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बदलाव की शुरुआत

Author: 
चंद्र भूषण
Source: 
डाउन टू अर्थ, नवम्बर 2017

तकनीक का विकास दुनियाभर को नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ा रहा है और इसने काला सोना यानी कोयले के भविष्य को चुनौती दे दी है। भारत में अन्तिम कोयला बिजली संयंत्र 2050 तक बन्द हो सकता है। चंद्र भूषण का विश्लेषण

बदलाव की शुरुआत यह मई 2030 है। मध्य प्रदेश के झाबुआ में रहने वाली सुनिधि परमेश ने राहत की साँस ली है क्योंकि अब वह बिजली से चलने वाले इंडक्शन चूल्हे में नाश्ता बनाकर अपनी बेटियों को स्कूल भेज सकती है। बेटियाँ इस साल अच्छे अंक लाई हैं। इसका बड़ा श्रेय छत पर लगे 500 वाट के सौर पैनल और 3 किलोवाट प्रति घंटा (kWh) बैटरी बैंक को जाता है। उनके पति महेश ने बैंक से लोन लेकर कुछ साल पहले इन्हें लगवाया था। इस सिस्टम से उन्हें 24 घंटे बिजली मिल जाती है। यह बिजली से घर में रखे रेफ्रिजरेटर, टीवी और बिजली से चलने वाले एक ई-स्कूटर के लिये पर्याप्त है। सुनिधि को अब ईंधन के लिये लकड़ियाँ लाने पैदल नहीं जाना पड़ता और न ही एलपीजी रिफिल का इन्तजार करना पड़ता है। यहाँ तक की अब उनकी बेटियाँ आधी रात को भी पढ़ाई करती हैं और हर समय इंटरनेट भी मिल जाता है। महेश ने ड्रिप सिंचाई के लिये अपने 2 एकड़ के खेत में सौर जल पम्प भी लगवा लिया है। उन्हें हर महीने बिजली का बिल जमा करने से भी मुक्ति मिल गई है। सौर ऊर्जा से बची हुई बिजली को वह दिल्ली की एक कम्पनी को बेचते हैं।

राजधानी में ऐसी करीब 20 कम्पनियाँ हैं जो नवीकरणीय ऊर्जा खरीदती हैं उपभोक्ताओं को लुभाने के लिये पर्यावरण हितैषी होने का प्रचार करती हैं। दो बड़ी बिजली वितरण कम्पनियों (डिस्कॉम) की दुकान बन्द हो गई है। इनके बदले वितरण ग्रिड की देख-रेख के लिये हर नगरपालिका में एक कम्पनी है। सौर और पवन के बिजली का सस्ता स्रोत बनने के बाद कोयले से बनी बिजली खरीदने वाले कम हैं, इसलिये कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) ने अपनी खदानें बन्द करनी शुरू कर दी हैं। अब कोयला बिजली संयंत्रों के लिये सरकार की मदद ही सहारा बनी हुई है।

भारत ऊर्जा के मामले में लोकतांत्रिक होने का जश्न मना रहा है, सैकड़ों और हजारों घर बिजली का उत्पादन जो कर रहे हैं। उपभोग के साथ ही वे बिजली भी पैदा कर रहे हैं। बिजली तक वैश्विक पहुँच के लिये सरकार गरीबों के बैंक खातों में सीधे सब्सिडी पहुँचा रही है ताकि वे अपनी पसन्द की कम्पनी से बिजली खरीद सकें।

अब वर्तमान में आते हैं : सरकार चार करोड़ घरों को दिसम्बर 2018 तक बिजली उपलब्ध कराने और बिजली की कीमतों को कम करने के लिये कोयले की खदानों में भारी निवेश कर रही है। सरकार की मंशा है कि सीआईएल 2019-20 तक हर साल एक एक अरब टन कोयले का उत्पादन करे। 2016-17 में यह उत्पादन 55.4 करोड़ टन था। सरकार कोयले के भण्डार वाले 5,100 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में नई खदानें शुरू करना चाहती है। सबको एलपीजी मुहैया कराने के लिये शहरों में नई पाइपलाइन डाली जा रही है। इसके अलावा डिस्कॉम को घाटे से उबारने के लिये महत्त्वाकांक्षी उज्जवल डिस्कॉम एश्योरेंस (उदय) लागू की जा रही है।

ये सभी प्रयास चमकदार भविष्य की तस्वीर बयाँ करते हैं। तथ्य यह है कि भारत एक ऐसे सपने का पीछा कर रहा है जो वास्तविकता से कोसों दूर है। पूरी दुनिया ऊर्जा के एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। आने वाले कुछ दशकों में ऊर्जा के उत्पादन और उपयोग में क्रान्तिकारी परिवर्तन होने वाले हैं। ऊर्जा का जो परम्परागत ढाँचा इस वक्त स्थापित किया जा रहा है वह अपनी आर्थिक उम्र से पहले ही इस्तेमाल में नहीं रहेगा। चीन में यह अभी अनुभव और उपभोग भी कर रहे हैं। 2010 से चीन ने कोयले से बिजली उत्पादन क्षमता में करीब 3,00,000 मेगावाट (mw) की वृद्धि की है। इसकी वर्तमान क्षमता 9,50,000 mw है जो भारत से तीन गुणा ज्यादा है। 2011 से 2016 के बीच इन संयंत्रों से चीन के संयंत्रों के औसत उत्पादन घंटों में 5305 घंटे तक की गिरावट हुई है। पहले संयंत्र साल में 8760 घंटे काम करते थे जो अब 4165 घंटे ही काम कर रहे हैं। इसका मतलब है कि 2016 में चीन के कोयले संयंत्र अपनी क्षमता से आधे से भी कम पर काम कर रहे थे। फरवरी 2017 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की ओर से जारी रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि कोल ऊर्जा के निवेशकों को 28 से 65 लाख करोड़ रुपए तक नुकसान हो सकता है क्योंकि यह लाभकारी नहीं रहेगा या इसे पर्यावरण के कारणों से बन्द करना पड़ेगा।

पिछले 5 सालों में यूएस एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (यूएसईआईए) और इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईईए) ने कोयले के उपभोग का अपना अनुमान कम कर लिया है। यूएसईआईए ने 2013 में इंटरनेशनल एनर्जी आउटलुक रिपोर्ट में अनुमान लगाया था कि 2010 और 2040 के दौरान वैश्विक कोयले के उपयोग में 33 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी। इसकी 2017 की रिपोर्ट में, 2015 और 2050 के बीच कोयले के उपयोग में स्थिरता का अनुमान लगाती है। आईईए ने अपनी 2016 की वर्ल्ड एनर्जी आउटलुक रिपोर्ट में अनुमान लगाया था कि 2040 तक वैश्विक कोल उपभोग की दर में ठहराव आ जाएगा। इसने 2012 में जारी रिपोर्ट में माना था कि 2010-2035 के बीच कोयले के उपभोग में 18 प्रतिशत बढ़ोत्तरी होगी।

ऐसे क्या कारण रहे जिन्होंने यूएसईआईए और आईईए को अपना नजरिया बदलने के लिये मजबूर किया? इसका विश्लेषण करने के लिये जरूरी है कि उन अहम ताकतों को समझें जो दुनियाभर में उपभोक्ताओं के व्यवहार और व्यापार को प्रभावित कर रहे हैं। इसके बाद उन तकनीक खोजों को भी समझें जिसमें इन ताकतों के कारण बहुत तेजी से विकास हो रहा है।

ऊर्जा हासिल करने की वैश्विक प्रतिबद्धता


“सुनिश्चित करो कि 2030 तक वहनीय, भरोसेमंद और आधुनिक ऊर्जा तक वैश्विक पहुँच हो।”यह संयुक्त राष्ट्र का सातवाँ सतत विकास का लक्ष्य (सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल) है। इतिहास में कभी ऊर्जा की पहुँच खासकर बिजली को लेकर इतना ध्यान नहीं दिया गया।

विश्व में करीब सौ करोड़ लोगों की बिजली तक पहुँच नहीं है। इन लोगों को बिजली मुहैया कराने के लिये 2030 तक हर साल करीब 325 लाख करोड़ रुपए के निवेश की जरूरत है। यह ऊर्जा के क्षेत्र में वार्षिक निवेश का दो प्रतिशत है। 2030 तक बिजली की वैश्विक पहुँच के लिये निवेश में अन्तर है तथापि विश्व भर में इस दिशा में निवेश बढ़ा है। विश्व के 20 मुख्य देशों में बिजली की पहुँच के लिये 2013-14 के बीच निवेश 1870 करोड़ रुपए से बढ़कर 2010 करोड़ रुपए हो गया है। इथियोपिया और बांग्लादेश जैसे देश भी अपनी सकल घरेलू उत्पाद का 2-3 प्रतिशत निवेश खासकर बिजली की पहुँच पर कर रहे हैं। अन्तरराष्ट्रीय वित्त का सहयोग भी इस दिशा में बढ़ा है। अमेरिकी सरकार अफ्रीकी देशों के साथ मिलकर सब-सहारन अफ्रीका में बिजली की क्षमता दोगुना करने की दिशा में कम कर रही है।

क्या वैश्विक कोयला उपभोग अपने चरम पर पहुँच गया अफ्रीका देश नाइजीरिया में बिजली का उत्पादन बढ़ाने के लिये 22,500 करोड़ रुपए के निवेश की घोषणा की गई है। 2015 में पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते के तहत अफ्रीका में लोगों को नवीकरणीय ऊर्जा से बड़ी संख्या में बिजली सुनिश्चित करने की पहल की गई है। वहाँ भी जोरों से ऊर्जा पहुँचाने पर काम हो रहा है। ऊर्जा से वंचित भारत के तीस करोड़ लोगों को बिजली और पचास करोड़ लोगों को शुद्ध ईंधन अब तक नहीं पहुँचा है। सरकार ने हाल ही में 2018 तक लोगों को बिजली मुहैया कराने के लिये अरबों रुपए की महत्वाकांक्षी पहल की है। इस दिशा में हो रहे निवेश का फायदा आगे अलग जगह पर भी होगा।

उदाहरण के लिये अभी खाना बनाने के लिये स्वच्छ ईंधन का मतलब एलपीजी या बायोमास स्टोव है। बिजली में सुधार के साथ बिजली चालित कुकिंग स्टोव खाना बनाने के लिये स्वाभाविक पसन्द होंगे। विकसित देशों में ऐसा देखा गया है।

स्वच्छ हवा की बढ़ती माँग


पिछले पाँच सालों में शहरों में हवा की खराब गुणवत्ता ने वैश्विक जागरुकता को बढ़ाया है। दूषित हवा से हो रही मौतों और बीमारियों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर हर साल 325 लाख करोड़ रुपए का भार डाला है। भारत में इससे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को 5 प्रतिशत का नुकसान होता है। साफ हवा के लिये स्थानीय प्राधिकरण कठोर उपाय कर रहे हैं। चीन ने प्रदूषण वाली जगह पर कोयले के संयंत्र लगाने बन्द कर दिए हैं। बीजिंग नियमित रूप से कोल ऊर्जा संयंत्र बन्द कर रहा है।

भारत में पहली बार दिल्ली स्थित बदरपुर थर्मल पावर स्टेशन को हवा को साँस लेने लायक बनाने के लिये शीत काल में बन्द कर दिया है। पेरिस, मेड्रिड, एथेंस और मैक्सिको सिटी ने 2025 तक डीजल वाहन बन्द करने के लिये योजना बनाने की घोषणा कर दी है। भारत और चीन भी बड़े पैमाने पर बिजली चालित वाहनों को चलाने की दिशा में काम कर रहे हैं। साफ हवा की खातिर परिवर्तन की यह लय ऊर्जा और परिवहन सेक्टर में काफी बदलाव ला रही है।

जलवायु परिवर्तन की वास्तविकता


यह तीसरी और सबसे महत्त्वपूर्ण ताकत है जो ऊर्जा की आधारभूत संरचनाओं में बदलाव की माँग कर रही है। जलवायु परिवर्तन न केवल गरीबों बल्कि अमीरों को भी अब चोट पहुँचाने लगी है। इस साल अमेरिका ने कई तूफानों का सामना किया है। अनुमान के मुताबिक, इससे अमेरिका को करोड़ों रुपए का नुकसान पहुँचा है। इन तूफानों से जिन परिसम्पत्तियों को नुकसान पहुँचा उन्हें बनाने में कई साल लग जाएँगे। इसी तरह भारत में अतिशय बारिशों और सूखे ने शहरी और ग्रामीण इलाकों को अपनी चपेट में लिया है। यूरोप और एशिया में गर्म हवाओं या लू (हीट वेव) से जंगलों में आग लग रही है और लोग मर रहे हैं। इन घटनाओं को देखते हुए जनमत बनने लगा है कि जलवायु परिवर्तन के लिये उपाय जल्द करने होंगे।

पेरिस समझौते से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के अलग होने और उत्सर्जन में कटौती में असफल रहने के बावजूद व्यापारी और स्थानीय सरकारें जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये प्रतिबद्ध हैं। विश्व के सबसे बड़े 75 से ज्यादा शहरों सी-40 सिटीज क्लाइमेट लीडरशिप ग्रुप का गठन किया है। उन्होंने प्रण लिया है कि वे आने वाले तीन दशकों में उत्सर्जन में कमी करेंगे। सितम्बर में नाइकी, गैप, लेवी स्ट्रॉस समेत छह बड़ी कम्पनियों ने कपड़ा सेक्टर की 300 से ज्यादा कम्पनियों से हाथ मिलाकर प्रण लिया कि वे विज्ञान आधारित जलवायु लक्ष्य निर्धारित करेंगी। ये परिवर्तन भले ही अभी पर्याप्त न हों लेकिन प्रत्यक्ष जरूर हैं। साल 2006 में 1990 के दशक के बाद सबसे कम ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ। इसके पीछे मुख्य रूप से दो कारण हैं। पहला कोयले का कम उपभोग और दूसरा नवीकरणीय ऊर्जा का आधिक्य। लगातार तीसरे साल जीवाश्म ईंधन के प्रयोग से होने वाली वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भी लगभग न के बराबर बढ़ोत्तरी हुई। तीन प्रतिशत वैश्विक आर्थिक विकास के बावजूद यह सम्भव हुआ।

इन ताकतों ने उन्नत तकनीक को ऊर्जा सेक्टर में चिर परिचित रास्ते को बदलने के लिये प्रेरित किया। ऐसे पाँच तकनीकी चलन हैं जो ऊर्जा के क्षेत्र में भारी बदलाव की गवाही दे रहे हैं। भारत भी इनसे काफी प्रभावित है क्योंकि ये स्वच्छ भविष्य की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं।

चलन 1- नवीकरणीय ऊर्जा के दाम में भारी कमी:
सौर फोटोवोल्टेक (पीवी) संयंत्र के दामों में पिछले छह वर्षों में भारी गिरावट हुई है। इंटरनेशनल रिनेवेवल एनर्जी एजेंसी (आईआरईएनए) के अनुसार, 2009 से 2015 के अन्त तक पीवी मॉड्यूल के दाम 80 प्रतिशत तक गिरे हैं।

भारत में 2010 से 2016 के बीच सौर पीवी संयंत्र की लागत हर साल 20 प्रतिशत कम हुई है। इसी तरह यूटीलिटी स्केल यानी बड़े सौर ऊर्जा संयंत्र से बिजली की लागत कम हुई है। दिसम्बर 2010 में यह 12 रुपए kWh थी जो मई 2017 में 2.5 रुपए kWh हो गई। वर्तमान में सौर ऊर्जा की लागत एनटीपीसी की बिजली के औसत दाम से 20 प्रतिशत कम है। सबसे बड़ी बिजली निर्माता एनटीपीसी की बिजली की कीमत कोयला चालित परियोजनाओं से बनती है।

सौर ऊर्जा के दामों में भारी गिरावट पवन ऊर्जा भी सस्ती हो रही है, हालाँकि यह गिरावट सौर ऊर्जा जितनी नहीं है। वैश्विक स्तर पर तटवर्ती पवन ऊर्जा की पूँजी लागत 2015 में 1,01,400 kWh थी जबकि 1983 में यह लागत 3,09,790 रुपए kWh थी। साफ है कि इस दौरान लागत में दो तिहाई की गिरावट दर्ज की गई है। इस वक्त चीन और भारत में पवन ऊर्जा स्थापित करने की लागत सबसे कम है। फरवरी 2017 में भारतीय सौर ऊर्जा निगम ने 1000 MW निविदा के दौरान पवन ऊर्जा की लागत 3.46 रुपए kWh आंकी थी। यह आयातित कोयले के जरिए उत्पन्न बिजली से सस्ती है। हाल में भारतीय सौर ऊर्जा निगम की 1000 MW की पवन ऊर्जा निविदा में इसकी लागत 3.3 रुपए kWh बताई गई है। आने वाले 10 सालों में यह दर काफी कम होने की सम्भावना है। आईआरईएनए के अनुसार, 2015 के स्तर के मुकाबले 2025 में सौर पीवी की वैश्विक लागत 59 प्रतिशत तक कम हो सकती है। जबकि तटवर्ती पवन ऊर्जा की दर 26 प्रतिशत तक गिर सकती है।

2025 के भारत में विद्युत ग्रिड मुक्त घर संभव होंगे चलन 2- प्रभावी और सस्ती बैटरी : अक्टूबर 2016 में टेस्ला के एलोन मस्क ने पावरवाल-दो से पर्दा उठाया था। यह लीथियम आयन बैटरी का भण्डार था जो 14 kWh तक बिजली का संग्रह कर सकती हैं और 15 साल तक चल सकती है। यह सौर पैनल के साथ इस तरह डिजाइन की गई है कि घरों को ग्रिड से बिजली लेने की जरूरत नहीं है। वर्तमान में भारत में एक उच्च मध्यम वर्ग परिवार दो पावरवाल ऑनलाइन खरीदकर ग्रिड की बिजली से मुक्त हो सकता है। इसके लिये उन्हें करीब 8 लाख रुपए देने होंगे। इसके अतिरिक्त छत पर लगाने के लिये 10 kWh का सौर संयंत्र 6 लाख रुपए में खरीदना होगा। आज ग्रिड की बिजली से मुक्त होने की लागत मध्यम दर्जे की कार की कीमत के बराबर हो गई है।

दिसम्बर 2016 में टेस्ला ने दक्षिण कैलिफोर्निया एडिसन के लिये ग्रिड से जुड़ी बैटरी स्थापित की। यह कम्पनी दक्षिण कैलिफोर्निया में बिजली की आपूर्ति करती है। 80 MWh की बैटरी उस वक्त बिजली का भण्डारण कर लेती है जब माँग कम होती है और अधिक माँग के समय (पीक आवर्स) में ग्रिड को बिजली देती है। पहले गैस व ऊर्जा संयंत्रों में काम करती थी। टेस्ला अब दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के लिये 129 MWh बैटरी में पवन ऊर्जा का भण्डार एकत्र कर रही है और इसे कम दाम पर उपभोक्ताओं को बेच रही है। यह करने वाली टेस्ला अकेली कम्पनी नहीं है। बहुत सी कम्पनियाँ इस दिशा में आगे बढ़ रही हैं। साल 2016 में इन कम्पनियों ने ग्रिड स्केल बैटरी भण्डारण में 6500 करोड़ रुपए का निवेश किया है।

अब वापस भारत में आते हैं। भारत में ग्रिड से जुड़ी बैटरी भण्डारण सिस्टम पर कई पायलट प्रोजेक्ट प्रगति पर हैं। पुदुच्चेरी में तीन तकनीक-एडवांस लेड एसिड, लीथियम आयन और एल्क्लाइन फ्लो बैटरी का परीक्षण चल रहा है। इसमें दिन में ऊर्जा का संग्रह रात में इस्तेमाल किया जा रहा है।

ये उदाहरण बताते हैं कि आज हमारे पास ऐसी बैटरियाँ हैं जो बड़ी मात्रा में बिजली का भण्डारण कर सकती हैं जो कोयले से उत्पन्न और गैस चालित ऊर्जा संयंत्र की तरह बिजली उपलब्ध करा सकती हैं। इन बैटरियों में तेजी से सुधार भी हो रहा है। भविष्य की बैटरी और अधिक ऊर्जा का भण्डारण करेगी। साथ ही तेजी से चार्ज और खत्म होगी। अधिक स्थिर और सुरक्षित होगी। और सबसे जरूरी बात यह कि आज की बैटरीज से 70-80 प्रतिशत सस्ती होगी।

बैटरियों के दाम गिर रहे हैं। लीथियम आयन का दाम साल 2010 से 50 प्रतिशत तक कम हो गए हैं। केपीएमजी की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अभी लीथियम आयन की भण्डारण लागत 12.6 रुपए kWh है जो 2025 में गिरकर 3.5 रुपए kWh हो सकती है।

3.5 रुपए प्रति kWh भण्डारण लागत और 3 रुपए kWh सौर रूफटॉप संयंत्र की उत्पादन लागत के साथ भारत के घर 2025 तक ग्रिड से मुक्त हो सकते हैं। ऐसा इसलिये क्योंकि 2025 तक हर घर में सौर रूफटॉप समेत बैटरी पर खर्च 6 रुपए kWh होगा जबकि बिजली कम्पनियाँ 7 रुपए वसूल करेंगी।

चलन 3- घर, घरेलू सामान कार्यकुशल होंगे : वैश्विक ऊर्जा का सबसे अधिक उपभोग करने वाले 80 से ज्यादा देशों ने घरेलू सामान और वाहनों के लिये एनर्जी एफिशिएंसी स्टैंडर्ड एंड लेवलिंग (ईईएसएल) कार्यक्रम निर्धारित किए हैं। पिछले सालों में उद्योग, इमारतों और परिवहन में ऊर्जा दक्षता निगमन अनिवार्य रूप से दोगुना हो गई है। आईईए के अनुसार, ऊर्जा दक्षता में सुधार ने दुनिया की कुल ऊर्जा की माँग में काफी वृद्धि सीमित की है। ऊर्जा दक्षता की गति ऐसी है कि 2016 में ऊर्जा के दाम में उल्लेखनीय गिरावट के बावजूद उस साल दक्षता में अधिक निवेश हुआ। यूएसईआईए के अनुसार, ऊर्जा दक्षता में सुधार की गति आगे भी जारी रहेगी। यह वैश्विक ऊर्जा में अधिकता को कम करने में काफी मददगार होगी। अगर 2015 के स्तर की बात करें तो प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद के दोगुना होने और विश्व की आबादी में 25 प्रतिशत बढ़ोत्तरी होने पर भी 2040 तक वैश्विक ऊर्जा उपभोग 28 प्रतिशत ही बढ़ेगा। इसी तरह जीडीपी की ऊर्जा गहनता यानी 65000 रुपए जीडीपी के उत्पादन के लिये उपभोग की गई ऊर्जा भी इस अवधि में गिरकर आधी हो जाएगी।

यह तथ्य है कि ऊर्जा दक्षता के क्षेत्र में बिना शोर-शराबे के एक क्रान्ति हुई है, खासकर घरेलू सामान में दक्षता के मामले में। 1990 में एक बल्ब 60 वाट और सीलिंग पंखा 150 वाट बिजली की खपत करता था। आज हमारे पास एलईडी बल्ब है जो सिर्फ 7 वाट बिजली की खपत करता है और 1990 के बल्ब से 20 गुणा ज्यादा चलता है। पंखा भी अब 25 वाट बिजली की खपत करता है। 1980 के दशक में 24 इंच का सीआरटी टीवी 150 वाट बिजली की खपत करता था। अब उसी आकार का एलईडी टीवी महज 24 वाट में चलता है। एसी की ऊर्जा दक्षता भी 1990 के दशक से सात गुना बढ़ी है। इसी तरह फ्रिज की दक्षता में भी 6 गुणा सुधार हुआ है।

हम अति दक्ष सामान के युग में प्रवेश कर रहे हैं। बड़े पैमाने पर सौर पीवी के स्थापन और इसका प्रचार हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में सौर मिनी ग्रिड और शहरी इलाकों में सौर रूफटॉप के कारण अब डीसी घरेलू सामान उपयोग में लाए जाएँगे। ये सामान एसी सामान के मुकाबले में दोगुनी दक्षता के होंगे।

आज ऐसी व्यावसायिक और आवासीय इमारत बनानी सम्भव है जो परम्परागत इमारतों के मुकाबले 70 प्रतिशत कम बिजली का उपयोग करेंगी। और इसकी भरपाई पाँच साल से भी कम अवधि में हो जाएगी। ऊर्जा संरक्षण बिल्डिंग कोड (ईसीबीसी) के 2017 संस्करण नई व्यावसायिक इमारतों के लिये 25 प्रतिशत बिजली की बचत अनिवार्य कर रहे हैं। साथ ही इसने 50 प्रतिशत बिजली बचाकर इमारतों को सुपर ईसीबीसी श्रेणी हासिल करने के लिये रोडमैप प्रदान किया है। सभी इमारतों की कक्षाओं में ईसीबीसी अनिवार्य करके और सामान में स्टार रेटिंग कार्यक्रम मजबूत करके भारत आसानी से 2030 तक इमारतों की दक्षता में तीन गुना सुधार कर सकता है।

चलन 4- बिजली गतिशील हो रही है : विश्व में केवल 21 प्रतिशत अन्तिम ऊर्जा का उपभोग बिजली के रूप में हो रहा है। तेल, गैस कोयला और बायोमास जैसे ईंधन बाकी 79 प्रतिशत अन्तिम ऊर्जा में योगदान देते हैं। इन ईंधनों का इस्तेमाल परिवहन, उद्योग और भवनों में खाना बनाने और गर्मी के लिये होता है। आज हमारे पास ऐसी तकनीक है जिससे हम इन ईंधनों का प्रत्यक्ष प्रयोग बन्द कर सकते हैं और इनके बदले बिजली का इस्तेमाल कर सकते हैं। विमानों, जहाजरानी, भारी ड्यूटी सड़क परिवहन, सीमेंट, लौह, स्टील, फर्टिलाइजर और पेट्रोकेमिकल जैसे उद्योगों को छोड़कर बाकी सभी सेक्टरों में ऐसा किया जा सकता है। आईईए के अनुसार, 2014 से 2040 के बीच विश्व में बिजली की माँग 70 प्रतिशत बढ़ जाएगी और आधी से ज्यादा माँग की पूर्ति नवीनीकरण से होगी। 2016 में पहली बार बिजली सेक्टर ने तेल और गैस सेक्टर को पीछे छोड़ते हुए सबसे ज्यादा निवेश अर्जित किया। यह निवेश इसलिये बड़ा है क्योंकि बाजार के कुछ क्षेत्र तुरन्त इस बिजली का इस्तेमाल करना चाहते हैं।

उद्योग को ऐसा करने में वक्त लगेगा। लेकिन दो क्षेत्र ऐसे हैं जो बहुत जल्दी ईंधन से बिजली पर आ सकते हैं। वह दो क्षेत्र हैं निजी वाहन और इंडक्शन कुंकिंग।

विश्व की हर बड़ी ऑटोमोबाइल कम्पनी ने या तो बिजली से चलने वाली कार पेश कर दी है या उनकी योजनाओं में है। यह सब पिछले कुछ सालों में ही हुआ है। सबसे पहले चीन ने ई वाहनों की दिशा में बड़ी पहल की। यहाँ 2016 में बिजली से चलने वाली 7,50,000 कारें बेची गईं। करीब 20 लाख ई-कारों का भण्डार रखा गया। इनमें से 40 प्रतिशत कारें चीन में बिक गईं। हाल में भारत ने भी पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों को बन्द करने की योजना की घोषणा की है। 2030 तक यहाँ बिजली से चलने वाले वाहन ही चलेंगे। आईईए के ग्लोबल ईवी आउटलुक 2017 के अनुसार, 2025 तक सड़कों पर ई वाहन 4-7 करोड़ तक बढ़ जाएँगे। हालाँकि ऑटोमोबाइल के कुछ जानकारों का अनुमान है कि 2030 तक बिकने वाली हर तीन में से एक कार बिजली चालित होगी।

बिजली से चलने वाली कारों के मुकाबले बिजली चालित दुपहिया वाहनों की अच्छी शुरुआत हुई है। अकेले चीन ने 20 करोड़ दुपहिया बेच दिए हैं। भारत में यह आँकड़ा पाँच लाख ही है लेकिन सभी बड़ी दुपहिया वाहन निर्माता कम्पनियाँ बिजली से चलने वाले वाहनों के नए मॉडल ला रही हैं।

सरकार की योजना फास्टर एडॉप्शन एंड मैन्युफैक्चरिंग ऑफ हाइब्रिड एंड इलेक्ट्रिक वेहिकल योजना के निर्धारित लक्ष्य के अनुसार, भारत में 2020 तक 250 लाख बिजली चालित दुपहिया वाहन होने चाहिए। उद्योग के जानकारों का कहना है कि अगर ठीक से प्रोत्साहन दिया जाए तो 2025 तक इस लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।

ई वाहनों में तेजी से विकास की तरह ही इंडक्शन कुकिंग के विकास में भी तेजी आएगी। इंडक्शन कुकिंग खाना बनाने के लिये सबसे दक्ष और सबसे सस्ते माध्यम के रूप में उभरा है। आज एक चूल्हे वाला इंडक्शन स्टोव दो हजार रुपए से कम दाम पर उपलब्ध है। पाँच सदस्यों का एक परिवार इंडक्शन कुकिंग अपनाकर एलपीजी के मुकाबले कम-से-कम 30 प्रतिशत ईंधन का खर्च कम कर सकता है। क्या भारत को ठोस खाना बनाने के ईंधन से इंडक्शन कुकिंग में शिफ्ट कर जाना चाहिए या एलपीजी में निवेश करना चाहिए? सरकार के लिये यह अहम सवाल है जो ऊर्जा तक वैश्विक पहुँच सुनिश्चित करने की दिशा में कई हजार-करोड़ खर्च कर रही है।

चलन 5- स्मार्ट ग्रिड का विस्तार : स्मार्ट ग्रिड एक बिजली का नेटवर्क है जो ऊर्जा के सभी स्रोतों खासकर नवीकरणीय ऊर्जा पर नजर रखने के लिये विकसित हुआ है। यह बिजली की माँग को पूरा करने के लिये डिजिटल एवं उन्नत तकनीक का इस्तेमाल करता है। स्मार्ट ग्रिड, को दो दिशाओं में काम करने की अनुमति देता है। इससे उपभोक्ताओं को विक्रेता बनाने से सहूलियत होती है। यह माँग और पूर्ति को प्रतिबम्बित करने के लिये दिन के अलग-अलग समय में अलग दर का समर्थन करता है। 2020 तक स्मार्ट ग्रिड का बाजार 14.30 लाख करोड़ और 2030 तक 32.50 लाख करोड़ रुपए होने का अनुमान है। बहुत से देश स्मार्ट ग्रिड पर काम कर रहे हैं या इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। भारत में 2010 में इंडिया स्मार्ट ग्रिड टास्क फोर्स (आईएसजीटीएफ) और इंडिया स्मार्ट ग्रिड फोरम आईएसजीएफ) के गठन के साथ स्मार्ट ग्रिड की शुरुआत हुई थी। आईएसजीटीएफ नीति-निर्देश प्रदान करने के लिये बना एक अन्तर मंत्रिस्तरीय समूह है। आईएसजीएफ स्मार्ट ग्रिड तकनीक के विकास को गति देने के लिये सार्वजनिक और निजी हितधारकों का एक गैर लाभकारी स्वैच्छिक संघ है। सरकार ने 2015 से 338 करोड़ रुपए के बजटीय समर्थन से राष्ट्रीय स्मार्ट ग्रिड मिशन (एनएसजीएम) की शुरुआत की थी।

ऊर्जा मंत्रालय (एमओपी) ने देश भर में 11 पायलट परियोजनाओं को मंजूरी दी है जो स्मार्ट ग्रिड के विभिन्न क्रियाकलापों से सम्बन्धित हैं। इसके अतिरिक्त उदय योजना के तहत फीडर वितरण और ट्रांसफॉर्मर स्तर पर बड़े उपभोक्ताओं के लिये स्मार्ट मीटर स्थापित किए जा रहे हैं।

गतिशीलता में बदलते सुर भारत स्मार्ट ग्रिड की तरफ केवल नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण के परिप्रेक्ष्य में ही नहीं बल्कि वितरण से जुड़ी कई बुनियादी समस्याओं जैसे उच्च संचरण (हाई ट्रांसमिशन) एवं वितरण घाटा, बिजली चोरी, बार-बार लोड शेडिंग एवं कम वोल्टेज को सुलझाने के सन्दर्भ में देख रहा है। स्मार्ट ग्रिड तकनीक में इनमें से अधिकांश समस्याओं का समाधान निहित है। उदाहरण के लिये स्मार्ट मीटर एवं उन्नत मीटरिंग आधारभूत संरचना से उपभोक्ताओं व ट्रांसफॉर्मर स्तर पर बिजली चोरी और बिलिंग में सुधार की सम्भावना है। सबस्टेशन में सुधार से बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता में सुधार होगा। इस तरह थोड़े वक्त में स्मार्ट ग्रिड बिजली कम्पनियों को सेवा में सुधार और नुकसान कम करने में मददगार साबित होगा। लेकिन दीर्घकाल में वितरण क्षेत्र से जुड़ी बड़ी बिजली कम्पनियों के बन्द होने का रास्ता बनाएगा और उन्हें खत्म कर देगा।

ये पाँच तकनीकी चलन भारत की ऊर्जा व्यवस्था पर गहरा असर डालेंगे। आइए अब इसके दो मौलिक प्रभावों को देखते हैं। ये प्रभाव हैं कोयले और बड़ी एकीकृत डिस्कॉम का अन्त।

अन्त की शुरुआत


जनवरी 2017 के मध्य में लगभग सभी प्रमुख समाचार पत्रों में एक विचित्र खबर आई। खबर थी, भारत को 2027 तक नए कोयला बिजली संयंत्रों की जरूरत नहीं है, सिवाए उन 50 गीगावाट (एक गीगावाट = 1000 मेगावाट) क्षमता के जो निर्माणाधीन हैं। इसकी घोषणा केन्द्रीय बिजली प्राधिकरण (सीईए) द्वारा की गई थी। सीईए देश की मुख्य बिजली योजना प्राधिकरण है। कोयला-बिजली मन्दी के बारे में कोई भी बात, कुछ साल पहले तक एक उलट विचार माना जाता था। 2020 तक 150 करोड़ टन कोयले का उत्पादन करने के लिये नई कोयला खदानों की आवश्यकता का अनुमान लगाया गया था। ये मुख्यतः बिजली उत्पादन के लिये आवश्यक था। 2007-2012 के दौरान, दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) के मुताबिक 2,20,000 MW क्षमता वाले कोयला बिजली संयंत्रों को पर्यावरण मंजूरी प्रदान की गई थी और इससे भी कई और संयंत्र को मंजूरी मिलने की बात थी। तो, इन सभी प्रस्तावित संयंत्रों का क्या हुआ? ऐसा क्या हुआ जो इस निर्णय के बदलाव का कारण बनाया गया है?

सीईए का बिजली की माँग पर ये असहज पूर्वानुमान और कैसे इसे पूरा किया जाएगा, यही इस बदलाव के लिये जिम्मेदार है। सीईए ने अपने इलेक्ट्रिक पावर सर्वे (ईपीएस) में बिजली की माँग में लगातार उच्च वृद्धि दर का पूर्वानुमान दिया है जो कभी पूरा नहीं हुआ। ईपीएस हर पाँच साल में प्रकाशित किया जाता है और इस क्षेत्र में विकास के लिये रोडमैप तैयार किया जाता है। ईपीएस द्वारा किया गया अधिमूल्यांकन का परिणाम कोयला बिजली क्षेत्र में अधिक्षमता के रूप में निकला इसके अलावा, वर्तमान सरकार द्वारा 2022 तक नवीकरणीय ऊर्जा के 175 GW स्थापित करने का लक्ष्य तय किए जाने से पहले तक, सीईए ने पारम्परिक रूप से नवीकरणीय ऊर्जा को कमतर ही आँका।

अधिक माँग के अनुमानों का असर यह रहा है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) के दौरान, पारम्परिक स्रोतों से 88,537 MW के लक्ष्य के मुकाबले 99,209 MW क्षमता की स्थापना की गई। यह भारतीय बिजली क्षेत्र के इतिहास में पहली बार हुआ जो कि लक्ष्य का 112 प्रतिशत हिस्सा हासिल किया गया। अगर हम 12वीं योजना के दौरान नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित हुए हैं उसको जोड़ें तो अप्रैल 2017 में, भारत में 160 GW की माँग के मुकाबले 327 GW क्षमता स्थापित की। नतीजतन, कोयला आधारित बिजली संयंत्र 60 प्रतिशत के प्लांट लोड फैक्टर (पीएलएफ) पर संचालित हुए। इसका मतलब है कि वे अपनी क्षमता के सिर्फ 60 प्रतिशत पर ही काम कर रहे थे।

अगर हम अगले 10 वर्षों में बिजली की माँग और मौजूदा बिजली संयंत्रों की क्षमता के साथ-साथ निर्माणाधीन संयंत्र और जो पाइपलाइन में है, विशेष रूप से, सौर और पवन संयंत्रों की, तुलना करें तो कोल पावर सेक्टर के पीएलएफ में सुधार की सम्भावना नहीं है।

गलत पूर्वानुमान ने खेल बिगाड़ा 2021-22- कोयला बिजली क्षेत्र (कोल पावर सेक्टर) का पीएलएफ आगे घटेगा : 2017 में प्रकाशित नवीनतम 19वीं ईपीएस के अनुसार 2021-22 के लिये पूरे देश की अनुमानित बिजली आवश्यकता और उच्च (पीक) माँग 1566 बिलियन यूनिट kWh (बीयू) और 226 GW है। 2026-27 के लिये, अनुमानित बिजली आवश्यकता 2047 बीयू है और अनुमानित पीक डिमांड (उच्च माँग) 299 GW है। अगले 10 वर्षों में बिजली आवश्यकता में वार्षिक वृद्धि दर 6 प्रतिशत होने का अनुमान है। यह पिछले 10 वर्षों में हुई वृद्धि के समान ही है।

आइए अब आने वाले सालों में स्थापित होने वाले या लक्षित नए बिजली संयंत्र पर विचार करें:

1. 2017-22 के दौरान, लगभग 50 GW की नई कोयला आधारित बिजली संयंत्र चालू होने की सम्भावना है।
2. मार्च 2022 तक, 2,800 MW परमाणु रिएक्टर को चालू किया जाएगा।
3. 2021-22 तक, लगभग 15 GW पनबिजली संयंत्र आने की सम्भावनाएँ हैं।
4. 2022 तक लगभग 4 GW गैस आधारित बिजली संयंत्र के चालू होने की सम्भावना है।
5. भारत ने 2021-22 तक 175 GW नवीकरणीय ऊर्जा स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। 2016-17 तक 57 GW पहले ही स्थापित किया जा चुका है। लक्ष्य को पूरा करने के लिये अगले पाँच वर्षों में अतिरिक्त 118 GW स्थापित करने की आवश्यकता है। लेकिन नियामक और बाजार से जुड़े मुद्दों के कारण इस लक्ष्य के पूरा होने की सम्भावना नहीं है। इसकी जगह, 2022 तक 125 GW नवीकरणीय ऊर्जा की स्थापना यथार्थवादी है। इसलिये, 2017 और 2022 के बीच भारत केवल 70 GW ही स्थापित करेगा।

. यदि इन सभी प्लांट्स को चालू कर दिया जाए, तो 2022 तक अनुमानित स्थापित क्षमता 470 GW होने की सम्भावना है। यह 2021-22 के लिये आवश्यक बिजली और पीक लोड आवश्यकता को पूरा करने के लिये काफी होगा। वास्तव में, कोयला बिजली संयंत्र का पीएलएफ 2021-22 में 50 प्रतिशत तक कम हो जाएगा। दूसरे शब्दों में, 2021-22 तक भारत में वास्तविक बिजली की माँग के मुकाबले कहीं बहुत अधिक स्थापित क्षमता होगा।

लेकिन 2026-27 में क्या होगा? 2021-22 में जो भी क्षमता है, क्या उससे भारत 2026-27 की अपनी बिजली माँग को पूरा कर पाएगा?

2026-27- गैर-जीवाश्म ईंधन की स्थापित क्षमता जीवाश्म ईंधन से अधिक होगा : सीईए अनुमानों के मुताबिक, अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में जो गति है, उससे 2021-22 और 2026-27 के बीच अतिरिक्त 100 GW अक्षय ऊर्जा क्षमता बढ़ेगी। सीईए 2022-27 के दौरान 12 GW जल विद्युत क्षमता की स्थापना का भी अनुमान दे रहा है। इसके अलावा, 4.8 GW क्षमता के परमाणु संयंत्र भी 2026-27 तक चालू होने की सम्भावना है। सीईए मॉडलिंग से पता चलता है कि अगर ये क्षमताएँ काम करती हैं तो भारत को 2022-2027 के दौरान कोई भी कोयला या गैस आधारित बिजली संयंत्र स्थापित करने की आवश्यकता नहीं होगी। 2021-22 में मौजूदा कोयला क्षमता, 2026-27 के ऊर्जा और पीक लोड माँग को पूरा करने के लिये पर्याप्त होगा। वास्तव में, 2026-27 में कोल पावर प्लांट का पीएलएफ 60 प्रतिशत तक पहुँच पाएगा।

2026-27 में पहली बार, गैर-जीवाश्म ईंधन की स्थापित क्षमता जीवाश्म ईंधन से अधिक होगी। कोयला और गैस स्थापित क्षमता केवल 46.5 प्रतिशत ही योगदान देंगे। शेष अक्षय ऊर्जा, पनबिजली और परमाणु प्लांट से आएगा। फिर भी 2026-27 में, कोयला और गैस आधारित बिजली संयंत्रों से 65 प्रतिशत बिजली उत्पन्न की जाएगी। शेष गैर-जीवाश्म ईंधन से आएगा। लगभग 16.5 प्रतिशत सौर और पवन ऊर्जा से आएगा।

2031-32- कोयला बिजली संयंत्रों के अन्त की शुरुआत : 2026-27 के बाद की दुनिया अक्षय ऊर्जा से अपनी जरूरत पूरी करेगा। 2017-27 के दौरान, प्रत्येक 1 MW कोयला क्षमता के लिये, भारत कम-से-कम 3 मेगावाट सौर और पवन ऊर्जा क्षमता स्थापित करेगा। 2026-27 तक, पवन और सौर ऊर्जा, कोयला प्लांट, ऊर्जा क्षेत्र पर हावी होगी। तो क्या भारत को 2027 के बाद नए कोयला बिजली संयंत्रों की जरूरत है?

यह दो कारकों पर निर्भर करता है, एक, अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के मुकाबले कोयला विद्युत संयंत्रों की लागत प्रतिस्पर्धा और दूसरा, 2032 की जरूरत को पूरा करने के लिये 2027 की कोयला बिजली क्षमता की पर्याप्तता।

जैसा कि शुरुआत में दिखाया गया है, 2025 में भारत के उपभोक्ता के लिये सौर और पवन बिजली, ऊर्जा का सबसे सस्ता स्रोत होगा। बैटरी भण्डारण के साथ बड़े और छोटे सौर और पवन बिजली, कोयला और गैस बिजली संयंत्रों के साथ प्रतिस्पर्धा करेंगे। इसलिये, नए कोयला बिजली संयंत्र स्थापित करना आर्थिक रूप से तर्कसंगत नहीं है। लेकिन ग्रिड की तकनीकी आवश्यकता के बारे में क्या?

19वीं ईपीएस रिपोर्ट के अनुसार 2027 और 2032 के बीच, बिजली आवश्यकता में 4.3 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि और पीक लोड की आवश्यकता में 4.4 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान बताती है। 2031-32 में पीक लोड की माँग 370 GW होने का अनुमान है और बिजली की आवश्यकता 2531 बीयू रहेगी।

ग्रिड स्थिरता के लिये, अगर हम मान लें कि 2026-27 में विभिन्न स्रोतों से उत्पादित बिजली का अनुपात 2031-32 में भी समान रहता है तब 2031-32 में कोयला बिजली संयंत्रों से लगभग 1560 बीयू बिजली का उत्पादन करना होगा। ये 2026-27 में मौजूद कोयला बिजली संयंत्रों से सम्भव होगा। एकमात्र बदलाव यह होगा कि प्लांट का पीएलएफ 2027 के 62 प्रतिशत से बढ़कर 2032 में 74 प्रतिशत हो जाएगा।

यह एक सबसे अधिक वांछनीय परिणाम है, क्योंकि 75 प्रतिशत पीएलएफ को उच्चतम माना जाता है। इसलिये, भारत को 2022 के बाद कोयला बिजली संयंत्रों को स्थापित करने की जरूरत नहीं होगी। इसका मतलब है कि आज जो कोयला बिजली संयंत्रों का संचालन हो रहा है या निर्माण हो रहा है, वो 2032 तक आसानी से हमारी बिजली आवश्यकताओं को पूरा कर सकेगा।

2032 के बाद, भारत को नए कोयला बिजली संयंत्र स्थापित करने की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि इसे स्थापित करना सौर या पवन संयंत्र की तुलना में महँगा हो जाएगा। चूँकि कोयला प्लांट का पीएलएफ 2032 में सबसे ज्यादा होगा। 2032 में कोयले की खपत सबसे ज्यादा होगी और फिर यह कम होना शुरू हो जाएगी। यह मानते हुए कि 1 KW उत्पादन के लिये 0.65 किलोग्राम कोयले की आवश्यकता है, 2031-32 में भारत बिजली क्षेत्र में 100 करोड़ टन कोयले का उपभोग करेगा। इसलिये, भारत में बिजली के लिये कोयले की खपत 2031-32 तक सौ करोड़ टन तक पहुँच जाएगी और फिर कम होना शुरू हो जाएगी।

2032 में सर्वोत्तम पीएलएफ और कोयला संयंत्र चलन से बाहर यदि हम मान लें कि कोयला बिजली संयंत्रों का आर्थिक जीवन 30 वर्ष है तो (ऊर्जा मंत्रालय इसे 25 साल मानता है), तो 2050 तक अधिकतर कोयला बिजली संयंत्र संचालन से बाहर हो जाएँगे और उन्हें गैर-जीवाश्म ईंधन प्लांट के साथ प्रतिस्थापित करना सम्भव हो जाएगा।

सौर ऊर्जा की गर्मी अधिक उपभोक्ताओं तक इस परिदृश्य में (कोयला संयंत्र चलन से बाहर के ग्राफ में देखें) 2056-57 तक, भारत की कोयला बिजली क्षमता वर्तमान क्षमता का छठा हिस्सा यानि 30 GW होगा और फिर कम होना शुरू हो जाएगा। अन्तिम कोयला बिजली संयंत्र 2061-62 तक बन्द किया जा सकता है। जैसा कि ग्राफ में दिखाया गया है कि 2022 के बाद, कुछ नए कोयला बिजली संयंत्रों को स्थापित किया जाएगा, लेकिन उनमें अतिरिक्त क्षमता नहीं होंगी। उन्हें पुराने विद्युत संयंत्रों को बदलने के लिये स्थापित किया जाएगा। अगर हम कोल प्लांट का आर्थिक जीवन 25 वर्ष मानें तो 2050 में अन्तिम कोयला संयंत्र बन्द हो सकता है।

बड़े एकीकृत डिस्कॉम्स का समय खत्म होने को है


उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) राज्य में 20 करोड़ लोगों तक बिजली पहुँचाने (ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन) के लिये जिम्मेदार है। यह लगभग 30,000 सर्किट (सीकेटी) किमी के ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर और 40,000 से ज्यादा सीकेटी किमी के वितरण आधारभूत संरचना का प्रबन्धन करता है। यह 1.65 करोड़ उपभोक्ताओं की सेवा करता है और 45,000 MW बिजली की आपूर्ति करता है। इसे हर साल लगभग 8,000 करोड़ का नुकसान हो रहा है। यूपीपीसीएल बड़े एकीकृत डिस्कॉम्स का एक शानदार उदाहरण है, जो तकनीकी प्रगति के कारण बन्द होने की कगार पर है।

भारत में डिस्कॉम्स दिवालिया हो चुके हैं और सरकार से मिली सहायता पर जीवित हैं। सभी डिस्कॉम्स के लिये नवीनतम आँकड़े 2014-15 के हैं। उस साल डिस्कॉम्स को 1 लाख करोड़ का नुकसान हुआ। उनका कुल बकाया कर्ज 4.07 लाख करोड़ रुपए का था। इनका नेटवर्थ माइनस (ऋणात्मक) 2.43 लाख करोड़ रुपए का था। आज समग्र तकनीकी और वाणिज्यिक नुकसान 25 प्रतिशत है। इस मुद्दे पर विचार करने लायक सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा यह है कि उच्च नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता और लक्ष्य वाले राज्यों में डिस्कॉम्स की वित्तीय हालत बहुत ही खराब है। अगर हम नई और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमओएनआरई) द्वारा निर्धारित 2022 के लक्ष्य पर विचार करते हैं, ज्यादातर नवीकरणीय ऊर्जा, 175 GW का 83 प्रतिशत 10 राज्यों में स्थापित होना है। भारत में ये शीर्ष 10 राज्य डिस्कॉम्स की खराब बैलेंस शीट का बड़ा हिस्से के जिम्मेदार हैं। ये राज्य 2014-15 के कुल घाटे का 72 प्रतिशत और संचित घाटे के 73.5 प्रतिशत के लिये जिम्मेदार थे। इन 10 राज्यों के डिस्कॉम्स के हिस्से में कुल बकाया ऋण का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा था।

नवीकरणीय ऊर्जा का बड़े पैमाने पर पैठ डिस्कॉम्स को और अधिक अप्रासंगिक बना देगा। नवीकरणीय ऊर्जा परामर्श फर्म, ब्रिज टू इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, डिस्कॉम्स द्वारा वाणिज्यिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिये लगाया जा रहा शुल्क इतना अधिक है कि वर्तमान में उपभोक्ताओं के लिये सोलर रूफटॉप में स्थानान्तरित होना ज्यादा व्यावहार्य है। 2020 तक, सभी राज्यों में सोलर रूफटॉप वाणिज्यिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिये बिजली का सबसे सस्ता स्रोत होगा। वास्तव में, 2020 में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और आंध्र प्रदेश जैसे सभी बड़े राज्यों में, वाणिज्यिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं के लिये ग्रिड टैरिफ के मुकाबले सोलर रूफटॉप सस्ता होगा। ये उच्च-भुगतान वाले उपभोक्ता सोलर रूफटॉप की ओर जाएँगे तो इससे डिस्कॉम्स पर वित्तीय दबाव ज्यादा आएगा।

वास्तव में, बड़ी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना एक बड़ा खतरा डिस्कॉम के लिये होने वाला है। विद्युत अधिनियम 2003 के तहत, 1 MW या इससे अधिक लोड कनेक्शन वाला एक उपभोक्ता डिस्कॉम्स की जगह खुले बाजार से बिजली खरीद सकता है। उन्हें ग्रिड का उपयोग करने के लिये भुगतान करना होगा। एक ओपेन एक्सेस (खुली पहुँच) वाला उपभोक्ता MW स्केल नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना स्थापित कर सकता है और उस ऊर्जा का उपभोग करने के लिये ग्रिड का इस्तेमाल कर सकता है।

2016 में प्रयास एनर्जी समूह द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट “इंडियाज जर्नी टुवर्ड्स 175 जीडब्ल्यू रीन्यूएबल्स बाई 2022” के अनुसार, विभिन्न राज्यों में खुली पहुँच के माध्यम से मिलने वाली सौर ऊर्जा की लागत वाणिज्यिक और औद्योगिक उपभोक्ताओं के उपयोगिता शुल्क से सस्ता है। आगे, सौर ऊर्जा और भण्डारण प्रौद्योगिकी की कम लागत के साथ ही ओपेन एक्सेस (खुली पहुँच) भविष्य में गेम चेंजर साबित हो सकता है। यह सम्भव है कि एक दशक के भीतर, उच्च-भुगतान वाले उपभोक्ता डिस्कॉम्स से दूर चले जाएँ। वे अपनी खुद की बिजली भण्डारण सुविधा वाले अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना कर लेंगे और 24 घंटे बिजली की आपूर्ति में सक्षम हो जाएँगे। वे ग्रिड और स्थानीय वितरण नेटवर्क का उपयोग करेंगे और ग्रिड ऑपरेटर को पावर ट्रांसमिट करने के लिये भुगतान शुल्क दे देंगे।

एक बार अगर ऐसा होता है, तो यह डिस्कॉम्स को अव्यवहार्य बना देगा। बड़े उपभोक्ता बड़े विकेन्द्रीकृत परियोजनाओं और छोटे उपभोक्ता सोलर रूफटॉप की ओर चले जाएँगे और एकीकृत प्रणालियों का निर्माण करेंगे। तब नवीकरणीय ऊर्जा दुनिया को ग्रिड इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने और चलाने के लिये अलग संचरण और वितरण ऑपरेटरों की जरूरत होगी। वितरण कम्पनियों का काम, ट्रांसमिशन कम्पनियों जैसी, वितरण आधारभूत संरचना को बनाए रखना और शुल्क लगाना है। कोई भी निर्माता, व्यापारी या समूह ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग कर सकेगा और उपभोक्ताओं को बिजली प्रदान करने में सक्षम हो जाएगा।

स्मार्ट ग्रिड के साथ विद्युत क्षेत्र का बिखराव उस तरीके को बदल देगा जिस तरीके से हम अभी बिजली का उत्पादन और उपभोग करते हैं। इसमें क्रान्तिकारी बदलाव आ जाएँगे। हमारे पास हजारों ‘प्रोज्यूमर्स’ होंगे जो बिजली खरीदेंगे और बेचेंगे, हजारों मिनी-ग्रिड और लाखों ऑफ-ग्रिड होंगे। जर्मनी की तरह, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का स्वामित्व नागरिक, पंचायत, सहकारी समितियों, कारखानों और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों के पास होगा न कि बड़ी कम्पनियों के पास।

वर्चुअल पावर कम्पनियाँ उभरेंगी। वे लोगों की छतों और अक्षय ऊर्जा संयंत्रों से उत्पन्न बिजली एकत्र करेंगी और अन्य उपभोक्ताओं को बेच देंगी। उनके पास स्वयं की कोई सम्पत्ति नहीं होगी। बिजली क्षेत्र में यह ‘ऊबेर मॉडल’ की तरह होगा। ऊर्जा भण्डारण कम्पनियाँ भी उभरकर सामने आएँगी, जो बड़े स्तर पर बिजली भण्डारण उपकरणों को स्थापित कर सकेंगी और ग्रिड को बिजली प्रदान करेंगी।

उपभोक्ताओं के लिये दक्षता उत्पाद (एफिशिएंसी प्रोडक्ट) बेचने वाली ऊर्जा दक्षता सेवा कम्पनियाँ (एनर्जी एफिशिएंसी सर्विस कम्पनीज) हमारे पास होंगी। ये बाजार भी बड़ा हो जाएगा। ये एनर्जी सर्विस कम्पनियाँ ऊर्जा सेवा, जैसे लाइटिंग, हीटिंग, कूलिंग बेचेंगी, बिजली नहीं। एक बार ऐसा होने पर, हम वाट की दुनिया में रहेंगे न कि किलोवाट की दुनिया में क्योंकि सुपर-एफिशिएंट उपकरण मानक बनाए जाएँगे।

उच्च नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता वाले राज्यों का सबसे कमजोर विद्युत वितरण तंत्र जैसे ई-वाहन ऑटोमोबाइल क्षेत्र का सबसे बड़ा हिस्सा होगा, भवन और वाहन एकीकृत होंगे। मौजूदा पेट्रोल पम्प विद्युत चार्जिंग कम्पनियों में बदल दिया जाएगा, क्योंकि बैटरी 10 मिनट से कम समय में चार्ज हो जाएगी। उत्पादन में वृद्धि होगी, बिजली का ऑन साइट उपयोग होगा और सरप्लस को ग्रिड में भेज दिया जाएगा। कल का ग्रिड आज के इंटरनेट की तरह होगा। उपरोक्त दुनिया में, हमारे पास कुछ बड़े जनोपयोगी (यूटिलिटी) सेवाएँ होंगी (यहाँ तक कि जीवाश्म ईंधन आधारित)। लेकिन वे लोड सन्तुलन के लिये आपातकालीन उपयोग (स्टैंडबाय) पर होंगे। वे लचीले होंगे। उनका स्टैंडबाय पर रहने के लिये फीड-इन-टैरिफ देना होगा।

लेकिन गरीबों का क्या होगा? अगर अमीर विकेन्द्रीकृत अक्षय ऊर्जा पर चले जाएँगे तो गरीबों को सब्सिडी कौन देगा? इसका उत्तर यह है कि अमीर ग्रिड और वितरण नेटवर्क के संचालन को सब्सिडी देंगे। जैसा कि वे इन बुनियादी ढाँचे का उपयोग करेंगे, उन्हें गरीबों को सब्सिडी देना चाहिए। जहाँ तक बिजली का सम्बन्ध है, सरकार गरीबों को न्यूनतम बिजली आवश्यकता प्रदान करने के लिये सीधे सब्सिडी दे सकती है। यह एकमात्र तरीका है, जिससे भारत बिजली क्षेत्र को कार्बनरहित कर सकता है और सभी को ऊर्जा तक पहुँच प्रदान कर सकता है। लेकिन क्या सरकार ऐसे भविष्य के लिये कल्पना और योजना बना रही है? जवाब है, नहीं। कोयले के अन्त के बारे में बात करना निषेध है। बड़ी डिस्कॉम्स के खत्म होने की भविष्यवाणी बेतुका माना जाता है। लेकिन तथ्य यह है कि सरकार इस बारे में नीतियों और योजनाओं के बारे में सोच रही है, हालाँकि ये तरीका थोड़ा विखंडित है। 2050 तक कोयला खत्म हो सकता है और इससे भी पहले वितरण क्षेत्र समाप्त हो जाएगा।

सरकार आक्रामक रूप से बड़ी नवीकरणीय ऊर्जा और विकेन्द्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा दे रही है। सभी राज्यों में सोलर रूफटॉप के लिये नेट मीटरिंग नीति अपनाई जा रही है। ओपन एक्सेस की अनुमति है लेकिन डिस्कॉम्स द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है। सरकार ने ई-वाहनों के लिये एक महत्वाकांक्षी योजना भी बनाई है, जिसका परिवहन क्षेत्र और बैटरियों के अर्थशास्त्र पर बड़ा प्रभाव होगा। यह उपकरणों और इमारतों में ऊर्जा दक्षता के लिये स्टार रेटिंग को बढ़ावा दे रहा है। हालाँकि, इस पर और अधिक आक्रामक होने की जरूरत है।

सरकार स्मार्ट ग्रिड और स्मार्ट मीटर में निवेश कर रही है। और आज की राजनीति यह माँग करती है कि जल्द ही सभी को बिजली तक पहुँच प्रदान की जाए। यदि सभी सुधारों को एक साथ रखा जाता है, तो मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले की सुनिधि का सपना 2030 तक सच हो जाएगा।

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