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प्राकृतिक जलचक्र के संकट को तलाश है समाधान की


जल चक्रजल चक्रकुदरत ने पृथ्वी पर 1300 करोड़ साल पहले प्राकृतिक जलचक्र की स्थापना की थी। तब से वह पृथ्वी पर संचालित है। कुदरत ने ही उसके लिये पानी की आवश्यक मात्रा का बन्दोबस्त किया है। कुदरत ने ही उसके स्वभाव को निर्मल और फितरत को घुमक्कड़ बनाया है। सभी लोगों की नजर में वह, कुदरत की नियामत और अनमोल प्राकृतिक संसाधन है। हवा के बाद, वह दूसरा प्राकृतिक संसाधन है जो जीवन की निरन्तरता के लिये जरूरी है। कुदरती व्यवस्था के कारण ही वह पृथ्वी पर अनेक रूपों में मिलता है। वह शून्य डिग्री सेंटीग्रेड तापमान और उसके नीचे बर्फ की शक्ल में मिलता है पर भाप बनने के लिये उसे किसी निश्चित तापमान की जरूरत नहीं होती।

सामान्य लोगों को जलचक्र की यात्रा का अन्त या प्रारम्भ नजर नहीं आता। भारतीय मनीषियों और आधुनिक वैज्ञानिकों ने उसके घुमन्तु चरित्र को समझने का प्रयास किया है। वह, समुद्र के पानी के खारेपन को पीछे छोड़, अपने शुद्धतम रूप में भाप बन ऊपर उठता है। आसमान में पहुँचकर घुमन्तु बादल बनता है।

उपयुक्त परिस्थितियों के मिलते ही चहलकदमी करते बादल अपने आँचल में सहेजी पानी की नन्हीं बूँदों को धरती पर उतारते हैं। यह यात्रा, तापमान से नियंत्रित होती है और सहेजा पानी, वर्षा की बूँदों, ओस, पाले और बर्फ के रूप में धरती पर उतरता है। धरती पर पहुँचने के बाद उसकी अगली यात्रा प्रारम्भ होती है। वह नदी-नालों, झरनों के माध्यम से धरती के ऊपर, भूजल के रूप में धरती की गहराईयों में और बर्फ की चोटियों से हिमनदियों के रूप में यात्रा करता है।

यात्रा के दौरान उसका कुछ भाग धरती की सतह, जलस्रोतों और वनस्पतियों से भाप बन वायुमण्डल में वापस चला जाता है। उसकी यात्रा का अन्त समुद्र में होता है। समुद्र से वह पुनः भाप में परिवर्तित हो अगली यात्रा के लिये निकल पड़ता है। यही प्राकृतिक जलचक्र है। वैज्ञानिक बताते हैं कि उत्पत्ति के उपरान्त, उसके ठिकानों में अनेक बार बदलाव हुए हैं पर उसकी यात्रा कभी बन्द नहीं हुई। पृथ्वी पर पानी की यात्रा ही जलचक्र कहलाती है। अब कुछ बात उसकी मात्रा और ठिकानों तथा सन्तुलन की।

धरती पर पानी की कुल मात्रा लगभग 13,100 लाख क्यूबिक किलोमीटर है। इसकी लगभग 97 प्रतिशत मात्रा समुद्रों में, खारे पानी के रूप में और लगभग तीन प्रतिशत मात्रा साफ पानी के रूप में धरती पर पाई जाती है।

महाद्वीपों पर मौजूद तीन प्रतिशत पानी का 68.7 प्रतिशत बर्फ की चादरों, हिमनदियों और ध्रुवीय इलाकों में, लगभग 30.1 प्रतिशत धरती के नीचे भूजल के रूप में और लगभग 0.3 प्रतिशत सतही जल और अन्य स्रोतों में पाया जाता है। सतही जल का लगभग 2 प्रतिशत नदियों में, 87 प्रतिशत झीलों में और लगभग 11 प्रतिशत दलदली जमीन में पाया जाता है। भूजल का वितरण सब जगह एक जैसा नहीं है।

लगभग 700 मीटर की गहराई तक कुल उपलब्ध भूजल का 13.2 प्रतिशत और 700 से 3800 मीटर की गहराई तक 16.8 प्रतिशत पाया जाता है। वैज्ञानिक, पानी के उपर्युक्त सभी ठिकानों को जलचक्र का हिस्सा मानते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर महासागरों तथा महाद्वीपों की स्थिति में अनेक बार बदलाव आये हैं। जाहिर है, उन बदलावों के कारण महाद्वीपों पर जलचक्र के ठिकानों में भी बदलाव आये होंगे पर वैज्ञानिक मानते हैं कि कुदरत ने पानी की प्राकृतिक यात्रा की निरन्तरता को पिछले लगभग 1300 करोड़ सालों से सक्रिय बनाए रखा है। अनुकूलन के कारण उसके घटकों की सक्रियता या उसकी जिम्मेदारी कम नहीं हुई है। अब बात उसके विस्तार की।

उल्लेखनीय है कि प्राकृतिक जलचक्र का विस्तार वायुमण्डल से लेकर धरती की गहराईयों तक में है। जलचक्र में भाग लेने वाला पानी अपनी यात्रा के दौरान वायुमण्डल में लगभग 15 किलोमीटर की ऊँचाई तक तथा धरती में लगभग एक किलोमीटर की गहराई तक विचरण करता है। यही जलचक्र का कार्यक्षेत्र है। इसी कार्यक्षेत्र में जलचक्र, प्रकृति द्वारा सौंपी जिम्मेदारियों को पूरा करता है।

आम आदमी को प्राकृतिक जलचक्र बेहद सरल नजर आता है पर हकीकत में वह तथा उसके अन्तर्गत चल रही प्रक्रियाएँ बहुत ही जटिल हैं। जलचक्र को एक शृंखला से दर्शाना सम्भव नहीं है। उसकी अनेक उप-शाखाएँ हैं। कुदरत ने उन्हें दायित्वों को पूरा करने तथा परिणामों को अंजाम तक पहुँचाने के लिये गढ़ा है। उस व्यवस्था का कोई ओर-छोर नहीं है। वह एक अत्यन्त जटिल सिस्टम की तरह है। अब बात जलचक्र के घटकों के बीच मौजूद सन्तुलन की।

प्राकृतिक जलचक्र के विभिन्न घटकों के बीच विलक्षण सन्तुलन है। उदाहरण के लिये पृथ्वी से जितना पानी भाप बनकर वायुमण्डल में पहुँचता है उतना ही पानी बरसात/हिमपात के रूप में पृथ्वी पर वापस लौटता है। बारिश होने के बाद भी वायुमण्डल में भाप बचती है। उसका सम्बन्ध धरती पर बहने वाले पानी से है। जलचक्र के घटकों के सम्बन्ध को नीचे दी तालिका में दर्शाया गया है। तालिका में महाद्वीपों पर होने वाली वर्षा को 100 इकाई माना है तथा बाकी घटक महाद्वीपों पर होने वाली वर्षा के समानुपाती हैं।

 

सरल क्रमांक

घटक

योगदान

01

महाद्वीपों पर वर्षा

100

02

महासागरों पर वर्षा

385

03

महाद्वीपों से वाष्पीकरण

61

04

महासागरों से वाष्पीकरण

424

 

पृथ्वी पर कुल वाष्पीकरण (सरल क्रमांक 03 और 04 का योग

485

05

वायुमण्डल में पानी की भाप की स्थायी मात्रा

39

06

नदियों द्वारा समुद्र को सालाना सकल योगदान

38

07

भूजल (Base flow) द्वारा समुद्र को सालाना सकल योगदान

01

 

समुद्र को सकल सालाना योगदान (सरल क्रमांक 06 और 07 का योग)

39

 



ऊपर दी तालिका से पता चलता है कि -

1. वाष्पीकरण (485) और बरसात (485) की मात्रा एक दूसरे के बराबर तथा सन्तुलित है।
2. समुद्र से वाष्पीकृत होने वाला 424 इकाई पानी तीन स्रोतों {वर्षा (385) नदी (38) तथा भूजल (1)} के माध्यम से समुद्र को लौटाया जाता है। इस तरह लेन-देन बराबर हो जाता है।
3. हर साल महाद्वीपों पर 100 इकाई पानी बरसता है। महाद्वीपों से वाष्पीकरण द्वारा 61 वायुमण्डल को और नदियों तथा भूजल द्वारा 39 इकाई पानी समुद्र में चला जाता है। समुद्र में गए पानी के बराबर भाप वायुमण्डल में स्थायी रूप से बनी रहती है। समुद्र, महाद्वीपों का कर्ज चुका देता है।

हम जानना चाहेंगे कि आखिर कुदरत ने जलचक्र क्यों बनाया? उसकी क्या आवश्यकता है? पृथ्वी पर उसे क्यों संचालित किया? उसके संचालन की कुदरती भूमिका क्या है? क्या जलचक्र की कुदरती भूमिका के निर्वाह के लिये प्रकृति ने पर्याप्त पानी का बन्दोबस्त किया है? क्या कुदरती भूमिका के निर्वाह में पानी की गुणवत्ता, विस्तार तथा मात्रा की भी भूमिका है? उस कुदरती भूमिका के निर्वाह से कौन से काम पूरे होते हैं? यदि वे काम समय पर पूरे नहीं हुए तो क्या होगा? जलचक्र की कुदरती भूमिका से जुड़े ऐसे और भी अनेक सवाल हैं जो उठाए जा सकते हैं। उन्हें समग्रता में समझना आवश्यक है। अब बात कुदरती जलचक्र से जुड़े सवालों और सम्भावित उत्तरों की।

पहला सवाल यह है कि आखिर कुदरत ने जलचक्र क्यों बनाया या ऐसे कौन से जरूरी काम हैं जिन्हें अंजाम देने के लिये कुदरत को जलचक्र बनाना पड़ा? इसे समझने के लिये आवश्यक है कि सबसे पहले जलचक्र द्वारा सम्पादित कामों का जायजा लिया जाये।

माना जाता है कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति पानी में हुई। उसके बाद जीवन का विस्तार महाद्वीपों पर हुआ। उल्लेख है कि जीवन का अस्तित्व उन सभी जगह है जहाँ पानी/नमी किसी-न-किसी रूप में मौजूद है। उल्लेखनीय है कि जीवन का अस्तित्व वायुमण्डल, विभिन्न जलवायु क्षेत्रों तथा महासागरों की अधिकतम गहराई के गहन अन्धकार तक में है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि कुदरत ने पृथ्वी पर जीवन के उद्भव और उसकी निरन्तरता को आधार प्रदान करने के लिये जलचक्र का गठन किया है। इसी कारण जहाँ-जहाँ पानी है वहाँ-वहाँ, किसी-न-किसी रूप में जीवन भी है। अब बात धरती का भूगोल बदलने से जुड़ी जिम्मेदारी की।

बादल, जो जलचक्र का अभिन्न अंग हैं, पृथ्वी को माकूल मात्रा में पानी उपलब्ध कराते हैं। वह पानी, चट्टानों में टूट-फूट पैदा करता है। नदी मार्ग पर प्रवाहित हो, टूट-फूट से प्राप्त मलबे और घुलनशील रसायनों को विस्थापित करता है। उसका दूसरा काम मलबे तथा घुलनशील रसायनों को समुद्र में जमा करना है।

नदी तंत्र उपरोक्त दोनों कामों को सम्पन्न करता है। ऐसा करने के लिये कुदरत ने नदियों को अविरल तथा बारहमासी बनाया ताकि सूखे मौसम में भी अत्यन्त बारीक कणों और घुलित रसायनों का परिवहन जारी रहे। इसके लिये धरती की कोख में पर्याप्त भूजल के संचय और निकासी की व्यवस्था की है ताकि सूखे दिनों में भी घुलित रसायनों का निपटान जारी रहे। प्रवाह की अविरलता और ऑक्सीजन सोखने की क्षमता की मदद से पानी की निर्मलता सुनिश्चित की है।

अविरल पानी को स्वतः शुद्ध होने की नैसर्गिक क्षमता प्रदान की है। जलीय जीवन को सुरक्षित किया है। पानी को साफ करने वाले जीव-जन्तुओं को पानी में उपयुक्त आवास उपलब्ध कराया है। अविरल प्रवाह की मदद से कछार की गन्दगी समुद्र में जमा किया। गौरतलब है कि करोड़ों सालों से महाद्वीपों से हटाए रसायनों के समुद्र में जमा होने के कारण समुद्र का पानी खारा है। यही उसका तीसरा काम है जो नदियों में बहने वाले पानी को स्वच्छ रखता है। उसका चौथा काम मलबे को समुद्र में जमा करना है।

कुदरत मलबे को चट्टानों एवं आर्थिक महत्त्व के खनिजों में बदलती है और धरती का भूगोल बदलने के लिये इबारत लिखती है। समुद्र का अगला काम वर्षा के लिये अधिक-से-अधिक भाप उपलब्ध कराना है। इसीलिये पानी का लगभग 97 प्रतिशत हिस्सा समुद्रों में जमा है। यही वे जरूरी काम हैं जिन्हें पूरा करने के लिये कुदरत ने जलचक्र को गढ़ा, उसे व्यापक बनाया, विस्तार दिया तथा पर्याप्त पानी से नवाजा।

अब कुछ चर्चा कुदरती जलचक्र पर मानवीय हस्तक्षेपों और उनके प्रभावों की। चर्चा में धरती पर मौजूद सभी जलस्रोतों को जलचक्र का अभिन्न अंग माना है। कुदरती स्रोतों में समुद्र, बादल, वर्षा, बर्फ की चादरें, ग्लेशियर, नदियाँ, भूजल, प्राकृतिक झीलें, आर्द्रभूमि, झरने और सोते आते हैं। कृत्रिम जलस्रोतों में तालाब, बाँध, स्टापडैम, परकोलेशन टैंक, कुएँ और नलकूप मुख्य हैं। उल्लेखनीय है कि कुदरती जलस्रोतों की डिजाइन में बदलाव सम्भव नहीं है लेकिन कृत्रिम जलस्रोतों की डिजाइन में आमूल-चूल बदलाव सम्भव है। अगले चरण मेें जानना चाहेंगे कि जलस्रोतों की कुदरती भूमिका पर मानवीय हस्तक्षेपों का क्या असर होता है? सबसे पहले चर्चा जीवन पर पड़ने वाले सम्भावित प्रभाव की।

करोड़ों सालों से पृथ्वी पर जीवन की मौजूदगी महाद्वीपों से लेकर महासागरों की अतुल गहराईयों तक में है। महाद्वीपों पर जीवन का सम्बल साफ पानी और शुद्ध हवा है तो महासागरों में खारा पानी जलचरों तथा जलीय वनस्पतियों को जिन्दा रखता है। दोनों ही जगह प्राणियों तथा वनस्पतियों ने परिवेश से तालमेल कर जीवन को निरापद बनाया है।

आम आदमी को प्राकृतिक जलचक्र बेहद सरल नजर आता है पर हकीकत में वह तथा उसके अन्तर्गत चल रही प्रक्रियाएँ बहुत ही जटिल हैं। जलचक्र को एक शृंखला से दर्शाना सम्भव नहीं है। उसकी अनेक उप-शाखाएँ हैं। कुदरत ने उन्हें दायित्वों को पूरा करने तथा परिणामों को अंजाम तक पहुँचाने के लिये गढ़ा है। उस व्यवस्था का कोई ओर-छोर नहीं है। वह एक अत्यन्त जटिल सिस्टम की तरह है। अब बात जलचक्र के घटकों के बीच मौजूद सन्तुलन की। प्राकृतिक जलचक्र के विभिन्न घटकों के बीच विलक्षण सन्तुलन है।

महासागरों तथा महाद्वीपों पर होने वाले जीवन का क्रमिक विकास भी उनके परिवेश के तालमेल के साथ धीरे-धीरे सम्पन्न होता है। प्रजातियों का विलुप्त होना भी कुदरत की कार्यवाही का हिस्सा है। जलचक्र से तालमेल के कारण पृथ्वी पर जीवन निरापद बना रहता है।

मानवीय हस्तक्षेपों के कारण जलचक्र के समूचे विस्तार क्षेत्र में परिस्थितियाँ बदल रही हैं। मानवीय गतिविधियों के असर से वायुमण्डल की हवा प्रदूषित हो रही है। उसमें हानिकारक गैसों, अम्लों तथा ठोस कणों की मात्रा बढ़ रही है। वे, अवांछित घटक बारिश के साथ धरती पर पहुँचकर नदियों के पानी, भूजल तथा मिट्टी के गुणों में बदलाव ला रहे हैं। पानी में अनेक हानिकारक रसायन, कीटनाशक, भारी धातुएँ इत्यादि की मात्रा लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा, पानी के साथ अनेक प्रकार का अपशिष्ट, गन्दगी और प्लास्टिक इत्यादि भी समुद्र में पहुँच रहा है। इन रसायनों ने समूची धरती पर जलचक्र के पानी की केमिस्ट्री बदल दी है।

यह बदलाव महाद्वीपों और महासागरों में मौजूदा जीवन के लिये अनुकूल नहीं हैं। वह जैवविविधता की सम्पन्नता तथा विविधता को कम कर समूची पृथ्वी पर जीवन की निरापदता को कम कर रहा है। प्रजातियों के संकटापन्न होने तथा विलुप्त होने की गति बढ़ गई है। मनुष्य भी असुरक्षित हो रहा है। जीव-जगत पर नई-नई बीमारियों का प्रकोप उसी विसंगति का परिणाम है। यदि यह क्रम नहीं रुका तो भविष्य में जीवन पर गम्भीर संकट आ सकता है। इस संकट का निराकरण आवश्यक है। अब चर्चा धरती के भूगोल को बदलने में भाग लेने वाले पानी की मात्रा की उपयुक्तता की।

समुद्रों से लगभग 424 इकाई पानी भाप बनकर वायुमण्डल में पहुँचता है। उसका लगभग 80 प्रतिशत अर्थात 385 इकाई पानी हर साल समुद्रों पर बरसता है। कम पानी बरसने के कारण हर साल समुद्रों मेें 39 इकाई पानी की कमी होती है। इस कमी को धरती के नीचे बहने वाला पानी और नदियाँ पूरा करती हैं। महाद्वीपों पर हर साल 100 यूनिट पानी बरसता है। महाद्वीपों से हर साल 61 यूनिट पानी भाप बनकर वायुमण्डल में पहुँचता है और 39 यूनिट पानी नदियों तथा भूजल के माध्यम से समुद्र में जमा हो जाता है। समुद्रों में जमा होने वाला 39 यूनिट पानी, अपनी यात्रा के दौरान महाद्वीपों की धरती और उसकी उथली परतों की साफ-सफाई करता है। सूखे दिनों में भी नदी तंत्र की अविरलता कायम रखता है। सारे मलबे और घुलित रसायनों को समुद्र में पहुँचाता है और धरती का भूगोल गढ़ता है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि धरती का भूगोल बदलने और उसकी निरापदता को कायम रखने के लिये 39 यूनिट पानी पर्याप्त है। अब कुछ चर्चा मुख्य मानवीय गतिविधियों की जो जलचक्र के पानी का उपयोग कर रहे हैं।

पिछले कुछ सालों में नदी और भूजल भण्डारों के पानी के उपयोग में अत्यधिक तेजी आई है। यह उपयोग खाद्यान्न सुरक्षा, पेयजल आपूर्ति, औद्योगिक जरूरतों और जीवनशैली की आवश्यकता इत्यादि की पूर्ति के लिये है। इसलिये नदियों के पानी को बाँधों में रोका गया है। भूजल भण्डारों के पानी को कुओं और नलकूपों की मदद से बाहर निकाला गया है। बाँधों में जलसंचय करने तथा भूजल भण्डारों से पानी पम्प करने के कारण नदी प्रवाह, रसायनों और सिल्ट निपटान कम हुआ है। भूजल स्तर में गिरावट दर्ज हुई है। इन कारणों से जलचक्र की कुदरती भूमिका प्रभावित हुई है। हकीकत निम्नानुसार हैं-

उल्लेखनीय है कि भारतीय नदियों में हर साल, लगभग 1963 लाख हेक्टेयर मीटर पानी बहता है। जब नदियों पर बाँध नहीं बने थे तब नदियों का अविरल प्रवाह अपने साथ लगभग 205.2 करोड़ टन मलबा बहा कर ले जाता था। बाँधों के बनने के बाद उनके डाउनस्ट्रीम में प्रवाह में कमी आ रही है। बाँधों के बनने के बाद उनके जलाशयों में हर साल लगभग 48 करोड़ टन मलबा जमा हो रहा है। मलबे में मौजूद आर्गेनिक घटकों के सड़ने के कारण हानिकारक गैसें बन रही हैं। पानी की गुणवत्ता खराब हो रही है।

कछार की साफ-सफाई, जलीय जीव-जन्तु और वनस्पतियाँ प्रभावित हो रही हैं। विदित हो, नदी तंत्र में बहता पानी, मानव शरीर में बहते खून जैसा है। जिस तरह, मानव शरीर में खून के प्रवाह का रुकना घातक है, उसी तरह नदी प्रवाह का रुकना या कम होना, उसके लिये घातक है। खेती में उपयोग में लाए हानिकारक रसायनों, कारखानों और बसाहटों के कचरे इत्यादि का नदी में निस्तारण, नदी के लिये बेहद घातक होता है। यह मानव शरीर में जहरीले रसायन डालने जैसा है।

प्रकृति ने नदियों को बोल्डर, बजरी और रेत से नवाजा है। वे, बाढ़ के पानी के साथ बहकर आते हैं। नदी की कुल लम्बाई में, वे तली में, बड़े से छोटे के क्रम में जमा होते हैं। कणों के बीच के खाली स्थान बाढ़ के असर को कम करने और भूजल के आदान-प्रदान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। रेत के अवैज्ञानिक खनन के कारण नदी का ईको सिस्टम प्रभावित हो रहा है। अब कुछ बात नदी विज्ञान की अनदेखी के उदाहरणों की। वैसे तो भारत में नदी विज्ञान की अनदेखी के अनेक उदाहरण मौजूद हैं पर बानगी के तौर पर दो उदाहरण पेश हैं। पहला उदाहरण कावेरी तथा दूसरा उदाहरण फरक्का बैराज है।

कावेरी नदी तंत्र, भारत में नदियों के पानी के लगभग शत-प्रतिशत उपयोग का एकमात्र बिरला उदाहरण है। यह उदाहरण नदी जल उपयोग की मौजूदा सोच को दर्शाता है। उल्लेखनीय है कि कावेरी नदी की कुल लम्बाई लगभग 800 किलोमीटर है। उसके कछार का कुल रकबा लगभग 81,155 वर्ग किलोमीटर है। उल्लेखनीय है कि कावेरी और उसकी सहायक नदियों पर 66 बाँध बने हैं। उसके पानी का लगभग 95 प्रतिशत भाग उपयोग होता है। लगभग पाँच प्रतिशत पानी ही कुदरती भूमिका का पालन कर समुद्र में जमा होता है। यह हकीकत दर्शाती है कि कावेरी नदी तंत्र में जलचक्र पूरी तरह बाधित और पंगु है।

गंगा नदी द्वारा हर साल लगभग 2.9 बिलियन मीट्रिक टन मलबा बंगाल की खाड़ी में उड़ेला जाता है।

कोलकाता (कलकत्ता) बन्दरगाह को गाद जमाव से मुक्त रखने के लिये, सन 1853 में सर आर्थर काटन ने गंगा नदी पर फरक्का बैराज के निर्माण का सुझाव दिया था। उल्लेखनीय है कि उन्नीसवीं सदी में कलकत्ता, ईस्ट इण्डिया कम्पनी सरकार का मुख्यालय था और कलकत्ता बन्दरगाह, समुद्री यातायात का प्रमुख केन्द्र था।

अंग्रेजी शासन काल में फरक्का बैराज पर कोई काम नहीं हुआ पर सन 1947 के बाद, पश्चिम बंगाल सरकार के सुझाव पर सन 1949 में भारत सरकार उसे क्रियान्वित करने के लिये सहमत हुई। भारत के तत्कालीन सिंचाई मंत्री डॉ. केएल राव जो खुद प्रख्यात सिविल इंजीनियर थे, का मानना था कि फरक्का बैराज से पानी के ट्रांसफर के बाद हुगली नदी गाद मुक्त होगी और कलकत्ता बन्दरगाह को गाद जमाव से निजात मिलेगी।

पानी में अनेक हानिकारक रसायन, कीटनाशक, भारी धातुएँ इत्यादि की मात्रा लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा, पानी के साथ अनेक प्रकार का अपशिष्ट, गन्दगी और प्लास्टिक इत्यादि भी समुद्र में पहुँच रहा है। इन रसायनों ने समूची धरती पर जलचक्र के पानी की केमिस्ट्री बदल दी है। यह बदलाव महाद्वीपों और महासागरों में मौजूदा जीवन के लिये अनुकूल नहीं हैं। वह जैवविविधता की सम्पन्नता तथा विविधता को कम कर समूची पृथ्वी पर जीवन की निरापदता को कम कर रहा है।

उल्लेखनीय है कि सन 1960 में बंगाल सरकार के वरिष्ठ इंजीनियर कपिल भट्टाचार्य ने फरक्का बैराज का तकनीकी आधार पर पुरजोर विरोध किया था। उनकी रिपोर्ट के अनुसार फरक्का बैराज बनने से कलकत्ता बन्दरगाह की गाद जमाव की समस्या हल नहीं होगी। वे कलकत्ता बन्दरगाह की गाद समस्या के लिये हुगली की सहायक नदियों, दामोदर और रुपनारायण नदियों पर बने बाँधों को जिम्मेदार मानते थे। उनकी बात नहीं मानी गई। बैराज के विरोध के परिणामस्वरूप उन्हें अन्ततः नौकरी छोड़ना पड़ी। सन 1961 में लगभग 2240 मीटर लम्बे बैराज बनाने का काम प्रारम्भ हुआ। फरक्का बैराज से 21 अप्रैल 1975 को हुगली में तय मात्रा में पानी छोड़ा गया। यह पानी 41 किलोमीटर लम्बी और 300 मीटर चौड़ी फीडर कैनाल के मार्फत अन्ततः हुगली नदी को मिलता है।

वर्तमान में बाढ़ के बिहार की ओर बढ़ते असर और गाद मुक्ति के उद्देश्य पूर्ति की काफी हद तक नाकामी के कारण फरक्का बैराज का पुरजोर विरोध हो रहा है। उसके तकनीकी औचित्य पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं। मात्र चालीस साल के ही भीतर कपिल भट्टाचार्य का नदी विज्ञान आधारित विरोध सही सिद्ध हो रहा है। सर आर्थर काटन तथा डॉ. केएल राव जैसे विख्यात सिविल इंजीनियर गलत सिद्ध हो रहे हैं। यह नदी के पानी की मात्रा और गाद निपटान की कुदरती व्यवस्था के विज्ञान की समझ की कमी का परिणाम है। यह कमी भारत के हर बाँध में मौजूद है। इस कमी के कारण भारत का हर बाँध गाद समस्या का शिकार है। गाद जमाव के कारण जल संग्रह क्षमता खो रहा है। नदियों को बदसूरत कर रहा है। अब बात जमीन के नीचे संचालित जलचक्र पर गहराते संकट की।

धरती के नीचे बहता भूजल भी कुदरती जलचक्र का हिस्सा है। उसका अतिदोहन, आँखों से नहीं दिखता इसलिये, वह, नदियों के पानी के उपयोग की तुलना में, अनदेखी का शिकार होता है तथा अधिक हानिकारक होता है। वह, न केवल धरती के नीचे प्रवाहित जलचक्र को बाधित करता है, वरन नदियों के प्रवाह को भी घटाता है। जब वह लक्ष्मण रेखा पार कर लेता है तो जलचक्र के धरती और उसकी उथली परतों में संचालित, दोनों घटक ही प्रभावित होते हैं। उसके कारण जैवविविधता, प्रदूषण और पानी की खुद-ब-खुद निर्मल होने वाली नैसर्गिक क्षमता समाप्त होने लगती है। उसकी साफ-सफाई का व्यय बढ़ने लगता है।

जलचक्र के खंडित या बाधित होने के कारण होने वाली चुनौतियाँ स्वाभाविक हैं। पानी का उपयोग भी किसी हद तक मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति और जीवन की निरन्तरता से जुड़ा है। उसे पूरी तरह खत्म करना या पानी का उपयोग बन्द करना सम्भव नहीं है। दूसरे शब्दों में नदियों के पानी और भूजल का उपयोग करना आवश्यक है। इस उपयोग का कुदरत से तालमेल रखना ऐसा तरीका खोजना आवश्यक है जो मूलभूत आवश्यकताओं को यथासम्भव पूरा करे। प्राकृतिक चुनौतियों (बाढ़, सूखा, तूफान इत्यादि) से निपटने के लिये माकूल व्यवस्था सुझाए।

उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों के सत्ता में काबिज होने के पहले भारत में नदी जल के उपयोग का परम्परागत मॉडल प्रचलन में था। परम्परागत मॉडल के अन्तर्गत, नदियों के पानी का उपयोग मुख्यतः तालाब भरने में किया जाता था। छोटी नदियों पर कहीं-कहीं तालाबों की शृंखला बनाई जाती थीं। नदियों का प्रवाह अविरल था। नदी पथ में बड़े व्यवधान नहीं थे। अविरलता और व्यवधानों के नहीं होने के कारण गाद निपटान कुदरती था। जलस्रोतों की साइज छोटी थी। यदि गाद जमा होती थी तो उसकी मात्रा बेहद कम थी। मात्रा कम होने के कारण वह स्थानीय स्तर पर खप जाती थी। जलचक्र पर कोई संकट नहीं था। पानी स्वच्छ और निरापद तथा हानिकारक रसायनों के प्रदूषण से मुक्त था।

भारत में लगभग 5000 साल से खेती हो रही है। भारतीय खेती को दो नजरियों से देखा जा सकता है। पहला नजरिया उसका रकबा है। जहाँ तक रकबे का प्रश्न है तो प्रारम्भ में बहुत कम इलाके पर खेती होती थी। आबादी के साथ खेती का रकबा बढ़ा। राजस्व प्राप्ति की चाहत और आजीविका का प्रमुख स्रोत होने के कारण खेती को खूब बढ़ावा मिला। दूसरा नजरिया उत्पादन लेने के लिये अपनाया देशज विज्ञान है। वही देशज विज्ञान ही बरसात पर आधारित, पारम्परिक भारतीय कृषि पद्धति या विज्ञान है।

उल्लेखनीय है कि भले ही परम्परागत खेती असिंचित थी पर उसका पूरा ताना-बाना कुदरती घटकों पर आधारित था। वह माकूल, निरापद और अपेक्षाकृत अधिक कारगर थी। उसकी मौसम की अनिश्चितता से निपटने की काबलियत बेहतर थी। पानी की माँग बहुत कम थी। कम वर्षा वाले इलाकों में तालाबों में जमा पानी से खरीफ में धान की खेती होती थी और नदियों की अविरलता पर संकट नहीं था। प्राकृतिक जलचक्र लगभग अप्रभावित था।

स्वाभाविक है, जलचक्र की कुदरती भूमिका निरापद तथा टिकाऊ होना चाहिए इसलिये कुदरती और कृत्रिम जलस्रोत बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। उनकी अल्पकालिक निरापदता या स्थायित्व अहितकर है इसलिये विकास का रोडमैप, कुदरती जलचक्र के निरापद तथा टिकाऊ मार्ग का आईना होना चाहिए। यह उल्लेख मौजूदा प्रयासों या योजनाओं को नकारना नहीं है अपितु जलचक्र के पानी के भविष्य को बेहतर बनाए रखने के लिये लीक से हटकर कुछ नए विकल्पों पर विचार करने का आग्रह है। वह धरती के पर्यावरण को निरापद तथा जैवविविधता को समृद्ध बनाए रखने का आग्रह है। वह निरापद एवं टिकाऊ विकास का सन्देश है।


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