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एजिलेंट तकनीक : इंडिया इन्नोवेशन इनिशियेटिव-आई3

..इंडिया इन्नोवेशन इनिशयेटिव परियोजना का उद्देश्य देश में एक नूतन पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है. इसके लिए वे नूतन विधियों को अपनाने वालों को संवेदनशील बनाएंगे, प्रोत्साहित करेंगे और बढावा देंगे, इसके अलावा नूतन विधियों के व्यवसायीकरण को सहज बनाएंगे।

नए ज्ञान संसाधन : नाइट्रेट और कैंसर

..फ्लोराइड और आर्सेनिक के बाद नाइट्रेट/नाइट्राइट प्रदूषण भारत के लिए आज एक गंभीर समस्या का रूप ले चुका है। यह प्रदूषण मुख्यत: मनुष्यों के लिए प्रयुक्त होने वाले जल के साथ उर्वरकों और नालों में बहने वाले दूषित जल के मिश्रण से होता है। नए शोध से पता चला है कि नाइट्रेट/नाइट्राइट प्रदूषण मनुष्यों के स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचाता है और इससे कैंसर तक हो सकता है।

वाटर एड-नयूज लैटर!

फोटो साभार- वाटर एडफोटो साभार- वाटर एडवाटर एड एक प्रमुख स्वतंत्र संस्था है, जो गरीबों को सुरक्षित जल, स्वच्छता और सफाई की शिक्षा प्राप्त करने में सहायता करती है। संस्था के नए न्यूज लैटर में उनकी गतिविधियों की झलक मिलती है, कि कैसे इसने बिहार में एक माह के प्रयास से सेनिटेशन के लिए एक बिल्कुल नई तकनीक को प्रोत्साहित किया।

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राष्ट्रीय ग्रामीण जल आपूर्ति कार्यक्रम - कार्यान्वयन के लिए फ्रेमवर्क(2008-12)

ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी की सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दिशा में पेयजल आपूर्ति विभाग, ग्रामीण विकास मंत्रालय (भारत सरकार) के द्वारा नए दिशा निर्देश जारी किये गये हैं। यह कार्यक्रम राजीव गांधी राष्ट्रीय पेयजल मिशन (आरजीएनडीडब्ल्यूएम) के तहत क्रियान्वित किया जा रहा है।

पेयजल आपूर्ति विभाग, भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय का नोडल विभाग है, जो राज्यों को पेयजल और स्वच्छता के क्षेत्र में तकनीकी, वैज्ञानिक, और वित्तीय सहायता मुहैया कराता है।

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शहरी गरीबों के लिए पानी और स्वच्छता पर राष्ट्रीय कार्यशाला

वाटर एड, यूएन हैबिटाट और मध्य प्रदेश सरकार संयुक्त रूप से शहरी गरीबों के लिए जल और स्वच्छता पर, एक तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला भोपाल में 5 से 7 मार्च 2009 को आयोजित की।

भारत में मलिन बस्तियों में जनसंख्या दोगुनी हो गई है, लेकिन पानी और सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएं अभी भी वहां मुहैया नहीं हैं। देश भर से 100 से अधिक विशेषज्ञों में इस समस्या इस समस्या का हल ढूंढने के लिए भोपाल में इकट्ठा हुए। भारत की शहरी आबादी इसकी कुल जनसंख्या की तुलना में अधिक तीव्र गति से बढ़ रही है। ओर ज्यादातर को पीने का पानी और सेनियेशन की सुविधाएं तक मुहैया नहीं हैं। मलिन बस्तियों में बढ़ती हुई आबादी और सुविधाओं के अभाव से भारत के जल और स्वच्छता के समग्र लक्ष्य की उपलब्धि बुरी तरह प्रभावित होगी।

जल संरक्षण की चुनौती

अंधाधुन जल दोहनअंधाधुन जल दोहनदेश की कई छोटी-छोटी नदियां सूख गई हैं या सूखने की कगार पर हैं। बड़ी-बड़ी नदियों में पानी का प्रवाह धीमा होता जा रहा है। कुएं सूखते जा रहे है। 1960 में हमारे देश में 10 लाख कुएं थे, लेकिन आज इनकी संख्या 2 करोड़ 60 लाख से 3 करोड़ के बीच है। हमारे देश के 55 से 60 फीसदी लोगों को पानी की आवश्यकता की पूर्ति भूजल द्वारा होती है, लेकिन अब भूजल की उपलब्धता को लेकर भारी कमी महसूस की जा रही है। पूरे देश में भूजल का स्तर प्रत्येक साल औसतन एक मीटर नीचे सरकता जा रहा है। नीचे सरकता भूजल का स्तर देश के लिए गंभीर चुनौती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए की आजादी के बाद कृषि उत्पादन बढ़ाने में भूजल की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इससे हमारे अनाज उत्पादन

जल-संरक्षण के लिए समाज आगे आये

सेव वाटर, सेव लाइफसेव वाटर, सेव लाइफजल संकट देश ही नहीं, समूचे विश्व की गंभीर समस्या है। दुनिया के विशेषज्ञों की राय है कि वर्षा जल संरक्षण को बढावा देकर गिरते भू-जल स्तर को रोका जा सकता है। टिकाऊ विकास का यही आधार हो सकता है। इसमे दो राय नहीं कि जल संकट ही आने वाले समय की सबसे बडी चुनौती है, जिस पर गौर करना आज की सबसे बडी जरूरत है। वरना, स्थिति इतनी भयावह होगी कि उसका मुकाबला कर पाना असंभव होगा। लिहाजा, जल-प्रबंधन पर ध्यान दिया जाना बेहद जरूरी है।

सेटेलाइट से जल प्रबंधन

भास्कर न्यूज/ जोधपुर: प्रदेश में तेजी से गिरते भूजल स्तर से अगले दो दशक में पानी के भीषण संकट की आशंका को देखते हुए इसरो के सेंट्रल रिमोट सेंसिंग सेंटर ने जल प्रबंधन की कवायद शुरु कर दी है। इसके लिए भूजल विभाग समेत अन्य संबंधित विभागों के लिए इंटीग्रेटेड मैनेजमेंट का प्रारुप तैयार किया जा रहा है।

इसके लिए सेटेलाइट चित्रों के माध्यम से जल संसाधनों से लेकर भूजल स्तर के बारे में डाटा तैयार कर बाकायदा वाटर सोर्स इन्फॉर्मेशन सिस्टम तैयार किया जा रहा है। उस आधार पर प्रदेश में जल प्रबंधन किया जाएगा। इसके लिए सेंट्रल रिमोट सेंसिंग सेंटर के विशेषज्ञों ने भूजल विभाग के अधिकारियों को ट्रेनिंग भी देना शुरु कर दिया है।

बूँद बूँद कर बना सरोवर

तालाबतालाबबूंद-बूंद से सागर कैसे भरता है इसकी मिसाल बिहार के माणिकपुर गांव में देखी जा सकती है। पटना से करीब सौ किलोमीटर दूर इस गांव के कमलेश्वरी सिंह ने सात साल तक अकेले ही खुरपी और बाल्टी की मदद से 60 फीट लंबा-चौड़ा और 25 फीट गहरा तालाब खोद डाला। आज जब दक्षिण बिहार के ज्यादातर गांवों के तालाब और कुएं पानी का संकट झेल रहे हैं, कमलेश्वरी के पसीने की बूंदों से तैयार ये तालाब लबालब भरा है।