगत की प्रजातियाँ ही नहीं आएँगी, बल्कि अनेक सभ्यताएँ और संस्कृतियाँ भी नष्ट हो जाएँगी।

गोया, शोध-पत्र की चेतावनी पर गम्भीर बहस और उसे रोकने के उपाय अमल में लाया जाना जरूरी हैं। बावजूद यह शोध-पत्र इसलिये संशय से भरा लगता है, क्योंकि अमेरिका के जिन दो वैज्ञानिकों ने यह जारी किया है, उसी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी जवाबदेही से मुकरते हुए जलवायु परिवर्तन के समझौते को खारिज कर दिया है। इसलिये यह आशंका प्रबल है कि दुनिया का राजनीतिक नेतृत्व इसे गम्भीरता से लेगा?

चूँकि छठा महाविनाश मानव निर्मित बताया जा रहा है, इसलिये हम मानव का प्रकृति में हस्तक्षेप कितना है, इसकी पड़ताल किये लेते हैं। एक समय था जब मनुष्य वन्य पशुओं के भय से गुफाओं और पेड़ों पर आश्रय ढूँढता फिरता था। लेकिन ज्योें-ज्यों मानव प्रगति करता गया प्राणियों का स्वामी बनने की उसकी चाह बढ़ती गई। इस चाहत के चलते पशु असुरक्षित हो गए।

वन्य जीव विशेषज्ञों ने जो ताजा आँकड़े प्राप्त किये हैं उनसे संकेत मिलते हैं कि इंसान ने अपने निजी हितों की रक्षा के लिये पिछली तीन शताब्दियों में दुनिया से लगभग 200 जीव-जन्तुओं का अस्तित्व ही मिटा दिया। भारत में वर्तमान में करीब 140 जीव-जन्तु विलोपशील अथवा संकटग्रस्त अवस्था में हैं। ये संकेत वन्य प्राणियों की सुरक्षा की गारंटी देने वाले राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य और चिड़ियाघरों की सम्पूर्ण व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं? पंचांग (कैलेण्डर) के शुरू होने से 18वीं सदी तक प्रत्येक 55 वर्षों में एक वन्य पशु की प्रजाति लुप्त होती रही।

18वीं से 20वीं सदी के बीच प्रत्येक 18 माह में एक वन्य प्राणी की प्रजाति नष्ट हो रही है। एक बार जिस प्राणी की नस्ल पृथ्वी पर समाप्त हो गई तो पुनः उस नस्ल को धरती पर पैदा करना मनुष्य के बस की बात नहीं है। हालांकि वैज्ञानिक क्लोन पद्धति से डायनासोर को धरती पर फिर से अवतरित करने की कोशिशों में जुटे हैं, लेकिन अभी इस प्रयोग में कामयाबी नहीं मिली है।

क्लोन पद्धति से भेड़ का निर्माण कर लेने के बाद से वैज्ञानिक इस अहंकार में है कि वह लुप्त हो चुकी प्रजातियों को फिर से अस्तित्व में ले आएँगे। लेकिन इतिहास गवाह है कि मनुष्य कभी प्रकृति से जीत नहीं पाया है। इसलिये मनुष्य यदि अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों के अहंकार से बाहर नहीं निकला तो विनाश या प्रलय आसन्न ही समझिए? चुनांचे, प्रत्येक प्राणी का पारिस्थितिक तंत्र, खाद्य शृंखला एवं जैवविविधता की दृष्टि से विशेष महत्त्व होता है। जिसे कम करके नहीं आँका जाना चाहिए।

भारत में फिरंगियों द्वारा किये गए निर्दोष प्राणियों के शिकार की फेहरिस्त भले ही लम्बी हो उनके संरक्षण की पैरवी अंग्रेजों ने ही की थी। 1907 में पहली बार सर माइकल कीन ने जंगलों को प्राणी अभयारण्य बनाये जाने पर विचार किया, किन्तु सरजाॅन हिबेट ने इसे खारिज कर दिया। ईआरस्टेवान्स ने 1916 में कालागढ़ के जंगल को प्राणी अभयारण्य बनाने का विचार रखा। किन्तु कमिश्नर विन्डम के जबरदस्त विरोध के कारण मामला फिर ठंडे बस्ते में बन्द हो गया।

1934 में गवर्नर सर माल्कम हैली ने कालागढ़ के जंगल को कानूनी संरक्षण देते हुए राष्ट्रीय प्राणी उद्यान बनाने की बात कही। हैली ने मेजर जिम कार्बेट से परामर्श करते हुए इसकी सीमाएँ निर्धारित कीं। सन 1935 में यूनाइटेड प्राविंस (वर्तमान उत्तर-प्रदेश एवं उत्तराखण्ड) नेशनल पार्क्स एक्ट पारित हो गया और यह अभयारण्य भारत का पहला राष्ट्रीय वन्य प्राणी उद्यान बना दिया गया। यह हैली के प्रयत्नों से बना था, इसलिये इसका नाम ‘हैली नेशनल पार्क’ रखा गया। बाद में उत्तर-प्रदेश सरकार ने जिम कार्बेट की याद में इसका नाम ‘कार्बेट नेशनल पार्क’ रख दिया। इस तरह से भारत में राष्ट्रीय उद्यानों की बुनियाद फिरंगियों ने रखी।

भारत में दुनिया के भू-भाग का 2.4 प्रतिशत भाग है। इसके बावजूद यह सभी ज्ञात प्रजातियों की सात से आठ प्रतिशत प्रजातियाँ उपलब्ध हैं। इसमें पेड़-पौधों की 45 हजार और जीवों की 91 हजार प्रजातियाँ हैं इस नाते भारत जैवविविधता की दृष्टि से सम्पन्न देश है। हालांकि कुछ दशकों से खेती में रसायनों के बढ़ते प्रयोग ने हमारी कृषि सम्बन्धी जैवविविधता को बड़ी मात्रा में हानि पहुँचाई है।

आज हालात इतने बदतर हो गए हैं कि प्रतिदिन 50 से अधिक कृषि प्रजातियाँ नष्ट हो रही हैं। हरित क्रान्ति ने हमारी अनाज से सम्बन्धित जरूरतों की पूर्ति जरूर की, लेकिन रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं के प्रयोग ने एक ओर तो भूमि की सेहत खराब की, वहीं दूसरी ओर कई अनाज की प्रजातियाँ भी नष्ट कर दीं। अब फसल की उत्पादकता बढ़ाने के बहाने जीएम बीजों का भी खतरा कृषि सम्बन्धी जैवविविधता पर मँडरा रहा है।

वर्तमान में जिस रफ्तार से वनों की कटाई चल रही है उससे तय है कि 2125 तक जलाऊ लकड़ी की भीषण समस्या पैदा होगी, क्योंकि वर्तमान में प्रतिवर्ष करीब 33 करोड़ टन लकड़ी के ईंधन की जरूरत पड़ती है। देश की सम्पूर्ण ग्रामीण आबादी ईंधन पर निर्भर है। ग्रामीण स्तर पर फिलहाल कोई ठीक विकल्प भी दिखाई नहीं दे रहा है।

सरकार को वन-प्रांतरों निकट जितने भी गाँव हैं उनमें ईंधन की समस्या दूर करने के लिये बड़ी संख्या में गोबर गैस संयंत्र लगाने, उज्वला योजना के तहत गैस सिलेंडर देने और प्रत्येक घर में एक विद्युत कनेक्शन निशुल्क देना चाहिए। ग्रामीणों के पालतू पशु इन्हीं वनों में घास चरते हैं इस कारण प्राणियों के प्रजनन पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

यह घास बहुत सस्ती दरों पर ग्रामीणों को उपलब्ध कराई जानी चाहिए। घास की कटाई इन्हीं ग्रामों के मजदूरों से कराई जाये तो गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले जो ग्रामीण हैं उनके परिवारों की उदरपूर्ति के लिये धन भी सुलभ हो सकेगा और वे सम्भवतः जगल से चोरी-छिपे लकड़ी भी नहीं काटेंगे। इन उपायों से बड़ी मात्रा में जैवविविधता का संरक्षण होगा।

मध्य-प्रदेश एवं छत्तीसगढ़, देश के ऐसे राज्य हैं, जहाँ सबसे अधिक वन और प्राणी संरक्षण स्थल हैं। प्रदेश के वनों का 11 फीसदी से अधिक क्षेत्र उद्यानों और अभयारण्यों के लिये सुरक्षित है। ये वन विंध्य-कैमूर पर्वत के रूप में दमोह से सागर तक, मुरैना में चंबल और कुँवारी नदियों के बीहड़ों से लेकर कूनो नदी के जंगल तक, शिवपुरी का पठारी क्षेत्र, नर्मदा के दक्षिण में पूर्वी सीमा से लेकर पश्चिमी सीमा बस्तर तक फैले हुए हैं। एक ओर तो ये राज्य देश में सबसे ज्यादा वन और प्राणियों को संरक्षण देने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी ओर वन संरक्षण अधिनियम 1980 का सबसे ज्यादा उल्लंघन भी इन्हीं राज्यों में हो रहा है। साफ है कि जैवविविधता पर संकट गहराया हुआ है।

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