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आस्था के केन्द्र पर पर्यावरण की सुध


हमारे ज्यादातर प्राचीन तीर्थ पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं। धार्मिक आस्था का सम्मान हर हाल में होना चाहिए, किंतु इन स्थलों पर पर्यावरण की जो महिमा है, उसका भी ख्याल रखने की जरूरत है ? आस्था और पर्यावरण के तालमेल से ही इन स्थलों की आध्यात्मिकता बनी हुई है। इन स्थलों पर अंधाधुंध निर्माण और लोगों की बढ़ती संख्या इनका आध्यात्मिक अनुभव को तो ठेस लगा ही रहे हैं, भगदड़ से अनायास उपजने वाली त्रासदियों का सबब भी बन रहे हैं। केदारनाथ त्रासदी इसी बेतरतीब निर्माण और तीर्थयात्रियों की बड़ी संख्या का परिणाम थी। इसलिए एनजीटी ने वैष्णो देवी मंदिर पर श्रद्धालुओं की संख्या तय करके उचित पहल की है।

प्रदूषण और पर्यावरण बदलाव की समस्या जैसे-जैसे धार्मिक आस्था के केन्द्र एवं पर्यटन स्थलों पर गहरा रही है, वैसे-वैसे सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण के फैसले पर्यावरण सुधार और जन-सुरक्षा की दृष्टि से प्रासंगिक लग रहे हैं। कई निर्णयों की प्रशंसा हुई है, तो कई निंदा के दायरे में भी आए हैं। अधिकरण ने जम्मू स्थित वैष्णो देवी मंदिर में दर्शन के लिये प्रतिदिन 50000 श्रद्धालुओं की संख्या निर्धारित कर दी है। यदि इससे ज्यादा संख्या में दर्शार्थी आते हैं तो उन्हें कटरा और अर्द्धकुमारी में रोक दिया जाएगा। वैष्णो देवी मंदिर भवन की क्षमता वैसे भी 50000 से अधिक की नहीं है। मंदिर मार्ग में ठहरने के स्थलों पर कूड़े के निस्तारण और मल-विसर्जन की क्षमताएँ भी इतने ही लोगों के लायक हैं। इस लिहाज से पर्यावरण को स्थिर बनाए रखने में यह निर्देश बेहद महत्त्वपूर्ण है। किन्तु अधिकरण ने अमरनाथ मंदिर की गुफा पर ध्वनि प्रदूषण पर अंकुश लगाने की दृष्टि से नारियल फोड़ने और शंख बजाने पर जो अंकुश लगाया गया है, उसकी तीखी आलोचना हो रही है। बहरहाल दर्शानार्थियों की संख्या सीमित कर देने से भगदड़ के कारण जो हादसे होते हैं, वे भी नियंत्रित होंगे।

यह निर्देश उस याचिका पर सुनवाई के क्रम में आया है, जिसमें याचिकार्ता ने जम्मू स्थित वैष्णो देवी मंदिर परिसर में घोड़ों, गधों, टट्टुओं और खच्चरों के आवागमन पर रोक लगाने का निर्देश देने की मांग की थी। दरअसल इन पारम्परिक पशुओं पर लादकर रोजमर्रा के उपयोग वाला सामान तो जाता ही है, कई बुजुर्ग, दिव्यांग एवं बच्चे भी इन पर सवार होकर माता के दर्शन के लिये जाते हैं। इनके अंधाधुंध इस्तेमाल से मंदिर परिसर और मार्ग में प्रदूषण बढ़ रहा है। यह प्रदूषण जन-स्वास्थ्य के लिये भी हानिकारक बताया गया है। लेकिन इनकी आवाजाही से हजारों परिवारों की रोजी-रोटी चल रही है। इस नाते इनकी आवाजाही भी जरूरी है। बावजूद अधिकरण ने धीरे-धीरे इनको हटाने का निर्देश दिया है।

वैष्णो देवी मंदिर त्रिकुट पहाड़ियों पर समुद्र तल से 5200 फुट की ऊँचाई पर एक गुफा में स्थित है। फिर भी तीर्थयात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। नवरात्रियों के समय यह संख्या औसत से ज्यादा बढ़ जाती है। दिसम्बर में बड़े दिन की छुट्टियों के अवसर पर भी श्रद्धालुओं की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है। ऐसे अवसरों पर मंदिर का प्रबंधन देख रहे श्राईन बोर्ड पर भी दबाब बढ़ जाता है। नतीजतन व्यवस्थाएँ लड़खड़ाने का संकट गहरा जाता है। इसीलिए अधिकरण ने श्राईन बोर्ड के प्रबंधन द्वारा उपलब्ध कराए गए तीर्थयात्रियों के आंकड़े और बुनियादी सुविधाओं का आकलन करने के बाद ही यह फैसला लिया है।

किन्तु अधिकरण ने पशुओं के उपयोग को धीरे-धीरे खत्म करने का श्राईन बोर्ड को जो निर्देश दिया है वह इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की आजीविका की दृष्टि से अप्रासंगिक लगता है। यह बात अपनी जगह सही है कि जिस स्थल पर भी मनुष्य और पशु होंगे वहाँ पर्यावरण दूषित होगा ही। लेकिन एक सीमा में इनकी उपस्थिति रहे तो इनके द्वारा उत्सर्जित होने वाला प्रदूषण प्राकृतिक रूप से जैविक क्रिया का हिस्सा बन पंच-तत्वों में विलय हो जाता है। हालाँकि इसी साल 24 नवम्बर से मंदिर जाने के लिये नया रास्ता खुल जाएगा। 13 कि.मी. से ज्यादा लम्बे इस रास्ते पर या तो बैटरी से चलने वाली टैक्सियाँ चलेंगी या लोगों को पैदल जाने की अनुमति होगी। इस रास्ते पर खच्चरों और गधों का इस्तेमाल प्रतिबंधित होगा।

एनजीटी ने जिन मानकों को आधार बनाकर यह फैसला दिया है, वह बेहद अहम है। यदि कचरे के निस्तारण और मल-मूत्र के विर्सजन को पैमाना मानकर चलें तो देश के ज्यादातर महानगर और शहर इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं। देश की राजधानी होते हुए भी दिल्ली इस समस्या से दो-चार हो रही है। आबादी और शहर के भूगोल के अनुपात में ज्यादातर शहरों में ये दोनों ही व्यवस्थाएँ छोटी पड़ रही है। परेशानी यह भी है कि शहरों की ओर लोगों को आकर्षित करने के उपाय तो बहुत हो रहे हैं, लेकिन उस अनुपात में न तो शहरों का व्यवस्थित ढंग से विस्तार हुआ है और न ही सुविधाएँ उपलब्ध हो पाई है। हमारे जितने भी प्राचीन धर्म-स्थल हैं, वहाँ के धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये उपाय तो बहुत किए गए लेकिन जमीनी स्तर पर आने वाले श्रद्धालुओं को सुविधाएँ नहीं जुटाई गईं। यहाँ तक कि न तो मार्गों का चौड़ीकरण हुआ और न ही ठहरने के प्रबंध के साथ बिजली-पानी की सुविधाएँ समुचित हो पाईं। यही वजह है कि हर साल तीर्थ स्थलों पर जानलेवा दुर्घटनाएँ हो रही हैं।

भारत में पिछले डेढ़ दशक के दौरान मंदिरों और अन्य धार्मिक आयोजनों में प्रचार-प्रसार के कारण उम्मीद से कई गुना ज्यादा भीड़ उमड़ रही है। जिसके चलते दर्शनलाभ की जल्दबाजी व कुप्रबंधन से उपजने वाले भगदड़ों का सिलसिला जारी है। धर्म स्थल हमें इस बात के लिये प्रेरित करते हैं कि हम कम से कम शालीनता और आत्मानुशासन का परिचय दें, किन्तु इस बात की परवाह आयोजकों और प्रशासनिक अधिकारियों को नहीं होती। इसलिए उनकी जो सजगता घटना के पूर्व सामने आनी चाहिए, वह अक्सर देखने में नहीं आती? आजादी के बाद से ही राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र उस अनियंत्रित स्थिति को काबू करने की कोशिश में लगा रहता है, जिसे वह समय पर नियंत्रित करने की कोशिश करता तो हालात कमोबेश बेकाबू ही नहीं हुए होते? इसलिए अब ऐसी जरूरत महसूस होने लगी है कि भीड़-भाड़ वाली जगहों पर व्यवस्था की जिम्मेदारी जिन आयोजकों, सम्बन्धित विभागों और अधिकारियों पर होती है, उन्हें भी ऐसी घटनाओं के लिये ज़िम्मेवार ठहराया जाए।

हमारे धार्मिक-आध्यात्मिक आयोजन विराट रूप लेते जा रहे हैं। कुंभ मेलों में तो विशेष पर्वों के अवसर पर एक साथ तीन-तीन करोड़ तक लोग एक निश्चित समय के बीच स्नान करते हैं। किन्तु इस अनुपात में यातायात और सुरक्षा के इंतजाम देखने में नहीं आते। जबकि शासन-प्रशासन के पास पिछले पर्वों के आंकड़े होते हैं। बावजूद लापरवाही बरतना हैरान करने वाली बात है। दरअसल, कुंभ या अन्य मेलों में जितनी भीड़ पहुँचती है और उसके प्रबंधन के लिये जिस प्रबंध कौशल की जरूरत होती है, उसकी दूसरे देशों के लोग कल्पना भी नहीं कर सकते? इसलिए हमारे यहाँ लगने वाले मेलों के प्रबंधन की सीख हम विदेशी साहित्य और प्रशिक्षण से नहीं ले सकते? क्योंकि दुनिया के किसी अन्य देश में किसी एक दिन और विशेष मुहूर्त के समय लाखों-करोड़ों की भीड़ जुटने की उम्मीद ही नहीं की जा सकती है? यह भीड़ रेलों और बसों से ही यात्रा करती है। बावजूद हमारे नौकरशाह भीड़ प्रबंधन का प्रशिक्षण लेने खासतौर से यूरोपीय देशों में जाते हैं। प्रबंधन के ऐसे प्रशिक्षण विदेशी सैर-सपाटे के बहाने हैं, इनका वास्तविकता से कोई सन्बन्ध नहीं होता। ऐसे प्रबंधनों के पाठ हमें खुद अपने देशज ज्ञान और अनुभव से लिखने एवं सीखने होंगे।

इस दृष्टि से इस वैष्णो देवी मंदिर पर यात्रियों की संख्या की जो सीमा तय की गई है, वह एनजीटी की सजगता दर्शाती है। एनजीटी अब उन स्थलों पर पर्यावरण एवं जनसुरक्षा की सुध ले रही है, जिन्हें आस्था का केंद्र मानकर अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। हमारे ज्यादातर प्राचीन तीर्थ पर्यावरण की दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं। धार्मिक आस्था का सम्मान हर हाल में होना चाहिए, किंतु इन स्थलों पर पर्यावरण की जो महिमा है, उसका भी ख्याल रखने की जरूरत है? आस्था और पर्यावरण के तालमेल से ही इन स्थलों की आध्यात्मिकता बनी हुई है। इन स्थलों पर अंधाधुंध निर्माण और लोगों की बढ़ती संख्या इनका आध्यात्मिक अनुभव को तो ठेस लगा ही रहे हैं, भगदड़ से अनायास उपजने वाली त्रासदियों का सबब भी बन रहे हैं। केदारनाथ त्रासदी इसी बेतरतीब निर्माण और तीर्थयात्रियों की बड़ी संख्या का परिणाम थी। इसलिए एनजीटी ने वैष्णो देवी मंदिर पर श्रद्धालुओं की संख्या तय करके उचित पहल की है।

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