बूँदों के तराने

Source: 
बूँदों के तीर्थ ‘पुस्तक’

पानी की बात चले और कबीर की रचना कोई न सुनाए - ऐसा कैसे हो सकता है। कबीर ने पानी के विविध प्रसंगों के माध्यम से जीवन-दर्शन की बहुत ही सहज ढंग से चर्चा की है।

लुनियाखेड़ी में जल संरचना के पास खड़े हैं राष्ट्रीय मानव बसाहट एवं पर्यावरण केन्द्र के श्री मुकेश बड़गइया व पानी समिति अध्यक्ष श्री रामेश्वर शर्मा यह उज्जैन जिले की तराना तहसील का गाँव लुनियाखेड़ी है। इसे ‘कबीर के गाँव’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ कबीर का एक स्मारक और शोध संस्थान बनाया गया है। कबीर को गाँव के लोग सही मायने में जीते हैं- इसका आभास आपको इस गाँव में मिल सकता है। ‘कबीर के गाँव’ में पानी की बात न हो- यह कैसे हो सकता है।

लुनियाखेड़ी में प्रवेश करते ही पहली मुलाकात कुछ किसानों से होती है। हाथ-पाँव मिट्टी में सने हैं। नाम है श्री रामेश्वर शर्मा। पानी की बात करने के दौरान ही पता चलता है कि आप पानी समिति के अध्यक्ष भी हैं। इनके खेतों के पास ही डबरी और परकोलेशन तालाब का निर्माण किया है। नाले को भी जगह-जगह रोका गया है। हम कुछ थोड़ा और आगे चलते हैं तो विशाल तालाब नजर आता है।

पानी आन्दोलन का काम कर रही स्वयं सेवी संस्था राष्ट्रीय मानव बसाहट एवं पर्यावरण केन्द्र (एन.सी.एच.एस.सी.) के परियोजना अधिकारी श्री मुकेश बड़गइया व पानी-प्रेमी गाँव के समाज ने हमें बताया कि पानी आन्दोलन के पहले गाँव बुरी तरह जलसंकट से जूझ रहा था। जिस तालाब की पाल पर हम खड़े हैं, यहाँ एक पतली-सी लकीर की माफिक नाला बहता था। उसे पार करने के दौरान दल-दल का ही अहसास होता था। गर्मी में तो यह पूरी तरह सूख जाया करता था। गाँव में जहाँ देखो, वहीं पड़त भूमि नजर आती थी। मवेशियों को पानी के लिये दूर-दूर तक जाना पड़ता था। समाज पानी संकट से हैरान-परेशान था। पानी आन्दोलन की नींव रखने के दौरान प्रारम्भ में तो किसी को विश्वास नहीं था कि गाँव एक बड़ी सामाजिक-आर्थिक क्रान्ति के रास्ते पर है। लेकिन, जब लोगों को विश्वास में लेकर उन्हीं की जिम्मेदारी तय करते हुए काम शुरू हुआ तो सराहनीय जनभागीदारी के किस्से सामने आये। आज यह गाँव पानी से सराबोर है। कभी सूखाग्रस्त रहा गाँव पानी से घिरे टापू के समान नजर आता है।

कबीर की साखियां व पानी दर्शन लुनियाखेड़ी का कबीर स्मारक शोध संस्थान ...हमारे सामने पानी से लबालब विशाल तालाब है। इसे लुनियाखेड़ी के तालाब के नाम से जाना जाता है। यह तालाब समाज की सक्रिय भागीदारी से मात्र एक माह के भीतर ही बनकर तैयार हो गया। तालाब की लागत लगभग 6 लाख रुपये है। शासन से 3.70 लाख रुपये की सहायता मिली है। शेष राशि समाज की ओर से श्रमदान व अन्य साधनों के रूप में उपलब्ध हुई है। तालाब के पहले भी पानी को जगह-जगह रोका गया है। पहले लूज बोल्डर संरचनाएँ तैयार की गई हैं। कन्टूर ट्रेंच, डबरियाँ व नाला-बंधान भी निर्मित किया गया। पानी इन सब अवरोधों को पार करने के बाद ही तालाब तक आ पाता है। यहाँ भी हर चरण में रिचार्जिंग की प्रक्रिया सम्पन्न हो जाती है। तालाब निर्माण के दौरान एक रोचक वाक्या देखने में आया। एक किसान अपनी जमीन डूबने की आशंका से ग्रस्त रहता था, लेकिन डाउन स्ट्रीम में होने के कारण सबसे ज्यादा फायदा उसे ही हुआ। तालाब की रिचार्जिंग से वह अपनी बारह बीघा जमीन सिंचित करने लगा है।

तालाब के लिये पानी समिति के सचिव विष्णु मालवीय ने भी अपनी जमीन दान में दी है। तालाब के पास ही एक सवा सौ साल पुरानी बावड़ी भी है। पहले यह सूखी रहती थी, लेकिन अब पानी का स्थायी खजाना बन गई है। यहाँ से चार-चार इंजिनों से लगातार किसान रबी फसल की सिंचाई के लिये पानी ले रहे हैं, लेकिन बावड़ी है कि खाली होने का नाम ही नहीं ले रही है। तालाब का क्षेत्रफल एक लाख अड़तीस हजार हेक्टेयर है। इसमें लगभग 1600 हेक्टेयर जमीन को सिंचित करने की क्षमता विद्यमान है। फिलहाल, बावड़ी के पानी से ही 25 किसानों की 40 बीघा जमीन में गेहूँ, आलू, प्याज और लहसुन की फसल ली जा रही है। पहले अधिकांश भूमि पानी के अभाव में सूखी ही रहती थी। किसानों को उम्मीद है कि इससे 4 लाख रुपये की आय होगी।

...यानी केवल छह माह के भीतर ही इस तालाब की लागत निकल जाएगी। इस साइड के लाभान्वित किसानों में प्रमुख हैं शिवनारायण शर्मा, केशुलाल शर्मा, रामचन्द्र, अमृतलाल, घनश्याम, हरिनारायण व अन्य।

...हम आपको एक बात तो बताना ही भूल गये। कभी बंजर रही इस धरती पर तालाब व अन्य जल संरचनाएँ बनने के बाद घूमते-फिरते सारस भी आने लगे हैं। गाँव में आस-पास के 5-6 गाँवों के मवेशी भी पानी पीने आते हैं।

गाँव में डबरी और परकोलेशन तालाब भी बनाया गया है। पानी समिति के अध्यक्ष रामेश्वर शर्मा, कमलसिंह व अन्य किसानों को इसका लाभ मिल रहा है। इसकी डाउन साइड के कुएँ जिन्दा हो गए हैं। पहले रबी में या तो जमीन सूखी रहती थी या फिर केवल एक पानी का गेहूँ ले पाते थे। अब तीन-तीन बार पानी पिलाया जाता है। 12 किसान यहाँ से लाभान्वित हुए हैं। मोटे तौर पर यहाँ रबी का 40 बीघा रकबा बढ़ गया है।

पानी आन्दोलन के फैलाव के दौरान गाँव-समाज जल प्रबन्धन के नित नये तरीके खोज रहा था। एन.सी.एच.एस.सी. के मुकेश बड़गइया गाँव की अनेक जल संरचनाएँ दिखाते हुए हमें एक स्टॉपडैम के किनारे ले गये। यहाँ भी पानी का विशाल भंडार मौजूद है। इसकी भी एक कहानी है। पहले भी पानी का प्रबन्धन तो होता था, लेकिन उसमें समाज की भागीदारी नहीं थी। सो, लोग उसे अपना काम नहीं समझते थे। सरकारी एजेंसियाँ भी संरचनाएँ तैयार करने के बाद उनकी सुध नहीं लेती थीं। 1982 में इस स्टॉपडैम को पंचायत ने तैयार करवाया था। न जाने क्या बात रही होगी कि गेट लगाने के बाद भी इतना पानी नहीं रुकता था कि सिंचाई की जा सके। गाँव-समाज ने यह मत जाहिर किया कि हमें इस स्टॉपडैम का जीर्णोद्धार करना चाहिए ताकि कम लागत में पानी रोकने का ज्यादा लाभ मिल सके। लोग जुट गये। काली मिट्टी निकालकर इसका गहरीकरण किया गया। इसका पहला ही लाभ यह हुआ कि इसमें ज्यादा मात्रा में पानी रुकने लगा। तब समाज ने यह फैसला लिया कि इसकी ऊँचाई बढ़ाई जानी चाहिए। जिला पंचायत को प्रस्ताव भेजकर ऊँचाई एक मीटर और बढ़ाई गई।

इस पानी से आस-पास के जलस्रोत रिचार्ज हुए हैं। यहाँ उज्जैन तथा शाजापुर जिले की सीमा है। इस स्टॉपडैम से लुनियाखेड़ी के अलावा पास के गाँव कनासिया तथा शाजापुर के गाँवों को भी फायदा पहुँच रहा है। यहाँ अनेक गाँवों के मवेशी एकत्रित होकर पानी पीते हैं। कतिपय लोग पानी-भंडार के पास एकत्रित गोबर से अपनी आजीविका भी चला रहे हैं।

कुछ ही समय में हम एक और ‘जल-खजाने’ के किनारे हैं। जब समाज एक बार तय कर लेता है तो स्थान-स्थान पर पानी रोकने उसके लिये किसी जुनून की माफिक हो जाता है। करीब 22 साल पहले इस नाले को भी मिट्टी की पाल बनाकर रोकने की कोशिश की गई थी। अब यहाँ पक्का नाला बंधान तैयार कर लिया गया है। रोक के पास इस नाले में 6 फीट पानी भरा है, जो काफी दूर तक क्रमशः कम होते हुए मौजूद है। यह भी मवेशियों के लिये पानी पीने का स्थान है। इससे जमीन का भूजल स्तर बढ़ रहा है, जो किसानों के कुओं व ट्यूबवेलों के माध्यम से खेतों तक जा रहा है। इस रिचार्जिंग से लगभग 30 किसान लाभान्वित हो रहे हैं।

...ऐसी बात नहीं है! पानी के विशाल भंडारों के साथ-साथ गाँव-समाज ने यहाँ 25 डबरियाँ भी बनाई हैं। पानी को ‘इकाई-स्तर’ पर रोकने से ही जल प्रबन्धन की अवधारणा पुख्ता होती है। एक ही फार्मूला होता है- पानी यदि फर्राटे की गति से भाग रहा है तो उसे धीरे करो! और यदि वह धीरे है तो उसे वहीं थाम दो। कुछ भी करिये पर ‘बूँदों’ को अपने गाँव का मेहमान बना लीजिये। उनकी मान-मनौव्वल करिये। फिर देखिये वे गाँव की जिन्दगी को कैसे बदल देती हैं…! इन डबरियों के किनारों पर समाज ने फलदार पौधे भी लगाए हैं। अनेक डबरियाँ हमने ऐसी देखीं जो कुएँ के पास थीं। इनसे कुएँ जिन्दा होते गए। इनके अलावा 20 हेक्टेयर में चारागाह विकास का कार्य किया गया है। यहाँ घास के तिनके, नन्हीं बूँदों को जमीन में समाने के लिये किसी नन्हीं-सी पाल के किरदार में होते हैं। 20 लूज बोल्डर संरचनाएँ भी पानी प्रवाह क्षेत्र में बनाई हैं। बड़े पैमाने पर ‘छोटी रोक’ पर रतनजोत व अरंडी के पौधे भी लगाये गये।

उज्जैन जिले के अनेक गाँवों में हमने ‘निरख-परख’ को भी देखा। लुनियाखेड़ी में हमें मुकेश बड़गइया व गाँव-समाज ने बताया कि इस जानकारी में अन्य सूचनाओं के साथ यह उल्लिखित है कि कौन-सा नाला गाँव में किन-किन स्थानों व खेतों के पास से होकर गुजर रहा है। कितनी जल संरचनाएँ कहाँ-कहाँ बनाई गई हैं। नया निरख-परख भी तैयार है, जो पूर्व व वर्तमान स्थितियों के बीच अन्तर बताता है। गाँव-समाज के नये संकल्पों का भी समावेश है। गाँव के जल प्रबन्धन की रणनीति को रेत पर नक्शा खींचकर समझाया गया था। पानी के अलावा भी इसमें अनेक जानकारियाँ हैं।

आपके जेहन में यह सवाल अवश्य उठ रहा होगा कि सूखे गाँव को ‘पानी के टापू’ में बदलने के लिये कौन-सी आयोजना की गई?

दरअसल, इसके पीछे गाँव-समाज के साथ एक ‘पानी-संवाद’ कायम करना होता है, लेकिन लुनियाखेड़ी में तो एक खास बात और थी! जैसा कि हमने आपको पहले भी बताया था, वह ‘कबीर का गाँव’ के नाम से जाना जाता है। यहाँ कबीर स्मारक व शोध संस्थान भी हैं। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री दिग्विजयसिंह यहाँ कबीर पंथियों के भजन सुनते आते रहे हैं। गाँव में एक निपानिया परिवार है। पूरे देश में ये कबीर के भजनों के माध्यम से उनके दर्शन की व्याख्या करते हैं। हमारी मुलाकात श्री प्रहलादसिंह निपानिया से होती है। इन्होंने सन 1979 से कबीर की रचनाओं को गाना शुरू किया। पानी आन्दोलन के फैलाव के लिये एकत्रित समाज के सामने निपानिया ने कबीर के पानी से जुड़े अनेक लोकगीत गाए! वे कहने लगे- “कबीर ने अपनी साखी में पानी की हिफाजत करने का आह्वान किया। वे प्राकृतिक सन्तुलन बनाये जाने पर भी जोर देते हैं।”

गाँव से विदाई पर कबीर का पानी दर्शन सुनने के बाद लगा कि गाँवों की जड़ें हमारी समृद्ध वैचारिक विरासत के साथ किस हद तक आज के दौर और परिवेश में भी जुड़ी हुई हैं। तब भला समाज पानी-संचय के लिये क्यों नहीं उठ खड़ा होगा!

...आपको कबीर की साखियों के साथ पानी का टापू कैसा लगा?
...और इस दर्शन के साथ तराना तहसील में कैसे लगे ये ‘बूँदों के तराने!’
...यहाँ का कबीर स्मारक आगे भी गाँव को पानी का दर्शन बताता रहे!!

 

बूँदों के तीर्थ


(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

बूँदों के ठिकाने

2

तालाबों का राम दरबार

3

एक अनूठी अन्तिम इच्छा

4

बूँदों से महामस्तकाभिषेक

5

बूँदों का जंक्शन

6

देवडूंगरी का प्रसाद

7

बूँदों की रानी

8

पानी के योग

9

बूँदों के तराने

10

फौजी गाँव की बूँदें

11

झिरियों का गाँव

12

जंगल की पीड़ा

13

गाँव की जीवन रेखा

14

बूँदों की बैरक

15

रामदेवजी का नाला

16

पानी के पहाड़

17

बूँदों का स्वराज

18

देवाजी का ओटा

18

बूँदों के छिपे खजाने

20

खिरनियों की मीठी बूँदें

21

जल संचय की रणनीति

22

डबरियाँ : पानी की नई कहावत

23

वसुन्धरा का दर्द

 


Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Lines and paragraphs break automatically.

More information about formatting options

CAPTCHA
यह सवाल इस परीक्षण के लिए है कि क्या आप एक इंसान हैं या मशीनी स्वचालित स्पैम प्रस्तुतियाँ डालने वाली चीज
इस सरल गणितीय समस्या का समाधान करें. जैसे- उदाहरण 1+ 3= 4 और अपना पोस्ट करें
11 + 3 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.