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बिलासपुर जिले के जल का घरेलू, औद्योगिक एवं अन्य उपयोग (Domestic, Industrial and other uses of water in Bilaspur District)

Author: 
श्रीमती कावेरी दामड़कर
Source: 
शोध प्रबंध ‘बिलासपुर जिले में जल-संसाधन विकास : एक भौगोलिक अध्ययन (Water Resource Development in Bilaspur District : A geographical study)’, भूगोल विभाग, रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़

पेयजल आपूर्ति जल संसाधन का द्वितीय प्रमुख उपयोग है। बिलासपुर जिले की कुल जनसंख्या 2,95,336 व्यक्ति (1981) है, जो नगरीय एवं ग्रामीण क्षेत्रों में आवासित है। पेयजल आपूर्ति की दृष्टि से जिले की जनसंख्या का 70 प्रतिशत आज भी पेयजल की समस्या से ग्रसित है। यद्यपि विभिन्न योजनाओं के माध्यम से प्रशासन द्वारा पेयजल आपूर्ति की जा रही है तथापि जिले के 45 प्रतिशत ग्राम आज भी पेयजल की दृष्टि से समस्यामूलक है। नगरीय क्षेत्रों में विशेषतः जल संग्राहकों से दूर स्थित क्षेत्रों में, पानी का अभाव रहता है। साथ ही कई नगरीय क्षेत्रों में विशेषतः जल संग्रहकों से दूर स्थित क्षेत्रों में, पानी का अभाव रहता है। साथ ही कई नगरीय क्षेत्रों में जहाँ पेयजल आपूर्ति नदी से होती है। ग्रीष्म काल में जलस्रोत के सूख जाने के कारण जलाभाव की स्थिति रहती है।

ग्रामीण जल प्रदाय


बिलासपुर जिले के कुल 3,616 ग्रामों में पेयजल की परम्परागत व्यवस्था है। जिले के 3543 ग्रामों में ग्रीष्मावधि में एवं 10 ग्रामों में पेयजल की भीषण अभाव की स्थिति है। जिले की कुल ग्रामीण जनसंख्या 29,52,086 है एवं जल माँग 14,76,04,308 लाख लीटर है। विभिन्न साधनों से वर्तमान में जल आपूर्ति 1.03471 लाख घनलीटर है। जिले के लगभग 97.8 प्रतिशत ग्रामों में पेयजल की समस्या विद्यमान है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व बिलासपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्र में शुद्ध पेयजल पूर्ति हेतु कोई व्यवस्था नहीं थी। ग्रामीण जनसंख्या अपनी जल की आवश्यकता की पूर्ति के लिये परम्परागत साधनों- नदी, नाले, तालाब इत्यादि पर ही निर्भर थे। कहीं-कहीं कुछ जमींदारों एवं छोटे रियासतों के मालिकों ने पेयजल हेतु तालाबों का निर्माण करवाया था। जिले के अधिकांश ग्रामों में पेयजल का अभाव था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात योजनाकाल में राष्ट्रीय पेयजल एवं स्वास्थ्य-सफाई योजना का प्रावधान रखा गया जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल योजनाओं का विकास किया गया। परन्तु जनता की निष्क्रियता के कारण यह योजना सफल नहीं हो सकी। चतुर्थ एवं पंचम योजनावधि में बिलासपुर जिले में ग्रामीण जल आपूर्ति हेतु हस्तचलित पम्पों के माध्यम से भूगर्भ जल का उपयोग किया जाना प्रस्तावित हुआ। जिसके तहत कुल व्यय राशि का 25 प्रतिशत ग्राम पंचायतों को देना था। किन्तु, ग्राम पंचायतों द्वारा इतनी राशि भी व्यय न कर पाने के कारण अंततोगत्वा शासन द्वारा ही इस कार्यक्रम हेतु राशि की व्यवस्था की गई। इसका तात्कालिक परिणाम यह हुआ कि जिले के सभी ग्रामों में पेयजल प्राप्ति हेतु नलकूपों का खनन किया गया। छठवीं योजना के अन्त तक जिले में पेयजल आपूर्ति की पर्याप्त व्यवस्था की गई। वर्तमान में लोरमी, जांजगीर, करतला, पाली, पोड़ी-उपरोरा, कटघोरा, मरवाही एवं गौरेला विकासखण्डों के अतिरिक्त अन्य सभी विकासखण्डों में न्यूनतम पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था है, यद्यपि ग्रीष्मावधि में सभी विकासखण्डों में पेयजल की कमी बनी रहती है।

पेयजल प्राप्ति के साधन


सामान्यतः जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति के परम्परागत साधन नदी, नाले, तालाब, कुएँ ही हैं तथा हस्तचलित पम्प (नलकूप) एवं कुएँ ही जल आपूर्ति के प्रमुख साधन हैं।

बिलासपुर जिले के 94.2 प्रतिशत ग्रामों में पेयजल आपूर्ति, हस्तचलित पम्पों, नलकूपों एवं कुओं के माध्यम से 2.0 प्रतिशत ग्रामों में तालाबों से, 2.0 प्रतिशत नदियों से एवं 1.35 प्रतिशत हस्तचलित पम्पों एवं अन्य साधनों से होती है। जिले के पेयजल आपूर्ति के साधनों का विवरण सारिणी क्रमांक 26 में दर्शाया गया है।

तालाब एवं जलाशय


तालाब सतही जल के संचयन के महत्त्वपूर्ण साधन हैं। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या की अधिकांश जलीय आवश्यकता जैसे- स्नान करने, कपड़े धोने, जानवरों की सफाई इत्यादि के लिये तालाब के जल का उपयोग होता है। सामान्यतः जिले के दक्षिणी मैदानी क्षेत्रों में तालाबों का वितरण अधिक है। इन क्षेत्रों में तालाब निर्माण हेतु सभी दशायें यथा- समतल भूमि उपयुक्त है। जिले में 75 ग्राम ऐसे हैं, जहाँ पर तालाब का जल पेयजल के रूप में उपयोग में लाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब के जल के विभिन्न उपयोगों के कारण ये जल प्रदूषण के प्रमुख स्रोत भी हैं। सामान्यतः वर्षा की अवधि में अनेक प्रकार की अशुद्धियाँ इनमें सम्मिलित हो जाती है। साथ ही काई एवं अन्य जीवाणुगत अशुद्धियाँ भी आ जाती हैं। जिससे जल प्रदूषित हो जाता है। इस प्रकार तालाब पेयजल की दृष्टि से अत्यंत खतरनाक है। फिर भी ग्रामीण अंचलों में आज भी तालाब का जल उपयोग में लाया जा रहा है।

सारणी क्रमांक 26 बिलासपुर जिला ग्रामीण पेयजल प्रदाय के स्रोत

नदियाँ एवं नाले


बिलासपुर जिले के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में नदी एवं नाले भी जल आपूर्ति के स्रोत हैं। जिले के 73 ग्रामों में नदियाँ एवं 13 ग्रामों में नाले पेयजल आपूर्ति के प्रमुख स्रोत के रूप में हैं। ऐसे ग्रामों की संख्या पोड़ी-उपरोरा विकास खण्ड में अधिक है। इस विकासखण्ड का अधिकांश क्षेत्र पर्वतीय एवं वनाच्छादित होने के कारण पेयजल प्राप्ति के साधनों के विकास में अत्यंत कठिनाई होती है। नदियों एवं नालों का जल भी पेयजल की दृष्टि से हानिकारक है। इनमें भी अनेक प्रकार की जैव-अजैव तत्व, घुलनशील-अघुलनशील अशुद्धियों, औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थ आदि से भी जल संदूषित हो जाता है। जिससे जलजनित रोग सम्भाव्य होते हैं।

कुएँ


बिलासपुर जिले के सभी ग्रामों में कुआँ पेयजल आपूर्ति का प्रमुख साधन है। जिले में पेयजल प्राप्ति योग्य कुओं की संख्या 3,184 है। जिले के लोरमी, पंडरिया, मुंगेली एवं पथरिया विकासखंडों में 60-80 प्रतिशत जलीय आवश्यकता की पूर्ति कुओं के माध्यम से होती है। अन्य विकासखण्डों में 50 प्रतिशत ग्रामों में पेयजल आपूर्ति का स्रोत कुआँ है।

हस्तचलित पम्प


इस प्रकार जिले में सभी ग्रामीण क्षेत्रों में 10,101 हस्तचलित पम्पों के माध्यम से लगभग 60606 ग्रामीण जनसंख्या को शुद्ध पेयजल आपूर्ति की जा रही है। जो कुल ग्रामीण जनसंख्या का 60 प्रतिशत है। जिले में प्रायः सभी विकासखण्डों में प्रति ग्राम हस्तचलित पम्पों की संख्या 4 है। जिले में सर्वाधिक हस्तचलित पम्प की वितरण बिल्हा विकासखण्ड में (644) तथा न्यूनतम संख्या पेण्ड्रा विकासखण्ड में (203) है।

समस्यामूलक ग्रामों में पेयजल की स्थिति एवं जल आपूर्ति


जिले के ग्राम्य क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था हेतु समस्यामूलक ग्रामों में पेयजल आपूर्ति हेतु योजना निर्मित की गई। बिलासपुर जिले में 3,513 ग्राम आज भी पेयजल पूर्ति की दृष्टि समस्यामूलक ग्राम हैं-

समस्यामूलक ग्राम वह ग्राम है, जहाँ पर निम्नलिखित स्थितियों में से कोई एक कारण विद्यमान हो-

1. जहाँ कुआँ असफल हो।
2. जिन स्थानों में ग्रीष्मावधि में कुओं का जल तल 15 मीटर से अधिक नीचे चला जाता हो।
3. कुएँ से प्राप्त जल उपलब्धि से ग्राम्य आवश्यकता की पूर्ति न हो एवं अन्य कोई सम्भावना न हो।
4. जिन स्थानों पर कुओं के खनन हेतु 15 मीटर तक की गहराई तक चट्टानों को काटने के उपरांत भी जल उपलब्ध न हो अथवा उपलब्ध जल की मात्रा अत्यंत कम हो एवं जिनका जल गर्मी में सूख जाता हो।
5. ग्राम में पेयजल प्राप्ति का स्रोत एक किलोमीटर से अधिक दूरी पर हो।
6. जिन स्थानों पर भूगर्भिक संरचना अत्यंत कठोर हो एवं कुओं के खनन हेतु चट्टानों का कटाव एवं विस्फोट अनार्थिक हो।
7. जिन स्थानों का पानी खारा एवं पीने योग्य न हो।
8. वर्तमान भूगर्भिक एवं सतही जलस्रोत प्रदूषण मुक्त हो तथा जीवाणुओं को नष्ट करना आवश्यक हो।
9. जिन स्थानों पर जलजनित रोग गिनी वर्म, हैजा, मियादी बुखार, पेचिश आदि के जीवाणुओं का प्रभाव हो।

जिले के सभी समस्यामूलक ग्रामों को तीन उपवर्गों में विभक्त किया जा सकता है।

1. ग्रीष्कालीन समस्यामूलक ग्राम
2. भीषण समस्यामूलक ग्राम,
3. समस्याविहीन ग्राम

ग्रीष्मकालीन समस्या मूलक ग्राम


सामान्यतः ग्रामीण अंचलों में पेयजल प्राप्ति के स्रोतों यथा- कुआँ, हस्तचलित पम्प, तालाब, नदियों एवं नालों का जल तल ग्रीष्मावधि में कमोबेश न्यून हो जाता है अथवा सूख जाता है। परिणामस्वरूप जलाभाव की समस्या हो जाती है। जिले 8.5 प्रतिशत ग्राम में ग्रीष्मावधि में गम्भीर पेयजल संकट विद्यमान रहता है। ग्रीष्मावधि में पेयजल का संकट सामान्यतः दक्षिणी मैदानी विकासखण्डों में स्थित ग्रामों में देखा जाता है। ऐसे ग्रामों की सर्वाधिक संख्या बिल्हा एवं पथरिया (30 ग्राम) विकासखण्डों तथा पश्चिमी विकासखण्डों में है, जहाँ 17 प्रतिशत से अधिक ग्रामों में ग्रीष्मावधि में गम्भीर पेयजल की स्थिति रहती है। ये न्यून वर्षा के क्षेत्र हैं। अतः पूर्व मानसून काल में भूगर्भ जलस्तर घट जाता है। फलस्वरूप सतही एवं भूगर्भिक जलाभाव के कारण जलस्रोत सूख जाते हैं। जिले के पश्चिमी क्षेत्र के कोटा (15.4 प्रतिशत), तखतपुर (14 प्रतिशत), मुंगेली (4 प्रतिशत), लोरमी (9 प्रतिशत), विकासखण्डों में भी ग्रीष्मकालीन समस्यामूलक ग्राम अधिक हैं। जिले के उत्तरी एवं पूर्वी क्षेत्र में स्थित विकासखण्डों में 6 से 8 प्रतिशत ग्रामों में पेयजल के अभाव की स्थिति रहती है।

भीषण समस्यामूलक ग्राम


जिन ग्रामों में वर्षभर जलाभाव की स्थिति बनी रहती है। ऐसे ग्रामों को इस संवर्ग में रखा गया है।

बिलासपुर जिला पेयजल समस्यामूलक ग्राम

समस्याविहीन ग्राम


जिले के 9 प्रतिशत ग्रामों में पेयजल की समस्या नहीं है। ऐसे ग्रामों की सर्वाधिक संख्या पामगढ़ (47 ग्राम) करतला (10 ग्राम) विकासखण्ड में है। इन क्षेत्रों में कॉप मिट्टी की उपलब्धता के फलस्वरूप भूगर्भ जलस्तर की गहराई 6 मीटर तक रहती है। पुनः इन क्षेत्रों में औसत भूगर्भ जलस्तर की गहराई 6 मीटर तक रहती है। पुनः इन क्षेत्रों में तालाबों का सघन वितरण है जिसके फलस्वरूप इन क्षेत्रों में पेयजल की विशेष समस्या नहीं है। जिले के अकलतरा, बिल्हा, जांजगीर, डभरा आदि विकासखण्डों में समस्याविहीन ग्रामों की संख्या 0-20 ग्राम तक है।

समस्यामूलक ग्रामों में जल आपूर्ति


वर्ष 1951 से 1970 तक जिले में सामान्यतः सभी ग्रामों में पेयजल का अभाव था। चतुर्थ एवं पंचम योजना काल में ग्रामीण जल प्रदाय के क्षेत्र में पर्याप्त विकास किया जाने लगा, जिससे समस्यामूलक ग्रामों की संख्या में ह्रास होने लगा। पाँचवी पंचवर्षीय योजना के अन्त तक जिले में कुल 2,808 ग्राम समस्यामूलक थे। जिनमें से मात्र 780 ग्रामों में पेयजल की सुविधा उपलब्ध करायी गई। इस प्रकार 72.2 प्रतिशत ग्रामों में अभी भी पेयजल के अभाव की स्थिति बनी हुई थी। छठवीं योजना काल में (1980-85) समस्यामूलक ग्रामों की संख्या 3,442 रही जिनमें से 3,310 ग्रामों में 386 कुएँ एवं 353 हस्तचलित पम्पों से पेयजल सुविधा उपलब्ध करायी गई। वर्तमान में जिले में 3,543 समस्यामूलक ग्राम है जिनमें पेयजल सुविधा उपलब्ध करायी जा रही है। केवल 4 प्रतिशत समस्यामूलक ग्राम पेयजल की समस्या के समाधान हेतु शेष रह गये हैं।

नगरीय जल प्रदाय योजना का विकास


बिलासपुर जिले में सुव्यवस्थित नगरीय पेयजल प्रदाय योजना का विकास पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत ही हुआ है। प्रथम एवं द्वितीय योजना अवधि तक (1961) जिले में नल द्वारा पेयजल पूर्ति नहीं की जाती थी। तृतीय एवं चतुर्थ योजना में जिले में सर्वप्रथम बिलासपुर नगर में पेयजल योजना का क्रियान्वयन किया गया। पाँचवी पंचवर्षीय योजना में जिले के अन्य नगरीय क्षेत्रों में भी पेयजल योजना का विकास किया गया। इस योजना के अन्त तक नल योजना वाले 8 नगर थे। नगरीय क्षेत्रों में जलाभाव की स्थिति रहती है। छठवीं योजना में मुंगेली, तखतपुर, रतनपुर एवं कोटा इत्यादि नगरों के लिये जल आपूर्ति की योजना बनी। इस प्रकार वर्ष 1985 तक जिले के 80 प्रतिशत नगरों में पेयजल योजना का विकास किया गया।

वर्तमान में जिले के सभी नगरीय क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति हेतु योजनाओं का कार्य प्रारम्भ हो चुका है।

जल प्रदाय के स्रोत


सामान्यतः बिलासपुर जिले के सभी नगरों में पेयजल आपूर्ति मुख्यतः नलकूपों के माध्यम से की जाती है। मुंगेली एवं कोरबा में जल आपूर्ति नदियों द्वारा होती है। जिले के विभिन्न नगरीय क्षेत्रों में जलप्रदाय के स्रोत का विवरण सारिणी क्रमांक 27 में दर्शाया गया है।

सारिणी क्रमांक 27 बिलासपुर जिला नगरीय जल प्रदाय का विवरण सारिणी क्रमांक 27 से स्पष्ट है कि जिले में वर्तमान समय में भी जल आपूर्ति के स्रोत कुएँ हैं। जिले के कुल जल की आवश्यकता का 22.2 प्रतिशत जल ही प्राप्त होता है, जिनसे लगभग 12203 व्यक्तियों की जलीय आवश्यकता की पूर्ति हो पाती है। द्वितीय महत्त्वपूर्ण साधन हस्तचलित पम्प है जिनके माध्यम से जिले की 45 प्रतिशत (27.36 लाख लीटर) जल की आपूर्ति होती है, जो जिले की कुल नगरीय जल आपूर्ति का 33.3 प्रतिशत है। से जल आपूर्ति नलकूपों के माध्यम से की जाती है।

जिले के विभिन्न नगरीय क्षेत्रों में जल प्रदाय की स्थिति


जिले के प्रमुख नगरों में जल प्रदाय की स्थिति निम्नलिखित है-

बिलासपुर


बिलासपुर नगर के लिये जलप्रदाय योजना वर्ष 1961 में 90,000 सम्भाव्य जनसंख्या के लिये निर्मित की गई। बढ़ती हुई जनसंख्या के परिणामस्वरूप जल प्रदाय योजना का पुनः विस्तार किया गया। वर्तमान में 15.75 लाख लीटर प्रतिदिन है, जो सामान्य दैनिक आवश्यकता का 79.3 प्रतिशत है।

बिलासपुर नगर में जल प्रदाय का मुख्य स्रोत भूगर्भ जल है। बिलासपुर नगर की भूवैज्ञानिक संरचना मुख्यतः बालुका प्रस्तर एवं कॉप युक्त है। अतः भूगर्भ जलस्तर उच्च रहता है। यहाँ अरपा नदी जो अन्तः प्रवाही नदी है, भी भूगर्भ जल सम्भरण में सहायक है। नगर में जल प्रदाय हेतु तीन वृहत जल संग्राहक स्थापित किये गये जिनकी क्षमता क्रमशः 5 लाख 75 हजार एवं 25 हजार लीटर है। इसके अतिरिक्त जल के विवरण हेतु लगभग 45 किलोमीटर लम्बी पाइप बिछाई गई है। नगर में 8,740 घरेलू एवं 1,050 सार्वजनिक नल लगे हैं। वर्तमान जल प्रदाय के द्वारा नगर की 80 प्रतिशत जनसंख्या की जलापूर्ति हो पाती है। शेष 20 प्रतिशत जनसंख्या अभी भी परम्परागत साधनों यथा- कुओं आदि पर निर्भर हैं।

कोरबा


कोरबा नगर बिलासपुर जिले का महत्त्वपूर्ण औद्योगिक केन्द्र है। यहाँ की जनसंख्या 83,424 व्यक्ति (1981) है। कोरबा शहर के लिये जलप्रदाय योजना का विकास वर्ष 1981 में किया गया। जलप्रदाय का स्रोत हसदो बाँध की दायीं तट नहर है। नगर में वर्तमान जलप्रदाय 12 लाख लीटर प्रतिदिन है। जो कि कुल नगरीय जल आवश्यकता का प्रतिशत है। नगर में प्रति व्यक्ति जल की खपत 7.5 लीटर है। 5 लीटर जल की संग्रहण हेतु जल संग्राहक निर्मित है जिसकी क्षमता 22.5 लाख लीटर है। नगर में 30 कुएँ भी हैं, जो पेयजल आपूर्ति के स्रोत हैं।

चांपा


वर्ष 1978 में 20,000 व्यक्तियों के लिये जल प्रदाय योजना का निर्माण किया गया। चांपा नगर में जल प्रदाय का स्रोत हसदो नदी है। जल प्रदाय हेतु हसदो नदी पर बाँध का निर्माण किया जिसकी क्षमता 27 लाख लीटर प्रतिदिन है, परन्तु वर्तमान में केवल 18 लाख लीटर प्रतिदिन जल-प्रदाय किया जाता है। चांपा नगर की जनसंख्या 22,996 व्यक्ति (1981) है एवं जल की कुल आवश्यकता 27.5 लाख लीटर प्रतिदिन है। अतः उपर्युक्त जल प्रदाय योजना द्वारा जल आपूर्ति पर्याप्त नहीं थी। चांपा नगर जो 16 वार्डों में विभक्त है, के कुछ वार्डों में पेयजल आपूर्ति हसदो नदी पर स्थापित (इन्टेक) कुएँ एवं कुछ वार्डों में हस्तचलित पम्प के माध्यम से पेयजल आपूर्ति की व्यवस्था की गयी। नगर की वर्तमान में कुल आवश्यकता का 60 प्रतिशत जल प्राप्त है। प्रति व्यक्ति जल आपूर्ति 72 लीटर है, जबकि जल की माँग 120 लीटर है।

सक्ती


सक्ती नगर में वर्ष 1981 में भूगर्भ जलस्रोतों पर आधारित पेयजल प्रदाय योजना विकसित की गई। जल प्राप्ति हेतु 58 नलकूपों का खनन किया गया जिनमें से वर्तमान में 56 नलकूपों द्वारा नगर में जल प्रदाय किया जाता है। इसके अतिरिक्त नगर में 16 पक्के कुएँ हैं। जिनमें लगभग 36,000 लीटर जल आपूर्ति होती है। नगर की वर्तमान पेयजल वितरण, नगर की कुल जल की मात्रा (16.3 लाख लीटर) को देखते हुए अपर्याप्त है। नगर की 24.8 प्रतिशत जनसंख्या ही पेयजल की वर्तमान व्यवस्था से लाभान्वित है। नगर के वार्ड क्रमांक 5, 6, 7, 8, 9 एवं 10 पेयजल की गम्भीर संकट है।

मुंगेली


आगर नदी के तट पर स्थित मुंगेली बिलासपुर जिले के दक्षिण-पश्चिमी मैदानी भाग का प्रमुख नगर है। इस नगर में सन 1985 से जल प्रदाय की व्यवस्था की जा रही है। नगर में पेयजल आपूर्ति का स्रोत आगर नदी है। नदी का जल तल ग्रीष्म में घट जाता है। अतः नलकूपों का खनन भी किया गया है। साथ ही नदी पर अस्थायी बाँध, जिसकी जल क्षमता 90 हजार लीटर प्रति घंटा है, का निर्माण किया गया है। इस बाँध के नगरीय जल आवश्यकता की पूर्ति की जाती है।

वर्ष 1982 में नगर में सुव्यवस्थित एवं पर्याप्त जल प्रदाय हेतु आगर नदी पर स्थायी पक्का बाँध का निर्माण किया गया है एवं नगरपालिका क्षेत्र के अन्तर्गत 62 पेयजल योग्य कुएँ हैं, जिनमें लगभग 3.00 हजार लीटर जल प्रतिदिन उपयोग हेतु प्राप्त होती है। इस प्रकार सम्पूर्ण स्रोतों से 3.105 लाख लीटर जल आपूर्ति प्रतिदिन होती है जो कुल आवश्यकता का 13.2 प्रतिशत है।

गुणवत्ता की दृष्टि से आगर नदी का जल पेय योग्य नहीं है। जल में सोडियम एवं क्लोरीन की मात्रा अधिक है (20-30 प्रतिशत)। अतः जल शुद्धीकरण संयंत्र स्थापित किया गया है।

तखतपुर


तखतपुर नगरीय क्षेत्र में वर्ष 1980 से पेयजल योजना का विकास किया गया है। नगर की वर्तमान जनसंख्या 11,858 व्यक्ति (1981) है। नगर की कुल जल आवश्यकता 13.95 लाख लीटर है एवं कुल जलीय आवश्यकता का 6.45 प्रतिशत ही जल आपूर्ति होती है। पेयजल प्राप्ति का स्रोत नलकूप है। यद्यपि गुणवत्ता की दृष्टि से यह उपयुक्त है, फिर भी जल में निहित सूक्ष्म अशुद्धियों के शुद्धीकरण हेतु क्लोरीनेशन संयंत्र स्थापित किया गया है।

कोटा


कोटा नगर में जलप्रदाय भूमिगत स्रोत पर निर्भर है। नगर में 1976 में जल प्रदाय योजना क्रियान्वित की गई। वर्तमान में नगर में पेयजल की आपूर्ति हेतु 5 नलकूपों का खनन किया गया है। साथ ही 5 लाख लीटर की क्षमतायुक्त जल संग्राहक स्थापित है। नगरपालिका क्षेत्र में 456 जल संयोजनों के माध्यम से जल वितरण किया जाता है। नगर में नलकूपों के अतिरिक्त 27 कुएँ हैं जिनमें पेयजल प्राप्त किया जाता है। नगर की वर्तमान जल माँग 12.6 लाख लीटर प्रतिदिन है एवं सम्पूर्ण स्रोतों से 7.6 लाख लीटर जल आपूर्ति होती है। इस प्रकार नगर की कुल जल माँग का 60 प्रतिशत ही पूर्ण हो पाता है।

रतनपुर


रतनपुर नगर बिलासपुर का प्राचीन ऐतिहासिक नगर है। प्रारम्भ से ही यहाँ के शासकों ने पेयजल आपूर्ति हेतु तालाब एवं कुएँ खुदवाये थे। किन्तु बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए 1976 में जल प्रदाय योजना का विकास किया गया। रतनपुर नगर की जनसंख्या 13,140 व्यक्ति (1981) है। नगर की कुल जल की आवश्यकता 15.57 लाख मीटर प्रतिदिन है एवं समस्त साधनों से 13.5 लाख लीटर जल की आपूर्ति होती है जो कुल आवश्यकता का 83.3 प्रतिशत है।

नैला-जांजगीर


नगर की जनसंख्या 17,886 व्यक्ति है। नगर की जल प्रदाय व्यवस्था मुख्यतः भूमिगत स्रोतों पर आधारित है। इस नगर की कुल जल आवश्यकता 21.92 लाख लीटर प्रतिदिन है। समस्त स्रोतों से कुल आपूर्ति 18 लाख लीटर है। इस प्रकार 82.12 प्रतिशत की आपूर्ति सम्भव हो पायी है। नगर में जल प्रदाय अपर्याप्त होने के कारण 72 हस्तचलित पम्प लगाये गये हैं, जिनसे नगर की कुल जल माँग को 50.2 प्रतिशत जल आपूर्ति सम्भव हो पायी है। इसमें अतिरिक्त नगर में 52 पेयजल के कुएँ हैं। इस प्रकार नगर के 50 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या जल आपूर्ति की सुविधा से वंचित है।

नया बाराद्वार


नया बाराद्वार में जल प्रदाय 5 नलकूपों के माध्यम से किया जाता है। नगरीय क्षेत्र में 46 सार्वजनिक तथा 37 व्यक्तिगत कुएँ हैं। इन सभी कुओं का जल ग्रीष्मकाल में सूख जाता है। अतः यहाँ ग्रीष्मकाल में पेयजल का गम्भीर संकट होता है। नगरीय क्षेत्र में 1,837 मीटर पाइप बिक्री है। शेष बारादार में पाइप नहीं है। यहाँ केवल 21.3 प्रतिशत जनसंख्या को ही शुद्ध पेयजल प्राप्त है। शेष क्षेत्र में पेयजल का भीषण संकट है।

अकलतरा


अकलतरा नगर में पेयजल का प्रमुख साधन नलकूप है। नगर में जल प्रदाय हेतु 4 नलकूप हैं, जिनकी क्षमता 65.79 लाख लीटर प्रतिदिन है, का खनन किया गया है। नगर की जनसंख्या 12,985 व्यक्ति (1981) है एवं सम्पूर्ण स्रोतों से जल प्रदाय 28.8 लाख मीटर प्रतिदिन है। इस प्रकार प्रति व्यक्ति जल आपूर्ति 70 लीटर है। नगर में जल प्रदाय हेतु 60 सार्वजनिक नल एवं 235 पक्के कुएँ हैं जो जल आपूर्ति के महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

जलजनित रोग


जल संसाधन के अध्ययन में जलजनित रोगों का अध्ययन महत्त्वपूर्ण भाग है। यह जल की गुणवत्ता एवं जल उपयोग का मानव स्वास्थ्य के साथ प्रत्यक्ष रूपेण से सम्बन्धित है। वस्तुतः जल में व्याप्त जैवीय प्रदूषण, जल में शाक्य रोग जनक जैवों के अनुसंकुलन या निर्मुक्ति या परिवर्धन है। इस प्रकार प्रदूषित जल से जलजनित रोगों का प्रसार होता है (डॉ. रघुवंशी एवं अन्य, 1989, 126)। विश्व स्वास्थ्य संगठन के सर्वेक्षण के अनुसार विश्व के 80 प्रतिशत से अधिक रोग दूषित जल के कारण होता है। जल विभिन्न स्वरूपों में रोगों का कारक है। प्रथम दूषित जल के प्रत्यक्ष उपयोग से जल जन्य रोग होते हैं। जैसे- मियादी बुखार एवं हैजा आदि। द्वितीय जल एक संक्रमणकारी तत्व के रूप में भी रोगों को जन्म देता है। उदाहरण स्कीवी, स्ट्राकोमा आदि। तृतीय कुछ रोग जल में कुछ बड़े परोपजीवियों की उपस्थिति से होता है। उदाहरण- कृमि संक्रमण के कारण होने वाला सिस्टोसोलियासिस (नारू) रोग। यह रोग सिस्टोसमय नामक चपटे सघरेपर्णाम कृमियों के कारण होता है जो संदूषित जल में पाये जाते हैं (बघमार, 1988, 29)।

जल जन्य रोग जल में उपस्थित निम्नलिखित संक्रमणकारी तत्वों के कारण होते हैं-

अ. वायरस- वायरस पीलिया
ब. बैक्टीरिया- हैजा, मियादी बुखार, खूनी पेचिस, आंत्रशोथ, अतिसार
स. प्रोटोजोआ- अमीषिक, अतिसार, अमेषिक यकृत एक्सेस जियार्डित।
द. कृमि- गोल कृमि, धागा कृमि, सिस्टोसोमियासिस

वे रोग जो जल में रहने वाले परोपजीवियों द्वारा उत्पन्न होते हैं-

अ. साइक्लोयस- गिनीवर्म, फीताकृमि आदि
ब- स्नेल- नारू रोग।

बिलासपुर जिला भी जलजनित रोगों के प्रभाव से मुक्त नहीं है। जिले में जल जनित रोगों में आंत्रशोथ, खूनी पेचिस, हैजा, नारू रोग एवं पीलिया का विशेष प्रकोप है। जल जन्य रोगों का अधिकांश प्रकोप ग्रामीण अंचलों में है। इसका कारण शुद्ध पेयजल एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी सुविधाओं का अभाव है। दूसरे स्वयं लोगों के जल प्रयोग के अस्वास्थ्यकर तरीके हैं।

बिलासपुर जिले में जलजनित रोगों का अध्ययन मुख्यतः प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों के माध्यम से प्राप्त आँकड़ों के आधार पर वर्ष 1980-87 की अवधि के लिये जल जनित रोगों का अध्ययन किया गया है। तथापि इन आँकड़ों के आधार पर जल जनित रोगों का स्पष्ट आकलन नहीं हो पाता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले लोग स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ नहीं ले पाते हैं। वहीं शहरी क्षेत्रों में निजी व्यवसायरत स्वास्थ्य केंद्रों पर अधिकांश लोग अपना इलाज करवाते हैं। डॉक्टरों के अनुसार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों एवं अस्पतालों से प्राप्त आँकड़े, वास्तविक आँकड़ों का 20-40 प्रतिशत तक प्रतिनिधित्व करते हैं (बाघमार, 1988, 20)।

बिलासपुर जिले के प्रमुख जल जनित रोग


आंत्रशोथ अशुद्ध जल निहित कीटाणुओं के कारण उत्पन्न होता है। आंत्र शोथ विकासशील देशों की एक समस्या है। इन देशों के जीवन स्तर, व्यक्तिगत स्वच्छता, शुद्ध पेयजल की कमी एवं वातावरण में स्वच्छता की बहुत कमी है। सामान्यतः यह रोग वर्षाऋतु में जुलाई से सितम्बर के महीनों में होता है।

बिलासपुर जिले में अध्ययन अवधि में आंत्र शोथ के 692 रोगी हुए। वर्ष 1979-80 में वहाँ 250 से भी अधिक व्यक्ति इस रोग से ग्रसित थे, वहीं 1987 के पश्चात इस रोग के रोगियों की संख्या में 80 प्रतिशत कमी आयी है। वर्ष 1986 में 12 लोग इस रोग से ग्रसित हुये। आंत्रशोथ से प्रभावित क्षेत्र पंडरिया, लोरमी, कोटा, गौरेला, मालखरौदा, बम्हनीडीह, कोरबा एवं जांजगीर विकासखण्ड हैं। इनमें से बिल्हा, बलौदा एवं गौरेला विकासखण्ड में कई ग्राम प्रभावित हैं। इसका प्रमुख कारण दूषित जल, स्वास्थ्य सुविधा का अभाव, यातायात के साधनों का अभाव आदि है। इन विकासखण्डों में आंत्रशोथ से प्रभावित ग्रामों की संख्या क्रमशः 2, 3, 3 एवं 4, 4 है। इन विकासखण्डों में प्रति हजार जनसंख्या पर क्रमशः मरवाही 5.8 प्रतिशत, करतला, 2.7 प्रतिशत, गौरेला 2.7 प्रतिशत है। आंत्रशोथ से प्रभावित विकासखण्डों में पंडरिया (1.7 प्रतिशत), लोरमा (1.3 प्रतिशत), कटघोरा (1.8 प्रतिशत) है। जिले के अकलतरा, बलौदा, पौड़ी-उपरोरा एवं मुंगेली विकासखण्ड में आंत्रशोथ से प्रभावित क्षेत्र का प्रतिशत अत्यंत न्यून (0 से 0.4 प्रतिशत) है। इन क्षेत्रों में मैदानी क्षेत्रीय स्थिति के कारण जल संशोधन, हस्तचलित पम्प, कुएँ तालाब आदि की उचित व्यवस्था, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की सुविधा, उपयुक्त तापक्रम आदि होने के कारण आंत्रशोथ का प्रभाव कम है।

खूनी पेचिस


दूषित जल के प्रयोग से होने वाले पेचिस का बिलासपुर जिले में व्यापक प्रभाव हुआ है। यह मुख्यतः जीवाणुओं द्वारा प्लेक्सनर एवं चित्रा, अमीबा) जल के माध्यम से शरीर में विशेषकर आँतों में प्रविष्ट होने के कारण होता है। यह रोग दूषित जल या दूध में दूषित जल के प्रयोग, गंदे नाले के पानी का सीधा उपयोग होने के कारण होता है। जिले में 1986-87 की अवधि में 254 व्यक्ति खूनी पेचिस के रोगी हुए हैं। जिनमें से सर्वाधिक गौरेला प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के लालपुर गाँव के 143 व्यक्ति इस रोग से प्रभावित हुए थे, 1987 में मरवाही विकासखण्ड के सर्वाधिक 117 व्यक्ति खूनी पेचिस से प्रभावित हुए। इसके अतिरिक्त करतला एवं कोरबा में खूनी पेचिस से 112 व्यक्ति प्रभावित हुए एवं पंडरिया क्षेत्र के देवसरा ग्राम में 80 व्यक्ति प्रभावित हुए। ये क्षेत्र मुख्यतः पहाड़ी एवं सघन वन वाले आदिवासी जनसंख्या बहुल क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों में चिकित्सा, परिवहन सुविधा प्राप्त नहीं है। द्वितीय कोरबा क्षेत्र में बढ़ते हुए औद्योगिकरण के कारण समीपस्थ क्षेत्रों में जल की शुद्धता में कमी भी आ रही है।

अतिसार


अतिसार अथवा डायरिया के जीवाणु गंदी भूमि एवं गंदे जल में लम्बे समय तक पनपते हैं। ये जीवाणु आंत एवं लासिक ग्रंथि में पहुँचकर आंत्र विष बनाते हैं जिनसे विकार उत्पन्न होता है। बिलासपुर जिले में कोरबा, करतला एवं मरवाही विकासखण्ड अतिसार से अधिक प्रभावित क्षेत्र है। वर्ष 1986-87 में कुल 778 अतिसार के प्रकरण हुए। जिले में मरवाही विकासखण्ड में 447 व्यक्ति, कोरबा में 537 व्यक्ति एवं करबला में 203 व्यक्ति अतिसार से प्रभावित हुए। जिले के लोरमी, पंडरिया, डभरा, कोटा, सक्ती, जयजयपुर एवं पोड़ी-उपरोरा विकासखण्डों में भी अतिसार से प्रभावित ग्राम है। इन क्षेत्रों में 20 से 50 व्यक्ति अतिसार से पीड़ित हुए। यहाँ पर मृत्यु दर 0.3 से 1.87 प्रति हजार है। मरवाही कोरबा, करतला, मालखरौदा में मृत्यु दर क्रमशः 5.46, 3.0, 2.25, 2.5 प्रति हजार है।

बिलासपुर जिला जल जलजनित रोग

पीलिया


पीलिया जल जन्य एक भयंकर बीमारी है। यह रोग विश्वव्यापी है। अधिकतम बसंत एवं शीतऋतु में इसका प्रकोप होता है। सामान्य अध्ययन से ज्ञात होता है कि निम्न सामाजिक वर्ग के क्षेत्र इस बीमारी से अधिक प्रभावित होते हैं। अपर्याप्त व्यक्तिगत स्वास्थ्य व्यवस्था एवं निष्क्रिय स्वास्थ्य सुविधायें इसका प्रमुख कारण है। वर्ष 1987-88 की अवधि में क्रमशः 11, 154 एवं 2,491 व्यक्ति जिले में पीलिया के रोगी हुए।

मियादी बुखार


जलपूर्ति के स्रोत जैसे तालाबों एवं कुओं में उत्पन्न संक्रामक कीटाणुओं द्वारा यह रोग होता है। रोगी के मल-मूत्र एवं अन्य तरीके से भोजन एवं पीने के पानी द्वारा अन्य लोगों के शरीर में पहुँचकर रोग ग्रस्त करते हैं। मियादी बुखार दूषित जल एवं भोजन के माध्यम से फैलता है। (घोष 1969, 495)।

बिलासपुर जिले में मियादी बुखार का सर्वाधिक प्रकोप जयजयपुर, पाली एवं कोरबा विकासखण्ड में है। इन क्षेत्रों में इन रोगों से मृत्यु दर क्रमशः 0, 21, 0.4 एवं 0.06 प्रति हजार है।

नारू रोग


नारू रोग धागे जैसे कीट से होने वाला रोग है। यह रोग उन इलाकों में अधिक होता है। जहाँ पर लोग पीने का पानी झील, बावड़ी तथा तालाब से ग्रहण करते हैं।

व्यक्ति जब किसी बावड़ी या ताल-तलैया में पानी पीने लाने या नहाने-धोने के लिये जाता है तो नारू रोग के भ्रूण उसमें करीब जाते हैं। इस प्रकार इस जल के सेवन से नारू रोग का संक्रमण होता है।

जिले में नारू रोग का सर्वाधिक प्रकोप आदिवासी बहुल पर्वतीय वनाच्छादित विकासखण्डों में अधिक है। इन विकासखण्डों में मरवाही, गौरेला, पाली, विकासखण्ड मुख्य हैं। इन विकासखण्डों में जल के परीक्षण से ज्ञात हुआ है कि प्राकृतिक जलस्रोतों में आयोडीन की कमी है, जिससे इन क्षेत्रों में इस रोग का प्रकोप बढ़ा है।

अन्य जल जन्य रोग


जल के द्वारा संक्रमणीय रूप से फैलने वाले अन्य रोगों जैसे पीलिया, विष बाधा, सेंदरी, टुकवर्म, मिनी वर्म आदि का अधिक प्रभाव पूर्वी विकासखण्डों- कटघोरा, पाली, पोड़ी-उपरोरा, कोरबा, करतला, सक्ती, चांपा, मालखरौदा एवं जयजयपुर है। इन विकासखण्डों में मृत्युदर क्रमशः करतला में 3.69, कोरबा में 3.06, पाली में 2.04, कटघोरा में 0.75 प्रति हजार है। अन्य विकासखण्डों में मृत्यु दर 0.10 से 0.85 प्रति हजार तक है।

औद्योगिक कार्यों में जल आपूर्ति


बिलासपुर जिले में 1970 के दशक के पश्चात उद्योगों का तीव्र विकास हुआ है। जिले में वर्तमान में 9 वृहत, 8 मध्यम एवं 3000 से अधिक लघु औद्योगिक इकाइयाँ हैं जो यहाँ की औद्योगिक पृष्ठभूमि का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिले के प्रमुख तीन औद्योगिक क्षेत्र हैं-

1. बिलासपुर औद्योगिक क्षेत्र
2. चांपा अकलतरा औद्योगिक क्षेत्र
3. कोरबा औद्योगिक क्षेत्र।

जिले में औद्योगिक विकास के लिये पानी की कमी नहीं है। बिलासपुर शहर के 8 किलोमीटर की परिधि में पानी की सतह ऊपर होने के कारण औद्योगिक विकास के लिये पानी की कठिनाई नहीं है। बिलासपुर जिले के मनियारी एवं खारंग नदी पर जलाशय निर्मित है। साथ ही तीन नदियों- हसदेव, अरपा, आगर- हॉफ, जल के उपयोग हेतु नदी परियोजनाओं का कार्य हाथ में है। इसके अलावा जिले में नलकूप, तालाबों एवं नालों में पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध है। जहाँ से औद्योगिक जल की आवश्यकता की पूर्ति सुविधापूर्वक की जा सकती है। नगर निगम एवं ग्राम पंचायतों द्वारा पानी की पूर्ति हेतु आवश्यक व्यवस्था की गई है। जिससे औद्योगिक जल की आवश्यकता की पूर्ति हो सकेगी।

जिले के औद्योगिक क्षेत्र में औद्योगिक कार्य हेतु जल की उपलब्ध मात्रा एवं आपूर्ति हेतु किये जाने वाले कार्य का विवरण सारिणी क्रमांक 28 में वर्णित है।

सारिणी क्रमांक 28 बिलासपुर जिला औद्योगिक कार्य के लिये जल की उपलब्ध मात्रा

बिलासपुर औद्योगिक क्षेत्र


इस प्रक्षेत्र के अन्तर्गत तिरगिट्टी एवं तिफरा औद्योगिक क्षेत्र सम्मिलित है। कुल 66 हेक्टेयर भूमि पर विस्तृत इस औद्योगिक क्षेत्र में, बीईसी फर्टिलाइजर, श्री मेटल वर्क्स, एलाइड स्टील आदि अनेक औद्योगिक इकाइयाँ हैं। इस औद्योगिक क्षेत्र में जल आपूर्ति हेतु नलकूपों का खनन किया गया है। जल वितरण हेतु निर्मित 22.5 लाख लीटर की संग्रहण क्षमता संग्राहक का निर्माण किया गया है। वर्तमान में स्थापित जल प्रदाय व्यवस्था से सम्पूर्ण औद्योगिक आवश्यकता की पूर्ति हो जाती है।

अकलतरा-चांपा क्षेत्र


इस औद्योगिक क्षेत्र में मुख्यतः सीमेंट उद्योग स्थापित हैं। एक टन सीमेंट उत्पादन हेतु लगभग तीन लाख मीटर जल की आवश्यकता होती है (राव, 1968)। इस क्षेत्र में रेमण्ड सीमेंट (1982) एवं सी.सी.आई. (1981) प्रमुख सीमेंट उत्पादक इकाइयाँ हैं जिनका वार्षिक उत्पादन क्रमशः 66,000 लाख टन एवं 3.5 हजार टन है। इन उद्योगों के लिये आवश्यक जल की पूर्ति हेतु नलकूपों का खनन किया गया है। वर्तमान में इन उद्योगों का वार्षिक जल उपयोग क्रमशः 53.3 लाख घनमीटर एवं 11.6 लाख घन मीटर है। चांपा में स्थापित मध्यभारत पेपर मिल में आवश्यक जल आपूर्ति समीपस्थ हसदो नदी के द्वारा होती है। कुल जल की आवश्यकता एवं उपयोग 6 लाख घनमीटर है। इस प्रकार सम्पूर्ण औद्योगिक क्षेत्र में कुल औद्योगिक जल आपूर्ति 72.9 लाख घनमीटर है जो जिले की कुल औद्योगिक जल उपयोग का 39.85 प्रतिशत है।

कोरबा औद्योगिक क्षेत्र


कोरबा-बिलासपुर जिले का प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र है। इस प्रक्षेत्र में दो वृहद औद्योगिक इकाइयाँ- राष्ट्रीय ताप विद्युत शक्ति ऊर्जा एवं भारत एल्युमीनियम (बाल्को) स्थापित हैं। इन क्षेत्रों में हसदो-बांगों सिंचाई परियोजना के अन्तर्गत दर्री बैराज से क्रमशः 95 लाख घनमीटर जल की आपूर्ति की जा सकती है।

मनोरंजनात्मक कार्यों में जल का उपयोग


“मनुष्यों के लिये संतोषप्रद बाह्य स्थल मनोरंजन, जो आध्यात्मिक तथा मानसिक शक्ति एवं स्वास्थ्य प्रदान करता है। जल रहित क्षेत्र की कल्पना से परे है।” (एलन, 1959, 106)।

वर्तमान में जल संसाधन का मनोरंजन की दृष्टि से उपयोग बढ़ता जा रहा है। नदियों पर निर्मित बाँध, नदी घाटी परियोजना केंद्र, नदियों में नौकाविहार की सुविधा, जलक्रीड़ा आदि जल द्वारा प्रदत्त मनोरंजनात्मक उपयोग के साधन हैं।

जिले में मनोरंजन की दृष्टि से कई ऐसे स्थान हैं, जहाँ जल के माध्यम से कई ऐसे मनोरंजन की उत्कृष्ट सुविधायें हैं। मनियारी जलाशय, खारंग जलाशय, हसदो बैराज प्रमुख जलाशय हैं जहाँ पर्यटन की पूर्ण सुविधा है। इन सभी क्षेत्र नौका विहार, आदि अनेक जल क्रीड़ाओं का प्रबंध किया गया है। इनके अतिरिक्त किरारी, जलाशय (पामगढ़ विकासखण्ड) चिल्हाटी जलाशय, कोरबा झील जो कि कोरबा रेलवे स्टेशन के 10 किमी की दूरी पर स्थित है, मनोरंजनात्मक उपयोग की दृष्टि से उत्कृष्ट स्थान है।

जिले के नगरीय क्षेत्रों में तरणपुष्कर निर्मित किये गये हैं बिलासपुर कोरबा में स्थित तरण-पुष्कर उल्लेखनीय है बिलासपुर नगर में स्थित संजय तरण पुष्कर में प्रतिदिन लगभग 500 व्यक्ति जलक्रीड़ा का आनंद प्राप्त कर सकते हैं।

नौपरिवहन हेतु जल का उपयोग


“नौपरिवहन धाराओं के जल का उपयोग का एक उदाहरण है जो सड़क एवं रेल परिवहन से अधिक सस्ता है।” (एलन, 1954, 106)।

बिलासपुर जिले में नदियों की कुल लम्बाई 700 किलोमीटर है किन्तु नदियाँ सततवाहिनी नहीं है, ग्रीष्मावधि में जल या तो सूख जाता है अथवा जल की मात्रा अत्यंत न्यून रहती है। अतः नदियों व्ययोग्य नहीं रह जाती हैं, वर्षाकालीन अवधि में, प्रमुख नदियों में जल पर्याप्त रहता है जहाँ नौपरिवहन होता है इनमें प्रमुख हैं हसदो तथा मनियारी नदी जिले में मात्र चांपा के निकट हसदो नदी में जल की गहराई अधिक होने के कारण वर्षभर एक किनारे से दूसरे किनारे तक नौकाएँ चलायी जाती हैं।

मत्स्यपालन हेतु जल का उपयोग


मत्स्य पालन जल संसाधन विकास का महत्त्वपूर्ण पहलू है। बिलासपुर जिले का मत्स्योद्योग भी जल संसाधन को विकसित करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। जिले के अन्तर्गत आने वाले सभी जल संसाधनों, नदियों, तालाब, जलाशय आदि में मत्स्य पालन होता है। बिलासपुर जिले में उपलब्ध जल संसाधनों में से 1,59,518.8 हेक्टेयर क्षेत्र में (47 प्रतिशत) मत्स्य पालन किया जाता है, जो मध्य प्रदेश के कुल मत्स्यपालन क्षेत्र का 6.73 प्रतिशत है। जिले में मत्स्यपालन से प्रतिवर्ष 229.63 लाख रुपये की आय होती है।

जिले में स्वच्छ जल की व्यापारी मछलियों (कतला, रोहू) का मुख्य रूप से उत्पादन एवं पालन किया जा रहा है।

जिले में मत्स्य उत्पादन मुख्यतः शासकीय एवं निजी मत्स्य पालन इकाइयों द्वारा किया जाता है। बिलासपुर जिले की मत्स्योत्पादन इकाइयों का विवरण सारिणी क्रमांक 29 में दर्शाया गया है।

सारिणी क्रमांक 29 बिलासपुर जिला मत्स्यपालन जल उपयोग अन्तर्गत क्षेत्र सारिणी क्रमांक 27 से स्पष्ट है कि जिले के 58.8 प्रतिशत मत्स्योत्पादक क्षेत्र ग्राम पंचायतों के अधीन है। जिले में निजी स्वामित्व वाले तालाबों का प्रतिशत 24.9, सिंचाई विभाग अन्तर्गत 1.31 प्रतिशत एवं राजस्व विभाग के अन्तर्गत 13.2 प्रतिशत मत्स्य पालन के उपयुक्त तालाब हैं। ग्राम पंचायतों, राजस्व नगर पालिका आदि विभागान्तर्गत अधिकांशतः छोटे तालाबों में मत्स्यपालन किया जाता है। तालाबों का जल ग्रहण क्षेत्र अधिकतम 2000 है न्यूनतम 50 हेक्टेयर तक है।

जिले में मत्स्य पालन मुख्यतः बिल्हा, जांजगीर, मंगेली, पथरिया, लोरमी, अकलतरा एवं कोरबा विकासखण्ड में होता है। जिले में मत्स्यपालन सर्वाधिक बिल्हा विकासखण्ड में होता है। इस विकासखण्ड में 1,10,023 हेक्टेयर जल क्षेत्र में मत्स्य पालन किया जाता है। खारंग जलाशय प्रमुख मत्स्योपालन केन्द्र हैं। जिले के उत्तरी वनाच्छादित विकासखण्ड-पौड़ी-उपरोरा एवं दक्षिणी पूर्वी विकासखण्ड जयजयपुर, डभरा, मालखरौदा एवं चांपा में मत्स्योत्पादन का विकास नहीं हुआ।

बिलासपुर जिले में मत्स्यपालन की शासकीय इकाइयाँ


शासन में मत्स्यपालन के लिये अनेक जलाशयों का विकास किया है जिनमें मत्स्य विकास निगम द्वारा मत्स्य पालन किया जा रहा है। जिले के जलाशयों में सहायक संचालक मत्स्योद्योग द्वारा मत्स्य पालन किया जाता है।

सहायक संचालक की मुख्य मत्स्य पालन इकाइयाँ


सहायक संचालक मत्स्योद्योग ने शासन को 6 निम्नांकित जलाशय प्रदान किये हैं-

हसदो बैराज, दर्री


हसदो नदी पर निर्मित इस जलाशय का मत्स्य पालन जल क्षेत्र 1,785 हेक्टेयर है। यहाँ पर बड़ी मात्रा में कतला, रोहू एवं आयातित प्रजाति का मत्स्यपालन किया जाता है। वार्षिक मत्स्योत्पादन 1,63,892.5 लाख टन है।

घोंघा जलाशय


कोंटा मार्ग पर स्थित इस जलाशय में सन 1972 से मत्स्यपालन विकसित किया गया है। इस जलाशय का मत्स्योत्पादक जल क्षेत्र 445 हेक्टेयर है।

आरसमेटा जलाशय


पामगढ़ विकासखण्ड में स्थित इस जलाशय का मत्स्योत्पादक क्षेत्र 50 हेक्टेयर है।

गगनई जलाशय


मरवाही विकासखण्ड में गगनई नालों पर निर्मित इस जलाशय का मत्स्योत्पादक जल क्षेत्र 475 हेक्टेयर है।

क्रांति जलाशय


पंडरिया विकासखण्ड में स्थित इस जलाशय का विकास 1961-62 में किया गया। इस जलाशय का मत्स्योत्पादक क्षेत्र 50 हेक्टेयर है।

देवरीपाली जलाशय


इस जलाशय का मत्स्योत्पादक क्षेत्र 77 हेक्टेयर है।

मत्स्य विकास निगम की मत्स्य पालन इकाइयाँ


मत्स्यपालन की दृष्टि से जिले में द्वितीय महत्त्वपूर्ण उत्पादक केन्द्र है। यहाँ पर देशी एवं विदेशी प्रजाति की मछलियों का मिश्रित पालन किया जाता है। जलाशय का मत्स्योत्पादक क्षेत्र 2600 हेक्टेयर है।

खुड़िया जलाशय


मत्स्य पालन में इस जलाशय का प्रथम स्थान है। इस जलाशय का मत्स्योत्पादक क्षेत्र 1611 हेक्टेयर है।

दुलहरा जलाशय


रतनपुर के पास स्थित इस जलाशय का मत्स्योत्पादक क्षेत्र 169 हेक्टेयर है।

निजी मत्स्यपालन इकाइयाँ


निजी क्षेत्र के वितरण प्रारूपों को स्पष्ट करना अत्यंत कठिन है। निजी क्षेत्र को मत्स्य पालन इकाइयाँ सम्पूर्ण जिले में बिखरी हुई हैं। जिले में ग्राम पंचायतों एवं सिंचाई विभागाधीन एवं जलाशयों को एक निश्चित अवधि के ठेके पर मत्स्य पालकों को दिया जाता है।

जिले में 88,985 हेक्टेयर जल क्षेत्र में निजी व्यवसायी मत्स्योपालन कर रहे हैं। जो कुल मत्स्योत्पादक जल क्षेत्र का 55.78 प्रतिशत है। जिले की सभी तहसीलों में निजी मत्स्योत्पादक इकाइयाँ हैं, बंधवां तालाब कोतमीसुनार, आगरिया आदि प्रमुख निजी मत्स्यपालन इकाइयाँ हैं। इन तालाबों का मत्स्योत्पादक जल क्षेत्र 50 से 600 हेक्टेयर है।

मत्स्योत्पादन


जिले में मत्स्योद्योग विभाग की स्थापना के (1961) पश्चात यह उद्योग विकसित होता गया वर्तमान में जिले में वृहत पैमाने पर मत्स्योत्पादन किया जा रहा है। बिलासपुर जिले में वर्ष 1985-86 की अवधि में 7622 लाख टन मत्स्योत्पादन हुआ है, जिनसे लगभग 79,902.00 लाख रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ है।

जिले में शासकीय मत्स्योत्पादन क्षेत्र कुल मत्स्योत्पादक क्षेत्र के 44.8 प्रतिशत क्षेत्र में विस्तृत है, इनमें 899.303 लाख टन वार्षिक उत्पादन अनुमानित है। जिले में निजी मत्स्य व्यवसाय का महत्त्वपूर्ण स्थान है, जो 60 प्रतिशत से अधिक मत्स्योत्पादन करता है।

जिले में मत्स्योत्पादन के अतिरिक्त मत्स्यबीज का भी उत्पादन होता है। बिलासपुर जिले में मत्स्यबीज उत्पादन हेतु प्रक्षेत्रों का निर्माण किया गया है प्रमुख मत्स्य बीज उत्पादक क्षेत्र का विवरण सारिणी क्रमांक 30 में दर्शाया गया है।

सारिणी क्रमांक 30 बिलासपुर जिला मत्स्य बीज उत्पादक क्षेत्र इन क्षेत्रों में प्रतिवर्ष 1 से 25 लाख टन मत्स्य बीज का उत्पादन होता है। जिसका उपयोग स्थानीय तालाबों एवं जलाशयों में मत्स्य पालन हेतु किया जाता है।

सारांश एवं उपसंहार


पूर्वी मध्य प्रदेश के 1966.8 वर्ग किमी क्षेत्रफल में बिलासपुर जिले (210-03’ से 230-07’ उत्तरी अक्षांश तथा 810-12’ से 830-40’ पूर्वी देशांतर) का विस्तार है। इसमें 14 तहसील एवं 25 विकासखण्ड है। आर्कियन युग की ग्रेनाइट, कड़प्पा क्रम का चूना प्रस्तर एवं शैल, कार्बनिक रस युग के गोंडवाना क्रम की कोयला संस्तर एवं बालुका प्रस्तर तथा नदी तटीय क्षेत्रों के नूतन एवं अभिनूतन, कॉप के जमाव प्रमुख भूवैज्ञानिक संरचना है।

बिलासपुर जिले को दो भौतिक प्रदेशों में विभक्त किया जा सकता है- उत्तरी पर्वतीय पठारी प्रदेश एवं दक्षिणी मैदानी क्षेत्र। पेण्ड्रा पठार, मैकल श्रेणी, लोरमी पठार, धुरी हाड़ियां, कोरबा, हसदो-रामपुर बेसिन, उत्तरी पर्वतीय पठारी प्रदेश की प्रमुख भ्वाकृतिक इकाइयाँ है, जिनकी ऊँचाई 500 से 1500 मीटर तक है। दक्षिणी मैदानी क्षेत्र मुख्यत: महानदी एवं उसकी सहायक नदियों अरपा, मनियारी, शिवनाथ सोन द्वारा निर्मित है। अरपा नदी इस मैदान को दो भागों में विभक्त करती है - पूर्वी बिलासपुर मैदान, हसदो नदी द्वारा निर्मित है एवं 290-300 मीटर औसत ऊँचाई है। सम्पूर्ण भू-दृश्य प्रौढ़ मैदानी स्वरूप का है जिसमें नदियाँ धीमे एवं लम्बे विसर्पों में बहती है। पश्चिमी बिलासपुर मैदान मुख्यत: अरपा नदी से हॉफ नदी तक विस्तृत है। इस मैदान की औसत ऊँचाई 360 मीटर है। यह मैदान काली मिट्टी का क्षेत्र है।

बिलासपुर जिले का 94.2 प्रतिशत भाग महानदी प्रवाह क्रम द्वारा अपवाहित है एवं लगभग 5 प्रतिशत भाग गंगा प्रवाह क्षेत्र के अंतर्गत आता है। शिवनाथ एवं उसकी सहायक अरपा, मनियारी एवं हसदो, सोन तथा बोराई नदियाँ महानदी प्रवाह क्रम की एवं सोन नदी गंगाप्रवाह क्रम का प्रतिनिधि करती है। हसदो जिले का सर्वप्रमुख नदी है, जो देवगढ़ की पहाड़ी से निकलकर जिले के वनाच्छादित पौड़ी-उपरोरा, कोरबा तथा चांपा के मैदान में प्रवाहित होती हुई शिवरीनारायण के समीप महानदी में मिलती है। जिले के अंतर्गत नदी की लंबाई 100 किमी है। इस नदी पर वृहत सिंचाई परियोजना का निर्माण किया गया है, जिससे जिले के समस्त पूर्वी भागों को सिंचाई हेतु जल प्राप्त हो सका है।

शिवनाथ नदी की सहायक अरपा नदी की प्रमुख सहायक नदी खारून है जिस पर खारंग जलाशय का निर्माण किया गया है। मनियारी नदी मैकल श्रेणी से निकलकर दक्षिणी-पूर्वी ढाल का अनुसरण करते हुए शिवनाथ में मिलती है। इसकी लंबाई 119 किमी है। अन्य प्रमुख नदियों में बोराई, लीलागर, सोन प्रमुख है, जो महानदी प्रवाह क्रम का निर्माण करती है। जिले के उत्तरी-पश्चिमी भाग में 48 किलो मीटर के एक संकरे बेसिन का निर्माण करते हुए सोन नदी उत्तर-पूर्व की ओर प्रवाहित होती हुई गंगा नदी में विलीन हो जाती है।

जिले की मिट्टियाँ मुख्यत: लाल एवं पीली प्रकार की है। इन्हें स्थानीय रूप से तीन प्रकारों - कन्हारी, मटासी एवं डोरसा मिट्टी में विभक्त किया जाता है। कन्हार मिट्टी जिसमें काली मिट्टी की प्रमुखता होती है, का विस्तार मुख्यत: दक्षिणी-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र में है। इस मिट्टी की जल धारण क्षमता 45 से 70 सेमी तक होती है। जिले में इस प्रकार की मिट्टी में गेहूँ, चना मटर, जैसी फसलें ली जाती है। मटासी मिट्टी लाल एवं पीली मिट्टी की प्रमुखता वाली मिट्टी में जल धारण क्षमता 10-20 प्रतिशत है। जिले के हसदोमांद के मैदान में व्यापक रूप से यह मिट्टी पायी जाती है। प्राय: डोरसा मिट्टी, कन्हार एवं मटासी मिट्टियों का मिश्रण है। यह प्राय: सही फसलों के लिये उपयुकत है। बिलासपुर जिले के तखतपुर कोटा, लीलागर, मनियारी नदी के क्षेत्र में इसका विस्तार है। भाटा मिट्टी जिले के उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में पायी जाने वाली अनुपजाऊ मिट्टी है। मुख्यत: मुरूम पाया जाता है।

बिलासपुर जिले की जलवायु मानसूनी है। दैनिक एवं वार्षिक तापांतर, वर्षा की अनियमितता जलवायु का ऋतित्वक क्रम जिले का जलवायु की प्रमुख विशेषता है। जिले का अधिक तापक्रम मई में 400 से. एवं न्यूनतम दिसंबर-जनवरी में 100 से. रहता है। वायुदाब सामान्यत: 946 (शीतकाल) से 936 (ग्रीष्मकाल) मिली मीटर रहता है। वर्षा प्रमुखत: मानसून अवधि में होती है। इन अवधि में जिले में सर्वाधिक वर्षा कटघोरा में 1957.5 मिली मीटर एवं न्यूनतम वर्षा मुंगेली में 964.9 मिली मीटर होती है।

बिलासपुर जिले में लगभग 21.6 प्रतिशत अर्थात 328890 हेक्टेयर क्षेत्र में वनों का विस्तार है। वनों का अधिकांश विस्तार जिले के उत्तरी क्षेत्रों में है। इन वनों में मुख्यत: साल वनों का विस्तार (2585 वर्ग किमी) है। पेण्ड्रा पठारी क्षेत्र में मिश्रित प्रकार के वनों का विस्तार (15863 हे. में) है। जिसमें सागौन, शीशम, आम, आंवला, तेंदु जैसे महत्त्वपूर्ण वृक्ष पाए जाते हैं। जिले में बांस के वन भी मिलता है।

वर्ष 1981 की जनगणना के अनुसार जिले की जनसंख्या 2953366 व्यक्ति हैं। जनसंख्या का सर्वाधिक केंद्रीकरण दक्षिणी मैदानी क्षेत्र में है। बिलासपुर जिले की जनसंख्या का औसत घनत्व 148 व्यक्ति/वर्ग किमी है। जिले की 86.1 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण है जो 3616 ग्रामों में तथा 13.9 प्रतिशत नगरीय जनसंख्या 13 नगरों में निवास करती है। जिले की प्रति ग्राम जनसंख्या 721 व्यक्ति हैं। जिले की जनसंख्या का लिंगानुपात 957 है। जिले की 28.59 प्रतिशत जनसंख्या साक्षर है। जिले में कुल जनसंख्या का 17.25 प्रतिशत अनुसूचित जाति एवं जनजातियों का है। इनका केंद्रीकरण मुख्यत: मरवाही, गौरेला में अधिक है।

बिलासपुर जिले के भूमि उपयोग संवर्गों में वनोन्तर्गत 22.5 प्रतिशत भूमि, कृषि के लिये अप्राप्य भूमि 5.85 प्रतिशत, अकृषिगत भूमि 11.85 प्रतिशत, कृषि योग्य भूमि 2.32 प्रतिशत पड़ती भूमि 3.60 प्रतिशत एवं निरा बोया गया क्षेत्र 54.48 प्रतिशत है। जिले में निरा बोये गये क्षेत्र का विस्तार दक्षिणी मैदानी क्षेत्रों में अधिक है।

कृषि बिलासपुर जिले की अर्थ व्यवस्था का प्रमुख अंग है। धान प्रमुख फसल है। संपूर्ण कृषि क्षेत्र के 62.77 प्रतिशत भूमि पर धान की कृषि की जाती है। जिले की कृषि निर्वहन प्रकार की है। जिसमें खरीफ की फसलों का प्राधान्य है।

धान, कोदो, कुटकी, तीवरा इत्यादि खरीफ फसल है। गेहूँ, चना रबी की फसलें हैं। इसके अतिरिक्त जिले में साक-सब्जी का भी उत्पादन होता है। जिले में कुल फसली क्षेत्र के 62.7 प्रतिशत भाग पर धान का उत्पादन किया जाता है, जिसका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 25.33 क्विंटल है। गेहूँ महत्त्वपूर्ण रबी की फसल है जो कन्हार मिट्टी के क्षेत्र में होती है। गेहूँ का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 10.84 क्विंटल है। जिले के उत्तरी विकासखण्डों में तीवरा, मक्का की कृषि भी की जाती है।

बिलासपुर जिला खनिज संसाधन की दृष्टि से संपन्न है। यहाँ बॉक्साइट (3.799 लाख टन), डोलोमाइट (522.00 लाख टन), कोयला (958.73 लाख टन) एवं चूना प्रस्तर (2113 लाख टन) के विशाल संभाव्य संचित भंडार हैं। इनके अतिरिक्त अग्नि, मिट्टी, अभ्रक, क्वार्टज खनिज भी पाये जाते हैं।

जिले में पंचवर्षीय योजनान्तर्गत उद्योगों का पर्याप्त विकास हुआ है। संप्रत्ति जिले में 4 वृहत, 8 मध्यम एवं 300 से अधिक लघु औद्योगिक इकाइयाँ स्थापित हो चुकी है। बिलासपुर जिले में जल संसाधन प्राप्ति का प्रमुख स्रोत वर्षा है। जुलाई एवं अगस्त सर्वाधिक वर्षा के महीने हैं जबकि कुल वार्षिक वर्षा का 60 प्रतिशत से अधिक वर्षा प्राप्त होती है। सितंबर एवं अक्टूबर में निवर्तन कालीन मानसून से 4 से 16 प्रतिशत तक वार्षिक वर्षा प्राप्त होती है। वार्षिक वर्षा की मात्रा पश्चिम से पूर्व की ओर क्रमश: बढ़ते जाती है। औसत वार्षिक विचलनशीलता 24.8 प्रतिशत है। वर्षा की विचलनशीलता का विस्तार न्यूनतम 22 प्रतिशत (पेण्ड्रा) में अधिकतम 32 प्रतिशत (जांजगीर) है। सामान्यत: सितंबर एवं अक्टूबर में विचलनशीलता का प्रतिशत सर्वाधिक (70-80 प्रतिशत) है। बिलासपुर जिले के किसी भी भाग में वर्षा के उतार-चढ़ाव की प्रवृत्ति का सामान्यकृत स्वरूप निर्धारित नहीं किया जा सकता। तथापि यह तथ्य स्पष्ट है कि सामान्यत: अधिक वर्षा की अवधि न्यूनतम वर्षा की अवधि का अनुसरण करती है। जिले में वर्षा की मात्रा में वर्ष दर वर्ष ह्रास की प्रवृत्ति दिखाई देती है। ह्रास की यह दर अधिकतम (1-1.07 सेमी), मुंगेली में तथा न्यूनतम (0.14 सेमी) कटघोरा में है। जिले के अन्य केंद्रों यथा जांजगीर में यह ह्रास दर 1.29 सेमी, पेण्ड्रा में 0.24 समी तथा सक्ती में 0.09 सेमी है (आरेख क्रमांक 2)। यद्यपि वर्षा की यह ह्रास दर कम है तथापि धान उत्पादक क्षेत्र के लिये यह संकट का सूचक है साथ ही क्षेत्र के जल संसाधन विकास प्रबंधकों हेतु एक चेतावनी है।

जिले के सभी क्षेत्रों में वार्षिक वर्षा एवं संभाव्य वाष्पीय वाष्पोत्सर्जन के अंतर्सम्बन्धों का अध्ययन जल बजट की स्थिति स्पष्ट होती है। जिले में औसत सामान्य वाष्पोत्सर्जन की मात्रा उत्तर से दक्षिण की ओर क्रमश: घटते जाती है। उत्तरी क्षेत्र में औसत संभाव्य, वाष्पीय वाष्पोत्सर्जन 1409 मिलीमीटर एवं दक्षिणी क्षेत्रों में 1480 मिलीमीटर है। संभाव्य वाष्पीय वाष्पोत्सर्जन की इस क्षेत्रीय विषमता का प्रमुख कारण तापक्रम भिन्नता, मिट्टी की संचित आर्द्रता ग्राही क्षमता, वानस्पतिक आवरण, वार्षिक वर्षा है। जिले में जलाभाव की मात्रा में उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर क्रमश: वृद्धि होती है, जिले के उत्तर में स्थित कटघोरा-पेण्ड्रा में औसत वार्षिक जलाभाव 600-700 मिलीमीटर के मध्य है जबकि न्यूनतम 300-350 मिलीमीटर कटघोरा एवं पेण्ड्रा में एक सामान्य जल वर्ष में जिले में जलाभाव की सामान्यत: दो स्थितियाँ निर्मित होती है। प्रथम मानसून काल में संचित आर्द्रता से शीतकालीन जलीय आवश्यकता पूर्ण नहीं हो पाती। फलत: शुष्कता की स्थिति निर्मित हो जाती है। द्वितीय मार्च तक मिट्टी में संचित आर्द्रता की समाप्ति के साथ शुष्कता की द्वितीय स्थिति निर्मित हो जाती है। सामान्यत: अधिक वर्षा वाले क्षेत्र अधिकतम जलाधिक्य के क्षेत्र हैं। इनमें कटघोरा में 695, मिलीमीटर, पेण्ड्रा में 760 मिलीमीटर, जांजगीर में 516 मिलीमीटर एवं बिलासपुर में 350 मिलीमीटर जलाधिक्य क्षेत्र है। जिले की औसत आर्द्रता पर्याप्तता 56.25 प्रतिशत है। अधिक आर्द्रता पर्याप्तता, कटघोरा एवं पेण्ड्रा क्षेत्र में क्रमश: 63 एवं 61 प्रतिशत की वर्षा की लंबी अवधि, कुल वार्षिक वर्षा की प्राप्ति, मिट्टी की उच्च जल धारण क्षमता इन क्षेत्र में आर्द्रता पर्याप्तता का प्रमुख कारण है। आर्द्रता पर्याप्तता सर्वाधिक मानसून काल में 90 प्रतिशत होती है, जो अक्टूबर के पश्चात क्रमश: कम होते जाती है।

बिलासपुर जिले के विभिन्न केंद्रों पर वर्ष 1956-86 की अध्ययन अवधि में 67.76 की दशक सर्वाधिक सूखा ग्रस्त रहा। इस अवधि में सर्वाधिक सूखाग्रस्त जांजगीर क्षेत्र (19 शुष्क वर्ष) रहा। जबकि पेण्ड्रा एवं कटघोरा में सूखे वर्षों की संख्या क्रमश: 12 एवं 11 रही। जिले में शुष्कता गहनता सर्वाधिक मुंगेली एवं जांजगीर में (60 प्रतिशत से अधिक) एवं न्यूनतम (35.45 प्रतिशत) कटघोरा में है।

जिले का मुंगेली एवं बिलासपुर क्षेत्र सर्वाधिक शुष्क क्षेत्र हैं एवं शुष्कता गहनता सूचकांक 75 प्रतिशत से अधिक है। जांजगीर, सक्ती मध्यम शुष्क क्षेत्र (शुष्कता गहनता सूचकांक 40-45 प्रतिशत) एवं कटघोरा, पेण्ड्रा, न्यून शुष्क क्षेत्र के प्रतिनिधि केंद्र है। संपूर्ण जिले को आर्द्रता सूचकांक के आधार पर पुन: तीन आर्द्रता प्रदेश में विभक्त किया जा सकता है। ‘बी’ आर्द्रता प्रदेश, जिसका विस्तार मुख्यत: उत्तरी बिलासपुर क्षेत्र में है। कटघोरा, पेण्ड्रा, सक्ती का प्रतिनिधि केंद्र हैं, इनका आर्द्रता सूचकांक क्रमश: 65.2, 53.7, 59.5 है।

नम आर्द्र (सी-1) आर्द्रता प्रदेश में जलाभाव की मात्रा क्रमश: बढ़ते जाती है। जिले के जांजगीर क्षेत्र, दक्षिण पूर्वी एवं मध्यवर्ती मैदानी क्षेत्र में इसका विस्तार। जिले का दक्षिण पश्चिम के मैदानी क्षेत्र शुष्क आर्द्र ‘सी-1’ आर्द्रता प्रदेश के अंतर्गत आता है। मुंगेली, प्रमुख प्रतिनिधि केंद्र है।

बिलासपुर जिले में धरातलीय जल उपलब्धता का 95.04 प्रतिशत (9829 लाख घन मीटर) जल 18694 वर्ग किलो मीटर क्षेत्र में विस्तृत महानदी प्रवाह क्रम की नदियों द्वारा संग्रहित होता है। शेष 5.04 प्रतिशत जल 964 वर्ग किमी क्षेत्र में विस्तृत गंगा प्रवाह क्रम की सोन एवं उसकी सहायक नदियों द्वारा प्राप्त होता है।

बिलासपुर जिले की विभिन्न नदियों में वार्षिक जलावाह की मात्रा में पर्याप्त क्षेत्रीय विषमताएँ एवं परिवर्तन दृष्टिगत होता है। हसदो नदी का उच्चतम मासिक जलावाह 714.14 लाख घनमीटर प्रति सेकेंड है तथा न्यूनतम 4.06 लाख घन मीटर प्रति सेकेंड है। अरपा नदी का न्यूनतम जल प्रवाह 0.6 लाख घनमीटर प्रति सेकेंड में अधिक 130.6 लाख घनमीटर प्रति सेकेंड है।

सामान्यत: शिवनाथ एवं अरपा नदियों का 95 प्रतिशत जलावाह जुलाई से सितंबर की अवधि में होता है। वहीं महानदी एवं हसदो नदी में यह अवधि जून से नवंबर तक रहती है क्योंकि इस भाग में वर्षा की अवधि लंबी है। सामान्यत: मासिक जलावाह मासिक वर्षा का अनुसरण करती है। मानसून अवधि उच्च जलावाह की अवधि है। सितंबर के पश्चात वर्षा की घटती दर के साथ-साथ जलावाह की मात्रा भी कम होते जाती है। इस अवधि में जिले में नदी जल प्रवाह अधिकतम 9.6 लाख घनमीटर से न्यूनतम 0.45 लाख घनमीटर (अरपा) तक रहता है। जिले के विभिन्न नदी जल प्रवाहमापी केंद्रों पर वार्षिक जलावाह में भी पर्याप्त विभिन्नता है। औसत वार्षिक जलावाह में भी पर्याप्त विभिन्नता है। औसत वार्षिक जलावाह की अधिकतम मात्रा 6882.5 लाख घनमीटर प्रति सेकेंड बसंतपुर (महानदी) में है। शिवनाथ एवं हसदो का जलावाह क्रमश: 3,146 एवं 1,685 लाख घन मीटर प्रति सेकेंड की न्यूनतम वार्षिक जलावाह क्रमश: गतौरा में 316.6 लाख घनमीटर प्रति सेकेंड है।

बिलासपुर जिले में जलावाह की मात्रा भी वर्षा के वितरण की भांति उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर क्रमश: घटते जाती है। अधिकतम, जलावाह कटघोरा में 10050 मिली मीटर एवं न्यूनतम मुंगेली में 489 मिलीमीटर है। वार्षिक वर्षा की भांति औसत वार्षिक जलावाह की मात्रा में भी अत्यधिक विचलनशीलता है। विचलनशीलता का मुख्य कारण प्रवाह क्षेत्र में वर्षा की अनियमितता एवं प्राप्यता में भिन्नता है। वार्षिक विचलनशीलता का यह प्रतिशत बम्हनीडीह में 32.5, जौंधरा में 32.5, गतौरा में 44.5 एवं बसंतपुर मे 30.5 प्रतिशत है।

तालाब तथा जलाशय की धरातलीय जल संग्रहण अथवा उपलब्धता के प्रमुख स्रोत है, जो बिलासपुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के प्रमुख भूदृश्य हैं। जिले में गहरे छिछले एवं अधिक फैले (डबरी) तालाबों की संख्या अधिक ही वर्षा अवधि में इन तालाबों से छोटी नालियों की सहायता से ढाल में स्थित खेतों में सिंचाई हेतु जल उपलब्ध होता है।

जिले में 40 हेक्टेयर से अधिक सिंचाई क्षमतायुक्त तालाबों की संख्या 466 है। सर्वाधिक केंद्रीकरण मध्यवर्ती, विकासखण्डों - बिल्हा, मस्तुरी, पामगढ़, तखतपुर, अकलतरा में है। 40 हेक्टेयर से कम सिंचाई क्षमता युक्त तालाबों का सर्वाधिक वितरण अरपा-लीलागर दोआब में है। इस क्षेत्र में तालाबों की संख्या 4827 है। जल संसाधन विकास की दृष्टि से जिले के मध्यवर्ती एवं दक्षिण-पूर्वी मैदानी क्षेत्र के तालाबों के द्वारा सिंचाई की अतिरिक्त सुविधा प्राप्त हुई है। लगभग 6702 तालाबों द्वारा 15107 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की जाती है, जो संपूर्ण जिले के सिंचित क्षेत्र का 8.5 प्रतिशत है। जिले में प्रति 100 हेक्टेयर तालाबों का घनत्व सर्वाधिक मालखरौदा विकासखण्ड में (2.9) एवं न्यूनतम घनत्व कोरबा विकासखण्ड (0.2) में है। सामान्यत: जिले के प्रत्येक ग्राम में एक तालाब अवश्य है। जिले में प्रति ग्राम तालाबों की संख्या 4.3 है। ऐसे ग्राम जहाँ तालाबों की संख्या 10 से 15 है।

बिलासपुर जिले में सतही जल के संग्रहण हेतु खारंग, मनियारी, बांगों एवं घोंघा जलाशय का निर्माण किया गया है।

बांगों जलाशय हसदो नदी पर निर्मित है। एवं इसकी जल संग्रहण क्षमता 3476.9 लाख घनमीटर है। इस जलाशय से 40486 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होती है। खारंग जलाशय 1930 में अरपा की सहायक शाखा पर निर्मित किया गया था इसके द्वारा मस्तुरी, बिल्हा विकासखण्ड के 4534 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई की सुविधा प्राप्त हुई। मनियारी नदी पर वर्ष 1931 में निर्मित मनियारी जलाशय की जल संग्रहण क्षमता 147.81 लाख घनमीटर है। एवं इसके द्वारा लगभग 40812 हेक्टेयर क्षेत्र में (मंगेली, लोरमी, तखतपुर) सिंचाई की जाती है।

बिलासपुर जिले के 15664 तालाबों, 4 जलाशयों एवं नदी नालों के रूप में संपूर्ण जिले की लगभग 53949 हेक्टेयर भूमि जलान्तर्गत है, जो संपूर्ण जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 27.4 प्रतिशत है।

भूगर्भजल जल उपलब्धता मुख्यत: चट्टानी सरंध्रता, चट्टानों की जलवहन क्षमता एवं चट्टानी कणों की विभिन्नता पर निर्भर है। जिले की आर्कियन ग्रेनाइट एवं नीस चट्टानों में प्राथमिक सरंध्रता के अभाव में अपक्षयित संधियों एवं दरारी क्षेत्र अच्छे जलागार हैं। गोंडवाना युगीन बालुका प्रस्तर एवं अपचयित चूना प्रस्तर की जिले की अच्छे भूगर्भजल उपलब्धता स्रोत हैं। इन अपचयित चट्टानी संस्तरों की मोटाई 15 से 30 मीटर तक है। बिलासपुर जिले की भूगर्भ जलस्तर गहनता अध्ययन हेतु 100 निरीक्षण कूपों का अध्ययन किया गया है (परिशिष्ट क्रमांक) जिले के विभिन्न भागों में भूगर्भ जलस्तर गहनता में विषमता है। जिले की 60 प्रतिशत निरीक्षण कूपों में गहनता 0 से 5 मीटर तक है। जिले के दक्षिण-पश्चिम मैदानी क्षेत्र में भूगर्भजल तल की गहराई 5 से 10 मीटर तक एवं न्यूनतम भूगर्भ जलस्तर अपचयित चूना प्रस्तर एवं कॉपयुक्त नदी तटीय क्षेत्रों में 0 से 3 मीटर तक है।

जिले में मानसून अवधि में औसत जल सतह की गहराई 4.45 मीटर रहती है परंतु चक्रभाटा बिल्हा-सरगाँव का क्षेत्र एक अपवाह है जहाँ जल सतह मानसून काल में भी 14.59 मीटर नीचे रहता है। मानसूनोत्तर अवधि में भूगर्भ जलस्तर 1 मीटर से 8 मीटर तक होता है। औसत अधिकतम एवं न्यूनतम जल तल उतार-चढ़ाव क्रमश: 10.81 मीटर (बेलतरा में) एवं 0.4 मीटर (काठांकोनी, तखतपुर विकासखण्ड में) है। संपूर्ण अध्ययन अवधि (1972, 84) में न्यूनतम उतार-चढ़ाव (0.04 मीटर), कुरदुर में पाया गया एवं खोली (पथरिया) में सर्वाधिक उतार-चढ़ाव 21.11 मीटर पाया गया है। औसत भूगर्भ जल उतार-चढ़ाव 4.45 मीटर है।

बिालसपुर जिले में कुल भूगर्भ जल पुन: पूर्ति 2873.58 लाख घन मीटर वार्षिक है। एवं भूगर्भ जल की शुद्ध पुन: पूर्ति 2408.29 लाख घनमीटर है। जिले में भूगर्भ जल पुन: पूर्ति सर्वाधिक पौड़ी उपरोरा विकासखण्ड में 3835 हेक्टेयर मीटर है एवं न्यूनतम अकलतरा चांपा आदि विकासखण्डों में 3.50 लाख घनमीटर है। इन विकासखण्डों में भूगर्भ जल पुन: पूर्ति की न्यूनता का मुख्य कारण कठोर कड़प्पा क्रम की चूना प्रस्तर वाली चट्टानी संरचना तथा अधिक मात्रा में भूगर्भ जल निकासी है।

बिलासपुर जिले में भूगर्भ जल निकासी 86.17 लाख घनमीटर है। जो कुल भूगर्भ जल पुन: पूर्ति का 3.57 प्रतिशत है। भूगर्भ जल निकासी की सर्वाधिक मात्रा डभरा विकासखण्ड में है। यहाँ कुल प्राप्य भूगर्भ जल का 1.5 प्रतिशत (5.55 लाख घन मीटर) है जल का निकास हुआ। जिले में भूगर्भ जल का न्यूनतम विकास 1.70 लाख घन मीटर वार्षिक पौड़ी उपरोरा विकासखण्ड में है। जो कुल भूगर्भ जल प्राप्यता का 0.4 प्रतिशत है। अकलतरा, चांपा, सक्ती, जयजयपुर विकासखण्डों में भूगर्भ जल निकासी की मात्रा 2.00 से 3.00 लाख घनमीटर वार्षिक है जो कुल भूगर्भ जल प्राप्यता का 5 से 10 प्रतिशत है।

बिलासपुर जिले में जल संसाधन विकास योजना पूर्व ही प्रारंभ हो गया था। बीसवीं शताब्दी का द्वितीय दशक जल संसाधन विकास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा जब हसदो सिंचाई विभाग की स्थापना के साथ जिले में दो महत्त्वपूर्ण सिंचाई योजनाएँ - खारंग जलाशय (1930) एवं मनियारी जलाशय (1931) क्रियान्वित की गई। इन योजनाओं के निर्माण के फलस्वरूप जिले में सिंचित क्षेत्र में अत्यधिक वृद्धि हुई वर्ष 1931-51 की अवधि में सिंचाई का अत्यंत न्यून विकास हुआ। जिले में पंचवर्षीय योजना के तहत सिंचाई का विकास द्रूतगति से हुआ। वर्ष 1957-61 की अवधि में शासन द्वारा सिंचाई विकास हेतु निर्मित की गई। वृहत एवं लघु योजनाओं के सिंचित क्षेत्र में 11.10 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो सकी। तृतीय पंचवर्षीय योजना (1965-70) में जिले की महती जल संसाधन विकास परियोजना हसदो-बांगों का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ एवं जिले से 41488 हे. क्षेत्र में सिंचाई की जाती है। चौथी एवं पाँचवी पंचवर्षीय योजनान्तर्गत जिले में लघु सिंचाई योजना पर विशेष ध्यान रखा गया। छठवीं पंचवर्षीय योजना में 18367.3 हेक्टेयर में सिंचाई की अतिरिक्त सुविधा प्राप्त हुई। वर्तमान में जिले में 178282 हेक्टेयर (कुल फसली क्षेत्र का 16.4 प्रतिशत) में सिंचाई की सुविधा प्राप्त है।

जिले में जल संसाधन का विकास सर्वाधिक बिलासपुर तहसील में हुआ है। संप्रति कुल फसल क्षेत्र का 82.4 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र है। विकास की दृष्टि से जांजगीर द्वितीय स्थान पर है। जहाँ वर्ष 1964-67 की अवधि में 3315 हेक्टेयर भूमि सिंचित थी जो 1984-87 में बढ़कर 63479 हेक्टेयर हो गई। मुंगेली तहसील में सिंचाई की वृद्धि दर 5.10 प्रतिशत रही। सक्ती एवं कटघोरा तहसीलों में इस वृद्धि का प्रतिशत क्रमश: 66.18 एवं 89.7 प्रतिशत है।

बिलासपुर जिले के सिंचित क्षेत्र के वितरण की दृष्टि से क्षेत्रीय विभिन्नता स्पष्टतया परिलक्षित होती है। जिले के दक्षिणी मैदानी भागों में सिंचाई का केंद्रीकरण अत्याधिक हुआ है। समस्त दक्षिणी मैदानी क्षेत्र में विकासखण्डों के कुल क्षेत्रफल 92086 हेक्टेयर का 23.4 प्रतिशत क्षेत्र सिंचित है। वहीं उत्तरी विकासखण्डों में (घुरी पहाड़िया, पेण्ड्रा पठार आदि) कुल भौगोलिक क्षेत्र के 1.9 प्रतिशत भाग ही सिंचित है। जिले में कुल फसली क्षेत्र में सिंचित क्षेत्र का विस्तार न्यूनतम कटघोरा विकासखण्ड में 0.81 प्रतिशत तथा अधिकतम 60.76 प्रतिशत जांजगीर विकासखण्ड में है। मुंगेली, पंडरिया, बलौदा, अकलतरा विकासखण्डों में कुल फसली क्षेत्र के 10-20 प्रतिशत तक क्षेत्र सिंचित है। मरवाही, पाली, पेण्ड्रा, करतला विकासखण्डों में सिंचित क्षेत्र का प्रतिशत क्रमश: 3.05, 3.38, 2.70 एवं 2.52 है।

नहरें बिलासपुर जिले में सिंचाई के प्रमुख साधन हैं। जिले के संपूर्ण सिंचित क्षेत्र का 76.2 प्रतिशत क्षेत्र नहरों द्वारा सिंचित हैं। योजना पूर्व जिले में नहरों द्वारा सिंचित क्षेत्र 80285 हेक्टेयर था जबकि वर्तमान में यह क्षेत्र 135591 हेक्टेयर है। बिलासपुर जिले में नहरों द्वारा सर्वाधिक सिंचित क्षेत्र जांजगीर विकासखण्ड में 35998 हेक्टेयर है जो कुल सिंचित क्षेत्र का 97.0 प्रतिशत है। मस्तुरी, अकलतरा, बिल्हा, बलौदा, विकासखण्ड में 50 से 70 प्रतिशत तक भूमि नहरों द्वारा सिंचित है। उत्तरी विकासखण्डों - मरवाही, गौरेला, पोंडी उपरोरा आदि में नहरों द्वारा सिंचित क्षेत्र न्यून (0-1 प्रतिशत) है। मस्तुरी, जांजगीर, अकलतरा, लोरमी विकासखण्डों में नहरों द्वारा सिंचाई का घनत्व सर्वाधिक (50 प्रतिशत) है। बिल्हा, मुंगेली एवं बलौदा विकासखण्ड में 20 से 25 प्रतिशत तक एवं शेष विकासखण्डों मरवाही, पंडरिया जयजयपुर तथा मालखरौदा में सिंचित क्षेत्र 5 प्रतिशत से कम है।

तालाबों द्वारा बिलासपुर जिले के 10.16 प्रतिशत क्षेत्र में सिंचाई की जाती है। सिंचाई युक्त तालाबों का केंद्रीकरण हसदो महानदी मैदान में है। इन क्षेत्रों में सिंचाई युक्त वृहत तालाबों की संख्या 1516 है। तालाब द्वारा सिंचित क्षेत्र की गहनता सर्वाधिक जयजपुर विकासखण्ड में (22.0 प्रतिशत) है। अकलतरा, बलौदा, पामगढ़, चांपा, मालखरौंदा, सक्ती, डभरा विकासखण्ड में गहनता 5 से 10 प्रतिशत है।

कुओं द्वारा जिले के 4.16 प्रतिशत भूमि को सिंचाई हेतु जल प्राप्य होता है। जिले में वर्तमान में कुल 17982 सिंचाई कुएँ हैं। जिनमें से 8.4 प्रतिशत मस्तुरी, जयजयपुर एवं रायगढ़ में है। कुओं की न्यूनतम संख्या पंडरिया विकासखण्ड में (211) है। कुओं द्वारा सिंचित क्षेत्र का सर्वाधिक विस्तार पेण्ड्रा विकासखण्ड में (58.2 प्रतिशत) है। दक्षिणी मैदानी क्षेत्र में कुओं द्वारा सिंचित क्षेत्र का प्रतिशत 0.37 से 3.44 प्रतिशत तक है।

बिलासपुर जिले में 3.17 प्रतिशत भूमि अन्य साधनों से सिंचित है। इन साधनों में मौसमी नालों एवं डबरी आदि हैं। पथरिया विकासखण्ड में सर्वाधिक 18.08 प्रतिशत भूमि है। इन्हीं साधनों से सिंचित है।

जिले में सिंचाई घनत्व के वितरण में पर्याप्त विषमता है। अधिकतम सिंचाई घनत्व जांजगीर विकासखण्ड में (75 प्रतिशत से अधिक) है। हसदो बांगों परियोजना इस अधिकता का प्रमुख कारण है। मस्तुरी, लोरमी, अकलतरा, चांपा, विकासखण्डों में निरा बोये गये क्षेत्र को 50.75 प्रतिशत सिंचित है। सिंचाई घनत्व का न्यूनतम प्रतिशत मरवाही, पेण्ड्रा, पौड़ी-उपरोरा कटघोरा, कोरबा एवं करतला विकासखण्डों में 5.25 प्रतिशत है। इन क्षेत्रों में धरातलीय विषमताओं तथा अयोग्य कृषि के कारण सिंचाई के विकास में बाधा आयी है।

जिले में विभिन्न फसलोंन्तर्गत जल का सर्वाधिक उपयोग चावल की कृषि में होता है। मक्का द्वितीय महत्त्वपूर्ण फसल है जिसमें कुल सिंचित जल का 5.4 प्रतिशत प्रयुक्त होता है। अन्य फसलोन्तर्गत सिंचित क्षेत्र नगण्य है। बिलासपुर जिले में कुल सिंचित क्षेत्र का 84.89 प्रतिशत खाद्यान्न फसलों का है। चावल प्रमुख सिंचित फसल है जिसके अंतर्गत 84.89 प्रतिशत भूमि सिंचित है। कुल सिंचित क्षेत्र के 7.1 प्रतिशत भाग में फल तथा सब्जियाँ उत्पन्न की जाती है। मक्का दूसरी प्रमुख खाद्यान्न फसल है, जिसका 5.6 प्रतिशत सिंचित है। अखाद्य फसलों, तिलहन, गेहूँ के अंतर्गत सिंचित क्षेत्र अत्यंत कम (2.5 प्रतिशत) है।

बिलासपुर जिले में कुल उपलब्ध जल राशि का मात्र 15.84 प्रतिशत ही सिंचाई कार्यों में प्रयुक्त होता है। जिले में 1537 लाख घनमीटर सतही एवं भूगर्भ जल सिंचाई कार्यों में प्रयुक्त होता है। जांजगीर विकासखण्ड में सिंचाई हेतु जल का सर्वाधिक 2273 लाख घन मीटर उपयोग किया जाता है।

बिलासपुर जिले में कुल उपलब्ध सतही जल (9,829 लाख घन मीटर) का 14.86 प्रतिशत ही सिंचाई कार्यों में प्रयुक्त होता है। जांजगीर एवं मस्तुरी विकासखण्डों में क्रमश: 237.37 एवं 261.84 लाख घनमीटर सतही जल नहरों एवं तालाबों के माध्यम से सिंचाई हेतु उपयोग में लाया जाता है।

गौरेला, पेण्ड्रा कटघोरा, पाली, कोरबा, करतला, जयजयपुर विकासखण्डों में सिंचाई हेतु भूगर्भ जल का उपयोग न्यून 1.7 से 10 लाख घन मीटर तक है। हसदो, अरपा दोआब में स्थित विकासखण्डों में सिंचाई का मध्यम विकास हुआ है। इस क्षेत्र में 60 से 100 लाख घन मीटर तक जल का उपयोग सिंचाई के लिये किया जाता है।

बिलासपुर जिले में कुल उपलब्ध भूगर्भ जल राशि 2322.12 लाख घन मीटर का मात्र 3.48 प्रतिशत (80.45 लाख घन मीटर) जल ही सिंचाई के कार्यों में उपयोग में लाया जाता है। भूगर्भ जल का सिंचाई हेतु सर्वाधिक उपयोग पेण्ड्रा विकासखण्ड में (6.25 लाख घन मीटर) होता है, जो कुल सिंचित जल उपयोग की 55.5 प्रतिशत है। नूनतम जल उपयोग जांजगीर विकासखण्ड में (1.4 प्रतिशत) होता है।

जिले में जल संसाधन विकास की पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं। जिले में उपलब्ध कुल जलराशि 12042.12 लाख घन मीटर जल राशि का भाग 1617.45 लाख घनमीटर जल ही सिंचाई के कार्यों में उपयोग में लाया जाता है। अत: शेष जलराशि का उपयोग अन्य कार्यों में किया जा सकता है।

बिलासपुर जिले के ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्र पेयजल की समस्या से ग्रस्त हैं। जिले की कुल ग्रामीण जनसंख्या 29,52,086 व्यक्ति है एवं जल मांग 1.47 लाख लीटर प्रतिदिन है। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति के स्रोत तालाब हैं। जिले के प्राय: सभी ग्रामों में पेयजल आपूर्ति हेतु तालाबों के जल का विभिन्न कार्यों जैसे - पेयजल, कपड़ा धोने एवं अन्य निस्तारी कार्यों हेतु किया जाता है। फलस्वरूप जल में प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होती है। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति के अन्य स्रोतों में नाले, नदियाँ एवं कुएँ हैं। जिले के 2.0 प्रतिशत ग्रामों में नदी नालों एवं 94.2 प्रतिशत ग्रामों में कुएँ प्रमुख स्रोत हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल आपूर्ति हेतु प्रत्येक ग्रामीण क्षेत्र में हस्तचलित पंप (250 व्यक्ति/ हस्तचलित पंप) लगाए गए हैं। जिले में 10101 हस्तचालित पंपों के माध्यम से लगभग 80 प्रतिशत जल आपूर्ति होती है तथापि जिले में ग्रीष्मावधि में जलस्रोतों के जलस्तर पर जाने के कारण जलाभाव की स्थिति निर्मित हो जाती है। जिले के लगभग 3553 ग्रामों के इस दृष्टि से समस्यामूलक ग्राम घोषित किया गया है। जिले के 8.5 प्रतिशत ग्रामों में ग्रीष्मावधि में पेयजल लेकर विद्यमान रहता है। ऐसे ग्रामों की सर्वाधिक संख्या बिल्हा, पथरिया विकासखण्ड में (30 ग्राम) है, पश्चिमी विकासखण्डों पंडरिया, पथरिया, मुंगेली में 17 प्रतिशत से भी अधिक ग्रामों में पेयजल अभाव रहता है। बिलासपुर जिले में 11 ऐसे ग्राम हैं जहाँ वर्ष भर पेयजल की गंभीर समस्या है। ये ग्राम बिल्हा (3), मस्तुरी (4), अकलतरा (2) एवं जयजयपुर (2) में स्थित है। जिले के 9 प्रतिशत ग्रामों में पेयजल की समस्या नहीं है। ऐसे ग्रामों की संख्या पामगढ़ में सर्वाधिक (47 ग्राम) है। इन क्षेत्रों में कॉप मिट्टी की उपलब्धता के फलस्वरूप भूगर्भ जलस्तर गहराई ग्रीष्मावधि में भी 6 मीटर से कम रहती है। अत: सतही स्रोतों के सूखने के उपरांत भी भूगर्भय स्रोतों जल आपूर्ति के स्रोत रहते हैं।

जिले के समस्यामूलक ग्रामों की संख्या छठवीं योजना के अंत तक 3442 रही जिनमें से 3310 ग्रामों में 386 कुएँ एवं 353 हस्तचलित पंपों के माध्यम से पेयजल सुविधा उपलब्ध करायी गयी है।

बिलासपुर जिले में नगरीय जल प्रदाय योजना का विकास पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत ही हुआ है। यहाँ तृतीय एवं चतुर्थ योजना में सर्वप्रथम बिलासपुर नगर में पेयजल योजना का निर्माण किया गया। इसके पश्चात पाँचवी एवं छठवीं योजना के अंत तक जिले के सभी नगरीय क्षेत्रों में पेयजल आपूर्ति हेतु नल जल योजना का विकास किया गया।

जिले में वर्तमान समय में भी जल आपूर्ति के स्रोत कुएँ हैं। जिले के कुल जल आवश्यकता का 22.2 प्रतिशत जल कुओं से ही प्राप्त होता है। द्वितीय महत्त्वपूर्ण साधन हस्तचलित पंप हैं। जिनके माध्यम से जिले की 45 प्रतिशत जल की आपूर्ति होती है। जिले की कुल नगरीय जल आपूर्ति का 33.3 प्रतिशत नलकूपों के माध्यम से की जाती है।

जिले के सभी नगरीय क्षेत्रों में पेयजल की समस्या विद्यमान है। वर्तमान में कुल नगरीय जनसंख्या 499194 व्यक्ति है एवं विभिन्न स्रोतों से 118.302 लाख लीटर / प्रतिदिन जल आपूर्ति की जा रही है। इस प्रकार नगरीय क्षेत्रों में पेयजल योजना के विकास की आवश्यकता है।

जल प्रदूषण एवं जल के अनुचित प्रयोगों के कारण जलजनित रोग का जन्म होता है। बिलासपुर जिले को जलजनित रोगों में आंत्रशोध, खूनी पेचिस, हैजा, नारू एवं पीलिया का विशेष प्रकोप की बिलासपुर जिले के पंडरिया, लोरमी, कोटा, गौरेला, मालखरौदा, कोरबा, करतला, विकासखण्डों में आंत्रशोध को सर्वाधिक प्रभावित है। इसका प्रमुख कारण दूषित जल, स्वास्थ्य सुविधा का प्रभाव आदि है। इन क्षेत्रों में प्रति हजार जनसंख्या पर आंत्रशोध क्रमश: मरवाही में 5.8, करतला में 2.7, गौरेला में 2.7, पंडरिया में 1.73, लोरमी में 1.57 एवं कटघोरा में 1.87 प्रतिशत है। बिलासपुर जिले में संपूर्ण अध्ययन अवधि के खूनी पेचिस, अतिसार, पीलिया जैसे जल जनित रोगों से प्रभावित ग्रामों की भी गंभीर संकट रहा है सामान्यत: जिले के उत्तरी क्षेत्रों में जलजनित रोगों का प्रभाव अधिक ही इन क्षेत्रों में इन रोगों से प्रभावित कारण प्रति हजार मृत्युदर 0.3 से 1.87 व्यक्ति है। यह दर मरवाही, कोरबा, करतला, मालखरौदा में क्रमश: 5.46, 3.0, 2.225, 2.5 है। पेण्ड्रा, मरवाही, गौरेला क्षेत्र में जलजनित नारू रोग का विशेष प्रकोप की इन क्षेत्रों में जल परीक्षण से आयोडीन की कमी ज्ञात हुई है जो इस रोग के जन्म होने का एक प्रमुख कारण है।

जिले में औद्योगिक विकास के लिये पानी की कमी नहीं है। मनियारी एवं खारंग नदियों पर निर्मित जलाशय एवं हसदो बांगो वृहत परियोजना साथ ही नलकूपों के माध्यम से विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में पर्याप्त जल आपूर्ति संभव है। जिले के तीन प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों-कोरबा, औद्योगिक क्षेत्र, चांपा, अकलतरा औद्योगिक क्षेत्र एवं बिलासपुर औद्योगिक क्षेत्र में स्थित उद्योगों को जल आपूर्ति वर्तमान में लगभग 205.1 लाख घनमीटर है। बिलासपुर औद्योगिक क्षेत्र में जला आपूर्ति के स्रोत (नलकूप) हैं, वहीं कोरबा एवं चांपा अकलतरा क्षेत्र में जल आपूर्ति हेतु हसदो नदी एवं हसदों नहर प्रमुख साधन है। जिले के संपूर्ण औद्योगिक जल आपूर्ति का 50 प्रतिशत से अधिक जल का उपयोग औद्योगिक क्षेत्र में होता है। अकलतरा चांपा क्षेत्र में जिले के कुल औद्योगिक जल उपयोग का 39.85 प्रतिशत जल प्रयुक्त है।

जल संसाधन का मनोरंजन की दृष्टि से उपयोग वर्तमान में महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है। जिले के महत्त्वपूर्ण जल मनोरंजन क्षेत्रों में खुड़िया जलाशय, खूंटाघाट, हसदो-बांगों जलाशय, कोरबा आदि हैं, जहाँ नौका विहार, जल आखेट आदि अनेक जल क्रीड़ाओं का प्रबंध किया गया है। जिले में नौ परिवहन हेतु जल उपयोग नगण्य हैं। मत्स्यपालन जल संसाधन विकास का महत्त्वपूर्ण पहलू हैं। बिलासपुर जिले में उपलब्ध जल संसाधन क्षेत्रों में 159517.8 हेक्टेयर (47 प्रतिशत) में मत्स्य पालन किया जाता है। यहाँ स्वच्छ जल की व्यापारी मछली (कतला, रोहू) का मुख्य रूप से उत्पादन एवं पालन किया जाता है। जिले में मत्स्यपालन मुख्यत: शासकीय एवं निजी मत्स्यपालन इकाइयों द्वारा किया जाता है। जिले के 58.8 प्रतिशत मत्स्योत्पादक क्षेत्र ग्राम पंचायतों के अधीन है। निजी स्वामित्व वाले तालाबों का प्रतिशत 24.9, सिंचाई विभागन्तर्गत 1.31 प्रतिशत एवं राजस्व विभाग के अंतर्गत 13.2 प्रतिशत, मत्स्यपाल के उपयुक्त तालाब हैं। जिले में मत्स्यपालन मुख्यत: बिल्हा, जांजगीर, मुंगेली, पथरिया, लोरमी, अकलतरा एवं कोरबा विकासखण्ड में होता है। बिल्हा में 110023 हेक्टेयर जल क्षेत्र में मत्स्यपालन किया जाता है। खारंग जलाशय प्रमुख मत्स्योपालन केंद्र हैं। पौड़ी-उपरोरा एवं दक्षिण पूर्वी विकासखण्ड जयजयपुर, डभरा, मालखरौदा एवं चांपा में मत्स्योपालन का विकास नहीं हुआ है। जिले में प्रमुख शासकीय मत्स्योत्पादक क्षेत्र हसदो बैराज (1785 हे.), घोंघा जलाशय (445 हे.), सारंग जलाशय (2600 हे.), खुड़िया जलाशय (1612 हे.) है। जिले में कुल 88985 हे. जल क्षेत्र में निजी व्यवसायी मत्स्योपालन कर रहें जो कुल मत्स्योत्पादक क्षेत्र का 24.3 प्रतिशत है। निजी स्वामित्व वाले तालाबों का जल क्षेत्र 50 से 600 हेक्टेयर है। जिले में वर्ष 1986-87 अवधि में 7622 लाख टन मत्स्योत्पादन हुआ जिससे लगभग 79902.00 लाख रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ है। शासकीय मत्स्योत्पादन क्षेत्र में 899.303 लाख टन वार्षिक उत्पादन होता है। जिले में 60 प्रतिशत से अधिक उत्पादन निजी मत्स्य व्यवसायियों द्वारा किया जाता है। जिले में प्रतिवर्ष 1 से 25 लाख टन तक मत्स्य बीज उत्पादन होता है जिसका उपयोग स्थानीय तालाबों जलाशयों में मत्स्यपालन हेतु किया जाता है।

बिलासपुर जिले में जल संसाधन विकास की अनेक समस्याएँ हैं। बिलासपुर जिले में सिंचित क्षेत्र 21.1 प्रतिशत है किंतु सिंचाई के वितरण में पर्याप्त क्षेत्रीय विषमताएँ हैं। जिले के कई क्षेत्रों में विवेकहीन सिंचाई व्यवस्था के कारण जल जमाव की समस्या उत्पन्न हो जाती है। प्रशासकीय अक्षमता के फलस्वरूप सिंचाई विकास योजनाओं में विलंब होता है। जिले के उत्तरी क्षेत्रों में असंख्य छोटे नाले एवं तालाब आदि हैं। साथ ही जिले में प्रवाहित होने वाली हसदो, अरपा, मनियारी इत्यादि का उद्गम स्थल होने के कारण मध्यम सिंचाई योजना संभव नहीं हो पायी है। परंतु लघु सिंचाई योजना के द्वारा यहाँ के सूखे खेतों में सिंचाई की असीम सम्भावनाएँ हैं। वित्तीय समस्या एक महत्त्वपूर्ण समस्या है। जो जल संसाधन विकास की धीमी गति का कारण है। पुन: जिले के उत्तरी क्षेत्रों में धरातलीय विषमता एवं वनाच्छादित क्षेत्रों के कारण खेत बिखरे हुए हैं अत: सिंचाई योजनाओं का निर्माण अत्यंत व्ययपूर्ण है।

जिले में यद्यपि हसदो-बांगों वृहत परियोजना का निर्माण किया गया है तथापि इसके अपवर्ती क्षेत्रों (कटघोरा-कोरबा) में इस योजना का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। जिससे सिंचाई का प्रतिशत नगण्य है।

जिले के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रीष्मावधि में जलाभाव की स्थिति निर्मित हो जाती है। यहाँ के ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों के निस्तार कार्यों में प्रयोग के परिणाम स्वरूप जल प्रदूषण की समस्या जन्म लेती है। जो विभिन्न जल जनित रोगों का कारण है। उत्तरी क्षेत्रों में स्थित मरवाही, पेण्ड्रा, कोट विकासखण्ड में गुणवत्ता की दृष्टि से जल कठोर (कठोरता 300 से 800 मिली ग्राम / लीटर) है। पुन: जल में आयोडीन की कमी है। परिणामस्वरूप नारू रोग एवं पेट से सम्बन्धित अनेक रोगों की गंभीर समस्या है। जिले के नगरीय क्षेत्रों में जल आपूर्ति भी पर्याप्त नहीं है। नगरीय क्षेत्रों में जल आपूर्ति की अन्य प्रमुख समस्या दोषपूर्ण वितरण प्रणाली है। सार्वजनिक नलों द्वारा जल आपूर्ति क्षेत्र में रख-रखाव के पर्याप्त प्रबंध न होने के कारण जल के अपव्यय एवं दुरुपयोग की समस्या है। नगरीय क्षेत्रों में जल संग्राहकों से दूरस्थ स्थित क्षेत्र में जल आपूर्ति क्षेत्र में रख-रखाव के पर्याप्त प्रबंध न होने के कारण जल के अपव्यय एवं दुरुपयोग की समस्या है। नगरीय क्षेत्रों में जल संग्राहकों से दूरस्थ स्थित क्षेत्र में जल आपूर्ति की एक बड़ी समस्या है।

कोरबा, चांपा, औद्योगिक क्षेत्र में औद्योगिक अपशिष्ट पदार्थों के सीधे नदी जल में प्रवाहित किए जाने के कारण, औद्योगिक जल प्रदूषण की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गयी है। इन क्षेत्रों में नदियों के जल में प्रदूषण के कारण कार्बन की अधिकता, जल जैविक ऑक्सीजन मांग की कमी, जल में अम्लीयता में वृद्धि हो जाती है, जो मानवीय स्वास्थ्य पर दुष्परिणाम डालती है।

जिले में जल संसाधन विकास की विभिन्न समस्याओं के निराकरण हेतु अनेक प्रबंध किए जाने चाहिए। जिनमें सिंचाई की दोषपूर्ण प्रणाली में सुधार हेतु बाड़ाबंदी योजना महत्त्वपूर्ण है। पुन: प्रशासकीय अक्षमता को यथा संभव दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए। जिले के उत्तरी क्षेत्रों में सिंचाई के विकास हेतु 50 हेक्टेयर के छोटे-छोटे खंडों में सामूहिक सिंचाई व्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है। यहाँ के छोटे-छोटे नालों पर मिट्टी के छोटे बांध, बनाकर सिंचाई की सुविधा में विस्तार किया जा सकता है। पेयजल आपूर्ति हेतु भूगर्भ जलस्रोतों के विकास को पर्याप्त महत्ता दी जानी चाहिए। साथ ही वितरण व्यवस्था में सुधार, जल के दोषपूर्ण उपयोग को रोकथाम, वित्तीय प्रबंधन आदि किए जाने चाहिए। जल प्रदूषण की समस्या के समाधान हेतु औद्योगिक इकाइयों द्वारा पर्याप्त व्यवस्था के उपरांत ही जल नदियों में प्रवाहित किया जाना चाहिए।

बिलासपुर जिले को जल संसाधन के वर्तमान उपयोग की दृष्टि से 3 उपवर्गों में विभक्त किया जा सकता है -

1. न्यून उपयोगिता प्रदेश
2. मध्यम उपयोगिता प्रदेश
3. उच्च उपयोगिता प्रदेश

पेण्ड्रा, जयजयपुर, करतला आदि समस्त उत्तरी विकासखण्ड न्यूनतम जल उपयोगिता प्रदेश के अंतर्गत हैं। इस क्षेत्रों में यद्यपि जल संसाधन पर्याप्त हैं, तथापित अनेक तकनीकी कारणों से विकास की गति मंद है। इन विकासखण्ड में विकास की दर 5 प्रतिशत से कम है। जिले अपेक्षाकृत मैदानी क्षेत्रों में जल संसाधन का विकास अन्य क्षेत्रों की तुलना में अच्छा हुआ है। इन क्षेत्र में विकास की दर 10-20 प्रतिशत है। मस्तुरी, लोरमी, जांजगीर क्षेत्र जल संसाधन विकास की दृष्टि से सर्वोपरि है। इन क्षेत्रों में हसदो, बांगो, मनियारी एवं खारंग जलाशय सिंचाई योजना के परिणाम स्वरूप जल संसाधन विकास की दर उच्च है। तथापि समग्र रूपेण जिले में जल संसाधनों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया है। जिले में सिंचाई विकास की क्षेत्रीय विभिन्नता, ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में पेयजल विकास की अपर्याप्तता विद्यमान है। जिले में जल की कुल संचित राशि 12237 लाख मीटर है जिसमें से लगभग 1994.9 लाख घनमीटर जल का ही उपयोग हो रहा है। अत: इस राशि को देखते हुए जिले में जल संसाधन के विकास की असीम संभावनायें परिलक्षित होती है।

बिलासपुर जिले के जल संसाधन उपलब्धता, वर्तमान जल उपयोग एवं अधिशेष जल राशि की पर्याप्तता के आधार पर तीन प्रमुख जल संसाधन विकास संभाव्यता प्रदेश परिलक्षित हैं -

प्रथम प्रदेश जिले के तीन क्षेत्रों - लोरमी पठार, जांजगीर एवं दक्षिण पूर्वी डभरा विकासखण्ड में स्थित है। इन प्रदेशों में वर्तमान में जल संसाधन का अधिकतम उपयोग हो रहा है। यहाँ सिंचित क्षेत्र का प्रतिशत 75 से 90 तक है। इन क्षेत्रों में एक ओर लोरमी पठार में जनसंख्या कम है, वहीं दूसरी ओर जांजगीर एवं डभरा क्षेत्र में ग्रामीण जनसंख्या के सघन वितरण के कारण अधिशेष जलराशि की मात्रा न्यून है। अत: इस क्षेत्र में विकास की सम्भावनाएँ अपेक्षाकृत कम है।

द्वितीय प्रदेश (मध्यवर्ती मैदानी क्षेत्र) में विकास की अवस्था मध्यम है। इस प्रदेश में पेयजल की समस्या के साथ ही सिंचाई का भी मध्यम विकास हुआ है। इस प्रदेश की विभिन्न नदियों - अरपा, बोराई आगर इत्यादि पर लघु, मध्यम सिंचाई परियोजनाएँ विकसित किए जाने की पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं।

तीसरे प्रक्षेत्र, पेण्ड्रा का पठार-कोरबा बेसिन में जनसंख्या न्यून है। क्षेत्र उबड़-खाबड़ है। इस प्रदेश में कोरबा औद्योगिक प्रदेश स्थित है, जहाँ जल की आवश्यकता अधिक है। साथ ही अधिशेष जल की मात्रा भी अधिक है, जिससे विकास की सम्भावनाएँ अधिक है।

अंत में बिलासपुर जिले के जल संसाधन में रूचि रखने वाले अध्येताओं, कृषि एवं सिंचाई अभियांत्रिकों, नगरीय एवं ग्रामीण पेयजल आपूर्ति से संबंद्ध लोगों, कृषि एवं आर्थिक तथा औद्योगिक नियोजकों, मत्स्यपालकों, अर्थशास्त्रियों तथा भूगोलवेत्ताओं को यह अध्ययन बिलासपुर जिले में जल संसाधन के वितरण, उपयोग और नियोजन को समझने में सहायक सिद्ध होते हैं।

परिशिष्ट 1 बिलासपुर जिला फसल प्रतिरूप (1984-87) भू अभिलेख कार्यालय, बिलासपुर परिशिष्ट 2 बिलासपुर जिला जल संतुलन परिशिष्ट 3 बिलासपुर जिला नदियों का औसत मासिक एवं वार्षिक जलावाह परिशिष्ट 4 परिशिष्ट 5 बिलासपुर जिला औसत भूगर्भजल स्तर एवं गहनता बिलासपुर जिला भूगर्भजल स्तर एवं गहनता परिशिष्ट 6 बिलासपुर जिला भूगर्भ जल संभरण एवं निकासी परिशिष्ट 7 बिलासपुर जिला जलाशयों का वितरण परिशिष्ट 9 बिलासपुर जिला पेयजल समस्यामूलक ग्राम परिशिष्ट 10 बिलासपुर जिला जल संसाधन विकास

 

बिलासपुर जिले में जल संसाधन विकास एक भौगोलिक अध्ययन 1990

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

बिलासपुर जिले की भौतिक पृष्ठभूमि (Geographical background of Bilaspur district)

2

बिलासपुर जिले की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि (Cultural background of Bilaspur district)

3

बिलासपुर जिले की जल संसाधन संभाव्यता (Water Resource Probability of Bilaspur District)

4

बिलासपुर जिले के जल संसाधनों का उपयोग (Use of water resources in Bilaspur district)

5

बिलासपुर जिले के जल का घरेलू, औद्योगिक एवं अन्य उपयोग (Domestic, Industrial and other uses of water in Bilaspur District)

 

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