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भारत में जलवायु परिवर्तन: संकट में मानवीय स्वास्थ्य

Author: 
सोहन पाल सिंह
Source: 
विभाग भूगोल डी. बी. एस. (पी. जी.) कालिज, देहरादून (उत्तराखण्ड)

सारांश


कहा जाता है कि ‘‘धरती मानव की नहीं होती बल्कि मानव धरती का होता है।’’ किन्तु मानव जाति ने बिना कुछ समझे सदैव अपने लाभ के लिये इस अमूल्य धरा पर नियंत्रण करने और उसका शोषण करने का प्रयास किया है। इस धरा पर बढ़ती जनसंख्या और अपने जीवन स्तर के उन्नयन की मनुष्य की लगातार बढ़ती आकांशा के फलस्वरूप नये-नये तकनीकी आविष्कार हुए हैं। इन सभी आविष्कारों और नवाचारों ने जीवन को अधिक आरामदेय तो बना दिया, लेकिन इसके बदले, भोजन, वायु, जल खनिज एवं ऊर्जा की मांग बढ़ गई है। किन्तु इन नवीकरण की पृथ्वी की क्षमता सीमित होने के कारण ये संसाधन भी सीमित है।

वर्तमान में हमारे इस जीवमण्डल के प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से क्षरण ने यहाँ वैश्विक जलवायु में गम्भीर परिवर्तन किये हैं, जो मानव एवं अन्य प्राणी जातियों के अरित्व पर गम्भीर प्रभाव पड़े हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूल नहीं हो पाने के कारण डायनासोर व अन्य जीव अपना अस्तित्व न बचा सके हैं। प्राकृतिक, मशीनी व नृवैज्ञानिक प्रक्रियाओं जैसे कार्बन डाइआक्साइड, मीथेन आदि ग्रीन हाउस गैसों के कारण जीव मण्डल की जलवायु में हुए दीर्घ कालिक परिवर्तनों को जलवायु परिवर्तन कहा जाता है। ये गैस वायुमण्डल में जमा होकर तापमान को बढ़ाती है और इससे जलवायु में परिवर्तन होता है।

ऋतु परिवर्तन, वैश्विक तापमान वृद्धि, समुद्र स्तर में वृद्धि, फसल चक्र में परिवर्तन, आदि अन्य जलवायु परिवर्तन न केवल हमारे बल्कि हमारे बच्चों और बच्चों के बच्चों के लिये भी भूस्खलन, सूनामी, महामारी, पलायन एवं स्वास्थ्य के लिये बड़ी आपदायें हैं।

अतः इस विषय पर महात्मा गाँधी जी ने कहा था, कि ‘‘धरती पर सभी की आवश्यकताओं के लिये पर्याप्त संसाधन है, उनके लालच के लिये नहीं,’’ भविष्य की रक्षा करने व भावी पीड़ा को प्राकृतिक विरासत सौपने के लिये पूरा विश्व एक साथ आ रहा है, इसलिये हम ऐसी दुनिया बनाने की आशा कर रहे हैं जहाँ हर किसी की आवश्यकता के लिये संसाधन तैयार कर सके।

प्रस्तावना


जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि हाल के वर्षों में जिस तेजी से भारत में जलवायु परिवर्तन हो रहा है उतनी तेजी से पिछले 100 वर्षों में कभी नहीं हुआ। यहाँ के वर्तमान कार्बन उत्सर्जन की दर को देखते हुए वैज्ञानिकों ने अंदेशा जताया है कि वर्ष 2030 तक भारत का औसत तापमान लगभग 1° बढ़ जायेगा। यदि जलवायु परिवर्तन का यहि हाल रहा तो गर्मियों में भारत के उत्तर में कश्मीर व उत्तराखण्ड में हिम नहीं दिखायी देंगे। इस प्रकार यदि जीवमण्डल में मौजूद कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा को कम करने के लिये समय रहते कारगर कदम नहीं उठाये गये तो यहाँ की नदियों का जल स्तर बढ़ेगा, भयंकर आंधियाँ, तूफान, बाढ़, के साथ-साथ असहनीय गर्मी यहाँ के लोगों को झेलनी होगी।2

अध्ययन का उद्देश्य


प्रस्तुत अध्ययन का प्रमुख उद्देश्य भारत में जलवायु परिवर्तन का मानवीय स्वास्थ्य पर पड़ते हानिकारक प्रभाव की तरफ ध्यान आकर्षित करना।

विधि तंत्रः- प्रस्तुत अध्ययन में अवलोनात्मक एवं वर्णनात्मक विधितंत्रों का प्रयोग करते हुए भारत में बढ़ते जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की विवेचना प्रस्तुत की है।

अध्ययन क्षेत्रः- भारत एक चतुर्भुजाकार की आकृति में 8°4‘‘ उत्तरी अक्षांश से 37°6’’ उत्तरी अक्षांश तक एवं 68°7’’ पूर्वी देशान्तर से 97°25’’ पूर्वी देशान्तर के बीच विस्तृत है। इस क्षेत्र की जलवायु उष्ण कटिबंधीय मानसूनी प्रकार की है। इस क्षेत्र में उत्तर व उत्तर पूर्व, द. एवं दक्षिण पूर्व तथा मध्य भाग वर्तमान में जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप ताप वृद्धि के कारण बाढ़ एवं नयी-नयी बिमारियों की चपेट में आ रहे हैं। इन सब समस्याओं की वजह जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता तापमान है।3 जलवायु परिवर्तन से विकास की गति के लिये बड़ा खतरा अब भारत में भी उत्पन्न हो गया है। इसका पहला चरण यहाँ बाढ़, सूखा, गर्म हवाएँ, चक्रवात, आंधी, समुद्र की लहरें आदि है और वहीं दूसरे कारण (अवसंरचना, दायरा और सेवाओं) परितंत्रो का क्षरण या बदलाव, खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट, जल उपलब्धता की कमी तथा आजिविका पर नकारात्मक प्रभाव आदि हैं। इसका कारण लोगों की प्राकृतिक और मानव जनित आपदाओं की चपेट में आने की आशंकाएँ बढ़ रही है।4

अतः भारत में जलवायु परिवर्तन से बढ़ती समस्याओं के निस्तारण हेतु संयुक्त राष्ट्र महा सभा की 70वीं वर्ष गाँठ पर अमेरिका में बोलते हुए मोदी जी ने पर्यावरण का जिक्र करते हुए कहा कि अगर हम जलवायु परिवर्तन की चिन्ता करते हैं तो यह हमारे नीजि सुख को सुरक्षित करने की बू आती है, लेकिन यदि हम क्लाइमेट जस्टिस की बात करते हैं, तो गरीबों को प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखने का एक संवेदनशील संकल्प उभरकर आता है। क्योंकि जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव सबसे ज्यादा इन्हीं निर्धन व वंचित लोगों पर होता है। जब प्राकृतिक आपदा आती है, तो ये बेघर हो जाते हैं, जब भूकम्प आता है, तो इनके घर तबाह हो जाते है।5

जब सूखा पड़ता है उसका भी सबसे ज्यादा प्रभाव इन्हीं लोगों पर होता है, इसीलिये मैं मानता हूँ कि चर्चा जलवायु परिवर्तन की बजाए जलवायु न्याय पर हो। अतः हमें क्लाइमेट चेंज की चुनौती से निपटने में उन समाधानों पर बल बल देने की आवश्यकता है, जिनसे हम अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल हो सके। साथ ही एक ग्लोबल एजुकेशन प्रोग्राम शुरू करने की आवश्यकता है, जो हमारी अगली पीढ़ी को प्रकृति के क्षरण एवं संवर्धन के लिये तैयार कर सके क्योंकि ऐसा किये बिना शान्ति, न्यायोचित व्यवस्था और सतत विकास सम्भव नहीं हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन के कारण फटता बादल भारत में पिछले कुछ वर्षों की समस्या को गौर से देखा जाये तो जलवायु परिवर्तन का प्रभाव प्रत्यक्ष दिखाई देने लगा है। जैसे अगस्त 2010 को लेह शहर बादल फटने के कारण तबाह हो गया था। इस कहर में 200 लोग मरे थे, एक घन्टे के अन्दर 250 मिली. मीटर की बारिश हुए थी, जून 2013 में उत्तराखण्ड में बारिश से महात्रासदी, सितम्बर 2014 में जम्मू-कश्मीर ने 60 वर्षों की सबसे भयानक बाढ़ के अभिशाप को झेला जिसमें छःलाख लोग प्रभावित हुए और लगभग 200 से ज्यादा लोग मरे।6

भारत एक कृषि प्रधान देश है यह कोई रहस्य की बात नहीं है। देश की दो-तिहाई आबादी कृषि पर निर्भर है और खाद्यान्न उपलब्ध कराने के कारण इस पर नकारात्मक प्रभाव समूची मानव जाति को प्रभावित करेगा ऐसा तय है। भारत की अधिकांश कृषि मानसून पर निर्भर है जिसके कारण मानसून देश का असली वित्त मंत्री है।

मानसून का प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। तापमान वृद्धि के कारण मानसून बेहद अस्थिर, मनमौजी और प्राकृतिक रूप से संचालित हो रहा है। जिसका आकलन करना व स्पष्ट व्याख्यान करना मुश्किल है। अप्रत्याशित मौसम के अनेक समाचार देश के विभिन्न भागों से मिल रहे हैं। रबी की कटाई के समय बे-मौसम बारिश और आंधी तूफान से तैयार फसल की क्षति हुई। फसल की बर्वादी से त्रस्त हो लगभग हजारों किसानों ने आत्महत्या कर ली। इससे पहले देश के कई भागों में ओलावृष्टि से बहुत नुकसान हुआ था।

देश में वर्तमान दलहन की फसल पूरी तरह से मानसून बारिश पर निर्भर है, सूखे के कारण दलहन के उत्पादन में कमी आई जिसके चलते दाल का दाम 200 रूपये से अधिक हो गया था। दाल भारत की व्यापक आबादी की पौष्टिकता का आधार है। अतः जलवायु परिवर्तन के कारण देश में कुपोषण की भी सम्भावना है। वर्तमान में बे-मौसम बारिश व ताप वृद्धि से वातावरण मच्छरों के प्रजनन के लिये और अधिक अनुकूल कर दिया जिसमें डेंगू मच्छर का प्रकोप इस वर्ष बढ़ा है। भारत के लगभग कुछ उत्तर व मध्य एवं दक्षिण भाग में मलेरिया, चिकन्गुणिया, डेंगू, दस्त आदि से त्रस्त है। ये सब जलवायु परिवर्तन का परिणाम है।7

जलवायु परिवर्तन के कारणः- जलवायु परिवर्तन के कारणों को दो भागों में बाँटा जा सकता है

(1) प्राकृतिक कारण
(2) मानवीय कारण

प्राकृतिक कारणः- जलवायु परिवर्तन के लिये अनेक प्राकृतिक कारक उत्तदायी हैं, इनमें से प्रमुख महाद्वीपीय प्लेटों का खिसकन, ज्वालामुखी, समुद्री तरंगे भूकम्प आदि।

मानवी कारणः- मानवीय कारकों का जलवायु परिवर्तन में एक अहम सेल है। मानव अपनी क्रिया-कलापों के द्वारा जलवायु में परिवर्तन करता है। इसके प्रमुख कारण ग्रीन हाऊस, उद्योग धन्धें, परमाणु परीक्षण, रायायनिक पदार्थों का उपयोग, संसाधनो का विदोहन एवं ओजोन ह्रास आदि है।8

ग्रीन हाउसः-
मानव द्वारा कोयला, पेट्रोल आदि जीवाश्म ईंधन का अत्याधिक उपयोग करने एवं वन विनाश, और अपघटित न होने वाले पदार्थ अर्थात प्लास्टिक का प्रयोग, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक के प्रयोग ग्रीन हाउस को उत्पन्न करते हैं।

उद्योग-धन्धेः- मानव अपने स्वयं के विकास के लिये अनेक क्रिया-कलाप करता है। इनमें उद्योग-धन्धे, फैक्ट्रियां आदि का निर्माण करता है तथा इनसे निकलने वाली गैसें व अपशिष्ट वातावरण में परिवर्तन उत्पन्न करती है, जो जलवायु परिवर्तन में सहायक है।

परमाणु परिक्षणः- मानव द्वारा समय-समय पर परमाणुओं का परिक्षण किया जाता है। इसका प्रभाव लम्बे समय तक रहता है, जो जलवायु परिवर्तन में अपना योगदान देते हैं।

रासायनिक पदार्थों का उपयोगः- रासायनिक खाद व उर्वरक तथा कीटनाशक अत्यधिक उपयोग के कारण इनसे निकलने वाली विषैली गैसें जलवायु परिवर्तन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

संसाधनों का विदोहनः- प्राकृतिक प्रदत्त उपहार को मानव अविवेक पूर्ण नीति से विदोहन कर रहा है, जो कि प्रकृति द्वारा स्थापित सन्तुलन में व्यावधान उत्पन्न करता है, जो जलवायु परिवर्तन के लिये जिम्मेदार है।9

भारत में जलवायु परिवर्तन का प्रभावः- जलवायु परिवर्तन से मानव पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 19वीं सदी के बाद भारतीय धरा के सकल तापमान में 0.5° से 1 डिग्री तक की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। ये तापमान में वृद्धि केवल बड़े पैमाने पर मामूली लग सकती है, लेकिन ये आगे चलकर महाविनाश का आधार ले सकती है।10

खेती/कृषिः- बढ़ती जनसंख्या के कारण भोजन की निरन्तर बढ़ती मांग में वृद्धि हो रही है। इससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव भारतीय कृषि पर पड़ रहा है। क्योंकि तापमान, वर्षा, आद्रता इत्यादि में बदलाव हुआ, जो कि मिट्टी की क्षमता को प्रभावित कर रहा है एवं इससे विषाणु फैलाने वाले जीव व बिमारियाँ उत्पन्न हो रही है, जो मिट्टी की उर्वरा शक्ति को धीरे-धीरे क्षीण कर रही है।

वर्षा का बदलता चक्र (जलवायु परिवर्तन) मौसम:-
मौसम गर्म होने पर वर्षा का चक्र प्रभावित होता है। इससे यहाँ बाढ़ या सूखे का खतरा बढ़ रहा है, अभी हाल में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार व पं. बंगाल में भीषण बाढ़ आयी, उत्तराखण्ड में गर्म मौसम की वजह से हिमखण्ड पिघल रहे हैं। आये दिन उत्तरी भारत में बादल फट रहे हैं। जो जलवायु परिवर्तन का प्रभाव है।

समुद्र के जलस्तर में वृद्धि:- जलवायु परिवर्तन का एक अन्य प्रमुख कारक है, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि। समुद्र के गर्म होने, बर्फ के पिघलने से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाली सदी में अन्तर समुद्र के जलस्तर में 1/2 मीटर की वृद्धि हो जायेगी। इससे अनेक दुष्परिणाम सामने आयेंगे। जैसे तटीय क्षेत्रों की बर्बादी, बाढ़, मिट्टी अपरदन, खारे पानी की वृद्धि इत्यादि से भारत के दक्षिणी भाग के तटीय जीवन अस्त-व्यस्त हो जायेगा एवं यहाँ खेती, पेय जल, मत्स्य पालन व मानव बसाव तहस नहस हो जायेगा।11

स्वास्थ्य:- वैश्विक ताप का भारतीय मानव जाति के स्वास्थ्य पर सीधा असर होगा। इससे गर्मी से सम्बन्धित बीमारियों, निर्जलीकरण, संक्रमक बिमारियों के प्रसार, कुपोषण एवं मानव स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।

जंगल और वन्य जीव:- प्राणी व पशु प्राकृतिक वातावरण में रहते हैं। ये जलवायु परिवर्तन के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं। यदि जलवायु में परिवर्तन का ये दौर इसी प्रकार से चलता रहा तो भारतीय सर जमीन से काफी पशु-पक्षी विलुप्त हो जायेंगे तथा कुछ विलुप्त हो भी गये हैं।12

निवारण:- इस दिशा में कुछ सकारात्मक पहल करके भारतीय परिसीमा में जलवायु परिवर्तन के होते विकराल रूप का समाधान किया जा सकता है।

1. जलवायु परिवर्तन के लिये मुख्य उत्तरदायी गैस कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा में कमी लाने के लिये जीवाश्म ईंधन की जगह प्राकृतिक स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि विकल्पों का अधिकाधिक प्रयोग किया जाये।

2. वनों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगाई जाये तथा भारतीय बेकार एवं खाली भूमि पर वृक्षारोपण व वन विस्तार कार्यक्रम चलाकर वन विस्तार किया जाये।

3. जनसंख्या की तीव्र वृद्धि पर अंकुश लगाया जाना चाहिये।

4. कृषि उत्पादन में रासायनिक खादों की जगह जैविक खादों का अधिक प्रयोग किया जाये।

5. पर्यावरण प्रदूषण रोकने व ग्रीण हाउस गैसों के उत्पादन पर रोक लगाने वाले अन्तरराष्ट्रीय कानूनों व संधियों का कठोरता से पालन किया जाये।

6. उद्योगों एवं स्वचालित वाहनों में ऐसे परिस्कृत उपकरणों को लगाया जाये जिससे प्रदूषित गैसों का उत्सर्जन कम से कम हो तथा इन्हें वायुमण्डल में छोड़े जाने से पूर्व परिष्कृत किया जाये।

7. और अन्त में पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने हेतु जन सहभागिता कार्यक्रमों को संचालित करने पर जोर दिया जाये।13

निष्कर्ष:- भारत में बढ़ते जलवायु परिवर्तन के विकराल प्रभाव वर्तमान में भारत के समक्ष एक सबसे बड़ी समस्या है। यह समस्या मानवीय क्रियाकलापों की देन है बेसक आज विकास की धारा को मोड़ा नहीं जा सकता है, किन्तु इसे मानवीय हित में इतना नियंत्रित तो अवश्य किया जा सकता है। जिससे भारत वर्ष की धरा पर मंडरा रहे इस गम्भीर संकट को दूर किया जा सके। ‘‘जियो और जीने दो’’ के सिद्धान्त का पालन करते हुए यहाँ के पर्यावरण सुरक्षा में योगदान देना चाहिये। पर्यावरण सम्बन्धी बदलावों, सूखा, बाढ़, समुद्री तुफान के बढ़ते प्रकोप के बावजूद ग्लोबल वार्मिंग का मुद्दा अभी भी आम लोगों के बीच अपनी जगह नही बना पाया है। अतः अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर पर्यावरण चिन्तन के लिये जो भी बैठकें हुयी है, उनमें ग्लोबल वार्मिंग के परिणामों की भयावहता पर ही अधिक चर्चा हुई है। जबकि सुधार के प्रयास कम ही किये गये हैं। अतः आवश्यकता है कि व्यावहारिक हल खोजने के अलावा उन पर अमल भी किया जाये।

सन्दर्भ सूची


1. योजना दिसम्बर, 2015, पृ. सं.-7, 33
2. भूगोल और आप, मार्च-अप्रैल 2012, अंक-61, पृ. सं. 10-11
3. जनपद मेरठ अर्थ-सांख्यिकीय पत्रिका 2013, पृ. सं.-35
4. Journal of Integrated Development and Research, Vol. 4, No. 1, June 2014, pp: 137-138
5. The Rohilkhand Geographical Journal of Indian Vol. XVIII, July 2015, pp: 160-162
6. रघुवंशी, डॉ. अरूण, रघुवंशी चंद्रलेखा: पर्यावरण प्रदूषण, म. प्र. हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल
7. चन्दोला, प्रेमानन्द: पर्यावरण और जीव (2011), पृ. सं.-28
8. सिंह, डॉ. पी. एन.: पारिस्थितिकी परिचय, हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर 2012, पृ. सं.-8
9. श्रीवास्तव, गोपीनाथ: पर्यावरण प्रदूषण (2007), पृ. सं. 12-13
10. पर्यावरण विकास: सी. ई. पी. आर. डी. के अंक
11. डॉ. राव बी.पी. पर्यावरण अध्ययन के आधार (2005) वसुन्दरा प्रकाशन गोरखपुर, पृ. सं. 30-32
12. डॉ. प्रसाद अनिरूद्ध, पर्यावरण संरक्षण विधि की रूप रेखा, सेन्ट्रल लॉ पब्लिकेशन, इलाहाबाद 2009, पृ. सं.-130
13. धर उपेन्द्र, जैव विविधता संरक्षण विकास, गो.ब. पन्त हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान कोसी कटारमल अलमोड़ा, उत्तराखण्ड 2012, पृ. सं. 117-118

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