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जल संकट की चपेट में दक्षिणी राज्य

Author: 
बी शेखर
Source: 
राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 8 अप्रैल 2017

उत्तरी कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के आखिर के कुछ हफ्तों में अच्छी बारिश हुई थी, लेकिन बेवक्त की बरसात के कारण ज्यादातर फसलें बर्बाद हो गईं। इसकी वजह से प्रति हेक्टेयर पैदावार में भी कमी आएगी। मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने हाल में कहा था कि राज्य को 25 हजार करोड़ रुपए का फसली नुकसान हुआ है। सूखे की इस समस्या से निपटने के लिये कर्नाटक सरकार ने केन्द्र सरकार से 4702.54 करोड़ रुपए के पैकेज की माँग की है। पूरा दक्षिण भारत अभूतपूर्व भीषण सूखे की चपेट में है। यह 50 साल का सबसे भीषण सूखा है। सबसे बड़ी चिन्ता यह है कि इन राज्यों में बारिश लाने वाला दक्षिणी-पश्चिमी मानसून अभी तीन महीने दूर है। इस दौरान जल की उपलब्धता को लेकर क्या हालात पैदा होंगे, कुछ नहीं कहा जा सकता। केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु के लगभग सभी बाँध न्यूनतम भण्डारण क्षमता तक सूख चुके हैं। नतीजतन, इन राज्यों में खेती की सारी गतिविधियाँ ठप पड़ी हैं।

कर्नाटक और तमिलनाडु की हालत सबसे ज्यादा खराब है क्योंकि पिछले साल दक्षिणी-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी, दोनों मानसून में बादलों ने धोखा दिया था, जिसकी वजह से फसलों को भारी नुकसान हुआ था। परिणाम यह हुआ कि किसानों द्वारा बैंकों से लिये गए कर्ज की अदायगी में चूक की घटनाएँ बहुत तेजी से बढ़ने लगीं। ऐसे लोगों को उबारने के लिये बैंक नया कर्ज भी नहीं दे रहे हैं और इस तरह उनके परिवारों की जिन्दगी अन्धेरे के गर्त में डूबती जा रही है।

ये हालात किसानों को गहरे संकट से उबारने के लिये एक के बाद एक आई सरकारों के प्रयासों पर सवालिया निशान हैं। इनमें से चार राज्यों में कतिपय सिंचाई परियोजनाओं से पानी निकालने की योजनाओं सहित कई किसान हितैषी कदमों को लेकर राज्य सरकारों के लम्बे-चौड़े दावों के बावजूद रैयतों की आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ती ही जा रही हैं। हालांकि कृषि प्रधान सभी राज्यों में हालात कमोबेश एक से हैं, लेकिन आत्महत्या की घटनाओं में बहुत तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है।

आत्महत्या करने के कारण


कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि छोटी जोतों, मानसून पर अतिनिर्भरता, अपर्याप्त सिंचाई साधनों और सस्ते कर्ज व बीमे के कारण ज्यादातर किसानों को ऐसा त्रासद फैसला करना पड़ रहा है। पिछले 2-3 वर्षो में अत्यन्त अनियमित और अपर्याप्त मानसून ने कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों की समस्याओं को और गम्भीर कर दिया है। अत्यन्त गम्भीर परिस्थितियों में इन समस्याओं से ग्रस्त किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहे हैं। भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद (आईसीएआर) के पूर्व सदस्य एमवीएस नागी रेड्डी कहते हैं, ‘‘कृषि संकट राज्य सरकारों की अनदेखी का नतीजा है। अनन्तपुरम जिले (आन्ध्र प्रदेश) के पाँच लाख से ज्यादा किसान काम की तलाश में दूसरे राज्यों में चले गए हैं। इन हालात से निपटने के लिये केन्द्रीय सहायता की माँग करने के बजाय राज्य सरकार विकास दर के झूठे दावे कर रही है, जिसका नतीजा है कि इतनी बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं।”

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के विश्लेषण के मुताबिक दिवालियेपन, कर्जखोरी और खेती से जुड़ी समस्याओं के कारण ज्यादातर किसान आत्महत्या कर रहे हैं। कुल 8007 में से 4479 लोगों ने कर्ज में डूबने के कारण आत्महत्या की यानी खुदकुशी करने वाले किसानों में से 55.9 प्रतिशत कर्ज में डूबे थे। इसी तरह, खुदकुशी के 8007 में से 2193 यानी 27.3 प्रतिशत मामले खेती से जुड़ी समस्याओं के कारण थे। इस तरह, वर्ष 2015 में आत्महत्या करने वाले किसानों में 83 प्रतिशत ऐसे थे जो कर्ज नहीं मिल पाने या फसल नहीं बिक पाने के कारण यह कदम उठाने को मजबूर हुए। किसानों द्वारा आत्महत्या करने की अन्य वजहों में पारिवारिक कलह, खराब सेहत और नशे की लत प्रमुख हैं।

कर्नाटक के विधि एवं संसदीय कार्यमंत्री टी बी जयचंद्र ने हाल ही में विधानसभा में बताया कि राज्य के 177 तालुकों में से 160 को सूखा प्रभावित घोषित कर दिया गया है। कर्नाटक पहला ऐसा राज्य था जिसने पिछले वर्ष को भी सूखाग्रस्त घोषित किया था। इस साल की शुरुआत में भी सरकार एक एडवाइजरी जारी कर चुकी है जिसमें किसानों से आग्रह किया गया है कि लगभग छह साल की अपर्याप्त बारिश के कारण पैदा हुए गम्भीर जल संकट को देखते हुए वे ज्यादा पानी सोखने वाली फसलों की खेती से बचें।

राज्य के कृषि विभाग के अनुसार कर्नाटक में कुल बुआई क्षेत्र (धान, गन्ना, रागी, मक्का और दाल जैसी प्रमुख फसलें शामिल) 96200 हेक्टेयर से घटकर इस साल 61600 हेक्टेयर रह गया है। इसका मतलब कि इस साल उपज कम होगी और किसानों पर बोझ बढ़ेगा। दक्षिणी कर्नाटक के छह दूरस्थ जिलों की पानी की सभी जरूरतों को पूरा करने वाला कावेरी बेसिन भी सूखे की चपेट में है।

इस नदी के चार बाँधों में बहुत कम पानी रह गया है। इस क्षेत्र को पीने के लिये 24 टीएमसी फुट जबकि सिंचाई के लिये 42 टीएमसी फुट पानी की आवश्यकता है। इसके मद्देनजर सरकार को कृषि उपयोग और जलाशयों के पुनर्भण्डारण के मुकाबले पीने के लिये पानी को प्राथमिकता देने के लिये एक प्रस्ताव पारित करने पर मजबूर होना पड़ा।

हालांकि उत्तरी कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के आखिर के कुछ हफ्तों में अच्छी बारिश हुई थी, लेकिन बेवक्त की बरसात के कारण ज्यादातर फसलें बर्बाद हो गईं। इसकी वजह से प्रति हेक्टेयर पैदावार में भी कमी आएगी। मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने हाल में कहा था कि राज्य को 25 हजार करोड़ रुपए का फसली नुकसान हुआ है। सूखे की इस समस्या से निपटने के लिये कर्नाटक सरकार ने केन्द्र सरकार से 4702.54 करोड़ रुपए के पैकेज की माँग की है।

तमिलनाडु में भी है कृषि संकट


तमिलनाडु के हालात भी मिलते-जुलते हैं। यह राज्य गम्भीर कृषि संकट का सामना कर रहा है। फसलों के नुकसान के कारण कावेरी डेल्टा बेसिन के कई किसान अपनी जान दे चुके हैं। हाल में त्रिची कलक्ट्रेट के बाहर जब किसानों ने मुँह में मरे हुए चूहों के साथ प्रदर्शन किया तो लोग अवाक रह गए। किसानों का कहना था कि अगर उन्हें कोई मदद नहीं मिली तो वे चूहे खाने को मजबूर होंगे। उन्होंने राज्य को सूखाग्रस्त घोषित किये जाने की माँग की। उनके विरोध के नाटकीय तरीके को अनोखा कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

हालांकि राज्य में बारिश में 70 प्रतिशत की कमी दर्शाई गई है लेकिन डेल्टा क्षेत्र के जिलों के किसानों का कहना है कि यह 80-90 प्रतिशत के बीच है। मानसून के फेल होने और कर्नाटक द्वारा छोड़े गए कावेरी नदी के जल के भण्डारण की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण फसलें बर्बाद हो गईं। नतीजतन, किसानों के सामने सूखे की ऐसी स्थिति मुँह बाए खड़ी है जिसका सामना उन्होंने पिछले कई वर्षों से नहीं किया था।

तमिलनाडु सरकार ने राहत के लिये केन्द्र से राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन फंड (एनडीआरएफ) से 39,565 करोड़ रुपए मंजूर करने का आग्रह किया है। किसानों की समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ट कराने के लिये उनके कई संगठन राज्य और केन्द्र सरकार के दरवाजे खटखटा रहे हैं, लेकिन कोई असर नहीं पड़ रहा। त्रिची में मृत चूहों के साथ प्रदर्शन करने वाले संगठन के अध्यक्ष पी अयाकन्नु की चेतावनी के अनुसार दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर किसान इंसानी खोपड़ियों के साथ प्रदर्शन कर रहे हैं।

पिछले कुछ सालों के सूखे के कारण जो किसान ज्यादा प्रभावित हुए हैं, उन्हें 15 मार्च, 2017 को पारित राज्य के बजट से भी कुछ हासिल नहीं हुआ। इसमें पानी के व्यावहारिक इस्तेमाल को बढ़ावा देने, खुरपका-मुँहपका रोग के टीके के उत्पादन में आत्मनिर्भरता और इस तरह की कई स्कीमों की घोषणा तो की गई लेकिन आलोचकों का कहना है कि कृषि एवं सम्बन्धित क्षेत्र को इन कदमों से कोई राहत नहीं मिलने वाली। कृषक संगठन, जिनकी प्रमुख माँग कर्ज माफी है, भी इस बजट से खुश नहीं हैं। प्रदशर्नकारी किसानों ने मरे हुए साँप लाने की धमकी दी है। उनका कहना है कि अगर सरकार उन्हें उबारने के लिये आगे नहीं आती है तो वे साँपों का भोजन बनाएँगे और उसे खाएँगे। बहरहाल, तमिलनाडु सरकार की ओर से अभी तक कोई कदम नहीं उठाए जाने से किसान निराश हैं।

तमिलनाडु में डीएमके और पीएमके सहित सभी विपक्षी दलों ने सरकार से राज्य को सूखाग्रस्त घोषित करने का आग्रह किया है लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ है। कर्नाटक का भी यही हाल है। राज्य की तीनों प्रमुख पार्टियों, सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी जेडीएस व भाजपा को राज्य में दो सीटों के लिये हो रहे उपचुनाव से ही फुर्सत नहीं है। अलबत्ता, जब कोई किसान अपमान न सह पाने के कारण आत्महत्या करता है, तो इन पार्टियों के नेता घड़ियाली आँसू बहाने आ जाते हैं। इसके अलावा उनके पास किसानों की समस्याओं को सुलझाने के लिये कोई समय नहीं है।

जहाँ तक तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का सवाल है, तो वे दोनों पुनर्गठित राज्य के शासन-प्रशासन की गुत्थी में उलझे हुए हैं और किसान उनकी प्राथमिकता में ही नहीं हैं। जिले के कई हिस्सों में जहाँ धान से लेकर प्याज और दालों की खेती होती है, किसानों ने जाड़े की फसल दो से तीन बार बोई। हर बार जब खेत सूख जाते, वे इस उम्मीद में फिर बुआई करते कि बारिश की बूँदें गिरेंगी और फसलों में जान फूँकेंगी, लेकिन बरसात नहीं हुई और खर्च तो बढ़ा ही, घाटे में भी इजाफा हुआ। हालांकि तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश और तेलंगाना ने कुछ हद तक 50 से 100 प्रतिशत तक कृषि लोन को माफ कर दिया है, लेकिन कर्नाटक सरकार ने अभी तक यह वादा पूरा नहीं किया है।

पिछले कुछ सालों के सूखे के कारण जो किसान ज्यादा प्रभावित हुए हैं, उन्हें 15 मार्च, 2017 को पारित राज्य के बजट से भी कुछ हासिल नहीं हुआ। इसमें पानी के व्यावहारिक इस्तेमाल को बढ़ावा देने, खुरपका-मुँहपका रोग के टीके के उत्पादन में आत्मनिर्भरता और इस तरह की कई स्कीमों की घोषणा तो की गई लेकिन आलोचकों का कहना है कि कृषि एवं सम्बन्धित क्षेत्र को इन कदमों से कोई राहत नहीं मिलने वाली। कृषक संगठन, जिनकी प्रमुख माँग कर्ज माफी है, भी इस बजट से खुश नहीं हैं।

कर्नाटक के बजट में एकमात्र सकारात्मक चीज रही कृषि यंत्रधारे कार्यक्रम का और 250 केन्द्रों तक विस्तार एवं खेती में टेक्नोलॉजी को अपनाने के लिये शुरू की गई प्रोत्साहन योजना। नई टेक्नोलॉजी से किसानों के प्रति हेक्टेयर पैदावार बढ़ाने में मदद मिलेगी।

कर्नाटक के किसान बजट से भी नाराज


कर्नाटक राज्य रैयत संघ के महासचिव बी नागेंद्र के अनुसार किसानों के नजरिए से देखा जाये तो राज्य सरकार का बजट पूरी तरह से निराशाजनक है। उम्मीद थी कि कम-से-कम 50 प्रतिशत कर्ज तो माफ कर ही दिया जाएगा लेकिन हर समय किसानों की खुशहाली की बात करने वाले मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने ऐसी कोई घोषणा नहीं की। नागेंद्र कहते हैं कि किसानों की सुनिश्चित आय की उम्मीदें पूरी नहीं हुई लेकिन राज्य सरकार को सातवें वेतन आयोग के जरिए राज्य कर्मचारियों के वेतन बढ़ाने में बहुत दिलचस्पी है।

कर्नाटक राज्य गन्ना उत्पादक संगठन के अध्यक्ष के शान्ता कुमार के अनुसार बड़ी संख्या में किसानों के आत्महत्या करने के बावजूद राज्य सरकार किसानों की दुर्दशा की अनदेखी कर रही है। दूसरी तरफ, कर्नाटक सरकार का कहा है कि कर्ज माफी में धन को बर्बाद करने के बजाय उसका इस्तेमाल ज्यादा-से-ज्यादा इलाकों तक सिंचाई सुविधा पहुँचाने, नहरों की मरम्मत और जलाशयों के पुनर्भण्डारण में किया जा रहा है। इन उपायों से आगे चलकर किसानों को काफी फायदा होगा।

केरल में भी ठीक नहीं हैं हालात


जहाँ तक केरल का प्रश्न है तो पिछली एक सदी में जल देवता उससे इतने कुपित नहीं हुए जितने पिछले कुछ महीनों में दिखे। दक्षिण-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी, दोनों मानसून दगा दे गए। छिटपुट बारिश के अलावा इस ईरीय प्रदेश को कुछ नहीं मिला। नतीजतन, राज्य के सामने पिछले 115 साल का सबसे भीषण सूखा मुँह बाए खड़ा है। 1956 में इस राज्य के गठन के बाद का यह सबसे भीषण सूखा है। क्षेत्रीय मौसम विभाग के आँकड़े डराने वाले हैं।

पिछले साल जुलाई से सितम्बर के बीच दक्षिण-पश्चिमी मानसून में 33.7 प्रतिशत की कमी थी। लेकिन असली खलनायक तो निकला अक्टूबर से दिसम्बर के बीच का उत्तर-पूर्वी मानसून क्योंकि इसमें 61 प्रतिशत की भारी-भरकम कमी दर्ज की गई। राज्य मौसम विभाग के निदेशक एस सुदेवन कहते हैं कि दोनों मानसून सिस्टम का फेल होना दुर्लभ है। इसकी मुख्य वजह रही चेन्नई और आन्ध्र तट से टकराने वाले वरदा जैसे चक्रवात जो बंगाल की खाड़ी में पैदा हुए। उत्तर-पूर्वी मानसून के कारण पिछले साल सामान्य से 20 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई लेकिन इस साल कमी ही कमी दिख रही है।

केरल के सबसे ज्यादा प्रभावित जिले हैं त्रिसूर और पलक्कड़। ये आमतौर पर सूखाग्रस्त क्षेत्र हैं, जहाँ सूखा और फसल का मुर्झाना आम बात है। लेकिन इस साल तो किसानों को बड़ा झटका लगा। पूरे केरल में भूजल की स्थिति भी खराब होती जा रही है। राज्य बाँधों और जलाशयों से भी अच्छी खबर नहीं मिल रही है। लगभग सभी जलाशयों के स्तर में लगातार भारी कमी दर्ज की जा रही है। कृषि निदेशालय के 21 दिसम्बर, 2016 के ताजा आँकड़े बताते हैं कि राज्य में सूखे के कारण खेती योग्य 17,128 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित हुआ है। फसल नुकसान के कारण 90 करोड़ की चपत लगी है।

केरल राज्य आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण (केएसडीएमए) ने राज्य सरकार से आग्रह किया है कि अगले कुछ महीनों के लिये जो भी पानी बचा है, उसे संरक्षित करने के लिये सक्रियता दिखाई जाये। राज्य में पहली बार ऐसा हुआ जब 28 अक्टूबर को मुख्यमंत्री पिन्नारी विजयन की अध्यक्षता में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में केएसडीएमए की अनुशंसा पर घरों और उद्योगों के लिये पानी की राशन व्यवस्था लागू की गई। तीन आर यानी पानी को रिड्यूस, रीयूज और रिसाइकिल करने के उद्देश्य के साथ एक 26 सूत्री एजेंडा बनाया गया है। मई, 2017 तक पानी के इस्तेमाल को लेकर एक वरीयता क्रम भी बनाया गया है। सबसे ज्यादा प्राथमिकता पीने के पानी को और उसके बाद घर में उपयोग और फिर औद्योगिक उपयोग।

समग्र रूप से देखा जाये तो दक्षिण भारतीय राज्य अब तक के सबसे भीषण सूखे का सामना कर रहे हैं। खेती के लिये सिंचाई को भूल जाइए, स्थिति यह है कि अब दक्षिण की ये पाँच सरकारें पीने के पानी के संरक्षण को लेकर भयंकर दबाव में हैं। उम्मीद की जाती है कि 2017 को लेकर भारतीय मौसम विभाग का यह अनुमान सही साबित हो कि दक्षिण-पश्चिमी मानसून के तहत देश भर में सामान्य बारिश होगी। सूखा प्रभावित दक्षिणी राज्यों के लिये इससे बड़ी दूसरी कोई राहत नहीं हो सकती है।

लेखक, बंगलुरु स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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