SIMILAR TOPIC WISE

Latest

थार मरुभूमि (Thar Desert)

Author: 
एस.एम. मोहनोत और एएस. कोलारकर
Source: 
‘बूँदों की संस्कृति से साभार’, सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वायरनमेंट, नई दिल्ली, 1998

थार क्षेत्र की खेती और जमीन का अन्य उपयोग बरसात पर ही टिका है। बरसात अच्छी हुई तो अधिक जमीन पर फसल लगती है। चारे की भरमार हो जाती है। भविष्य के लिये भी चारा भूसा सम्भालकर रख लिया जाता है। बरसात का पानी जमीन के अन्दर बनी कुंडियों में सहेज लिया जाता है। चूँकि बरसात की मर्जी का बहुत भरोसा नहीं होता, इसलिये यहाँ मिश्रित खेती विकसित हुई है। यहाँ लोग और पशु एक-दूसरे के काम आते हैं। थार मरुभूमि 4.46 करोड़ हेक्टेयर में पसरी है, जिसका 2.78 करोड़ हेक्टेयर इलाका भारत में है और बाकी पाकिस्तान में। यह मरुभूमि पूरब में अरावली पर्वतमाला, पश्चिम में सिंधु के उर्वर इलाके, पाकिस्तान की नारा घाटी और कच्छ के रण के क्षारीय इलाके, तथा उत्तर में हरियाणा और पंजाब के जलोढ़ मैदानी भाग से घिरी है।

भारत में थार मरुभूमि का अधिकांश हिस्सा राजस्थान के पश्चिमी भाग में है। गुजरात के पूरे कच्छ और कई अन्य जिलों का कुछ-कुछ हिस्सा रेगिस्तानी है। पंजाब के भठिंडा और फिरोजपुर तथा हरियाणा के हिसार और महेंद्रगढ़ जिलों का कुछ-कुछ हिस्सा भी रेगिस्तानी है। थार के करीब 60 फीसदी हिस्से पर कम या ज्यादा खेती की जाती है, करीब 30 फीसदी हिस्से पर वनस्पतियाँ हैं, पर यह मुख्यतः चारागाह के रूप में ही काम आता है। इसके पूर्वी हिस्सों में सालाना औसत 500 मिमी. पानी बरसता है तो पश्चिम में 100 मिमी पर यह पानी भी बहुत व्यवस्थित ढंग का नहीं होता। किसी साल बहुत-ज्यादा पानी पड़ गया तो किसी साल एकदम नहीं। सो, खेती बहुत ही मुश्किल है और हर दस में से चार साल सूखा रहता है। मरु क्षेत्र के अधिकांश हिस्से में चार-पाँच महीने तेज हवाएँ चलती हैं। गर्मियों में रेतीले तूफान बहुत आम हैं।

पर इस इलाके में मौजूद हरियाली, भले ही वह कितनी भी कम क्यों न हो, विविधता भरी है। यहाँ करीब 700 किस्म के पेड़-पौधे पाये जाते हैं जिनमें से 107 किस्म की तो घास ही है। इनकी जड़ें बहुत अन्दर तक जाती हैं और ये प्रतिकूल जलवायु में भी जीवित रहने और अनुकूल मौसम होते ही ज्यादा-से-ज्यादा प्राण तत्व-पानी और अन्य पोषक तत्व-ले लेने में सक्षम हैं। स्थानीय घास की एक विशेषता असंख्य बीज पैदा करते जाना भी है। यहाँ की ज्यादातार पैदावार पौष्टिकता और लवणों से भरी है। इसके साथ ही थार क्षेत्र को सबसे उन्नत किस्म के कुछ पशुओं का ‘वरदान’ भी मिला हुआ है। देश के ऊन का 50 फीसदी हिस्सा यहीं होता है और उत्तर भारत में श्रेष्ठ किस्म के बैल यहीं से जाते हैं।

पर थार क्षेत्र की खेती और जमीन का अन्य उपयोग बरसात पर ही टिका है। बरसात अच्छी हुई तो अधिक जमीन पर फसल लगती है। चारे की भरमार हो जाती है। भविष्य के लिये भी चारा भूसा सम्भालकर रख लिया जाता है। बरसात का पानी जमीन के अन्दर बनी कुंडियों में सहेज लिया जाता है। चूँकि बरसात की मर्जी का बहुत भरोसा नहीं होता, इसलिये यहाँ मिश्रित खेती विकसित हुई है। यहाँ लोग और पशु एक-दूसरे के काम आते हैं।

1. राजस्थान


भारत के पश्चिम-उत्तरी क्षेत्र में स्थित राजस्थान रजवाड़ों का प्रदेश है। अरावली पर्वत शृंखला इसे भौगोलिक और जलवायु की दृष्टि से दो भागों में बाँटती है। इसका उत्तर-पश्चिमी भाग थार मरुभूमि का रेतीला मैदान है और पूर्वी हिस्सा मालवा पठार का भाग है। पूर्वोत्तर के भरतपुर और बूँदी जलोढ़ मिट्टी से बने हैं तथा चम्बल और बाणगंगा नदियों के इलाके हैं।

उत्तर-पश्चिमी राजस्थानी इलाका सुदूर पश्चिम में एकदम शुष्क है तो उत्तर-पश्चिम की तरफ बढ़ते जाने पर अपेक्षाकृत अधिक आबाद और उर्वर इलाके मिलते जाते हैं। कुछ पट्टियों की ज्यादा उर्वर और उपजाऊ जमीन को छोड़ दें तो रेगिस्तान के इलाके में खेती बहुत मुश्किल और बहुत कम है। फिर भी इस इलाके के जोधपुर और जैसलमेर जैसे शहर बहुत ही व्यवस्थित और सुन्दर ढंग से बसाए गए हैं। अरावली पर्वत माला से निकलने वाली लूणी नदी अजमेर से शुरू होकर कच्छ के रण तक जाती है, और इस शुष्क इलाके के काफी बड़े हिस्से की जीवन रेखा-सी है। इसके दोनों किनारों पर काफी गाँव बसे हैं।

राजस्थान का शुष्क इलाका करीब-करीब अनावृष्टि वाला मरु प्रदेश है। कुछ इलाकों में बरसात शायद ही करीब औसत 120 मिमी से ऊपर जाती है। समुद्र तल से पानी लेकर चले बादल गुजरात के काठियावाड़ और ज्यादा-से-ज्यादा अरावली पर्वतमाला की ढलान तक आते-आते अपना पूरा पानी रीता कर चुके होते हैं। इस पूरे इलाके में असाधारण ऊँचाई (करीब 1220 मीटर) पर स्थित माउंट आबू में सालाना औसत 1525-1780 मिमी बरसात होती है। मरु प्रदेश के पश्चिमी इलाके में पानी की इतनी कमी है कि सिंचाई की बहुत विस्तृत व्यवस्था हो ही नहीं सकती और पारम्परिक रूप से यहाँ के लोग कुंडियों और बरसाती जल संचय की अन्य विधियों पर आश्रित रहे हैं।1

पश्चिमी राजस्थान, जो मुख्यतः मरुभूमि है, पुराने बीकानेर, जोधपुर और जैसलमेर रियासतों को मिलाकर बना है। जैसलमेर शहर को चारों ओर से चट्टानी पर्वतमाला ने घेर रखा है। शुरुआती ब्रिटिश गजेटियरों से पता चलता है कि इस इलाके में बहुत कम गाँव बसे थे और जो गाँव थे वे एक कुएँ के इर्द-गिर्द बसे कुछ झोपड़ियाँ भर थे। कुओं की गहराई अक्सर 76-122 मीटर होती थी, जबकि एक कुआँ 150 मीटर गहरा भी मिला है। जोधपुर में कुएँ ही पानी का मुख्य स्रोत थे-पीने के लिये भी और खेत सींचने के लिये भी। कुओं से सींची गई जमीन को चाही कहा जाता था।2 जोधपुर जिले के पूर्वी हिस्से में कुओं की भरमार थी और वह इलाका ज्यादा उर्वर भी था। यहाँ रबी और खरीफ, दोनों फसलें होती थीं। कुओं से पानी निकालने के लिये कई विधियों का चलन था।

जोधपुर के लिये लूणी एक महत्त्वपूर्ण नदी है। इसके पाट में स्थित रेत पर तरबूज लगाए जाते हैं। पहले जब कभी-कभार बाढ़ आती थी और नदी का पानी बाहर निकलता था तो उसके साथ आई मिट्टी-रेत पर गेहूँ और जौ की खेती की जाती थी। इस सदी के शुरू में अंग्रेज अधिकारियों ने जोधपुर जिले में मौजूद 35 तालाबों की गिनती की थी, जिनमें से 24 खालसा गाँवों में स्थित थे। लूणी और कुहिया नदियों पर बाँध डालकर दो कृत्रिम झीलों-जसवंतसागर और सरदार समंद को भर लिया जाता था। पहले ताल से 8,100 हेक्टेयर जमीन की सिंचाई हो सकती थी, जबकि सरदार समंद 7,290 हेक्टेयर जमीन सींचने में सक्षम था। अधिकांश छोटे ताल-तलैयों की तलहटी में ही गेहूँ की खेती की जाती थी। सरोवरों से निकली नालियों से सींची जमीन नाहरी कहलाती थी। किसान मिलजुल कर अपने खेतों के चारों ओर मिट्टी की बाड़ खड़ी करते थे जिससे पशु अन्दर आकर फसल को बर्बाद न करें। इन मिट्टी के बाड़ों से बरसाती पानी भी रुकता था। तीन महीने तक पानी ठहर जाने से जमीन तर हो जाती थी और वहाँ लगी फसल बाद में बहुत सींचे बगैर भी अच्छी पैदावार देती थी।3

1897 के पूर्व बीकानेर में व्यवस्थित सिंचाई वाली कोई बड़ी प्रणाली नहीं थी। तब इस राज के शासकों ने घग्गर सिंचाई नहर और बड़े-बड़े तालाबों का निर्माण कराया। गाँव के लोग पहले से ही कुंडियों और सरों में बरसात का पानी जमा करते हैं जिनका निर्माण खास तरह की मिट्टी में होता था। कुंड-कुंडियाँ ढकी रहती थीं।3,4

मरु प्रदेश के अधिकांश गाँवों में छोटे-छोटे तालाब थे और बरसात ठीक हो तो इनमें पूरे गाँव के पीने लायक सात-आठ महीनों का पानी जमा हो जाता था। अगर कम बरसात हो तो पानी आधे साल से पहले ही खत्म होने लगता था और दूरदराज के गाँवों से लाना पड़ता था। कई बार 20-30 किमी दूर से भी पीने का पानी लाया जाता था। गरीब लोग आमतौर पर इतनी दूर से पानी नहीं ला पाते थे और अक्सर खारे पानी में ही दही डालकर पी लेते थे। पूरब की तरफ हर गाँव में टांके खोदे जाते थे, जिनमें बरसात का पानी जमा होता था और बारिश बीतने के बाद ही इसका प्रयोग किया जाता था।5

इतनी मुश्किल जलवायु के बीच भी मध्यकाल में पश्चिमी राजस्थान की समृद्धि, सम्पदा और इतने लोगों की हर प्रकार की जरूरतों की पूर्ति यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों के बहुत ही कुशलतापूर्ण प्रयोग पर आधारित थीं। 1200-1300 वर्षों का यहाँ का इतिहास तो जगजाहिर ही है। यहाँ के शहरी लोगों ने मुश्किल स्थिति और उपलब्ध क्षीण प्राकृतिक संसाधनों के अनुसार ही अपना जीवन ढाल लिया था। और चाहे मरुभूमि के ग्रामीण हों या शहरी, सभी का जीवन पारिस्थितिकी से मेल खाने वाला था; और तभी यहाँ सभ्यता-संस्कृति फली-फूली। इतने कम पानी वाले इलाकों में दुनिया में कहीं भी न तो आबादी का घनत्व इतना रहा है, न ऐसी समृद्धि।

सांस्कृतिक मान्यताएँ


थार के समाज ने जल की हर बूँद का बहुत ही व्यवस्थित उपयोग करने वाली आस्थाएँ विकसित कीं और लोक जीवन की इन्हीं मान्यताओं ने इस मुश्किल प्रदेश में जीवन को चलाया, समृद्ध किया और प्रकृति पर भी जरूरत से ज्यादा दबाव नहीं पड़ा। पश्चिमी राजस्थान में पानी के महत्त्व से जुड़ी अनगिनत लोक कथाएँ हैं और ये इसके उपयोग की पवित्रता के प्रति आस्था बढ़ाती हैं। एक कहावत है कि अगर बहू घड़ा भर घी गिरा दे, तब भी सास कुछ नहीं बोलती जबकि पानी गिरा दे तो डाँट जरूर पड़ती है। इसी प्रकार कहावत है कि साधारण मेहमान है तो मलाईदार दूध दो, विशेष मेहमान हो तो पानी-वह भी एक गिलास पानी दो। इससे ज्यादा माँगे तो दूसरा गिलास दूध का दो। राजस्थान में अभी भी पानी गिलास में नहीं, लोटे में दिया जाता है। इसे मुँह से लगाकर पानी नहीं पीते। बचा पानी फिर किसी और के काम आता है।

पानी की हर बूँद उपयोग में आ जाये, इसके लिये दूसरे लोक व्यवहार भी हैं। जैसलमेर के कुछ घरों में आज भी लोग लकड़ी की छोटी चौकी पर बैठकर नहाते हैं जिसके नीचे एक बरतन रहता है। नहाने से गिरा पानी इसमें जमा होता है, जो जानवरों के काम आ जाता है। इसी प्रकार जैसलमेर, पोखरण और फलोदी में लोग घर के बाहर एक ऊँचे पत्थर पर नहाते हैं। यहाँ से पानी बहकर उस बड़े हौज में चला जाता है जिसका पानी जानवरों के प्रयोग में आता है। जिन गाँवों में मीठा जल कम है, वहाँ इसका प्रयोग सिर्फ पीने के लिये किया जाता है। कपड़े धोने वगैरह का काम खारे पानी से ही किया जाता है।

बरसात और पानी का आना राजस्थानी लोक जीवन में मंगल, उत्सव और खुशियों का अवसर है। बादलों को लेकर जितने लोकगीत राजस्थान में हैं उतने शायद कहीं न होंगे। यहाँ उस गंडेरी को लेकर भी गाने हैं जिसे सिर पर रखकर औरतें उसके ऊपर घड़ा लेकर चलती हैं। अधिकांश तालाबों के पास मन्दिर हैं। अनेक अवसरों पर जलते दीप पानी में तैरा दिये जाते हैं। माना जाता है कि पानी हर आदमी के जीवन को खुशियों और प्रकाश से भर देता है।

जल संचय, वितरण और उपयोग, सभी काम स्थानीय समुदाय द्वारा साझे तौर पर किये जाते थे। मानसून के पहले सारा गाँव मिलकर तालाब के आगोर या पायतान को पूरी तरह साफ कर देता था। इसी तरह तालाबों से गाद निकालने में पूरा समाज श्रमदान करता था।

मरु प्रदेश के अधिकांश गाँवों में छोटे-छोटे तालाब थे और बरसात ठीक हो तो इनमें पूरे गाँव के पीने लायक सात-आठ महीनों का पानी जमा हो जाता था। अगर कम बरसात हो तो पानी आधे साल से पहले ही खत्म होने लगता था और दूरदराज के गाँवों से लाना पड़ता था। कई बार 20-30 किमी दूर से भी पीने का पानी लाया जाता था। गरीब लोग आमतौर पर इतनी दूर से पानी नहीं ला पाते थे और अक्सर खारे पानी में ही दही डालकर पी लेते थे।अंग व्यवस्था पानी के व्यवस्थित और समान वितरण वाली थी। हर घर के सदस्यों और उसके पशुओं के हिसाब से पानी की जरूरत तय की जाती थी। एक आदमी एक इकाई होता था, पर जानवरों का हिसाब अलग था। वहाँ बड़े पशु तो एक इकाई माने जाते थे, पर 10 बकरियों को मिलाकर एक इकाई पूरी होती थी। जब हर घर की जरूरत का निर्धारण हो जाता था तब हर घर पानी के स्रोत से पानी निकालने के लिये एक दिन का श्रमदान करता था। कई कारणों से कुछ परिवारों को इसमें छूट भी दी जाती थी। जानवरों को पानी खींचने या ढोने के काम में नहीं लगाया जाता था। ऐसा होने पर वे जानवर ज्यादा पानी पी सकते थे। जानवरों के लिये घर पर पानी नहीं ले जाया जाता था। जानवर पानी के स्रोत पर आकर ही पानी पीते थे और वह भी सिर्फ रात में, क्योंकि यह आम धारणा थी कि वे रात में कम पानी पीते हैं, दिन में ज्यादा।

शहरी व्यवस्थाएँ


शहर कहाँ बसे, यह तय करने में पानी से नजदीकी एक बड़ा कारण रहा है, पर मरुभूमि के लिये यह और भी बड़ा कारण रहा है। लूणी की सहायक बांदी नदी के दाहिने तट पर बसे पाली को इसी नदी के रिसाव के समृद्ध भूजल के चलते भरपूर और अच्छा पानी मिलता रहा है।

जैसलमेर को अपना नाम अपने संस्थापक राव जैसल और पर्वत प्रदेश मेर या मेरु को जोड़ने से मिला। लेकिन पर्वत शृंखला के बीच स्थित होने के बाद भी इसे पर्वतीय नखलिस्तान का दर्जा प्राप्त है। और इसी के चलते असीमित शुष्क प्रदेश में स्थित होकर भी जैसलमेर युगों से अपराजेय बना रहा। जैसलमेर का किला राजस्थान के किलों में दूसरा सबसे पुराना है। यह आस-पास के भूतल से 75 मीटर ऊँची पहाड़ी के ऊपर बना है। जैसलमेर शहर को 1965 के पहले तक मुख्यतः घड़ीसर के विशाल सरोवर से ही पानी की आपूर्ति की जाती थी।

जैसलमेर : घड़ीसर का निर्माण जैसलमेर के राजा घड़सी रावल ने सन 1367 में कराया था। यहाँ गुलाब सागर, मलका, मूलताला और सुधारार जैसे अनेक दूसरे तालाब भी हैं। बरसात कम हो तो इनका पानी कुछ महीनों में ही चट हो जाता, सिर्फ घड़ीसर का पानी कभी नहीं चूकता। पहले रोज शाम को औरतें यहाँ पानी लेने जुटती थीं। किले के अन्दर मीठे पानी के तीन कुएँ हैं और नीचे बसे शहर में भी ऐसे छह कुएँ हैं। किंवदंती है कि सबसे बड़े जैसालू कुएँ का निर्माण खुद भगवान श्री कृष्ण ने किया था। जब प्यासे अर्जुन ने उनसे पानी माँगा तो अपने सुदर्शन चक्र से उन्होंने यह कुआँ खोद डाला। इसका नाम शहर को बसाने वाले महाराज जैसल के नाम पर जैसालू रखा गया। आज किले के अन्दर के तीनों कुएँ बन्द कर दिये गए हैं, क्योंकि किले तक भी टोंटी वाले पानी की आपूर्ति शुरू हो गई है।

घड़ीसर का आगोर विशाल था और सिर्फ एक तरफ ही इसका विस्तार 20 किमी का था। इसका रख-रखाव राजा की देखरेख में होता था और हर बरसात के पहले इसके पूरे आगोर को साफ किया जाता था। जिन नहरों से तालाब में पानी आता था उनको भी साफ किया जाता था। इस आगोर क्षेत्र में जानवरों को ले जाने की मनाही थी। तालाब में नहाना अक्षम्य अपराध माना जाता था। अगर कोई तालाब को गन्दा करता हुआ या इसके आगोर में पशु ले जाता हुआ पकड़ा जाता था तब खुद राजा उसे दंड देते थे, जो छह महीनों की कैद तक जा सकता था। आगोर से पानी सीधे घड़ीसर में नहीं आता था। एक कम ऊँचाई का बाँध बना था जो रेत कणों और मिट्टी के मोटे कणों को रोक लेता था जिससे सिर्फ साफ पानी ही तालाब में जाता था।

हाल के वर्षों में नहर की पूरी जलापूर्ति व्यवस्था एकदम बदल ही गई है। आज घड़ीसर एकदम उपेक्षित हो गया है। लोगों को इसमें नहाते और जानवरों को आगोर में घूमते देखा जा सकता है। आगोर के जल निकासी वाले रास्ते भी टूट-फूट गए हैं।

1989-90 में जैसलमेर की आबादी करीब 30,000 थी। यहाँ के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के इंजीनियर जी. गहलौत के अनुसार, अभी जैसलमेर शहर को रोज 7.5 लाख गैलन पानी की जरूरत है और यह भूजल निकालकर ही किया जा रहा है। पानी बाड़मेर रोड पर शहर से 12 किमी दूर स्थित डबला गाँव से आता है। वहाँ गड़े आठ नलकूपों से पानी लाकर जैसलमेर शहर को दिया जाता है। ये सभी लाठी शृंखला में गाड़े गए हैं, इसलिये पर्याप्त मीठा पानी देते हैं। भूजल 80 मीटर नीचे है। यहाँ से पानी शहर में लाकर 300 हार्स पावर के पम्प से किले के ऊपर पहुँचाया जाता है, जहाँ पानी जमा करने की एक बड़ी टंकी बनाई गई है। यहाँ से छोड़ा गया पानी पूरे शहर में अपने आप पहुँच जाता है, क्योंकि किला काफी ऊँचाई पर है।

नलकूपों को गाड़ने और नलकों से पानी देने की व्यवस्था ने जैसलमेर शहर में नई परेशानियाँ पैदा की हैं। गन्दे पानी की निकासी की पुरानी व्यवस्था अब एकदम कम पड़ने लगी है। पूरे शहर में घरों से निकलने वाली नालियों का पानी जहाँ-तहाँ बिखरकर मच्छरों का अभयारण्य बना हुआ है। जैसलमेर के निर्माताओं ने पहले जल निकासी की कोई बड़ी व्यवस्था करनी जरूरी नहीं समझी थी। घर एकदम पास-पास बने हैं और सड़कें-नालियाँ तंग हैं। सो, अब नालियाँ बिछाना बहुत मुश्किल काम है।

गन्दे पानी से किले की दीवारों पर सीलन आ रही है और इसके ऊपर घास-फूस और पौधे की जड़ें जमाने लगे हैं। चूँकि इस शहर का आर्थिक जीवन मुख्यतः पर्यटन से चलता है, इस ऐतिहासिक किले को हुआ नुकसान शहर की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुँचाएगा।

बीकानेर : राजा राव बीका ने इस शहर की स्थापना सन 1489 में कराई थी। ऐसा लगता है कि बीकानेर शहर को बसाने के फैसले के पीछे यहाँ मुडिया कांकर की पट्टी मिलने का बहुत बड़ा हाथ था। मिट्टी की यह किस्म जल संचय के हिसाब से बहुत उपयोगी है। इसी के आधार पर यहाँ बरसात के पानी को संचित करने के लिये तालाबों की एक शृंखला बनाई गई। इन तालाबों के आगोर को पवित्र जगह माना जाता था और यहाँ शौच वगैरह की सख्त मनाही थी। अक्सर इन इलाकों को, जिनमें कुछ तो विशाल थे, हरियाली से भरा रखा जाता था। बीकानेर के आस-पास के शहरों में भी तालाबों की भरमार है। इनमें सबसे नामी कोलायत तालाब का आगोर 14,900 हेक्टेयर, गजनेर का 12,950 हेक्टेयर और गंगा सरोवर का 7,950 हेक्टेयर का है।

शहर की पानी की जरूरतें इन तालाबों के साथ ही घर के कुओं और टांकों से पूरी होती थीं, जो अपने घर और परिसर में पड़ी बारिश के पानी को संचित कर लेने के लिये बनाए जाते थे। टांका का पानी सिर्फ पीने के काम आता था। अगर किसी साल कम बरसात हुई और टांका नहीं भरा तो सबसे पहले पास के कुओं और तालाबों से पानी लाकर उसे भर लिया जाता था। इस प्रकार शहर के लोगों की पानी की जरूरतें पूरी होती थीं।

इस सदी के शुरू में बीकानेर में 40 तालाब थे। आज हर्षतालाब के अलावा बाकी सभी तालाबों के आगोर नष्ट हो गए हैं। जस्सोलाई, बाघीनाडा और रंगोलाई जैसे नामी पुराने तालाब आज बीकानेर शहर में बिला गए हैं। पहले जो नहर सुरसागर सरोवर को पानी पहुँचाती थी आज शहर का गन्दा नाला बन गई है और सुरसागर शहर भर की नालियों के लिये एक बड़ा कुंड। चूँकि नहर की ढलान तालाब की तरफ है, इसलिये तालाब से गन्दा पानी निकालने वाले पम्प कोई लाभ नहीं दे पाते। सुरसागर के चारों तरफ बने मकानों ने भी वहाँ का खुलापन खत्म किया है। परिणाम हुआ है कि बीकानेर को अब एक नई मुश्किल-बाढ़-का सामना करना पड़ रहा है। जब कभी भी ज्यादा पानी बरसता है, गन्दे तालाबों का पानी उफनकर आस-पास के इलाकों में भर जाता है। और कभी वह समय भी था जब राजे-महाराजे खुद चलकर सुरसागर की सीढ़ियों पर बैठकर प्रसन्न होते थे।

कोलायत के जलग्रहण क्षेत्र में असंख्य ईंट भट्ठे लग गए हैं। ईंट के लिये मिट्टी निकालने से जगह-जगह बड़े-बड़े खंदक बन गए हैं। अब पानी तालाब में जाने की जगह इनमें भरता जाता है। भट्ठों की आँच के लिये आगोर के पेड़ों को भी बड़ी संख्या में काटा गया है। कोलायत के पूरे आगोर को नष्ट किया जा रहा है और इसके साथ ही पिछले कुछ वर्षों में तालाब के पानी के स्तर में भी गिरावट आती जा रही है।

बीकानेर के हर घर में पीने के पानी के लिये टांका है। ये घर के आँगन या मकान के परिसर में बने हैं। असंख्य कुओं और तालाबों के साथ वे शहर की पानी की जरूरतें पूरी करते थे। पर राजस्थान नहर के चलते अब शहर को भरपूर पानी उपलब्ध हो रहा है। परिणाम हो रहा है टांकों की उपेक्षा। अब बचे टांकों का उपयोग नलके के पानी को ही रखने के लिये किया जा रहा है। अब तो यह काम प्लास्टिक की टंकियाँ करने लगी हैं। आज बीकानेर में सिर्फ पक्के वैष्णव लोग ही टांकों का प्रयोग करते हैं, क्योंकि वे दूसरों का छुआ पानी नहीं पीते।

1989-90 में बीकानेर शहर की आबादी 3.5 लाख के करीब थी और शहर को रोज 1.1 से 1.3 करोड़ गैलन पानी की जरूरत थी। 1958 में शहर में जब जलापूर्ति शुरू हुई थी तब उसे रोज 30 लाख गैलन पानी की जरूरत थी। 1978 में यहाँ नई प्रणाली की अनुमति दी गई, जिसमें राजस्थान नहर से लूणकरणसर लिफ्ट नहर द्वारा यहाँ तक पानी ले आने की योजना थी। बीकानेर-लूणकरणसर लिफ्ट नहर योजना की क्षमता रोज 65 लाख गैलन पानी लाने की है। इस योजना से अभी 25 से 35 लाख गैलन पानी ही रोज लिया जा रहा है। कुछ स्थानीय स्रोतों के साथ अभी शहर की पानी की जरूरतें आराम से पूरी हो जा रही हैं। समस्या सिर्फ तभी होती है जब बिजली न हो।

पर आज भी शहर के पानी की मुख्य जरूरतें यहाँ के असंख्य पुराने कुओं और नए नलकूपों से पूरी हो रही हैं। 1.1 से 1.3 करोड़ गैलन की रोजाना की जरूरत में इन स्थानीय स्रोतों से ही 85 से 95 लाख गैलन पानी मिल जाता है। इस प्रकार बीकानेर शहर की जलापूर्ति मुख्यतः भूजल पर ही आश्रित है। जलापूर्ति विभाग के अधिकारियों का कहना है कि जब तक राजस्थान नहर में पानी है, डरने की कोई बात नहीं है। लेकिन वे इस तथ्य की उपेक्षा कर देते हैं कि आज भी शहर मुख्यतः जिस पानी पर चल रहा है उसका स्रोत सूख सकता है।

फलोदी, बाड़मेर और बलोतरा : अपने घर की छत पर गिरे बरसाती पानी को संचित करना पूरे थार मरुभूमि प्रदेश के गाँवों और शहरों में बहुत आम है। ढलवा छत पर पड़ने वाले बरसाती पानी को एक पाइप के सहारे आँगन या पिछवाड़े जमीन के अन्दर बनाए गए टांके में ले जाया जाता है। पश्चिमी राजस्थान में बरसाती पानी को संग्रहित करने की यह तकनीक काफी हद तक कलाकारी जैसी लगती है। पहली बरसात के पानी को जमा नहीं करते, क्योंकि इससे छत और पाइप में बैठी धूल-मिट्टी और अन्य प्रकार की गन्दगी की सफाई हो जाती है। इसके बाद का पानी जमा किया जाता है। टाँकों का आकार अक्सर एक बड़े कमरे जितना होता है। एक घर का टांका तो 6.1 मीटर गहरा, 4.27 मीटर लम्बा और 2.44 मीटर चौड़ा मिला। दुर्भाग्य से नलके का पानी आने के साथ ही थार क्षेत्र में छतों से पानी बटोरने का चलन धीरे-धीरे उठता जा रहा है।

पारम्परिक रूप से टांके ही जल संचय का सबसे विश्वस्त तरीका रहे हैं। इससे पानी खर्च करने में भी सावधानी रखी जाती थी जिससे गर्मियों में कमी न हो जाये। कम बरसात होने पर कुओं, नाडियों और तालाबों से पानी लाकर घर के टांकों को भर लिया जाता था। घर के बुजुर्गों को ही टांकों के रख-रखाव का सबसे ज्यादा ख्याल रहता था, क्योंकि उन्होंने अपने पूरे जीवन भर इसी का पानी पिया था। शुरुआती वर्षों में लोगों को नलके के पानी का स्वाद अच्छा नहीं लगा। टांकों का पानी बीमारों को भी दिया जाता था।

मरुभूमि की गर्मी से बचने के लिये टांकों से लगा एक कमरा भी बनाया जाता था। चूँकि यह कमरा जमीन के नीचे होता था और इसकी तथा टांके की एक दीवार साझी होती थी इसलिये इसमें काफी ठंडक रहती थी और दोपहर में पूरा परिवार इसी कमरे में आराम करने चला जाता था।

जोधपुर जिले का फलोदी शहर बीकानेर-जैसलमेर रोड पर स्थित है और 1980 के दशक में इसकी आबादी करीब 36,000 थी। राजस्थान नहर का पानी आने के पहले यहाँ के हर घर में एक टांका होता था। इसके साथ ही बस्ती में सात सार्वजनिक तालाब-रानीसर, रामसर, हिवासर, सिवसर, न्यातालाह, खत्री और चिकलिण-थे। तीन बड़े कुएँ भी थे। बरसात के बाद तालाबों का पानी ही प्रयोग किया जाता था और टांकों के पानी को गर्मियों के लिये सुरक्षित रखा जाता था। लेकिन अन्य जगहों की तरह ही जब फलोदी में राजस्थान नहर का पानी पहुँचने लगा, टांकों की स्थिति खराब होने लगी। वैसे अभी भी काफी सारे लोग टांकों का पानी पीते हैं, पर यह संख्या 2000 परिवार के आस-पास रह गई होगी। अभी भी फलोदी के लोग टांके बनवाते हैं, पर अब इसे बरसाती पानी की जगह नलके वाले पानी से ही भरने का चलन जोर पकड़ता जा रहा है।

फलोदी के तालाबों और सरोवरों की हालत भी टांकों जैसी होती जा रही है। इनसे जुड़ी लम्बी नहरें शहर तक पानी ले आती थीं। पर अब उन्हें बर्बाद कर दिया गया है। जिस रानीसर तालाब का पानी वर्षों में कभी ही चट हो पाता था, आज सूखा पड़ा है।

बाड़मेर शहर में बाहर से पानी लाने की अभी तक कोई व्यवस्था नहीं है। राजस्थान नहर का पानी यहाँ तक नहीं पहुँच पाता और नर्मदा बाँध का पानी कब तक पहुँचेगा, कहना मुश्किल है। इस जिले के अधिकांश भागों का भूजल खारा है। बहुत ज्यादा गहराई में मीठा पानी मिलता है। परिणाम यह है कि बाड़मेर के प्रायः सभी घरों में आज भी छत से पानी जमा करने का चलन है। बाड़मेर पश्चिमी राजस्थान का एकमात्र ऐसा बड़ा शहर है जहाँ छत से पानी जमा करने की ‘कला’ मरी नहीं है। लोग अभी भी अपने टांकों को दुरुस्त रखे हुए हैं, क्योंकि मीठा पानी लेने का सबसे भरोसेमन्द स्रोत यही है।

लेकिन बलोतरा में स्थिति बड़ी तेजी से बदल रही है। रंगसाजी के लिये प्रसिद्ध यह औद्योगिक नगर लूणी नदी के किनारे बसा है। यहाँ पानी की भारी कमी है। टैंकरों से पानी की आपूर्ति होती है। चूँकि अधिकांश कारोबार रंगों और रसायनों का है, इसलिये फैक्टरियों से निकला गन्दा पानी तथा कचरे ने कुओं और यहाँ तक कि पानी की पाइपों के अन्दर भी घुसपैठ कर ली है। पारम्परिक रूप से यहाँ भी मुख्यतः टांकों के पानी पर ही जीवन चलता था। कुछ पुराने मकानों में अभी टांके हैं। पर अब सिर्फ आठ या दस घर ही ऐसे होंगे जो बरसाती पानी को संग्रहित करते होंगे। अधिकांश लोग खारा या प्रदूषित पानी ही पीते हैं।

बलोतरा के निवासी नंद किशोर, जिनके यहाँ टांका है और जो अभी भी बरसात का पानी इकट्ठा करते हैं, का कहना है कि उनके यहाँ किसी को भी नलके का पानी अच्छा नहीं लगता-न बुजुर्ग माँ-बाप को और न ही उनके बच्चों को। उनका टांका इतना बड़ा है कि 12 लोगों के उनके परिवार की दो वर्ष की जरूरतें पूरी कर सकता है। पास-पड़ोस के लोग भी कभी-कभार उनके टांके का पानी ले जाते हैं।

जोधपुर : जोधपुर शहर इस बात का सबसे अच्छा प्रमाण है कि किस प्रकार आधुनिकीकरण और शहरीकरण ने इस मरुभूमि के शहर की अद्भुत जल प्रबन्ध प्रणाली को चौपट कर दिया है। इस शहर की स्थापना सन 1495 में हुई। शहर के लिये स्थान का चुनाव करते हुए इसके शासकों ने पहले पानी और सुरक्षा, दो बातों पर जरूर विचार किया होगा। चोंका-दाइजार पठार इस क्षेत्र के भूगोल का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। यह 30 किमी लम्बा और अधिकतम 5 किमी चौड़ा है तथा जमीन से इसकी ऊँचाई 120-150 मीटर है। इसकी ढलान कम-ज्यादा है, पर कई जगहों पर बहुत तीखी है। यह पूरा पठार नाडी, तालाब, तलैया, सरोवरों जैसी भूतल वाली 50 व्यवस्थाओं और कुओं, बावड़ियों और झालराओं जैसी 150 भूजल प्रणालियों के लिये आगोर का काम करता है। भूतल वाली ज्यादातर व्यवस्थाएँ प्राकृतिक हैं, पर सदियों से लोगों के श्रम और कौशल ने इनमें काफी सुधार ला दिया है। पहले यही भूतल प्रणालियाँ नगर में पानी का मुख्य स्रोत थीं और इन्हीं से रिसा पानी कुओं, बावड़ियों और झालराओं में जमा होता था। इनमें से कुछ व्यवस्थाएँ तो 500 वर्षों से भी ज्यादा पुरानी हैं। पानी की माँग बढ़ने के अनुपात में इनकी संख्या भी बढ़ती गई है। इनका निर्माण राजा-महाराजाओं, यश की कामना रखने वाले सेठ-साहूकारों या आम लोगों ने भी कराया है। पर इनका निर्माण चाहे जिस किसी ने कराया हो ये समाज की सम्पत्ति बन गईं और स्थानीय निवासियों का इनसे अपनापन सम्पत्ति के सामान्य बोध से कहीं ज्यादा गहरा हो गया।

दुर्भाग्य से 1897-98 के आस-पास से पानी वाली व्यवस्थाओं का निर्माण और विकास अचानक ठप होने लगा। तभी पानी की सार्वजनिक आपूर्ति प्रणाली की शुरुआत हुई थी। फिर भी 1960 के दशक तक लोगों ने पारम्परिक प्रणालियों की पवित्रता बनाए रखी, उनको चलन में रखा। पर 1960 के बाद से इन प्रणालियों की गिरावट तेज हुई और लोगों के मन में भी इनके प्रति आदर भाव नहीं रहा। ये प्रणालियाँ आज इतनी बदहाल हो गई हैं कि इनको फिर से दुरुस्त कर पाना असम्भव-सा लगता है। अगर तत्काल कदम नहीं उठाए गए तो बची-खुची पारम्परिक व्यवस्थाएँ भी इसी गति को प्राप्त होंगी। यह उल्लेखनीय है कि आज भी जब पानी का संकट आता है तो जलापूर्ति विभाग भी नगर में मौजूद भूजल वाली 107 चालू व्यवस्थाओं में से 66 से पानी लेकर अपना काम चलाता है।

1989 में स्कूल ऑफ डेजर्ट साइंसेज द्वारा किये गए एक सर्वेक्षण में शहर में पारम्परिक जल प्रबन्ध वाली 229 व्यवस्थाएँ मिलीं। इनमें नाडियों, तालाबों और झीलों जैसी भूतल वाली 75 व्यवस्थाएँ थीं जबकि कुएँ, बावड़ी और झालराओं जैसी 154 भूजल व्यवस्थाएँ थीं।

भूतल वाली व्यवस्थाएँ


भूतल वाली प्राचीन व्यवस्थाएँ सदियों से स्थानीय लोगों और पालतू पशुओं के साथ ही वन्य जीवों की भी पानी की जरूरतें पूरा करती रही हैं। इनमें वास्तु और इंजीनियरिंग कौशल की उत्तम श्रेणी तो दिखती ही है, सामुदायिक भागीदारी का भी उदाहरण है। साथ ही इनसे ‘सबके लिये पानी’ वाले मूल दर्शन वाली सामाजिक, नैतिक और धार्मिक मान्यताएँ और मूल्य भी जुड़े हुए हैं। सदियों से इन्हीं मूल्यों और मान्यताओं ने बगैर किसी लिखित कायदे-कानून के एक विलक्षण जल प्रणाली को विकसित किया और चलाया। लेकिन सरकारी सार्वजनिक जलापूर्ति की शुरुआत के साथ ही लोग अपनी इस अमूल्य सम्पदा को उपेक्षित करते जा रहे हैं। अब और बहुत देर किये बगैर जोधपुर की पारम्परिक भूजल व्यवस्थाओं को जीवित रखने के लिये कदम उठाने की जरूरत है। इनका जीवन इनके आगोर-चोंका-दाइजार पठार के जीवित रहने पर निर्भर करता है। पानी वाली हर व्यवस्था से विस्तृत आगोर, जलमार्ग और नहरें जुड़ी थीं जिनसे इनमें बरसात का पानी जमा होता था।

 

सारिणी 2.7.1 : जोधपुर के पारम्परिक जल प्रबन्धों की स्थिति

 

कुल

काम न आने वाले

काम आने वाले

उपयोग छोड़ा गया

बर्बाद

पानी की गुणवत्ता

पानी का उपयोग

पीने लायक

न पीने लायक

पीने में

सिंचाई/पशुओं के लिये

नहाने/धोने के लिये

भूतल वाले प्रबन्ध

नाडी

        

शहर के अन्दर

15

2

-

11

2

5(1)

8

-

शहर के बाहर

10

-

7

1

2

-

-

3

तालाब

        

शहर के अन्दर

23

1

2

15

5

3(1)

14

3

शहर के बाहर

17

1

11

3

2

2

-

3

जलाशय

        

शहर के अन्दर

2

-

2

-

-

-

-

-

शहर के बाहर

3

-

1

-

2

-

-

2

झील

        

शहर के अन्दर

5

-

-

5

-

3

2

-

शहर के बाहर

0

-

-

-

-

-

-

-

कुल

        

शहर के अन्दर

45

3

4

31

7

11

24

3

शहर के बाहर

30

1

19

4

6

2

-

8

भूजल वाले प्रबन्ध

कुएँ

        

शहर के अन्दर

43

12

1

27

3

27

-

3

शहर के बाहर

55

11

-

39

5

26

13

5

बावड़ियाँ

        

शहर के अन्दर

21

7

5

5

4

3

-

6

शहर के बाहर

27

4

3

15

5

10

7

3

झालरा

        

शहर के अन्दर

4

2

1

-

1

-

-

1

शहर के बाहर

4

1

-

-

3

1

1

1

कुल

        

शहर के अन्दर

68

21

7

32

8

30

-

10

शहर के बाहर

86

16

3

54

13

37

21

9

टिप्पणी : कोष्ठक के आँकड़े बताते हैं कि उनका उपयोग सिंचाई के लिये भी होता था।

स्रोत : एस.एम. मोहनोत, द ओल्ड वाटर सिस्टम ऑफ जोधपुर

जोधपुर की बेहतरीन जल प्रबन्ध व्यवस्था आधुनिकीकरण और शहरीकरण की आँधी से बर्बाद हो गई है। अधिकांश पारम्परिक जल संचय और वितरण व्यवस्थाएँ बर्बाद हो गई हैं या उनका उपयोग बन्द कर दिया गया है।

 

नाडी: नाडी गाँव का वैसा पोखर है जिसमें बरसात का पानी जमा किया जाता था। इसका कोई खास विकसित किया गया आगोर नहीं होता। पक्की नाडी बनाने का सबसे पुराना ज्ञात मामला सन 1520 का है जब राव जोधाजी के शासनकाल में जोधपुर के निकट एक नाडी बनवाई गई थी। प्रायः हर गाँव में नाडियाँ हैं और इनको बनाने की जगह का चुनाव गाँव के लोग बरसाती पानी के प्राकृतिक जल ग्रहण क्षेत्रों और पानी जमा हो सकने की क्षमता के हिसाब से करते हैं। बरसात के बाद इनका पानी दो महीने से लेकर पूरे वर्ष तक भी चलता है। नाडी कहाँ बने- इसी पर उसमें जमा होने वाले पानी की मात्रा भी निर्भर करती थी, क्योंकि उसके स्थान से ही उसका आगोर और पानी निकलने का चरित्र तय होता है। ढूँह वाले इलाकों की नाडी 1.5 से 4 मीटर गहरी होती है और रिसाव के चलते इसमें तेजी से पानी गायब होता है। इनका आगोर भी छोटा होता है। रेतीले मैदानी इलाकों की नाडियाँ 3 से 12 मीटर तक गहरी होती हैं। इनका आगोर बड़ा होता है और यहाँ रिसाव से नुकसान भी अपेक्षाकृत कम होता है। इसी के चलते यहाँ सात से दस महीनों तक पानी टिकता है। जलोढ़ मिट्टी वाले मैदानी इलाके की नाडियाँ सबसे बड़ी होती हैं। इनका आगोर काफी बड़ा होता है और आमतौर पर ये चार-साढ़े चार मीटर गहरी होती हैं। यहाँ 8 से 12 महीनों तक पानी टिकता है।

मनुष्य और पशुओं की काफी बड़ी जरूरतें नाडियों से पूरी होती है। केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसन्धान संस्थान द्वारा किये गए एक अध्ययन से उनकी संख्या और समाज की उन पर निर्भरता का पता चलता है। नागौर, बाड़मेर और जैसलमेर जिलों में यह सर्वेक्षण हुआ और वहाँ इनकी संख्या क्रमशः 1436, 592 और 1822 पाई गई। इन तीनों जिलों में पानी की कुल जरूरत का 37.06 फीसदी नाडियों से पूरा किया जाता था।

मरुभूमि के हर गाँव में उसकी भौगोलिक बनावट, गाँव की उम्र और जनसंख्या के हिसाब से एक या अधिक नाडियाँ होती ही हैं। नाडी असल में भूतल में प्राकृतिक रूप से बना गड्ढा है जिसमें कई दिशाओं से आया बरसाती पानी जमा होता है। छोटी नाडियों की जलग्रहण क्षमता बढ़ाने के लिये एक या दो तरफ पत्थर की दीवार बना दी जाती है। स्थानीय लोगों द्वारा समय-समय पर इसकी गाद-मिट्टी निकालना और खुदाई करना आम है। अगर बरसात सामान्य हुई तो अधिकांश नाडियों में चार से आठ महीनों का पानी जमा होता है। कुछ नाडियों में पानी साल भर चल जाता है। स्कूल ऑफ डेजर्ट साइंसेज के सर्वेक्षण में जोधपुर नगर और आस-पास के इलाके में 25 नाडियों की गिनती की गई थी। अधिकांश नाडियों का नाम बस्ती के नाम पर या उसे बनवाने, गहरा कराने, साफ कराने वाले व्यक्ति के नाम पर रखा गया था। इनमें से पाँच शहर के अन्दर थीं, जबकि 20 बाहर। सबसे पुरानी जोधनाडी सन 1458 में बनी थी। कई दूसरी नाडियाँ भी 250 वर्ष से ज्यादा पुरानी हैं। पर कोई लिखित प्रमाण न होने से आधी से ज्यादा नाडियों की उम्र तय करना मुश्किल था। इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि इनमें से कुछ नाडियाँ नगर के बसने से भी पहले से मौजूद होंगी। इन नाडियों का पानी अभी भी पीने और दूसरे कामों में प्रयोग होता है। दुर्भाग्य से अब लोगों ने इनसे नजर फेर ली है और करीब एक-तिहाई नाडियाँ बहुत प्रदूषित हो चुकी हैं। इनका आगोर नष्ट हो गया है। शहरीकरण ने उनको घेर लिया है। पुरानी रांगे की नाडी और प्रीताडो नाडी (करीब 450 वर्ष पुरानी) जैसी छः नाडियाँ एकदम नष्ट हो चुकी हैं।

लेकिन नाडियों से जुड़े कुछ दोष भी हैं। तेजी से मिट्टी भरना, वाष्पीकरण और रिसाव से ज्यादा पानी का नुकसान तथा सफाई रख पाने की मुश्किलें इससे जुड़ी हैं। जमीन की बनावट कैसी है- इस पर गाद जमना और रिसाव, दोनों ही निर्भर करते हैं। पुराने जलोढ़ इलाके में स्थित नाडी में सबसे ज्यादा मिट्टी जमती है, जबकि नए जलोढ़ इलाके में सबसे कम। नाडियों में गाद जमने से पानी कम न रुके, इसके लिये हर गाँव में बरसात से पहले इनकी गाद निकालने और नई खुदाई का काम होता है। गाद को रेतीले खेतों में पटा दिया जाता है या ईंट बनाने के काम में उपयोग किया जाता है।

नाडियों का मुँह जितना बड़ा होता है उस अनुपात में इसमें ज्यादा पानी नहीं रहता, पर इसके चलते वाष्पीकरण से पानी का ज्यादा नुकसान जरूर हो जाता है। पानी की गहराई के साथ ही रिसाव वाला नुकसान ज्यादा हो जाता है। मार्च से जून के बीच वाष्पीकरण से 55 से 80 फीसदी तक पानी खत्म हो जाता है। रिसाव वाला नुकसान जुलाई से सितम्बर तक ही मुख्य रूप से होता है, जब नाडियाँ लबालब भरी होती हैं। इस व्यवस्था के खराब रख-रखाव और ढंग से उपयोग न करने से इनमें कीड़े, जलकुम्भियाँ और दूसरी तरह की गन्दगी भी भरी है।6,7

तालाब: तालाब पश्चिमी राजस्थान में बहुत आम हैं और रहे हैं। पुराने तालाब सिर्फ ढलान की दूसरी ओर वाला मुंडेर मजबूत और ऊँचा रखते थे जिससे बरसात का पानी जमा हो। दूसरी तरफ से ढलानें होती थीं या पहाड़ी चट्टानों का किनारा रहता था। मुंडेर की तरफ से सीढ़ियाँ बनी होती थीं। अभी तक मौजूद ऐसे सारे तालाबों में कुछ-न-कुछ कलाकृतियाँ बनी हुई हैं, कहीं मूर्तियाँ हैं तो कहीं पत्थरों पर खुदाई हुई है। अधिकांश तालाब चोंका-दाइजर पठार की अलग-अलग ऊँचाई और गहराई में स्थित हैं। कुछ तालाबों की तलहटी में कुएँ हैं जिन्हें बेरी कहा जाता है। हर तालाब के आगोर के रखरखाव पर खास ध्यान देने की परम्परा रही है। ये तालाब बहुत हाल तक मनुष्य और जानवरों की पानी की जरूरतें पूरी करने के मुख्य स्रोत रहे हैं। स्कूल ऑफ डेजर्ट साइंसेज के सर्वेक्षणकर्ताओं ने पुराने रिकॉर्डों में दर्ज 46 तालाबों में से 40 को ढूँढ निकाला। इन 40 में से आठ शहर के पहाड़ी हिस्से में हैं और 300-530 वर्ष पुराने हैं। सबसे पुराने रानीसर तालाब का निर्माण सन 1460 में हुआ था। तीन और पुराने तालाब- चांकेलाव (सन 1460), फूलालाव (सन 1490) और नया तालाब (सन 1700)- शहरीकरण की आँधी में खो गए। फूलालाव तालाब के ऊपर तो आज एक सार्वजनिक पार्क बना दिया गया है। 40 वर्ष पहले तक पेयजल के लिये उपयोग में आ रहा गाँगेलाव तालाब आज गन्दगी, कचरे और बदबू का डेरा बन गया है। स्थानीय लोगों ने अपने घरों की नालियाँ इसी में गिरानी शुरू कर दी हैं।

नगर सीमा के अन्दर अब सिर्फ रानीसर और पद्मसर (सन 1520) ही साफ-सुथरे तालाब रह गए हैं। इनका आकार सबसे बड़ा है और इन्होंने अपनी पहचान बनाए रखी है। इन तालाबों का पानी आज भी पीने और दूसरे कामों में प्रयोग होता है।7 पर इनके आगोर भी शहर की बढ़ती भीड़-भाड़ की मार झेल रहे हैं। 1989 के जुलाई-सितम्बर के दौरान काफी अच्छी बरसात हुई; पर न रानीसर से पानी भरकर निकला, न पद्मसर से। इससे पहले अगर बरसात अच्छी हो तो ये दोनों तालाब उफनते ही थे। यह बदलाव शहरीकरण और उपेक्षा से आगोर और जलमार्गों की बर्बादी के चलते आया है।

मौजूदा तालाब भी पेयजल का अच्छा स्रोत बन सकते हैं और इन पर तत्काल ध्यान दिये जाने की जरूरत है। इनसे अनेक कुओं और बावड़ियों को पानी मिलता है। अगर तालाब सूख गए तो काफी संख्या में कुओं और बावड़ियों का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा।

बाकी 32 तालाब (जिनमें से तीन शुद्ध अर्थों में तालाब नहीं बाँध वाले जलाशय हैं) नगर सीमा के बाहर स्थित हैं। ये 105 वर्ष से लेकर 600 वर्ष तक पुराने हैं। नागदारी और बारली तालाबों का निर्माण तो करीब 600 वर्ष पहले हुआ था। जसवंतसागर सबसे नया तालाब है, जिसका निर्माण सन 1885 में हुआ था। दुर्भाग्य से इन 29 तालाबों में से 11 तो अब नहीं हैं। इनको या तो बढ़ता शहरीकरण और औद्योगीकरण निगल गए हैं या उन्हें पार्कों और कॉलोनियों में तब्दील कर दिया गया है। 11 अन्य तालाबों के आगोर भी नष्ट हो चुके हैं और उनके भी बचने की सम्भावना कम ही है। पहले हर तालाब का अपना आगोर होता था, पर स्कूल ऑफ डेजर्ट साइंसेज की टोली ने पाया कि अब सिर्फ दो-बिजोलाई और अरना-के ही आगोर पूरी तरह सुरक्षित बचे हैं। सामान्य बरसात भी हो तो इन दो को छोड़कर बाकी किसी भी तालाब में छह महीने से ज्यादा पानी नहीं रुकता। फिर भी आधे तालाबों की स्थिति ठीक है और उनका पानी अभी तक मनुष्यों के पीने लायक है, बाकी आधे तालाबों का पानी प्रदूषित हो चुका है। कभी स्थानीय निवासियों के पीने के पानी का मुख्य स्रोत रहे इन तालाबों का पानी आज मुख्यतः पशुओं के उपयोग में आता है और सिंचाई के लिये प्रयोग होता है।

जलाशय : तालाबों के विपरीत जलाशय चारों तरफ से पक्की पाल और लगभग पूरे अपारगम्य तले वाले ही होते हैं। ये वर्गाकार या आयताकार होते हैं और इनकी जल सम्भरण क्षमता विशाल होती है। शहर के बाहर स्थित इनके जलग्रहण क्षेत्रों से इन तक पानी लाने के लिये नहरें और नालियाँ होती हैं। हर जलाशय का अपना स्वतंत्र आगोर होता है और वहाँ से पानी लाने की व्यवस्था होती है। तालाबों की तरह जलाशयों के निर्माण में भी अक्सर स्थानीय साधनों और कौशल का ही उपयोग होता है।

जोधपुर में पिछली दो शताब्दियों में पाँच जलाशय बनाए गए हैं। सबसे पुराने जलाशय फतेहसागर का निर्माण 1780 में और सबसे नए जलाशय पाओटा का निर्माण 1887 में हुआ था। इनमें से तीन नगर सीमा के अन्दर हैं और दो बाहर। अन्दर वाले तीनों जलाशय- फतेहसागर, गुलाबसागर (1794) और बाईजी का तालाब (1877)-विशालकाय हैं। बाहर वाले मानसागर (1870) और पाओटा भी पर्याप्त बड़े हैं। इनमें से बाईजी का तालाब और पाओटा का प्रयोग अब बन्द हो गया है और मानसागर को बर्बाद कर दिया गया है। बाईजी का तालाब और मानसागर में अब आस-पास की कॉलोनियों की नालियाँ गिरती हैं। गुलाबसागर और फतेहसागर अभी भी ठीक ठाक हैं, पर इनका पानी भी प्रदूषित हो चुका है। उनमें 4 से 8 किमी से पानी लाने वाली नहरों का रख-रखाव अब कमजोर हो गया है। लोगों ने इन नहरों में अपने घरों की मोरियाँ खोल दी हैं, उनके बाँध तक पर घर फैला दिया है और वे इनमें कचरा भी फेंकने लगे हैं।

1955 तक बाईजी का तालाब, गुलाबसागर और फतेहसागर का पानी पीने के काम भी आता था। उनके रख-रखाव, सफाई और मरम्मत के प्रति प्रशासन भी चौकस रहा करता था। गुलाबसागर और फतेहसागर को पानी पहुँचाने वाली नहरों को ठीक कर दिया जाये तो कम-से-कम इन दोनों को अभी भी बचाया जा सकता है।

झील : जोधपुर शहर के बाहरी हिस्से में पाँच विशाल झीलें हैं। इनमें सबसे पुरानी बालसमंद झील का निर्माण सन 1126 में हुआ था और समय-समय पर इसकी खुदाई करके इसकी क्षमता और बढ़ाई गई है। बाकी चार-लालसागर (सन 1800), कैलाना (1872), तखतसागर (1932) और उम्मेदसागर (1931) बालसमंद की तुलना में बहुत नई हैं। इन झीलों में करीब 70 करोड़ घन फीट पानी अँटता है जो 8 लाख लोगों की 8 महीनों की जरूरत के लिये पर्याप्त है। यहाँ की सारी नाडियों और तालाबों की कुल जल सम्भरण क्षमता भी करीब इतनी ही होगी, पर आजकल सामान्य वर्षा वाले वर्षों में भी इनमें पानी पूरा नहीं भरता। इनके आगोर और जलमार्गों की दुरवस्था के चलते ऐसा होता है। कैलाना-तखतसागर शहर की सबसे बड़ी झीलें हैं और इनको अनेक छोटी नहरों के अलावा छोटा आबू, कालीबेरी, केरु, नाडिलाव जैसी बड़ी नहरों से भी पानी मिलता है। ये सारी नहरें हाथी नहर में मिलती हैं जो छह मीटर गहरी है। झीलों के आगोर क्षेत्र में खनन के धंधे के चलते इन नालियों पर भी बुरा प्रभाव पड़ा है और उनमें पत्थर-मिट्टी भर गई है।

बालसमंद सबसे पुराना तो है ही, काफी बड़ा भी है। इसे बालसमंद-मंडौर पहाड़ियों पर हुई बरसात का पानी मिलता है जो मंडौर- फेदुसर नहर से यहाँ तक पहुँचता है। 1875 तक शहर की आबादी का काफी बड़ा भाग बालसमंद के पानी से ही अपनी जरूरतें पूरा करता था। बालसमंद का पानी एक खुली नहर के जरिए बीच जोधपुर में स्थित गुलाबसागर जलाशय में लाया जाता था। जब कैलाना और तखतसागर झीलों का निर्माण हो गया तब शहर की जलापूर्ति व्यवस्था और सुधर गई। इनका पानी पाइपों के जरिए 1905 में गुलाबसागर और बाईजी का तालाब में लाया जाने लगा। इसके बाद शहर के पश्चिमी हिस्से के निवासियों की जरूरत के लिये उमेदसागर का निर्माण किया गया। पर अभी बालसमंद के आगोर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन का काम चल रहा है और इस झील को पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। इससे इसके आस-पास लगे 50 बागों पर भी बुरा प्रभाव पड़ा है।

 

सारिणी 2.7.4 : जोधपुर के जलाशयों और तालाबों के मुख्य जलमार्ग

जलमार्ग

पानी आपूर्ति वाले जलाशय/तालाब

लम्बाई (किमी में)

बालसमंद नहर

बालसमंद

10.25

नाडिलाव

कैलाना

5.61

कालीबेरी

कैलाना

6.16

पाबुबेरी

कैलाना

4.39

केरु

कैलाना

10.51

गोलासाणी

कैलाना

13.30

छोटा आबू

कैलाना

9.88

हाथी

कैलाना

अनुपलब्ध

तखतसागर नहर

तखतसागर

0.81

उमेदसागर पूर्व

उमेदसागर

6.90

उमेदसागर पश्चिम

उमेदसागर

3.01

फतेहसागर-गुलाबसागर

फतेहसागर-गुलाबसागर

8.45

बाईजी का तालाब

बाईजी का तालाब

1.40

रानीसर-पद्मसर

रानीसर-पद्मसर

2.25

टिप्पणी : इनके अतिरिक्त छोटे जलमार्ग हैं जो कम लम्बे हैं और अनेक भूतल जल प्रबन्धों को पानी पहुँचाते हैं।

 

शहर के दक्षिण-पश्चिम में स्थित उमेदसागर झील को आबू पहाड़ियों की बरसात का पानी भी मिलता है, जो उमेदसागर नहर से यहाँ तक पहुँचता है। पाँचकुंड और दाइजर बाँधों का निर्माण बरसाती पानी को थामने के लिये किया गया है। इनके आकार छोटे हैं। इनमें पानी भरने के बाद नागदारी जैसे छोटे तालाबों में भरता है। चूँकि ये व्यवस्थाएँ बरसात का काफी पानी थाम लेती हैं, इसलिये इस इलाके के कुओं और बावड़ियों का जलस्तर काफी ऊँचा रहता है।

नगर के बाहर 11 सोते भी हैं। बहुत हाल तक ये बारहमासी थे, पर अब इनमें से सात सिर्फ मानसून के समय बहते हैं। ऐसा खनन और बड़ी संख्या में नलकूपों के गड़ने के चलते हुआ है। इन सोतों से वन्य जीवों और जानवरों की कई तरह की जरूरतें पूरी होती हैं।

नहरें : जोधपुर की नहर प्रणाली में तालाबों, जलाशयों और नाडियों को पानी पहुँचाने वाले असंख्य जलमार्ग, नहरें और नालियाँ शामिल हैं। इन्हीं प्राकृतिक जलमार्गों के चलते ही शहर बसने के पहले ही यहाँ अनेक नाडियों और तालाबों का निर्माण हो चुका था। करीब 200 वर्ष पूर्व बड़े-बड़े जलाशयों के निर्माण ने नहरों की उपयोगिता और बढ़ाई। इसी क्रम में विभिन्न जल ग्रहणों क्षेत्रों से तालाबों, जलाशयों, झीलों को जोड़ने वाली नहरों का जल भी विकसित हुआ। 1886 तक नहरों का जाल पूरी तरह बिछ चुका था।

जोधपुर देश का शायद एकमात्र ऐसा शहर है जहाँ पानी की हर बूँद को बचाने का जतन हुआ दिखता है। इसके लिये हर जलग्रहण क्षेत्र को नहरों और नालियों से जोड़ा गया था। सो, हर तालाब, हर नाडी, हर झील तो इन जलग्रहण क्षेत्रों से जुड़ी ही थी, ये आपस में भी नहरों के माध्यम से जुड़ी थीं और इनसे ही शहर भर की जलापूर्ति व्यवस्था जुड़ी थी। नगर में पानी की भूमिगत सुरंगे भी हैं, जिन पर बहुत कम विशेषज्ञों की नजर गई है।

स्कूल ऑफ डेजर्ट साइंसेज के सर्वेक्षण से यह बात सामने आई कि इन नहरों की कुल लम्बाई 85 किमी है और ये कुल करीब 13,500 हेक्टेयर के जलग्रहण क्षेत्रों का पानी सहेज लाती हैं। इनसे पाँच झीलों, दो जलाशयों और दो तालाबों को पानी मिलता है। नहरें आमतौर पर तीन से पाँच मीटर चौड़ी हैं (कई स्थानों पर इनकी चौड़ाई 7 मीटर तक भी है)। स्थानीय भूरे पत्थरों का उपयोग भी इन नहरों में हुआ है और इनमें राजमिस्त्री का काम भी है जिससे ये टिकाऊ बनी हैं।

बालसमंद नहर अभी भी ठीक हैं। इसके अन्दर जरूर कचरा, पत्थर और रेत भर गई है, पर इसे सबसे ज्यादा खतरा इस क्षेत्र में हो रहे अन्धाधुन्ध खनन से है। दो स्थानों पर सड़क का निर्माण भी इसके रास्ते में बाधक हो रहा है। कैलाना और तखतसागर झीलों को पानी पहुँचाने वाली नहरें आमतौर पर ठीक स्थिति में हैं। पर इनमें भी कंकड़-पत्थर भरने लगे हैं। उमेदसागर नहर पर भी तत्काल ध्यान देना जरूरी है। गुलाबसागर और फतेहसागर नहरों पर शहरीकरण के दबाव से खतरा बढ़ गया है और अगर तत्काल ध्यान नहीं दिया गया तो ये सदा के लिये गायब हो जाएँगी। फिर ये झीलों भी बाईजी का तालाब और मानसागर की तरह मर जाएँगी। बाईजी का तालाब को पानी पहुँचाने वाली नहर को गन्दा नाला बना दिया गया है और फतेहसागर नहर भी उसी तरह बढ़ती लग रही है। जोधपुर की उत्कृष्ट नहर प्रणाली को तत्काल मरम्मत व सफाई की जरूरत है और इसे अवैध कब्जों से भी बचाना होगा। नहरों के किनारे पत्थरों की खुदाई बन्द होनी चाहिए। उस सर्वेक्षण का अनुमान है कि अगर ये जरूरी कदम उठा लिये गए तो 20 करोड़ घन मीटर अधिक बरसाती पानी जोधपुर को दिया जा सकेगा।

भूजल वाली व्यवस्थाएँ


जोधपुर की भूजल वाली व्यवस्थाओं में कुएँ, बावड़ियों और झालराओं का प्रमुख स्थान है। ये व्यवस्थाएँ अपने आस-पास के लोगों को सुगमता से अच्छा और नियमित पानी देने के उद्देश्य से बनाई गई थीं। इनका न तो अपना कोई आगोर है, न कोई स्वतंत्र स्रोत। लेकिन इन सबमें ऊँचाई पर स्थित तालाबों और झीलों से हुए रिसाव का पानी जमा होता है। इनके आकार, आकृति, गहराई, डिजाइन और अवस्थिति में काफी फर्क है। इनमें से अनेक का निर्माण परोपकारी लोगों ने कराया है। कुओं का निर्माण तो मुख्यतः पेयजल की सुविधा के लिये ही कराया गया था, जबकि बावड़ियों और झालराओं का निर्माण नहाने-धोने के उद्देश्य से भी किया गया था।

कुएँ : पुराने रिकॉर्डों के अनुसार, शहर के विभिन्न हिस्सों में 125 कुएँ थे, पर स्कूल ऑफ डेजर्ट साइंसेज के सर्वेक्षणकर्ता अब इनमें से सिर्फ 98 कुओं को ही ढूँढ पाये- 41 शहर के अन्दर और 57 बाहर। जेठा बेड़ा और चोपासानी बेड़ा सबसे पुराने कुएँ हैं। जेठा बेड़ा का निर्माण सन 1460 में हुआ था। पर अनेक पुराने कुओं के निर्माण की पक्की तारीख का रिकॉर्ड न होने से उनकी उम्र निर्धारित नहीं की जा सकती। लेकिन ये 120 से 530 साल पुराने हैं। 98 कुओं में से 74 अभी भी प्रयोग में आ रहे हैं। इनमें से 53 का प्रयोग पीने का पानी निकालने के लिये हो रहा है, जबकि 13 से सिंचाई और पशुओं की जरूरतें पूरी की जा रही थीं। जिन 24 कुओं को छोड़ दिया गया है या बन्द कर दिया गया है उनमें या तो पानी रीत गया था या गन्दा आने लगा था।

सर्वेक्षण से यह बात सामने आई कि हर कुएँ की खुदाई पानी की मात्रा और शुद्धता को ध्यान में रखकर की गई थी। आखिरी सार्वजनिक कुआँ सन 1870 के आस-पास खोदा गया और उसके बाद जैसे यह काम एकदम ठप्प पड़ गया। इसका सीधा सम्बन्ध अन्य स्रोतों के जलापूर्ति बढ़ने से था। फिर भी आज तक नगर का जलापूर्ति विभाग 23 पुराने कुओं से पानी लेकर सप्लाई करता है। शहर की 2 से 3 फीसदी आबादी अभी भी कुओं का पानी पीती है। ऐसा लगता है कि कुओं का शहर की आबादी और इसके विस्तार से भी कुछ-न-कुछ रिश्ता है। सबसे ज्यादा संख्या में कुएँ शहर के उसी पुराने हिस्से में हैं जहाँ आबादी का घनत्व सबसे ज्यादा है।

बावड़ी : जोधपुर शहर में काफी सारी बावड़ियाँ हैं। कुओं की तुलना में कम गहरी बावड़ियाँ खूबसूरगत मेहराबों और सीढ़ियों वाली हैं। किसी भी जल संग्रह प्रणाली की तुलना में बावड़ियों में पानी ज्यादा समय तक रहता है, क्योंकि इसमें वाष्पीकरण से नुकसान, एकदम नगण्य होता है। डेजर्ट स्कूल के सर्वेक्षण के अनुसार 16 बावड़ियाँ शहर के अन्दर हैं और 29 बाहर। बावड़ियाँ किसी भी अन्य व्यवस्थित जल प्रबन्ध से ज्यादा पुरानी हैं। मंडौर बावड़ी का निर्माण तो सन 784 में ही हुआ था। मंडौर की ही मेरु बावड़ी करीब 600 वर्ष पुरानी है। चांद बावड़ी (1460), जागू बावड़ी (1465) और ईदगाह बावड़ी (1490), शहर की सबसे पुरानी बावड़ियाँ हैं। शिव बावड़ी (1880) सबसे नई है। करीब आधी बावड़ियाँ आज भी बहुत अच्छी स्थिति में हैं, पर आधी की स्थिति सुधारने पर तत्काल ध्यान देना जरूरी है। 30 बावड़ियों में पानी रहता है जिनमें से 20 का पानी तो पीने लायक है। बावड़ियों का पानी पीने की परम्परा नहीं रही है, फिर भी रामेश्वरजी मन्दिर बावड़ी, अचलनाथ बावड़ी, शिव बावड़ी, बारली बावड़ी और नाथों की बावड़ी का पानी सदा से पिया जाता रहा है और मन्दिरों में इससे पूजा भी होती है। इन बावड़ियों में नहाने, कपड़े धोने वगैरह की मनाही है। नगर का जलापूर्ति विभाग 11 बावड़ियों से पानी लेकर शहर में सप्लाई करता है और इससे पता चलता है कि ये बावड़ियाँ अभी भी किस स्थिति में हैं। पर इन बावड़ियों से नियमित रूप से पानी लेने के बावजूद इनकी स्थिति सुधारने पर जरा भी ध्यान नहीं दिया गया है। 11 बावड़ियाँ आज पूरी तरह त्याग दी गई हैं और दो तो बर्बाद भी हो चुकी हैं। डेजर्ट स्कूल के अध्ययन का निष्कर्ष है कि अगर तत्काल ध्यान नहीं दिया गया तो अनेक दूसरी बावड़ियों का भी यही हाल होगा।

झालरा : डेजर्ट स्कूल के सर्वेक्षणकर्ता शहर के सभी आठ झालराओं को ढूँढ पाने में सफल रहे। दो झालरा शहर क्षेत्र के अन्दर हैं और छह बाहर। लेकिन आज किसी का भी पानी पीने के काम नहीं आता। पुराने रिकॉर्डों से यह भी पता चलता है कि उनका पानी पीने के काम नहीं आता था। उनका निर्माण सामूहिक स्नान और धार्मिक रीति-रिवाजों को पूरा करने के लिये किया जाता था। अक्सर आयताकार झालरा के प्रायः तीन और कई बार चारों तरफ से सीढ़ियाँ बनी होती थीं। 1660 में बना महामन्दिर झालरा, जो बहुत हद तक बावड़ी की तरह दिखता है, सबसे पुराना है। क्रिया का झालरा और मंडौर झालरा भी 400 से 500 वर्ष पुराने हैं। चार झालराओं का प्रयोग बन्द हो गया है और शेष का पानी भी आदमी के उपयोग के लायक नहीं बचा था। लेकिन स्थानीय जलापूर्ति विभाग दो का पानी लेकर शहर में दे रहा था और नौलखा झालरा का पानी सिंचाई के लिये प्रयोग हो रहा था। ये जल संचय के लिहाज से विशिष्ट तो हैं ही, इनका वास्तुशिल्प भी अद्भुत है और शहर की विरासत और एक अलग जल प्रणाली होने के लिहाज से इनका संरक्षण जरूरी है।

यह स्पष्ट है कि शहर की पुरानी अद्भुत जलापूर्ति प्रणाली को और ज्यादा बर्बाद होने से बचाने के लिये तत्काल कदम उठाने की जरूरत है। इसके लिये प्रशासनिक और विधाई कदम तो उठने ही चाहिए, पर लोगों का समर्थन भी जरूरी है। इन व्यवस्थाओं के जलागोर में खनन कार्यों को बन्द करना होगा। नगर योजना विभाग, शहर सुधार न्यास और नगरपालिका को शहर के विस्तार के लिये जंगलों को काटने तथा आगोर क्षेत्र में बस्तियाँ बसाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। आगोर क्षेत्र में वन विभाग को नए सिरे से वृक्षारोपण करना चाहिए।

नाडी, तालाब, जलाशय, बावड़ी, कुएँ, झालरा और नहरों को साफ-सुथरा और मरम्मत करके फिर से ठीक करना चाहिए। इनसे गाद, मिट्टी, कंकड़-पत्थर और कचरा निकाल देना चाहिए। जलागोर और नहरों की जमीन पर हुए अवैध कब्जों और निर्माणों को हटाने के लिये कानूनी प्रावधान किये जाने चाहिए। लेकिन ये सारे काम लोगों के समर्थन के बगैर नहीं हो सकते। इसलिये लोगों को शिक्षित और सचेत करने के लिये जन चेतना अभियान चलाए जाने चाहिए। जल संरक्षण और नगर की विलक्षण जल संचय प्रणालियों के बारे में लोगों को सचेत बनाना चाहिए।

ग्रामीण जल प्रणालियाँ


भूतल पर जल संसाधनों के लगभग पूरा अकाल और भूजल की स्थिति भी बहुत विरल-उसकी गुणवत्ता और पुनरावेशित होने की क्षमता कम-होने से पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीणों ने अपने शहरी लोगों की तरह ही बहुत कुशल जल संचय विधियाँ विकसित करके अपनी और अपने पशुओं की जरूरतें पूरी करने का बन्दोबस्त किया था। इन प्रणालियों को उन कई सांस्कृतिक रीति-रिवाजों से भी मदद मिली जिनमें जल संरक्षण को बहुत महत्त्व दिया गया है। इन व्यवहारों में जल संसाधनों का समतापूर्ण उपयोग करना और पारिस्थितिकी से मेल खाने वाले तरीके अपनाना शामिल था।

थार मरुभूमि क्षेत्र की बस्तियों में जल संचय की सबसे महत्त्वपूर्ण प्रणालियाँ थीं- टांका, तालाब, नाडी, जोहड़, ढाब, टोबा और तलाई।

मरुभूमि के गाँवों के नाम में आपको अक्सर ‘सर’ प्रत्यय जुड़ा मिलेगा, जो सरोवर से आया है और इससे पता चलता है कि वहाँ कोई सरोवर है या था। अक्सर मरुभूमि के उन्हीं हिस्सों पर आबादी बसी है जहाँ मिट्टी कम रिसाव वाली है, जहाँ आगोर क्षेत्र बड़ा है और ढलान ऐसी है कि आसानी से पानी संग्रहित किया जा सके। तालाब अक्सर उस ढलवा जमीन की तली में खोदे जाते, तो इसका बढ़िया आगोर या पायतन बन सकते थे। कौन-सी जमीन आगोर बन सकती है, इसका फैसला गाँव के बुजुर्ग किया करते थे।

टोबा : तकनीकी रूप से टोबा और नाडी में बहुत कम फर्क है। शुष्क क्षेत्र में जल संचय की यह एक पारम्परिक व्यवस्था है। प्राकृतिक रूप से गहरी हो गई पायतन वाली जगह ही टोबा कहलाती है। कम रिसावदार मिट्टी वाली जमीन, जो ढलान के नीचे हो, को ही टोबा बनाने के लिये चुना जाता है। अगर पायतन वाला इलाका अच्छा हो, पर ढलान खास न हो, तो ढलान बनाई जाती है। लोगों को और जानवरों को पानी उपलब्ध करने के साथ ही इसके आस-पास की जमीन में उगी घास पशुओं के चरने के काम आती है। पारम्परिक रूप से यह पानी और घास उपलब्ध कराने की संयुक्त व्यवस्था रही है। हर गाँव में जाति और समुदाय के हिसाब से पशुपालक पाँच या छह टोबा बनाते हैं।

और फिर हर जाति या समुदाय वाले पशुपालक अपने पशुओं को लेकर एक-एक टोबा में चले जाते हैं। इससे पशुओं के दूसरे इलाके में चरने का अन्देशा भी खत्म हो जाता है। चूँकि टोबे अलग-अलग दिशाओं में होते हैं, इसलिये इनके एक-दूसरे से सटे होने या एक के जानवरों के दूसरों में घुसने का खतरा भी नहीं होता। इससे चारे को लेकर होने वाले विवाद भी नहीं उठते। जब पशुओं के साथ पशुपालक भी गाँव से बाहर स्थित टोबो पर चले जाते हैं तो गाँव के जलस्रोतों पर दबाव कम हो जाता है। गाँवों में भी तब सिर्फ बच्चे और बूढ़े ही रह जाते हैं। इससे गाँव में साल भर पानी मिलना सम्भव हो जाता है। अपने टोबे का पानी चट हो जाने पर बाहर गए लोग गाँव के सामूहिक टोबे के पानी का प्रयोग करते हैं।

एक टोबे तक जाने वाले परिवारों की संख्या एक से 20 तक कुछ भी हो सकती है। टोबा के पानी को लेकर शायद ही कभी विवाद उठता होगा। जब मौसम की मार या अन्य कारणों से एक टोबे का पानी चूक जाता है तो उस पर निर्भर परिवारों को दूसरे टोबों में व्यवस्थित करना पड़ता है। यह काम आपसी सलाह-मशविरे और स्वीकृत से होता है। पर हर व्यक्ति को टोबा के रखरखाव और उपयोग सम्बन्धी पहले से तय कायदे कानूनों को मानना ही होता है। टोबा को बचाने और बढ़ाने के लिये उसके पायतन क्षेत्र को बढ़ाया जाता है और इसे लोग या जानवर बर्बाद न कर दें, इसका खास खयाल रखा जाता है। टोबा को भी बीच में गहरा किया जाता है जिससे ज्यादा पानी जमा हो सके और वाष्पीकरण से कम-से-कम नुकसान हो।8

कुंडी : थार मरुभूमि के रेतीले हिस्सों के ग्रामीणों की बरसाती जल संग्रह की एक अन्य पारम्परिक देसी प्रणाली है-कुंडी या कुंड। यह मुख्यतः पेयजल का भूमिगत नन्हा तालाब है जो ऊपर से ढका होता है। आमतौर पर मिट्टी और कहीं-कहीं सीमेंट से बनी कुंडियाँ राजस्थान के पश्चिमी शुष्क इलाके में हर कहीं मिलती हैं। इन इलाकों में जो थोड़ा-बहुत भूजल निकलता भी है वह आमतौर पर कम या ज्यादा खारा होता ही है। जैसे, बाड़मेर के करीब 76 फीसदी हिस्से के भूजल में घुले नमक की मात्रा प्रति दस लाख पर 1,500-10,000 कणों तक पाई जाती है। ऐसी जलवायु में भी कुंडी सुविधाजनक है। वह साफ और मीठा पानी उपलब्ध कराती है।

कुंडियाँ सामुदायिक भी हैं और निजी भी। कुछ अमीर किसानों के पास तो एक से ज्यादा अपनी कुंडियाँ होती हैं। पश्चिमी राजस्थान में कुंडी बनाने का पहला दस्तावेजी मामला सन 1607 में वाडी का मेलान गाँव के राजा सुर सिंह द्वारा एक कुंडी बनवाने का है। जोधपुर के मेहरानगढ़ किले में महाराजा उदय सिंह के शासनकाल में सन 1759 में एक कुंडी बनी थी। 1895-96 के भयंकर अकाल के समय कुंडियाँ बनाने का काम बड़े पैमाने पर शुरू हुआ। यह बहुत सम्भव है कि पश्चिमी राजस्थान में सन 1607 से भी पहले से कुंडियाँ बनती आई हों। बीकानेर से अनूपगढ़ के रास्ते पर स्थित जलवाली गाँव में करीब 300 कुंडियाँ हैं। चूँकि यह इलाका रेतीला है, इसलिये जहाँ कहीं भी ढलान मिली वहीं एक कुंडी बना दी गई है। हर परिवार के पास चार या पाँच कुंडियाँ हैं।

हर साल बरसात के पहले कुंडियों के आगोर को साफ कर देने पर सारा गाँव ध्यान देता है। आगोर में पशु चराना या जूते पहनकर जाना एकदम मना है। चूँकि कुंडी घर या गाँव के अन्दर होती है। इसलिये पानी लाने के समय की बचत भी होती है। अगर थार मरुक्षेत्र के निवासियों के घरों में कुंडी न हो तो उन्हें पानी के लिये ही गधे, ऊँट या बैलगाड़ी के साथ 10 से 15 किमी दूर तो जाना ही पड़ेगा। सफाई के साथ ही कुंडियों का पानी पीने के लिये भी आदर्श होता है। मरुक्षेत्र में पानी से जुड़ी बीमारियाँ बहुत आम हैं, पर कुंडियों के पानी से ये रोग नहीं होते।

कुंडी का आगोर कठौते जैसा होता है और ठीक बीच में कुंडी होती है। इसके प्रवेश मार्ग पर कांटेदार झाड़ियाँ काटकर डाल दी जाती हैं जो पानी के साथ तैरकर आने वाले सूखे पत्ते, घास वगैरह को ऊपर रोक देती हैं और साँप-गिरगिट वगैरह को भी अन्दर नहीं जाने देतीं। कुंडी के ऊपर ढक्कन होता है जिसे उठाकर बाल्टी वगैरह से पानी निकाला जाता है।

कुंड या कुंडी आमतौर पर गोलाकार होती है और जितनी उसकी गोलाई होती है, लगभग उतनी ही गहराई। ये आमतौर से 3 से 4.5 मीटर गहरी होती हैं। चूना, गारा और सीमेंट से इसका निर्माण किया जाता है। कुंडी की असली सफलता उसके आगोर पर निर्भर करती है। कुंडी को पूरा भरने के लिये आगोर बड़ा और ढलान वाला होना चाहिए। यह 20 वर्ग मीटर से लेकर दो हेक्टेयर तक का होता है। 2 से 3 फीसदी ढलान हो तो 2 हेक्टेयर का आगोर 200 घन मीटर क्षमता की कुंडी भरने के लिये पर्याप्त होता है।9

आगोर का निर्माण कई चीजों से किया जाता है। स्थानीय स्तर पर तालाब की गाद, मुर्रम, मिट्टी, राख और बजरी, जो कुछ उपलब्ध हो उसे कायदे से जमाकर आगोर तैयार किया जाता है। सतह को साफ करके उसे कुंडी की तरफ ढलान वाला बना लेते हैं और उस पर आमतौर पर तालाब या नाडी से निकाली गाद की एक मोटी परत बिछाकर जमा देते हैं। मानसून की पहली बरसात के बाद इस सतह को और पक्का करने के लिये उसे ठीक से ठोक-पीटकर बैठा देते हैं। जिन जगहों पर जिप्सम की परत जमीन से बहुत कम गहराई पर चलती है वहाँ यह व्यवस्था ज्यादा मजबूत करनी पड़ती है और अक्सर मुर्रम का उपयोग किया जाता है। जमीन साफ करके पहले इसकी परत बिखेरते हैं, उसे ठीक से जमा देते हैं, कुछ समय तक भेड़-बकरियों को उसके ऊपर चलाकर यह इन्तजाम भी करते हैं कि ज्यादातर रिसाव वाले छेद भर जाएँ। इस दौरान पानी छींटकर भी मिट्टी बैठाते जाते हैं। राख को सीधे तो नहीं, पर तालाब या नाडी की साद और मुर्रम के साथ प्रयोग करते हैं। राख उन रंध्रों को ज्यादा ऊँची तरह भर देती है। पहाड़ी जमीन हो तो बजरी का उपयोग किया जाता है।

जब बरसात कम हो तो कुंडियों की महत्ता कम पड़ जाती है। पर राजस्थानी मरुक्षेत्र के 11 जिलों में बरसात से सम्बन्धित जो 14 वर्षों का अध्ययन हुआ है वह इस आशंका को निराधार ही बताता है। उसके अनुसार जैसलमेर, पाली और सीकर को छोड़कर बाकी सभी जिलों में एक दिन में 25 मिमी बरसात वाले चार से छह दिन हुए ही हैं। इतनी बरसात में 100 वर्ग मीटर आगोर वाली कुंडी में बड़े आराम से 10,000 लीटर पानी जमा हो सकता है। 56 मीटर व्यास और 2,463 वर्ग मीटर के आगोर वाली कुंडी में 2,46,000 लीटर पानी जमा हो जाएगा। अगर हम मान लें कि बरसाती पानी का सिर्फ 40-50 फीसदी हिस्सा ही जमा हो सकता है तब भी यह आँकड़ा आसानी से एक लाख लीटर से ऊपर चला जाता है। जुटाए गए आँकड़ों से स्पष्ट है कि जिन इलाकों में 100 मिमी बरसात होती है वहाँ कुंडी व्यवस्था प्रभावी हो सकती है। अगर कुंडियों में पूरा पानी नहीं भी जमा हो पाया तो वे घर की टंकी की तरह तो उपयोग की ही जा सकती हैं जिनमें टैंकरों से लाया पानी रखा जा सके। अभी तो पानी न होने की स्थिति में टैंकर तब तक खड़े रहते हैं जब तक गाँव का हर आदमी घड़ों और अन्य बर्तनों में पानी न भर ले और फिर टैंकरों को बार-बार चक्कर लगाना होता है। कुंडियों को आसानी से एक बार में भरा जा सकता है।

कुईं और डाकेरियान : कुईं पश्चिमी राजस्थान के लोगों के कौशल का एक और उदाहरण है। कुईं, जिन्हें कहीं-कहीं बेरी भी कहा जाता है, अक्सर तालाब के पास बनाई जाती हैं जिनमें तालाब का रिसा पानी जमा होता है। इस प्रकार पानी की बर्बादी कम-से-कम हो पाती है। आमतौर पर ये 10 से 12 मीटर गहरी होती हैं और कच्चा ही रहती हैं। इनका मुँह अक्सर लकड़ी के पटरों से ढँका होता है जिससे लोग या पशु गिर न जाएँ।

कुईं आज भी बीकानेर के लूणकरणसर तहसील में बड़ी संख्या में पाई जाती हैं। जैसलमेर जिले में मोहनगढ़ और रामगढ़ के बीच के गाँवों में, जो भारत-पाक सीमा से लगे हैं, तथा फलोदी और दियातारा के बीच के गाँवों में भी बड़ी संख्या में कुइयाँ मौजूद हैं। बेरियों का पानी बचाकर रखा जाता है तथा जब और पानी खत्म हो जाये तब इसका उपयोग किया जाता है। 1987 में जब भयंकर सूखा पड़ा और काफी सारे तालाब सूख गए, तब भी बेरियों में पानी आ रहा था।

जल संसाधनों के अधिकतम सम्भव प्रयोग का स्थानीय ज्ञान एक आपात व्यवस्था डाकेरियान में झलकता है। जिन खेतों में खरीफ की फसल लेनी होती है वहाँ बरसाती पानी को घेरे रखने के लिये खेत की मेड़ें ऊँची कर दी जाती हैं। यह पानी जमीन में समा जाता है। फसल कटने के बाद खेत के बीच में एक छिछला कुआँ खोद देते हैं जहाँ इस पानी का कुछ हिस्सा रिसकर जमा हो जाता है। इसे फिर से काम में ले लिया जाता है।

खड़ीन : पश्चिमी राजस्थान के पारम्परिक जल प्रबन्धों की गुण-गाथा तब तक पूरी नहीं होगी जब तक हम खड़ीनों की चर्चा न कर लें। यह बहुत पुरानी और वैज्ञानिक व्यवस्था है। शुष्क क्षेत्र के वैज्ञानिकों का मानना है कि इनकी आज भी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। खड़ीन या धोरा की तकनीक 15वीं सदी में जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों ने विकसित की थी। दरबार उन्हें जमीन देते थे और खड़ीनें विकसित करने को कहते थे। जमीन राजा की रहती थी और उपज का एक-चौथाई हिस्सा उन्हें जाता था। इस प्रकार पालीवालों ने पूरे जैसलमेर में खड़ीनें खड़ी कीं। आज भी करीब 500 छोटी-बड़ी खड़ीनें यहाँ हैं और इनसे 12,140 हेक्टेयर जमीन सिंचित होती है।10 पास के जोधपुर, बाड़मेर और बीकानेर जिले में भी खड़ीनें हैं।

सिंचाई की यह विधि ई.पू. 4500 के आस-पास उर (मौजूदा ईरान) और बाद में मध्य-पूर्व में प्रयोग में लाई जाने वाली सिंचाई विधियों से बहुत ज्यादा मेल खाती है। नेगेव रेगिस्तान में भी ऐसी एक विधि 4,000 वर्ष पूर्व प्रयोग में लाई जाती थी और करीब 500 वर्ष पूर्व दक्षिण-पश्चिमी कोलोराडो में भी यही विधि अपनाई गई थी। खड़ीन बरसाती पानी को खेती वाली जमीन में रोकने और बाद में इस पानी से नम जमीन पर खेती करने वाली प्रणाली है। जैसलमेर के शुष्क इलाके में अधिकांश फसलों की पानी सम्बन्धी जरूरतें सिर्फ मानसून की बरसात से पूरी नहीं होतीं। एक तो बरसात भी बहुत भरोसे की नहीं होती और जमीन भी रेत की ढूह और कंकरीली या चट्टानी है। इसलिये बरसात के सहारे बड़े पैमाने पर खेती कर पाना सम्भव नहीं है। पर ऐसी प्रतिकूल जलवायु में भी लोगों ने खड़ीनों के सहारे खेती का विकास किया है।

शुरुआती ब्रिटिश अधिकारियों के अनुसार, इस इलाके में सर्दियों वाली अर्थात रबी की फसल को सींचने की किसी भी कोशिश को दंडनीय अपराध माना जाता था। यह माना जाता था कि प्रकृति सबका पेट भरेगी और उसके कायदे-कानूनों से छेड़छाड़ करना गलत है। माना जाता है कि यह खयाल सलीम सिंह नामक कुख्यात मंत्री ने पालीवाल ब्राह्मणों को तबाह करने के लिये प्रचारित कराया था। पालीवालों ने खड़ीनें खड़ी करने में अपनी काफी पूँजी लगा रखी थी। यहाँ बारहमासी सोते नहीं हैं, कुएँ बहुत गहरे हैं और बरसात बहुत कम होती है। ऐसी जगह में भी जब आस-पास पहाड़ियाँ हों और जमीन चट्टानी हो तो खड़ीनों से सिंचाई सम्भव बना दी गई थी। जब पालीवाल ब्राह्मणों को निकाल बाहर किया गया तब खड़ीनें भी उपेक्षित हो गईं। तब राजदरबार ने लोगों से खड़ीनें बनाने और उनकी देखभाल करने को कहा।

खड़ीन मिट्टी का एक बड़ा बाँध है जो किसी ढलान वाली जमीन के नीचे बनाया जाता है जिससे ढलान पर गिरकर नीचे आने वाला पानी रुक सके। अक्सर यह 1.5 मीटर से 3.5 मीटर तक ऊँची होती है। यह ढलान वाली दिशा को खुला छोड़कर बाकी तीन दिशाओं को घेरती है। जमीन की बनावट के हिसाब से इनकी लम्बाई 100 से 300 मीटर तक होती है। इससे घिरी जमीन की नमी ही नहीं बढ़ती, बरसाती पानी के प्रवाह पर अंकुश लगाने के चलते यह उपजाऊ मिट्टी के बहाव को भी रोकती है।

खड़ीनें ऐसी कंकरीली और चट्टानी जमीन को भी खेती लायक बना देती हैं जो आमतौर पर सिर्फ पशुओं की चराई के लिये ही प्रयोग होती है। पानी को निचले मैदानी इलाके पर घेर दिया जाता है, जहाँ पानी की मात्रा के हिसाब से एक या दो फसलें ली जाती हैं। जब कम बरसात हो तो सिर्फ खरीफ की फसल ही ली जाती है। बरसात अच्छी हो तो रबी की फसल भी उसी जमीन पर उगा ली जाती है। यह प्रणाली सबसे शुष्क इलाके में भी किसानों को कम-से-कम एक फसल तो दे ही देती है।

खड़ीनें जमीन और आस-पास की बनावट के हिसाब से बन सकती हैं। इन्हें कहीं भी खड़ी नहीं कर सकते। जमीन की बनावट के लिहाज से जहाँ दो चीजें-तीखी ढलान वाला चट्टानी आगोर और फसल उगा सकने वाली मिट्टी का निचला मैदान – हों, वहाँ खड़ीन खड़ी की जा सकती है।

जिस जगह पर पानी आकर खड़ा होता है उसे खड़ीन और पानी रोकने वाले बाँध को खड़ीन बाँध कहते हैं। बरसात के चरित्र, आगोर की स्थिति और मिट्टी का हिसाब देखकर ही खड़ीन का आकार तय होता है। खड़ीन को कितना ऊँचा उठाना है, इसी हिसाब से इसका निचला हिस्सा बनाया जाता है।10 इन बाँधों को तेजी से बहकर आते पानी के आगे टूटने न देने के हिसाब से भी बनाया जाता है। अतिरिक्त पानी को ऊपर से निकल जाने दिया जाता है। खड़ीन में सबसे गहराई वाली जगह पर फाटक भी बना दिया जाता है, जिससे यहाँ से जरूरत के अनुसार पानी निकाला भी जा सके। तेज बहाव वाले पानी को रोकने की क्षमता रेतीली मिट्टी में कम और अच्छी मिट्टी में ज्यादा होती है।

अगर जमीन एकदम शुष्क हो तो पानी के बहाव की रफ्तार वैसे भी कम हो जाती है। जब तेज बरसात हो तो ढलान पर पानी तूफानी रूप ले लेता है। ढलान और आगोर पर भी पानी के बहाव की रफ्तार निर्भर करती है। खड़ीन में जमा पानी रिसकर जमीन को तर करता है। खड़ीनों में ढलान से उतरने वाला 50 से 60 फीसदी पानी ही जमा हो पाता है। बाकी वाष्पीकरण, रिसाव वगैरह के माध्यम से गायब हो जाता है। खेती लायक पानी जमा करने के लिये खड़ीन और आगोर का आदर्श अनुपात 1 और 15 का होना चाहिए। अनुपात इससे ज्यादा हो तो और भी अच्छा। पुरानी खड़ीनों में अनेक ऐसी हैं जिनमें मात्र 76 से 101 मिमी की बरसात से ही भरपूर पानी जमा हो जाता है।10

 

सारिणी 2.7.10 : खड़ीन बाँध के अन्दर और बाहर की जमीन में खारापन

खड़ीन

गहराई (सेमी)

विद्युत चालकता

खड़ीन के अन्दर

खड़ीन के बाहर

रुपसी

0-20

3.6

58.0

20-60

1.6

33.0

60-90

0.7

15.5

90-120

0.8

14.4

भोजका

0-20

0.8

36.17

20-60

0.8

2.24

60-90

1.14

4.45

90-120

1.12

-

टिप्पणी : चालकता माइक्रोम प्रतिघंटा/सेमी में मापी गई

स्रोत : ए.एस. कोलारकर

 

मानसून की अनिश्चितता अन्न की पैदावार पर ज्यादा असर न डाले, इसी को ध्यान में रखते हुए जुलाई में पहली बरसात के तत्काल बाद बाजरा बो दिया जाता है। इसके बाद 60-70 मिमी भी बरसात हो गई तो यह बाजरा के लिये पर्याप्त होती है। जमीन की नमी को देखते हुए बाजरा, ज्वार या गुआर की फसल लगाई जाती है। इनके साथ ही मोठ, मूँग और तिल जैसी दलहन और तिलहन की फसलें भी लगा दी जाती हैं। खेतों में घिरा पानी पूरे मानसून भर जमा रहता है और उसके बाद रबी की फसल लगाई जाती है।

मरु प्रदेश में वर्षा कम तो होती है, पर कई बार यह बहुत कम समय में ही एकदम तूफानी रफ्तार से गिरती है। फिर ढलान पर पानी एकदम तेज रफ्तार से उतरता है। यह अनुमान है कि 100 हेक्टेयर तक के कई चट्टानी आगोरों से एक बरसात में 1,00,000 घन मीटर तक पानी जमा होकर नीचे आ सकता है। इस प्रकार खड़ीनों पर काफी पानी जमा होता है और यह 50 से लेकर 125 सेमी तक ऊँचा हो सकता है। साल में 80 से 100 मिमी बरसात, जो कम-से-कम दो-तीन दफे तेज पानी पड़ने के रूप में आये, भी खड़ीनों को भरने और रबी तक की फसल देने के लिये पर्याप्त है।11 यह पानी धीरे-धीरे नवम्बर तक सूखता है और तब जमीन में गेहूँ और तिलहन जैसी रबी की फसल बोने लायक नमी रहती है। फलोदी के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में तरबूज भी खूब उगाए जाते हैं। गेहूँ और चना भी बोया जाता है। अगर फसल लगाने के समय तक पानी टिका हो तो पहले फाटक खोलकर उस पानी को निकाल दिया जाता है। आमतौर पर रबी की फसल को कोई रासायनिक खाद देने की जरूरत नहीं पड़ती। मार्च तक फसल तैयार हो जाती है।

खड़ीन की खेती में न तो बहुत जुताई-गोड़ाई की जरूरत होती है, न रासायनिक खाद और कीटनाशकों की। फिर भी बाजरा की पैदावार प्रति हेक्टेयर 3 से 5 क्विंटल तक हो जाती है। अच्छी बरसात हो और पर्याप्त पानी जमा हो जाये तो गेहूँ की फसल प्रति हेक्टेयर 20 से 30 क्विंटल और चने की फसल प्रति हेक्टेयर 15 से 25 क्विंटल हो जाती है। राजस्थान नहर से सिंचित खेतों की पैदावार की तुलना में यह पैदावार भले ही कम दिखे, पर यह भी याद रखना जरूरी है कि यह फसल बिना ज्यादा परिश्रम, ज्यादा खर्च और झमेले के हो जाती है और इतने मुश्किल इलाकों में भी फसल का भरोसा रहता है।10

खड़ीनों में जमा पानी अपने साथ बारीक और उर्वर मिट्टी भी लाता है। इसलिये खड़ीनों की मिट्टी की प्रकृति बदल जाती है और यह वहीं के दूसरे खेतों की तुलना में ज्यादा उर्वर हो जाती है। इसमें जैव कार्बन पदार्थों की मात्रा 0.2 से 0.5 फीसदी तक हो जाती है, जो आस-पास की जमीन से बहुत अधिक है। फिर इसमें पोटैशियम ऑक्साइड की मात्रा भी ज्यादा होती ही है। आगोर क्षेत्र में चराई भी होती है, सो पशुओं के गोबर और पेशाब की उर्वरता भी इसमें आ जाती है।

खड़ीनों से ढलान वाली मिट्टी में लवणों के बढ़ने पर भी अंकुश लगता है। मरुभूमि में जहाँ भी पानी जमा होता है, वहाँ जिप्सम की परत ऊपर होने से नुकसान होता है। पर पुरानी खड़ीनों में लवणों की मात्रा हल्की ही आई है। हाँ, खड़ीन बाँधों की दूसरी तरफ, जहाँ रिसकर पानी पहुँचता है, लवणों की मात्रा ज्यादा पाई जाती है। स्पष्ट है कि खड़ीनों में आने वाले लवण खुद-ब-खुद बाहर फेंके जाते हैं। पानी के साथ आने वाली मिट्टी साल-दर-साल खड़ीन के अन्दर वाली जमीन का स्तर थोड़ा-थोड़ा ऊपर करती जाती है और कुछ वर्षों में ही खड़ीन के अन्दर और बाहर की मिट्टी के स्तर और किस्म में काफी फर्क आ जाता है। पुरानी खड़ीनों में तो ऊँचाई का फर्क चौथाई से एक मीटर तक का हो गया है। इस फर्क के चलते भी खड़ीन में जमा पानी का रिसाव बाहर की तरफ होता है और लवण घुलकर बाहर निकल जाते हैं। अनेक स्थानों पर खड़ीनों के बाहर कुआँ खोद दिया गया है और इस कुएँ में भरपूर पानी आता है, जिसका उपयोग पीने और अन्य कार्यों में भी होता है। इससे रिसाव तेज होता है और इस क्रम में खड़ीन के अन्दर की जमीन से लवणों के बाहर जाने का क्रम भी तेज होता है (देखें सारणी 2.7.10 और 2.7.11)।12

अध्ययनों से स्पष्ट हो जाता है कि जैसलमेर जिले के खड़ीन वाले किसानों की स्थिति बिना खड़ीन वाले किसानों से काफी अच्छी है (देखें सारणी 2.7.9)।12 पर यह भी स्पष्ट है कि खड़ीनों की स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है। चूँकि अधिकांश खड़ीनों का निर्माण पालीवाल ब्राह्मणों ने किया था, सो जब उनको बाहर भगाया गया तब इसके कौशल में गिरावट आई। फिर इनका रख-रखाव भी उपेक्षित हुआ। बाढ़ के साथ कंकड़-पत्थर और मोटा रेत भी आ जाता है और खड़ीनों में जमा हो जाता है। आगोर क्षेत्र में बर्बादी होने से यह क्रम तेज हुआ है। इससे मिट्टी भरने का क्रम भी बढ़ा है। उपेक्षा के चलते अनेक खड़ीन बाँध टूट गए हैं या उनमें दरार आ गई है, इनके चलते अब वे पानी को नहीं रोक पाते।

खड़ीनों की गिरावट का सबसे बड़ा कारण खड़ीन भूमि की पारम्परिक मिल्कियत वाली व्यवस्था का गड़बड़ा जाना है। जनसंख्या बढ़ने और संयुक्त परिवारों के टूटने से जमीन भी बँटी है। खडीन के लिये बड़ी जमीन चाहिए या फिर सहकारी प्रयास होनी चाहिए। जमीन के बँटते-बिखरते जाने से यह काम ज्यादा मुश्किल होता गया है।

खड़ीन व्यवस्था को ठीक से चलाने के लिये उसके आगोर क्षेत्र को फिर से हरा-भरा बनाना होगा। इसमें चराई जरूरी है और लाभप्रद भी, पर एक सीमा तक ही। सिंचित जमीन को भी बराबर समतल करते रहना चाहिए जिससे पानी का समान वितरण हो। ऐसा न करने पर पानी जहाँ-तहाँ जमा होगा और उसका कुशलतापूर्ण उपयोग नहीं हो पाएगा। तेज बारिश के बाद तूफान की रफ्तार से आया पानी अपने साथ कंकड़-पत्थर और मोटा रेत लाकर खड़ीन में भर सकता है। इनको समय-समय पर निकालते रहना चाहिए। मिट्टी में लवणों की मात्रा पर भी नजर रखनी चाहिए और अगर ये बढ़े हुए दिखें तो पहली एक-दो बरसात का पानी बह जाने देना चाहिए, क्योंकि उसके साथ में अतिरिक्त लवण भी बह जाएँगे। खड़ीन बाँध के बाहर कुआँ खोदने से भी यह काम हो जाता है। बाँध का उचित रख-रखाव किया जाना चाहिए। इसकी ऊँचाई 1.5 मीटर से कम नहीं होनी चाहिए और इसमें दरार नहीं आनी चाहिए। सामान्य स्थिति में पानी को ऊपर से निकलने भी नहीं देना चाहिए।

अनेक पुरानी खड़ीनें आज उपेक्षित हैं, पर असंख्य खड़ीनें आज भी उपयोगी हैं। इनके महत्त्व को मानकर राजस्थान सरकार ने भी नई खड़ीनें बनवाने की योजना बनाई है। सातवीं योजना में इसके लिये 6.95 करोड़ रुपए का प्रावधान था (देखें सारणी 2.7.8)।

स्वयंसेवी संगठनों ने भी इधर खड़ीनें बनवाने का काम शुरू किया है। ग्रामीण विकास विज्ञान समिति ने जोधपुर जिले में गरीब किसानों की जमीन पर 86 खड़ीनें बनवाई हैं। अपने इस काम के मूल्यांकन में समिति का मानना है कि खड़ीनों से उत्पादकता निश्चित रूप से बढ़ी है। सूखे के समय चारे की उपलब्धता भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।

 

सारिणी 2.7.11 : खड़ीन के अन्दर और बाहर के भूजल का खारापन

खड़ीन

जुलाई-सितम्बर

नवम्बर-दिसम्बर

जनवरी-फरवरी

अन्दर (*)

बाहर (*)

अन्दर (*)

बाहर (*)

अन्दर (*)

बाहर (*)

रुपसी

298

648

447

938

667

1,520

मसर्डी

169

814

466

639

709

4,381

परट

140

213

180

497

-

-

भोजका

219

532

438

649

591

812

टिप्पणी : क्षारीयता (खारापन) विद्युत चालकता के हिसाब से मापी जाती है जो माइक्रोम प्रति घंटा/सेमी के हिसाब से मापी जाती है। चालकता ज्यादा का अर्थ क्षारीयता ज्यादा होना है।

स्रोत : ए.एस. कोलारकर

 

पर खड़ीनों को पुनर्जीवित करने का काम बहुत सरल नहीं रहा है। समिति को इसके लिये कई तरह की परेशानियाँ भी उठानी पड़ी हैं। जगह के चुनाव की गड़बड़ से भी तकलीफ हुई। कौन किसान लाभ में रहे, कौन छूटे-इसको लेकर भी विवाद उठे। खड़ीन के अन्दर की जमीन के बँटवारे पर भी झमेले उठे। पानी के बँटवारे पर भी किसानों ने शिकायतें कीं। जमीन की मिल्कियत में गैर-बराबरी से खड़ीनों के विकास में बाधा आई। खड़ीनों को सफल करने के लिये उनके प्रबन्ध में सभी किसानों की भागीदारी जरूरी है।

समिति द्वारा बनवाई कुछ खड़ीनों में तकनीकी खामियाँ भी दिखीं। 1988 में जब भारी बरसात हुई तब कई खड़ीनों में दरारें आ गईं। बाँध इतने मजबूत नहीं थे कि बाढ़ का पानी रोक सकें। फिर अनेक किसान खड़ीन की नाजुक खेती को समझ पाये हैं। नमी-खुदाई का हिसाब ठीक से न जान पाने के चलते उनको फसलों का नुकसान भी उठाना पड़ा। अगर तेज बरसात एक फसल को बहा ले जाये तो फिर दूसरी फसल लगाने लायक साधन उनके पास नहीं होते। पर समिति द्वारा शुरुआत करने के बाद खड़ीनों के चलन ने जोर पकड़ा है और अनेक गाँवों के लोगों ने समिति से अपने यहाँ खड़ीनें खड़ी करने में मदद माँगी है।

समिति ने यह भी पाया कि तकनीक के स्तर पर भले ही खड़ीनें कितनी भी अद्भुत क्यों न हों, इससे भूतल के जल के समान वितरण को निश्चित रूप से बढ़ावा नहीं मिलता। खड़ीन से किसको लाभ होगा यह प्राकृतिक बनावट और खड़ीन के अन्दर आने वाली जमीन के संयोग पर ही बहुत हद तक निर्भर करता है। जिस आदमी का खेत खड़ीन में या उसके पास होगा, उसको दूर वाले खेत के मालिक से ज्यादा लाभ मिलेगा ही। इससे किसानों में असमानता पैदा होती है। पहले संयुक्त परिवारों के चलते जमीन बिखरी और बँटी नहीं थी। अक्सर खड़ीन वाली जमीन एक या दो परिवारों की होती थी, पर परिवार बिखरने से आज विवाद बहुत आम हो गए हैं।

आज अधिकांश खड़ीनों की पैदावार में समान बँटवारा नहीं होता। सिर्फ आगोर क्षेत्र का रख-रखाव सामूहिक तौर पर होता है और खेतों की रखवाली होती है।

आगे चलकर गैर-बराबरी ज्यादा बड़े विवाद का कारण बन सकती है-खासतौर से खड़ीन के अन्दर और दूर वाले खेतों के मालिकों के बीच। इससे सामुदायिक भागीदारी खत्म हो सकती है, जिसके बल पर ही यह प्रणाली विकसित हुई है और अभी तक चली आ रही है। अनेक किसानों ने समिति से शिकायत की कि उनकी जमीन के सामने बाँध बन जाने से वे पहाड़ों से ढलकर आने वाले पानी का उपयोग भी नहीं कर पाते। यह मुद्दा आगे विवाद बढ़ा सकता है।

2. गुजरात


थार मरुभूमि गुजरात के पूरे कच्छ क्षेत्र के साथ ही जामनगर, बनासकांठा, मेहसाणा, अहमदाबाद, सुरेंद्रनगर, राजकोट और जूनागढ़ के कुछ-कुछ भागों तक पसरी है। जमीन बनावट के लिहाज से गुजरात कच्छ का रण और जलोढ़ मैदानों से बना है। पूर्व और उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ते जाने पर जमीन की ऊँचाई भी बढ़ती जाती है (समुद्र तल से 300 मीटर या अधिक) और मध्य में काठियावाड़ और कच्छ अरब सागर में निकले प्रायद्वीपीय इलाके हैं। इस प्रायद्वीपीय इलाके को सौराष्ट्र कहा जाता है।

थार मरुभूमि में आने वाले गुजरात के तीन जिलों में भी काफी फर्क है। बनासकांठा मुख्यतः रेतीला मैदानी इलाका है जिसमें रेत के टीलों के बीच जगह-जगह काली मिट्टी की पट्टी मिलती है।14 बनास नदी जिले को लगभग बराबर दो हिस्सों में बाँटती है। उत्तरी और उत्तर-पूर्वी इलाका ऊँचा और पहाड़ियों वाला है, जिसमें परिवहन बहुत मुश्किल है। बाकी हिस्सा मुख्यतः समतल है, जिसमें कहीं-कहीं गाछ-वृक्ष हैं। लेकिन धुर उत्तर या दक्षिण में शायद ही कहीं हरियाली दिखती है। पूरे पूर्वी सीमावर्ती इलाके में नमक वाला दलदला क्षेत्र ही भरा है।14

काठियावाड़ प्रायद्वीप पहले एक द्वीप ही था और यह ज्वालामुखी फटने से अपने मौजूदा स्वरूप में आया है। जामनगर जिला इसी का एक हिस्सा है। इलाके की बनावट एक जैसी नहीं है और पर्वत शृंखलाएँ इसे कई जगह काटती हैं। रण से यह उत्तर और पूर्व में बँटता है, जबकि रेत के ढूह उत्तर और पश्चिम में तट से लगे इलाकों में हैं। समुद्री ज्वार के समय तटीय प्रदेश पानी में डूबा रहता है।15

कच्छ प्रायद्वीप कच्छ जिले से भी कुछ आगे जाता है और दक्षिण-पश्चिम को छोड़कर रण से घिरा है। यहाँ न तो पेड़-पौधे हैं, न हरियाली। पूरा इलाका उजाड़ तथा पथरीला है। पर इसके भी रंग-रूप में काफी अन्तर आता गया है। कच्छ प्रायद्वीप में पहाड़ियाँ और गुमसुम खड़ी चोटियाँ हैं। यहाँ खामोश और काफी गहराई में पड़ी नदियों के मार्ग हैं, तो घाटियों में काफी अच्छी खेती और हरे-भरे इलाके भी हैं। दक्षिणी हिस्से में समुद्र तट से लगी ऊँची रेतीली पट्टी से लगी हुई उर्वर जमीन की 32 से 48 किमी चौड़ी पट्टी भी है जिस पर बहुत व्यवस्थित ढंग से खेती होती है। इसके बाद तीन पर्वत शृंखलाएँ-कच्छ, पूर्व में वागाड और उत्तर में रण, इसे अलग-अलग हिस्सों में बाँटती हैं। कच्छ का रण वाला हिस्सा भी दो भागों-उत्तर का बड़ा रण और पूरब का छोटा रण में बँटा है। यह पूरा इलाका स्थानीय मौसम से कई तरह से प्रभावित होता है। दोनों रणों का पानी खारा है।

दोनों रण बाकी समय सूखे रहते हैं, जबकि बरसात में एकदम पानी भर जाता है। छोटे रण का पानी भरकर नल झील होकर कच्छ की खाड़ी में गिरता है। इस पूरे इलाके में अप्रैल से अक्टूबर तक तेज हवाएँ चलती हैं, जिनके साथ कभी-कभी वर्षा और कई बार बाढ़ भी आती है। इस बाढ़ का पानी भी मुख्यतः खारा होता है।

जब यह पानी सूखता है तो पूरी जमीन पर कंकड़-पत्थर, घोंघा-सीप के कवच और नमक की परत बिछी होती है। गर्मी बढ़ने के साथ ही जमीन भी कठोर होकर फटने लगती है। सूरज की चकाचौंध और नमक की सफेदी मिलकर मृगमरीचिका पैदा करते हैं। पानी सिर्फ कुछ उठी हुई चट्टानी जमीन पर मिलता है और उसके आस-पास उगी घास और झाड़ियाँ दूर से ही उसकी मौजूदगी बता देती हैं। रण जून से नवम्बर तक पूरा डूबा रहता है और इसके बाद फरवरी तक काफी सारा दलदल मौजूद होता है। बड़े रण नकी तुलना में छोटा रण जल्दी सूखता है। कच्छ जिले का तटीय हिस्सा 352 किमी लम्बा है और यहाँ नौ बन्दरगाह हैं। तट वाला इलाका आमतौर पर समतल है और जहाँ-तहाँ समुद्र तल में मिलने वाले सोते ही इसे काटते हैं।

पारम्परिक कुएँ और तालाब : गुजरात में जल संचय के पारम्परिक ‘उपकरण’ कुएँ और तालाब ही हैं। कच्छ क्षेत्र से अनेक सोते बहते हैं, पर उनमें से अधिकांश मौसमी हैं और अक्सर उनका पानी खारा ही होता है जिसे पिया नहीं जा सकता। कई बार नदियों के तल में कुआँ खोदकर पीने का पानी निकाला जाता है। गर्मियों में तो नमक की मात्रा इतनी बढ़ जाती है कि उसे पशु भी नहीं पी सकते। मीठा पानी बड़े मजे से 4.5 से 13.7 मीटर की गहराई पर मिल जाता है और भरपूर मात्रा में निकलता है। रेतीली मिट्टी के चलते बरसाती पानी को संचित कर पाना बहुत मुश्किल होता है और 20 में से शायद ही एक तालाब का पानी पूरे वर्ष रह पाता है। घाटी वाली जमीन पर मुख्यतः मोटे अनाज उगाए जाते हैं। अगर बरसात समय पर आ गई तो मोटे अनाजों को पानी की जरूरत नहीं पड़ती। यदि बरसात में देरी हो तो खेत को जोत-कोड़ कर बीज डाल दिया जाता है और पौधों के एक फुट का हो जाने पर उनकी सिंचाई की जाती है। नदियों की तलहटी वाली रेत पर तरबूज और खरबूज की खेती होती है।

काठियावाड़ में भूजल का स्तर काफी ऊँचा है और इसके चलते असंख्य कुएँ मौजूद हैं। खूबसूरत सीढ़ियों और मेहराबों वाली बावड़ियाँ भी यहाँ हैं।

बावड़ी : बावड़ियाँ वैसे तो पूरे राजस्थान में हैं, पर उत्तरी और मध्यवर्ती राजस्थान में इनकी संख्या ज्यादा है। कच्छ क्षेत्र में बावड़ियाँ बहुत कम हैं और कम खूबसूरत भी हैं। गुजरात में इन्हें वाव या वावडी कहा जाता है जबकि राजस्थान और उत्तर भारत में बावड़ी या बावली। गुजरात में बावड़ियों का निर्माण मुश्किल जलवायु के प्रति लोगों की अद्भुत जिजीविषा का प्रमाण है। बावड़ियाँ अक्सर तालाबों, कृत्रिम झीलों या सरोवरों के पास बनी हैं और गुजरात के थार क्षेत्र के लोगों की पानी की जरूरतें पूरी करती हैं। 18वीं सदी में प्रकाशित मीरात-ए-अहमदी में अली मुहम्मद खां ने लिखा था, “गुजरात में अनेक नदियाँ और असंख्य तालाब तथा बावड़ियाँ हैं।”

इतिहासकारों के अनुसार, बावड़ियों को काल के हिसाब से चार वर्गों में बाँटा जा सकता है: पूर्व-सोलंकी काल (8वीं से 11वीं सदी), सोलंकी काल (11वीं से 12वीं सदी), वाघेला काल (मध्य 13वीं से 14वीं सदी) और सल्तनत काल। बावड़ी का निर्माण काफी रस्मों-पूजाओं से जुड़ा था और ये लोगों के जीवन की एक महत्त्वपूर्ण घटना हुआ करती थीं। बड़े तालाब, बावड़ी या कुएँ का निर्माण राजा या गाँव के प्रधान द्वारा जमीन पर निशान लगाने और पूजा करने से होता था। इस बीच पुजारी मंत्रोच्चार करते थे। यह वास्तु पूजन होता था। बाद में इलाके के लोग एक जानकार आदमी की देखरेख में खुदाई करते थे। अक्सर खुदाई फसल कटने के बाद होती थी जब गर्मी बहुत बढ़ चुकी होती थी और जमीन एकदम सूखी होती थी। खुदाई के बाद सीढ़ियों का निर्माण बहुत सजधज से होता था। फिर ब्राह्मण पुजारी पूजा करने के बाद इसके पानी को पवित्र और उपयोग लायक घोषित करता था।

बावड़ियों की सजावट और निर्माण की खूबसूरती बताती है कि उन्हें बनाने वाले उनसे कितना अपनापन महसूस करते थे और ये लोगों के पारम्परिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में क्या महत्त्व रखती थीं। औरतें बावड़ी की देवी को नारियल, अन्न और दूध चढ़ाकर अपने लिये अच्छा घर-वर-सन्तान माँगा करती थीं। शादी के बाद नवविवाहित जोड़ा बावड़ी पर जाकर जल देवी को प्रणाम करता था और उनसे अपना घर सन्तानों से भरा होने का आशीर्वाद माँगता था। इनमें से कई रस्में आज तक होती हैं।

बावड़ियों के कई उपयोग थे। वे कहाँ अवस्थित हैं, इसी से उनका उपयोग भी निर्धारित होता था। अगर कोई बावड़ी गाँव से सटी है तो यह लोगों की रोजाना की जरूरतों के अलावा गरम दोपहरिया में लोगों की बैठकी के काम भी आती थी। अगर यह गाँव से बाहर व्यापार मार्ग पर होती थी तो मुख्यतः यहाँ व्यापारी ठहरते और इसका उपयोग करते थे। पाटण से सौराष्ट्र के सैनिक और व्यापार मार्ग पर अनेक बावड़ियाँ स्थित थीं।

बावड़ियों के पानी में घुला नमक, खनिज पदार्थ और अन्य रसायनों में कई बार यह गुण होता है कि वे अपने सम्पर्क में आई चीजों की चमक, धार और मजबूती बढ़ा देती हैं। इनसे कपड़ों और हथियारों को चमकाना आम था। सौराष्ट्र की सरी नामक बावड़ी का पानी तलवारों पर शान चढ़ाने के लिये प्रसिद्ध था।

आज पूरे गुजरात में बावड़ियों और सीढ़ीदार तालाबों के खण्डहर बिखरे पड़े हैं। कभी सामाजिक और धार्मिक महत्त्व का स्थान रही ये बावड़ियाँ आज साँपों, चमगादड़ों और कबूतरों का अड्डा बनी हुई हैं। अब तो बावड़ियाँ बनाने की कला भी तेजी से विलुप्त हुई जा रही है। कुआँ खोदने वाले ढूँढ़े नहीं मिलते और उन्होंने दूसरे पेशे अपना लिये हैं। पर स्थानीय जमीन और चट्टानों की बनावट, पानी के स्तर, खुदाई और निर्माण के बारे में अनुभव और जानकारी न रहने के बाद यह काम बहुत मुश्किल हो जाएगा।

बावड़ियों का पतन असल में सामाजिक गिरावट से जुड़ा है, क्योंकि पहले स्थानीय समुदाय ही इनका निर्माण और रख-रखाव करता था। केन्द्रीकरण और खेती बढ़ने के दबाव ने भी इस पारम्परिक प्रणाली को ध्वस्त किया है। पहले इस हिसाब से पानी लिया जाता था कि कितना प्राकृतिक पानी फिर से भरेगा। पर आधुनिक तकनीक और खेती भूजल के स्तर या मात्रा की परवाह नहीं करती।

गुजरात में जल संचय की सबसे पुरानी प्रणालियाँ तालाबों वाली थीं। वहाँ की भौगोलिक बनावट और जलवायु भी तालाबों के अनुकूल थी। इसलिये हर गाँव में एक या दो तालाब तो मिलेंगे ही। इनका निर्माण पीने के पानी और सिंचाई, दोनों की जरूरतों के लिये होता था या फिर ये मन्दिर परिसर का हिस्सा हुआ करते थे, जैसा कि कच्छ के नारायण सरोवर के साथ है।

आज अनेक तालाब भी समाप्ति की कगार पर हैं। अनेक तो पूरी तरह सूख गए हैं और कई के ऊपर तो बच्चे क्रिकेट-फुटबाल खेलते हैं। कई जगहों पर पूरा तालाब ही अवैध कब्जों और निर्माण का शिकार बन गया है और अब वहाँ तालाब का कोई चिन्ह भी मौजूद नहीं है। इनकी गिरावट भी सामाजिक समन्वय और मेलजोल में आई गिरावट से जुड़ी है, क्योंकि पहले स्थानीय समुदाय ही इनका निर्माण और रख-रखाव किया करता था। आज तालाबों का निर्माण और रख-रखाव सरकार ने अपने हाथों में ले लिया है। गाँव की पुरानी संस्थाएँ नष्ट हो चुकी हैं। लोग अब तालाबों की गाद साफ करने की ‘झंझट’ उठाने की जगह टोंटी वाला पानी चाहते हैं। सौराष्ट्र का एक ग्रामीण कहता है, “पहले तो काम हर आदमी का जिम्मा था, आज किसी का भी जिम्मा नहीं रह गया।”

अन्य व्यवस्थाएँ : गुजरात में जल संचय की कई अन्य प्रणालियाँ भी थीं। असंख्य कुंड थे, भले ही उनकी संख्या राजस्थान से कम हो। कुंडों के अन्दर कुएँ भी थे। सम्भवतः कुंडों का निर्माण ग्रीक शासनकाल में गुजरात में ही दामोदर कुंड के निर्माण से शुरू हुआ था। कुंडों का मुख्य उपयोग तो सिंचाई के लिये ही होता था। वाधवाणा का मोरार कुंड सिंचाई के लिये ही बना था। कई कुंड चमड़ा गलाने, धोने या कपड़ों की रंगाई-धुलाई के लिये भी बने थे। कुंड वाव कम थे, पर एक तरह के सीढ़ीदार तालाब ही थे। इनमें तीन तरफ से सीढ़ियाँ थीं और चौथी तरफ से पानी निकालने का इन्तजाम। ऐसी व्यवस्थाएँ मुख्यतः उत्तर-पूर्वी गुजरात में ही हैं।

अन्य भूमिगत व्यवस्थाओं में गुफा, हौज, टंकी और कच्चे कुएँ थे, जो गुजरात में जगह-जगह मिलते हैं। जूनागढ़ के उपरकोट में बौद्ध काल का सामूहिक स्नानागार भी एक विलक्षण चीज है, जिसमें एक बड़े कुंड के आस-पास स्नान और बैठने के लिये पत्थरों की अद्भुत सजावट है। इससे जुड़ा एक बड़ा हाल है।

झील या नदी की सूखी तलहटी में खुदाई करके पीने का पानी निकालने का चलन भी रहा है। इन्हें विरडा कहा जाता है (देखें बॉक्स : मालधारियों के चमत्कार)। रेत की ऊपरी सतह पर ही मिलने वाला यह पानी अक्सर मीठा ही निकलता है। कच्छ के बन्नी क्षेत्र और रण के किनारे के इलाकों में विरडा ही पेयजल का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। घुमंतू राबड़ी और मालधारी कबीलाई लोग विरडा खोदने में माहिर होते हैं।

 

पानी : सामाजिक सेतु


कोमल कोठारी


राजस्थान के शुष्क इलाके में पानी को संचित करने की परम्परा उसके सामाजिक ढाँचे से जुड़ी हुई है। करीब 600 गाँवों से जानकारी इकट्ठा करने के बाद मुझे पता चला कि जो भी राजस्व वसूली से जुड़ा था- चाहे वह राज्य हो, जागीरदार हो या कोई और-किसी ने भी लोगों के लिये जल संचय व्यवस्थाओं का निर्माण नहीं करवाया। पहले जिस किसी भी राजा, जागीरदार या अन्य प्रमुख व्यक्ति ने पानी से जुड़ी व्यवस्थाओं का निर्माण करवाया, वे उनकी व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करने के लिये थीं। लोग अपनी जरूरतों का भार स्वयं ही उठाते थे। उदाहरण के तौर पर मेहरानगढ़ किले के अन्दर बनी जोधपुर की रानीसर झील ऊँचे लोगों के लिये ही बनी थी, हालांकि इसके पास में स्थित पद्मसर झील का उपयोग स्थानीय लोग किया करते थे। जोधपुर की बालसमंद झील राजाओं ने कुछ विशिष्ट कार्यों के लिये निर्मित कराई थी। इस झील से स्थानीय लोगों को पीने का पानी लेने की आज्ञा भी नहीं थी। सन 1955 तक फतेहसागर और स्वरूपसागर का पानी, जिनका निर्माण स्थानीय शासकों ने करवाया था, स्थानीय लोग प्रयोग में नहीं ला सकते थे। इसके विपरीत, उदयपुर की पिछोला झील, जिसका निर्माण बंजारों ने किया था, शहर में पानी का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत था।

राजस्थान एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ साल भर बहने वाली नदियाँ नहीं हैं। यहाँ पानी से सम्बन्धित समस्याएँ कम तथा अनियमित वर्षा और नदियों में अपर्याप्त पानी को लेकर उत्पन्न होती हैं। यहाँ प्रकृति और संस्कृति एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। सन 1979 और 1990 में राजस्थान के कुछ इलाकों में भारी बारिश हुई थी, जिससे लूणी नदी में बाढ़ आने से राज्य को काफी हानि पहुँची थी। परन्तु 1979 में क्षति और भी हो सकती थी, अगर स्थानीय लोगों ने सन्देश देने की प्राचीन पद्धति, जिसमें ढोलों का प्रयोग किया जाता था, का सहारा न लिया होता। जिन क्षेत्रों में यह व्यवस्था लुप्त हो चुकी थी, वहाँ काफी हानि पहुँची थी।

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में लोककथाएँ और पौराणिक गाथाएँ काफी महत्त्वपूर्ण हुआ करती हैं। राजस्थान में पानी के लगभग सभी प्राकृतिक स्रोतों जैसे झरना आदि की उत्पत्ति के बारे में पौराणिक किस्से हैं। बाणगंगाओं की उत्पत्ति हमेशा उन स्थानों में मानी जाती है जहाँ पांडव किसी-न-किसी समय रहा करते थे। अर्जुन ने धरती में तीर मारकर पानी बाहर निकाला था। जिस जगह पर भीम ने अपना पैर जमीन पर धँसाकर पानी के फव्वारे को बाहर निकाला था, उसे भीम गदा के नाम से जाना जाता है। शुष्क क्षेत्रों में पानी इतनी कम मात्रा में उपलब्ध होता है कि किसी भी प्राकृतिक स्रोत की पूजा तक शुरू हो जाती है। और-तो-और कई जगहों पर तो पानी के प्राकृतिक स्रोत तीर्थ स्थान भी बन गए हैं।

स्थानीय लोगों ने पानी के कई कृत्रिम स्रोतों का निर्माण किया है। राजस्थान में पानी के कई पारम्परिक स्रोत हैं, जैसे नाडी, तालाब, जोहड़, बन्धा, सागर, समंद और सरोवर। गाँवों का कोई व्यक्ति जब ‘नाडी’ की बात करता है, तब उसे उसके बारे में स्पष्ट जानकारी होती है (जैसे नाडी में पानी कैसे जमा होता है, किस तरह इसका आगोर तैयार किया जाता है।) गाँववाला यह भी जानता है कि बाँध का निर्माण किस मिट्टी से किया जाता है और बाँध के निर्माण के लिये खुदाई एक विशेष तरीके से की जाती है।

कुएँ पानी के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। राजस्थान में कई प्रकार के कुएँ पाये जाते हैं। सामान्यतः किसी साधारण कुएँ का मालिक एक अकेला व्यक्ति हुआ करता है। बड़े कुओं, जिन्हें कोहर के नाम से जाना जाता है, पर अधिकार पूरे समुदाय का होता है। इसके अतिरिक्त ‘बावड़ी’ या ‘झालरा’ भी हैं। बावड़ियों को धार्मिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण माना जाता है और इनका निर्माण पुण्य कमाने के लिये किया जाता था।

राजस्थान के मरुक्षेत्र में से कुछ को पार के नाम से जाना जाता है। पार ऐसी जगह होती है जहाँ बहता हुआ पानी एक जगह जमा होकर धरती में रिसकर उसके अन्दर चला जाता है। गाँव वालों को इस बात की जानकारी रहती है कि अगर ऐसे स्थानों पर कुओं की खुदाई की जाये तो मीठा पानी प्राप्त किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, यहाँ उगे पेड़-पौधों से भी गाँव वाले पार का पता लगा लेते हैं। इन कुओं को बेरी के नाम से जाना जाता है। ये बेरियाँ इंसानों और पालतू जानवरों, दोनों ही के लिये पीने का पानी उपलब्ध कराती हैं। इसके अतिरिक्त इन बेरियों की खुदाई सूखी झीलों और नदियों की तलहटी पर भी की जाती थी।

जय सिंधी पाकिस्तान सीमा के निकट स्थित एक गाँव है। यहाँ पिछले कई वर्षों से वर्षा नहीं हुई है। इस गाँव में भेड़ों की कुल संख्या 30,000 से भी ज्यादा है। चूँकि इस गाँव में पार की व्यवस्था काफी अच्छी है, इसलिये इन भेड़ों को घास अथवा पानी के लिये इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता।

राजस्थान के लोग पारम्परिक तौर पर राज्य को दो हिस्सों में बाँटते हैं। एक, जिसमें ‘पालर’ पानी मिलता है और दूसरा, जहाँ ‘वाकर’ पानी प्राप्त होता है। वर्षा से प्राप्त जल ही पालर जल है, जो प्राकृतिक पानी का सबसे शुद्ध रूप है और जिसे टांका में तीन से पाँच वर्ष तक के लिये जमा किया जा सकता है। वाकर भूजल को कहते हैं। इसमें कई प्रकार के तत्व मिले होते हैं। पालर पानी में उगने वाली फसलें वाकर पानी में उगने वाली फसलों से बिल्कुल भिन्न होती हैं। इसके अतिरिक्त इनको रोपने का समय और सिंचाई की व्यवस्था भी एक-दूसरे से अलग होती है।

राजस्थान के लोगों को अपनी जमीन से सम्बन्धित बातों की भी अच्छी जानकारी होती है और वे भिन्न-भिन्न प्रकार की मिट्टियों को स्थानीय नाम भी देते हैं। उदाहरण के तौर पर, कुओं की खुदाई करने वाले मजदूर विभिन्न मिट्टी की परतों को अलग-अलग नाम देते हैं, और उन्हें यह भी पता होता है कि किसी एक विशेष प्रकार की मिट्टी के नीचे पानी मिलेगा अथवा नहीं। कुओं की खुदाई करने वाले अलग मजदूर रहते हैं।

राज्य के कुछ कुओं, जिन्हें सागर-का-कुआँ के नाम से जाना जाता है में पानी अत्यधिक मात्रा में उपलब्ध होता है। ये कुएँ करीब 60 मीटर गहरे होते हैं और कभी भी नहीं सूखते हैं। इनमें पानी काफी शुद्ध और हमेशा रहता है। बोरूंदा गाँव, जहाँ मैं रहता हूँ, में ऐसे करीब 60 कुएँ हैं। इनमें 300 हार्स पावर के इंजन लगे हुए हैं जो सौ से भी ज्यादा एकड़ जमीन की सिंचाई करते हैं।

लोगों ने अन्य प्रकार के कुओं को अलग-अलग नाम दिये हैं, जैसे सीर-का-कुआँ, साजय का कुआँ, या झरारे का कुआँ। साजय-का-कुआँ में पानी भूतल के भण्डार से प्राप्त किया जाता है, जो रिस-रिसकर जमीन के अन्दर जमा हो गया है। सीर-का-कुआँ में जमीन के अन्दर स्थित जल भर कुएँ में आकर खुलता है। विभिन्न प्रकार के कुओं से अलग-अलग प्रकार की फसलों की खेती की जाती है।

जमीन को मापने के लिये पारम्परिक ‘पावंडा’ या पगों का सहारा लिया जाता था। कभी-कभी हाथों से माप भी की जाती थी। कुओं की गहराई को बताने के लिये लोग ’60 पुरुष’ कहा करते थे। नदियों के पानी को समय के हिसाब से मापा जाता था-जैसे तीन महीने या छह महीने का पानी आदि।

राजस्थान में पानी शुरू से ही सुन्दर और कलात्मक चीजों से जुड़ा था। कुम्हार पीने के पानी के बर्तन काफी लगन और मेहनत से तैयार करते थे। फारसी चक्र, जिसे ‘चड़स’ के नाम से जाना जाता था, को तैयार करने के लिये सबसे उत्तम चमड़े का प्रयोग किया जाता था। इसमें करीब 360 अलग-अलग प्रकार के जोड़ हुआ करते थे।

मरु प्रदेश में प्रसिद्ध एक गाना समद उझालो में एक धार्मिक कृत्य का वर्णन है जिसमें एक औरत नाडी से कई टागरी (मिट्टी से भरी बाल्टी) खोदकर निकालने और किसी पाल पर रखने का प्रण करती है। अपना व्रत (प्रण) पूरा करने के पश्चात वह अपने भाई की प्रतीक्षा करती है जो कपड़ों के भेंट लाकर इस धार्मिक कृत्य को पूरा करेगा। जब उसका भाई काफी समय प्रतीक्षा करने के बाद भी नहीं आता है, तब वह नदी में चलना शुरू कर देती है। उसका भाई उसके डूबने के तुरन्त बाद ही वहाँ पहुँचता है। इस गाने को सावन (मानसून) के महीने में गाया जाता है। और यह नाडियों और तालाबों से गाद को निकालने में समाज की जिम्मेदारी को भली-भाँति दर्शाता है।

 

 

विपत्ति में एक शहर


जोधपुर राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। यह मारवाड़ राजपूतों की प्राचीन राजधानी हुआ करता था। मारवाड़ की पुरानी राजधानी मंडौर को बदलकर जोधपुर करने के पीछे पानी की कमी एक महत्त्वपूर्ण कारण था। एक पथरीली पहाड़ी की ढलान पर स्थित जोधपुर शहर पानी की आपूर्ति के लिये वर्षा और भूजल पर निर्भर है।

सन 1459 में अपनी राजधानी मंडौर से जोधपुर स्थानान्तरित करने के बाद राव जोधाजी ने जोधपुर किले का निर्माण करवाया था। सन 1460 के कुछ ही दिनों बाद रानी जस्मेदा ने रानीसर झील बनवाई थी। पद्मसर का निर्माण बाल्दिया सेठ ने अपने पिता पद्म की याद में करवाया था। सन 1515 में राव गंगोजी ने किले के समीप में रहने वाले लोगों के लिये गंगेलाओं का निर्माण करवाया। इसके कुछ दशक बाद ही रावती के पास सूरसागर जलाशय की नींव सन 1608 में राजा सूर सिंह द्वारा रखी गई थी। बालसमंद झील का निर्माण 1159 में बंजारा सरदार राजा बालकरण परिहार ने करवाया था। इसको पहले महाराजा सूर सिंह ने सन 1611 में बढ़वाया। बाद में महाराजा जसवंत सिंह के शासनकाल (1638-1678) में पानी के अन्य स्रोतों का निर्माण भी करवाया गया था। उन्होंने इसे कुछ ही दशकों बाद फिर से चौड़ा करवाया। गुलाबसागर का निर्माण पासवान गुलाब राय ने सन 1788 में किया था। फतेहसागर को महाराजा भीम सिंह ने तैयार करवाया था। मानसागर और महामंदिर झालरा को सन 1804 में निर्मित करने का श्रेय महाराजा मान सिंह को जाता है। इसके अतिरिक्त, बाई-का-तालाब महाराजा मान सिंह की पुत्री ने ही तैयार करवाया था।

जलापूर्ति योजनाएँ

महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय के शासनकाल (1872-1895) में पानी की आपूर्ति से सम्बन्धित योजनाओं को काफी बढ़ावा दिया गया था। उनके ही शासनकाल में एक अकाल वाले वर्ष में कैलाना का निर्माण किया गया था। इसके अलावा, रानीसर और बालसमंद बाँधों को और ऊँचा किया गया था और शहर के तालाबों में पानी पहुँचाने के लिये लम्बी नहरों की खुदाई भी करवाई गई थी। पहले ब्रिटिश अभियन्ता होम्स, जिसे पानी की आपूर्ति की जिम्मेदारी सन 1883 के आस-पास सौंपी गई थी, ने कैलाना कृत्रिम जल-प्रणातल का निर्माण करवाया था, जिससे कैलाना का पानी बाई-का-तालाब में लाया जा सके। जोधपुर में पाइपों से पानी की सप्लाई करने का श्रेय भी उसे ही दिया जाता है।

शहर के जलाशयों में पानी की आपूर्ति के लिये सन 1917-18 में चोपसानी पम्पिंग योजना शुरू की गई थी। शहर की जनसंख्या, जो 1901 में 60,500 से बढ़कर 1931 में 90,000 के आस-पास पहुँच गई थी, की जरूरतों को पूरा करने में पुरानी व्यवस्था काफी नहीं थी। इस स्थिति से निबटने के लिये सन 1931-32 में जोधपुर फिल्टर वाटर स्कीम और बाद में सन 1938 में सुमेरसमंद जल योजना शुरू की गई। सुमेर समंद जल योजना के तहत जोधपुर से 85 किमी दूर स्थित सुमेर समंद से खुली नहरों की सहायता से पानी शहर में पहुँचाया जाता था। इस पानी को तखत सागर में जमा किया जाता था। जोधपुर से 9 किमी दूर स्थित चोपसानी गाँव में तैयार किये गए फिल्टर-हाउस से शहर के लोगों को, सन 1940 के बाद से, पानी की सप्लाई नियमित ढंग से मिलने लगी। इस नहर को बाद में जोधपुर से 140 किमी स्थित जवाई तक बढ़ाया गया, जहाँ शहर में पानी सप्लाई करने के लिये एक बाँध का निर्माण किया गया था। आज जोधपुर के करीब दस लाख लोगों के लिये पानी का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत जवाई जलाशय है।

जोधपुर शहर, जहाँ करीब नौ लाख लोग बसते हैं (1991 के आँकड़े), को प्रतिदिन 2.7 करोड़ गैलन पानी की आवश्यकता है। जलाशयों और भूजल से अभी 2.24 करोड़ गैलन की आपूर्ति की जाती है। इसमें जलाशयों का योगदान करीब 55-60 प्रतिशत का है। दो प्रमुख जलाशय, जवाई और हेमावास, जोधपुर को पानी पहुँचाने के अलावा पाली और रोहित शहर एवं पाली और जोधपुर जिलों में स्थित गाँवों की पानी की जरूरतों को भी पूरा करते हैं।

जमा किये हुए पानी के घटते स्तर के कारण अब भूजल पर निर्भरता काफी बढ़ गई है। पिछले कुछ वर्षों से, जनवरी के महीने से अगले मानसून तक, जोधपुर के लिये भूजल ही एकमात्र स्रोत हुआ करता है। जोधपुर के आस-पास स्थित भूजल के जलभर शहर की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं। जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग ‘फेड’ ने दूरदराज के गाँवों, जैसे रामपुरा, मनई, तिओरी और बलरवा आदि में नलकूप लगवाए हैं, जहाँ से पानी टैंकरों और पाइपों की सहायता से लाया जाता है। इन गाँवों में पानी का स्तर लगातार घटता जा रहा है। यह प्रतिवर्ष 1.27 मीटर के हिसाब से गिर रहा है। सन 1989 में रामपुर का भूजल स्तर 4.4 मीटर गिरा था। राणसी गाँव में जहाँ खोखले चूना पत्थर ही पानी को जमा करने के एकमात्र स्रोत हैं, पानी की आपूर्ति के नियमित स्रोत नहीं माने जा सकते हैं। इसके अलावा भूजल स्तर अब जमीन से 45 मीटर नीचे चला गया है। अत्यधिक इस्तेमाल से भूजल के स्रोत या तो सूख चुके हैं अथवा उनकी पानी देने की क्षमता कम हो गई है। चूँकि अब नलकूप कम मात्रा में पानी उपलब्ध करा पा रहे हैं और नए नलकूपों को लगाने का स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं, इसलिये अब पानी की आपूर्ति गैर-सरकारी नलकूपों, खुले कुओं और बावड़ियों की सहायता से की जा रही है। सन 1987-88 में, जब जोधपुर में पीने के पानी की भयंकर कमी हो गई थी, तब जोधपुर शहर के आस-पास स्थित कुओं से पानी लेकर टैंकरों से बाँटा गया था।

शहर के स्थानीय स्रोतों से प्रतिदिन 13 लाख गैलन पानी मिलता है। स्थानीय पानी के स्रोतों को काम में लाने के लिये ‘फेड’ ने चापाकलों को लगाने की योजना तैयार की थी। आज जोधपुर में करीब 1,835 चापाकल लगे हुए हैं। पानी की सप्लाई न होने वाले दिनों में ये चापाकल काफी मददगार साबित होते हैं। चूँकि पीने और खाना पकाने के लिये पानी की आवश्यकता अन्य कार्यों की अपेक्षा काफी कम होती है, इसलिये पाइपों द्वारा पानी हर दूसरे दिन भी सप्लाई की जा सकती है। चापाकल के पानी का इस्तेमाल नहाने और कपड़ा साफ करने में किया जा सकता है।

रामपुरा और मनई गाँव जोधपुर से करीब 30 किमी दूर स्थित हैं। सन 1969-70 में आपात जलापूर्ति योजना के तहत रामपुरा में 12 और मनई में 4 नलकूपों को लगाया गया था, जिससे जोधपुर शहर में 40 लाख गैलन पानी प्रतिदिन के हिसाब से पहुँचाया जा सके। पानी को निरन्तर खींचते रहने के कारण रामपुरा के 10 और मनई के 4 में से 2 नलकूप पूरी तरह सूख चुके हैं। इसके अतिरिक्त, रामपुरा में भूजल स्तर 15 से बढ़कर 45 मीटर तक पहुँच गया है। पिछले कुछ वर्षों में जब कभी भी ‘फेड’ ने नए नलकूपों को खुदवाने की योजना बनाई, स्थानीय लोगों ने इसका जोरदार विरोध किया। रामपुरा के लोगों ने पानी को जोधपुर ले जाने के खिलाफ आवाज उठाई। उनके अनुसार भूजल के स्रोत के खत्म होने के पश्चात रामपुरा पर कोई भी ध्यान नहीं देगा। रामपुरा और मनई खेती के लिये उपयुक्त क्षेत्रों में आते हैं। भूजल स्तर के घटने से लोगों को अपने क्षेत्र में लगाए हुए नलकूपों को और गहरा करना होता है, जिसमें काफी खर्च होता है। रामपुरा में हो रहे विरोधों को देखते हुए ‘फेड’ ने मनई गाँव में नलकूप लगाने का निर्णय लिया। पर यहाँ भी इस योजना का भारी विरोध किया गया। इसके पश्चात जिला अधिकारियों, पुलिस ‘फेड’ के अधिकारियों और गाँव वालों के बीच एक बैठक करवाई गई। ‘फेड’ ने गाँव में एक बड़े जलाशय का निर्माण करने का निर्णय लिया। तब समझौता हुआ, लेकिन नलकूपों को लगाने के बाद ‘फेड’ ने अपने दिये गए आश्वासन से मुँह मोड़ लिया।

जोधपुर से 35 किमी दूर स्थित टेओरी और बलरवा गाँव से पानी एक 0.5 मीटर पाइप लाइन की सहायता से जोधपुर शहर में पहुँचाया जाता है। सन 1987-88 में टेओरी में नौ और बलरवा में 12 नलकूप प्रतिदिन 40 लाख गैलन पानी की सप्लाई करने के लिये लगाए गए थे। उसके बाद से इन गाँवों में भूजल स्तर निरन्तर गिरता ही जा रहा है। जल विभाग के अधिकारी 15 और नलकूप लगाने की योजना बना रहे हैं, जिन्हें इस पाइप लाइन से जोड़ दिया जाएगा। इससे कुल उत्पादित पानी में 26 से 50 लाख गैलन (प्रतिदिन के हिसाब से) की बढ़ोत्तरी की आशा है।

जोधपुर से 75 किमी दूर स्थित राणसी गाँव एक अन्य क्षेत्र है जहाँ से पाइप लाइन की सहायता से पानी जोधपुर पहुँचाया जाता है। प्रतिदिन 25 लाख गैलन पानी की आपूर्ति के लिये इस क्षेत्र में कई नलकूप लगाए गए हैं, पर अभी सिर्फ 15 लाख गैलन की ही आपूर्ति हो पा रही है। जोधपुर से 12 किमी की दूरी पर स्थित पाल गाँव में सन 1982 में 19 नए नलकूप लगाए गए थे। आज इनमें से 10 सूख चुके हैं, और अन्य नलकूपों से प्राप्त पानी की मात्रा में भारी कमी आई है। सन 1987-88 के बाद से छह और नलकूप इस क्षेत्र में लगाए जा चुके हैं।

जोधपुर के आस-पास के क्षेत्रों में भूजल की समस्या काफी जटिल होती जा रही है। लगभग सभी प्रमुख भूजल के स्रोत सूख चुके हैं और कई में पानी का स्तर गिरता ही जा रहा है।

पानी बना पण्य

सन 1980-81 के बाद से जोधपुर में पानी एक बिक्री योग्य वस्तु हो गया है। हालांकि सन 1980-81 के पहले भी पानी की बिक्री फैक्टरियों और निर्माण के कार्यों के लिये की जाती थी, पर अब उसे शादियों, सामाजिक कार्यों और घेरलू कामकाजों के लिये भी खरीदा-बेचा जा रहा है। आज अगर नलके में पानी का दबाव कम हो जाता है तो लोग पानी के टैंकरों का ऑर्डर अन्य वस्तुओं की तरह ही करते हैं। वे लोग, जो पानी को खरीदने की स्थिति में नहीं हैं, आज सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए स्रोतों पर ही आश्रित हैं। इसके अतिरिक्त, पास के चापाकलों, कुओं या बावड़ियों से भी उन्हें कभी-कभी पानी मिल जाता है।

पानी का कारोबार तीन श्रेणी के लोगों द्वारा किया जाता है। एक, जिनके पास अपना कुआँ होता है। दूसरा, जिनके पास अपने टैंकर होते हैं। और तीसरा, जिनके पास ये दोनों ही उपलब्ध होते हैं। कुओं के मालिक एक टैंकर को भरने का 10 रुपए लेते हैं। जिनके पास अपना टैंकर होता है, वे पानी को बेचने का 40 से 100 रुपए तक लेते हैं। आपातकाल की स्थिति में इनकी दरें और भी बढ़ जाती हैं। आज कुओं के मालिकों की कुल संख्या 80 से 100 के बीच है, जो हर वर्ष बढ़ती ही जा रही है। पानी की बिक्री की व्यवस्था में घूसखोरी या भ्रष्टाचार काफी हद तक जुड़ा है। सन 1986-87 में आये भयंकर सूखे के दौरान पाल के गैर-सरकारी कुओं के मालिकों ने सरकार को पानी बेचने का निर्णय लिया। पर उनकी योजना सफल नहीं हो पाई, क्योंकि उन्हें इसके लिये प्रति 1,000 गैलन पानी पर सिर्फ 2 रुपए का प्रस्ताव सरकार ने रखा था। नरपतलाल कुमार, जो इनमें से एक थे, के अनुसार पानी काफी दूर से रेल और टैंकरों की मदद से लाया गया था, जिससे सरकारी अधिकारी घूस में अधिक पैसा कमा सकें।

कुमार के अनुसार, उनके पाल में स्थित कुएँ की क्षमता अत्यधिक प्रयोग में लाए जाने के कारण काफी घट गई है। उन्होंने सन 1980-81 से ही पानी बेचना शुरू कर दिया था। उस वक्त ऐसे लोगों की संख्या सिर्फ 7-8 थी और बाजार भी उतना प्रतिस्पर्धा वाला नहीं था। सन 1985-86 और 1987-88 में आये भयंकर अकाल के बाद कई नए लोगों ने इस पानी के बाजार में प्रवेश किया।

जोधपुर के सिंधी कालोनी के निवासी भावर सिंह ने सन 1980 के आस-पास एक नलकूप लगवाया था, जिसे पानी की बिक्री के लिये प्रयोग में लाने की योजना थी। आज यह उनकी कमाई का एकमात्र स्रोत है। शुरू के दिनों में उन्हें पानी बेचना एक अनैतिक काम लगा, पर बाद में वे इसे किसी अन्य कारोबार की भाँति ही देखने लगे। आज चूँकि जोधपुर में पानी की व्यवस्था में सुधार के आसार काफी कम हैं, इसलिये उन्हें भविष्य में काफी मुनाफा कमाने की आशा है।

ओमजी धूत जोधपुर के सबसे पुराने और समृद्ध पानी बेचने वालों में हैं। हालांकि उनके पास अपना कोई कुआँ नहीं है, फिर भी अपने ट्रकों और ट्रैक्टरों की मदद से वे इस कारोबार में लगे हैं। चूँकि वे इस क्षेत्र में भली-भाँति जाने जाते हैं और उनके पास एक टेलीफोन है जो अन्य लोगों के पास नहीं है, वे इस कारोबार में सबसे आगे चल रहे हैं। वे एक टैंकर को 10-15 रुपए में भरकर 40-100 रुपए में बेच देते हैं।

पानी का अत्यधिक उपयोग करने और पिछले कुछ वर्षों से पानी अनियमित ढंग से बरसने के कारण नलकूपों से प्राप्त होने वाले पानी की आपूर्ति में काफी कमी आई है, जिससे जोधपुर में पानी की आपूर्ति अब काफी कठिन हो गई है। प्रतिदिन 1.4-1.5 करोड़ गैलन जलापूर्ति कायम रखने के लिये ‘फेड’ और अधिक नलकूपों को लगाने के लिये उपयुक्त स्थानों की खोज में लगी है।

सन 1934 तक कैलाना, उमेदसागर और बालसमंद जोधपुर शहर में जलापूर्ति करने वाले महत्त्वपूर्ण जलाशय हुआ करते थे। इन स्रोतों से करीब 25 लाख घन मीटर पानी उपलब्ध होता था, जिसमें कैलाना-उमेदसागर का हिस्सा 22.5 लाख घन मीटर और बालसमंद का 2.5 लाख घन मीटर हुआ करता था। प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 15 गैलन के हिसाब से, शहर की कुल जनसंख्या 1 लाख की दैनिक जरूरतों को आसानी से पूरा किया जाता था। इसके अतिरिक्त स्थानीय तालाब और बावड़ी भी बहुत हद तक पानी की अच्छी सप्लाई करने में समर्थ थे।

दुर्भाग्यवश, पानी के इन स्रोतों की बुरी तरह उपेक्षा की गई है। उदाहरण के तौर पर, बालसमंद, जिसका निर्माण 1887-88 में किया गया था, की कुल क्षमता 13.8 लाख घन मीटर है। इस जलाशय का जल ग्रहण क्षेत्र 15 वर्ग किमी में फैला हुआ था। आज इस जल ग्रहण क्षेत्र का तीन-चौथाई क्षेत्र खानों की वजह से टूट-फूट गया है। इससे जुड़ी नहरें किसी समय में आठ किमी से लम्बी हुआ करती थीं, पर आज उन्हें भी नष्ट कर दिया गया है। इस वजह से आज जलाशय में काफी कम पानी बचा है। इसी तरह, कैलाना, जिसका निर्माण सन 1892 में हुआ था, की कुल क्षमता 54.1 लाख घन मीटर हुआ करती थी। इसके अतिरिक्त, इसका जल ग्रहण क्षेत्र करीब 40 वर्ग किमी था और इसमें पानी पहुँचाने वाली नहरों की कुल लम्बाई 55 किमी से भी ज्यादा हुआ करती थी। आज इस जल ग्रहण क्षेत्र का आधा से भी अधिक हिस्सा काम के लायक नहीं है।

इन सबके बावजूद, पानी के पारम्परिक स्रोतों में अब भी काफी क्षमता है। ‘फेड’ के अभियंता महेश शर्मा पारम्परिक स्रोतों को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं। उनके अनुसार, इन स्रोतों से शहर की महीने भर की सभी जरूरतों को पूरा किया जा सकता है। आज शहर की कुल जरूरत प्रतिदिन के हिसाब से 80 हजार घन मीटर है। अकाल के दिनों में पानी की आपूर्ति हर दूसरे दिन की जा सकती है और ये स्रोत दो महीने तक शहर की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। अकाल के वर्षों में लगभग सभी महत्त्वपूर्ण जलाशय सूखने लगते हैं। चूँकि स्थानीय स्रोत शहर के पास हैं, इसलिये इनसे पानी की सप्लाई करना भी आसान है।

अकाल के समय में स्थानीय स्रोतों ने काफी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। सन 1985 में पानी का संकट इतना अधिक हो गया था कि सरकार एक समय में पूरे शहर को खाली करने पर विचार कर रही थी। पर स्थानीय स्रोत जैसे टापी बावड़ी की सफाई करने के पश्चात प्रतिदिन करीब 2.5 लाख गैलन पानी की सप्लाई सम्भव हो सकी थी। इससे इस बावड़ी के पाँच किमी के दायरे में रह रहे लोगों को बचाया जा सका था।

 

 

जोधपुर : जरूरत भर की यारी


सन 1985 में जोधपुर में इस शताब्दी का सबसे भयंकर अकाल पड़ा था। इस विपत्ति से निबटने के लिये सरकार पूरे शहर को ही खाली करने पर विचार कर रही थी। इस दौरान, बावड़ी जो शहर में पानी की आपूर्ति करने के प्रमुख पारम्परिक स्रोत थे, पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

सन 1985 के संकट ने शहर की पानी व्यवस्था को बनाए रखने में इन बावड़ियों के महत्त्व को उजागर किया। शहर की नगरपालिका के अफसरों ने चाँद और जलप बावड़ियों को साफ करवाया और उनसे प्राप्त पानी को शहर में बाँटा। यहाँ के स्थानीय युवकों ने टापी बावड़ी को भी साफ करने की सोची थी। यह बावड़ी शहर के कचरे से भरी पड़ी थी। टापी बावड़ी के निकट स्थित भीमजी का मोहल्ला के निवासी शिवराम पुरोहित ने इन युवकों को 75 मीटर लम्बे, 12 मीटर चौड़े और 75 मीटर गहरे इस पानी के स्रोत को साफ करने के लिये उत्साहित किया। पुरोहित को टापी सफाई अभियान समिति का खजांची बनाया गया। वे 1,000 रुपए दान में देने वाले पहले व्यक्ति थे। इन रुपयों को सफाई में लगे नौजवानों को चाय-पानी पहुँचाने के काम में खर्च किया गया। जिला कलक्टर ने भी इस कार्य के लिये 12,000 रुपए का योगदान दिया। इसके अतिरिक्त घर-घर जाकर 7,500 रुपए भी एकत्रित किये गए। जमा हुए कचरे को हटाने के लिये करीब 200 ट्रकों की आवश्यकता थी। हालांकि फेड ने सफाई के काम के लिये कुछ भी धन उपलब्ध नहीं कराया, पर सफाई का काम पूरा होते ही उसने पानी की सप्लाई के लिये एक पम्प इस स्थान पर लगवाया। इस बावड़ी से शहर को प्रतिदिन 2.3 लाख गैलन पानी उपलब्ध कराया जा सका। पुरोहित बताते हैं कि नल का पानी आने से बावड़ी की उपेक्षा शुरू हुई। यह अफवाह भी उड़ी कि दुश्मनों ने इसके पानी में तेजाब डाल दिया है। कहा गया कि जो औरतें पानी भरने गईं उनके पैरों के गहने काले पड़ गए।

सन 1989 में, जिस वर्ष काफी अच्छी हुई थी, बावड़ी की फिर से उपेक्षा की गई। पुरोहित के अनुसार, कुओं में तैरने के लिये कूदते बच्चों या इसमें पत्थर फेंकने वाले बच्चों पर कड़ी निगाह रखना एक कठिन काम है। इसके अतिरिक्त, लोगों ने इस कुएँ को शवदाह के बाद नहाने के काम में लाना भी शुरू कर दिया है।

चूँकि कुआँ एक सामाजिक स्थल है, इसलिये लोगों को इसका गलत कार्यों के लिये उपयोग करने से रोकना भी एक कठिन काम है। इस समस्या को सुलझाने के लिये पुरोहित ने अपने पैसे से एक छोटा हौज और नहाने के लिये एक बन्द स्थान का निर्माण करवाया है, जिससे लोग कुएँ के पास न जाएँ।

लोगों की स्मरणशक्ति काफी कमजोर है और वे सन 1985 में आये संकट को भूल चुके हैं। शायद इसी तरह के एक अन्य अकाल से ही वे बावड़ियों की महत्ता को फिर से समझने लगेंगे। आज, जोधपुर के कुछ ही लोग बावड़ियों के महत्त्व को अच्छी तरह समझ पा रहे हैं।

 

 

नाडियाँ थीं नब्ज


एल. पी. भरारा

राजस्थान के शुष्क इलाकों में पानी के पारम्परिक स्रोतों का निर्माण और उनका संरक्षण करना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इससे प्राकृतिक प्रकोपों से होने वाले नुकसान को कम करने में काफी मदद मिलती है।

पिछले तीन दशकों में पानी से सम्बन्धित व्यवस्था में काफी बदलाव आया है। पहले अधिकतर परिवार तालाबों का पानी इस्तेमाल किया करते थे। आज सरकार द्वारा कुओं की खुदाई के लिये विशेष ऋण उपलब्ध कराने से कुओं की संख्या काफी बढ़ गई है, जिसके फलस्वरूप अधिकतर लोग अब इससे प्राप्त पानी का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। पिछले दो दशकों में नलकूपों की खुदाई भी करवाई गई है। कुछ क्षेत्रों में नलों की सुविधा भी आ गई है। राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में पानी के पारम्परिक स्रोत नाडी, कुएँ और टांका हुआ करते थे। जबकि नाडियों और कुओं पर समूचे समाज का स्वामित्व होता था, टांकों का मालिक कोई विशेष व्यक्ति हुआ करता था।

सारिणी 2.7.3 : थार में पेयजल की साझी व्यवस्थाएँ

साझे स्रोत

साझे सम्मिलित स्रोत

नाडी

टांका - कुआँ

कुएँ

कुआँ – नाडी - नलकूप

तालाब

कुआँ – नाडी

बाँध

तालाब – कुआँ – नलकूप

नलकूप

तालाब – कुआँ

कुआँ – नाडी – टांका

तालाब – नहर

टांका – कुआँ – तालाब

तालाब – नहर – कुआँ

टांका – नाडी


दक्षिणी राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों में स्थित गाँवों के पास की नाड़ियों में पानी साधारणतः गन्दा और पीने योग्य नहीं होता था। फिर भी इस क्षेत्र में पानी की कमी होने की वजह से लोग इसका प्रयोग पीने, नहाने, कपड़ा साफ करने और जानवरों के लिये किया करते थे। एक बार जब सरदारसमंद क्षेत्र में पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होने लगा, तब एक सर्वे में पाया गया कि लोगों ने नाडी के प्राप्त जल को पीने के लिये प्रयोग में लाना छोड़ दिया है।

सारिणी 2.7.2 : राजस्थान के कुछ इलाकों में पेयजल के मुख्य स्रोत

इलाके

एक स्रोत पर आश्रित प्रतिशत परिवार

घुमंतू कबीलों और गोचर वाले क्षेत्र

21 कुएँ 17

तालाब 4

शुष्क खेती का क्षेत्र

4 कुएँ 4

सिंचाई सुविधाओं से युक्त बरसात वाला क्षेत्र

13 तालाब 5

नहर 1

बाँध 1

तालाब 6

शुष्क क्षेत्र अनुसन्धान केन्द्र की योजना वाला क्षेत्र

100 कुएँ 100


अध्ययन किये गए गाँव में पाये जाने वाले पानी के स्रोतों में छह मौसमी नाडियाँ और एक कुआँ प्रमुख था, जिसका उपयोग गर्मियों में सिर्फ चार से छह महीनों के लिये किया जाता था। ये नाडियाँ गाँव के समीप थीं, इनके जल ग्रहण क्षेत्र काफी बड़े होते थे और ये वर्षाजल को काफी मात्रा में जमा करने में सक्षम थीं। ढाणियाँ (फैले हुए वास क्षेत्र) इन नाडियों के पास ही होती थीं। नाडी से प्राप्त जल का उपयोग जुलाई-अगस्त से लेकर अक्टूबर-नवम्बर तक किया जाता था। पास में स्थित नाडी में पानी खत्म हो जाने के बाद गाँव वाले इन नाडियों में से किसी भी एक नाडी के पानी को उपयोग में ला सकते थे। जब पास के क्षेत्रों से चरवाहे इस गाँव में अपने जानवरों को चराने के लिये लाते तो वे भी इसी पानी का इस्तेमाल करते थे।

 

 

थार के टोबा


राजस्थान के मरुक्षेत्रों में पाये जाने वाले टोबाओं का स्वरूप, स्वामित्व और घास-पानी-पशुधन के बीच के सम्बन्धों को बीकानेर जिले के सत्तासर गाँव के अध्ययन से समझा जा सकता है। सत्तासर गाँव कुल 18,269 हेक्टेयर की जमीन पर फैला हुआ है। यह बीकानेर से 75 किमी दूर बीकानेर-अनूपगढ़ रोड पर स्थित है। यहाँ औसत वार्षिक वर्षा 200 मिमी होती है। इस क्षेत्र में एक विशेष प्रकार की जलवायु है, जहाँ गर्मियों में तापमान काफी अधिक और सर्दियों में काफी कम होता है। गर्मी के मौसम में, विशेषकर मई और जून के महीनों में, यहाँ काफी तेज गर्म हवाएँ चलती हैं। इन दिनों रेतीले तूफान और बालू के ढूहों का बनना आम है।

इस गाँव में कुल 108 परिवार रहते हैं। यहाँ की जनसंख्या हिंदू और मुस्लिम धर्मों को मानने वाले विभिन्न वर्गों या जातियों का एक सम्मिश्रण है। हिंदुओं में सुथार, कुम्हार और सोनार जाति के लोग हैं, जबकि मुसलमानों में बलोच, मौलवी, परिहार और कामरानी प्रमुख हैं, जो पारम्परिक रूप से पशुपालक हैं। सिंधी मुसलमानों, जो पशुपालन का काम करते हैं, की जनसंख्या गाँव की कुल जनसंख्या के लगभग दो-तिहाई है। इनकी तुलना में पशुपालन से जुड़े हिंदुओं की जनसंख्या भी काफी कम है।

कम और अनियमित वर्षा होने के कारण यहाँ के निवासी कृषि की नई तकनीकों को अपनाने में झिझकते हैं। पर स्थानीय प्राकृतिक स्रोतों, जैसे पानी और चारे के प्रति एक विवेकशील और व्यावहारिक रुख अपनाने से उन्हें पशुओं को पालने के उपयोगी तरीकों को समझने में काफी मदद मिली है। इस गाँव के पशुओं की कुल संख्या 6,987 है, जिसमें बड़े जानवर 22.15 प्रतिशत, भेड़ 62.09 प्रतिशत, बकरियाँ 11.61 प्रतिशत और ऊँट 3.62 प्रतिशत हैं। पशुपालन यहाँ के लोगों का सबसे मुख्य पेशा है। परती और बंजर समेत हरेक 100 हेक्टेयर की जमीन पर पशुओं का घनत्व 38.41 है, जबकि उपजाऊ क्षेत्रों के हिसाब से प्रति 100 हेक्टेयर पर पशुओं का घनत्व 1016.65 है।

सत्तासर गाँव में छह टोबा हैं, जो मुख्य गाँव से लगभग 8-16 किमी दूर विभिन्न दिशाओं में फैले हुए हैं। इन छह टोबाओं के नाम गाँव टोबा, नौरंगवाली, ब्रह्मावाली, गोगलीवाली, मिसरीवाली और भादौं हैं। इन टोबाओं के अतिरिक्त गाँव में पानी की आवश्यकताओं के लिये दो कुएँ और कई कुंड भी हैं।

गाँव के कुओं को छोड़कर ये सभी स्रोत मौसमी हैं। इन कुओं का पानी खारा होने की वजह से पीने योग्य नहीं है। चूँकि गाँव में पशुओं की संख्या काफी अधिक है, इसलिये यहाँ के निवासियों को इन्हें भिन्न-भिन्न टोबाओं के पास ले जाना होता है, जहाँ चारा आदि भी काफी मात्रा में मिल जाता है। गोचर की तरफ प्रस्थान करने से पहले हरेक मुस्लिम पशुपालक मस्जिद में गुड़ और दूध चढ़ाता है और अच्छी घास और पानी के लिये प्रार्थना करता है। कुछ लोग भात और गोश्त का भोज करते हैं। यह व्यवस्था दूरदराज के क्षेत्रों में स्थित छोटी बस्तियों, जिन्हें ‘ढाणी’ कहा जाता है, की तरफ प्रवास करने वाले किसानों के स्थानान्तरण से मिलती-जुलती है। हरेक टोबा में एक अस्थायी निवास तैयार किया जाता है, जिसे ‘झम्पा’ कहा जाता है। वे अपने साथ सिर्फ आवश्यक चीजों जैसे चक्की, दूध का बिलौना, कुछ अनाज और दैनिक जरूरत की कुछ अन्य वस्तुएँ ले जाते हैं।

गाँव टोबा पर आश्रित अधिकतर पशुओं के मालिक परिहार, बलोच, कामरानी और मौलवी जाति के हैं। अन्य परिवार, जो इस टोबा को काम में लाते हैं, सामान्यतः काम करने वाले जातियों के होते हैं, जिनके पास काफी कम पशु होते हैं। इस गाँव के अन्य टोबाओं का प्रयोग परिहार और बलोच जाति के लोग करते हैं, जिनके पास छोटे-बड़े पशुओं की संख्या काफी अधिक होती है।

मानसून के आते ही लोग अपने पशुओं को लेकर अपने पारिवारिक या सामूहिक टोबाओं की तरफ निकल पड़ते हैं और जब तक टोबाओं में पानी और उसके आस-पास की घास खत्म नहीं होती है, तब तक वे वहाँ अपना डेरा लगाए रहते हैं। उसके बाद वे या तो गाँव के मुख्य तालाब के पास आ जाते हैं, या किसी और स्थान की ओर चल देते हैं। गाँव टोबा में पानी आठ महीनों तक उपलब्ध रहता है, जबकि अन्य टाबाओं में यह चार से पाँच महीने तक ही रहता है। इन टोबाओं के पानी को इस्तेमाल में लाने के लिये आपसी झगड़ा काफी कम होता है। पानी के अभाव वाले दिनों में जब एक टोबा का पानी खत्म हो जाता है तो लोग आपसी समझ से दूसरे टोबा का इस्तेमाल करते हैं। इन समूहों के एक स्थान से दूसरे स्थान की तरफ लगातार प्रवास करने के पीछे बारम्बार अकाल का पड़ना और पानी-चारे का कम मात्रा में उपलब्ध होना प्रमुख कारण है। परम्परा के अनुसार किसी टोबा को इस्तेमाल में लाने से सम्बन्धित अधिकार को उसकी सबसे पहले खुदाई करने वाले ही तय करते हैं। टोबाओं के निर्माण के लिये चुने हुए क्षेत्र के आस-पास काफी संख्या में छायादार पेड़-पौधे और हरियाली पाई जाती है।

 

 

पानी गए न ऊबरे...


एम. एस. राठौर

राजस्थान में विकास की योजनाओं में पानी का महत्त्वपूर्ण स्थान है। पानी से सम्बन्धित एक समन्वित नीति के न होने से कृषि, उद्योग और पीने के पानी, सबकी बढ़ती माँगों की वजह से राज्य के पानी के स्रोतों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया जा रहा है।

जल संसाधनों में भारी निवेश करने के बावजूद राजस्थान की जनता पानी की कमी को सहन करने को मजबूर है। पानी के स्रोतों की मौजूदा प्रबन्धन व्यवस्था उनको आगे के लिये भी बचाकर रखने की न होकर अन्धाधुंध उपयोग की है। पानी के संरक्षण की पारम्परिक तकनीकों की उपेक्षा की गई है। भले ही पारम्परिक ज्ञान हर मर्ज की दवा न हो, पर स्थानीय लोगों के अनुभव पानी के स्रोतों को विकसित करने और उनके संरक्षण से सम्बन्धित नीतियों को तैयार करने में काफी मददगार साबित हो सकते हैं। राजस्थान में वार्षिक औसत से कम वर्षा होने के अलावा भारी अनिश्चितता भरी भी है। यह अनिश्चितता बढ़ती ही जा रही है।

राज्य में भूजल का वितरण काफी अनियमित है। इसके अतिरिक्त भूजल के प्रकार में भी भिन्नताएँ हैं। राजस्थान में हर साल 34 लाख एकड़ फीट भूजल पुनरावेशित होता है। राजस्थान की विभिन्न नदियों में बहने वाला पानी अनुमानतः 1.6 करोड़ घन फीट है, जो देश के सतह पर पाये जाने वाले कुल पानी का एक प्रतिशत है।5 सभी नदियों का औसत कुल बहाव 20.5 लाख हेक्टेयर मीटर है। इस पूरी क्षमता का सिर्फ 50 प्रतिशत ही उपयोग में लाया जा रहा है।

सारिणी 2.7.5 : राजस्थान में पानी की माँग और आपूर्ति के स्रोत

उद्देश्य

पानी के स्रोत

 

भूजल (लाख एकड़ फुट)

भूतल का पानी (लाख एकड़ फुट)

कुल पानी (लाख एकड़ फुट)

पीना

15.05

02.20

17.25 (9.1)

उद्योग

0.22

अनुपलब्ध

00.22 (0.1)

सिंचाई

44.78

127.42

172.20 (90.8)

कुल

60.05 (31.7)

129.62 (68.3)

189.67 (100.0)

टिप्पणी : कोष्ठक के आँकड़े प्रतिशत मात्रा को दर्शाते हैं।

स्रोत : राजस्थान सरकार 1989, राजस्थान के जल संसाधनों पर रिपोर्ट


राज्य में पानी की माँग सिंचाई के कार्यों के लिये सबसे अधिक है। उद्योग की जरूरतों और पेयजल का स्थान इसके बाद ही आता है। राज्य की कुल पानी की जरूरतों में सिंचाई का हिस्सा 90.8 प्रतिशत का है। इस हिस्से के लगभग 76 प्रतिशत की पूर्ति सतह के पानी से की जाती है। राजस्थान में पानी की कुल माँग का लगभग 31.7 प्रतिशत भूजल से पूरा किया जाता है। इसमें से करीब 87 प्रतिशत का उपयोग पीने के पानी के लिये किया जाता है।

क्या राजस्थान में पानी की आपूर्ति राज्य की माँग को पूरा कर पाती है? ऐसा न होने के दो सूचक हैं: पहला, राज्य में भूजल के स्तर में हुई भारी गिरावट और दूसरा, राज्य में पीने के पानी की माँग को पूरा करने के लिये सरकार द्वारा बड़े स्तर पर उठाए गए कदम। आज राजस्थान में उपयोग में लाए जा रहे भूजल और राज्य में उपलब्ध भूजल की कुल मात्रा में काफी असन्तुलन है। समूचे राज्य में भूजल का अत्यधिक अनुचित उपयोग करने के विरुद्ध काफी चिन्ता प्रकट की जा रही है। इसके अतिरिक्त, अलग-अलग विभागों के द्वारा किये जाने वाले कार्यों का भी प्रभाव पानी के अनुचित उपयोग किये जाने पर पड़ता है। उदाहरण के तौर पर, बिजली की दर, कुओं की खुदाई के लिये उपलब्ध कराया गया धन और आवश्यक धन की सप्लाई आदि का प्रभाव पानी के स्रोतों को विकसित करने पर काफी पड़ता है। इन कारणों के बावजूद पानी के स्रोतों को विकसित करने के लिये सरकार ने एक समन्वित नीति तैयार नहीं की है।

आज पानी की आपूर्ति बढ़ाने और उसकी माँग पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता है। आने वाले दिनों में पेयजल की माँग काफी बढ़ने की सम्भावना है। इस समस्या से निबटने के लिये सतह पर पाये जाने वाले पानी को उपयोग में लाने के पारम्परिक तौर-तरीकों को अपनाने से काफी मदद मिल सकती है।

पेयजल

पीने के पानी के पक्के स्रोतों के उपलब्ध न होने के कारण पश्चिमी राजस्थान के निवासी कुओं और कुछ अन्य पारम्परिक पानी को जमा करने के तौर-तरीकों पर निर्भर हैं। कई स्थानों पर पानी टैंकरों, ऊँट गाड़ियों और सिर पर रखकर भी 15 किमी से भी दूर स्थित स्रोतों से लाया जाता है। इसके अतिरिक्त, जनसंख्या के अलग-अलग वर्गों की पानी के स्रोतों तक पहुँच में भी असमानताएँ हैं।

सारिणी 2.7.6 : राजस्थान के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पेयजल की माँग

वर्ष

अनुमानित आबादी

पेयजल की माँग

ग्रामीण (लाख)

शहरी (लाख)

ग्रामीण* (लाख लीटर रोजाना)

शहरी (लाख लीटर रोजाना)

कुल (लाख लीटर रोजाना)

1990

326.0

108.7

18,530

17,940

36,470

1995

355.1

136.8

20,150

22,570

42,720

2000

378.0

171.0

21,480

28,220

49,700

टिप्पणी : यह अनुमान ग्रामीण इलाकों के लिये प्रति व्यक्ति रोज 30 लीटर और शहरी इलाकों के लिये प्रति व्यक्ति रोज 135 लीटर के आधार पर लगाया गया है।

*ग्रामीण पेयजल में मनुष्य और पशुओं, दोनों का हिसाब शामिल है।

स्रोत : राजस्थान सरकार, अगस्त 1987, राजस्थान के जल संसाधनों पर रिपोर्ट


पानी के पारम्परिक स्रोत (जैसे नाडी, टांका और खड़ीन) आज भी पीने के पानी के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इनके जल ग्रहण क्षेत्रों का उपयोग भी पशुओं को चराने के लिये किया जाता है। चूँकि ये स्रोत बस्तियों के समीप होते हैं, इसलिये इनको उपयोग में लाने से समय और मेहनत, दोनों ही कम खर्च होता है।

लोगों और पशुओं, दोनों की संख्या बढ़ने से उत्पन्न पारिस्थितिक दबाव का राज्य की भूसम्पदा पर काफी बुरा असर पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त पानी की आपूर्ति से सम्बन्धित नीतियाँ तैयार करने वाले अधिकारी पानी के पारम्परिक स्रोतों की उपेक्षा कर रहे हैं। पश्चिमी राजस्थान में पानी के पारम्परिक स्रोत कुंडी या टांका हैं। इन स्रोतों पर स्वामित्व किसी व्यक्ति विशेष अथवा समूचे स्थानीय समाज का होता है, और इनका निर्माण सामूहिक अथवा किसी व्यक्ति विशेष की अधिकृत जमीन पर किया जाता है।

लाडनू तहसील का जैसलान गाँव नागौर जिले में डीडवाणा के निकट स्थित है। डीडवाणा खारे पानी वाले अपने झील के लिये प्रसिद्ध है। जैसलान गाँव भी खारे भूजल वाले क्षेत्रों में आता है। पीने के पानी की समस्या इस गाँव के 250 साल पूर्व बसने के समय से ही चली आ रही है। इस गाँव के निवासी करीब तीन किमी दूर स्थित मीठा घिरोडा गाँव से पानी लाया करते थे। चूँकि यह गाँव आस-पास के 8-10 किमी क्षेत्र में बसे सभी गाँवों में पीने के पानी का एकमात्र स्रोत था, इसलिये गर्मी के मौसम में लोगों को पानी के लिये 10-12 घंटे लाइन में लगना पड़ता था। पीने के पानी को तालों से बन्द रखा जाता था और इसका उपयोग काफी सावधानी से किया जाता था।

जानवरों की जरूरतों को गाँव के खारे पानी के कुओं अथवा गाँव की नाडी से पूरा किया जाता था। इस नाडी का निर्माण सन 1896 में जोधपुर के राजा द्वारा अकाल से बचने के लिये किया गया था। इस नाडी में एक कुएँ की खुदाई भी की गई थी, जिससे लोगों को तीन महीने तक पीने का पानी उपलब्ध कराया जा सके। अच्छी वर्षा पाने वाले वर्षों में इस नाडी में पानी सिर्फ तीन महीनों तक उपलब्ध रहता था। चूँकि मनुष्य और जानवर दोनों एक ही स्रोत का इस्तेमाल करते थे, इसलिये पानी काफी प्रदूषित हो जाता था। यहाँ की जवान औरतों और मर्दों के स्वास्थ्य पर पानी में गिनी-कृमियों के पनपने से काफी बुरा असर पड़ा था। आज भी यह नाडी पशुओं के लिये पीने के पानी का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

आज से करीब 150 वर्ष पहले यहाँ के गाँव वालों को पानी को जमा रखने से सम्बन्धित तकनीकों की कोई जानकारी नहीं थी। इस दिशा में पहला कदम सन 1886 में एक परिवार ने अपने घर की छत से पानी को जमा करने की विधि तैयार करके उठाया था। इसके बाद, गाँव वालों की सहायता से एक कुंड का निर्माण किया गया था। इस प्रयोग के सफल होने के पश्चात सन 1923 और 1926 के बीच दो और कुंडों का निर्माण करवाया गया था। बाद के वर्षों में कुंडों की संख्या बढ़ती ही गई। आज इस गाँव में 100 के करीब कुंड हैं। अगर किसी वर्ष मानसून की बरसात नहीं होती है, तब लोग पानी खरीदकर इन कुंडों में जमा करते हैं।

कुंडों पर स्वामित्व

अधिकतर कुंडों पर स्वामित्व किसी एक विशेष परिवार अथवा जाति का होता है। अकाल के समय में तैयार किये गए सरकारी कुंडों का सामूहिक इस्तेमाल किया जाता है। चूँकि मानसून के दिनों में कई परिवार गाँव को छोड़कर खेतों में बनी झोपड़ियों में, फसलों की देखभाल के लिये चले जाते हैं, इसलिये कुंडों का निर्माण खेती के लिये उपयुक्त जमीनों पर भी किया गया है। आज करीब 20 कुंड पारिवारिक झगड़ों या गरीब परिवारों द्वारा उनकी मरम्मत न करवा पाने के कारण काम के लायक नहीं हैं।

पानी तक पहुँच

पानी तक सबकी पहुँच एक महत्त्वपूर्ण समस्या है। कुंडों का निर्माण सिर्फ वही परिवार कर सकता है जिसके पास इसके लिये जरूरी धन हो, एक पक्का घर हो या कुछ जमीन हो जिस पर कुंड का निर्माण किया जा सके। गरीब परिवारों के पास इतने स्रोत उपलब्ध नहीं होते हैं, उन्हें तो सार्वजनिक कुंडों के सहारे जीना पड़ता है।

गाँव में 50 प्रतिशत से भी अधिक ऊँची जाति के परिवारों के पास अपना कुंड है। नीची जाति के परिवारों में यह प्रतिशत घटकर 14 हो जाता है। जाट, ब्राह्मण और राजपूत कुल गैर-सरकारी कुंडों में से करीब 90 प्रतिशत के मालिक हैं। इस गाँव में दो बड़े सरकारी कुंड हैं। पहले का निर्माण पंचायत ने सन 1984 में 33,000 रुपए खर्च करके करवाया था, जबकि दूसरे का निर्माण सन 1986 में हुआ था। पहला अब भी काफी अच्छी हालत में है, जबकि दूसरे में दरार पड़नी शुरू हो गई है।

सारिणी 2.7.7 : जैसलान गाँव के कुंडों में जातिगत बँटवारा

जाति

घरों की संख्या

कुंडों की संख्या

कुंडी वाले घरों का प्रतिशत

कुल कुंडों में प्रतिशत मालिकाना

राजपूत

35

18

51.4

22.5

ब्राह्मण

50

32

64.0

40.0

जाट

30

22

73.3

27.5

बलाई (अ.ज.)

35

5

14.3

6.3

बढ़ई

4

2

50.0

2.5

कुम्हार

5

1

20.0

1.2

कुल

159

80

50.3

100.0

स्रोत : एम.एस. राठौर


गाँव वालों ने इन कुंडों को उपयोग में लाने वाले विभिन्न जातियों के लोगों में बाँट दिया है। पहले को नीची जाति के परिवारों के लिये छोड़ दिया गया है, जबकि दूसरे का उपयोग सिर्फ ऊँची जाति के लोग करते हैं। जिस समय गाँव में सिर्फ एक कुंड हुआ करता था, उस समय नीची जाति के लोगों को इसके समीप खड़ा होकर ऊँची जाति के लोगों द्वारा उनके बर्तनों को भरने तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी, क्योंकि उन्हें इस कुंड को सीधे इस्तेमाल की अनुमति नहीं थी। यह ऊँची जाति के लोगों के लिये भी एक कठिन काम था, क्योंकि अछूत की व्यवस्था को कायम रखने के लिये उन्हें काफी सवेरे अथवा देर रात में भी नीची जाति के लोगों के लिये कुंड से पानी निकालना पड़ता था। इसके अतिरिक्त, छुआछूत व्यवस्था के विरुद्ध कानून बनने से उनके सामने मजबूरी थी और पंचायत या अन्य संस्थानों के लिये किये जाने वाले चुनावों में उन्हें नीची जाति के लोगों के वोटों की जरूरत पड़ती थी। चूँकि इन कुंडों का निर्माण सरकारी धन से किया गया था, इसलिये उन्होंने सबसे अच्छे कुंड को नीची जाति के परिवारों को देने का निश्चय किया, क्योंकि बड़ी जातियों के पास अपने कुंड पहले से ही मौजूद थे। सबसे अच्छे कुंडों को नीची जातियों को देने से ऊँची जाति के लोगों को सामाजिक एवं राजनैतिक दोनों ही क्षेत्रों में फायदा हुआ है।

सार्वजनिक हस्तक्षेप

सार्वजनिक हस्तक्षेप दो प्रकार से किये गए हैं- पीने के पानी की पाइपों से आपूर्ति और सार्वजनिक कुंडों का निर्माण आज से दस वर्ष पहले, तीन गाँवों के लिये एक सार्वजनिक जलापूर्ति योजना तैयार की गई थी। इसके तहत एक टंकी और कई नलों से गाँवों में पानी उपलब्ध कराया गया था। पर किसी कारणवश यह सप्लाई सिर्फ एक ही गाँव में हो सकी। जैसलान गाँव को थोड़ा भी पानी नहीं मिला, हालांकि चुनावों के वक्त दो-तीन दिनों के लिये पानी की सप्लाई की गई थी। इसके बाद जैसलान में एक और टंकी का निर्माण सन 1988 में किया गया था। आज ये दोनों ही टंकियाँ उपेक्षित पड़ी हुई हैं।

सार्वजनिक स्वास्थ्य और अन्य कार्यों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण, नल से पानी देने की योजना को शुरू करने में काफी वक्त लगने की सम्भावना है, क्योंकि एक तो यह बिजली की सप्लाई पर निर्भर है जो काफी अनियमित है। और दूसरे, यह योजना दो अन्य गाँवों से जुड़ी है, जो राजनीतिक दृष्टिकोण से काफी प्रभावशाली हैं।

चूँकि गरीब परिवारों के कुंडों का संरक्षण धन की कमी के कारण अच्छी तरह नहीं हो पाता है, इसलिये इन दो सार्वजनिक कुंडों का सरकार द्वारा निर्माण कराने से गरीबों को पानी मिलने में सहायता मिली है। इन परिवारों के कुंडों का रख-रखाव नहीं हो पाता था। उनका आगोर साफ नहीं होता था। दरारें आ जाने से काफी पानी रिसकर बर्बाद हो जाता था। कभी-कभी तो इन्हें ढकने के लायक कुछ नहीं होता था।

सार्वजनिक कुंडों के संरक्षण का काम भी एक जटिल समस्या है। इन्हें प्रति वर्ष कहीं-न-कहीं मरम्मत करने की जरूरत पड़ती है। पर यह काम कौन करेगा? संरक्षण का काम सामूहिक तौर पर करना मुश्किल है, क्योंकि इसके लिये गाँव वालों को तैयार करने की जरूरत होती है। चूँकि इन कुंडों का निर्माण सरकार ने बिना गाँव वालों की सहायता से करवाया है, इसलिये स्थानीय लोगों को इस कार्य के लिये तैयार करना और भी मुश्किल है।

उपेक्षित कुंड और सूखे गाँव

बीकानेर शहर से 36 किमी दूर स्थित बीकानेर-अनूपगढ़ रोड पर स्थित जलवाली गाँव में कुल 170 घर हैं। इस गाँव में सिर्फ एक छोटी नाडी थी, जो साल के अधिकतर महीनों में सूखी पड़ी रहती थी। इस समस्या से निबटने के लिये जलवाली के पूर्वजों ने 300 से भी अधिक कुंडों का निर्माण किया था। ये कुंड साधारणतः 6 मीटर गहरे और करीब 2 मीटर चौड़े हैं। इन कुंडों के गड्ढों के किनारों को चूना और राख से पलस्तर किया गया है। हरेक गड्ढे के ऊपर एक गुम्बदनुमा आवरण है, जो जमीन से 1-1.5 मीटर ऊँचा है। इस गुम्बद को स्थानीय भाषा में भिडा के नाम से जाना जाता है। इसका निर्माण फोग के पौधे की लकड़ी से किया जाता है, जिस पर मिट्टी लेप दी जाती है। गाँव के सभी कुंडों का एक ही जलग्रहण क्षेत्र है। एक समय में हरेक कुंड में दो से तीन छिद्र होते थे, जिससे वर्षा का पानी उसमें जमा हो सके। जलग्रहण क्षेत्र के संरक्षण का काम गाँव में सामूहिक तौर पर किया जाता था, पर हरेक कुंड की मरम्मत का काम व्यक्तिगत तौर पर किया जाता है। इस तरह, ये कुंड प्रकृति की अनियमितताओं से जूझने के लिये गाँव वालों द्वारा अपनाई गई समझदारी के प्रतीक थे। इन कुंडों के पानी का प्रयोग सिर्फ पीने के लिये किया जाता था। गाँव के खारा पानी वाले दो अन्य कुओं को अन्य जरूरतों के लिये प्रयोग में लाया जाता था।

आज, गाँव में पहले के कुंडों के बीच पानी के पानी की एक भव्य टंकी देखी जा सकती है। पहले की कुंड व्यवस्था की हालत काफी बिगड़ गई है। राजस्थान नहर से पानी आ जाने के बाद से वर्षाजल को जमा करने का चलन गाँव में पूरी तरह रोक दिया गया है। कुंडों के आगोर अब पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) के एक शोधकर्ता ने इनमें से एक कुंड में भेड़ का शव और एक अन्य कुंड में चिड़ियों का घोंसला पाया। कुछ कुंडों को आज भी राजस्थान नहर से प्राप्त पानी को जमा करने के काम में लाया जा रहा है, जिससे नहर से पानी उपलब्ध न होने के समय इसका प्रयोग किया जा सके। राजस्थान नहर के पानी की आपूर्ति काफी अनियमित है। कभी इस नहर से दो-तीन दिन तक लगातार पानी आता है और कभी 15-20 दिनों तक इसे रोक दिया जाता है।

गाँव वालों को कुंड व्यवस्था खोने का भी कोई पछतावा नहीं है। वे राजस्थान नहर को कभी न खत्म होने वाला मीठे पानी का स्रोत मानते हैं। उनके अनुसार, “कौन आगोरों की हिफाजत के लिये मेहनत करे”। कभी नहर में पानी नहीं उपलब्ध रहता है तो गाँव वाले 13 किमी दूर स्थित भद्रासर से पानी लाते हैं। वहाँ भी पानी का मुख्य स्रोत राजस्थान नहर ही है।

एक ग्रामीण ने अपने आँगन में एक कुंड का निर्माण करवाया है, पर वर्षाजल को इकट्ठा करने के लिये नहीं, बल्कि राजस्थान नहर से प्राप्त पानी के लिये। जब उससे इस बारे में पूछा गया तो उसने कहा, “मैं क्यों इतनी दूर स्थित कुंड तक हर रोज जाऊँ?” उसके घर से कुंड की दूरी 50 मीटर से भी कम है।

आज सिर्फ 100 के आस-पास कुंड देखने को मिलते हैं। बाकी कहाँ गए, कोई पता नहीं है। इनके गुम्बदों को जलावन के लिये बेच दिया गया है। इस तरह आने वाली नई पीढ़ी धीरे-धीरे ढाँचों को भूलती जा रही है। अगर किसी कारणवश राजस्थान नहर किसी मौसम में पानी की आपूर्ति नहीं कर पाये, तो गाँव में इन कुंडों को फिर से निर्मित करने से सम्बन्धित जानकारी किसी के भी पास नहीं होगी।

पर इस क्षेत्र का हरेक गाँव जलवाली की तरह नहीं है। लूणकरणसर से करीब 10 किमी दूर स्थित सुर्णाणा गाँव में वर्षाजल और भूजल को एक साथ जमा करने की पद्धति का एक अच्छा उदाहरण देखा जा सकता है। यहाँ वर्षाजल को एक ऐसे कृत्रिम तालाब की सहायता से जमा किया जाता है, जो सौ से भी अधिक वर्ष पुराना है। इस तालाब के आस-पास 60-70 कुईं या बेरियाँ हैं। इनमें पानी तालाब से रिसकर पहुँचता है। यहाँ अप्रैल के महीने में भी तालाब में काफी पानी उपलब्ध रहता है, क्योंकि इसके आगोर का गाँव वाले अच्छी तरह संरक्षण करते हैं।

राजस्थान नहर का पानी इस गाँव तक पहुँच चुका है, हालांकि सप्लाई अभी भी काफी अनियमित है। जब सीएसई का शोधकर्ता इस गाँव में पहुँचा, उस समय पिछले 15 दिनों से नहर का पानी नहीं आया था। जब नहर का पानी आने लगा, तालाब की उपेक्षा की गई। धीरे-धीरे, लोगों ने कुइयों की उपेक्षा करनी शुरू की। इसके फलस्वरूप, आज तालाब के आस-पास सिर्फ 15-20 कुईं ही बची हैं। सुर्णाणा गाँव में रह रहे 300 परिवारों में से सिर्फ 5 परिवारों के पास अपनी कुईं बची हुई है। वे इनका प्रयोग सिर्फ नहर से पानी नहीं मिलने वाले दिनों में ही किया करते हैं। वे लोग, जिनकी कुईं नष्ट हो चुकी हैं, आज काफी दुखी हैं। आज सुर्णाणा में तालाब को फिर से काम के लायक बनाने के लिये लोग तैयार हैं। राजस्थान नहर पर पूरी तरह आश्रित होने का फल उन्हें मिल चुका है।

लूणकरणसर से करीब 4 किमी दूर स्थित कालवास गाँव में कुल 60 परिवार रहते हैं। इनका मुख्य पेशा पशुपालन है। इस गाँव में पानी के पारम्परिक स्रोत एक नाडी और उसकी चारों ओर बनी बेरियाँ थीं। जनवरी के महीने तक इस नाडी में पानी रहता था। इसके बाद इन कुइयों को इस्तेमाल में लाया जाता था। हरेक परिवार के पास दो से तीन कुइयाँ हैं। इस गाँव में एक गहरा कुआँ भी है, हालांकि इसका पानी काफी खारा है। राजस्थान नहर का पानी इस गाँव तक पहुँच चुका है, पर इससे प्रत्येक 15 दिनों में सिर्फ एक ही बार पानी आता है। नहर के आने के बाद भी इस गाँव में पानी का मुख्य स्रोत कुईं ही है।

लूणकरणसर से करीब 18 किमी की दूरी पर स्थित राजपुरिया गाँव भी राजस्थान नहर के सम्मोहन में फँसा हुआ है। यह गाँव में एक बड़े कुएँ पर निर्भर करता है, हालांकि इसका पानी थोड़ा खारा है। यहाँ मीठे पानी का कोई स्थानीय स्रोत नहीं है। पहले इस गाँव में एक टांका हुआ करता था, जिससे सारे गाँव को मीठा पानी मिलता था। पर धीरे-धीरे इस टांका की उपेक्षा की गई, और इसका आगोर बिगड़ता चला गया। गाँव वाले इसका कारण कुछ ही दिनों पहले आये अकाल को मानते हैं, जिसकी वजह से गाँव के अधिकतर लोग आस-पास के इलाकों में चले गए थे। इसका गाँव के सामाजिक जीवन और आपसी एकता पर बहुत बुरा असर पड़ा। इस टांका को साफ करने के लिये आज कोई राजी नहीं है।

 

 

सुरक्षित कुंड : चुरु के खजाने


थार मरुस्थल का प्रवेश द्वार चुरु जिला एक निर्जन दिखने वाला क्षेत्र है। यहाँ आक-जवास के झाड़ और जगह बदलते बालू के ढूँह भरे पड़े हैं। गर्मी के दिनों में हर साल निश्चित रूप से यहाँ का तापमान सबसे अधिक रिकॉर्ड किया जाता है। यहाँ के कुएँ खारे और काफी गहरे होते हैं। यहाँ पाइपों अनियमित सप्लाई वाला पानी घरेलू जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पाता है। इस समस्या से निपटने के लिये यहाँ गाँव वालों ने खुद मानसून में जल को इकट्ठा करने के लिये कुंडों को तैयार किया है।

लहसेडी गाँव के रण सिंह, जो कुंडों को तैयार करने वाले माने हुए मिस्त्रियों में से एक हैं, के अनुसार, “एक अच्छे कुंड को तैयार करना काफी कठिन काम है। इसके लिये जमीन पर उगे पेड़-पौधों को साफ करना होता है। आगोर को तैयार करने में काफी सावधानी बरतनी पड़ती है।” पाँच मीटर गहरे और 2.5 मीटर व्यास के कुंड को तैयार करने में 25 दिन लगते हैं और कुल खर्च 12,000 रुपए आता है। तैयार किये गए कुंड को ‘भिडा’ से ढँका जाता है। पारम्परिक तौर पर आसानी से उपलब्ध फोग की लकड़ी से इस ‘भिडा’ को तैयार किया जाता था जिस पर बाद में मिट्टी लेप दी जाती थी। आजकल इसके लिये बलुआ पत्थर या सीमेंट का प्रयोग होता है।

हालांकि अधिकतर कुंडों पर स्वामित्व निजी लोगों का है, फिर भी कुछ का निर्माण सार्वजनिक उपयोग के लिये भी किया गया है। निहाल सिंह कहते हैं, “गाँव (लहसेडी) के बाहर चुरु के एक बनिए ने सौ वर्ष पहले एक बड़े कुंड का निर्माण करवाया था।” इससे चुरु और हिसार के बीच पुराने ऊँटों वाले मार्ग पर चलने वाले यात्रियों को काफी राहत मिलती थी। एक अन्य प्रसिद्ध सार्वजनिक कुंड डाडरेवा में, जो चुरु और बीकानेर के बीच यात्रा करने वाले लोगों का नामी पड़ाव हुआ करता था, सन 1957 में तैयार करवाया गया था। इसकी देखभाल करने वाले सुंगा राम शर्मा काफी गर्व से बताते हैं, “यह यात्रियों की साल भर सेवा करने के अलावा योद्धा सन्त गोगाजी चौहान की समाधि पर, सावन के महीने में, आने वाले करीब 15 लाख तीर्थयात्रियों की भी सेवा करता है।”

पिछले वर्ष इस गाँव को राजस्थान नहर से जोड़ा गया था और एक 10,000 लीटर की क्षमता वाली एक टंकी का निर्माण भी गाँव में करवाया गया था, फिर भी यहाँ पानी की सप्लाई काफी अनियमित है। गर्मी के दिनों में यहाँ सप्ताह में सिर्फ एक ही दिन पानी आता है। चंद्रावती देवी के अनुसार, “इसके बाद कुंड का ठंडा पानी ही हमारी प्यास बुझाने का एकमात्र सहारा होता है। नल के पानी का उपयोग पशुओं की जरूरतों को पूरा करने के लिये किया जाता है।”

कुंड का पानी पशुओं की भी प्यास बुझाता है। चुरु-बीकानेर राजमार्ग पर स्थित न्यांगली गाँव के थोड़ा बाहर एक बड़े कुंड का निर्माण सोबाक सिंह ने सन 1957 में करवाया था, जिसका हौज 7 मीटर गहरा था और इसका आगोर कोयला-राख से तैयार किया गया था। इस कुंड के बाहर एक छोटा हौज था, जिसे एक नाली के द्वारा जोड़ा गया था। इसमें पशुओं के पीने के लिये पानी रखा जाता था। आज यह नाली क्षतिग्रस्त हो गई है, क्योंकि “हम पास के छोटे कुंड को अपने जानवरों के लिये प्रयोग में ला रहे हैं।”

राजस्थान नहर के आने से कुंडों की महत्ता में कुछ कमी आई है। न्यांगली के अधिकतर कुंडों की हालत काफी खराब है और लहसेडी में, पिछले पाँच वर्षों के दौरान, सिर्फ गिने-चुने कुंडों की खुदाई की गई है। यहाँ पानी की आपूर्ति काफी अनियमित है, इसलिये गाँव वालों ने कुंडों की पूरी तरह उपेक्षा नहीं की है। न्यांगली के कंवरपाल सिंह बताते हैं, “अब हम इन्हें पानी के एक अतिरिक्त स्रोत की भाँति देखते हैं।” पर, डाडरेवा में, जहाँ पानी की सप्लाई थोड़ी अधिक नियमित है, अधिकतर घरों में कुंड नहीं रह गए हैं।

हालांकि राजस्थान सरकार ने सत्तर के दशक के शुरू से ही कुंडों को छोटे स्तर पर की जाने वाली सिंचाई और पीने के पानी जैसी जरूरतों के लिये बढ़ावा देना शुरू किया था, परन्तु उसने कुंडों को पीने के पानी के संकट को दूर करने के एक अनुपूरक स्रोत की भाँति ही माना है। चुरु के लगभग 950 गाँवों में पानी उपलब्ध कराने के बाद सरकार का मानना है, जैसा कि चुरु के जिला कलेक्टर, आर.एन. अरविंद भलीभाँति प्रकट करते हुए कहते हैं, “कुंड सीमित माँग की ही पूर्ति कर सकते हैं।”

पिछले वर्ष सरकार ने व्यक्तिगत रूप से कुंडों के निर्माण के लिये दी जाने वाली आर्थिक सहायता पर रोक लगा दी थी। पर अरविंद का मानना है, “इस जिले के लोग इस व्यवस्था को जारी रखना चाहते हैं और जिला प्रशासन भी इसका समर्थन करता है।”  केन्द्र सरकार द्वारा चलाई जा रही जवाहर रोजगार योजना के तहत पंचायतों को, सार्वजनिक उपयोग के लिये कुंडों का निर्माण कराने के लिये, आर्थिक सहायता दी जाती है।

अभी, पंचायतों द्वारा निर्मित कुंड पीने के पानी की सार्वजनिक स्रोत व्यवस्था प्याऊ की भाँति काम कर रहे हैं। इससे यात्रियों को भी काफी सहायता मिल रही है। गाँव वालों को अपने दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लिये इन कुंडों को उपयोग में लाने की अनुमति नहीं दी गई है। पंचायत के कुंड की देखभाल करने वाले लहसेडी गाँव के 65 वर्षीय महावीर प्रसाद शर्मा कहते हैं,“मैं प्रतिदिन कई लोगों की प्यास बुझाता हूँ, पर मुझे अपने परिवार के लिये इस कुंड को उपयोग में लाने की अनुमति नहीं है।”

चूँकि अधिकतर कुंडों पर स्वामित्व अलग-अलग लोगों का है, इसलिये गरीब लोगों के लिये मीठा पानी एक दुर्लभ वस्तु है। न्यांगली के दुलाराम खेद प्रकट करते हुए कहते हैं, “मेरे जैसे गरीब लोगों को कुंड के पानी को उपयोग में लाने की अनुमति नहीं दी गई है।” इसी तरह, राम सिंह, जिन्होंने एक मजदूर की तरह 15 वर्ष की आयु से ही इन कुंडों को तैयार करना शुरू किया था, के पास कोई भी अपना कुंड नहीं है और वे अब भी अपने परिवार की पीने के पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिये अनियमित पानी की आपूर्ति पर निर्भर करते हैं।

 

 

जैसलमेर : मरुस्थल का मरुद्वीप

ए.एस. कोलारकर

‘जल संचय’ शब्द पुरानी किताबों में नहीं मिलेगा, पर जैसलमेर की अथाह मरुभूमि में 15वीं सदी में पालीवाल ब्राह्मणों ने खड़ीन बाँधों के जरिए जो काम शुरू किया उसे यही दो शब्द सही ढंग से बता सकते हैं। खड़ीन से साल में कम-से-कम एक फसल होने की पक्की व्यवस्था हो जाती है। यह सिर्फ मौसम की मुश्किलों को ध्यान में रखकर ही नहीं विकसित हुई है। इससे थोड़ा-बहुत जो भी पानी गिरे वह संचित हो जाता है और खेतों का बिगड़ना रुकता है। यह बहुत ही ठोस वैज्ञानिक आधार पर बनती थी और आज तक प्रासंगिक है।

जैसलमेर क्षेत्र की जलवायु काफी गर्म और शुष्क है। यहाँ वर्षा का वार्षिक औसत सिर्फ 164 मिमी है और औसतन प्रत्येक वर्ष सिर्फ 7.7 दिन वर्षा होती है। फसलों की सामान्य जरूरतों के मद्देनजर, जो 250 मिमी से काफी अधिक होती है, यहाँ जलवायु खेती के लिये उपयुक्त नहीं है। कम पानी में उपजने वाले ज्वार-बाजरा को भी इतनी कम वर्षा पाने वाले क्षेत्रों में उपजा पाना काफी मुश्किल काम है। खड़ीन मूलतः भागते पानी को रोकने की व्यवस्था है। ऊँचे जल ग्रहण क्षेत्रों से बहने वाले पानी को खड़ीन बाँधों की सहायता से रोका जाता है, जहाँ मानसून के दिनों में जमा किया जाता है। इससे खड़ीनों में नमी तैयार होती है, जो जाड़े के मौसम तक पौधों की जड़ों में निरन्तर पहुँचती रहती है।

सारिणी 2.7.8 : मरुभूमि विकास के तहत सातवीं योजना में खड़ीनों के लिये निर्धारित रकम

वर्ष

रुपए (लाख में)

1985-86

110.00

1986-87

125.00

1987-88

135.00

1988-89

150.00

1989-90

175.00

कुल

695.00

स्रोत : ए.एस. कोलारकर



सारिणी 2.7.9 : शुष्क खेती पर खड़ीनों का प्रभाव

 

खड़ीन खेत

बिना खड़ीन वाले खेत

प्रति परिवार

औसत जोत (हेक्टेयर)

12

8

प्रति घर औसत पशु

70

40

कुल पशुओं में बड़े जानवरों का प्रतिशत

36

27

जानवरों का प्रतिवर्ष औसत मोल (रुपए)

4,400

2,017

जानवरों से मिलने वाली चीजों की बिक्री से मिली रकम (रुपए)

2,500

1,500

प्रवासी पशुओं का अनुपात (प्रतिशत)

44

57

स्रोत : ए.एस. कोलारकर


खड़ीनों की जमीन जमा हुए पानी के साथ आई बारीक मिट्टी के भारी मात्रा में जमा होने से बनती है। यह मिट्टी काफी समय तक गीली या नम रहती है। चूँकि नम दशा मिट्टी के खनिजों के रासायनिक अपक्षयण, सूक्ष्म जीवों की सक्रिय गतिविधियों और अपघटन के लिये काफी अनुकूल होती है, इसलिये खड़ीन की मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा औरों से अधिक होती है और इनमें अन्य मरुस्थलीय जमीन की अपेक्षा अधिक पौष्टिक तत्व पाये जाते हैं।2 खड़ीन पिछली कई शताब्दियों से, मिट्टी अथवा जमीन को हानि पहुँचाए बिना काफी कुशलता से अपना काम कर रही है। मिट्टी को निरन्तर उपजाऊ बनाते रहने और उसमें नमी लाने की वजह से इन क्षेत्रों की जमीन काफी उपजाऊ हो गई है। इन्हीं कारणों से खड़ीनों के आस-पास की जमीन में घने पेड़-पौधे तुरन्त पनपने लगते हैं। मरुस्थलीय क्षेत्रों में खड़ीनें नखलिस्तान उगाने का काम करती हैं।

सन 1892 में जैसलमेर राज्य के शासकों द्वारा पालीवाल ब्राह्मणों को भगाने के पहले तक अधिकतर खड़ीनों का निर्माण इन्हीं ब्राह्मणों ने करवाया था। हालांकि जमीनों पर स्वामित्व शासकों का ही होता था, परन्तु खड़ीनों का निर्माण करने के लिये समुदायों को छूट दी गई थी। बदले में ये समुदाय शासकों को उपजाई गई फसल का एक हिस्सा दिया करते थे। इसके बाद के वर्षों में जैसलमेर के शासकों ने खड़ीनों के निर्माण के लिये पालीवालों को वापस बुलाने की काफी चेष्टा की। पर वे लौटकर वापस नहीं आये। सन 1980 के बाद से राजस्थान सरकार भी नए खड़ीनों का निर्माण कर रही है। पुरानी खड़ीनें भी काम में लाई जा रही हैं।

राज्य के मिट्टी और पानी के स्रोतों को संरक्षित करने के लिये तैयार किये गए कार्यक्रमों में खड़ीनों पर विशेष ध्यान दिया गया है। विभिन्न संस्थानों (जैसे केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसन्धान संस्थान और राज्य दूरसंवेदी व्यवहृत केन्द्र) ने नई खड़ीनों के निर्माण के लिये उपयुक्त क्षेत्रों के नाम सुझाए हैं। जैसलमेर जिले में किये गए मिट्टी के एक सर्वेक्षण के अनुसार, जिले में खड़ीनों के निर्माण के लिये अभी भी कई क्षेत्र उपयुक्त हैं, जिससे 118.600 हेक्टेयर की जमीन को उपयोगी बनाया जा सकता है। इस व्यवस्था के कार्यान्वयन से न सिर्फ फसलों की उपज बढ़ाई जा सकती है, बल्कि मरुक्षेत्रों में मानव निर्मित कई नए मरुद्वीपों को भी तैयार किया जा सकता है। इससे पर्यावरण, पशुओं और मरुस्थलों में रहने वाले लोगों की सामाजिक और आर्थिक दशा को सुधारने में काफी मदद भी मिलेगी।

 

 

जोधपुर : बँटवारे पर बवाल

सौरभ सिन्हा

हालांकि जैसलमेर की प्राचीन खड़ीनें सतह पर पाये जाने वाले पानी के स्रोतों का न्यायोचित ढंग से बँटवारा करने की व्यवस्था को बढ़ावा देती हैं, पर गैर सरकारी संगठनों द्वारा तैयार की गई कुछ खड़ीनें, तकनीकी कारणों से, ऐसा करने में विफल रही हैं।

इन खड़ीनों से होने वाले फायदे का बँटवारा इनके अधिकृत जोत क्षेत्रों के निर्धारित स्थान पर निर्भर करता है। जलग्रहण क्षेत्र का आकार, ढलान और निर्धारित स्थान एवं अधिकार क्षेत्र का आकार और दिशा ही वर्षाजल को उपयोग में लाने के लिये अपनाए गए तौर-तरीकों का निर्धारण करते हैं। लाभभोगियों के बीच होने वाले विवादों से बचने के लिये खड़ीन के अन्दर की जमीनों के मालिकों के बीच जमीन का बँटवारा बाँध की लम्बाई की दिशा में करना चाहिए। पानी के अनियमित फैलाव की वजह से कभी-कभी किसान खड़ीन के अधिकार क्षेत्र में पानी का बराबर बँटवारा न होने की शिकायत करते हैं। उपयुक्त जगहों पर खड़ीनों को विकसित करने में अभी की जमीन बाँटने की व्यवस्था एक प्रमुख बाधा है। इसके अतिरिक्त खड़ीन में जमा जरूरत से अधिक पानी को निचले हिस्सों में बनी खड़ीनों तक पहुँचाने के लिये किसानों को प्रोत्साहित करना चाहिए। पानी को जरूरत से अधिक मात्रा में जमा रखने से उपज वाले क्षेत्रों को हानि पहुँचेगी और पानी को काम में लाने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ेगा। खड़ीनों का ठीक से सर्वेक्षण न करने से जलग्रहण क्षेत्र से इसके प्रभावी अधिकार वाले क्षेत्रों में होने वाले बहाव में रुकावट आएगी। इससे किसानों के बीच विवाद भी उत्पन्न हो जाते हैं। कई किसानों ने समिति के पास यह शिकायत दर्ज की है कि उनकी जमीन के सामने खड़ीनों के होने से वे अपने खेतों में उपज के लिये आवश्यक बहाव को उपयोग में नहीं ला पाते हैं। इससे खड़ीन और बिना खड़ीन वाली जमीन के बीच आर्थिक विषमताएँ बढ़ने की सम्भावना है, जो बाद में कई जटिल विवादों को जन्म दे सकती है।

इन कम वर्षा पाने वाले क्षेत्रों में यह व्यवस्था काफी उपयोगी है। इसे बढ़ावा देने के लिये और भी आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता है। हालांकि, पानी के बराबर के बँटवारे के लिये जरूरी कदमों को उठाने के लिये किसानों को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

 

 

राजस्थान : पानी भी बना पराया


आर. परमशिवम और वी. ए. म्हाईसाल्कर

वर्ष 1990 तक संसार के सभी लोगों को साफ पानी और स्वास्थ्य रक्षा की सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिये संयुक्त राष्ट्र के अन्तरराष्ट्रीय पेयजल आपूर्ति एवं स्वच्छता दशक (1980-1990) प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वालों में भारत भी था। ग्रामीण क्षेत्रों में पानी पहुँचाने के उद्देश्य से भारत सरकार ने फरवरी 1986 में पेयजल पर एक टेक्नोलॉजी मिशन प्रोग्राम शुरू किया था। सन 1985-86 के आँकड़ों के अनुसार, देश के कुल 2,27,000 समस्याग्रस्त गाँवों में से करीब 1,54,300 गाँवों (86 प्रतिशत) में पानी के स्रोत नहीं थे। 43,600 गाँवों (19 प्रतिशत) में पानी के स्रोत प्रदूषित हो चुके थे और 29,100 गाँवों (13 प्रतिशत) के स्रोतों में अकार्बनिक रासायनिक तत्वों की मात्रा काफी अधिक थी।1

पिछले दशक में इस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र में किये जाने वाले निवेश में भारी बढ़ोत्तरी करने के बावजूद तय किये गए लक्ष्य को नहीं पाया जा सका। अब भी भारत की एक बड़ी जनसंख्या के पास पीने के साफ पानी के पर्याप्त स्रोत उपलब्ध नहीं हैं। इस सन्दर्भ में देश में काम में लाई जा रही पारम्परिक जल संचय विधियों का, विशेषकर राजस्थान में मूल्यांकन करना अति आवश्यक है।

भारत में जल संचय की परम्परा नई नहीं है। शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पानी को जमा रखने की परम्परा काफी दिनों से चली आ रही है। पश्चिमी राजस्थान में, विशेषकर बाड़मेर जिले में जहाँ वर्षा की वार्षिक दर करीब 200 मिमी है, उपलब्ध पानी सिर्फ पीने के लिये भी काफी नहीं है। इसके अतिरिक्त, इसके बहुत बड़े क्षेत्र में सिर्फ खारा भूजल ही मिलता है। इस जिले के लगभग 76 प्रतिशत क्षेत्र के भूजल में मिले नमक के कणों (डीटीएस) की मात्रा, प्रत्येक 10 लाख कणों में 1,500 से 10,000 तक पाई जाती है। ऐसी दशा में लोग पीने के पानी और खेती के लिये जमा किये गए वर्षाजल पर ही निर्भर करते हैं।2,5

इस जिले के लोग ज्यादातर बिखरी हुई बस्तियों में रहते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘ढाणी’ कहा जाता है। यहाँ की भू-आकृतियाँ बालू के ढूह, रेतीले मैदानी क्षेत्र और लहरियेदार बालुई मैदान आदि प्रमुख हैं। पर गर्मी के दिनों में भी इन क्षेत्रों में वर्षाजल को जमा करने की पारम्परिक तकनीकों की सहायता से साफ और पीने का मीठा पानी उपलब्ध रहता है। सन 1950 के दशक में वर्षाजल को जमा करने के प्रति जैसलमेर जिले में एक नई अभिरुचि जागी, जिसके फलस्वरूप कम खर्च में कुछ भूजल ग्रहण क्षेत्रों को तैयार किया गया, जिससे घरों और पशुओं, दोनों के लिये पानी का आपूर्ति सम्भव हो सके। इनका अच्छी तरह संरक्षण करने से क्षेत्र में पानी की आपूर्ति काफी अच्छी हो गई है।


सारिणी 2.7.12 : बाड़मेर जिले के गाँवों के पानी में लौह तत्वों की ज्यादा मात्रा

तहसील

गाँव

स्रोत

लौह तत्व (मिग्रा/लीटर)

पचपद्रा

गंगवास

बेरी

4.54

पचपद्रा

मांडली

नाडी

4.05

शिव

मागा-का-गाँव

टांका

1.42

बाड़मेर

खियाला

नाडी

1.53

बाड़मेर

बनवा

नाडी

2.27

बाड़मेर

सलारिया

टांका

10.75

बाड़मेर

पांडी-का-पार

बेरी

5.10

शिव

डाबर

टांका

1.15

बाड़मेर

अभे-का-पार

बेरी

2.98

बाड़मेर

देतानी

नाडी

3.44



सारिणी 2.7.13 : बाड़मेर जिले के पारम्परिक जलस्रोतों में गन्दगी का स्तर: बदहाल व्यवस्था

गाँव

स्रोत

प्रति 100 मिली में कुल कोलीफार्म

मुनाबाओ

टांका

असंख्य

बन्दसर

टांका

32,800

जलीला

टांका

असंख्य

बूठिया

टांका

असंख्य

बीरढ का पार

टांका

असंख्य

गाग्नियो का पार

टांका

असंख्य

पुंडपुडिया

टांका

13,000

मांडूप का पार

टांका

18,600

गागरिया

टांका

असंख्य

सिडारी चरणान

टांका

असंख्य

गणगवास

टांका

असंख्य

कूरी

टांका

24,200

कोनारा

टांका

असंख्य

कोनारा

टांका

37,800

केल्नोर

टांका

असंख्य

टिप्पणी : यह अधिकतम सम्भव संख्या है।


पाइपों से पानी की सप्लाई करने की व्यवस्था के आ जाने से पारम्परिक पानी को जमा रखने की व्यवस्था की उपेक्षा की जा रही है। पर 1980 के दशक में भयंकर अकाल के आने से एक बार फिर से लोगों का ध्यान पारम्परिक जल संचय व्यवस्थाओं की तरफ गया है।

कितना स्वच्छ पानी

हालांकि जल संचय व्यवस्थाएँ कई शताब्दियों से चली आ रही हैं, फिर भी इनके वितरण सम्बन्धी जानकारी, इनसे प्राप्त पानी की गुणवत्ता और इनसे जुड़े स्वास्थ्य एवं सामाजिक और आर्थिक पहलुओं पर लिखत-पढ़त में कुछ खास उपलब्ध नहीं है।

पीने के पानी से सम्बन्धित समस्याओं को दूर करने के लिये, राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसन्धान संस्थान (नीरी) ने सन 1988 के अप्रैल-मई महीनों में, चार छोटे जिलों का बड़े स्तर पर, अध्ययन किया था। ये चार जिले थे: बाड़मेर (राजस्थान), नागपुर (महाराष्ट्र), कोरापुट (ओडीशा) और पूर्वी सिक्किम (सिक्किम)। इसमें पहली बार, पानी की गुणवत्ता का अध्ययन इन जिलों के कई गाँवों में किया गया था। बाड़मेर जिले के 853 गाँवों में से 835 को समस्याग्रस्त गाँव माना गया था। 649 में पानी का एक भी स्रोत नहीं था। 69 में अत्यधिक रासायनिक तत्व पाये गए थे और 117 के पानी के स्रोतों को कीटाणुओं से प्रदूषित पाया गया था। जिले के 312 समस्याग्रस्त गाँवों, जिनका वर्गीकरण ‘फेड’ ने सन 1988 में किया था, के 351 स्रोतों (जैसे नाडी, टांका, खुले कुएँ और नलकूप आदि) से प्राप्त पानी की गुणवत्ता का मूल्यांकन किया गया था।3


सारिणी 2.7.14 : बाड़मेर जिले के प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में 1986-1987 में दर्ज पानी से जुड़ी बीमारियाँ

बीमारियाँ

प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र

 

बाड़मेर (1987)

सिवाणा (1987)

गुडामलाणी (1987)

धोरीमाणा (1987)

बैतू (1987)

सिंधारी (1987)

चोहटन (1986)

शिव (1986)

हैजा

शून्य

शून्य

शून्य

शून्य

शून्य

शून्य

शून्य

शून्य

टाइफाइड

28

6

3

शून्य

61

36

25

26

पारा-टाइफाइड

शून्य

-

-

-

-

-

-

-

अमीबाजनित रोग

1,087

135

87

15

162

372

30

136

गैस्ट्रोएंटिराइटिस

2,749

-

377

1,064

648

230

500

131

यूरिनरी कैलुलस

-

-

शून्य

-

26

2

-

-

पोलियो

9

शून्य

शून्य

6

शून्य

शून्य

शून्य

शून्य

नारू

711

शून्य

शून्य

शून्य

शून्य

शून्य

-

-

वायरल हेपेटाइटिस

-

-

17

5

शून्य

शून्य

शून्य

38

पीलिया

-

22

-

-

-

-

-

-


पानी के अधिकतर नमूनों में स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने में सक्षम फ्लोराइड और नाइट्रेट वांछित स्तर से अधिक था। अधिकतर मामलों में पूरी तरह घुले हुए ठोस पदार्थ, जैसे लोहा और मैंगनीज, भी वांछित स्तर से काफी अधिक मात्रा में उपलब्ध थे, जिसके कारण कई गाँव अत्यधिक रासायनिक तत्व वाले गाँवों की श्रेणी में आ गए थे।

पानी के पारम्परिक स्रोतों जैसे टांका और नाडी से जमा किये गए पानी के कुछ नमूनों को मल-मूत्र से प्रदूषित पाया गया। कई गाँवों में टांके बहते हुए कचरों से बुरी तरह प्रदूषित थे। टांकाओं से जमा किये गए पानी के नमूनों में क्लोरीन का काफी अधिक मात्रा में मिलना इनमें अत्यधिक कार्बनिक तत्वों के होने का एक प्रमाण है। इसके अतिरिक्त कई टांकाओं में तरह-तरह के कीड़े-मकोड़े भी पाये गए।


पानी से उत्पन्न बीमारियाँ

पीने के उपयोग में लाये जाने वाले पानी में बीमारी फैलाने वाले कीटों-जीवाणुओं को नहीं पनपने देना चाहिए और इनमें पाये जाने वाले कार्बनिक और अकार्बनिक तत्वों की मात्रा को जरूरत से अधिक नहीं होने देना चाहिए।

साफ पेयजल उपलब्ध कराने के प्रावधान का मतलब उसकी गुणवत्ता और मात्रा दोनों से है। अगर प्रति व्यक्ति पानी की खपत की दर काफी कम है, तब भी यह सुरक्षित आपूर्ति नहीं मानी जाएगी, चाहे पानी कितना भी शुद्ध क्यों न हो। अनुभव बताता है कि दस्त सिर्फ पानी के पर्याप्त उपलब्धता से ही कम हो जाते हैं। इसके लिये पानी की गुणवत्ता आवश्यक नहीं है।


सारिणी 2.7.15 : डुंगरपुर और बाँसवाड़ा की बावड़ियों के जल की शुद्धता

स्रोत

प्रति 100 मिली कुल कोलीफार्म

मानव अवशिष्ट वाले कोलीफार्म/100 मिली

नारु के कीड़े/100 मिली

डूंगरपुर

   

बारोड-बाकलावाला कुआँ

56,100

8,350

-

बारोड-फुटेरिवाला कुआँ

12,250

5,650

-

घरामोरैया कुआँ

37,900

2,600

-

खेमारू-पुजेला कुआँ

11,300

1,200

-

माटूगामडा पुजेला

7,450

1,070

-

माटूगामडा बोहारिया कुआँ

38,850

3,050

-

बाँसवाड़ा

   

सुंदाणी बावड़ी

26,700

-

276

मोटायाम बावड़ी

28,400

-

15

केरण्णा बावड़ी

12,600

10,500

5



विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अनुमान लगाया है कि विश्व की 80 प्रतिशत बीमारियों की जड़ अपर्याप्त अथवा अस्वच्छ पानी है। प्रदूषित पानी को पीना, कीड़े-मकोड़ों का पानी के स्रोतों में पनपना और पानी की सफाई न होने के कारण फैलने वाली बीमारियाँ आदि आती हैं।1

पानी की गुणवत्ता का स्वास्थ्य पर प्रभाव

बाड़मेर जिले में किये गए एक अध्ययन से पता चला कि यहाँ के लोग, बिना किसी शिकायत के, ऐसे पानी को पीने के इस्तेमाल में ला रहे थे जिसमें ‘टीडीएस’ की मात्रा 1,500 से 3,000 मिग्रा प्रति लीटर थी। जिन क्षेत्रों में ‘टीडीएस’ की मात्रा 3,000 से 5,000 मिली ग्राम प्रति लीटर थी, वहाँ के लोग इसका इस्तेमाल तो कर रहे थे, किन्तु उसके खराब स्वाद की शिकायत भी कर रहे थे। इसके अतिरिक्त, 5,000 मिग्रा प्रति लीटर से अधिक की टीडीएस वाले पानी का प्रयोग सिर्फ जानवरों के लिये किया जा रहा था।

फ्लोराइडों के मामले में जहाँ कुछ गाँवों में दाँतों में चित्तीदार धब्बे प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिले, वहीं कंकाल या अपंगकारी फ्लोरोसिस किसी भी गाँव में नहीं पाया गया। पर, बच्चों में दाँत का फ्लोरोसिस काफी देखा गया।

पानी के कुछ पारम्परिक स्रोतों में नाइट्रेटों की मात्रा वांछित अधिकतम स्तर (45 मिग्रा/लीटर) से भी काफी अधिक होने के बावजूद, जिले के छोटे बच्चों में मेथामेग्लोबिनेमिआ नाम की बीमारी के होने का कोई प्रमाण नहीं मिला। इसका एक कारण बच्चों का माँ के दूध पर पलना हो सकता है। चूँकि स्थानीय जनसंख्या पानी के लिये पारम्परिक स्रोतों के साथ ही अन्य स्रोतों पर भी निर्भर है, इसलिये बीमारियों के लिये सिर्फ पारम्परिक स्रोतों को जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं होगा।

बाड़मेर में स्थित स्वास्थ्य केन्द्रों से प्राप्त आँकड़ों से पता चलता है कि जिलों में पानी से सम्बन्धित लगभग सभी बीमारियाँ पाई जाती हैं। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि इनमें उन लोगों को भी सम्मिलित किया गया है जो पारम्परिक स्रोतों के अलावा और भी कई स्रोतों को इस्तेमाल में लाते हैं।


सारिणी 2.7.16 : बाड़मेर जिले के पारम्परिक जल प्रबन्धों में नारु के जीवाणुओं की मौजूदगी

गाँव

स्रोत

जीवाणुओं की संख्या प्रति लीटर

मुनाबाओ

टांका

4

देताणी

टांका

15

खियाला

टांका

7

बनवा

नाडी

10

भीलों का पार

टांका

1

गार्डिया

टांका

11

सलारिया

टांका

7

शेरे-का-ताला

टांका

2

डाबा-का-पार

टांका

4

खींडा भारतसिंह

टांका

7

चीबी

खुला कुआँ

1

सोमेसरे नाया

खुला कुआँ

10

खार्डा भारतसिंह

खुला कुआँ

1

पीडियान का ताला

खुला कुआँ

2


सुधार की रणनीतियाँ

राजस्थान के बाड़मेर, डुंगरपुर, बाँसवाड़ा और सवाई माधोपुर जिलों में एक बड़े स्तर पर किये गए अध्ययन से पता चला है कि जल संचय के पारम्परिक प्रबन्धों के प्रदूषित होने के आसार, औरों की अपेक्षा काफी अधिक होते हैं और ये पीने के पानी के लिये तय किये गए मानदंडों को पूरा नहीं कर पाते हैं।

सारिणी 2.7.17 : जलस्रोतों की सापेक्षिक शुद्धता

तहसील

नमूनों की संख्या

चापाकल

कुएँ

टांका/नाडी

पीएसपी

कुल

कोलीफार्म की मौजूदगी

कुल

कोलीफार्म की मौजूदगी

कुल

कोलीफार्म की मौजूदगी

कुल

कोलीफार्म की मौजूदगी

शिव

3

3

2

1

2

2

8

6

बाड़मेर

4

3

14

13

8

8

6

4

पचपद्रा

1

1

1

1

2

2

4

4

चोहटन

4

3

8

8

4

4

2

2

सिवाणा

-

-

2

2

-

-

-

-

कुल

12

10

27

25

16

16

20

16

टिप्पणी : नमूनों की कुल संख्या : 75, अशुद्धियों वाले नमूने : 67, शुद्ध नमूने : 8

स्रोत : सभी सारणिया आर. परमशिवम और वी.ए. म्हाइसाल्कर

पानी की सामुदायिक आपूर्ति और स्वच्छता में सुधार लाने से लोगों की जीवन को काफी बदला जा सकता है, क्योंकि इसका सीधा प्रभाव स्वास्थ्य, आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरण जैसे पहलुओं पर पड़ेगा। खराब स्वास्थ्य का मनुष्यों की सामर्थ्य और उत्पादन क्षमता पर काफी बुरा असर पड़ता है। इसका एक उदाहरण नारु से होने वाला संक्रमण है जो सिर्फ पीने के पानी से ही फैलता है। गिनी-कृमि के संक्रमण से आदमी मरता तो कभी-कभी ही है, पर यह मनुष्य को हमेशा के लिये विकलांग बना सकता है। किसी-किसी क्षेत्र में, एक समय में 30-50 प्रतिशत निवासी अपंग हो सकते हैं। इससे किसान तीन महीने तक खेतों में नहीं जा पाते हैं, जिसका प्रभाव खेतों से होने वाले उपज पर पड़ता है।6

नारु को पूरी तरह खत्म करने के लिये निम्नलिखित तीन नीतियों पर विचार किया जा सकता है: (1) पानी के ऐसे स्रोतों का निर्माण, जिसका उपयोग इस संक्रामक रोग से पीड़ित लोग न कर सकें; (2) पानी को छानना; (3) रासायनिक तत्वों से इन्हें दूर रखना।

उन क्षेत्रों में जहाँ पानी की सुनिश्चित आपूर्ति नहीं है, वहाँ चापाकल और 100 माइक्रोन नायलन मेश से पानी की छनाई के साधन उपलब्ध कराने चाहिए (डब्ल्यूएचओ द्वारा अनुशंसित)। अन्य क्षेत्रों के लिये बावड़ियों को स्वच्छ कुओं में बदलने की अनुशंसा है, जिससे साफ पानी की सप्लाई सुनिश्चित की जा सके। पर इस बीच उसकी ठीक से सफाई होनी चाहिए।

आईआईटी चेन्नई के द्वारा प्रयोगशाला में किये गए परीक्षण से यह बात साबित हुई है कि 0.2 मिग्रा/लीटर की मुक्त अवशिष्ट क्लोरीन और 300 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान पर 12 घंटे की सम्पर्क अवधि से पानी में जमे नारू के सभी कीड़ों को खत्म किया जा सकता है। जिले के कुछ गाँवों में किये गए प्रयोग से यह बात सिद्ध हो चुकी है। इस तरह पानी के पारम्परिक अथवा अन्य स्रोतों को पॉट क्लोरिनेटरों, क्लोरीन के टैबलेटों या ब्लीचिंग पाउडर के घोल से अच्छी तरह क्लोरिनेट करने से नारु के कीड़ों और अन्य जीवाणुओं से बचा जा सकता है।

सहायक कार्यक्रम

स्थिति में सुधार के लिये ये कुछ जरूरी कदम हैं, जिनका एक साथ कार्यान्वयन करने से अच्छी सफलता मिल सकती है :

1. लोगों के लिये तैयार किया गया कोई भी प्रोग्राम तब तक सफल नहीं हो सकता है, जब तक लाभभोगी समुदाय इसमें सक्रिय रूप से भाग नहीं लेगा। स्वास्थ्य और सफाई की महत्ता से सम्बन्धित जानकारी लोगों को देने के साथ-साथ ऐसे कदम उठाने से उनके स्वास्थ्य और उत्पादन क्षमता को सुधारने में काफी मदद मिलेगी।

2. प्रदूषण को रोकने के लिये जल संचयक पारम्परिक पानी को जमा करने की व्यवस्थाओं के जलग्रहण क्षेत्रों की सुरक्षा काफी महत्त्वपूर्ण है।

3. जलग्रहण क्षेत्र, पानी जमा करने के स्रोत और इनमें से पानी को निकालने की व्यवस्था के निर्माण की तकनीकों में सुधार लाने से न सिर्फ इनकी क्षमता को बढ़ाया जा सकता है, बल्कि इससे प्रदूषण को रोकने में मदद भी मिलेगी।

4. इस दिशा में पहला कदम स्थानीय लोगों में पानी को जमा करने की विभिन्न व्यवस्थाओं से सम्बन्धित सही जानकारी और इनसे प्राप्त होने वाले पानी की गुणवत्ता और उसका स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के प्रति जागरुकता फैलाने से सम्बन्धित होना चाहिए।

 

 

गुजरात : पानी से जुड़ी कलाकारी


जुट्टा जैन - नूबाएर

बावड़ियाँ वास्तुकला और जल संचय व्यवस्था का एक अद्भुत रूप है, जो 7वीं शताब्दी के बाद से समूचे राजस्थान और गुजरात में आज तक बची हुई हैं। गुजरात में इनकी महत्ता और कौशल ने जो स्थान प्राप्त किया है उसे अब पार करना मुश्किल है। हालांकि पश्चिमी भारत की कला और वास्तुकला के इतिहास की कई किताबों में इन बावड़ियों की उपेक्षा की गई है, परन्तु इस क्षेत्र की वास्तुकला और शिल्पकला के विकास में आये बदलाव को ये भलीभाँति दर्शाती हैं।

ये बावड़ियाँ पानी तो देती ही थीं, पानी लेने आई औरतों और मर्दों के मिलने और आराम करने की जगह भी थीं। ऐसा माना जाता है कि यहाँ जीवन देने वाली कई प्रेतात्माएँ भी रहती हैं। बावड़ियाँ अक्सर तीन जगहों पर देखी जा सकती हैं- ये मन्दिरों के पास होती हैं या इनमें खुद ही एक मन्दिर या समाधि हो सकती है। ये गाँव के बीच में हो सकती हैं या गाँव के बाहर स्थित सड़क के साथ भी हो सकती हैं।

भारत में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के कुओं में से ये बावड़ियाँ अर्थात सीढ़ीदार कुएँ, वास्तुकला की दृष्टि से सबसे जटिल और पेचीदा मानी जाती हैं। इनकी एक विशेषता एक लम्बा सीढ़ीदार गलियारा है, जो पाँच या छह मंजिलों से होते हुए नीचे स्थित कुएँ तक पहुँचता है।

चूँकि इसका अधिकतर हिस्सा भूमिगत होता है, इसलिये यह एक भूमिगत मन्दिर के समान दिखता है। मीनारों की तरह के कई अनुप्रस्थ ‘कुत’ जिनका निर्माण कभी-कभी खुले स्तम्भों वाले मंडपों की तरह किया जाता है, किनारे की दीवारों को सहारा प्रदान करते हैं। सीढ़ीदार गलियारों को ये ‘कुत’ एक नियमित अन्तराल के बाद काटते हैं। ये गलियारे नीचे स्थित पानी के स्रोत तक पहुँचते हैं। बड़ी बावड़ियों में सात तक भूमिगत मंजिलें हुआ करती हैं। इनके निर्माण की विधि मिट्टी की दशा और भूजल की गहराई पर निर्भर करती है। गुजरात की बावड़ियों को इनके निर्माण सम्बन्धी विशेषताओं के आधार पर पाँच मुख्य वर्गों में बाँटा जा सकता है- एक, जिनमें सीढ़ीदार गलियारे एक सीधी लाइन में नीचे की तरफ बने होते हैं और सिर्फ एक प्रवेशद्वार होता है; दूसरा, जो पहले के ही समान होते हैं, पर इनमें तीन प्रवेश द्वार होते हैं; तीसरा, जिनमें सीढ़ीदार गलियारे आगे जाकर समकोण पर मुड़ गए होते हैं; चौथा, जिनके कुओं के चारों तरफ परिक्रमा करता बरामदा-सा होता है और पाँचवाँ, जिसमें बावड़ी में चारों दिशाओं से चार प्रवेश द्वार होते हैं, और पानी बिल्कुल मध्य में रहता है। अक्सर, सबसे निचले स्तर में एक चौकोर जलाशय बना होता है। बावड़ी का यह हिस्सा, सीढ़ीदार गलियारे की तरह, बिल्कुल खुला होता है। इस पानी के चारों तरफ एक बरामदेनुमा रास्ता होता है, जिसे खम्भों की सहायता से खड़ा रखा जाता है और जिसे शिल्पकला और नक्काशी से सजाया जाता है। ऊपरी मंजिलों में, एक निचली मुंडेर की दीवार, जिसमें झुके हुए पत्थर लगाए जाते हैं, से खुली जगहों को ढका जाता है। इसे ‘कक्सासणा’ कहा जाता है। साधारणतः इसे आकर्षक नक्काशी और कभी-कभी चिड़ियों, घोड़ों, हाथियों, लड़कियों, जोड़ों या अन्य दैविक चित्रों से सजाया जाता है। पास के क्षेत्रों में पानी पहुँचाने के लिये तैयार की गई पानी की नालियाँ या जानवरों के पीने नहाने के पानी के कुंड बावड़ी की दीवारों से जुड़े होते हैं।

ये घरेलू उपयोग और खेती की जरूरतों को पूरा करने के सबसे प्रमुख स्रोत हैं। उत्तरी गुजरात की शुष्क जलवायु में, जहाँ नदियों और पानी के अन्य प्राकृतिक स्रोतों में पानी वर्षा के मौसम के कुछ ही महीनों बाद तक उपलब्ध रहता है, ये बावड़ियाँ साल भर अपने जलभरों से साफ पानी उपलब्ध कराने के स्रोत हैं। बावड़ियाँ कभी सामाजिक मेलजोल और एक-दूसरे को सूचना देने की एक आदर्श जगह हुआ करती थीं। दिन की गर्मी से बचने के लिये लोग इसकी ठंडी छाँव में आराम किया करते थे। गाँव से बाहर बनी बावड़ियाँ सभी प्रमुख व्यापार मार्गों पर तैयार की जाती थीं। गुजरात के समुद्री तटों पर स्थित महत्त्वपूर्ण बन्दरगाहों से सामान को उत्तरी भारत में ले जाने वाले कारवां यहाँ आराम करते थे।

धार्मिक महत्त्व

मध्यकाल की कई पुस्तकों और अभिलेखों में इस बात का उल्लेख है कि जो भी व्यक्ति तालाबों, कुओं या बावड़ियों का निर्माण करता है उसे बलि देने वालों की अपेक्षा अधिक पुण्य मिलता है। जहाँ भगवान को प्रसाद चढ़ाने से सिर्फ पुजारियों को ही फायदा पहुँचता है, इन कुओं के निर्माण से सभी प्यासे प्राणियों की प्यास बुझती है।

गुजरात जैसे शुष्क राज्य में, सिर्फ बावड़ियों और तालाबों की खुदाई ही हमेशा के लिये पानी उपलब्ध कराने की गारंटी नहीं बन सकती है। इसलिये, पानी या उसमें बसने वाले भगवान की कृपा पाने के लिये पूजा-पाठ और भाग चढ़ाने की भी जरूरत पड़ती है। गुजरात में पानी और उसके स्रोतों की पूजा करने की प्रथा प्राचीनकाल से चली आ रही है। सम्भवतः मातृ देवी की उपासना-पद्धति का यह एक और रूप है। यह चीज गुजरात की बावड़ियों, जिन्हें गुजराती में ‘वाव’ कहा जाता है, के नामों से उद्घाटित होती है- जैसे, माता भवानी वाव, आसापुरी वाव, सिंधवाई माता वाव, अंकोल माता वाव, मातृ वाव और सिकोतरी वाव। ऐसा कहा जाता है कि शक्तितीर्थ हमेशा तालाबों (कुंडों) से जुड़े होते हैं। कई बावड़ियाँ स्वयं ही पूजा स्थल होती हैं, और कभी-कभी इनके प्रवेश द्वार से कोई छोटा पूजा स्थल जुड़ा होता है। ये पूजास्थल बावड़ी के स्तम्भों के पीछे की दीवार के अन्त में या बावड़ी के ठीक सामने बने मंडपों में बने होते हैं। अधिकतर बावड़ियों की दीवारें पूरी तरह शिल्पकलाओं से भरी होती हैं। इससे यह पता चलता है कि पानी से भरा अन्दर का जलाशय ही बावड़ियों का सबसे पवित्र स्थल है। इन शिल्पकलाओं में हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ एक सिरे से बनी होती हैं।

लोग पानी के स्रोतों पर जाकर अलग-अलग चीजों के लिये प्रार्थना करते हैं- जैसे सन्तान, अच्छी उपज और धन आदि। अपनी प्रार्थना पूरी हो जाने पर वे पानी के देवता को प्रसाद चढ़ाते हैं। यह अनाज, चावल, दूध, फल, नारियल, पशुबलि और स्वयं के बलिदान में से कुछ भी हो सकता है।

सौराष्ट्र में स्थित वाधवान की मधा बावड़ी से जुड़ा एक लोक गान पानी के बहाव को सुनिश्चित करने के लिये उत्सर्ग की महत्ता को दर्शाता है। यह एक सामान्य धारणा को भी उजागर करता है कि सभी कुर्बानियों में अपना उत्सर्ग सबसे प्रभावशाली होता है। यह गाना एक समय का वर्णन करता है जब पूरे 12 वर्ष तक, इस मधा बावड़ी में पानी सूख जाने से गाँव वालों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। इस समस्या को दूर करने का सिर्फ एक ही उपाय बचा था- एक नए शादीशुदा जोड़े का उत्सर्ग। देवी की यह माँग उस समय पूरी हुई जब एक चुने हुए जोड़े को इस कुएँ की सीढ़ियों से नीचे की तरफ उतारा गया। ऐसा करते ही कुएँ में पानी भरना शुरू हो गया। दूल्हा और दुल्हन उस समय तक नीचे की तरफ जाते रहे, जब तक बढ़ते हुए पानी ने उन्हें पूरी तरह अपने में समा नहीं लिया।

मूर्तियाँ और शिल्पकलाएँ

कुछ साहित्यिक प्रसंग पानी वाले प्रबन्धों में मूर्तिकला और शिल्पकला के होने का वर्णन करते हैं। इनका विस्तृत वर्णन सिर्फ 12वीं शताब्दी के अन्त में गुजरात में लिखी गई एक संस्कृत किताब, ‘अपराजिताप्रेच्छा’ और दक्षिण भारत में लिखी गई ‘विश्वकर्मा वास्तुशास्त्र’ में ही मिलता है। ‘अपराजिताप्रेच्छा’ के अनुसार, किसी बावड़ी में श्रीधरा, जलसाईं, 11 रुद्रों, भैरव, उमामहेश्वर, कृष्ण, दंडपाणी, दिक्पाल, आठ मात्रिकाओं, गंगा और नवदुर्गा जैसे देवी-देवताओं का वास जरूर होना चाहिए।

11वीं शताब्दी में तैयार पाटण के रानी वाव को समूचे गुजरात में पाई जाने वाली बावड़ियों में सबसे सुन्दर माना जाता है। इसके गलियारे की पूरी दीवार और बावड़ी की चाहरदीवारी को देवताओं और उनके सहचरियों जैसे ब्रह्मा-ब्रह्माणी, शिव-पार्वती, भैरव-कालिका और विष्णु-लक्ष्मी की मूर्तियों से सजाया गया है। इसके अतिरिक्त, इसमें शेषशाई विष्णु, महिषासुरमर्दिनी, गणेश के साथ सात मात्रिकाएँ, कुबेर, विष्णु के दसों अवतार, लाकुलिसा, सूर्य, ब्रह्मा, इंद्र, विश्वरूपा, देवियाँ, सुरसुन्दरी और अप्सराएँ नाच की भिन्न-भिन्न मुद्राओं और तरह-तरह के शृंगार करने की अवस्था में देखी जा सकती हैं।

इनके बावड़ियों में पाये जाने वाले चित्रों में दैनिक जीवन, कामुक तस्वीरें, मक्खन बिलोना, लड़ाई की तस्वीरें, राजकीय शोभायात्राएँ, सामान्य औरतों की आकृतियाँ, अलंकृत प्रस्तर गल, ज्यामितीय बनावटें, वनस्पतियों और जानवरों जैसे मूल विषयों को दर्शाते चौखट और पानी के जानवरों की तस्वीरें भी हैं। पानी में रहने वाले जानवरों जैसे कछुए, साँप, मछली और मकर की मूर्तियाँ सिर्फ बावड़ियों में ही पाई जाती हैं।

मुसलमानों द्वारा निर्मित बावड़ियों में अलंकृत मूर्तियाँ और दीवारें नहीं मिलती हैं। इनकी जगह वर्तिलेख और पत्तेदार टहनियों की खुदी आकृतियाँ मिलती हैं, जो कभी-कभी कलशों से निकलती हुई दिखाई देती हैं। अहमदाबाद की मस्जिदों में भी इसी प्रकार की सजावट है। हिन्दू परम्परा के अनुसार तैयार की गई बावड़ियों में, जिनका निर्माण मुसलमानों के शासनकाल में किया गया था, भी इस प्रकार की आकृतियों की नकल की गई थी। इन दोनों में इतनी समानताएँ हैं कि इन्हें एक-दूसरे से अलग करना काफी मुश्किल है।

मध्यकाल में कई बावड़ियों का निर्माण किया गया था। सबसे आधुनिक बावड़ी का निर्माण करीब 45 वर्ष पहले, वांकानेर महल में, निजी उपयोग और आरामगाह के लिये किया गया था। हालांकि गुजरात और राजस्थान की प्राचीन बावड़ियाँ आज भी बची हुई हैं, परन्तु इनमें से कई बेकार हो चुकी हैं। जिन क्षेत्रों में भूजल का स्तर काफी गिर चुका है, वहाँ की सभी बावड़ियाँ सूख गई हैं। अन्य बावड़ियों को कचरा जमा करने के स्थान की तरह इस्तेमाल में लाया जा रहा है। नगरपालिका द्वारा पानी की सप्लाई उपलब्ध कराने के बाद बावड़ियाँ किसी काम की नहीं रही हैं। सिर्फ अकाल के दिनों में ही इन्हें याद किया जाता है।

 

 

कच्छ : मालधारियों के चमत्कार


गुजरात के कच्छ जिले के उत्तरी मरुस्थलीय क्षेत्रों में स्थित बन्नी के विस्तृत रेतीले चारागाह में रहने वाले खानाबदोश मालधारी खारी जमीन और खारे पानी के बीच अपनी साल भर की पानी की जरूरतों के लिये खारे पानी के स्तर के ऊपर ही मीठा पानी जमा लेते हैं। इस क्षेत्र की कठिन जलवायु और अपर्याप्त वर्षा ने उन्हें वर्षाजल को अच्छी तरह जमा रखने के लिये उपयुक्त जगह खोजने के लिये विवश किया। सदियों से प्रकृति से सामंजस्य में रहने से वे उसकी विभिन्न मनोदशाओं को अच्छी तरह समझ चुके हैं। प्रकृति की इन अनियमितताओं से बचने के लिये उन्होंने एक विशेष तकनीक ‘विरडा’ को विकसित किया है जो वर्षाजल को जमा करने की एक अद्भुत व्यवस्था है।

बन्नी चारागाह कच्छ के बड़े रन का एक हिस्सा है और कच्छ के छोटे रन के साथ वह अरब सागर की ‘पुरानी भुजाओं’ का हिस्सा भी है, जो गाद से बन्द हो चुका है। प्रारम्भ में यहाँ 40 प्रकार की घास पाई जाती थी। आज इनमें से सात-आठ किस्में ही बची हैं। यहाँ जमीन की बनावट, वनस्पति और मिट्टी बड़े रन के खारे दलदलों से काफी भिन्न है। ‘विरडा’ एक प्रकार का छिछला कुँआ होता है, जिसकी खुदाई प्राकृतिक झीलों में की जाती है। यहाँ इस क्षेत्र के निवासी अपनी साल भर की पानी की जरूरतों को पूरा करने लायक वर्षाजल को जमा करते हैं। यह तकनीक मालधारियों की विपरीत स्थिति के अनुकूल खुद को ढालने की क्षमता को भलीभाँति दर्शाती है। वे साफ वर्षाजल के ऊपरी सतह तक पहुँचने वाले एक ढाँचे को तैयार करते हैं। जैसे ही वर्षाजल को निकाला जाता है, नीचे स्थित खारा पानी ऊपर उठने लगता है और ‘विरडा’ के निचले हिस्से में जमा हो जाता है।

चूँकि बन्नी की स्थलाकृति काफी समतल है, इसलिये यहाँ की जमीन पर बहुत कम ढाल जगहें (झील) हैं। मानसून के मौसम में पानी के बहाव को देखकर मालधारी इन जगहों का पता लगाते हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें यह भी पता है कि वर्षाजल मिट्टी में रिसकर नीचे जाने के बाद खारे भूजल के ऊपर जमा हो जाता है। वर्षा के पानी और खारे जल के घनत्व में फर्क से ऐसा होता है। और अधिक साफ पानी को जमा करने के लिये वे भूजल से करीब 1 मीटर ऊपर जमा हुए वर्षाजल की ऊपरी सतहों पर कई विरडाओं की खुदाई करते हैं। पानी के इन दो (मीठे और खारे) स्तरों के बीच खारे पानी का एक संक्रमण कटिबन्ध होता है।

पिछले कुछ दशकों में इन खानाबदोश मालधारियों ने गाँवों में बसकर रहना शुरू कर दिया है। अपने गाँवों के समीप इन्होंने विरडाओं की खुदाई भी की है। इस तरह, इन विरडाओं के लिये उपयुक्त स्थान और इनके निर्माण और संरक्षण से सम्बन्धित जानकारी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आसानी से पहुँच पा रही है। वर्षाजल को जमा करने की यह विशिष्ट तकनीक आज भी प्रयोग में लाई जा रही है।

यह तकनीक इस क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी के निर्विघ्न परिचालन पर निर्भर करती है। साफ पानी के जमीन में निर्बाध परिगमन के लिये अत्यधिक घास के आवरण का होना अति आवश्यक है। मानसून के दिनों में उत्तरी दिशा में बहने वाली नदियों का पानी कच्छ के बड़े रण में समुद्री पानी को आने से रोकता है, जिससे मिट्टी के खारेपन को नियंत्रित करने में सहायता मिलती है। प्राकृतिक वनस्पति को बचाने और जानवरों की संख्या को सीमित रखने से पारिस्थितिक सन्तुलन कायम रहता है। कच्छ के बड़े रन से सिर्फ पाँच किमी दूर स्थित धोरडो गाँव में पानी को जमा रखने की पाँच प्राकृतिक झीलें हैं। यहाँ पाँच विरडाओं का निर्माण किया गया है, जिनमें से गाँव के उत्तरी हिस्से में स्थित विरडा सबसे मुख्य है। इसमें सबसे अधिक पानी जमा रहता है। एक साधारण मानसून के दौरान (यहाँ औसत 317 मिमी वर्षा होती है) इन चार झीलों में पानी भरने के बाद अतिरिक्त पानी इस पाँचवी झील में आकर जमा हो जाता है। इससे ज्यादा पानी हुआ तो रण की तरफ बह जाता है।

इन मुख्य झीलों पर 31 विरडाओं का निर्माण समूचे समुदाय के सामूहिक प्रयास से हुआ था, जिससे पानी की समस्या दूर हो सके। सन 1961 में, भुज जिले के नेता, प्रेमजी ठक्कर गुजरात सरकार के राजस्व मंत्री बने। मालधारियों की सहायता करने के उद्देश्य से उन्होंने धोरडो गाँव में पानी जमा करने वाले एक बड़े जलाशय के निर्माण का काम शुरू करवाया, पर गाँव वालों ने पहले बनी झीलों को ही और चौड़ा और गहरा करने का निर्णय लिया। उन्होंने बड़ी झीलों को और गहरा किया और अन्य चार छोटी झीलों को भी चौड़ा किया। साधारणतः गाँव वाले हरेक दो वर्ष के बाद इसमें जमा गाद को श्रमदान के द्वारा साफ करते हैं।

धोरडो के विरडाओं की औसत गहराई 3.3 मीटर है। विरडा का गोलाकार कटोरेनुमा ऊपरी भाग रस्सी और बाल्टी की सहायता से पानी खींचने में सहायक होता है। इसमें पानी का स्तर कम हो जाने पर, औरत और बच्चे आसानी से अन्दर जा सकते हैं। इसके निचले भाग को सुदृढ़ बनाने के लिये एक विशेष प्रकार के पेड़ के तनों से बना एक चौखट तैयार किया जाता है। इन्हें एक-दूसरे के समान्तर रखा जाता है, जिसके बीच घास की सतह बिठाई जाती है। यह घास विरडा में घुसने वाली मिट्टी के कणों को छानने के जाल की तरह काम करती है।

सामान्य तौर पर दो या तीन परिवार एक साथ तीन से चार विरडाओं की खुदाई करते हैं, जिन्हें एक नाली से एक-दूसरे से जोड़ा जाता है। इन कुंडों को तैयार करने के लिये सूखी गाद और चिकनी मिट्टी का प्रयोग किया जाता है, जिन्हें एक विशेष प्रकार के वृक्ष की टहनियों की सहायता से बाँधकर रखा जाता है। गाँव के बड़े-बुजुर्गों की अगुवाई में गाँव वाले सप्ताह में एक या दो बार इनकी सतह में जमा गाद को निकालते हैं और पुनः इनकी मरम्मत के लिये उसी का इस्तेमाल करते हैं। इन कुंडों को जानवरों से बचाने के लिये इनके चारों ओर बाड़ लगाई जाती है। विरडाओं में जमा पानी की उपयोगिता के अनुसार, गाँव वाले इनका प्रयोग 20 दिन से चार महीनों तक कर सकते हैं। इसके बाद पानी बहुत खारा हो जाता है।

मालधारियों के जीवन में इन विरडाओं का प्रमुख स्थान है। सदियों से इनका प्रयोग एक सार्वजनिक स्थल के रूप में किया गया है, जहाँ पेड़ों की छाँव में लोग आराम करते हैं। बन्नी के गोचर की पारिस्थितिकी का एक अभिन्न हिस्सा बन गई यह विशिष्ट व्यवस्था आज संकट में है। विरडा में प्रयोग आने वाले पेड़, जिसका वैज्ञानिक नाम प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा है, का जोर बढ़ने से घास की उपज में वृद्धि पर रोक लग गई है, जिसके फलस्वरूप नमक मिट्टी की सतह तक पहुँच गया है। बन्नी के स्थानीय घास की किस्मों की संख्या में भारी गिरावट आई है और कुछ क्षेत्रों में विरडा तेजी से खारे होते जा रहे हैं।

नलकों से पीने के पानी की आपूर्ति शुरू होने से मालधारियों की विरडाओं पर निर्भरता काफी कम हो गई है, हालांकि यह आपूर्ति काफी अनियमित है और इसकी गुणवत्ता भी अच्छी नहीं है।

घटते गोचर, मालधारियों द्वारा बन्नी के बाहर के शहरों में पलायन और बाहरी बाजारों का स्थानीय अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप का बन्नी की नाजुक पारिस्थितिकी पर बहुत बुरा असर पड़ा है। जानवरों और जंगलों के उत्पादों से प्राप्त आमदनी के घटने के कारण मालधारियों ने अपने जीने के पारम्परिक ढंग को काफी हद तक छोड़ दिया है। गुजरात में दुग्ध सहकारी समितियों के फैलने के कारण इन्होंने पशुपालन करना भी छोड़ दिया है। उन्होंने नामी कांकरेज गायों की स्थानीय नस्लों की जगह भैंसों को पालना शुरू कर दिया है। चूँकि भैंसें काफी चराई करती हैं, इसके फलस्वरूप घास गायब हो रही है और भूस्खलन काफी बढ़ गया है। पानी का जमीन के नीचे पहुँचना घटा है। पिछले कुछ वर्षों से कच्छ के बड़े रण में लगातार समुद्री जल के घुसने से इस क्षेत्र का खारापन बढ़ गया है, जिसका कुप्रभाव घास की उपज पर पड़ा है। इस क्षेत्र के उत्तरी भाग में बहने वाली सभी प्रमुख नदियों में बाँधों के निर्माण से साफ पानी की उपलब्धता में कमी आई है। इससे चारागाहों को अत्यधिक नुकसान पहुँचा है, जिसके कारण विरडाओं से प्राप्त होने वाले साफ पानी की मात्रा पर भी असर पड़ा है।

 

 

पानी रहते प्यासे


गुजरात के थार मरुक्षेत्र वाले इलाके के शहरों में पारम्परिक जल संचय प्रणालियाँ नष्ट होती जा रही हैं और ये शहर पानी की अपनी बढ़ती जरूरतों के लिये दिन-ब-दिन भूजल के स्रोतों पर आश्रित हुए जा रहे हैं। प्रायः सभी शहरों में भूजल का स्तर बहुत तेजी से गिर रहा है और भविष्य बहुत ही सूखा नजर आता है।

भुज

कच्छ जिले के भुज शहर पहले चारदीवारी से घिरा था, पर आज इस दीवार के अवशेष भर जहाँ-तहाँ दिखते हैं। कभी यहाँ तीन बड़े जलाशय थे- हमीरसर, देसलसर (सबसे बड़ा) और प्रागसर। अब प्रागसर नहीं बचा है। यह जलाशय भर दिया गया है और यह जगह वायुसेना के कब्जे में है। देसलसर उपेक्षित पड़ा है। इसमें अब सिर्फ भैंसें नहाती हैं और धोबी या औरतें कपड़ा धोती हैं।

हमीरसर पहले भुज के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण जलस्रोत था। लाखी पहाड़ियों से निकलने वाली मुख्य नहर का पानी इसमें आता था। छोटे सोते भी आकर इसी मुख्य नहर से मिलते थे। हमीरसर के चलते भुज में भूजल का स्तर भी अच्छा रहा करता था। जलाशय के चारों ओर कुएँ बने थे, जिनका मीठा पानी पीने और अन्य कामों में प्रयोग होता था। यहाँ से बैलगाड़ियों या ऊँट गाड़ियों में पानी भरकर दूर-दराज के घरों तक ले जाया जाता था। हमीरसर के आस-पास बने अनेक मकानों के अहातों में भी कुएँ खुदे थे।

जब हमीरसर भर जाता था तब इससे निकला पानी जाकर रुद्रमाता नदी में गिरता था। जब हमीरसर भरकर उफनता था तो शहर के लोगों के लिये यह खुश होने की बात थी। राजा तब छुट्टी घोषित करते थे और पूजा किया करते थे। पर यह स्थिति कई-कई वर्षों के बाद आती थी। अतः सारे राजाओं को पूजा करने का अवसर नहीं मिला। पूजा की प्रबल उत्कंठा वाले एक शासक ने तो तंग आकर इसकी एक दीवार तोड़ डालने का आदेश दिया कि उधर से बहने वाले पानी को उफान मानकर वह पूजा कर ले। इस अकेली मूर्खता ने हमीरसर का वजूद ही संकट में डाल दिया। अब यह जलाशय बहुत जल्दी सूख जाता है।

आज नहर की देखरेख भी नहीं की जाती। शहर के कुछ हिस्सों में गन्दे नाले भी नहर में गिरते हैं और लोग जलाशय में अपने जानवरों को नहलाते हैं और कपड़े धोते हैं। पहले यह सब एकदम मना था। अब पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये जलाशय में मोटरबोट चलती हैं। हमीरसर का पानी प्रदूषित हो चुका है और मछलियाँ मर चुकी हैं। अब यह भी समाप्त हो जाने की राह पर है।

1988-89 में भुज की अनुमानित आबादी एक लाख थी। नगर निगम टोंटी वाले पानी की आपूर्ति करता है। चूँकि अब सतह के ऊपर का जल संचित नहीं होता, इसलिये पानी की पूरी जरूरत भूजल को खींचकर ही पूरी की जा रही है। भुज से 6 किमी दूर टाक्केश्वरी में 1969 में पहला नलकूप गाड़कर यहाँ पाइप वाले पानी की आपूर्ति शुरू की गई। आज यहाँ रोज 70 लाख लीटर पानी की आपूर्ति की जा रही है जो भुज और कुकमा के बीच गाँधीधाम राजमार्ग के किनारे गड़े नौ नलकूपों से लिया जाता है। भुज नगर निगम ही कुकमा और भूजाडी गाँवों को भी पाइप वाले पानी की आपूर्ति करता है। अपने गाँव की जमीन से पानी देने के एवज में इन गाँव वालों ने यह व्यवस्था अपने यहाँ कायम कराई है।

इन नलकूपों के अलावा हमीरसर के पास खुदे तीन कुएँ भी सार्वजनिक जरूरतों को पूरा करते हैं। इन्हीं कुओं से सेना और सीमा सुरक्षा बल की टंकियाँ भी भरी जाती हैं।

अंजार

कच्छ जिले का एक अन्य प्रमुख शहर है अंजार, जो भुज-गाँधीधाम राजमार्ग पर स्थित है। 1971 में नल वाला जलापूर्ति शुरू होने से पहले यहाँ की पानी सम्बन्धी जरूरतें कुओं से ही पूरी होती थीं। यहाँ सिधसर नामक एक बड़ा तालाब भी था, आज इसका नामोनिशान नहीं है। इस तालाब को सरकारी सूखा राहत कार्यक्रम के तहत बेवकूफी के चलते नष्ट कर दिया गया। इसकी गाद निकालते-निकालते इसके तल की वह मिट्टी भी निकाल दी गई जो पानी को ऊपर रोकती थी। इस खुदाई के बाद तालाब बहुत कम समय में ही सूखने लगा।

1988-89 में अंजार की आबादी 50,000 के करीब थी और शहर को रोज 17 लाख गैलन पानी की जरूरत पड़ती थी। नगर पालिका सिर्फ 15 लाख गैलन पानी ही दे पाती थी। 1971 में नलों के आने के पहले यहाँ भूजल का स्तर 30 मीटर के करीब था। आज यह 60 मीटर नीचे पहुँच गया है। अंजार की समस्याएँ कांदला बन्दरगाह और गाँधीधाम परिसर को पानी देने के जिम्मे से और भी बढ़ गई हैं।

पालनपुर

बनासकंठा जिले का मुख्यालय है पालनपुर। हीरे तराशने और चमकाने के काम के लिये प्रसिद्ध इस शहर की आबादी 1988-89 में करीब एक लाख थी। इस शहर में मानसरोवर नामक एक विशाल तालाब है जो गर्मियों में पूरा सूख जाता है, लेकिन बरसात के समय भर जाता है। यहाँ मीठी वाव नामक एक बड़ी बावड़ी भी है। इसकी सीढ़ियाँ तो अब पानी के अन्दर नहीं आतीं, पानी का स्तर अब उनसे नीचे ही रहता है और सीढ़ियों पर कचरा भरा रहता है। शहर में अनेक कुएँ भी हैं।

पालनपुर शहर को रोज करीब 60 लाख लीटर पानी चाहिए, जबकि जलापूर्ति सिर्फ 50 लाख लीटर की ही है और यह पूरा भूजल ही होता है। शहर के आस-पास के इलाकों में इसके लिये 15 नलकूप गाड़े गए हैं। अब शहर में भूजल के ऊपर वाली कोई ऐसी जल संचय व्यवस्था नहीं रह गई है जिसमें साल भर पानी उपलब्ध रहे। भूजल के अधिक दोहन से उसका स्तर गिरकर 50 मीटर तक पहुँच गया है। अब शहर की बढ़ती जरूरतों के लिये पानी कहाँ से आएगा, यह कोई नहीं जानता।

जामनगर

भीड़भाड़ और अत्यधिक सक्रियता भरे जामनगर शहर के बीच में जाम रणमल द्वारा बनवाई गई रणमल झील एक शान्त, स्वच्छ, सुन्दर अभयारण्य जैसा है। यह करीब 60 किस्म के पक्षियों का बसेरा है। 1984 में यहाँ प्रसिद्ध पक्षीप्रेमी स्व. सालिम अली आये थे और यहाँ से वापस लौटकर उन्होंने लिखा कि इस झील को बचाना बहुत जरूरी है। जामनगर की खूबसूरती में चार चाँद लगाने के साथ ही यह झील इसके भूजल के स्तर की पहरेदार है और शहर की शीतलता भी बनाए रखती है।

जब जामनगर रियासत खत्म हो गई तो यह झील भी उपेक्षित हो गई। आज भी इसका भविष्य अन्धकार की गर्त में ही है। आज पास में बनने वाली इमारतें सचमुच इस झील को निगलती जा रही हैं। कुछ वर्ष पहले बनी एक सड़क ने झील को दो भागों में बाँट दिया, जिन्हें अब अगला और पिछला तालाब कहा जाने लगा है। इसके एक छोटे हिस्से को भरकर वहाँ बस पड़ाव और कॉलोनी बसाई गई है। प्रकृति प्रेमियों के शोर मचाने पर एक अन्य बड़ी इमारत का बनना रुका। पर आज भी रोज इस झील की जगह पर बसाने के प्रस्ताव एक या दूसरे रूप में आते ही रहते हैं।

पर इस झील के लिये सबसे बड़ा खतरा शहर की बढ़ती आबादी है। आस-पास की कॉलोनियों का सारा गन्दा पानी इसमें आने लगा है। सरकारी वाहनों और निजी ऑटोरिक्शा के वर्कशॉप इसके किनारे हैं, जो सारा कचरा इसी के हवाले करते हैं। हरमुक ध्रुव जैसे स्थानीय पर्यावरणवादियों के शोर मचाने के बाद नगर निगम ने झील के संरक्षण पर ध्यान देना शुरू किया है।

 

Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Lines and paragraphs break automatically.

More information about formatting options

CAPTCHA
यह सवाल इस परीक्षण के लिए है कि क्या आप एक इंसान हैं या मशीनी स्वचालित स्पैम प्रस्तुतियाँ डालने वाली चीज
इस सरल गणितीय समस्या का समाधान करें. जैसे- उदाहरण 1+ 3= 4 और अपना पोस्ट करें
4 + 10 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.