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बूँद-बूँद को सहेजना ही जल संकट का निदान


सरुतालसरुतालजानकारों का कहना है कि उत्तराखण्ड पहाड़ी राज्य में यदि सरकार व गैर सरकारी ढाँचागत कार्यों में वर्षाजल के संरक्षण की योजना अनिवार्य कर दी जाय तो राज्य में जल सम्बन्धी समस्या का निदान यूँ ही हो जाएगा। इस राज्य में ऐसी कोई नीति अब तक सामने नहीं आई है।

यहाँ तक कि सत्ता प्रतिष्ठानों में भी यह बात सुनी नहीं जाती है। जबकि सत्ता चलाने वाले जनता के नुमाइन्दे जल संकट का सामना करके सत्ता के शीर्ष पर बैठे हैं। परन्तु उन्हें तो सत्ता का खुमार इतना चढ़ जाता है कि वे जल समस्या को कोई समस्या नहीं मानते। यह बात दीगर है कि वे अति जल संकट से जूझने वाले गाँव, कस्बे, शहर तक एक-आध पानी का टैंकर पहुँचा देते हैं। पर यह तो जल संकट का स्थायी निदान नहीं हुआ। खैर जल संकट का निदान जब होगा वह, तो समय के ही गर्त में है।

ज्ञात हो कि राज्य के कुछ लोगों और संस्थानों ने जल संकट के समाधान और जल संरक्षण के लिये उल्लेखनीय कार्य किये हैं। यह कार्य राज्य में यदि प्रत्येक नागरिक और सरकारी एवं गैर सरकारी स्तर पर अनिवार्य कर दिया जाये तो राज्य में लोग सौ फीसदी जल समस्या से निजात पा सकते हैं।

काबिले गौर हो कि मसूरी से लगभग 70 किमी दूरी पर स्थित बीहड़ पहाड़ी गाँव पाब में बंजर पड़ी 03 हेक्टेयर जमीन पर विषम परिस्थितियों के बीच समुद्र तल से 1170 मी. की ऊँचाई पर ‘नारायणी उद्यान’ को 1994 में कृषक कुन्दन सिंह पंवार ने स्थापित किया है। यहाँ ना तो कोई प्राकृतिक जलस्रोत है और ना ही कोई पाइप लाइन है। इस ‘फल बागान’ की सम्पूर्ण सिंचाई की व्यवस्था वर्षाजल पर ही निर्भर है। श्री पंवार ने सिंचाई बाबत रेनवाटर हार्वेस्टिंग को प्रमुखता से इजाद किया है। यही वजह है कि उन्हें कभी भी सिंचाई के लिये मोहताज नहीं होना पड़ता।

तीन हेक्टेयर फल बागान की पूरी सिंचाई टपक विधि से होती है जो सौ फीसदी वर्षाजल ही है। उत्तरकाशी जनपद के दूरस्थ गाँव हिमरोल में भी भरत सिंह राणा ने कुन्दन सिंह पंवार जैसे ही काम करके दिखाया। श्री राणा ने समुद्र तल से दो हजार मी. की ऊँचाई पर एक ‘फल बगान’ विकसित किया और इस बागान में ही वर्षाजल को उपयोगी बनाया। श्री राणा वर्षाजल का ऐसा संरक्षण कर रहे हैं कि वे बागान में ही फलों और फूलों का पल्प तक तैयार करते हैं जिसमें वे 100 फीसदी वर्षाजल का ही उपयोग करते हैं। इन दोनों प्रगतिशील कृषकों ने बागान में ही वाटर हार्वेस्टिंग पोंड भी बनवाए और छत के पानी को भी संरक्षित किया है।

इसी तरह पौड़ी जिले के यमकेश्वर विकासखण्ड के अर्न्तगत आर्मी से सेवानिवृत हुए त्रिलोक सिंह बिष्ट अपने गाँव रामजीवाला में ही रह रहे हैं। श्री बिष्ट ने अवकाश प्राप्त होने के तुरन्त बाद अपने घर-पर जल संरक्षण के तौर-तरीके अपनाए। वे बरसात के पानी का भरपूर उपयोग करते हैं। वे अपने घर के आस-पास बरसात के पानी से सिंचाई करते हैं तो पीने के अलावा जितने भी पानी के उपयोग की आवश्यकता होती है वह बरसात के पानी से ही पूरी करते हैं।

घर की छत, शौचालय की छत के पानी को वह अलग-अलग टंकियों तक पहुँचाते हैं। वे बताते हैं कि जब भी वे छुट्टियों में घर आया करते थे उन्हें सबसे अधिक पानी की समस्या से जूझना पड़ता था। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने गाँव में ही रहने का मन बनाया और वर्षाजल को एकत्रित करने के उपाय ढूँढे। वर्तमान में वे 20 हजार ली. वर्षाजल को एकत्रित कर रखते हैं। जिससे उनकी पानी से सभी प्रकार की समस्या का समाधान हो गया है।

मौजूदा वक्त में हिमकॉन संस्था ने भी उनके घर पर फेरोसिमेंट टैंक का निर्माण करवाया है जिसमें वर्षाजल को ही संरक्षित करना है इस तरह अब उनके घर पर वर्षाजल का 25 हजार ली. का बैंक बन चुका है।

दूसरी ओर पर्वतीय कृषि महाविद्यालय चिरबटिया टिहरी गढ़वाल ने भी समुद्र तल से 7000 फीट की ऊँचाई पर पाँच लाख लीटर वर्षाजल का संरक्षण कर मिशाल कायम की है। यह जिले का एकमात्र संस्थान है जो वर्षाजल संचयन का काम कर रहा है। बता दें कि मार्च-अप्रैल के माह में वर्षा न होने की वजह से जिले में 70 फीसदी फसल सूख गई थी, जनपद को सूखा ग्रस्त घोषित कर दिया गया। लेकिन चिरबटिया स्थित कृषि महाविद्यालय की आठ हेक्टेयर भूमि पर रोपे गए फलदार पौधे और फूल हरे-भरे लहलहा रहे थे।

यही कारण है पिछले तीन वर्षों से महाविद्यालय परिसर में वर्षाजल संरक्षण के लिये काम किया जा रहा है। महाविद्यालय कैम्पस के सभी भवनों की छत से लेकर हेलीपैड तक पर गिरने वाली बारिश की एक-एक बूँद को यहाँ जाया नहीं देते। बता दें कि यहाँ सात हजार फीट की ऊँचाई पर कोई जल संकट नहीं है और 39 टंकियों में आज भी एकत्रित है तीन लाख लीटर वर्षाजल।

उत्तरकाशी के हिमरोल गाँव में कुन्दन सिंह राणा द्वारा बनाया गया तालाबइसके अलावा दूधातोली विकास संस्था ने दूधातोली के जंगलों में वर्षाजल संरक्षण के लिये ताल-तलैया बनाए तो दूधातोली नदी जीवित हो ऊठी। हैस्को संस्था ने देहरादून स्थित हैस्को ग्राम विकसित करके वर्षाजल के एकत्रिकरण के लिये चाल-खाल को बढ़ावा दिया।

मौजूदा समय में हैस्को ग्राम शुक्लापुर गाँव के लोग और संस्थान में कार्यरत कर्मी 80 फीसदी उपयोग वर्षाजल का ही करते हैं। लोक विज्ञान संस्थान देहरादून ने भी राज्य में वर्षाजल के संरक्षण पर राज्य में अभियान चलाया। संस्थान ने राज्य में वर्षाजल की कितनी मात्रा उपयोग में आती है इसके आँकड़े प्रस्तुत किये। यह भी बताया कि वर्षाजल के संरक्षण से ही जल संकट का सामना किया जा सकता है।

हिमालय पर्यावरण शिक्षा संस्थान ने जलकुर नदी के जलागम क्षेत्र में भारी मात्रा में चाल-खाल को पुनर्जीवित किया तो आज भी जलकुर नदी की धार निरन्तर बनी है। लोक जीवन विकास भारती ने बाल गंगा घाटी में चाल-खाल के पुनर्जीवन के लिये एक सफल अभियान चलाया। लक्ष्मी आश्रम कौसानी में भी सर्वाधिक जल उपयोगिता वर्षाजल पर ही निर्भर है। यहाँ अध्ययनरत छात्राएँ एक तरफ शिक्षा अर्जन करती हैं तो दूसरी तरफ पर्यावरणीय सवालों के व्यावहारिक ज्ञान से अच्छी तरह वाकिफ हैं। वे भी वर्षाजल के संरक्षण को महत्त्वपूर्ण मानती हैं।

पर्यावरण के जानकारों का मानना है कि यदि सरकार सिर्फ ढाँचागत विकास बाबत वर्षाजल को संरक्षित करना अनिवार्य कर दें तो दो तरह के फायदे सामने आ सकते हैं। एक तो जल संकट का समाधान हो जाएगा और दूसरा बरसात में फिजूल तरीके से बहता पानी कहीं नाली चोक कर देता है तो कही बेतरतीब बहकर अन्य नुकसान पहुँचाता है जैसे गन्दगी को अपने साथ बहाकर पेयजल स्रोतों में जमाकर देना या भू-धंसाव वगैरह। ऐसी स्थिति पर कमोबेस जल समस्या का निदान हो सकता है।

उनका यह भी मानना है कि राज्य में परम्परागत जल संरक्षण की पद्धति को जमीनी रूप दिया जाये। इससे जल संकट का सामना तो होगा ही साथ-साथ में बिगड़ते पर्यावरण पर काबू पाया जा सकता है। वैसे राज्य सरकार ने हाल ही में निर्णय लिया है कि जल संरक्षण के लिये चाल-खाल को प्रमुखता से बनाया जाये ताकि राज्य का प्रत्येक जलागम क्षेत्र सरसब्ज हो सके। समय बताएगा कि राज्य सरकार की यह योजना कब परवान चढ़ती है। कुल मिलाकर सत्ता प्रतिष्ठानों में अब तक यह जागरुकता पूर्ण रूप से नहीं आई है।

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