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भूमि एवं जल संरक्षण में बाँस का उपयोग (Importance of Bamboo in soil and water conservation)

Author: 
राजेश कौशल, ओ.पी. चतुर्वेदी और अम्बरीष तिवारी
Source: 
केन्द्रीय मृदा एवं जल संरक्षण, अनुसन्धान और प्रशिक्षण संस्थान अनुसन्धान केन्द्र, देहरादून (उत्तराखण्ड)

बाँस, मनुष्य के लिये प्रकृति का अमूल्य उपहार है। बहुआयामी उपयोगों को देखते हुए इसे वनों का ‘हरा सोना’ कहा जाता है। यह पूरे विश्व में समुद्र तल से 7000 मीटर की ऊँचाई तक पाया जाता है। संसार भर में बाँस की 75 से अधिक प्रजातियाँ व 1200 से अधिक उपजातियाँ पाई जाती हैं। भारत में बाँस की 114 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। हमारे देश में कश्मीर घाटी को छोड़कर बाँस सर्वत्र पाया जाता है। भारत में बाँस करीब 0.10 लाख वर्ग किमी में फैला हुआ है जिससे 4.50 लाख टन उत्पादन मिलता है।

बांस के पेड़बांस के पेड़ उत्तर भारत के पर्वतीय क्षेत्र (हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखण्ड) बाँस की विभिन्न प्रजातियों को उगाने के लिये आदर्श क्षेत्र है। शिवालिक पर्वतीय क्षेत्र और इसकी तलहटी में लाठी बाँस, कांटा बाँस एवं मध्य हिमालय में मगर एवं चाय बाँस पाया जाता है। ऊपरी हिमालय क्षेत्रों में रिंगाल की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। रिंगाल की मुख्य चार प्रजातियाँ गोल, थाम, देव एवं जमूरा हैं। बाँस सामान्यतः नम घाटियों में वृक्षों की छाँव में, नदियों और नालों के किनारे एवं पर्वतों के ढलान के निचले भागों में होता है। पर कभी-कभी यह ऊँची ढलानों तथा पर्वतों के ऊँचे भागों में भी पाया गया है।

कहाँ लगाएँ बाँस


बाँस प्रायः ऐसे क्षेत्रों में लगाए जाते हैं, जहाँ पर पर्याप्त मात्रा में वर्षा होती हो और जहाँ पानी का उत्तम निकास हो। बाँस को लगाने के लिये खाली पहाड़ियों की ढलान, नदी-नालों के किनारे, रेलवे लाइनों तथा सड़कों के किनारे वाले स्थान काफी उपयुक्त माने जाते हैं। जिस भूमि में फसल लगाई जाती हो, ऐसी भूमि में बाँस नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि एक बार लगाने के बाद बाँस को हटाना बहुत मुश्किल है। बाँस को खेतों और बाग के चारों तरफ भी बाड़ के रूप में एक या दो कतारों में लगाया जा सकता है।

भू-संरक्षण के लिये बाँस रोपण


बंजर भूमि पर बाँस का रोपण : नग्न पहाड़ी, भूस्खलित अथवा इससे सम्भावित क्षेत्र को बाँस द्वारा रोपित कर संरक्षित किया जा सकता है। इसके लिये बाँस को खत्तियों पर लगाया जाता है। ये खत्तियाँ निरन्तर अथवा सान्तर रूप में बनाई जाती हैं। सामान्य रूप से खत्तियाँ 30 सेमी X 30 सेमी से 45 सेमी X 45 सेमी के आकार में खोदी जाती हैं। सान्तर खत्तियाँ 2-3 मीटर की लम्बाई में बनाई जा सकती हैं तथा पंक्तियों के बीच की दूरी 3-5 मीटर के बीच हो सकती है। खत्तियाँ, मृदा एवं नमी संरक्षण के लिये अत्यन्त प्रभावी पाई गई हैं। खत्तियों की सेवा अवधि लगभग 3-4 वर्ष होती है। इतने समय में बाँस स्थापित होकर मृदा एवं जल संरक्षण शुरू कर देते हैं। इसके बाद बाँस झुंड बना लेता है एवं इसका छत्र भी बड़ा हो जाता है। 3-4 वर्ष के उपरान्त बाँस की जड़ें भी अच्छी तरह से विकसित हो जाती हैं तथा सब मिलकर पानी एवं मृदा का संरक्षण करते हैं। विकसित अवस्था में बाँस भूमि के लिये कवच का काम करता है। यह वर्षा की बूँदों के आघात व बहने वाले जल की ऊर्जा के प्रभाव से भूमि की रक्षा करता है। लाठी बाँस, कांटा बाँस, मगर बाँस, चाय बाँस, रिंगाल आदि उत्तर-पश्चिमी हिमालय के लिये उपयुक्त प्रजातियाँ हैं।

मेड़ों पर बाँस रोपण


मेड़ों पर प्रारम्भ में पौध उपलब्धता के अनुसार बाँस के पौधे 1 से 3 मीटर की दूरी पर रोपित किए जाते हैं। एक-दो वर्षों में ही पौध संवर्धन द्वारा एक नियमित बाड़ बन जाती है। मुख्य प्राथमिकता इसके रख-रखाव व संवर्द्धन को नियमित व नियंत्रित रखने की होती है। सावधानी न रखने पर बाड़ की बढ़वार अव्यवस्थित हो जाती है। पड़ोसी के खेत में नये कल्लों से पौधे निकलकर अनचाहे स्थान पर बढ़वार कर सकते हैं। यह अनचाहे विवाद का कारण भी बन सकता है। इसके बचाव हेतु बाँस कतार व खेत के मध्य 60 सेमी चौड़ी व 40 सेमी गहरी नाली बनानी चाहिए। सामान्यतया इस प्रकार के रोपण में बाँस को अतिरिक्त जल एवं पोषण की आवश्यकता नहीं पड़ती है। परन्तु बाँस झुंड के साथ खेत में गहरी जुताई या गुड़ाई द्वारा जड़ों एवं नए कल्लों तथा ऊपरी भाग की गाँठों से निकली टहनियों की छँटाई करना आवश्यक एवं लाभकारी रहता है।

मेड़ों पर कतार में बाँस रोपण एक प्राकृतिक बाड़ के रूप में अत्यन्त प्रभावी होता है जो कि किसी भी यांत्रिक बाड़ से अधिक मजबूत होता है। कई बार तो यह बाड़ इतनी घनी व मजबूत हो जाती है कि जानवरों व मनुष्यों द्वारा इसे पार कर पाना लगभग असम्भव होता है। इसके उचित प्रबन्धन से किसान न सिर्फ बाड़ के रूप में इसका प्रयोग करता है बल्कि प्रतिवर्ष अतिरिक्त आय भी प्राप्त करता है। इस तरह की बाड़ का नदियों व मौसमी नालों में रोपण किया जा सकता है तथा इससे भूमि को जल कटाव से बचाया जा सकता है।

वर्षाकाल में थोड़े समय के लिये तथा तीव्र गति से जिन स्थानों में जल भराव होता है, ऐसे स्थानों के तटों पर 3 से 5 मीटर के अन्तराल की कतारों तथा एक मीटर के पौध अन्तराल पर रोपण करने से जल द्वारा भूमि कटाव को रोका जा सकता है।

क्षेत्र सीमा निर्धारण हेतु भूमि व जलवायु के अनुसार बाँस की किसी भी किस्म का चुनाव किया जा सकता है। किन्तु बाड़ में रक्षा पट्टी हेतु ऐसी किस्मों का चुनाव किया जाना लाभकारी होता है, जिनसे जानवरों या मनुष्यों को बाड़ को पार करने में कठिनाई हो। इसके लिये घनी एवं काँटेदार बाँस प्रजातियाँ बैम्बूसा बैम्बोस, बैम्बूसा बालकोआ आदि सर्वोत्तम पायी गई हैं। इनके अतिरिक्त बैम्बूसा न्यूटन्स, बैम्बूसा टुल्डा, डेन्ट्रोकेलेमस स्ट्रिकटस आदि बाँस प्रजातियाँ जो अत्यन्त सघन झाड़ी बनाती हैं, बाड़ हेतु लगाने के लिये उपयुक्त होती हैं।

बाँस द्वारा चेक डैम


नाले में बहने वाले पानी से भूक्षरण बचाव हेतु पानी के वेग को कम करना जरूरी है। जीवित चेक डैम अवरोध के रूप में कार्य करते हैं। इन्हें क्षरण रोकने तथा अच्छी मृदा नमी स्तर को बनाए रखने के लिये छोटे नाले/गली के आर-पार लगाया जाता है। प्रथम क्रम की गली जिनमें थोड़ी मात्रा का अपवाह आता है, को चेक डैम द्वारा पुनर्स्थापित किया जा सकता है। नालों में बहने वाले पानी से भूक्षरण रोकने के लिये बाँस का उपयोग किया जा सकता है। नदी एवं नालों के किनारे बाँस की वृद्धि अच्छी पाई जाती है। बाँस को अन्य झाड़ी एवं घास के साथ अवरोध रूप में उपयोग में लाया जा सकता है। यह अवरोध क्षरण रोकने तथा अच्छी मृदा व नमी स्तर को बनाए रखने के लिये छोटे नालों/गली के आर-पार लगाए जा सकते हैं।

नाले एवं नदियों के किनारे भूक्षरण नियंत्रण


पर्वतीय क्षेत्र से प्रारम्भ होने वाले नालों में दिशा परिवर्तन व तट कटाव की समस्या काफी गम्भीर है। बरसात के दौरान चो, राओ, खड् इत्यादि जो मानसून के मौसम के अलावा अधिकतर सूखे रहते हैं, तेज बहाव के साथ अत्यधिक मात्रा में मलबा बहाकर लाते हैं तथा जमीनों, जीवन एवं सम्पत्ति को व्यापक क्षति पहुँचाते हैं। बाँस द्वारा विकसित वानस्पतिक अवरोधक इन नदी एवं नालों की धारा के वेग को कम करने में सक्षम हैं और इनके द्वारा किनारों को सुरक्षित रखा जा सकता है। बाँस द्वारा बनाई गई बाड़ छोटी धाराओं तथा बरसाती नालों में सफलतापूर्वक प्रयुक्त की जा सकती है। इसके लिये बाँस के पौधों को 2-3 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है। आवश्यकतानुसार बाँस की एक या तीन कतारें लगाई जा सकती हैं। बाँस के तनों में बहुत लचीलापन होता है तथा तेज बहाव को यह आसानी से सह लेते हैं। बाँस की मूसला जड़ें बहाव के विरुद्ध बहुत मजबूत होती हैं तथा मिट्टी को कटाव से सुरक्षित रखती हैं। सड़ जाने पर ये जड़ें भूमि की पारगम्यता भी बढ़ाती हैं तथा मृदा संरचना में सुधार करती हैं। नदी एवं नाले के किनारे के क्षेत्रों में बालूका, चाय, मगर, लाठी आदि बाँस उपयुक्त पाए गए हैं।

बरसाती नाले के किनारे की भूमि का पुनर्स्थापन


बरसाती नालों में मृदा कटाव नियंत्रण उपायों द्वारा बहाव को पूर्व निर्धारित भूमि पर नियंत्रित किया जा सकता है तथा किनारों के आस-पास की भूमि को उपयुक्त बाँस प्रजाति लगाकर पुनर्स्थापित किया जा सकता है। बाँस तेज बढ़वार के कारण इन जमीनों पर जल्दी स्थापित हो जाते हैं। बाँस की जड़ें एवं गिरे हुए पत्ते सड़ने के उपरान्त जल्दी ही भूमि में सुधार कर सकते हैं। लाठी बाँस, कांटा बाँस, मगर बाँस इसके लिये उचित प्रजातियाँ हैं। बाँस अपने क्षत्र द्वारा भूमि को वर्षा बूँद अपरदन एवं पृष्ठ अपवाह के विरुद्ध सुरक्षा देता है तथा अपनी जड़ों द्वारा पकड़ बनाकर मृदा को स्खलित होने से बचाता है। अपरदित ढलानों को पुनर्स्थापित करने हेतु बाँस एक बहुपयोगी प्रजाति है। बाँस के तने झुंडों के रूप में ढलान से नीचे की ओर बहने वाले क्षय पदार्थों को पकड़े रखते हैं। बाँस एवं रिंगाल प्रजातियाँ वर्षा की बूँदों के वेग को कम करती हैं तथा इनकी जड़ें ढलान के भीतर रिसे हुए जल के दबाव को खींचकर तथा पत्तियों के द्वारा वाष्पोत्सर्जन को कम करती हैं।

बाँस की प्रजाति बैम्बूसा वलगेरिस में आसानी से जड़ें आ जाती हैं। इस प्रजाति के तनों को खूँटों के रूप में उपयोग किया जा सकता है तथा ढलान की लम्बाई को 3-5 मीटर अन्तराल पर विभक्त किया जा सकता है। इस विधि में इन खूँटों को 1 मीटर की दूरी पर एक सीध में लगा दिया जाता है। खूँटों को जमीन के अन्दर 75 सेमी और ऊपर लगभग 50 सेमी तक ढाल के अनुसार रखा जा सकता है। खूँटों को आपस में बाँध दिया जाता है और खूँटों के बीच के स्थान में बेशरम, नेपियर आदि झाड़ियों की कटिंग लगा दी जाती है। बाँस को प्रकन्द के साथ लगाने पर बाँस के मरने का खतरा भी नहीं रहता और बाँस जल्दी स्थापित हो जाता है, हालाँकि इस पर अभी शोध करने की आवश्यकता है।

क्रिब संरचनाएँ


बक्सेनुमा आकार में बाँस की बल्लियों से बनाई गई क्रिब संरचनाओं को पत्थर/झाड़ियों से भरकर उन्हें तीव्र ढलानों को स्थापित करने के लिये प्रयोग में ला सकते हैं। 2-3 मीटर लम्बाई तथा 8-12 सेमी व्यास के बाँस के खम्भों को 50-75 सेमी गहराई तक जमीन में 1 मीटर की खम्भे से खम्भे तक की दूरी में दो पंक्तियों में गाड़ा जाता है। इन बाँस के खम्भों के साथ क्षैतिज बल्लियाँ लम्बी कीलों द्वारा ठोक दी जाती हैं। इन संरचना की ऊँचाई धरातल से 1.5 मीटर से 2 मीटर ऊपर रखी जाती है। अतः उपयुक्त एवं जल्दी बढ़ने वाली वनस्पति लगाई जा सकती है। ठोस बाँस प्रजातियाँ जैसे कि लाठी बाँस बैम्बूसा बालकुआ, थ्राइसोस्टेकस ओलीविराई, पसियोडोऑक्सीटिनेंथरा स्टाकसाई आदि को बल्लियों के रूप में क्रिब संरचना बनाने के लिये उपयोग में लाया जा सकता है।

 

बाँस की महत्ता


बाँस से लगभग 1400 से अधिक उत्पाद एवं वस्तुएँ बनाई जा सकती हैं। विश्व बैंक एवं इनबार के एक बाजार सर्वेक्षण के अनुसार वर्तमान में अन्तरराष्ट्रीय बाजार में बाँस का व्यवसाय 45 हजार करोड़ रुपये का है। भारतीय बाजार में बाँस का व्यवसाय 2,040 करोड़ रुपये का है तथा इसके प्रतिवर्ष 15-20 प्रतिशत बढ़ने की आशा है। विश्व के बाँस उत्पादक देशों में भारत दूसरे स्थान पर है, जहाँ 40-60 लाख टन बाँस प्रतिवर्ष जंगलों के कटान से आता है, जिसमें से 19 लाख टन केवल कागज उद्योग में लुगदी बनाने के काम आता है।


बाँस के बारे में कहा जाता है कि इसकी बढ़वार को वास्तव में देखा जा सकता है। जापान के एक वैज्ञानिक ने तो इसकी 24 घंटे में 1.19 मीटर वृद्धि अंकित की है जो कि मनुष्य की आठ वर्षों में होने वाली वृद्धि के लगभग समान है। 1945 में हिरोशिमा (जापान) के परमाणु बम विस्फोट में जहाँ लोहा भी पिघलकर राख हो गया था, भूमि सतह से सर्वप्रथम बाँस का पुनः अंकुरण कुछ ही महीनों में हो गया था। इससे इस वृक्ष की जीवितता का अनुमान लगाया जा सकता है। बाँस स्थानीय दस्तकारी के लिये महत्त्वपूर्ण है। बाँस, पैकेजिंग टोकरियाँ एवं सजावटी वस्तुएँ बनाने के उपयोग में लाया जाता है। बाँस से बनी उच्च गुणवत्ता व बेहतर डिजाइन से बनी वस्तुओं की माँग मुख्यतः होटल, रिसॉर्ट, विभिन्न कार्यालयों, घरों आदि में बढ़ रही है। बाँस से कई प्रकार के उत्पाद एवं वस्तुएँ जैसे फर्नीचर, वेस्ट पेपर बास्केट, थैले, फूलदान, हैंगर, फोटो फ्रेम इत्यादि बनाए जाते हैं। इसका उत्पादन पुल निर्माण, पाइप लाइन निर्माण जैसे कार्यों में भी होता है। बाँस की कुछ प्रजातियों की नई कोपलों से मुरब्बा, अचार, चिप्स, बीयर व घरेलू सब्जी आदि प्राप्त किये जा सकते हैं। चारे के रूप में भी इसका बहुत उपयोग है, क्योंकि बाँस व रिंगाल पूरे वर्ष हरा चारा देते हैं। भूकम्परोधी एवं कम बजट के गृह निर्माण में भी बाँस एवं रिंगाल उपयोग में लाया जाता है। इसके अलावा बाँस जलवायु की स्थिरता, भूमि एवं जल संरक्षण और ग्राम स्तर पर रोजगार के अवसर प्रदान करते हैं।

 

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