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पड़ोसी गाँव से लाये फसलों के लिये पानी


किसानों के लिये यह भी हैरत की बात थी कि जहाँ उनके गाँव में इतने गहरे जाने पर भी पानी नहीं मिल पा रहा था, वहीं यहाँ से करीब दो किमी दूर पड़ोस के गाँव भौंडवास की जमीन में खूब पानी है। यहाँ 200 फीट पर ही पानी है। अब भौंडवास में पानी तो है पर वहाँ का पानी यहाँ के खेतों के किस काम का। इस पर भी किसानों ने रास्ता निकाला और भौंडवास में उन्होंने पहले कुछ प्लाटनुमा जमीन खरीदी, फिर इस जमीन में बोरवेल कराया। इसमें पानी निकलने पर यहाँ से दो किमी लम्बी पाइपलाइन डालकर अब पानी फरसपुर के खेतों में दिया जा रहा है। भूजल भण्डार खत्म होते जाने से हालात दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे हैं। अब मरती हुई फसलों को बचाने के लिये किसान तरह-तरह के जतन कर रहा है। अब हालात इतने बुरे हो चले हैं कि ठंड के दिनों में ही जमीनी पानी सूखने लगा है। मध्य प्रदेश के इन्दौर और देवास जिलों में किसान अपनी खड़ी फसलों को सूखने से बचाने के लिये पानी के इन्तजाम में जुटे हैं। दूर-दूर से पाइपलाइन के जरिए पानी लाकर फसलों को दिया जा रहा है। हद तो तब हो गई, जब एक गाँव में पानी नहीं होने से कुछ किसानों ने लाखों रुपए खर्च कर दो किमी दूर पड़ोसी गाँव में जमीन खरीदकर ट्यूबवेल करवाए और अब वहाँ से पाइपलाइन बिछाकर पानी अपने गाँव की फसलों तक पहुँचा रहे हैं।

मध्य प्रदेश के मालवा इलाके में, जहाँ कभी पर्याप्त अनाज और खूब पानी होने से यहाँ की जमीन के बारे में कहावत मशहूर थी- 'मालव भूमि गहन गम्भीर, डग–डग रोटी पग–पग नीर...' राजस्थान के मारवाड़ इलाके में जब कभी सूखा या अकाल जैसे हालात बनते तो वहाँ के किसान अपने मवेशियों को लेकर मालवा का रुख किया करते थे और बारिश के बाद ही अपने गाँव लौटते थे। यहाँ उन्हें मवेशियों के लिये चारा और पानी तथा अपने लिये आसानी से अनाज मिल जाया करता था। नर्मदा, बेतवा, चंबल और कालीसिंध जैसी बड़ी नदियों से घिरे इस भू भाग में जहाँ कभी किसी ने न पानी की चिन्ता देखी और न ही अनाज की। लेकिन ये सब बातें अब पुराने दिनों के किस्से की तरह लगती हैं। इन दिनों यहाँ हालत बेहद बुरे हैं। बारिश को थमे अभी तीन-चार महीने ही हुए हैं और यहाँ अभी से पानी की किल्लत की आहट सुनाई देने लगी है।

ताल-तलैया सूख रहे हैं। ट्यूबवेल गहरे और गहरे होने के बाद भी साँसें गिन रहे हैं। 600 फीट तक गहरे ट्यूबवेल भी अब पानी नहीं दे पा रहे हैं। फसल के तैयार होने में अभी दो महीने का वक्त है। अब किसानों की चिन्ता है कि अपनी आँखों के सामने पानी की कमी से बदहाल होती फसल के लिये पानी का इन्तजाम कहाँ से करें।

इन्दौर महानगर से करीब 35 किमी दूर सांवेर विकासखण्ड का एक गाँव है– फरसपुर।

इस गाँव में भूजल स्तर बहुत नीचे चला गया है। किसान परेशान हैं। ग्रामीण बताते हैं कि बीते साल यहाँ के कुछ किसानों ने अपने खेतों पर 600 फीट गहरा बोर कराया था। लेकिन अब इसमें भी पानी नहीं आ पा रहा है। यहाँ के ट्यूबवेल में एक से डेढ़ इंच ही पानी था। ज्यादातर ट्यूबवेल बारिश के बाद ही दम तोड़ने लगते हैं।

ऐसी स्थिति में गाँव के किसानों के सामने बड़ा संकट है अपनी फसलों को बचाने का। अब किसानों ने गेहूँ-चना की फसल तो बो दी। एक-दो बार पानी से जमीन की सिंचाई भी कर ली पर अब अधबीच से पानी चला गया। किसानों ने सब तरह के उपाय करके देख लिया पर कहीं से कोई फायदा नहीं हुआ।

किसानों के लिये यह भी हैरत की बात थी कि जहाँ उनके गाँव में इतने गहरे जाने पर भी पानी नहीं मिल पा रहा था, वहीं यहाँ से करीब दो किमी दूर पड़ोस के गाँव भौंडवास की जमीन में खूब पानी है। यहाँ 200 फीट पर ही पानी है। अब भौंडवास में पानी तो है पर वहाँ का पानी यहाँ के खेतों के किस काम का। इस पर भी किसानों ने रास्ता निकाला और भौंडवास में उन्होंने पहले कुछ प्लाटनुमा जमीन खरीदी, फिर इस जमीन में बोरवेल कराया। इसमें पानी निकलने पर यहाँ से दो किमी लम्बी पाइपलाइन डालकर अब पानी फरसपुर के खेतों में दिया जा रहा है।

हालांकि यह बहुत खर्चीली प्रक्रिया साबित हुई है। प्लाट खरीदने, बोरवेल करवाने और पाइपलाइन डलवाने में किसानों को खासा रुपया खर्च हुआ है। एक मोटे अनुमान से आँके तो एक–एक किसान को आठ से दस लाख रुपए तक खर्च हुए हैं। चार लाख की चार हजार वर्ग फीट जमीन, चार लाख रुपए पाइपलाइन तथा एक से दो लाख ट्यूबवेल और मोटर आदि पर खर्च करना पड़ रहा है। पाइपलाइन डालने के लिये खासी सावधानी रखी गई कि इसमें किसी का कोई नुकसान नहीं हो। ज्यादातर हिस्से में जमीन खोदकर उसके नीचे से पाइप निकाले गए हैं। अब पानी का पम्प दूसरे गाँव से चलाना पड़ता है और खेत में पानी देखने फरसपुर आना पड़ता है।

इलाके में अपनी तरह का यह पहला मामला है, जब एक गाँव के किसानों ने अपनी फसलों को पानी देने के लिये दूसरे गाँव से पानी लाकर पौधों की प्यास बुझाई है। इससे फसल को जीवनदान मिला है और खेतों को फिलहाल पानी भी मिल गया है। लेकिन इस वैकल्पिक व्यवस्था ने यहाँ के किसानों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि इस साल तो जैसे-तैसे हो गया लेकिन अब आगे क्या। इस बार दर्जन भर बड़े किसानों ने लाखों रुपए खर्च कर अपनी फसल को तो बचा लिया है लेकिन अब गाँव के लोग किसी स्थायी विकल्प की खोज में जुटे हैं।

ग्रामीण अब अपनी गलती पहचान चुके हैं। बुजुर्ग नारायणसिंह कहते हैं- "बचपन से अब तक के 65 सालों में कभी पानी की इतनी किल्लत नहीं देखी। हमारे जमाने में कुओं से चड़स चला कर सिंचाई होती थी। किसी को कोई दिक्कत नहीं थी। कुओं में पानी आता रहता और सिंचाई भी होती रहती। कम जमीन में सिंचाई होती थी पर सबका काम चल जाया करता था। बीते कुछ सालों से ये नया स्वांग शुरू हुआ है- ट्यूबवेल का, इसने धरती का सीना छलनी कर दिया है। हर कोई कहीं भी बोर लगवा देता है। इससे गाँवों का जलस्तर तेजी से गिरता जा रहा है। अब तो पानी पाताल में उतरने लगा है।"

युवा किसान राजेश चौधरी भी कहते हैं- "अब हम जिला प्रशासन से बात करके गाँव में जल संरक्षण और बारिश के पानी को थामने की तकनीकों को अमल में लाएँगे। पानी के लिये लाखों रुपए खर्च करना बुद्धिमानी नहीं है। हमारे इलाके से जमीनी पानी लगातार गहरा होता जा रहा है तो इसकी बड़ी वजह यही है कि हम अपनी जमीन में बरसाती पानी को रिसा नहीं पा रहे हैं। अब गाँव के युवा इस काम को आगे बढ़ाएँगे।"

फरसपुर का भयावह सच हमारे सामने है, यदि अब भी हमने पानी को लेकर गम्भीरता से स्थायी तकनीकों पर ध्यान नहीं दिया तो जल संरक्षण विहीन समाज की तस्वीर भी इस फरसपुर गाँव की तरह ही नजर आएगी।

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