देश में गहराता जल संकट

Submitted by RuralWater on Fri, 02/10/2017 - 11:18
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हमारे भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, मरकरी और यूरेनियम का मिलना आम बात हो गई है। हाल के वर्षों का सूखा और किसानों की आत्महत्या स्थिति की गम्भीरता को दर्शाती है। मानसून परिवर्तन ने भी नई चुनौतियाँ पेश की हैं, इनसे बाढ़ और सूखा पर भी असर पड़ा है। देश के शहरों में लगभग 400 करोड़ लीटर सीवेज प्रतिदिन तैयार होता है , जिसमें से लगभग 20 प्रतिशत का शोधन हो पाता है। बारिश का पानी बाढ़ बन जाता है और गन्दा पानी घरों में घुस जाता है और बीमारियों को भी न्योता देता है। भारत में भूजल का सबसे अधिक उपयोग होता है। पीने का पानी, सिचाईं, उद्योग, कल-कारखानों से लेकर धुलाई-सफाई तक में भूजल का ही हम उपयोग करते हैं। भूजल के बारे में हमारी आम धारणा यह है कि यह कभी समाप्त नहीं होगा। जितना चाहें उतना पानी हम जमीन के अन्दर से निकाल सकते हैं। लेकिन यह सच नहीं है। जल का दोहन करने से हमारा भूजल भण्डार कम हो रहा है। एक आँकड़े के मुताबिक देश में अस्सी फीसदी लोग भूजल ही उपयोग में लाते हैं। यह सिंचाई की जरूरतों का लगभग दो तिहाई है। आजादी के कुछ वर्षों के बाद से ही हमारे देश में चौरासी फीसदी सिंचाई भूजल से हो रहा है।

आज हम पानी की निरन्तरता के संकट से जूझ रहे हैं। इस मामले में ट्यूबवेल सिंचाई ही समस्या बनती जा रही है। भारत के 60 प्रतिशत जिलों में जरूरत से ज्यादा भूजल का दोहन गम्भीर समस्या है। भारत का जल संकट इतना संवेदनशील हो चुका है कि अगर पानी की मौजूदा माँग बनी रही तो, पानी की आधी माँग भी 2030 तक पूरी नहीं हो पाएगी। भारत के अधिकांश भाग में जलस्तर गिरता जा रहा है। हमारे भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, मरकरी और यूरेनियम का मिलना आम बात हो गई है। हाल के वर्षों का सूखा और किसानों की आत्महत्या स्थिति की गम्भीरता को दर्शाती है। मानसून परिवर्तन ने भी नई चुनौतियाँ पेश की हैं, इनसे बाढ़ और सूखा पर भी असर पड़ा है।

देश के शहरों में लगभग 400 करोड़ लीटर सीवेज प्रतिदिन तैयार होता है , जिसमें से लगभग 20 प्रतिशत का शोधन हो पाता है। वर्षाजल में लगातार कभी अल्पवृष्टि, कभी अतिवृष्टि देखने को मिल रही है। अतिवृष्टि में जल बहाव की समुचित और समन्वित व्यवस्था न होने के कारण बरसात में शहरी जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। बारिश का पानी बाढ़ बन जाता है और गन्दा पानी घरों में घुस जाता है। यह बीमारियों को भी न्योता देता है।

आजादी के बाद देश में बड़े और मझोले सिंचाई योजनाओं पर 400,000 करोड़ का निवेश किया गया है। इससे सिंचाई की क्षमता 1 करोड़ 13 लाख हेक्टेयर में बनाई गई लेकिन लगभग 90 लाख हेक्टेयर में ही हो सका है। सालों साल यह फासला बढ़ता जा रहा है। किसानों तक पानी नहीं पहुँच रहा है जबकि पानी काफी मात्रा में जमा है।

हमने खूब पैसा बाँध और नहर प्रणाली पर लगाया, पर यह नहीं सोचा कि नतीजा क्या निकलेगा। बड़ी सिंचाई योजनाओं पर औसतन लागत 1382 प्रतिशत आया और मझोले योजनाओं पर यह लागत 325 प्रतिशत है। नदी की बेसिन अधिकांश नदियों में घटता जा रहा है जिसके कारण नए बाँधों का निर्माण की सम्भावना कम होती जा रही हैं।

जल प्रबन्धन के क्षेत्र में भारत अभूतपूर्व चुनौतियों से गुजर रहा है। दिनोंदिन जल संकट गहराता जा रहा है। साफ लग रहा है कि बीसवीं सदी के उपाय चुक चुके हैं। पुराने उपाय खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से बनाए गए थे, इसलिये सारा ध्यान सिंचाई समस्या से मुक्त होने में लगा था। लेकिन आज जमीनी हकीकत बदल चुकी है।

बड़े बाँधों की सिंचाई क्षमता को बढ़ाने में बड़ी भारी भूमिका निभाई है। लेकिन आज संकट यह है कि बाँधों में जमा किया गया पानी उन किसानों तक नहीं पहुँच रहा है जिनके लिये बड़े बाँध बनाए गए थे। इसी के साथ भूजल ने हरित क्रान्ति को सचमुच में बढ़ाया था, वह अपने को संजोए और सम्भाल कर रखने के संकट को झेल रहा है। जलस्तर और उसकी गुणवत्ता एक प्रकार के नए संकट से जूझ रही है। यह एक ऐसी स्थिति बन रही है जिसमें समस्या का समाधान-ही-समाधान बन रहा है।

इस हालत में हमारी जल समस्या का समाधान यही है कि हम पक्का कर लें कि बारहमासी नदी, सूखकर सड़क न बन जाये। इसी के साथ पानी का इस्तेमाल करने वालों के बीच टकराव भी बढ़ता गया। ये लोग शहर में भी हैं और उद्योग और कृषि में भी। इस टकराव से छुटकारा पाने के लिये एक नई रणनीति पर विचार करना होगा। इस विचार विमर्श के लिये नए संस्थागत ढाँचे की आवश्यकता है।

केन्द्रीय जल आयोग और केन्द्रीय भूजल परिषद ने अब तक अच्छा ही काम किया है। दशकों से ये संस्थाएँ भारत के जल क्षेत्र में काम कर रही हैं। हालांकि ये संस्थाएँ किसी और काल में बनी थीं। तब इनका कार्यक्षेत्र भी और काम करने वाले लोग भी अलग अलग ही थे। आज इसकी आवश्यकता है कि इन संस्थाओं को और मजबूत बनाया जाये, इनकी पुनर्रचना हो ताकि जल क्षेत्र में भारत को जैसा नेतृत्व चाहिए, वैसा नेतृत्व मिल सके।

नए नेतृत्व के बारे में योजना आयोग के पूर्व सदस्य मिहिर शाह के नेतृत्व में बनाई गई समिति ने सुझाव दिया कि जल सम्बन्धी के लिये बनी संस्थागत संस्थाओं में बदलाव होना ही चाहिए। समिति ने अपनी रपट बनाने के लिये बड़े पैमाने पर विचार-विमर्श के करने के बाद ही इस नतीजे पर पहुँची, जिसमें सभी सम्बन्धित पक्षों कठिनाइयों और समस्याओं को मद्देनजर रखकर ही विमर्श हुआ। इसमें सरकार के अन्दर के लोग तो हैं ही, सरकार के बाहर के लोग भी हैं। समिति ने खोजबीन के बाद जल के सन्दर्भ में माना कि सब कुछ समाप्त नहीं हुआ, लेकिन जल क्षेत्र में सुधार सम्बन्धी को आगे बढ़ाना चाहिए।

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About the author

.पत्रकारिता को बदलाव का माध्यम मानने वाले प्रदीप सिंह एक दशक से दिल्ली में रहकर पत्रकारिता और लेखन से जुड़े हैं। दिल्ली से प्रकाशित होने वाले कई अखबारों और पत्रिकाओं से जुड़कर काम किया।

वर्तमान में यथावत पाक्षिक पत्रिका में बतौर प्रमुख संवाददाता कार्यरत हैं। प्रदीप सिंह का जन्म 13 जुलाई 1976 को प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। प्राथमिक से लेकर बारहवीं तक की शिक्षा प्रतापगढ़ में हुई।

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