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आपदा और उनका प्रबन्धन

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पर्यावरण विज्ञान उच्चतर माध्यमिक पाठ्यक्रम

प्रकृति में बाढ़, सूखा, भूकम्प, सुनामी जैसी आकस्मिक आपदा समय-समय पर आती ही रहती हैं और इनके कारण जीवन और सम्पत्ति की बहुत हानि होती है। अतः यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि इन प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने और जहाँ तक सम्भव हो इन आपदाओं को कम से कम करने के उपाय और साधन खोजे जाएँ।

मानव गतिविधियाँ जैसे आग, दुर्घटना, महामारी आदि द्वारा होने वाली आपदा विनाशकारी प्राकृतिक विपत्तियों की तरह ही आकस्मिक होती हैं और उन्हीं के समान विनाशकारी भी। इस पाठ में आप प्राकृतिक आपदाओं के साथ ही मानव निर्मित आपदाओं के भी कारण, प्रभाव, रोकथाम और प्रबन्धन के विषय में जानकारी प्राप्त करेंगे।

उद्देश्य


इस पाठ के अध्ययन के समापन के पश्चात, आपः

- प्रकृति में पारिस्थितिक संतुलन कैसे बनाये रखते हैं का वर्णन कर पायेंगे;
- मानव निर्मित और प्राकृतिक आपदाओं को वर्गीकृत कर सकेंगे;
- बाढ़, तूफान (चक्रवात) सूखे (जल और जलवायु सम्बन्धी आपदाओं) के कारण, प्रभाव और प्रबन्धन का वर्णन कर पायेंगे;
- भूकम्प (भूविज्ञान सम्बन्धी आपदा) के कारण, प्रभाव और प्रबन्धन को वर्णित कर पायेंगे;
- जंगल की आग, तेल रिसाव जैसी दुर्घटनाओं से सम्बन्धित आपदाओं से लेकर औद्योगिक दुर्घटनाओं के कारण, प्रभाव और प्रबन्धन का वर्णन कर पायेंगे;
- जैव सम्बन्धी आपदाओं (महामारियों जैसे डेंगू, एचआइवी (HIV) और पशु महामारी) के कारण, प्रभाव और प्रबन्धन का वर्णन कर पायेंगे;
- आपदा प्रबन्धन में सरकार और समुदाय (समाज) की भूमिका का वर्णन कर पायेंगे।

12.1 प्रकृति में पारिस्थितकीय संतुलन


जीवधारियों के जीवन-यापन और कुशलता के लिये प्रकृति में भरपूर संसाधन हैं। परन्तु प्रकृति के अपने प्राकृतिक नियंत्रण साधन भी होते हैं। प्रयोग में आये संसाधनों को प्रकृति पुनः भर देती है, आधिक्यता को नियंत्रण में रखती है और यह सब प्राकृतिक रूप से जैवीय, भू-रासायनिक चक्र के द्वारा होता है। इस प्रकार प्रकृति में संतुलन बना रहता है। इसमें खाद्य शृंखला और खाद्य जाल तथा अन्य प्राकृतिक घटनाओं का बहुत बड़ा हाथ है। इस प्रकार प्रकृति में प्राकृतिक संतुलन को नियमित किया जाता है। इसको पारिस्थितिकी संतुलन भी कहते हैं और आज के सन्दर्भ में प्रकृति का यह संतुलन मानव गतिविधियों के कारण गड़बड़ा गया है।

12-2 प्राकृतिक आपदा


भारतीय उपमहाद्वीप प्राकृतिक आपदाओं के लिये सबसे अधिक संभावित क्षेत्र है। बाढ़, सूखा, चक्रवात और भूकम्प भारत में बार-बार और जल्दी-जल्दी आते ही रहते हैं। प्राकृतिक आपदा मानवनिर्मित आपदाओं जैसे आग आदि की पुनरावृति से मिलकर और बढ़ जाते हैं। पर्यावरण के अवक्रमण से स्थलाकृति (टोपो = भूमि) परिवर्तित हो जाती है। इसके साथ ही प्राकृतिक आपदाओं के लिये असुरक्षा भी बढ़ जाती है। 1988 में कुल भूमि का 11.2% क्षेत्र ही बाढ़ संभावित था परन्तु 1998 तक यह भू-भाग बढ़ कर 37% हो गया। अभी हाल ही में जिन चार सबसे बड़ी आपदाओं का सामना भारत को करना पड़ा है वह हैं- महाराष्ट्र के लातूर जिले में 1993 में आने वाला भूकम्प, 1999 में उड़ीसा का बड़ा चक्रवात, 2001 में गुजरात का भूकम्प, दिसम्बर 2004 में आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में आया सुनामी।

बार-बार आने वाली इन आपदाओं में जान और माल की बहुत हानि होती है। भौतिक सुरक्षा, विशेषकर जहाँ असुरक्षा अधिक है, इन बाधाओं के कारण खतरे में पड़ गई है। प्राकृतिक आपदाओं को रोका तो नहीं जा सकता परन्तु उनसे होने वाले दुष्परिणामों और क्षति को कुछ सावधानियाँ अपनाकर रोका जरूर जा सकता है जैसे अधिक कुशल भविष्यवाणी और प्रभावशाली बचाव साधनों के लिये अच्छी तैयारी होना। ऊपर बताई गयी चारों प्राकृतिक आपदाओं से यह स्पष्ट रूप से पता चलती है कि हमें बहुबाधा से होने वाली जान माल की हानि को कम करने और पुनः सुचारु करने के लिये उचित योजनाओं और तैयारियों की आवश्यकता है। आपदाओं के खतरे का प्रबन्धन वास्तव में विकास की समस्या है। पर्यावरण की जिस स्थिति को देश आज झेल रहा है, उसे ध्यान में रखते हुए आपदा प्रबन्धन की तैयारी और योजना तैयार करनी होगी।

12.2.1 आपदाओं के प्रकार


आपदा दो प्रकार की होती हैं- प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदा। उदाहरण के लिये- आग, दुर्घटनाएँ (सड़क, रेल या वायु) औद्योगिक दुर्घटनाएँ या महामारी मानव निर्मित आपदाओं के कुछ उदाहरण हैं। प्राकृतिक और मानवनिर्मित दोनों ही आपदा भयानक विनाश करती हैं। मानव जीवन की क्षति, जीविका उपार्जन के साधनों, सम्पत्ति और पर्यावरण का अवक्रमण इन आपदाओं का परिणाम होता है। आपदाओं से समाज के सामान्य क्रियाकलापों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और इसका दुष्प्रभाव दीर्घकालीन होता है। भूकम्प, चक्रवात, बाढ़ और सूखा प्राकृतिक आपदाओं के उदाहरण हैं।

(क) प्राकृतिक आपदा (Natural disaster)


कुछ आपदा प्रकृति में अपने आप ही पैदा हो जाती हैं जहाँ मनुष्य का कुछ हाथ या वश नहीं होता। इनका वर्णन नीचे किया जा रहा है-

(अ) बाढ़ (Flood)


नदियों या जलस्रोत और जलाशयों में अधिक जल आने से अचानक और अस्थाई रूप से किसी भूभाग का जलमग्न हो जाना, बाढ़ (Flood) कहलाता है।

चित्र 12.1 बाढ़

(i) कारण


बाढ़ अतिवृष्टि, तेज हवाएँ, चक्रवात, सुनामी, बर्फ का पिघलना या बांधों का फटना आदि के कारण ही आती हैं। बाढ़ धीरे-धीरे भी आ सकती है या अतिवृष्टि या जल भंडार में दरार या पानी का अधिक भरकर फैलने से अचानक भी बाढ़ आ सकती है। नदियों और तालाबों में गाद जमने के कारण बाढ़ की घटनाओं और उनकी तीव्रता में वृद्धि होती है।

(ii) प्रभाव


हताहत (घायल)
डूबने, गम्भीर चोट, या महामारियों जैस डायरिया, हैज़ा, पीलिया या वाइरल संक्रमण के कारण मनुष्य और पशुओं की मृत्यु बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की सामान्य समस्या है। बाढ़ के समय कुएँ तथा पेयजल के अन्य स्रोत भी जलमग्न हो जाते हैं जिसके कारण शुद्ध पेयजल की बहुत कमी हो जाती है। कभी-कभी लोगों को मजबूरी में बाढ़ का संक्रमित जल ही पीना पड़ता है जिससे गम्भीर रोग पैदा हो जाते हैं।

इमारतों की क्षति (संरचनात्मक क्षति)


बाढ़ के दौरान मिट्टी के घर और कमजोर नींव पर खड़े भवन ढह जाते हैं और जान माल के लिये खतरा और क्षति पैदा हो जाती है। सड़कों, रेल पटरियों, बांधों, स्मारकों, फसलों और पशुओं की भी भारी हानि होती है। बाढ़ों के कारण बड़े-बड़े पेड़ भी उखड़ जाते हैं जिसके कारण भूस्खलन और मृदा-अपरदन हो सकता है।

माल, सामान, सामग्री की क्षति


घरेलू सामान के साथ खाद्य पदार्थ, बिजली के उपकरण, फर्नीचर, कपड़े सब बाढ़ के पानी में डूब जाते हैं। भूमि पर भंडारित सामान जैसे अनाज, मशीनी उपकरण, गाड़ियाँ, पशुधन, साल्ट पैन (salt pan) और मछली के शिकार की नौकाएँ पानी में डूब कर बेकार हो जाती हैं।

उपयोगी वस्तुओं की क्षति


उपयोगी वस्तुएँ अर्थात जल-आपूर्ति, वाहितमल व्यवस्था (sewerage), संचार-व्यवस्था, बिजली व्यवस्था और परिवहन व्यवस्था, रेलमार्ग सभी बाढ़ के कारण खतरे में पड़ जाते हैं।

फसलों की क्षति


मानव और पशुधन की क्षति के साथ बाढ़ के कारण खेतों में खड़ी लहलहाती तैयार फसल की भी भारी हानि होती है। बाढ़ का पानी भंडारित अनाज के साथ काट कर रखी फसल को भी नष्ट कर देता है। बाढ़ के पानी से मिट्टी की गुणवत्ता पर भी प्रभाव पड़ता है। खेत के ऊपर की उपजाऊ मिट्टी पानी के साथ बह जाने से खेत बंजर हो जाते हैं। समुद्री तटों पर स्थित खेतों में समुद्र का खारा पानी भर जाने से वे कृषि के लिये अनुपयोगी हो जाते हैं।

बाढ़ों का नियंत्रण


बाढ़ों को कई प्रकार से नियंत्रित किया जा सकता है। वृक्षारोपण करके (वृक्ष लगा कर) बहकर आने वाले जल की मात्रा कम करने से बाढ़ के पानी का स्तर भी घट जायेगा। जंगल बारिश के पानी को भूमि के अंदर जाने का रास्ता देते हैं। इससे भूमिगत जल स्तर पुनः स्थापित होता है और पानी का व्यर्थ बहना कम हो जाता है। बांधों के निर्माण से पानी का भंडारण होता है और बाढ़ के जल में कमी आती है। बांध पानी को एकत्रित कर सकते हैं, इस कारण पानी नीचे नदियों तक नहीं पहुँच पाता। यदि बांध में एकत्रित पानी सीधा नदियों तक पहुँचे तो बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। बांधों से पानी को नियंत्रित रूप में छोड़ा जाता है। नदी/नहर/नालों से गाद निकालकर उन्हें गहरा करने से और तटों को चौड़ा करने से उनमें अधिक पानी भरने की धारण क्षमता बढ़ जाती है।

(iii) प्रबन्धन


यदि बाढ़ नियंत्रण की उचित योजना और उचित प्रबन्धन तरीकों का नियोजित ढंग से पालन करें तो बाढ़ से होने वाली क्षति और जान-माल की हानि को काफी हद तक रोका जा सकता है और कम किया जा सकता है।

बाढ़ प्रवृत क्षेत्रों की पहचान


बाढ़ों के उचित प्रबन्धन के लिये सुचारु और युक्तिसंगत योजना बनाने के लिये बाढ़-प्रवृत क्षेत्रों को पहचान कर उन्हें चिन्हित करना आवश्यक है। इन क्षेत्रों में बाढ़ का बार-बार आना और आकार को जानना भी जरूरी है।

बाढ़ का पूर्वानुमान


प्रायः लोगों को काफी पहले खतरे की सूचना देकर सुरक्षित स्थानों पर भेज दिया जाता है। जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा की तीव्रता का माप जल वैज्ञानिकों को इतना अनुमान लगाने के लिये पर्याप्त होता है कि नदी में पानी बढ़ने से कितना क्षेत्र जलमग्न हो जायेगा। जल वैज्ञानिक बाढ़ आने से पहले ही उसका अनुमान लगा लेते हैं। उसी सम्भावना से प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को सामान और पशुधन के साथ सुरक्षित स्थलों पर चले जाने के लिये चेतावनी दी जाती है। भारत में वर्षा मापक स्टेशनों का जाल (नेटवर्क) काफी बड़ा है, बाढ़ की चेतावनी केन्द्रीय जल कमीशन (Central Water Commission CWC), सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण डिवीजन (Irrigation and Flood Control Division) और जल संसाधन विभाग (Water Resource Department) द्वारा जारी की जाती है।

भूमि उपयोग की योजना


विकास की सभी गतिविधियों के लिये भूमि उपयोग की योजना का बहुत महत्त्व है। बाढ़ संभावित क्षेत्रों में विकास के किसी मुख्य कार्य की अनुमति नहीं देनी चाहिये। यदि निर्माण कार्य बिल्कुल ही अनिवार्य हो तो ऐसा होना चाहिये कि बाढ़ की शक्ति वह इमारत झेल सके। इमारतों को किसी ऊँचे स्थान पर ही बनाना चाहिये।

वृक्षारोपण को प्रोत्साहन मिलना चाहिये। जलग्रहण वाले स्थानों पर वृक्षोन्मूलन एकदम नहीं होना चाहिये। पेड़ कटने से पानी बहुत अधिक तीव्रता से बहता है और पानी के साथ मिट्टी बहने से मृदा-अपरदन बहुत होता है। मृदा-अपरदन नदियों में गाद जमने का मुख्य कारण है और नदियों में गाद जमने से बाढ़ों की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है। ऐसे निर्माण कार्य की जिसके कारण जल निकास बाधित हो, कभी अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। अचानक आये पानी के निकास की नालियों के ऊपर अतिक्रमण नहीं होना चाहिये। इन सबसे बाढ़ का खतरा घट जाता है।

कुछ पूर्वापाय (सावधानियाँ) जिनसे बाढ़ का खतरा कम होता है इस प्रकार हैं-

- घरों को बाढ़ संभावित क्षेत्र से दूर बनाएँ।
- मौसम की सूचना बाढ़ आने के पूर्वानुमान की सूचनाओं के प्रति जागरूक और सचेत रहिये।
- स्थान खाली करने के निर्देश और चेतावनी के बाद तुरन्त ही उपलब्ध शरणास्थलों में चले जायें।
- जब आप शरणास्थल में जा रहे हों तो अपने कीमती सामान को किसी ऊँचें स्थान पर रख दें जिससे वह बहे या डूबे नहीं।
- आपातकाल के लिये कुछ अतिरिक्त भोजन जैसे दाल, चावल, शक्कर आदि घर में रखिये।
- किसी खुले या ढीले बिजली के तार को न छुएँ।
- अफवाह फैलाने और उनको सुनने से बचें।
- वृद्ध और बच्चों का विशेष ध्यान रखें और उनके खाने का प्रबन्ध रखें।
- बाढ़ के समाप्त होने के बाद स्वयं की और परिवार की चिकित्सकीय जाँच अवश्य करायें, चोट और किसी भी प्रकार की बीमारी में डॉक्टरी सलाह लें।
- घर और आस-पास जमा हुए बाढ़ के कचरे के ढेरों को साफ करें।
- किसी भी नुकसान या क्षति की सूचना राजस्व विभाग को अवश्य दें।

(ब) सूखा (Draught)


किसी ऋतु या किसी काल में आशानुरूप वर्षा न होने के कारण सूखा पड़ता है। कम वर्षा होने से मनुष्य, पौधों, पशुओं और कृषि की जल की आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पाती है। कम वर्षा होने से नदी, झील, जलाशयों और कुएँ सूखने लगते हैं क्योंकि इनमें से पानी अधिक निकाला जाता है और भूजल की आपूर्ति कम हो पाती है। पानी की कमी के कारण फसल भी अच्छी नहीं होती। ये सब बातें आने वाले सूखे के मुख्य सूचक हैं।

(i) कारण


सूखा वर्षा की कमी के कारण होता है। मौसम विभाग के अनुसार यदि वार्षिक वर्षा का औसत 10% से अधिक कम हो जाता है, तब यह सूखे का सूचक है। सूखे की भीषणता का अनुमान वर्ष भर की वर्षा के औसत में होने वाली कमी से लगाया जाता है। पिछले कुछ समय में सूखों की संख्या में वृद्धि हुई है और इसका मुख्य कारण वनोन्मूलन और पर्यावरणीय अवक्रमण है।

(ii) प्रभाव


कृषि पर भी सूखे का भीषण प्रभाव पड़ता है। सबसे पहले सूखे से वर्षा पर निर्भर फसलें प्रभावित होती हैं। चरवाहे, भूमिहीन मजदूर, खेती पर निर्भर किसान, औरतें, बच्चे और फार्म के पशु सूखे के दुष्प्रभावों से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।

- फसल न होने पर या भोजन की कमी से भुखमरी और मृत्यु की ओर अग्रसर हो जाते हैं।
- डेयरी की गतिविधियाँ (दुग्ध उत्पादन), इमारती लकड़ी और मछली पालन प्रभावित हो जाता है।
- बेरोजगारी में वृद्धि हो जाती है।
- भूमिगत जल (भूजल) का स्तर कम हो जाता है।
- गहरे पानी भरे स्थानों से पानी को बाहर पम्प करके फेंकने से ऊर्जा की हानि होती हैं।
- जल-बिजली पावर प्लांट में ऊर्जा का उत्पाद कम हो जाता है।
- जैव विविधता की क्षति, लैंडस्केप (भूदृश्यों) की गुणवत्ता में कमी आ जाती है।
- स्वास्थ्य समस्याओं, गरीबी में वृद्धि, जीवनस्तर में कमी और सामाजिक अशांति के कारण लोग दूसरे स्थानों पर जाने लगते हैं।

(iii) प्रबन्धन


यदि कुछ उपायों को ध्यान में रखा जाय तो सूखे के प्रतिकूल प्रभावों को कम किया जा सकता है। वर्षा का नियमित रिकॉर्ड रखना, जलाशयों और पानी के भंडारों, नदियों, स्रोतों में पानी की उपलब्धता मांग के अनुपात में होनी चाहिये। जब मांग की तुलना में पानी कम हो तो पानी की खपत भी कम करनी चाहिये। पानी की खपत कम करने के लिये अनेक जल संरक्षण उपाय अपनाने चाहिये। इसमें जल की खपत कम करना, कुशलता और सावधानी से पानी का प्रयोग करना, पानी के बेकार होने को रोकना और प्रयोग किये पानी को छोटे कामों के लिये दोबारा प्रयोग में लाना शामिल है। सिंचाई और बुवाई की कुशल विधियों को कृषि में अपनाना चाहिये। ऐसी फसलों को लगाएँ जिनमें पानी की खपत कम हो। वर्षा के जल को एकत्रित करने से पानी की उपलब्धता बढ़ती है। वर्षा जल एकत्रित करने (Rain water harvesting) का अर्थ है कि सब तरफ से बहकर आने वाला पानी एक ही स्थान पर इकट्ठा हो और जल भंडारण हो या पानी को भूमि में इतने नीचे तक जाने का रास्ता मिले कि भूमिगत जलस्तर बढ़ता रहे।

(स) भूकम्प (Earthquake)


पृथ्वी की सतह की अपकृत (Deformed) चट्टानों में जमा हुई ऊर्जा का अचानक बाहर निकलना भूकम्प कहलाता है। इस अचानक निष्कासन से धरती कांप जाती है। भूकम्प वर्ष में किसी भी समय बिना किसी चेतावनी के अचानक आ सकते हैं और इसके कारण जान और माल की भारी क्षति होती है। 1993 में लातूर में और 2002 में भुज में आए भूकम्पों की त्रासदी को हम अच्छी तरह जानते हैं।

चित्र 12.1 बाढ़ भूकम्प की तीव्रता का अनुमान उसमें से मुक्त हुई ऊर्जा की मात्रा से सम्बन्धित है। जब धरती के भीतर छिपी ताकत चट्टानों के बीच से बाहर निकलती है। इसको एक यंत्र के द्वारा नापा जाता है जिसे ‘‘भूकम्पलेखी’’ (Seismograph) कहा जाता है। भूकम्प की तीव्रता रिक्टर स्केल (आविष्कारक सी.एफ. रिक्टर के नाम पर) पर मापी जाती है। नीचे दी गई निम्नलिखित मान क्षति की डिग्री को दर्शाते हैं।

आपदा और उनका प्रबंधन


तालिका चित्र 12.3 भूकम्पलेखी सिस्मोग्राफ

(i) कारण


पृथ्वी द्वारा ऊर्जा के निष्कासन का प्राकृतिक ढंग भूकम्प है। भूकम्प पृथ्वी के उन हिस्सों में ही आता है जहाँ भू-विज्ञान से सम्बन्धित त्रुटियां होती हैं। ऐसे क्षेत्र की पहचान पहले ही कर ली जाती है।

(ii) प्रभाव
संरचनात्मक क्षति (इमारती क्षति)


भूकम्प द्वारा भवनों, सड़कों, बांधों और स्मारकों की बहुत क्षति होती है। ऊँची-ऊँची इमारतें या ऐसी इमारतें जो कमजोर नींव पर खड़ी हैं विशेष रूप से भूकम्प से क्षतिग्रस्त होती हैं। घरेलू उपकरण विशेषरूप से बिजली के उपकरण और फर्नीचर की भी क्षति होती है। मानव और पशुधन जीवन की हानि होती है या इमारतों के गिरने से गम्भीर चोट लगती है इसके बाद जैसे हैजा, डायरिया, और संक्रमण से फैलने वाली महामारियाँ मानव जीवन को प्रभावित करती हैं। जल आपूर्ति, वाहित मल, संचार लाइनें, पॉवर लाइनें, परिवहन नेटवर्क और रेलमार्ग आदि आवश्यक सुविधायें अस्त-व्यस्त हो जाती हैं।

प्रबन्धन


भूकम्प के दुष्परिणामों से बचने के लिये निम्न तरीके अपनाने से इसके प्रभावों को कुछ कम किया जा सकता हैः

भवनों का डिजाइन (रूप-आकार)


इमारतें इस प्रकार की डिजाइन करनी चाहिये कि वे भूकम्प के झटकों को झेल सकें, खासतौर से भूकम्प-संभावित क्षेत्रों में तो विशेष ध्यान रखना चाहिये। मिट्टी की भौतिक विशेषताओं का विश्लेषण किया जाना चाहिये, विश्लेषण करते समय भूकम्प को सहने की उसकी शक्ति का परीक्षण आवश्यक है। ब्यूरो ऑफ इन्डियन स्टैन्डर्ड (Bureau of Indian Standard) ने भवन निर्माण के लिये कुछ रूप-रेखा और निर्देश तैयार किये हैं जो भूकम्प को सहने के लिये अपनाने अत्यंत आवश्यक हैं। प्रायः सम्बन्धित नगर निगम अधिकारी ही भवनों या इमारतों के डिजाइन को नियमों और सुरक्षा नियमों को पूरा करने पर ही स्वीकृति देते हैं। बिल्डर्स, आर्किटैक्ट, ठेकेदार, डिजाइनर, घर के मालिक और सरकारी अफसरों को इस सम्बन्ध में प्रशिक्षित करना आवश्यक है।

भूकम्प के घटित होने पर ली जाने वाली कुछ सावधानियाँ निम्नलिखित हैं-

- खुले स्थान में निकल जाएँ।
- शान्ति बना कर रखें, घबरा कर इधर उधर न भागें, लिफ्ट का प्रयोग कभी भी न करें, खिड़कियों से दूर रहें, फर्नीचर और शीशों से भी दूर रहें।
- मजबूत बीम (beam) के नीचे खड़े रहें क्योंकि वह गिरेगी नहीं या खाने की मेज या पलंग के नीचे घुस जायें।
- यदि आप किसी इमारत के नीचे खड़े हैं या अपने स्थान से हट नहीं सकते हो अपने सिर को, शरीर को अपने हाथों से, तकियों या कम्बल से ढक लें जिससे गिरने वाली किसी वस्तु से चोट न लग जाये।
- यदि बहुमंजिला इमारत में हैं तो उसी मंजिल पर रहिए लिफ्ट या सीढ़ियों की ओर न दौड़ें न लिफ्ट से नीचे उतरें।
- यदि रास्ते में हैं और यात्रा कर रहे हों तो अपनी गाड़ी को इमारतों, दीवारों, पुल, पेड़, बिजली के खम्बों और तारों से दूर ही खड़ी करें।
- जो कुछ क्षति हुई हो उसको देखें और बाधा को साफ करें।
- चोट आदि को देखें, प्राथमिक उपचार दें और लें, दूसरों की मदद करें।
- यदि आपका घर भूकम्प के कारण बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है तो तुरन्त घर से बाहर आ जायें। साथ में आपातकालीन आवश्यक चीजें जैसे खाना, पीना, प्राथमिक उपचार का बॉक्स, दवाइयाँ, फ्लैश लाइट या टॉर्च, मोमबत्ती, माचिस, कपड़े आदि यदि सम्भव हो तो साथ ले लें।
- इमारतें विशेषकर पुरानी और ऊँची इमारतों, बिजली के खम्भों, तारों और दीवारों से दूर ही रहें।

(द) चक्रवात (Cyclone)


चक्रवात एक प्रकार से हिंसक तूफान होते हैं, ये एक प्रकार की तेज और बहुत उच्च वेग वाली हवाएँ हैं जो निम्न वायुमंडलीय दबाव के शान्त केन्द्र के चारों ओर तीव्रता से घूमती हैं। यह शान्त केन्द्र प्रायः आगे की ओर बढ़ता है, कभी-कभी इनका वेग 50 कि-मी-/घंटा होता है। चक्रवात अचानक ही घटित होते हैं जबकि इनको बनने में लम्बा समय लग जाता है। चक्रवात के बाद प्रायः तेज वर्षा होती है जिसके कारण बाढ़ भी आ जाती है। उपग्रहों के द्वारा इनके द्वारा प्रभावित होने वाले संभावित क्षेत्रों का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है और वहाँ के निवासियों को चेतावनी दी जा सकती है। चेतावनी और स्थान परिवर्तन प्रस्तावित मार्ग के अनुसार ही होना चाहिये।

(i) प्रभाव


हल्के भार वाले मिट्टी, लकड़ी के निर्माण, पुरानी इमारतें जिनका ढाँचा और दीवारें कमजोर हो चुकी हैं और जिनकी नींव की मजबूत पकड़ नहीं है, चक्रवात के समय भारी खतरे में पड़ जाती है। समुद्री तट (mudslide) पर बसे निचले क्षेत्र इनसे सीधे ही खतरे में पड़ जाते हैं। समीपवर्ती बसे क्षेत्र बाढ़, मडस्लाइड या भूस्खलन आदि होने से जल्दी प्रभावित होते हैं। टेलीफोन और बिजली के तार और खम्भे, दीवारें, पेड़, मछली पकड़ने की नावें, साइनबोर्ड आदि के लिये चक्रवात आने से खतरा बढ़ जाता है। हल्का इमारती ढांचा जैसे फूस की झोपड़ी, टिन की छत वाले घर चक्रवात की क्षति को बहुत अधिक झेलते हैं। भारी वर्षा के कारण लोग और उनकी सम्पत्ति बाढ़ के पानी में बह सकती है या चक्रवात की तूफानी हवा में उड़ सकती हैं। तटीय क्षेत्र में आये चक्रवात के कारण समुद्र की लहरें भूमि पर पहुँच जाती हैं और बाढ़ आ जाती है इससे प्रभावित क्षेत्रों में मिट्टी और पानी में खारापन आ जाता है। इसके कारण पानी की आपूर्ति और कृषि फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

(ii) प्रबन्धन


चक्रवात-संभावित क्षेत्र को पहचानना बहुत आवश्यक है। चक्रवात संभावित क्षेत्र में किसी प्रकार के विकास कार्य की अनुमति नहीं देनी चाहिए। ऐसी इमारतें बनानी चाहिये जो हवा और बाढ़ों की तीव्रता को झेल सकें। किसी ढाँचे की पकड़ रखने वाले तत्व मजबूती से जमीन में गड़े होने चाहिये जिससे वे अपने ऊपर टिके ढाँचे को मजबूती से सम्भाल सकें। तट के किनारे लगे वन चक्रवात के प्रभाव को काफी हद तक कम करने में समर्थ होते हैं। अतः आवश्यक है कि समुद्री तट के किनारे-किनारे ग्रीन बैल्ट (तटों के साथ-साथ पेड़ उगाना) को विकसित किया जाय।

(ई) सुनामी (Tsunami)


सुनामी प्रायः सैस्मिक (भूकम्पीय) समुद्री लहरें या ज्वार भाटा (Tidal) लहरें या आकस्मिक समुद्री लहरें आदि नामों से भी जाना जाता है। ये प्रायः अन्तः समुद्री भूकम्प के कारण आती है जो समुद्र सतह के नीचे 50 कि.मी. (30 मील) से कम दूरी पर उठता है जिसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 6-5 से अधिक होती है। पानी के नीचे या तट पर भूस्खलन या ज्वालामुखी फटने से भी सुनामी आ सकती है। ऐसी लहरों के लिये प्रायः ज्वार-भाटा (टाइडल) लहरें शब्दों का प्रयोग किया जाता है। परन्तु यह भ्रामक और अनुचित है क्योंकि इन सुनामी लहरों का ज्वार-भाटे (टाइड) से कोई सम्बन्ध नहीं है।

सुनामी की लहरें सीधी, क्रमिक, अनिश्चित रूप से घटती-बढ़ती लहरें समुद्र की सतह पर बहुत दूरी पर पैदा होती हैं और ये चौड़े होते हुए (फैलते हुए) घेरे के रूप में होती हैं कुछ ऐसे ही जैसे किसी उथले तालाब में कंकड़ फेंकने से पैदा होती है। इसमें सावधानी पूर्ण किया गया निरीक्षण बहुत व्यावहारिक महत्त्व रखता है। भूकम्प वैज्ञानिक संभावित खतरे की चेतावनी तटीय क्षेत्रों को तुरन्त ही दे सकते हैं। जैसे ही कोई भूकम्प आता है तभी चेतावनी देने से सुनामी आने के कई घंटों पहले लोग सतर्क हो जाते हैं।

चित्र 12.4 सुनामी लहरें जैसे-जैसे महाद्वीपीय तटों की ओर बढ़ती हैं उनका तल उथला होता जाता है जिस पर लहरों के घर्षण से लहरों की तीव्रता और वेग कम होता जाता है। वेग कम होने के कारण लहरों की ऊँचाई 50 मीटर या उससे भी अधिक हो जाती है। तीन से पाँच मुख्य अनिश्चित दोलन लहरों के कारण सबसे अधिक नुकसान होता है। फिर भी सुनामी का प्रभाव अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग प्रकार का ही होता है।

(i) प्रभाव


सुनामी के दुष्प्रभाव भी चक्रवात या बाढ़ों की भांति ही हैं। समुद्री पानी की बड़ी लहरें तीव्र वेग के साथ अंदर घुस आती है और आस-पास का भूक्षेत्र जलमग्न होने से बस्तियां, फसलें और दूसरी अन्य सम्पत्ति बुरी तरह से नष्ट हो जाती हैं। दिसम्बर 2004 में आये सुनामी ने अनेक देशों में, विशेषकर इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका, भारत में भीषण विनाश और तांडव मचाया था। आन्ध्र प्रदेश और तमिलनाडु के तटीय जिलों का बहुत बड़ा क्षेत्र इसकी चपेट में आ गया था। 8 एशियाई देशों में, भारत सहित, दो लाख से अधिक लोगों की जानें चली गई थीं।

(ii) प्रबन्धन


सुनामी के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने के लिये चक्रवात या बाढ़ के लिये ली जाने वाली सावधानियाँ ही अपनानी चाहिए।

पाठगत प्रश्न 12.1


1. परिभाषा बताइये- (i) बाढ (ii) भूकम्प (iii) चक्रवात (iv) सुनामी
2. बाढ़ों को रोकने के कोई दो उपाय बताइये।
3. सुनामी का कोई एक दुष्प्रभाव बताइये।
4. चक्रवात के बाद प्रायः बाढ़ क्यों आती है?
5. समुद्र में कौन से परिवर्तन आते हैं जिनके कारण सुनामी का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है?

(ब) मानव-निर्मित या मानव विकास के कारण उत्पन्न आपदा


प्रकृति में अनेक आपदा मानव गतिविधियों के कारण पैदा हो जाती हैं। उनका वर्णन नीचे किया जा रहा है-

(i) आग (Fire)


किसी वस्तु के जलने की घटना को आग कहते हैं। ये प्रायः विध्वंसकारी होती हैं जिसमें जीवन और सम्पत्ति (जान और माल) दोनों की ही हानि होती है। प्रायः देखा गया है कि आग में मरने वालों की संख्या कभी-कभी चक्रवात, भूकम्प, बाढ़ और दूसरी अन्य प्राकृतिक आपदाओं में मरने वालों की कुल संख्या से भी अधिक होती है। आग जंगल और वन्य जीवों के लिये बहुत बड़ा खतरा है क्योंकि आग बहुत तेजी से फैलती है और कम समय में भयावह रूप से क्षति करती है। शहरों में घर, झुग्गियों, इमारतों, विशेषकर गोदाम और फैक्ट्री आग की चपेट में आते हैं। आग एक बड़े क्षेत्र में फैल जाती है। बहुत से लोग जलने तथा दम घुटने के कारण मर जाते हैं। इसके कारण हवा, पानी और मिट्टी भी संदूषित हो जाते हैं जिससे फसलों, वनस्पतियों, जानवरों और भूमि के उपजाऊपन पर दुष्प्रभाव पड़ता है।

(i) कारण


ग्रीष्म ऋतु में आग के कारण जान और माल का बहुत अधिक नुकसान होता है। आग लगने के अनेकों कारण हो सकते हैं उनमें से कुछ का वर्णन नीचे दिया जा रहा हैः

- जलती हुई दियासलाई या सिगरेट को लापरवाही से फेंकने से।
- घरों में आग के स्रोत आग का कारण हो सकते हैं, जैसे कैरोसीन स्टोव या गैस स्टोव पर खाना पकाते हुए कपड़ों में आग लग जाना।
- खाना पकाते हुए दुर्घटनाएं घर में आग लगने का मुख्य कारण होते हैं। अनदेखी या उपेक्षित तरीके से खाना पकाने के कारण आग लग सकती है।
- बिजली के तारों में शार्ट सर्किट होने से भी आग लग सकती है। बिजली के उपकरणों का अधिक गर्म होना, निम्न कोटि के बिजली के उपकरणों का प्रयोग करना ये सभी आग लगने के कारण हैं।
- घरों के आस-पास और सड़कों के दोनों ओर जमा कूड़े-कचरे के ढेर आग का कारण बन जाते हैं, जब लोग लापरवाही से माचिस की तीली या सिगरेट के जलते टुकड़े फेंक देते हैं।
- ज्वलनशील पदार्थों का भंडारण और स्थानान्तरण बिना उचित सावधानियों के करना भी आग लगने का कारण होता है।
- जंगल की आग भी मनुष्य की लापरवाही और अवहेलना के कारण फैलती है।

(ii) प्रभाव
- हताहत


आग से जलने या गंभीर चोट के कारण मानव और पशुओं के जान और माल का भारी नुकसान होता है। गाँवों में भंडारित पूरी की पूरी फसल ही कभी कभी आग की चपेट में आकर राख हो जाती है और मालिक का अत्यधिक नुकसान होता है।

(iii) प्रबन्धन


- आग से बचने के लिये सुरक्षा नियमों का पूरी तरह पालन करें और आग लगने पर बताये गये निकास के मार्ग को अवश्य याद रखें।
- ज्वलनशील पदार्थों और रसायन को पूर्ण सावधानी से व्यवहार में लाएं और भंडारण का सावधानीपूर्वक प्रबन्ध करें।
- घर में अग्निशमन यंत्र अवश्य रखें और उसका उपयोग करना भी मालूम होना चाहिए।
- घर से बाहर जाते समय सावधानीपूर्वक बिजली और गैस के सभी उपकरणों को बन्द कर दें।
- एक ही सॉकेट में बहुत से प्लग न लगायें।
- माचिस की डिबियाँ बच्चों की पहुँच से दूर रखें।
- पहुँच या प्रवेश मार्ग को भारी अल्मारी या फर्नीचर से बाधित न करें।
- आग लगने पर तुरन्त ही फायर ब्रिगेड को फोन करें।
- धुएँ से भरी जगह में पैरों और पेट के बल फर्श पर रेंगकर चलें क्योंकि धुआँ फर्श पर कम होता है।
- अपने घर से बाहर निकलने के दो रास्ते अवश्य बना कर रखें।
- कार्यस्थल और घर से कचरे और व्यर्थ सामान को नियमित रूप से हटाते रहें।
- खतरनाक पदार्थ जैसे पेन्ट, सॉल्वैंट, आसंजक (Adhesive), रसायन या गैस सिलिंडर का भंडारण अलग स्थान पर करें जो आग से बहुत दूर हो।
- हमारे देश में दीपावली पर होने वाली आतिशबाजी आग का प्रमुख कारण है। उनका उपयोग सावधानी से और बड़ों के निरीक्षण में ही करें।

(ब) सड़क, रेल और हवाई परिवहन दुर्घटनाएँ (Road, Rail and Air Accidents)
(i) सड़क दुर्घटनाएँ


सड़क परिवहन का विकास अधिक और सरल सम्पर्क एवं सेवा के लिये किया गया है। गाड़ियों की संख्या में वृद्धि, सड़क के नियमों की अवहेलना, तीव्र गति से वाहन चलाना, नशे में वाहन चलाना और गाड़ियों तथा सड़कों का खराब रखरखाव सड़क दुर्घटनाओं के मुख्य कारणों में से कुछ हैं। सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिये निम्नलिखित सावधानियाँ अपनानी चाहियेः

- सड़क पार करते समय दोनों ओर देखें।
- पैदल सड़क पार करते समय जेबरा क्रॉसिग से ही पार करें।
- दुपहिया वाहनों पर सवारी करते समय हैलमेट अवश्य पहनें।
- कार में दी गई सीट बैल्ट अवश्य लगाएं।
- उचित ड्राइविंग लाइसैंस मिलने पर ही गाड़ी चलाएं।
- सड़क यातायात चिन्हों को अच्छी तरह समझकर उन्हें पहचानें और पालन करें।
- लेन में बहुत अधिक इधर-उधर गाड़ी न घुसाएं। दूसरे ड्राइवरों (चालकों) के लिये आपकी चाल का अनुमान करना कठिन हो सकता है।
- उद्दण्डता और दुःसाहस से गाड़ी न चलाएं। अनावश्यक रूप से गाड़ियों को ओवरटेक न करें।
- सड़क पर सुरक्षात्मक वाहन चलाने का सबसे अच्छा और उचित तरीका ‘‘लेन ड्राइविंग’’ है।
- गाड़ी चलाते समय अचानक गति को तीव्र करना या अचानक ब्रेक न लगाया करें।
- पुराने घिसे टायर और खराब हेडलाइट को बदल दें।
- टायरों की हवा, रेडियेटर का पानी, ब्रेक ऑयल और ईंधन (पेट्रोल, डीजल) का नियमित निरीक्षण करते और करवाते रहें।
- सामने से आती गाड़ी को देखकर अपनी गाड़ी की तेज लाइट को कम कर दें।
- निर्माता के बनाए रखरखाव कार्यक्रम का पूरी तरह पालन करें।
- वाहन चलाते हुए अधीरता, क्रोध और नशे से बचें, सड़क आक्रोश (रोड रेज) खतरनाक होता है।
- यदि कोई अनहोनी घटना घटित हो जाती है तो शांत रहें।
- आग लगने की स्थिति में जल्दी से जल्दी वाहन से बाहर निकल जायें तथा सामान की चिन्ता न करें।

(ii) रेल दुर्घटना


रेल दुर्घटनाएं प्रायः मनुष्य की गलती से, तोड़ फोड़ से, या पहाड़ी रेल ट्रैक पर भू-स्खलन से या आग लगने के कारण होती हैं। रेल दुर्घटना में जान और सम्पत्ति की बहुत हानि होती है। भारतीय रेलवे को प्रतिवर्ष इन दुर्घटनाओं के कारण भारी नुकसान उठाना पड़ता है। कुछ सुरक्षात्मक तरीकों को सावधानी से अपनाने से दुर्घटनाओं और उसमें होने वाली हानियों को कम किया जा सकता हैः

- रेलवे क्रॉसिग पर सिग्नल और झूलते हुए बैरियर पर ध्यान दें। जबरदस्ती नीचे से निकल कर पार करने की कोशिश न करें।
- बिना चौकीदार वाली क्रॉसिंग पर गाड़ी से उतर कर ट्रैक पर सावधानी से दोनों ओर निरीक्षण करें, तब ही पार करें।
- ट्रेन को पुल पर या किसी सुरंग में न रोकें क्योंकि वहाँ से निकल कर भागना असम्भव है।
- ट्रेन में ज्वलनशील पदार्थ लेकर यात्रा न करें।
- चलती गाड़ी से बाहर झुककर न झाकें।
- ट्रेन में धूम्रपान न करें।
-बिना आवश्यकता के आपातकालीन चेन को खींचकर गाड़ी न रोकें।

(iii) हवाई दुर्घटनाएँ


हवाई दुर्घटनाएँ यांत्रिकी खराबी के कारण, आग से, खराब लैंडिंग और टेक ऑफ (असुरक्षित उतारना और उठना), मौसम की दशा, अपहरण (हाइजैक) और बम गिरने की स्थिति में होती है। हवाई दुर्घटनाओं को कम करने के कुछ सुरक्षात्मक प्रबन्ध निम्नलिखित हैं:

- उड़ान स्टाफ द्वारा दिये गये सुरक्षा नियमों के प्रदर्शन को ध्यानपूर्वक देखें और समझें।
- हवाई जहाज में रखे सुरक्षा कार्ड को ध्यानपूर्वक पढ़ें।
- आपातकालीन निकास कहाँ पर है इसे जाने और इसको कैसे खोला जाता है इस बात की जानकारी प्राप्त करें।
- सीट पर बैठे हुए हमेशा अपनी सीट बैल्ट बांधे रहें।
- शान्त रहें और उड़ान कर्मीदल द्वारा दिये गये निर्देशों का पालन करें।
- यदि आपातकालीन द्वार आप स्वयं खोल रहे हैं तो बाहर झांक कर देखें यदि बाहर आग दिखाई दे तो दरवाजा न खोलें क्योंकि खोलने से आग अन्दर आ सकती है। बाहर जाने का अन्य रास्ता लें।
- याद रखिए धुआँ ऊपर की ओर उठता है, यदि केबिन में धुआँ है तो नीचे ही रहने की कोशिश करें।
- यदि आपके पास कोई कपड़ा है तो उसे अपनी नाक और मुँह पर बांध लें।

(द) औद्योगिक दुर्घटनाएँ (Industrial Accidents)


औद्योगिक दुर्घटनाएँ विस्फोट, आग और विषाक्त तथा खतरनाक रसायनों के रिसाव के कारण होती हैं। औद्योगिक दुर्घटनाओं के कारण जीवन और सम्पत्ति का भारी नुकसान होता है। रसायनों का रिसाव मानव भूलों के कारण, यांत्रिक गड़बड़ी के कारण या भू-सम्बन्धी खतरे जैसे भूकम्प, बाढ़ आदि के कारण भी हो सकता है। किसी उद्योग में आग मनुष्य की गलती से या बिजली की गड़बड़ी (शार्ट सर्किट) के कारण लग सकती हैं।

(i) प्रभाव


औद्योगिक परिसर और उससे लगी हुई बस्ती औद्योगिक दुर्घटना के समय सबसे अधिक खतरे का सामना करती है। पास के क्षेत्र में रहने वाले कर्मचारी और निवासी और उनके जानवर तथा फसलें इन दुर्घटनाओं से बुरी तरह प्रभावित होते हैं। एक बहुत बड़े क्षेत्र का पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है। खतरनाक रसायन वातावरण या जल संकायों में घुल जाने से बहुत दूर तक खतरा बन जाते हैं। यहाँ तक कि औद्योगिक क्षेत्र के चारों ओर का पूरा पारितंत्र ही क्षतिग्रस्त हो जाता है। वर्ष 1984 में भोपाल त्रासदी में यही हुआ। जब 45 टन मिथाइल आइसो-साइनेट (MIC मिक) गैस रिस कर पूरे वातावरण में फैल गई थी और 2500 से अधिक लोग मारे गये थे।

विस्फोट, आग या विनाशक रसायनों के रिसाव से निर्माण (इमारतें) भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। यदि रसायन गैस के रूप में होता है तो उसका भौगोलिक विस्तार बहुत तेजी से और दूर तक होता है। विस्फोट या आग द्वारा हुई यांत्रिक क्षति से अनेकों लोग मारे जाते हैं या विषैले रसायन की विषाक्तता से मारे जाते हैं। हवा में घुला जहरीला रसायन श्वास द्वारा, आँखों के रास्ते, त्वचा के संपर्क से और खाने के साथ शरीर में पहुँचता है। प्रदूषक पदार्थ शरीर में अपना प्रभाव तुरन्त भी दिखा सकता है और दीर्घकालीन प्रभाव भी पड़ता है। तुरन्त होने वाले प्रभाव में मृत्यु के साथ अन्य लक्षण भी होते हैं जैसे चक्कर आना, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन आदि। दीर्घकालीन प्रभाव में कैंसर, दिल का दौरा, मस्तिष्क की क्षति, प्रतिरक्षा प्रणाली का असफल होना, अंग विकृति, प्रजनन विकृति अथवा बच्चों में जन्मजात दोष (जन्म से) उत्पन्न हो जाते हैं।

(ii) प्रबन्धन
खतरनाक रसायनों की तालिका बनाना


यह महत्त्वपूर्ण है कि पूर्ण आवश्यक सूचनाओं के साथ संकटदायी (खतरनाक) रसायनों की सूची बनी होनी चाहिये जिसमें रसायन की विशेषता, भंडारण का स्थान तथा उससे संभावित खतरे, सबकुछ लिखा होना चाहिए। यह सूचना प्रत्येक कर्मचारी और पड़ोस में रहने वाले सभी निवासियों को होनी चाहिए। सबको उनसे उत्पन्न संभावित खतरों के विषय में ज्ञान होना चाहिये। सम्भावित जोखिम भरे क्षेत्र को विशेष रूप से चिन्हित कर देना चाहिये। खतरों से सावधान करने के साथ आपातकाल में बचाव के मार्ग से अवगत कराना भी आवश्यक होता है।

उद्योग का स्थान


फैक्ट्री कभी भी रिहाइशी इलाके में नहीं लगानी चाहिये। औद्योगिक क्षेत्र और रिहाइशी इलाके में दूरी बनाने के लिये हरित पट्टी (Green belt) विकसित कर देनी चाहिए।

समुदाय की तैयारी (सामुदायकि सावधानी)


समुदाय के सभी व्यक्तियों को खतरे की ओर उससे बचने की योजना (तरीकों) की जानकारी होनी ही चाहिए। समुदाय के कुछ सदस्यों को संभावित खतरे पर नियमित रूप से ध्यान रखना चाहिए और सुरक्षा प्रशिक्षण में भाग लेते रहना चाहिये।

अन्य तरीके


विषाक्त रसायनों की सीमित मात्रा ही भंडार में रखें। अग्निशमन क्षमताओं को और समृद्ध बनाएँ, चेतावनी माध्यमों में सुधार लाएँ। प्रदूषण को फैलने से रोकने के लिये अधिक साधन अपनाए जाएँ। आपातकालीन राहत को विकसित किया जाए। कर्मचारी और आस-पास रहने वाले लोगों के विकास के लिये उचित प्रबन्ध करें। आस-पास रहने वालों के लिये और कर्मचारियों के लिये बीमा योजना होनी चाहिए और उसे कानून द्वारा मान्यता मिले।

12.3 जैविक (जीव-विज्ञान सम्बन्धी) आपदा
12.3.1 महामारियाँ (Epidemics)


महामारी उस बीमारी या अन्य स्वास्थ्य सम्बन्धी घटना को कहा जाता है जो प्रायः बहुत बड़ी संख्या को एक साथ प्रभावित करे। जब बहुत से लोगों को एक ही बीमारी अचानक होती है तो उसे महामारी अनुमानित किया जाता है। महामारियों को रोकने के लिये तुरन्त ही बहुत बड़े पैमाने पर कार्य करने की आवश्यकता है। किसी भी आपदा के बाद संक्रमण से फैलने वाले रोगों के एक दम फैलने की सम्भावना बहुत अधिक हो जाती है।

(i) कारण


स्वच्छता का उचित प्रबन्ध न होना ही बीमारी फैलने का प्रमुख कारण है। स्वच्छता न होने से जल दूषित हो जाता है जिसमें बीमारियों को फैलाने वाले कीटाणु पैदा होते हैं और पनपते हैं। बदलता मौसम भी बीमारी का कारण है। बदलता मौसम कीटों के प्रजनन के लिये अनुकूल समय होता है। जनसंख्या (उदाहरण पर्यटक और प्रवासी) गरीबी और भीड़ का प्रतिरोधी न होना, बीमारियों का वाहक है।

(ii) प्रभाव


महामारी सामूहिक बीमारी या मौत का कारण होती है। समाज में व्यवधान और आर्थिक क्षति जैसे द्वितीयक प्रभाव भी इनके कारण हो सकते हैं। अतिसंवेदनशीलता (Vulnerability) उन लोगों में अधिक होती है जो कुपोषण का शिकार है, लोग अस्वच्छ वातावरण में बगैर सफाई वाली दशाओं में रहते हैं, जल आपूर्ति घटिया गुणवत्ता की होती है, स्वास्थ्य सेवाओं की पर्याप्त सुविधा नहीं होती है।

(iii) प्रबन्धन उपाय


बचाव के लोक स्वास्थ्य उपायों को और अधिक मजबूत करने की आवश्यकता है। व्यक्तिगत सुरक्षा के लिये टीकाकरण एक प्रभावशाली तरीका है। स्वच्छता में सुधार, कीटाणु उत्पन्न होने के स्थानों पर दवाओं का छिड़काव, और घर व नगर के कूडे़ के उचित निपटान का प्रबन्ध होने से महामारी और रोगों से बचा जा सकता है। महामारियों से लड़ने के लिये उस क्षेत्र के लिये एक आकस्मिक योजना तैयार करके रखनी चाहिये। प्रारम्भ से ही समय रहते सतर्क करने से और नियमित परीक्षण करने से प्रारम्भिक अवस्था में ही रोग को नियंत्रित किया जा सकता है इससे विकराल रूप में महामारी को फैलने से पहले ही रोका जा सकता है।

कुछ बीमारियां जो महामारी का रूप ले सकती हैं उनका वर्णन नीचे किया जा रहा हैः

(अ) डेंग्यू (Dengue)


डेंगू को ब्रेक बोन फीवर (Break bone fever, हड्डी तोड़ बुखार) या डांडीफीवर (Dandy Fever) के नाम से भी जाना जाता है। यह बहुत तेज, संक्रमित, मच्छरों द्वारा उत्पन्न, रक्तस्राव होने वाला बुखार है। बुखार के साथ ही इसमें जोड़ों में असहनीय दर्द और अकड़न होती है इसीलिये इसका नाम ब्रेक बोन फीवर (हड्डी तोड़ बुखार) भी है। डेंग्यू मच्छरों द्वारा स्थानांतरित एक वाइरस के कारण होता है। यह मच्छर एडिस एजिप्टी (Aedes aegypti) या एशियन टाइगर मच्छर के नाम से जाना जाता है।

यदि मच्छर किसी ऐसे व्यक्ति को प्रथम तीन दिनों में काट ले जो इस रोग से ग्रसित है तो वह उस रोग के कीटाणुओं का वाहक बन जाता है। मच्छर में 8-10 दिन तक इस वाइरस को प्रभावशाली बनने में लगते हैं। इसके बाद वह मच्छर जीवन भर इस वाइरस को वहन करता है। त्वचा पर काटने से वाइरस मानव शरीर में प्रवेश कर जाता है। इसके लिये कोई विशेष उपचार नहीं है। इसलिये बचाव और सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। मच्छरों पर नियंत्रण करने से डेंगू को फैलाने से रोका जा सकता है।

(ब) एचआईवी (HIV) और एड्स (AIDS)


साल 2001 में रहस्यात्मक रूप से प्रतिरक्षा तंत्र की विकृति की आरम्भिक रिपोर्ट के 20 साल हो गये थे जिसे एड्स (या एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशियंसी सिंड्रोम) के नाम से जाना जाता है। यह रोग प्रतिरक्षा तंत्र की विकृति का रोग है और जानलेवा है। इस महामारी के कारण विश्व भर में 21 मिलियन लोग मारे जा चुके हैं। अनुमान है कि 2001 तक 36 मिलियन लोग एचआईवी के संक्रमण को लेकर जी रहे हैं। यह बीमारी एक वाइरस से फैलती है वाइरस का नाम एचआईवी (ह्यूमन इम्यून वाइरस) है। यह वाइरस प्रायः समागम से अथवा रक्त संचारण से फैलता है।

(स) मैड काऊ रोग (Bovine spongiform encephalopathy, बोवाइन स्पांजिफार्म एनसिफालोपैथी)


बोवाइन स्पांजीफार्म एनसिफालेपैथी (बीएसई या मैड काऊ रोग) पशुओं (मवेशियों) में एक संक्रमित एजेंट के कारण होता है जिसका इन्क्यूबेशन काल बहुत लंबा प्रायः दो से पाँच साल के बीच का होता है। लक्षणों के प्रकट होने के बाद एक साल में मृत्यु हो जाती है। इसका कोई उपचार या बचाव के तरीके अभी तक ज्ञात नहीं हैं।

सर्वप्रथम यह रोग 1986 में यूनाइटेड किंगडम में देखा गया। वहाँ यह मैड काऊ रोग एक महामारी की तरह फैला था, विशेषकर दक्षिणी इंग्लैंड में। मैड काऊ रोग के फैलने के बाद मनुष्य में फैलने वाले मस्तिष्क ज्वर (Creutzfeldt-Jacob-disease) में सम्बन्ध चिन्ता का विषय बन गया। वहाँ पर संक्रमित बीफ (गौमांस) खाना इसका कारण हो सकता है।

पाठगत प्रश्न 12.2


1. आदमी की लापरवाही के कारण होने वाली तीन आपदाओं का नाम बताइये।
2. सड़क दुर्घटनाओं से कैसे बचा जा सकता है?
3. रिहाइशी इलाकों से दूर रसायनों का भंडारण करना क्यों आवश्यक है।
4. आग की आपदा के कोई दो कारण बताइये।
5. एचआईवी (HIV)/एड्स (AIDS) जैसी बीमारियों को आपदा क्यों कहा जाता है?

12.4 सामुदायिक स्तर पर आपदा प्रबन्धन


जब कभी कोई भी आपदा आती है तब अनेक सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं और समाज (समुदाय) आपदा प्रबन्धन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

उनकी तैयारी, प्रतिक्रिया, पुनःप्राप्ति और बचाव का विस्तृत वर्णन इस प्रकार हैः

आपदा प्रबन्धन के चार मुख्य घटक होते हैं:

तैयारी (Preparedness): समाज और संस्थाएं आपदा के दुष्प्रभावों का सामना करने के लिये तैयार हैं या नहीं। इसके लिये मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:

- सामुदायिक जागरूकता और शिक्षा।
- आपदा प्रबन्धन योजना की तैयारी समुदाय, स्कूल और व्यक्तिगत रूप से।
- नकली (मॉकड्रिल) अभ्यास और प्रशिक्षण।
- सामग्री और मानव कुशलता दोनों की उपलब्धता की सूची तैयार होना।
- उचित चेतावनी व्यवस्था।
- पारस्परिक सहायता व्यवस्था।
- संवेदनशील समूह की पहचान।

प्रतिक्रिया (Response): पूर्वानुमान से, आपदा के समय और आपदा के तुरन्त बाद आपदा के दुष्प्रभावों को कम करने के लिये किये गये उपाय/कार्यवाही। इसके लिये मुख्य तत्व निम्नलिखित हैं:

- आपातकालीन ऑपरेशन केन्द्र को क्रियान्वित करना (कंट्रोल रूम)।
- खोजी और सुरक्षा टीमों का विस्तार।
- अद्यतन (अपडेट) चेतावनी का प्रसारण।
- सामुदायिक रसोईघरों की स्थापना जिसमें स्थानीय लोगों को लें।
- अस्थायी निवास और शौचालयों की व्यवस्था।
- मेडिकल कैम्प की व्यवस्था।
- संसाधनों का संग्रह करना।

पुनःप्राप्ति या पुनर्स्थापन (Recovery): इसमें भौतिक ढांचें के पुनः निर्माण के साथ आर्थिक और भावात्मक पुनरुद्धार भी किया जाता है। इसके मुख्य तत्व निम्नलिखित हैं:

- स्वास्थ्य और सुरक्षा उपायों के लिये सामुदायिक जागरूकता।
- जिन्होंने अपने सगे सम्बन्धियों को खोया है उनके लिये सांत्वना और परामर्श केन्द्र।
- यातायात, संचार और बिजली जैसी व्यवस्थाओं का पुनर्प्रबन्धन/पुर्नव्यवस्था।
- शरणस्थल की उपलब्धता।
- मलबे (rubble) से निर्माण सम्बंधी उपयोगी पदार्थों को एकत्र करना।
- आर्थिक सहायता प्रदान करना।
- रोजगार के अवसर तलाशना।
- नई इमारतों का निर्माण करना।

रोकथाम/बचाव (Prevention): आपदा की भीषणता को रोकने या कम करने के उपाय करने चाहिए।

- भूमि के उपयोग की योजना।
- खतरे वाले स्थान में बसने पर रोक।
- आपदा-प्रतिरोधक बिल्डिंग/इमारतें।
- आपदा के आने से पूर्व ही खतरे को कम करने के तरीके ढूंढना।
- सामुदायिक जागरूकता और शिक्षा।

आपदा से पहले और बाद के कुछ घंटे जीवन बचाने और क्षति को कम करने के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। अक्सर आपदा स्थल पर बाहरी सहायता को पहुँचने में वक्त लग जाता है। किसी भी आपदा के समय सर्वप्रथम पड़ौस से ही सहायता पहुँचती है। आपदा की स्थिति में सर्वप्रथम सहायता पहुँचाने वाले लोग प्रायः मेडिकल और अन्य घटनाओं को समझ पाने और संभालने के उचित ढंग से अनभिज्ञ होते हैं। उन्हें स्थिति का सामना करने का प्रशिक्षण और कौशल नहीं होता। अतः सामुदायिक स्तर पर प्रबन्धन का उद्देश्य स्थानीय लोगों को आपातकालीन स्थिति का प्रभावपूर्ण ढंग से सामना करने का प्रशिक्षण देना होना चाहिये। प्रशिक्षित समुदाय के सदस्य इस प्रकार की परिस्थितियों के समय में जीवन रक्षक सिद्ध होते हैं। अतः इस प्रकार प्रशिक्षित करने से समुदाय प्रबन्धन लोगों की भागीदारी को प्रोत्साहित करता है।

12.5 आपदा प्रबन्धन पर सरकारी पहल


भारत सरकार ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में आपदा प्रबन्धन के लिये राष्ट्रीय कमेटी (National committee on Disaster Management, NCDM) की स्थापना की है। इस राष्ट्रीय कमेटी के प्रस्ताव राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन कार्यक्रम का आधार होंगे और प्राकृतिक आपदा प्रबन्धन और प्रतिक्रिया तंत्र को इससे बल मिलेगा। यूनाइटेड नेशंस डेवेलपमेंट प्रोग्राम (यू एन डी पी) भी सरकार की आपदा प्रबन्धन की क्षमता को मजबूत करने में सहायक होती है।

कार्यक्रम में निम्नलिखित घटक सम्मिलित होंगे-

- प्रान्त और जिले के आपदा प्रबन्धन योजना का विकास।
- आपदा (रिस्क) खतरा प्रबन्धन और प्रतिक्रिया योजना का विकास गाँव/वार्ड, ग्राम पंचायत, ब्लॉक/शहरी स्थानीय स्तर पर।
- सभी स्तरों पर आपदा प्रबन्धन टीम बनाई जाये और इनमें सभी कमेटी और टीमों में महिलाओं का प्रतिनिधत्व भी उचित अनुपात में होना आवश्यक है। (गाँव/वार्ड, ग्राम पंचायत, ब्लॉक/शहरी स्थानीय ढांचा, जिला और राज्य)
- सभी स्तरों पर आपदा प्रबन्धन टीम की क्षमता बढ़ाई जाय। प्राथमिक उपचार, शरणस्थलों का प्रबन्धन, पानी और सफाई, बचाव और निकास/रिक्तीकरण में महिलाओं को विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिये।
- आपदा प्रवृत स्थानों में इमारतों में चक्रवात और भूकम्प प्रतिरोधक क्षमता वाले फीचर लगाने चाहिये। पुनर्स्थापन के प्रशिक्षण और निर्माण की ट्रेनिंग के लिये प्रदर्शन टीम हों।
-आपदा प्रबन्धन योजना और स्थानीय स्वयं सरकारी विकास योजनाओं का परस्पर तालमेल होना चाहिये।

पाठगत प्रश्न 12.3


1. आपदा प्रबंधन के चार घटकों के नाम लिखिए।
2. समुदाय स्तर पर आपदा प्रबंधन क्यों महत्त्वपूर्ण है?
3. NCDM को परिभाषित कीजिए।

आपने क्या सीखा


- भारतीय उपमहाद्वीप प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। भारत में बाढ़, सूखा (अकाल), चक्रवात और भूकम्प जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहती है।
- आपदाओं के प्रति अतिसंवेदनशीलता के कारण आग, महामारी इत्यादि जैसी मानवजनित घटनाएँ होती हैं।
- हाल ही में भारत ने चार बड़ी आपदाओं का सामना किया है। यह आपदा लातूर का भूकम्प (1993 में महाराष्ट्र में), उड़ीसा का चक्रवात (1999), गुजरात का भूकम्प (2001) तथा दिसम्बर 2004 में तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में सुनामी।

- अत्यधिक वर्षा, तेज हवाओं, चक्रवात, सुनामी, बर्फ का पिघलना या बांध टूटने के कारण नदियों या जलाशयों के जलस्तर में वृद्धि होने से एक बड़ा क्षेत्र अस्थायी रूप से जलमग्न हो जाता है। जिसे बाढ़ कहा जाता है। बाढ़ के कारण जान, माल की अत्यधिक हानि होती है। वनोन्मूलन के कारण मृदा अपरदन होता है जिससे नदियों और जलाशयों में गाद एकत्रित हो जाती है। इससे बाढ़ की स्थिति और खराब हो जाती है।

- अकाल एक ऐसी परिघटना है जिसके अन्तर्गत किसी मौसम में अपेक्षा से कम वर्षा होती है यह वर्षा पौधों, जन्तुओं, मनुष्यों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये अपर्याप्त होती है।

- अकाल का सर्वाधिक प्रभाव कृषि पर होता है। इससे दुग्ध उत्पादन से सम्बन्धित गतिविधियाँ, मात्स्यकी प्रभावित होती है तथा बेरोजगारी में वृद्धि होती है। जैव विविधता की क्षति, भूमिगत जल का अवक्षय तथा खाद्यान्नों की कमी हो जाती है। जिसके कारण भुखमरी, स्वास्थ्य, अवनति, गरीबी में वृद्धि, जीवनशैली में बदलाव और सामाजिक अशांति जैसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं तथा लोग एक स्थान से दूसरे स्थान के लिये प्रस्थान को बाध्य हो जाते हैं।

- भूकम्प एक ऐसी परिघटना है जिसके अन्तर्गत पृथ्वी की विकृत चट्टानों में संचित ऊर्जा अचानक विमोचित हो जाती है जिसके कारण पृथ्वी में कंपन होने लगता है।

- भूकम्प का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव इमारतों पर पड़ता है। ऐसी इमारतें जो बहुत ऊँची होती है या कमजोर नींव पर खड़ी होती हैं। भूकम्प से भरभरा कर गिर जाती हैं जिससे जीवन और सम्पत्ति दोनों के लिये ही खतरा पैदा हो जाता है।

- जब कुछ जलता है और अविध्वंसकारी होता है और जीवन और सम्पत्ति का नाश होता है तो उन्हें आग/अग्निकांड कहते हैं। ऐसा देखा गया है कि आग से मरने वालों की संख्या चक्रवात, भूकम्प, बाढ़ और अन्य आपदाओं में मरने वालो की कुल संख्या से भी अधिक होती है।

- सड़क, रेल और हवाई दुर्घटनाओं से भी जान और माल का भारी नुकसान होता है।

- नियमों के पालन से ऐसी अनेक दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है। बहुत से रोग असावधानी और अनदेखा करने के कारण ही महामारी बन कर फैलते हैं।

- यदि लोगों के लिये समूह जागरूकता अभियान चलाया जाय तो बहुत सी दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है।

- सामुदायिक स्तर पर आपदा प्रबन्धन में भागीदारी बहुत उपयोगी होती है क्योंकि सबसे पहले सहायता के लिये पहुँचने वाले वे ही होते हैं।

- भारत सरकार इस प्रकार के कार्यक्रमों को शुरू करने में पहल कर रही है जिसमें जन सामान्य को विभिन्न स्तर पर आपदा प्रबन्धन योजना में प्रभावशाली ढंग से भागीदार बनने के लिये सम्मिलित किया जायेगा।

पाठांत प्रश्न


1. बाढ़ क्यों आती हैं?
2. बाढ़ के प्रभावों को किस प्रकार कम कर सकते हैं?
3. हमारे देश में सूखा इतना प्रचलित क्यों है?
4. सूखे के दुष्प्रभावों पर कैसे विजय पाई जा सकती है?
5. सुनामी क्या है?
6. हमारे देश में महामारियाँ क्यों पायी जाती हैं?
7. आग के प्रभाव को कम करने के पाँच तरीके बताइये।
8. औद्योगिक दुर्घटनाओं से होने वाली क्षति का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
9. आपदा प्रबन्धन में समाज को जोड़ने से क्या लाभ हैं?
10. आपदा प्रबन्धन में सरकार का क्या योगदान है?

पाठगत प्रश्नों के उत्तर


12.1
1. (i) नदियों और जल संकायों में पानी का स्तर बढ़ जाने के कारण पानी का चारों ओर फैल कर एक बड़े क्षेत्र को जलमग्न कर देना बाढ़ कहलाता है।

(ii) पृथ्वी की सतह की अविकृत चट्टानों में जमा हुई ऊर्जा का अचानक बाहर निकलना भूकम्प है जिसके कारण धरती हिल जाती है।

(iii) चक्रवात एक हिंसक तूफान है ये एक प्रकार की तेज हवाएँ हैं जो निम्न वायुमंडलीय दबाव के शान्त केन्द्र के चारों ओर तीव्रता से घूमती हैं।

(iv) ये आकस्मिक समुद्री लहरें हैं जो अन्तः समुद्री भूकम्प के कारण पैदा होती हैं।

2. वन्यारोपण से, बांध बनाने से, गाद निकालकर गहराई बढ़ाने से, और तटों की चौड़ाई बढ़ा कर नदियों, नालों, तालाबों, आदि की जल संग्रह क्षमता को बढ़ाया जा सकता है। (कोई दो)

3. समुद्र का पानी भूमि पर आ जाता है और बस्तियां, फसलें और अन्य सम्पत्ति को बहा ले जाता है।

4. भारी वर्षा के कारण बाढ़ आती है और बाढ़ के बाद चक्रवात।

5. सीधी, क्रमिक, अनिश्चित रूप से घटती-बढ़ती लहरों का समुद्र की सतह पर बहुत दूरी तक पैदा होकर एक घेरे का रूप लेने का पता चलता है।

12.2
1. आग, दुर्घटनाएं (सड़क, रेल, हवाई), औद्योगिक दुर्घटनाएं।
2. सुरक्षात्मक ढंग से गाड़ी चलाएँ, यातायात नियमों का पालन करते हुए अपनी लेन में ही गाड़ी चलाएं (अन्य कोई)।
3. औद्योगिक दुर्घटना से बचने के लिये।
4 जली हुई दियासलाई या सिगरेट फेंकना, पकाने के उपकरण, बिजली के तारों में शार्ट सर्किट, ज्लवनशील पदार्थों का भंडारण या इधर उधर ले जाना, विस्फोटक रसायनों का भंडारण या स्थानांतरण (कोई दो)।
5. क्योंकि यह बहुत बड़ी जनसंख्या को प्रभावित करता है।

12.3
1. तैयारी, प्रतिक्रिया, पुनर्स्थापन, रोकथाम।
2. क्योंकि समाज और आस पड़ोस आपदा स्थल पर सबसे पहले पहुँचता है।
3. आपदा प्रबंधन की राष्ट्रीय कमेटी (NCDM) भारत सरकार द्वारा स्थापित की गई है जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री के पास है।

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