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अनियंत्रित बरसात से बदल रहा है भूगोल


. न मालूम प्रकृति का रूप बरसात को लेकर इतना विकराल क्यों होता जा रहा है। मानसून समाप्त होने पर भी यहाँ बरसात खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। उत्तराखण्ड हिमालय में तो इस वर्ष बरसात ने सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। हर तीसरे दिन मौसम विभाग अलर्ट जारी कर देता है कि फिर से 84 घण्टे राज्य में बड़ी तीव्र वर्षा होने वाली है। इस पर कई बार स्कूलों की छुट्टी हो चुकी है तो कई विकास के काम पीछड़ते जा रहे हैं और तो और कई प्रकार की फसलें अगाती-पछाती जा रही है। जिससे आने वाले समय में खाद्य सुरक्षा की स्थिति गड़बड़ा सकती है ऐसा एक अनुमान लगाया जा रहा है। वर्षा की तीव्रता इतनी है कि अगर खेतों में कोई बीज यदि किसान ने बो भी दिया तो वह अगले दिन बहकर दूसरे स्थान पर दिखाई दे रहा है। नदी, नाले छोटे-छोटे गदेरे इन दिनों उफान पर है। पर्यावरण के जानकार इस परिस्थिति को प्राकृतिक संसाधनों पर हो रहे अनियोजित विकास का प्रभाव मान रहे हैं।

ज्ञात हो कि उत्तराखण्ड राज्य में 20 वर्ष पहले संयमित व नियमित वर्षा का होना, बर्फ गिरना आदि का लोग इन्तजार करते थे सो अब लोगों को ऐसा डरावना लग रहा है। कहाँ-कहाँ बर्फ गिरेगी इसके कई निश्चित स्थान थे। जो अब पीछे खिसक रहे हैं। राज्य का ऐसा कोई गाँव नहीं था जहाँ प्राकृतिक जलस्रोत का होना लाजमी था। अब ऐसे गाँवों की संख्या सर्वाधिक हो गयी कि गाँव के गाँव पेयजल की त्रासदी से जूझ रहे हैं। सिंचाई के साधन तो पहले से ही कम थे तो मौजूदा हालात इसके विपरित हो चुकी है। हाँ गाँव में स्वजल योजना की पेयजल लाइन अवश्य पहुँच चुकी है पर इसमें पानी की बूँद तक नहीं तर रही है। पाईप-लाइनों का जंजाल सभी गाँव में बिछ चुका है। प्राकृतिक जलस्रोत सूखते जा रहे हैं। बरसात अनियमित और बेतरतीब हो रही है। मगर प्राकृतिक जलस्रोत रिचार्ज नहीं हो पा रहे हैं।

इसे विडम्बना कहें कि प्रकृति का मोहभंग। वैज्ञानिक प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की बात जरूर करते हैं, वैज्ञानिक यह भी बताते हैं कि इसके दोहन से फलां फायदा होने वाला है। किन्तु वैज्ञानिक ऐसा बताने में गुरेज कर रहे हैं कि फलां विकासीय योजना में प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण पहले कर लो फिर उसके दोहन करके विकास के काम आरम्भ करो। प्राकृतिक संसाधनों पर बन रही योजनाएँ बिना वैज्ञानिक सलाह के सर्वाधिक बनाई जा रही है। सिर्फ निर्माण व क्रियान्वयन करने वाली कम्पनी या संस्था खुद ही वैज्ञानिक रिपोर्ट बनवा रही है। विशेषज्ञों को ऐसे वक्त दूर ही रखा जा रहा है। यहाँ इसके पुख्ते उदाहरण दिये जा सकते हैं।

बता दें कि उत्तराखण्ड राज्य में ही टिहरी जैसा विशालकाय बाँध निर्मित है। वर्ष 2003 में जब टिहरी बाँध की अन्तिम सुरंग बंद कर दी गयी तो तब से उत्तरकाशी और देहरादून में बरसात का ग्राफ ही बदल गया। कभी भी यहाँ बरसात हो जाती है। उत्तरकाशी मुख्यालय तो 2003 के बाद चेरापूँजी ही बन गया है। बरसात भी ऐसी कि जो आफत बनकर आती है। लोग डरे व सहमें रहते हैं। इधर यदि इस वर्ष की बरसात पर नजर दौड़ाएँ तो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आ रहे हैं। देहरादून स्थित मौसम विभाग के एक जून से दो अगस्त तक के आंकड़े बताते हैं कि जुलाई से अब तक सर्वाधिक बारिश देहरादून में हुई है, जिसे 1008 मिली मापा गया है। जो कि सामान्य से नौ फीसदी अधिक है। इसी तरह राज्य के अल्मोड़ा में 590.8, बागेश्वर में 688.3, चमोली में 677.4, चम्पावत में 706, देहरादून में 1008.3, पौड़ी में 395.1, टिहरी में 440.6, हरिद्वार में 440.6, नैनीताल में 834.9, पिथौरागढ में 837.5, रुद्रप्रयाग में 841.3, उधमसिंहनगर में 435.6, उत्तरकाशी में 629.6 मिमी वर्षा हो चुकी है। यही नहीं इस बरसात के दौरान दो दर्जन से भी अधिक बार राज्य के अलग-अलग जगहों पर बादल फट चुके हैं। बादल फटने के कारण 100 से अधिक परिवार बेघरबार हुए हैं।

rain_dehradun एक तरफ राज्य में प्राकृतिक उथल-पुथल हो रही है तो दूसरी तरफ राज्य के विकास के लिये नई-नई विकासीय योजनाओं का श्रीगणेश किया जा रहा है। ऐसी विकासीय योजनाओं में 98 फीसदी योजनाएँ प्राकृतिक संसाधनों के दोहन करके बनाई जा रही है। उदाहरण स्वरूप गंगा नदी पर एक तरफ जलविद्युत परियोजनाएँ निर्माणाधीन है तो वहीं ऋषीकेश-कर्णप्रयाग बहुप्रतिक्षित रेल योजना बनने जा रही है। इन दोनों योजनाओं में सुरंग निर्माण का होना लाजमी है। देखना यह है कि इन दोनों योजनाओं की सुरंगे कई स्थानों पर आपस में टकरायेगी तो क्या इन सुरंगों में रेल चलेगी या जलविद्युत परियोजनाओं का पानी बहेगा जो बार-बार सवाल खड़ा कर रहा है। यही नहीं इन सुरंग निर्माण में जो क्षति प्राकृतिक संसाधनों की होगी उसकी भरपाई कैसी हो?

दोहन से पूर्व उसके लिये आज तक कोई रोडमैप सामने नहीं आ पाया है। फलस्वरूप इसके पर्यावरण कार्यकर्ता इसलिए बार-बार सवाल पूछ रहे हैं कि पिछले 20 से 40 वर्षों में जो बदलाव मौसम और फसल चक्र में आ रहे हैं उस पर वैज्ञानिकों की राय सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही है। उफरैंखाल में पानी संरक्षण के लिये काम करने वाले ‘पाणी राखो आन्दोलन’ के प्रणेता सच्चिदानन्द भारती कहते हैं कि 35 वर्ष पूर्व जब उन्होने उफरैंखाल में जल संरक्षण काम आरम्भ किया था तो उस वक्त इतनी वर्षा नहीं होती थी। उन्होंने वर्षाजल संरक्षण के तौर-तरीके अपनाएँ तो आज उफरैंखाल से एक सूखी नदी जीवित हो उठी। उन्हें इस बात का मलाल है कि वर्तमान में जितनी वर्षा हुई उससे कोई भी नदी पुनर्जीवित नहीं हुई। इतना बरसने वाला पानी जमीन के ऊपरी सतह पर से बड़ी तेजी से बहकर निकल रहा है। सवाल इस बात का है कि ऐसी वर्षा जो जमीन को स्पर्श तक नहीं कर रही है। ऐसा परिवर्तन खतरनाक हो सकता है जिस पर वैज्ञानिकों को कुछ हल निकालना पड़ेगा।

प्रसिद्ध भू-वैज्ञानिक प्रो. खड़क सिंह बल्दिया कहते हैं कि जब तक सरकार की मंशा विकास के प्रति गंगा के पानी जैसा स्पष्ट नहीं होगी तब तक पर्यावरण सुरक्षा की बात करनी बेईमानी ही होगी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि व्यवस्थाएँ कौन बनाता है? नीतियाँ कौन बनाता है? बजट की व्यवस्था कौन करता है? राज्य के नफा-नुकसान का हिसाब किताब कौन रखता है? वगैरह। यदि इन मुद्दों पर सरकारें गम्भीर नहीं तो मौसम भी तेजी से बदलेगा, लोग प्राकृतिक आपदाओं के संकट में आ जायेगें। पानी, पेड़ व हवा उपभोग की वस्तु बन जायेगी। वर्षा व साल की ऋतुओं का मिजाज बदल जायेगा। ऐसी परिस्थिति में लोगों की सांसे रुकनी आरम्भ हो जायेगी। इसलिए अच्छा तो यह है कि समय रहते लोग एक बार फिर से अपने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण व दोहन के बारे में सोचें।

पर्यावरणविद डा. अनिल प्रकाश जोशी कहते हैं कि मौसम परिवर्तन की मार तो पूरी दुनिया में है। परन्तु हम उत्तराखण्ड हिमालय वासियों को प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से पूर्व एक बार सोचना चाहिए था कि जितना दोहन हो रहा है उतना संरक्षण हुआ कि नहीं। ऐसा दरअसल राज्य में नहीं हो रहा है। जिसकी जिम्मेदारी सरकारों को लेनी चाहिए। रक्षासूत्र आन्दोलन के प्रणेता सुरेश भाई कहते हैं कि लोग अब ज्यादा दिखाई दे रहे हैं और पेड़ एकदम घट चुके है। ऊपर गाँव और नीचे सुरंग। पेड़ काटो और मुनाफा कमाओं जैसी प्रवृत्ति सरकारों की बन चुकी है। पर्यावरणविद राधा भट्ट कहती हैं कि इसे विडम्बना ही कहिए कि पहले तो पेड़ हमारी सुरक्षा करते थे अब हालात ऐसी हो गयी कि अब पेड़ो की सुरक्षा के लिये लम्बे आन्दोलन चलाने पड़ रहे हैं। कुल मिलाकर यह असंतुलित विकास मौसम को असंतुलित कर रहा है जिससे आये दिन तरह-तरह की प्राकृतिक आपदाएँ सामने खड़ी हो रही है। यही वजह है कि बाढ़ व भूस्खलन का खतरा, पेयजल का संकट, गर्मी व सर्दी का अनियंत्रित मिजाज, अनियमित वर्षा पहाड़ से लेकर मैदान तक बढ़ चुका है। समय रहते इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है।

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