बाँस मिशन आर्थिक समृद्धि का जरिया

Submitted by editorial on Sat, 06/09/2018 - 18:07
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योजना, अप्रैल 2018

पारम्परिक किसानों का तजुर्बा यह कहता है कि मक्का या बाजरे के साथ चावल की खेती करने पर प्रदर्शन बेहतर रहता है। आमतौर पर विभिन्न समुदाय के लोग अलग-अलग तरीके से खेती करते हैं। मसलन झूम खेती और दूसरी प्रणाली सीढ़ीनुमा खेती की है। सीढ़ीनुमा खेती को घाटियों और पहाड़ियों में अंजाम दिया जाता है, जबकि जंगल और आसपास के इलाकों में सिफ्टिंग या झूम सिस्टम के जरिए खेती की जाती है। यह खेती की बेहद पुरानी परम्परा है।

पूर्वोत्तर भारत की कोई भी कहानी चुनौतियों से उबरने और लचीलेपन की इसकी अन्तनिर्हित ताकत के जिक्र के बिना अधूरी है। कृषि प्रबन्धन और खेती की पारम्परिक प्रणालियाँ इस ताकत के मुख्य हिस्सा हैं। चाहे पहाड़ी हो या घाटी, यहाँ के सभी इलाकों में कृृषि से जुड़े लोगों की आजीविका का मुख्य साधन है। इस इलाके में खेती का अहम सकारात्मक पहलू यह है कि इससे जुड़ी पारम्परिक व्यवस्था पर्यावरण व चावल, मोटे अनाज और अन्य फसल उगाने वाले देशी समुदाय के पारम्परिक ज्ञान से जुड़ी हुई है। इन वजहों से पूर्वोत्तर के राज्यों के लोगों ने इस इलाके में जरूरी पारिस्थितिकी सम्बन्धी सन्तुलन बनाए रखा है।

जनजातीय समुदाय समेत यहाँ के मूल निवासियों ने खेती की पारम्परिक प्रणाली, कृषि जैवविविधता और इससे जुड़े ज्ञान को बरकरार रखा है। किसान आमतौर पर झूम परम्परा का पालन करते हैं या खेती के तौर-तरीकों मेें बदलाव करते हैं। जनजातीय समुदाय और अन्य समुदायों द्वारा जैव-संसाधनों का उपयोग देशी और पारम्परिक ज्ञान पर आधारित है, जो इन चीजों के इस्तेमाल में मदद करता है।

यहाँ के स्थानीय किसान खेती की अपनी व्यवस्था में स्थानीय स्तर के लिहाज से तैयार अहम और गैर-अहम फसलों पर काम करते रहे हैं। इससे उन्हें जोखिम और मुश्किल परिस्थितियों से बचाव में मदद मिलती है। खेती की अलग-अलग प्रणालियों की उपज और ऊर्जा दक्षता फसलों से जुड़ी खेती के तौर-तरीके पर निर्भर करती है।

मिशाल के तौर पर इस इलाके में पारम्परिक किसानों का तजुर्बा यह कहता है कि मक्का या बाजरे के साथ चावल की खेती करने पर प्रदर्शन बेहतर रहता है। आमतौर पर विभिन्न समुदाय के लोग अलग-अलग तरीके से खेती करते हैं। मसलन झूम खेती और दूसरी प्रणाली सीढ़ीनुमा खेती की है। सीढ़ीनुमा खेती को घाटियों और पहाड़ियों में अंजाम दिया जाता है, जबकि जंगल और आसपास के इलाकों में सिफ्टिंग या झूम सिस्टम के जरिए खेती की जाती है। यह खेती की बेहद पुरानी परम्परा है। इसके तहत पहाड़ियों की ढलानों पर मौजूद जमीन पर मौजूद जंगल को हटाकर सुखाया जाता है और मानसून के आगमन से पहले इस जंगल को जला दिया जाता है। इसके बाद इस जमीन पर फसल लगाई जाती है।

झूम चक्र का मामला मूल रूप से बेहद सफल रहा है। हालांकि, जनसंख्या में बढ़ोत्तरी और जमीन पर बढ़ते दबाव के कारण झूम चक्र की अवधि काफी घट गई। इससे जमीन की गुणवत्ता को लेकर भी समस्या पैदा हुई और इस इलाके की पारिस्थितिकी को लेकर भी खतरा पैदा हो गया।

नवोन्मेष बेहद अहम

बहरहाल, पूर्वोत्तर के आदिवासी किसान कौशल और काबिलियत का इस्तेमाल कर सकते हैं। नतीजतन, वे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल कर सकते हैं। इसी तरह की एक प्रणाली हैः सीढ़ीनुमा खेती की सिंचाई का चलन। यहाँ सीड़ी को बनाए रखने और मिट्टी के कटाव की समस्या को रोकने के लिये देशी तरीके से पत्थर और टाट के बोरे का इस्तेमाल किया जाता है। पहाड़ों की धाराओं को नियंत्रित कर सीढ़ियों में पानी के लिये गुंजाईश बनाई जाती है। इस सिस्टम में पानी लगातार ऊपर से नीचे की सीढ़ियों की ओर बहता है। सिंचाई की यह व्यवस्था गैर-उपजाऊ जमीन में बेहद कारगर रही है।

खासतौर पर चावल की खेती के मामले में। विशेषज्ञों की मानें तो इस चलन का एक अहम सकारात्मक पहलू यह है कि ढलान के ऊपरी हिस्से से तेज बहाव वाले पानी में भरपूर पौष्टिक तत्व होते हैं। सीढ़ी बनाकर की जाने वाली खेती मुख्य तौर पर चावल की फसल के लिये की जाती है। इसके अलावा ऊपरी ढलान पर मक्का, बीन और आलू जैसी फसलों की भी बुआई की जाती है। लिहाजा, जाहिर तौर पर ज्यादा पानी की खपत करने वाले फसलों मसलन चावल और जूट की खेती निचली ढलानों की जाती है।

जहाँ तक खेती के चलन से जुड़ी कड़ी मेहनत की बात है, तो पूर्वोत्तर के किसान, खासतौर पर नागालैण्ड, मेघालय और मणिपुर के किसानों को लम्बे समय से ‘आर्थिक लाभ’ की अहमियत की समझ रही है। ऐसे में देशी लोगों के बीच ‘पेड़ आधारित खेती की प्रणाली’ को भी प्रोत्साहित किया गया है। इसके तहत फसल के उत्पादन की प्रक्रिया में पेड़ों को बड़े पैमानेे पर फसलों से जोड़ा जाता है। खेती सम्बन्धी जलवायु हालातों पर भी ध्यान दिया जाता है। इसके तहत भोजन, फाइबर, दवा और अन्य छोटे कृषि उत्पाद के लिये पेड़ों की प्रजातियों को तैयार किया जाता है।

जमीन का इस्तेमाल सब्जियों, फल जंगल और जंगली पेड़ों की प्रजातियों, पौधारोपण वाली और अन्य फसलों के लिये किया जाता है। यह पाया गया है कि खेती की पारम्परिक व्यवस्था में बहुउद्देशीय पेड़ों और झाड़ियों की अहमियत का आकलन इस्तेमाल और आर्थिक लाभ के आधार पर किया गया है। जहाँ तक टिकाऊ व्यवस्था और आर्थिक सुधार की बात है, तो पूर्वोत्तर के लोग लम्बे समय से बाँस पर निर्भर रहे हैं।

बाँस जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का अहम हिस्सा है। पूर्वोत्तर इलाके में बाँस की खेती का मामला काफी व्यापक है। इस इलाके के जनजातीय समुदाय और मैदानी इलाकों में रहने वाले लोगों की जीवनशैली में बाँस पर निर्भरता काफी ज्यादा है। ये लोग विभिन्न जरूरतों में बाँस का उपयोग करते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि आधुनिक समाज के सामाजिक-आर्थिक विकास बाँस का अहम योगदान है। पर्यावरण के लिहाज से अनुकूल बाँस की फसल में इस इलाके की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, औद्योगिक विकास को बेहतर करने और मजबूत आर्थिक आधार तैयार करने की सम्भावना है।

हरा सोना

केन्द्रीय बजट 2018-19 में बाँस को ‘हरा सोना’ बताया है। यह बिल्कुल सही है। ‘बाँस’ मुख्य तौर पर घास की एक किस्म है, लेकिन एक सदी पहले पेड़ के तौर पर इसका वर्गीकरण कर दिये जाने से पूर्वोत्तर के लोग इस कमोडिटी का अधिकतम इस्तेमाल करने से वंचित हो गए। देश के कुल बाँस उत्पादन में पूर्वोत्तर भारत की हिस्सेदारी तकरीबन 68 फीसदी है। अनुमानों के मुताबिक, दुनिया के कुल बाँस संसाधनों में भारत की हिस्सेदारी 30 फीसदी है, लेकिन वैश्विक बाजार में इसका योगदान सिर्फ 4 फीसदी है। असली दिक्कत इसके कम उत्पादन को लेकर है और ऐसे में भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया बाँस मिशन काफी अहम है। यह केन्द्र सरकार की प्रायोजित योजना है।

इसकी 100 फीसदी फंडिंग भारत सरकार करेगी और इसका मकसद राज्यों के साथ मिलकर खास मकसद हासिल करना है। मसलन बाँस और बाँस आधारित हस्तकला को बढ़ावा देना और कौशल वाले और बिना कौशल वाले लोगों (खासतौर पर बेरोजगार युवाओं) के लिये रोजगार के मौके पैदा करना।

पूर्वोत्तर में बाँस उगाने वाले पारम्परिक किसानों और अन्य लोगों ने कई पीढ़ियों से तमाम ग्रामीण-शहरी फायदों के लिये बाँस का इस्तेमाल किया है। लोगों ने बाँस का पर्याप्त व्यावसायिक इस्तेमाल किया है बाँस को वर्षों ना कटाई के साथ बिना खेती वाली जमीन पर भी उगाया जा सकता है।

औद्योगिक फायदों के अलावा बाँस की शाखाओं का इस्तेमाल पौष्टिक आहार के तौर पर भी किया जा रहा है। इसमें औषधीय गुण भी हैं। मिजोरम, त्रिपुरा और नागालैण्ड जैसे राज्यों में बाँस उत्पादकों के बीच यह बात भी मशहूर है कि बाँस जमीन की सुरक्षा में भी काम आता है और इससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है। इससे मिट्टी की पानी संचय की क्षमता भी बेहतर होती है।

सरकार ने नवम्बर 2017 में बाँस को ‘पेड़ों’ की सूची से हटा दिया और बाँस को काटने, इसकी आवाजाही और इसके संसाधन के इस्तेमाल सम्बन्धी नियमों में ढील दे दी गई। इसके साथ ही बाँस पर से 90 वर्षों पुरानी पाबन्दियाँ हट गईं व बाँस से जुड़े उत्पादों के बेरोकटोक निर्यात को बढ़ावा मिला और इस बाबत नए मौके पैदा हुए। इस बीच, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश की राज्य सरकारों ने भी असम की नुमालीगढ़ रिफाइनरी की आगामी बायो-रिफाइनरी के लिये बाँस की सप्लाई करने पर सहमति जताई है। इस सम्बन्ध में आर्थिक गतिविधियों की शुरुआत हो चुकी है।

हालांकि, इन गतिविधियों से सरकार पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं है और उसने नई रणनीति पर काम करने का फैसला किया है, ताकि बाँस की खेती से जुड़े किसानों के लिये यह ‘आमदनी पैदा करने का स्थायी साधन’ बन सके। कई राज्यों में बाँस के काम से जुड़े देशी समूहों को इससे फायदा होगा।

केन्द्रीय वित्त मंत्री ने बजट 2018-19 में राष्ट्रीय बाँस मिशन पर फोकस कर नए सिरे से काम करने के लिये इसके लिये 1,290 करोड़ रुपए आवंटित किये थे। एक आधिकारिक अनुमान के मुताबिक, त्रिपुरा जैसे राज्य में बाँस सेगमेंट को आजीविका के मुख्य साधन के तौर पर विकसित किया जा सकता है और इसकी खेती से जुड़े कम-से-कम 20,000 किसानों को सम्मानजनक रोजगार के मौके मुहैया कराए जा सकते हैं।

इस इलाके में बाँस के कई उत्पाद भी देखे जा सकते हैं। इनमें से कुछ इस तरह हैंः बाँस का अचार, बाँस सिरका, फूलदान अगरबत्ती की छड़ी, मोबाइल कवर, टूथ पिक, कलम रखने वाला स्टैंड, फर्नीचर, जेवर, खाने वाली शाखाएँ, ताबूत, झाड़ू, फोटो फ्रेम, हैंगर, एश ट्रे, सीढ़ी और यहाँ तक कि पानी के बोतल का कवर भी।

अपनी पारम्परिक कला से लैस स्थानीय कारीगर बाँस से बनी खूबसूरत टोपी बनाते हैं। बाँस और बेत से बनी टोपी और अन्य उत्पादों के निर्यात की जबरदस्त सम्भावना है, लेकिन इसके बाजार का पूरी तरह से फायदा नहीं उठाया गया है। इस सिलसिले में निजी खिलाड़ियों और कारपोरेट घरानों को शामिल करने के लिये प्रोत्साहित करना पूर्वोत्तर के लिये काफी फायदेमन्द होगा।

यहाँ इस बात का भी उल्लेख करना जरूरी है कि किसानों के लिये अनाज रखने की खातिर डिब्बा तैयार करने में भी बाँस बेहद उपयोगी है। अलग-अलग साइज के बाँस के डिब्बे या धानी में धान रखा जाता है। बीज को सुरक्षित रखने के लिये भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। बीज के लिये धान को बाँस से बने खास डिब्बे (कंटेनर) में रखा जाता है। मेघालय में इस डिब्बे को थियार के नाम से जाना जाता है। थियार को बाँस के पतले-पतले टुकड़ों से बुना जाता है। साथ ही, इसके अन्दर धान के पुआल की मोटी परत लगाई जाती है। इसी तरह, मेघालय की खासी जनजाति द्वारा बनाई गई लकड़ी की धानी को दुली कहा जाता है। यह दोहरी परत वाला बाँस का बास्केट होता है और इसके दोनों तरफ गोबर और कीचड़ से पोत दिया जाता है। यह धानी अनाज को सुरक्षित रखने के लिये सबसे बेहतर व्यवस्था है। साथ ही, इस इलाके के कुछ हिस्से में ऐसे डिब्बों में मक्का रखा जाता है। कभी-कभी चूहों को भगाने के लिये इसमें ऊपर में शंकु के आकार का बाँस का बक्सा भी लगाया जाता है।

निष्कर्ष

तमाम विश्लेषणों के बाद आखिर में इस बात को रेखांकित करना जरूरी है कि पूर्वोत्तर क्षेत्र की खेती सम्बन्धी गतिविधियों को जैविक खेती के नाम से भी जाना जाता है। 8 जनवरी को प्रधानमंत्री ने सिक्किम को जैविक राज्य घोषित कर दिया। इसके बाद इस क्षेत्र में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिये केन्द्र सरकार की योजना-पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिये अॉर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट मिशन शुरू किया गया। दरअसल, 2015-2018 के दौरान इस सम्बन्ध में 400 करोड़ रुपए की रकम आवंटित की गई। भारत सरकार ने भी परम्परागत कृषि विकास योजना नामक अभियान के तहत देश में जैविक खेती के रकबे में बढ़ोत्तरी पर ध्यान दिया है।


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