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स्पर्श के लायक भी नहीं रहा यमुना का पानी

Author: 
प्रमोद भार्गव

वर्तमान स्थितियों में प्रदूषण सम्बन्धी तमाम रिपोर्टों के बावजूद यमुना दिल्ली में 25 किलोमीटर और आगरा में 10 किमी लम्बे नालों में तब्दील हो चुकी है। अकेली दिल्ली में अनेक चेतावनियों के बावजूद प्रतिदिन 3296 मिलियन गैलन लीटर गन्दा पानी और औद्योगिक अवशेष विभिन्न नालों से यमुना में उड़ेले जा रहे हैं। करीब 5600 किमी लम्बी सीवर लाइनों से मल-मूत्र बहाया जा रहा है। हालांकि 17 स्थलों पर 30 सीवर ट्रीटमेंट प्लांट क्रियाशील हैं, लेकिन उनकी गन्दे मल को स्वच्छ जल में परिवर्तित करने की दक्षता सन्दिग्ध है। इसे देश और नदियों का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि हमारी जीवनदायी नदियों का पानी अछूत होता जा रहा है। यमुना नदी के पानी की जो ताजा रिपोर्ट आई है, उसके अनुसार नदी जल में अमोनिया की मात्रा इस हद तक बढ़ गई है कि उसे छूना भी स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।

यह रिपोर्ट जल संस्थान आगरा ने दी है। इस पानी में अमोनिया की मात्रा खतरे के स्तर को पार कर चुकी है। इस कारण फरवरी 2016 को दिल्ली के वजीरावाद और चंदावल जल शोधन संयंत्रों को दो दिनों के लिये बन्द भी कर दिया गया था। दरअसल दिल्ली क्षेत्र में यमुना में अमोनिया की मात्रा 1.12 पार्टिकल्स पर मिलियन (पीपीएम) तक पहुँच गई थी, जबकि पानी में अमोनिया की मात्रा शून्य होनी चाहिए।

जल विशेषज्ञों के मुताबिक अगर पानी में अमोनिया की मात्रा 0.2 पीपीएम भी बढ़ जाती है तो किसी भी शोधन विधि से पानी को पीने लायक नहीं बनाया जा सकता है। इतने खराब हालात में भी आगरा के एमबीबीआर संयंत्र से पानी प्रदाय किया जाता रहा। जबकि इस पानी में अमोनिया की मात्रा 18 पीपीएम और जीवनी मंडी जल शोधन संयंत्र पर 23 पीपीएम दर्ज की गई थी।

जिस यमुना नदी के किनारों तथा जल व तल की सतहों पर खेल खेलते हुए द्वापर के भगवान कृष्ण ने जग को लीला दिखाने के लिये कालिया नाग का मान-मर्दन कर यमुना को प्रदूषण मुक्त कर दिया था, वहीं यमुना आज अस्पृष्यता का अभिशाप झेल रही है। डॉ पंकज कौशिक का कहना है कि अगर पानी में अमोनिया की मात्रा खतरे के स्तर से अधिक है, तो शुरुआत में पानी पीने वालों को पेट से जुड़ी बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। इन बीमारियों में डायरिया, उल्टी-दस्त, बुखार के अलावा साँस की शिकायत हो जाना शामिल हैं।

जल से अमोनिया की मात्रा घटाने के लिये क्लोरीन का अधिक प्रयोग किया जाता है। यमुना में इस समय 70 पीपीएम से लेकर 56 पीपीएम तक क्लोरीन का उपयोग किया जा रहा है। जबकि क्लोरीन की अधिकतम मात्रा 10 पीपीएम से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। अमोनिया की मात्रा घटाने का स्वाभाविक तरीका नदी में पानी के प्रवाह को बढ़ाना है। किन्तु आगरा के गोकुल बैराज में पानी की मात्रा कम होने के कारण ऐसा सम्भव नहीं हो पा रहा है।

भारत के लिये यमुना केवल एक नदी न होकर संस्कृति है। जो उत्तराखण्ड, हिमाचल, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली राज्यों के लिये जीवनदायी जल प्रदाय करने का प्रमुख आधार बनी हुई है। करोड़ों लोगों को सिंचाई, उद्योग और पेयजल उपलब्ध कराने के कारण यह नदी आजीविका का भी प्रमुख साधन है। लोक संस्कृति, लोक गीत और पौराणिक आख्यानों तथा क्षेपक दृष्टान्तों एवं गाथाओं में रची-बसी इस प्रकृति की अमूल्य देन को हानि पहुँचती है तो यह नदी भी मिथक तथा अतीत का संशयपूर्ण हिस्सा भर रहकर सरस्वती नदी की तरह विलुप्त होती चली जाएगी।

वर्तमान स्थितियों में प्रदूषण सम्बन्धी तमाम रिपोर्टों के बावजूद यमुना दिल्ली में 25 किलोमीटर और आगरा में 10 किमी लम्बे नालों में तब्दील हो चुकी है। अकेली दिल्ली में अनेक चेतावनियों के बावजूद प्रतिदिन 3296 मिलियन गैलन लीटर गन्दा पानी और औद्योगिक अवशेष विभिन्न नालों से यमुना में उड़ेले जा रहे हैं।

करीब 5600 किमी लम्बी सीवर लाइनों से मल-मूत्र बहाया जा रहा है। हालांकि 17 स्थलों पर 30 सीवर ट्रीटमेंट प्लांट क्रियाशील हैं, लेकिन उनकी गन्दे मल को स्वच्छ जल में परिवर्तित करने की दक्षता सन्दिग्ध है। जबकि पानी स्वच्छ करके ही यमुना में छोड़े जाने की पहली शर्त होनी चाहिए? इस स्थिति में भी कई संयंत्र, कई-कई दिन तक बन्द पड़े रहते हैं।

हालांकि यमुना को प्रदूषण मुक्त और शुद्ध किये जाने के लिये करीब 15000 करोड़ रुपए अब तक खर्च किये जा चुके हैं। बावजूद नतीजा शून्य ही रहा है। राष्ट्रमण्डल खेलों के आयोजन के पहले यमुना की सफाई के बहाने 3150 करोड़ रुपए केन्द्र सरकार ने दिये थे। इस राशि से नजफगढ़ और शाहदरा के नालों को साफ किया था। साथ ही 115 किमी लम्बी सीवर लाइन बिछाई जानी थी। सीवर लाइन तो बिछ गई, लेकिन नालों की स्थिति बहाल अब तक नहीं हो पाई है।

कुछ समय पहले केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के राष्ट्रीय नदी सरंक्षण निदेशालय ने दावा किया था कि बीस प्रान्तों के 160 नगरों से गुजरने वाली सभी अन्तरराज्यीय नदियों को प्रदूषण मुक्त व शुद्ध कर लिया गया है। परन्तु इसके उलट दिल्ली में स्थित पर्यावरण एवं विज्ञान केन्द्र की एक रिपोर्ट ‘सीवेज कैनाल हाऊ टू क्लीन द यमुना’ खुलासा करती है कि इनमें से ज्यादातर नदियाँ पहले से कहीं ज्यादा प्रदूषित और अशुद्ध हो गई है।

हालांकि संस्थानों की परस्पर विरोधी प्रतिवेदनों पर गौर करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि नदियों की प्रदूषित व बदहाल तस्वीर हमारी आँखों के सामने हैं। लिहाजा हम कह सकते हैं कि आगरा के जल-संस्थान ने यमुना के पानी को नहीं छूने की जो बात कही है, वही सही है।

यमुना की यह स्थिति तब है जब यह नदी दिल्लीवासियों को 40 प्रतिशत जल की आपूर्ति करती है। आगरा में 60 प्रतिशत जल की आपूर्ति यमुना जल से होती है। दिल्ली में यमुना और इसके दो से पाँच किमी चौड़े तटों पर होने वाले जल भराव से विभिन्न भूजल भण्डारों के पुनर्भरण के महत्त्व को ध्यान में रखने की जरूरत है।

मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेंद्र सिंह का कहना है कि दिल्ली दो हिस्सों में विभाजित है। एक राष्ट्रपति भवन, रायसीना पहाड़ियाँ और अरावली के मुहाने वाला क्षेत्र है, जिसकी प्राचीन पहचान खाण्डवप्रस्त के रूप में है। दूसरा हिस्सा इन्द्रप्रस्थ है, जिससे यमुना में जल का पुनर्भरण होता है। यही वे क्षेत्र है जहाँ सीमेंट कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिये गए हैं।

दरअसल गंगा-यमुना वाले पूरे दोआब क्षेत्र में भूजल के विशालतम भण्डार हैं, जिनका इन्द्रप्रस्थ जलभण्डार क्षेत्र से अन्तर जलधाराओं के रूप में सम्पर्क है। यह क्षेत्र हस्तिनापुर से लेकर इन्द्रप्रस्थ तक फैला हुआ है। सीमेंट कंक्रीट के इन जंगलों ने भूजल खण्डों की तमाम धाराओं को खण्डित कर दिया है।

इस कारण यमुना में प्राकृतिक रूप से जो जलधराएँ भूगर्भ में जुड़ी हुई थीं, उनके नष्ट होने से प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। जबकि केन्द्रीय भूजल वोट के एक अध्ययन से तय हुआ है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली क्षेत्र के मैदानी तटों पर भूजल के असीमित भण्डार हैं। यहाँ तक की इन जल भंडारों से 25 करोड़ गैलन जल का पेयजल के रूप में दोहन किया जा सकता है।

500 नलकूपों से यदि इस जल का दोहन किया जाये तो एक चौथाई दिल्ली की प्यास बुझाई जा सकती है। पौराणिक कथाएँ कहती हैं कि सूर्य की पुत्री यमुना ने अपने भाई यमन को अमरत्व देने के लिये यमुना जल से तिलक किया था, लेकिन आज यमुना यमपुरी में बदलने को अभिशप्त हो रही है।

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